मौर्य तथा मौर्योत्तर कालीन कला

मौर्य तथा मौर्योत्तर कालीन कला प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जहाँ कला, मूर्तिकला और वास्तुकला ने नए शिखरों को स्पर्श किया। इस काल में विकसित अशोक स्तंभ, गुफा-निर्माण परंपरा और अत्यंत परिष्कृत पॉलिशयुक्त पत्थर की तकनीक मौर्य शिल्पकला की श्रेष्ठता को दर्शाते हैं।

मौर्य तथा मौर्योत्तर कालीन कला

राजकीय कला

 1. राजप्रासाद (दरबारी/राजकीय कला)

  • मौर्यों ने राजनीतिक व धार्मिक दोनों कारणों से बड़े पैमाने पर स्थापत्य कार्य शुरू किए।
  • अशोक से पूर्व मौर्य वास्तुकला की जानकारी यूनानी लेखकों से मिलती है।
  • पाटलिपुत्र का महल 
    • चारों ओर लकड़ी की दीवार
    • 64 द्वार, 570 बुर्ज
    • आकार: चतुर्भुजाकार
    • सुरक्षा हेतु 60 फीट गहरी और 600 फीट चौड़ी खाई
  • चंद्रगुप्त मौर्य का राजप्रासाद –
    • एरियन ने सूसा और एकबेतना के प्रासादों जैसा बताया।
    • ईरान के पर्सेपोलिस के एकमेनियन महलों से प्रेरित।
  • मेगास्थनीज़ ने इसे मानव जाति की “सबसे महान रचनाओं में से एक” कहा।
  • कुम्हरार व बुलंदीबाग:
    • 80 स्तम्भों पर आधारित विशाल भवन
    • लकड़ी का ढांचा
    • सोने-चांदी की सजावट
  • काष्ठ कला अत्यधिक विकसित, नगर नियोजन की यूनानी यात्रियों ने प्रशंसा की।

2. मौर्यकालीन स्तम्भ

मौर्यकाल की सर्वश्रेष्ठ वास्तुकला

  • उद्देश्य:
    • युद्ध विजय
    • राजकीय संदेश/उपदेशों का प्रचार
  • औसत ऊँचाई: 40 फीट
  • सामग्री: चुनार का बलुआ पत्थर
  • एकाश्म (single piece) स्तम्भ— कलाकारों की उच्च तकनीक का प्रमाण।
  • लगभग सभी पर चमकदार मौर्य पॉलिश।
  • चोटी पर: सिंह, सांड, हाथी आदि पशु आकृतियाँ।
  • वेदी: उल्टे कमल की पंखुड़ियों से सजी।
  • शीर्षाकृतियाँ हृष्ट-पुष्ट, प्रभावशाली।
  • प्रमुख स्थल: बसराह-बखीरा, लौरिया-नंदनगढ़, रामपुरवा, सनकिसा, सारनाथ।

स्तम्भ संरचना (Parts)

  1. दण्ड – गोलाकार, नीचे से ऊपर संकरा (ताड़ वृक्ष जैसा)
  2. मेखला – इकहरी/दोहरी, लाट के ठीक ऊपर
  3. वेदी (बैठकी) – गोल/वर्गाकार, उल्टा कमल
  4. कंठा – वेदी के ऊपर
  5. चौकी – गोल/चौकोर
  6. शीर्ष – पशु आकृतियाँ

प्रमुख मौर्यकालीन स्तम्भ – शीर्ष

स्थानशीर्ष आकृति
सारनाथ (UP)4 सिंह
सांची (UP)4 सिंह
लौरिया-नंदनगढ़ (बिहार)सिंह व मोती चुगते हंस
संकिशा (UP)हाथी
रामपुरवा (बिहार)सिंह व बैल
लौरिया-अरेराजखण्डित; R.P. Chadda अनुसार गरुड़
वैशाली (बिहार)1 सिंह

सारनाथ स्तम्भ—सबसे उत्कृष्ट:

  • चार सिंह
  • नीचे: गतिशील घोड़ा, सांड, हिरन आदि

3. स्तूप

 1. स्तूप निर्माण का संदर्भ

  • बौद्ध व जैन धर्म की लोकप्रियता → स्तूपों और विहारों का बड़े पैमाने पर निर्माण।
  • साथ ही हिंदू धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ भी बनती रहीं।

2. स्तूप: परिचय

  • शाब्दिक अर्थ: थूह/ढेर।
  • परिभाषा: अर्द्धगोलाकार टीला/गुंबदाकार स्मारक, जिसमें बुद्ध की अस्थियाँ, अवशेष या पवित्र वस्तुएँ संरक्षित की जाती थीं।

3. स्तूपों के प्रकार

(1) शारीरिक स्तूप
  • सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण।
  • बुद्ध/बौद्ध महापुरुषों की अस्थियाँ, केश, दाँत आदि रखे जाते।
  • उदाहरण: सांची स्तूप (बुद्ध के अवशेष)।
(2) परिभोगिका स्तूप
  • बुद्ध या उनके शिष्यों के उपयोग की वस्तुएँ—भिक्षापात्र, चीवर आदि।
  • उदाहरण: सोपारा स्तूप (मुंबई) – बुद्ध के भिक्षापात्र पर आधारित।
(3) उद्देशिका (स्मारक) स्तूप
  • बुद्ध/शिष्यों के जीवन की प्रमुख घटनाओं से जुड़े स्थानों पर निर्मित।
  • उदाहरण:
    • धम्मचक्क पवत्तन स्तूप (सारनाथ)
    • बुद्धत्व स्तूप (बोधगया)
(4) प्रतीकात्मक स्तूप
  • बौद्ध दर्शन को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाते।
  • उदाहरण: शांति स्तूप (लेह)
(5) मनौती स्तूप
  • श्रद्धालु द्वारा छोटे रूप में निर्मित।
  • सामग्री: धातु, पत्थर, काँच।

4. स्तूप की संरचना (Architecture)

  • अंदर: अधजली ईंट, बाहर: पकी ईंट + मोटा प्लास्टर।
  • अंड (Anda): मुख्य गुंबदाकार ठोस संरचना।
  • मेधी: अंड का आधार/मंडप।
  • हर्मिका: छत्रों के चारों ओर जालीदार वर्गाकार संरचना।
  • छत्र / छत्रावली:
    • 1 छत्र = छत्र
    • अनेक छत्र = छत्रावली
    • 3 छत्र → बुद्ध, धम्म, संघ (त्रिरत्न)
  • यष्टि: स्तंभ जो छत्रावली को सहारा देता है।
  • प्रदक्षिणा-पथ: परिक्रमा मार्ग।
  • वेदिका: प्रदक्षिणा-पथ को घेरे रेलिंग।
मौर्य तथा मौर्योत्तर कालीन कला

स्तूप:

1. प्रारंभिक विकास

  • अशोक से पहले भी स्तूप निर्माण परंपरा प्रचलित।
  • बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद अवशेषों को 8 भागों में बाँटकर 8 स्तूप निर्मित:
    राजगृह, वैशाली, कपिलवस्तु, अल्कप्प, रामग्राम, वेट्ठद्वीप, पावा, कुशीनगर।
  • 9वाँ स्तूप: बुद्ध से संबंधित बर्तन रखा गया।
  • पिपरहवा स्तूप (बस्ती, UP): एकमात्र सुरक्षित प्राचीन स्तूप।

2. स्तूपों पर कला

  • स्तूपों पर बुद्ध के जीवन की 5 प्रमुख घटनाओं के अंकन: जन्म, महाभिनिष्क्रमण, बोधि प्राप्ति, धम्मचक्र प्रवर्तन, महापरिनिर्वाण
  • जातक कथाओं का चित्रण भी मिलता है।

3. मौर्य काल में स्तूप निर्माण

  • अशोक द्वारा बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण → स्तूप कला का चरमोत्कर्ष।
  • परंपरा अनुसार 84,000 स्तूप निर्मित।
  • प्रमुख स्तूप: सांची, चौखंडी (सारनाथ), धर्मराजिका।
  • कनक मुनि स्तूप का भी जीर्णोद्धार।

4. अशोककालीन शेष स्तूप

(1) सांची के 3 स्तूप (मध्य प्रदेश)
  1. महान स्तूप – शारीरिक स्तूप (बुद्ध के अवशेष)।
  2. दूसरा स्तूप – बौद्ध प्रचारकों की अस्थियाँ।
  3. तीसरा स्तूप – सारिपुत्र व महामोद्गल्यायन के अवशेष।
(2) धर्मराजिका स्तूप (सारनाथ, UP)
  • बुद्ध द्वारा प्रथम उपदेश का स्थल।
  • मूल स्वरूप नष्ट; अवशेष शेष।
(3) धर्मराजिका स्तूप (तक्षशिला, पाकिस्तान)
  • गांधार क्षेत्र में अशोक द्वारा निर्मित।
  • बुद्ध के अवशेषों का संरक्षण।
(4) चौखंडी स्तूप (सारनाथ, वाराणसी)
  • ईंट निर्मित; परंपरा अनुसार अशोक का निर्माण।
  • शीर्ष पर अष्टभुजाकार मीनार — मुगल काल (1588, हुमायूँ यात्रा के समय)।
  • हाल ही में ASI द्वारा संरक्षित क्षेत्र घोषित।
मौर्य तथा मौर्योत्तर कालीन कला

5. अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • राजस्थान, बैराठ का स्तूप: ईसा पूर्व 3वीं शताब्दी की संरचना का उत्कृष्ट उदाहरण।
  • मौर्यकाल और बाद में स्तूपों की संख्या तेजी से बढ़ी।
  • संरक्षक: जन-साधारण, गहपति, व्यापारी, कभी-कभी राजा।
  • दान-पत्रों में दानदाताओं व पेशों का उल्लेख मिलता है; कलाकारों के नाम दुर्लभ।
  • कलाकार उदाहरण:
    • पीतलखोड़ा गुफा (महाराष्ट्र) – शिल्पकार कान्हा
    • कोंडाने गुफा – उसका शिष्य बालक
  • शिल्पकार श्रेणियाँ: प्रस्तर उत्कीर्णक, स्वर्णकार आदि।
  • स्तूप निर्माण सामूहिक प्रयास, पर कुछ भाग विशिष्ट संरक्षकों द्वारा।

4. गुफाएँ और विहार : संक्षिप्त नोट्स

विहार

  • बौद्ध भिक्षुओं के आवास हेतु चट्टानों/पहाड़ियों को काटकर बने स्थान = विहार।
  • उद्देश्य: नगरों से दूर श्रमणों के निवास व शिक्षण हेतु।
  • शुरुआत: अशोक द्वारा।
  • निर्माण: राजकीय सहयोग, बाद में शिल्प संघ द्वारा।
  • शुरू में केवल निवास; बाद में महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र बने।

बाराबर पहाड़ी की गुफाएँ (अशोक)

मौर्य तथा मौर्योत्तर कालीन कला
अशोक द्वारा निर्मित गुफाएँ
  • सुदामा गुफा (12वें वर्ष) – धनुषाकार मेहराब।
  • विश्वझोपड़ी गुफा – चट्टान में “अशोक की सीढ़ियाँ”।
  • लोमस ऋषि गुफा – चैत्य चाप (अर्द्धवृत्ताकार) जैसा प्रवेश; गतिमान हाथी की मूर्ति; आयताकार हॉल + पीछे गोलाकार कक्ष; आजीविकों के लिए समर्पित।
  • करण चौपड़ (19वें वर्ष) – शिलालेख; सुपिया गुफा नामांकित।

नागार्जुनी पहाड़ी (दशरथ)

अशोक के पोते दशरथ द्वारा आजीविकों हेतु:

  1. गोपिका/गोपीका-कुभा – सबसे बड़ी।
  2. वदिथिका-कुभा
  3. वापियाका-कुभा

गुफाओं की विशेषताएँ

  • भीतरी दीवारों पर चमकीली पॉलिश।
  • कलात्मक प्रवेश द्वार।

5. लोककला / मौर्यकालीन मूर्तिकला

मौर्यकाल

  • अशोक काल में मूर्तिकला का उत्कर्ष—यह स्वतंत्र कला बनी।
  • संरक्षण: स्थानीय राज्यपाल व स्थानीय कलाकार, राजकीय संरक्षण कम।
  • उपयोग: स्तूप सजावट, तोरण, मेधी, धार्मिक अभिव्यक्ति।

यक्ष–यक्षिणी मूर्तियाँ

  • निर्माण: ईसा पूर्व 3री शताब्दी।
  • पहला उल्लेख: तमिल रचना शिलप्पादिकारम।
  • प्रमुख स्थल: पटना, विदिशा, मथुरा।
  • सामग्री: चुनार बलुआ पत्थर, चिकनी पॉलिश।
  • विशेषताएँ: प्राकृतिक चेहरे, अंग-उभार स्पष्ट।

दीदारगंज यक्षिणी (पटना)

  • अवस्थिति: पटना के पास, अब पटना संग्रहालय में।
  • ऊँची, संतुलित, लालित्यपूर्ण प्रतिमा; दाहिने हाथ में चामर।
  • गोल, मांसल शरीर; चेहरा भरा हुआ; तीखी नाक, होंठ, आँखें।
  • मौर्यकालीन पॉलिश और नारी-सौंदर्य का श्रेष्ठ उदाहरण।

अन्य मूर्तियाँ

  • धौली चट्टान का हाथी (ओडिशा)—अशोक शिलालेख के साथ; विशाल, बलिष्ठ रूप।
  • लोमस ऋषि गुफा का हाथी (बिहार)—गतिमान स्वरूप।
  • बोधगया का वज्रासन—चुनार पत्थर; मौर्यकालीन पॉलिश।
  • यक्ष–यक्षी मूर्तियाँ (मुख्य लोक कला):
    • मथुरा (परखम ग्राम): मणिभद्र यक्ष
    • पटना (दीदारगंज): चामर-धारिणी यक्षी
    • बेसनगर: यक्षी
    • ग्वालियर: मणिभद्र यक्षी
    • वाराणसी (राजघाट): त्रिमुख यक्ष
    • शिशुपालगढ़: यक्ष
    • विदिशा: यक्षी
  • अन्य महत्वपूर्ण खोजें:
    • पटना (बुलंदीबाग): नर्तकी की मृण्मूर्ति, 24 तीलियों वाला रथ का पहिया
    • उड़ीसा (धौली): चट्टान काटकर हाथी की आकृति
    • लोहानीपुर (पटना): दो जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ
    • अयोध्या: मौर्यकालीन मृण्मूर्तियाँ
    • कालसी (देहरादून): गजतमे अंकित हाथी की मूर्ति
    • रोपड़: हाथीदांत की मुहर—शासक का नाम भदूपालकस लिखा
    • कनगनहल्ली: अशोक की मूर्ति—इस पर रान्यो अशोक लिखा

मौर्य कला की प्रमुख विशेषताएँ

  • अत्यंत बारीकी, अनुपातिकता, यथार्थवाद।
  • प्रसिद्ध मौर्य पॉलिश – अत्यंत चमकदार सतह।
  • नारी सौंदर्य का सौष्ठव और लालित्य।

6. मौर्यकालीन मृदभाण्ड 

विशेषताएँ

  • मौर्य–प्राक् मौर्य युग की सर्वाधिक विकसित परंपरा।
  • उपयोग: विलासिता के पात्र।
  • गुण:
    • अत्यंत पतले, हल्के।
    • बेहतरीन गुथी हुई मिट्टी।
    • जलोढ़ मिट्टी का प्रयोग।
    • अत्यधिक चमक—काला या गहरा रंग।

अधिकांश अन-अलंकृत; कुछ चित्रित पात्र स्थल:
हस्तिनापुर, कौशाम्बी, श्रावस्ती, चंपा।

1. राजनीतिक स्थिति

  • मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया।
  • उत्तर भारत में प्रमुख राजवंश: शुंग, कण्व, कुषाण, शक
  • दक्षिण–पश्चिम भारत में प्रमुख राजवंश: सातवाहन, इक्ष्वाकु, आभीर, वाकाटक

2. धार्मिक विकास

  • इस काल में ब्राह्मण संप्रदायों का विस्तार:
    • शैव
    • वैष्णव
    • शाक्त
  • इन संप्रदायों ने अपने पूजा-स्थलों व मूर्तिकला की विशिष्ट परंपराएँ विकसित कीं।

3. कला और स्थापत्य में परिवर्तन

  • मौर्यकालीन परंपरा जारी:
    • चट्टानों को काटकर गुफा निर्माण,
    • स्तूपों का विस्तार,
    • शिल्प और मूर्तिकला का विकास।
  • नए राजवंशों ने अपनी क्षेत्रीय विशेषताएँ जोड़ीं, जिससे कला में विविधता आई।

4. विदेशी संपर्क का प्रभाव

  • इस काल में विदेशी प्रभाव (Indo-Greek, Shaka, Kushan) महत्वपूर्ण रहा।
  • इनके प्रभाव से:
    • नए कला केंद्र विकसित हुए।
    • मूर्तिकला अत्यधिक विकसित हुई और चरम पर पहुँची।
    • गांधार, मथुरा जैसी शैलियों का उदय।

स्थापत्य कला

1. स्तूप निर्माण का उत्कर्ष

  • मौर्योत्तर काल स्तूप निर्माण कला के चरमोत्कर्ष का समय।
  • कारण:
    • आर्थिक समृद्धि,
    • श्रेणी संघों (guilds) के दान,
    • सीमित मात्रा में राजकीय संरक्षण।

2. निर्माण सामग्री में परिवर्तन

  • लकड़ी और ईंट के स्थान पर प्रस्तर (पत्थर) का प्रयोग बढ़ा।
  • स्तूप अधिक विशाल, स्थायी और अलंकृत बनाए गए।

3. शुंग कालीन विकास

  • तोरणों (गेटवे) का निर्माण शुंगों के समय आरंभ।
  • तोरणों की विशेषताएँ:
    • सुंदर उत्कीर्णन,
    • जटिल आकृतियाँ व पैटर्न,
    • हेलेनिस्टिक (यूनानी) प्रभाव दिखाई देता है।
  • प्रमुख उदाहरण:
    • भरहुत स्तूप (मध्य प्रदेश)
    • सांची स्तूप के तोरण

4. दक्षिण भारत में स्तूप निर्माण

  • कृष्णा घाटी क्षेत्र में स्तूप निर्माण का बड़ा केंद्र।
  • संरक्षण देने वाले:
    • इक्ष्वाकु,
    • सातवाहन।
  • प्रमुख स्थल:
    • अमरावती,
    • नागार्जुनकोंडा,
    • जगय्यपेट,
    • गोलिघंटशाला,
    • भट्टीप्रोलूरू।
  • इन स्तूपों में अत्यंत विकसित श्वेत संगमरमर मूर्तिकला और बारीक उत्कीर्णन मिलता है।

अमरावती स्तूप : वास्तुकला व विकास के चरण

  • निर्माण : लगभग 200 ई.पू., सातवाहन शासकों द्वारा, अमरावती (आंध्र) में।
  • स्थिति : कृष्णा नदी के दाहिने तट पर।
  • माप : व्यास 108 फीट, ऊँचाई 14–15 फीट।
  • संरचना :
    • संगमरमर आवरण, बड़ा गुम्बद, प्रदक्षिणा पथ, तोरण।
    • वेदिका पर बौद्ध धर्म से संबंधित दृश्य उत्कीर्ण।
  • खोज : कर्नल मैकेंजी (1797 ई.) ने विध्वंसित अवस्था में देखा।
मौर्य तथा मौर्योत्तर कालीन कला
विकास के 4 चरण
  1. 200 ई.पू.–100 ई. : प्रारंभिक निर्माण, वेदिका पर काल्पनिक पशु, मानव, बुद्ध के प्रतीक।
  2. 100–150 ई. : शिल्पकला स्वाभाविक; सजावटी मूर्तियाँ; प्रतीक अधिक वास्तविक।
  3. 150–200 ई. : शिल्पकला का चरम; बुद्ध जीवन, जातक कथाएँ सुंदरता से अंकित।
  4. 200–250 ई. : लंबी मूर्तियाँ; गहरी मानवीय अभिव्यक्ति; अलंकरण व जातक दृश्य प्रमुख।

2. साँची स्तूप संख्या-1 : भौतिक व सौंदर्य विशिष्टताएँ

  • स्थान : साँची (भोपाल से 50 किमी); यूनेस्को विश्व धरोहर।
  • प्रमुख : स्तूप 1, 2, 3; स्तूप 1 में बुद्ध अवशेष।
भौतिक विशेषताएँ
  • मूल ढाँचा : अशोक द्वारा ईंटों का छोटा स्तूप, बाद में पत्थर, वेदिका, तोरण जोड़े गए।
  • गुम्बद : ऊँचाई 54 फीट, व्यास 120 फीट।
  • प्रदक्षिणा पथ : दो—ऊपरी और निचला।
  • तोरणद्वार : 4 तोरण (1st century BCE)। तिहरी बड़ेरियाँ, शेर, हाथी, धर्मचक्र, यक्ष आदि उकेरित।
  • प्रतीकात्मक बुद्ध : सिंहासन, पदचिह्न, छत्र, स्तूप रूप में।
  • भार वहन संरचना : हाथी/बौने; सजावट हेतु यक्षिणियाँ।
सौंदर्य विशेषताएँ
  • मूर्तियाँ उभारदार, स्वाभाविक, शरीर में कठोरता नहीं।
  • हाव-भाव व मुद्राएँ स्वाभाविक।
  • बुद्ध निराकार/प्रतीक रूप में दर्शाए गए।

3. चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएँ

  • निर्माण मौर्योत्तर काल में भी जारी रहा।
  • दो प्रकार :
    • विहार—भिक्षुओं के आवास कक्ष।
    • चैत्य—प्रार्थना कक्ष; समतल छत वाले चतुष्कोणीय कक्ष।
  • विशेषताएँ :
    • वर्षा से बचाव हेतु खुले प्रांगण, पत्थर-रोड़ी दीवारें।
    • मानव व पशु आकृतियों से सजावट।
  • उदाहरण :
    • कार्ले का चैत्य हॉल
    • अजंता : 29 गुफाएँ (25 विहार + 4 चैत्य)

4. उदयगिरि व खंडगिरी की गुफाएँ (ओडिशा)

  • स्थान : भुवनेश्वर के निकट।
  • काल : 1st–2nd century BCE, कलिंग राजा खारवेल द्वारा।
  • प्रकृति : मानव निर्मित + प्राकृतिक दोनों प्रकार की।
  • उद्देश्य : संभवतः जैन भिक्षुओं के निवास।
  • संख्या :
    • उदयगिरि – 18 गुफाएँ
    • खंडगिरी – 15 गुफाएँ
  • प्रमुख :
    • हाथीगुम्फा अभिलेख (ब्राह्मी लिपि); खारवेल के सैन्य अभियानों व “जैन नमोकर मंत्र” का उल्लेख।
    • रानीगुम्फा : दो-मंजिला, सुंदर मूर्तियाँ।

मूर्तिकला

इस काल में मूर्तिकला के क्षेत्र में तीन स्वतंत्र शैलियों का विकास हुआ – 

  1. गांधार शैली
  2. मथुरा शैली
  3. अमरावती शैली

उत्तर भारत में कला केंद्र (1st CE onwards)

  • प्रमुख केंद्र: गांधार (पाकिस्तान), मथुरा, वेन्गी/अमरावती (आंध्र)।
  • मथुरा व गांधार में बुद्ध के प्रतीकात्मक रूप को मानव रूप मिला।

1. गांधार शैली

उत्पत्ति व विकास

  • प्रमुख संरक्षण: कनिष्क, यवन, शुंग, कुषाण।
  • क्षेत्र: पेशावर, अफगानिस्तान के निकट पश्चिमी पंजाब; सिंधु नदी के दोनों ओर।
  • प्रभाव: ग्रीक–रोमन + बैक्ट्रिया + पार्थियन + स्थानीय गांधार परंपरा।
  • केंद्र: तक्षशिला, कपिशा, पुष्कलावती, शाहजी की ढेरी, बेग्राम।
  • समय: 50 BCE – 500 CE, दो चरण—
    • प्रारंभिक: नीले-धूसर बलुआ पत्थर
    • उत्तरवर्ती: मिट्टी, प्लास्टर
  • रूपांकन: बुद्ध-बोधिसत्त्व की मूर्तियाँ ग्रीक देवता अपोलो जैसी।
मुख्य विशेषताएँ
  • शैली यूनानी, विषय भारतीय (मायादेवी का स्वप्न, जन्म, विवाह, धर्मचक्र प्रवर्तन, जातक)।
  • “इंडो-ग्रीक आर्ट” नाम।
  • बाल घुँघराले, मुख गोल, प्रभामंडल (हेलो) विदेशी परंपरा से प्रेरित।
  • पगड़ी/मूँछ—अभारतीय प्रभाव।
  • मूर्तियाँ सामने से उभरी हुई; शरीर मांसल और बलिष्ठ।
  • बोधिसत्त्व मूर्तियाँ—राजसी, भारी आभूषण, सलवटों वाला वस्त्र।
    • पद्मपाणि (कमल), मंजुश्री (पुस्तक), मैत्रेय (सुराही)।
  • सामग्री: काला स्लेट, चूना पत्थर, पक्की मिट्टी।
  • विशेषताएँ: सूक्ष्म अंग-सौष्ठव, शारीरिक सौंदर्य, आभूषणों का प्रयोग।
  • उदाहरण: बुद्ध मुख (तक्षशिला), मथुरा के सप्त ऋषि टीले से प्राप्त एक स्त्री की प्रतिमा।
  • मथुरा के सप्त ऋषि टीले से प्राप्त एक स्त्री की प्रतिमा।

2. मथुरा शैली

विकास व क्षेत्र

  • काल: कुषाण काल (50–300 CE)।
  • केंद्र: मथुरा, सारनाथ, श्रावस्ती।
  • स्थानीय परंपरा पर आधारित; पूर्णतः भारतीय, विदेशी प्रभाव रहित।
  • सामग्री: लाल बलुआ पत्थर।
  • महत्त्व:
    • बुद्ध की पहली मानव प्रतिमाएँ यहीं बनीं।
    • प्रथम हिंदू मूर्तियाँ (विष्णु, शिव, दुर्गा, कार्तिकेय)।
    • प्राचीन जैन मूर्तियाँ (कायोत्सर्ग, पद्मासन, ध्यानमुद्रा)।

बौद्ध प्रतिमाएँ

  • बलिष्ठ शरीर, पद्मासन; दायाँ हाथ अभय मुद्रा।
  • हथेली/तलवों पर धर्मचक्र व त्रिरत्न।
  • सिंहासन के नीचे/पैरों के बीच सिंह।
  • वस्त्र स्पष्ट, बायां कंधा ढका।
  • चेहरा गोल, हल्की मुस्कान; प्रभामंडल साधारण।
  • स्थानक व आसनगत दोनों प्रकार।

हिंदू प्रतिमाएँ

  • विष्णु: शंख–चक्र–गदा–अभय; नृसिंह, वराह, शेषशायी रूप; अष्टभुज प्रतिमाएँ भी।
  • शिव: लिंग (एकमुखी, पंचमुखी), अर्धनारीश्वर, नन्दिकेश्वर।
  • विशेषता: कोमलता, अलौकिक मुखमंडल।

जैन प्रतिमाएँ

  • खड़ी मूर्तियाँ—दिगंबर, कायोत्सर्ग, श्रीवत्स।
  • बैठी मूर्तियाँ—ध्यान मुद्रा।
  • प्रमुख: ऋषभदेव, पार्श्वनाथ, महावीर।
अन्य मूर्तियाँ
  • यक्ष–यक्षिणियाँ (प्रसाधिका, स्नान करती यक्षिणी)।
  • कनिष्क की बिनासिर वाली मूर्ति—लबादा, भारी जूते, ज्यामितीय सलवटें।
विकास के चरण
  • 2nd–4th CE: गोलाई व मांसलता बढ़ी; ‘कटरा टीला बुद्ध’ प्रमुख।
  • 5th–6th CE: पारदर्शी वस्त्र दर्शाने की कला विकसित।
  • उदाहरण: पद्मासन बुद्ध की प्रतिमा
  • आसनस्थ बुद्ध (सारनाथ)। 
पद्मासन बुद्ध की प्रतिमा
आसनस्थ बुद्ध (सारनाथ)

3. अमरावती शैली

विकास व क्षेत्र

  • संरक्षक: सातवाहन, इक्ष्वाकु।
  • केंद्र: अमरावती, नागार्जुनकोंडा, घण्टशाल (कृष्णा–गोदावरी घाटी)।
  • मथुरा के समान विषय विविधता; संगमरमर का अधिक उपयोग।
  • विषय: बुद्ध जीवन प्रसंग, मायादेवी का स्वप्न, राजदरबार, नृत्य, लोकजीवन।
मुख्य विशेषताएँ
  • गतिशीलता व जटिल संयोजन; लचीली रेखाएँ, जीवंत आकृतियाँ।
  • त्रिभंग मुद्रा का व्यापक प्रयोग।
  • नारी आकृतियाँ—स्वाभाविक, सुंदर, त्रिभंगी, ऊपरी भाग अनावृत।
  • पुरुष—लंबे, पतले, पगड़ी/पटका युक्त।
  • उभारदार त्रिआयामी शिल्प; कोणीय शरीर व अतिव्याप्ति।
  • अलंकरण, वस्त्र, आभूषणों का सूक्ष्म अंकन; भक्ति + अलंकारिता।

भरहुत की मूर्तिकला

शुंगकालीन पृष्ठभूमि

  • शुंगकाल: 188 ई.पू.–30 ई.पू.
  • स्थापना: पुष्यमित्र शुंग (मौर्य के अंतिम शासक वृहद्रथ की हत्या कर सत्ता स्थापित)
  • कला केन्द्र: सांची, भरहुत, बोधगया, मथुरा आदि।
  • भरहुत: सतना (मध्य प्रदेश) — शुंगकालीन मूर्तिकला का प्रमुख स्थल।

मुख्य विशेषताएँ

1. संरचनात्मक विशेषताएँ

  • स्तूप के कटघरे, द्वार और खंभे स्थूल, भारी और मजबूत।
  • मूर्तियाँ भी भारी व मोटे रूपांकन की।

2. विषय-वस्तु

  • यक्ष, यक्षिणी, नाग, बौद्ध धर्म से जुड़े दृश्य।
  • कुल 40 जातक कथाओं पर आधारित मूर्तियाँ।
  • 6 मूर्तियाँ बुद्ध के जीवन की ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित।

कलात्मक विशेषताएँ

3. आकृतिक शैली

  • दीर्घाकार प्रतिमाएँ।
  • हल्का उभार (low relief) लेकिन रेखिकता बहुत स्पष्ट।
  • शरीर कड़ा, तना हुआ, हाथ-पैर शरीर से चिपके हुए।

4. आख्यात्मक (Narrative) शैली

  • तीन आयामों का भ्रम उत्पन्न—एक ओर झुके परिप्रेक्ष्य का प्रयोग।
  • कथानक की स्पष्टता—घटनाएँ मुख्य पात्रों तक सीमित।
  • जटिल कथानकों में समय के अनुसार सहायक पात्र जोड़े गए।
  • कई बार एक ही पैनल में एकाधिक घटनाओं का संयोजन।
  • चित्रात्मक भाषा के माध्यम से प्रभावी वर्णन 
  • उदाहरण
  • महारानी मायादेवी का स्वप्न (सिद्धार्थ के जन्म का पूर्वाभास)
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