मराठा साम्राज्य भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसने 17वीं–18वीं शताब्दी में राजनीतिक, सैन्य और प्रशासनिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत विषय के अंतर्गत मराठा साम्राज्य की स्थापना, विस्तार और उसकी शासन व्यवस्था का विशेष अध्ययन किया जाता है।
मराठा साम्राज्य

शिवाजी (1627-1680 ई.)
- जन्म – 20 अप्रैल, 1627 पूना के निकट शिवनेर के किले में हुआ।
- शिवाजी के पिता – शाहजी भौसले, माता – जीजाबाई था।
- शिवाजी के गुरु – समर्थ रामदास।
- 1637 ई. में शाहजी भौसले ने अपने पुत्र शिवाजी तथा पत्नी जीजाबाई को लेकर अपनी पैतृक जागीर की देखभाल का दायित्व दादोंजी कोंडदेव को सौंपकर कर्नाटक चले गए।
- शिवाजी का मूल उद्देश्य – मराठों की बिखरी हुई शक्ति को एकत्रित करके महाराष्ट्र (दक्षिण भारत) में एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना करना था।
- शिवाजी ने हिन्दुत्व धर्मोद्धारक उपाधि धारण की। शिवाजी ने हिन्दू पद पादशाही को ग्रहण किया। गया और ब्राह्मणों की रक्षा का व्रत लिया।
सैन्य अभियान
- शिवाजी ने 1643 ई. में बीजापुर के सिंहगढ़ के किले पर अधिकार किया। 1646 ई. में उन्होंने तोरण पर अधिकार कर लिया।
- 1656 ई. तक शिवाजी ने चाकन, पुरन्दर, बारामती, सूपा, तिकोना, लोहगढ़ आदि विभिन्न किलों पर अधिकार कर लिया।
- 1656 में शिवाजी की महत्त्वपूर्ण विजय जावली की थी। जावली एक मराठा सरदार चन्द्रराव मोरे के अधिकार में था।
- अप्रैल, 1656 में शिवाजी ने रायगढ़ के किले पर कब्जा कर लिया।
- 1657 ई. में शिवाजी का मुकाबला पहली बार मुगलों से हुआ, जब वह बीजापुर की तरफ से मुगलों से लड़ा। इसी समय शिवाजी ने जुन्नार को लूटा। कुछ समय बाद मुगलों के उत्तराधिकार युद्ध का लाभ उठाकर उसने अपनी सैनिक गतिविधियाँ पुन: आरम्भ की।
- शिवाजी के इस विस्तारवादी नीति से बीजापुर शासक सशंकित हो उठा उसने शिवाजी की शक्ति को दबाने तथा उसे कैद करने के लिए 1659 ई. में अपने योग्य सरदार अफजल खाँ के नेतृत्व में एक सैनिक टुकड़ी भेजी। प्रतापगढ़ के किले में शिवाजी ने अफजल ख़ाँ की हत्या कर दी।
- अफजल खाँ के उद्देश्य की सूचना दूत कृष्णजी भास्कर ने शिवाजी को दी
- 1660 ई. में मुगल शासक औरंगजेब ने शाइस्ता खाँ को दक्षिण का गवर्नर नियुक्त किया।
- 15 अप्रैल, 1663 में शिवाजी रात्रि में चुपके से पूना में प्रवेश कर शाइस्ता खाँ के महल पर आक्रमण कर दिया। शाइस्ता खाँ इस अचानक घबराकर भाग खड़ा हुआ। इस आक्रमण के कारण मुगलों को क्षति पहुँची तथा शिवाजी की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई।
- 1664 ई. में शिवाजी ने सूरत पर धावा बोल दिया। (प्रथम लूट – 22 मई, 1664 ई.)
- औरंगजेब ने आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह को दक्षिण भेजा। जयसिंह ने समझ लिया कि बीजापुर को जीतने के लिए शिवाजी से मैत्री आवश्यक है। जयसिंह ने शिवाजी को पुरन्दर की संधि (1665 ई.) के लिए बाध्य किया।
- जून, 1665 पुरन्दर की सन्धि के अनुसार :-
- शिवाजी को चार लाख हूण वार्षिक आय वाले 23 किले मुगलों को सौंपने पडे़ शिवाजी के पास मात्र बारह किले बचे।
- मुगलों ने शिवाजी के पुत्र शम्भा जी को पंचहजारी एवं उचित जागीर देना स्वीकार किया।
- शिवाजी ने बीजापुर के विरुद्ध मुगलों को सैनिक सहायता देने वायदा किया।
- 1666 ई. में शिवाजी जयसिंह के आश्वासन पर औरंगजेब से मिलने आ आये, पर उचित सम्मान न मिलने पर दरबार से उठकर चले गए औरंगजेब ने उन्हें कैद कर जयपुर भवन (आगरा) में रखा। परन्तु शिवाजी आगरा के किले की कैद से फरार होने में सफल हो गए।
- औरंगजेब ने शिवाजी के इस समझौते को स्वीकार कर शिवाजी को राजा की उपाधि प्रदान की तथा उसके पुत्र शम्भा जी को बरार में एक जागीर दी।
- 1670 ई. में शिवाजी का मुगलों से पुनः युद्ध आरम्भ हो गया।पुरन्दर की संधि द्वारा खोये गए अपने अनेक किलों को शिवाजी ने पुनः जीता जिसमें कोंडाना किला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था। शिवाजी ने इसका नाम सिंहगढ़ रखा।
- 1670 ई. में शिवाजी ने तीव्रगति से सूरत पर पुनः आक्रमण किया और उसे लूटा तथा मुगलों से चौथ की मांग की (सूरत की दूसरी लूट)
- 6 जून, 1674 को शिवाजी ने काशी के प्रसिद्ध विद्वान गंगाभट्ट से अपना राज्याभिषेक रायगढ़ में करवाया।
- शिवाजी का दूसरा राज्यभिषेक निश्छल पुरी गोस्वामी नामक तांत्रिक ने 4 अक्टूबर / 24 Sep1674 को किया।
शिवाजी का प्रशासन
- शिवाजी की प्रशासनिक व्यवस्था अधिकांशत: दक्षिणी राज्यों और मुगलों की प्रशासनिक व्यवस्था से प्रभावित थी। जिसके शीर्ष पर छत्रपति होता था।
- शिवाजी के प्रशासन में अष्टप्रधान नामक आठ मंत्री होते थे।
- सुरुनवीस अथवा सचिव – राजकीय पत्र व्यवहार का कार्य देखना तथा परगनों के हिसाब की जाँच करना आदि।
- अमात्य/मजूमदार – यह वित्त एवं राजस्व मंत्री।
- सेनापति अथवा सर-ए-नौबत – सेना की भर्ती, संगठन, रसद आदि का प्रबन्ध करता था।
- वाकिया नवीस अथवा मंत्री – राजा के दैनिक कार्यों तथा दरबार की प्रतिदिन की कार्यवाहियों का विवरण रखता था। (वर्तमान गृहमंत्री)
- दबीर / सुमन्त – यह विदेश मंत्री होता था।
- पण्डितराव – विद्वानों और धार्मिक कार्यों के लिए दिए जाने वाले अनुदानों का दायित्व निभाता था।
- पेशवा अथवा मुख्य प्रधान – यह राजा का प्रधानमंत्री होता था। इसका कार्य सम्पूर्ण राज्य के शासन की देखभाल करना था। राजा की अनुपस्थिति में उसके कार्यों की देखभाल भी करता था। सरकारी पत्रों तथा दस्तावेजों पर राजा के नीचे अपनी मुहर लगाता था।
- न्यायाधीश- यह मुख्य न्यायाधीश होता था (राजा के बाद)। इसके अधिकार क्षेत्र में राज्य के समस्त दीवानी तथा फौजदारी के मामले आते थे।
- शिवाजी ने अपने राज्य को चार प्रान्तों में विभक्त किया। प्रत्येक प्रान्त राज प्रतिनिधि के अधीन होता था।
- प्रान्तों (सूबा) को परगना और तालुकों में विभाजित किया गया था।
- जागीर प्रथा समाप्त कर दी गई थी तथा अधिकारियों को नकद वेतन प्रदान किया जाता था।
सेना
- शिवाजी ने एक नियमित तथा स्थायी सेना रखी। सेना का मुख्य भाग पैदल और घुड़सवार सेना थी। घुड़सवार सेना दो भागों में विभक्त थी।
- बरगीर- वे घुडसवार सैनिक थे जिन्हें राज्य की ओर से घोड़े और शस्त्र दिए जाते थे।
- सिलेदार- ये स्वतन्त्र सैनिक थे जो अपना अस्त्र-शस्त्र स्वयं रखते थे।
- पच्चीस अश्वारोहियों की एक टुकड़ी होती थी।
- 25 घुड़सवार-एक हवलदार के अधीन होते थे।
- 5 हवलदार-एक जुमलादार के अधीन होते थे।
- 10 जुमलादार-एक हजारी के अधीन होते थे।
- 5 हजारी-एक पंचहजारी के अधीन होते थे।
- पंचहजारी सर-ए-नौबत के अधीन होते थे ।
- सर-ए-नौबत सम्पूर्ण घुड़सवार सेना का प्रधान होता था।
- शिवाजी की सेना में मुसलमान सैनिक भी होते थे।
- किले में तीन अधिकारी होते थे-(1) हवलदार (2) सर-ए-नौबत (3) सबनीस हवलदार।
- सर-ए-नौबत मराठा तथा सबनीस ब्राह्मण होते थे।
- सबनीस (ब्राह्मण) नागरिक (असैनिक) और राजस्व प्रशासन देखता था। रसद और सैनिक सामग्री की देखभाल कारखाना नवीस करता था।
- सैनिकों को नकद वेतन दिया जाता था।
- वास्तव में पहाड़ी दुर्ग और उसके आसपास के क्षेत्र, जो हवलदार के अधीन होते थे, शिवाजी की प्रशासनिक इकाई थे। हवलदार के नेतृत्व में विभिन्न जातियों के सैनिकों की भर्ती करके दुर्ग सेना का गठन किया जाता था।
- शिवाजी ने कोलाबा में एक जहाजी बेड़े का भी निर्माण करवाया जो दो कमानों में बँटी हुई थी। एक दारिया सारंग (मुसलमान) तथा दूसरी नायक (हिन्द) के अधीन रहती थी।
- मावली सैनिक शिवाजी के अंगरक्षक थे। मावली एक पहाड़ी लड़ाकू जाति थी।
राजस्व प्रशासन
- शिवाजी की राजस्व व्यवस्था अहमदनगर राज्य में मलिक अम्बर द्वारा अपनायी गई रैय्यतवाड़ी प्रथा पर आधारित थी।
- शिवाजी ने भूमि को ठेके पर देने की प्रथा को त्याग दिया।
- भूमि की पैमाइश के आधार पर उत्पादन का अनुमान लगाया जाता था तथा किसान से लगान निर्धारित किया जाता था।
- केन्द्रीय अधिकारी द्वारा राजस्व एकत्रित किया जाता था।
- आरम्भ में शिवाजी ने पैदावार का 33 प्रतिशत लगान वसूल करवाया। परन्तु बाद में स्थानीय करों तथा चुंगियों को माफ करने के बाद इसे बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दिया।
- राजस्व नकद या वस्तु (अनाज) के रूप में चुकाया जा सकता था। नए इलाके बसाने को प्रोत्साहन देने के लिए किसानों को लगान मुक्त भूमि प्रदान की जाती थी।
- शिवाजी के आदेश पर 1679 ई. में अन्नाजी दत्तो ने एक विस्तृत भू सर्वेक्षण करवाया जिसके फलस्वरूप एक नए राजस्व निर्धारण हुआ।
- लगान व्यवस्था के लिए शिवाजी का राज्य 16 प्रान्तों में बाँटा गया था। तरफ का प्रधान कारकून कहलाता था। और प्रान्त का अधिकारी सूबेदार कहलाता था।
- गाँव के प्राचीन पैतृक अधिकारी पाटिल और जिले के देशमुख या देशपाण्डे होते थे।
- भूमि की पैमाइश रस्सी के स्थान पर काठी या जरीब से किया जाता था। खेतों का विवरण रखने के लिए भू-स्वामियों से कबूलियत ली जाती थी।
चौथ
- चौथ विजित राज्यों के क्षेत्रों से उपज के एक चौथाई (1/4 भाग) के रूप में वसूल किया जाता था।\
- रानाडे के अनुसार ‘चौथ सैन्य-कर था’, जो तीसरी शक्ति के आक्रमण से सुरक्षा प्रदान करने के बदले में वसूल किया जाता था।
- यदुनाथ सरकार के अनुसार ‘यह मराठा आक्रमण से बचने के एवज में वसूल किया जाने वाला कर था।’
सरदेशमुखी–
- यह आय का 10 प्रतिशत या 1/10 अंश के रूप में होता था, जो एक अतिरिक्त कर था।
- चौथ की आय का बँटवारा– बबती अर्थात् 1/4 भाग राजा के लिए, सहोत्रा अथवा 6 प्रतिशत पन्त सचिव के लिए, नाडगुण्डा अथवा 3 प्रतिशत राजा की इच्छा पर निर्भर था तथा शेष मोकास अथवा 66 प्रतिशत मराठा सरदारों को घुड़सवार रखने के लिए दिया जाता था।
- सरदेशमुखी भी चौथ की तरह था, लेकिन जब यह प्रदेश सीधा मराठा साम्राज्य में विलय कर लिया जाता था तो 66 प्रतिशत (मोकासा) जागीर के रूप में बाँट दिया जाता था।
न्याय प्रशासन
- गाँव के आपराधिक मामलों की सुनवाई पटेल किया करता था जो आज के तहसीलदार के समान होता था।
- दीवानी और फौजदारी के मामलों की अपील की सुनवाई ब्राह्मण न्यायाधीश करते थे। उनके निर्णय प्राचीन स्मृतियों के आधार पर होते थे।
- अपील की अंतिम अदालत हाजिर-मजलिस थी।
शम्भाजी (1680-1689 ई.)
- शिवाजी की मृत्यु रायगढ़ किले होने के बाद नवगठित मराठा साम्राज्य में आन्तरिक फूट पड़ गई। शिवाजी की दो पत्नियों से उत्पन्न दो पुत्रों – शम्भा जी और राजाराम के बीच उत्तराधिकार का विवाद खड़ा हो गया।
- शम्भा जी, राजाराम को गद्दी से उतारकर 20 जुलाई, 1680 को सिंहासनारूढ़ हुए।
- 11 मार्च, 1689 में औरंगजेब ने शम्भाजी की हत्या करवा दी तथा उसकी राजधानी रायगढ़ पर कब्जा कर लिया तथा उसके पुत्र शाहु और पत्नी येसूबाई को गिरफ्तार कर रायगढ़ के किले में कैद करवा दिया।
राजाराम (1689-1700 ई.)
- शम्भा जी की मृत्यु के बाद उसके सौतेले भाई राजाराम को मराठा मंत्रिपरिषद् ने राजा घोषित किया।
- 1689 ई. में राजाराम मुगलों के आक्रमण की आशंका से रायगढ़ छोड़कर जिंजी भाग गया। 1698 तक जिंजी मुगलों के विरुद्ध मराठा गतिविधियों का केन्द्र तथा मराठा साम्राज्य की राजधानी रही।
- जिंजी के बाद 1699 ई. से सतारा मराठों की राजधानी बनी।
- 1689 ई. तक मुगलों ने सम्पूर्ण मराठा क्षेत्र पर अधिकार कर लिया ।
- 1700 ई. में राजाराम की मृत्यु हो गई।
शिवाजी द्वितीय तथा ताराबाई (1700-1707 ई.)
- राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी ताराबाई ने अपने पुत्र को शिवाजी द्वितीय के नाम से गद्दी पर बैठाया और मुगलों से संघर्ष जारी रखा।
- उसने (ताराबाई) रायगढ़, सतारा तथा सिंहगढ़ आदि किलों को मुगलों से जीत लिया।
शाहू (1707-1748 ई.)
- औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र आजमशाह ने 8 मई, 1707 शाहू को कैद से मुक्त कर दिया।
- परन्तु कैद से मुक्त होने के बाद जब शाहू सतारा पहुँचे, तब तक ताराबाई ने शिवाजी द्वितीय को छत्रपति घोषित कर दिया था।
- 12 अक्टूबर, 1707 में शाहू तथा ताराबाई के मध्य ‘खेड़ा का युद्ध‘ हुआ जिसमें शाहू, बालाजी विश्वनाथ की मदद से विजयी हुआ।
- 1708 ई. में शाहू ने सतारा पर अधिकार कर लिया।
- शिवाजी द्वितीय की मृत्यु के बाद राजाराम का दूसरा पुत्र शम्भाजी कोल्हापुर की गद्दी पर बैठा। इन दो प्रतिद्वन्दी शक्तियों (सतारा तथा कोल्हापुर) के मध्य शत्रुता अन्तत: 1731 ई. में वार्ना की सन्धि के द्वारा समाप्त हुई।
- इस सन्धि में यह व्यवस्था की गई कि शम्भा जी द्वितीय मराठा राज्य के दक्षिणी भाग पर जिसकी राजधानी कोल्हापुर थी, शासन करे तथा उत्तरी भाग जिसकी राजधानी सतारा थी, पर शाहू शासन करे।
पेशवाओं के काल में मराठा शक्ति का उत्कर्ष
पेशवाओं की शक्ति का उत्थान शाहू व राजाराम की विधवा पत्नी ताराबाई के मध्य चल रहे गृह युद्ध के दौरान हुआ।
बालाजी विश्वनाथ (1713-1720)
- बालाजी विश्वनाथ ने राजस्व अधिकारी के रूप में जीवन शुरू किया।
- 1699 से 1708 तक बालाजी धनाजी की सेवा में रहे। उनकी मृत्यु के बाद 1708 में बालाजी शाहू की सेवा में आए।
- शाहू ने बालाजी को सेनाकर्ते (सैना के व्यवस्थापक) की पदवी दी।
- 1713 में शाहू ने बालाजी को पेशवा या मुख्य प्रधान नियुक्त किया।
- फरवरी, 1719 में बालाजी ने मुगल सूबेदार सैयद हुसैन से एक संधि की-
- स्वराज्य क्षेत्र पर राजस्व अधिकार की मान्यता दी गई।
- दक्कन के 6 मुगल सूबों तथा मैसूर, त्रिचिरापल्ली व तंजौर में चौथ व सरदेशमुखी वसूल करने के अधिकार को मान्यता दी गई।
- गौडवाना, बरार, खानदेश, हैदराबाद व कर्नाटक पर मराठों के अधिकार को मान्यता दी गई।
- 1719 मे बालाजी विश्वनाथ एवं सैयद हुसैन अली के बीच हुई संधि का मुख्य कारण फर्रुखसियर को गद्दी से हटाना था।
बाजीराव प्रथम (1720-1740 ई.)
- बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद शाहू ने उनके पुत्र बाजीराव प्रथम को पेशवा नियुक्त किया और इस प्रकार बालाजी विश्वनाथ के परिवार में पेशवा पद वंशानुगत हो गया।
- 23 जून, 1724 में शूकरखेड़ा के युद्ध में मराठों की मदद से निजामुल-मुल्क ने दक्कन के मुगल सूबेदार मुबारिज खाँ को परास्त करके दक्कन में अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित की।
- 1728 ई. में बाजीराव ने निजामुल-मुल्क को पालखेड़ा के युद्ध में पराजित किया।
- युद्ध में पराजित होने पर निजामुल मुल्क सन्धि के लिए बाध्य हुआ। 6 मार्च, 1728 में दोनों के बीच मुंशी शिवगाँव की सन्धि हुई जिसमे निजाम ने मराठों को चौथ और सरदेशमखी देना स्वीकार कर लिया।
- 1731 ई. डभोई के युद्ध में बाजीराव ने त्रियम्बकराव को पराजित कर सारे प्रतिद्वन्दियों का अन्त कर दिया।
- 1731 ई. में वार्ना की सन्धि द्वारा शम्भा द्वितीय ने शाहू की अधीनता स्वीकार कर ली।
- 1737 ई. में मुगल बादशाह ने निजाम को मराठों के विरुद्ध भेजा। बाजीराव ने निजाम को भोपाल के पास युद्ध में पराजित किया।
- भोपाल युद्ध के परिणामस्वरूप 1738 ई. में दुरई-सराय की सन्धि हुई। इस सन्धि की शर्ते पूर्णत: मराठों के अनुकूल थी। निजाम ने सम्पूर्ण मालवा का प्रदेश तथा नर्मदा से चम्बल के इलाके की पूरी सत्ता मराठों को सौंप दी।
- 1739 ई. में बसीन पर बाजीराव ने विजय की। इस युद्ध में बाजीराव ने पुर्तगालियों से सालसीट तथा बसीन को छीन लिया।
- पुर्तगालियों की उत्तरी क्षेत्र की राजधानी बेसीन तथा दक्षिणी क्षेत्र की राजधानी गोआ थी।
- बाजीराव ने 1733 ई. में जंजीरा के सिद्दियों के खिलाफ एक अभियान शुरू किया।
- बाजीराव प्रथम को लड़ाकू पेशवा के रूप में याद किया जाता है वह शिवाजी के बाद गुरिल्ला युद्ध का सबसे बड़ा प्रतिपादक था।
- शाहू ने बाजीराव प्रथम को योग्य पिता का योग्य पुत्र कहा है।
- बाजीराव प्रथम ने हिन्दू पादशाही का आदर्श रखा ।
बालाजी बाजीराव (1740-1761 ई.)
- बाजीराव की मृत्यु के बाद उसका पुत्र बालाजी बाजीराव (नाना साहब के नाम से प्रसिद्ध) पेशवा बने।
- 1741 ई. में बालाजी बाजीराव रघुजी भोसले के विरुद्ध अलीवर्दी खाँ की मदद के लिए मुर्शिदाबाद (बंगाल) प्रस्थान किया तथा रघुजी भोसले को युद्ध में पराजित कर सन्धि के लिए बाध्य किया।
- 1741 ई. में मुगल बादशाह ने एक संधि करके मालवा पर मराठों के अधिकार को वैधता पदान की।
- 15 दिसम्बर, 1749 को शाहू जी का निधन हो गया। वे निसंतान थे। अपनी मृत्यु के पूर्व हो उन्होंने ताराबाई के पौत्र राजाराम द्वितीय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया।
- जनवरी, 1750 में राजाराम द्वितीय का राज्याभिषेक हुआ।
- 1750 ई. में रघुजी भोसले की मध्यस्थता के कारण राजाराम तथा पेशवा के बीच संगोला की सन्धि हुई।
- 1752 ई. में पेशवा ने मुगल बादशाह से एक सन्धि की। इस सन्धि के द्वारा मुगल बादशाह ने मराठों को सम्पूर्ण भारत में चौथ वसूल करने का अधिकार दिया और उसके बदले में मराठों ने अवसर पड़ने पर मुगल बादशाह को सहायता देने का वायदा किया।
- इस सन्धि से मराठे प्रत्यक्ष रूप से दिल्ली की राजनीति से सम्बन्धित हो गए तथा मराठा शक्ति अपने चरमसीमा पर पहुँच गई।
- 1754 ई. में मराठे रघुनाथ राव के नेतृत्व में दिल्ली पहुँचे और वजीर गाजीउद्दीन की सहायता करते हुए उन्होंने अहमदशाह को सिंहासन से हटाकर आलमगीर द्वितीय को मुगल बादशाह बना दिया।
- 1757 ई. में मराठों ने रघुनाथ राव के नेतृत्व में पुन: दिल्ली पर आक्रमण किये तथा अहमदशाह अब्दाली के प्रतिनिधि नजीब उद्-दौला को मीर बख्शी पद से हटाकर अहमद शाह को उस पद पर नियुक्त किया।
- 1758 तक उसने सरहिन्द तथा लाहौर पर भी अधिकार कर लिया।
- 1752 ई. में झलकी की सन्धि में निजाम ने मराठों को बरार का आधा क्षेत्र दे दिया।
पानीपत का तृतीय युद्ध (14 जनवरी, 1761)
- पानीपत का तृतीय युद्ध मुख्यत: दो कारणों का परिणाम रहा।
- प्रथम, नादिर शाह की भाँति अहमदशाह अब्दाली भी भारत को लूटना चाहता था।
- दूसरा, मराठे हिन्दू पादशाही की भावना से प्रेरित होकर दिल्ली पर प्रभाव स्थापित करना चाहते थे।
- रुहेला सरदार नजीबुद्दौला तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया क्योंकि ये दोनों मराठा सरदारों के हाथों हार चुके थे।
- इस युद्ध में पेशवा बालाजी बाजीराव ने अपने नाबालिग बेटे विश्वास राव के नेतृत्व में एक शक्तिशाली सेना भेजी किन्तु वास्तविक सेनापति उसका चचेरा भाई सदाशिव राव भाऊ था।
- इस फौज (मराठा) का एक महत्त्वपूर्ण भाग था, तोपखाने की टुकड़ी जिसका नेतृत्व इब्राहिम खाँ गर्दी कर रहा था।
- 14 जनवरी, 1761 को मराठों ने आक्रमण आरम्भ किया। मल्हारराव होल्कर यद्ध के बीच में ही भाग निकला।
- पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों को एकमात्र मुगल वजीर इमाद-उल-मुल्क का समर्थन प्राप्त था, जबकि राजपूतों, सिखों तथा जाटों ने मराठों का साथ नहीं दिया।
माधवराव प्रथम (1761-1772 ई.)
- पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की हार तथा बालाजी की अकस्मात मृत्यु (23 जून, 1761) के बाद उसका पुत्र माधव राव प्रथम पेशवा बना।
- नया पेशवा केवल 17 वर्षीय था अत: पेशवा परिवार के पास बड़े जिम्मेदार सदस्य उसके चाचा रघुनाथ राव को उसका सहायक बनाया गया। किन्तु इस काल में पेशवा तथा उसके चाचा के बीच गम्भीर मतभेद पैदा हो गए जिसके कारण दोनों के बीच युद्ध हुआ।
- उसने 1763 ई. में निजाम को पराजित किया।
- 1763 ई. में राक्षस-भुवन की सन्धि माधवराव प्रथम तथा निजाम के हुई। इस सन्धि का मराठा इतिहास में इसलिए महत्त्व है क्योंकि इस सन्धि से मराठों तथा निजाम के सम्बधों में ठहराव आ गया।
- 1771 ई. में मराठा सरदार महादजी सिंधिया ने निर्वासित मुगल बादशाह शाह आलम को दिल्ली की गद्दी पर पुन: स्थापित किया जो बाद में उनका पेंशन भोगी बन गया।
- नवम्बर, 1772 में माधवराव की क्षय रोग से मृत्यु हो गई ।
माधवराव नारायण (1774-1796 ई.)
- 1774 ई. में पेशवा नारायण राव की हत्या के पश्चात् बडे़ भाई ने उसके पुत्र माधव राव नारायण को पेशवा बनाया।
- नाना फडनवीस के अन्तर्गत एक काउंसिल ऑफ रिजेन्सी का गठन किया गया। माधव राव नारायण के शासनकाल में प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ।
बाजीराव द्वितीय (1796-1818 ई.)
- माधव नारायण की मृत्यु के पश्चात् राघोबा का पुत्र बाजीराव द्वितीय पेशवा बना।
- 1802 ई. में बेसीन की सन्धि के तहत सहायक सन्धि स्वीकार कर लेने से मराठा अधिकारियों में मतभेद प्रारम्भ हो गया।
पेशवाओं के अन्तर्गत मराठा प्रशासन
- 18वीं तथा 19वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में मराठा प्रशासन हिन्दू तथा मुस्लिम संस्थाओं का उत्तम मिश्रण था। परन्तु शाहू के काल में मुगल सम्राट की सर्वोच्चता स्वीकार कर ली गई थी।
- 1719 ई. में सन्धि के अनुसार शाहु ने 10,000 का मनसब फर्रुखसियर से स्वीकार किया तथा 10 लाख रु० वार्षिक उसे खिराज देना स्वीकार किया।
केन्द्रीय प्रशासन
- मराठा साम्राज्य का मुखिया शिवाजी का वंशज छत्रपति था जो सतारा का राजा था। किन्तु 1750 की संगोला की सन्धि से पेशवा ही राज्य का वास्तविक मुखिया बन गया।
- आरम्भ में पेशवा, शिवाजी की अष्टप्रधान समिति का सदस्य होता था।
- पेशवा बालाजी बाजीराव के समय में पेशवा पद को वंशानुगत बनाया गया।
- पूना में पेशवा का सचिवालय जिसे हुजूर दफ्तर कहते थे, मराठा प्रशासन का केन्द्र था।
- यहाँ प्रशासन के विभिन्न विभागों के आलेख सुरक्षित रखे जाते थे तथा यही राजस्व और बजट सम्बन्धी मामलों का निपटारा किया जाता था।
प्रान्तीय तथा जिला प्रशासन
- सूबे को प्रान्त तथा तरफ एवं परगने को महल कहा जाता था। प्रत्येक प्रान्त एक सर सूबेदार के अधीन होता था।
- कर्नाटक के सर सूबेदार को अधिक अधिकार प्राप्त थे। वह अपने मामलतदार स्वयं नियुक्त करता था। मामलतदार तथा कामविसदार, दोनों ही जिलों में पेशवा के प्रतिनिधि होते थे।
- मामलतदार पर मण्डल, जिले, सरकार, सूबा इत्यादि का कार्यभार होता था।
- ग्रामों में कर निर्धारण मामलतदार, स्थानीय पटेलों के परामर्श से करता था।
- मामलतदार तथा कामविसदार के वेतन तथा भत्ते भिन्न-भिन्न जिलों की महत्ता के अनुसार होते थे। शिवाजी के काल में ये अधिकार स्थान्तरणीय होते थे परन्तु पेशवाओं के अधीन ये वंशानुगत हो गए।
- देशमुख तथा देशपाण्डे अन्य जिलाधिकारी थे जो मामलतदार पर एक नियंत्रण के रूप में कार्य करते थे। ये जमींदारों के वंशज थे, जिन्हें शिवाजी ने उनके आनुवंशिक पद से हटा दिया था तथा उन्हें कर वसूल करने की छूट दे दी थी।
- प्रशासन में भ्रष्टाचार रोकने का कार्य देशमुख तथा देशपाण्डे नामक अधिकारी करते थे।
- प्रत्येक जिले में एक कारकून भी होता था जो विशेष घटनाओं की सूचना सीधे केन्द्र को देता था।
- महल में मुख्य कार्यकर्ता हवलदार होता था।
स्थानीय अथवा ग्राम शासन
- ग्राम का मुख्य अधिकारी (मुखिया) पाटिल (पटेल) होता जो कर सम्बन्धी न्यायिक तथा अन्य प्रशासनिक कार्य करता था।
- वह ग्राम तथा पेशवा के प्रशासन के बीच मध्यस्थ था।
- पाटिल का पद अनुवांशिक था।
- पटेल को सरकार से वेतन नहीं मिलता था, वह एकत्रित कर का एक छोटा सा भाग अपने लिए रख लेता था।
- पटेल के अधीन कुलकर्णी (ग्राम लिपिक) होता था जो ग्राम भूमि का लेखा रखता था।
- कुलकर्णी के नीचे चौगुले होता था जो पटेल की सहायता करता था।
- सिक्कों के निर्धारित भार और धातु की शुद्धता की जाँच का काम पोतदार का था।
- गाँव को औद्योगिक आवश्यकताओं की पूर्ति बारह कारीगरों (वलूतो) द्वारा की जाती थी।
- मराठों का नागरिक प्रशासन मौर्य प्रशासन से मिलता – जुलता था। कोतवाल नगर का मुख्य दण्डाधिकारी तथा पुलिस का मुखिया होता था।
न्याय प्रणाली
- पाटिल गाँव का, मामलतदार जिले का, सर सूबेदार सूबे (प्रान्त) का न्यायिक अधिकारी होता था। इनके ऊपर सतारा का राजा होता था।
- दीवानी मुकदमों का फैसला पंचायतें करती थी। पंचायत से अपील मामलतदार के यहाँ होती थी।
- ग्राम की पुलिस पाटिल के अधीन तथा जिले की पुलिस मामलतदार के अधीन होती थी।
आय के स्रोत
- पेशवा के शासन काल के दौरान राज्य के राजस्व के मुख्य स्रोत थे- भू-राजस्व, (2) विविध कर।
- विविधकर –
- गृह कर, कूप सिंचित भूमि पर कर, सीमा शुल्क, माप और तौल के परीक्षण के लिए वार्षिक शुल्क आदि, विधवाओं के पुनर्विवाह पर कर आदि।
- पेशवाओं ने विधवा के पुनर्विवाह पर ‘पतदाम’ नामक कर लगाया।
- कर्जापट्टी अथवा जस्ती पट्टी जमींदारों पर लगने वाला असाधारण कर था।
- भू-राजस्व – भूमि कर राज्य की आय का मुख्य साधन था। शिवाजी खेत की वास्तविक उपज का भाग लेना पसन्द करते थे परन्तु पेशवाओं के काल में यह लम्बी अवधि के लिए निश्चित कर दिया जाता था।
- मराठा कर व्यवस्था में करदाता को संरक्षण मिलता था। परन्तु बाजीराव द्वितीय के काल में यह व्यवस्था नष्ट हो गई तथा कर वसूली का अधिकार नीलामी (इजारा) कर दिया गया।
- कामविसदार चौथ वसूल करते थे तथा गुमाश्ता सरदेशमुखी की वसूली करते थे।
- सरदेशमुखी पूर्णतः राजा के हिस्से में होती थी और इसकी उगाही सीधे काश्तकारों से ही की जाती थी।
- राजस्थान में मराठों ने चौथ तथा सरदेशमुखी की वसूली की मांग नहीं की। यहाँ के राजाओं पर खानदानी तथा मामलत (खराज) लगाया जाता था। केवल अजमेर ही सुरक्षात्मक उद्देश्य के कारण मराठों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में था।
- मीरासदार (जमींदार) वे काश्तकार थे जिनकी अपनी भूमि होती थी तथा उत्पादन के साधनों जैसे-हल, बैल आदि पर अधिकार होता था।
- उपरिस बटाईदार थे, जिन्हें कभी भी बेदखल किया जा सकता था।
सेना
- मराठा सेना का गठन मुगल सैन्य व्यवस्था पर आधारित था।
- शिवाजी सामन्तशाही सेना पर निर्भर नहीं थे तथा सेना को सीधे कहा पसन्द करते थे, पेशवा लोग सामन्तशाही पद्धति पसन्द करते थे तथा साम्राज्य जागीरों के रूप में बाँट दिया गया था।
- मराठों के तोपखानों में मुख्यतः पुर्तगाली अथवा भारतीय ईसाई ही काम करते थे।
- पेशवाओं ने तोपखाना बनाने के लिए पूना तथा जुन्नार के अम्बेगाँव में अपने कारखाने स्थापित करवाये थे।
- विदेशियों को सेना में भर्ती होने के लिए अधिक वेतन दिया
