गुप्त और पूर्व मध्य कालीन कला

गुप्त और पूर्व मध्य कालीन ललित कला प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के इतिहास में भारतीय कला की शास्त्रीय परंपरा का महत्वपूर्ण चरण है। इस काल में मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तुकला तथा नृत्य-संगीत जैसी ललित कलाओं का संतुलित, सौम्य और आध्यात्मिक विकास देखने को मिलता है, जिसने आगे की कला परंपराओं को गहराई से प्रभावित किया।

गुप्तकालीन स्तूप और गुफा

  • गुप्तकालीन दो बौद्ध स्तूपराजगृह स्थितजरासंध की बैठक’, सारनाथ के धमेख स्तूप का निर्माण इसी काल में हुआ।
  • नरसिंह गुप्त बालादित्य ने नालन्दा में बुद्ध का भव्य मंदिर बनवाया था।
  • गुप्त काल के दौरान, गुफाओं का वास्तुशास्त्रीय विकास निरंतर होता रहा। तथापि, गुफाओं की दीवारों पर भित्ति चित्रों का प्रयोग एक अतिरिक्त विशेषता बन गयी। भित्ति चित्रों के सर्वाधिक बेहतरीन उदाहरणों में से कुछ अजन्ता और एलोरा की गुफाओं में देखे जा सकते हैं।

अजन्ता गुफाएँ

स्थान व स्वरूप
  • महाराष्ट्र, औरंगाबाद—वघोरा नदी, सह्याद्री पर्वत, अजन्ता गाँव के पास।
  • चट्टानों को काटकर छत, स्तंभ, सभा-भवन, विशाल द्वार, भित्तियाँ व मूर्तियाँ निर्मित।
  • वास्तुकला + मूर्तिकला + चित्रकला का अद्भुत संगम।
  • स्वरूप: घोड़े की नाल जैसा।
संख्या व प्रकार
  • कुल 29 गुफाएँ —
    • 25 विहार (आवासीय)
    • 4 चैत्य (9, 10, 19, 26)
  • खोज: 1819, विलियम एरिस्किन (मद्रास रेजिमेंट)।
गुप्तकालीन वास्तुकला
काल निर्धारण
  • निर्माण: 200 ई.पू.–650 ई.
  • आरंभिक (2–1 शताब्दी ई.पू.): गुफा 9, 10, 12, 13
  • 5वीं सदी पूर्ववर्ती चरण: 11, 15, 6, 7
  • अधिकांश: 5वीं–6वीं सदी
  • गुप्त कालीन: गुफा 16, 17 (19 का विवाद)
  • हीनयान: गुफा 8, 13
  • कुल हीनयान: 5, शेष 24 महायान
  • सूचनाएँ: फाह्यान, ह्वेनसांग के लेख।
गुप्तकालीन वास्तुकला

गुप्तकालीन स्थापत्य

चैत्य गुफाएँ

  • विस्तृत उत्कीर्णन, गजपृष्ठ (vaulted) छत।
  • बुद्ध-बोधिसत्व आकृतियों से सज्जित।
  • गुफा 26 — विशाल मंडप, अनेक प्रतिमाएँ, महापरिनिर्वाण की विशाल मूर्ति।

विहार गुफाएँ

  • स्तंभयुक्त बरामदा, मंडप, कोष्ठ (cells), पीछे बुद्ध का पूजा-संकुल।

मूर्ति-शिल्प

  • प्रतिमाएँ बड़ी, उर्जा-पूर्ण, सांची शैली से साम्य।
  • मूर्तिकला व चित्रकला समानांतर विकसित।

चित्रकला

  • सर्वाधिक चित्र: गुफा 17 (चित्रशाला) — निर्माण: वराहदेव (वाकाटक नरेश हरिषेण का मंत्री)।
  • गुफा 16–17: प्रमुख चित्र केंद्र।
  • गुफा 9–10: शुंगकालीन भित्ति चित्र।
  • नवीनतम: गुफा 1–2 (6वीं–7वीं सदी)।
शैली
  • फ्रेस्को + टेम्पेरा, वनस्पतिक/खनिज रंग।
  • रेखाएँ—गहरी लाल/काली; नीला रंग अनुपस्थित।
  • केश-विन्यास अत्यंत विशिष्ट।
  • जातक, बुद्ध जीवन, वनस्पति-पशु आकृतियाँ।
तीन चरण
  1. पहला चरण (1 स. ई.पू.)—पैनी रेखाएँ, सीमित रंग, अलंकारहीन आकृतियाँ।
  2. दूसरा चरण—त्वचा के विविध रंग, लयात्मक घुमाव।
  3. पंचम सदी—आवयवों का उभार, भारी आकृतियाँ, बाहर की ओर प्रक्षेप।

महत्वपूर्ण चित्र-उदाहरण

गुफा 16
  • बुद्ध वैराग्य के चार दृश्य।
  • उपदेश दृश्य।
  • मरणासन्न राजकुमारी (सौन्दरी)।
गुफा 17
  • महाभिनिष्क्रमण (गृहत्याग)
  • यशोधरा द्वारा राहुल दान
  • विविध जातक चित्र।
गुफा 2
  • झूला झूलती राजकुमारी।
गुफा 9
  • भिक्षु दल स्तूप की ओर।
गुफा 1
  • सांडों की लड़ाई।
  • पुलकेशिन–परवेज (खुसरो) स्वागत दृश्य।
  • बोधिसत्व—वज्रपाणि, मंजुश्री, पद्मपाणि।
  • शिबि जातक, मातृ-पोषक जातक।
गुफा 19
  • नाग राजा व पत्नी।

एलोरा गुफाएँ — 

स्थान व विशेषता
  • महाराष्ट्र, औरंगाबाद।
  • 34 गुफाएँ — तीन धर्मों का अद्भुत संगम
    • 1–12: बौद्ध
    • 13–29: हिन्दू/ब्राह्मण
    • 30–34: जैन
  • काल: 5वीं–11वीं सदी
  • भारत में एकमात्र स्थल जहाँ तीनों धर्मों की पाषाण कला निरंतर मिलती है।
  • बौद्ध और ब्राह्मण धर्म के अंतरों को दर्शाती हैं।
गुप्तकालीन वास्तुकला

बौद्ध गुफाएँ (1–12)

  • वज्रयान शैली—तारा, महामयूरी, अक्षोभ्य, अवलोकितेश्वर, मैत्रेय, अमिताभ।
  • विशाल आकार, एक गुफा तीन-मंजिली।
  • विशाल स्तंभ + भव्य बुद्ध प्रतिमाएँ।
  • पद्मपाणि व वज्रपाणि— अंगरक्षक रूप में।
मुख्य गुफाएँ
  • गुफा 10—विश्वकर्मा चैत्य।
  • गुफा 14—रावण की खाई।
  • गुफा 15—दशावतार।
  • गुफा 16—कैलाश मंदिर
    • राष्ट्रकूट कृष्ण-I द्वारा निर्मित।
    • एक ही चट्टान को काटकर निर्मित।
    • द्रविड़ शैली, नंदी मंडप, गोपुरम् स्वरूप।

हिन्दू गुफाएँ (13–29)

  • शैव प्रधान—अंधकासुर वध, रावण द्वारा कैलाश उठाना, कल्याणसुंदर।
  • विष्णु अवतारों के कई दृश्य।

जैन गुफाएँ (30–34)

  • प्रसिद्ध—इन्द्र सभा और जगन्नाथ सभा (32–33)।
  • सूक्ष्म नक्काशी, तीर्थंकर प्रतिमाएँ।

चित्रकला (Ellora)

  • पाँच गुफाओं में भित्ति चित्र (कैलाश के आसपास)।
  • दो चरण:
    • खुदाई के दौरान
    • बाद की सदियों में
  • प्रारंभिक चित्र—गरुड़ पर विष्णु-लक्ष्मी।
  • उत्तरकालीन—गुजराती शैली, शैव साधुओं का जुलूस।
  • तीनों धर्मों से संबंधित विषय।
प्रमुख चित्र
  • विष्णु–लक्ष्मी
  • शिव व अनुयायी
  • अलंकारयुक्त अप्सराएँ  
गुप्तकालीन वास्तुकला

1. बाघ गुफाएँ

  • स्थान: धार जिला (म.प्र.), बघानी नदी के किनारे।
  • समय: 4–5वीं सदी, सातवाहन काल।
  • संप्रदाय: महायान बौद्ध।
  • संख्या: 9 गुफाएँ (केवल 5 सुरक्षित)।
  • वास्तु: चट्टानों को काटकर बलुआ पत्थर में निर्मित; अजन्ता जैसी वास्तु; सभी में विहार + पीछे चैत्य कक्ष।
  • चित्रकला:
    • गुफाएँ 2,3,7 के चित्र नष्ट; गुफा 4 (रंगमहल) में श्रेष्ठ भित्ति चित्र।
    • जातक कथाएँ, बौद्ध विषय, जीवन शैली का चित्रण।
    • 45×6 फीट का भव्य चित्र (गुफा 4)।
    • रंग: हिरौंजी, सफेद, काला, हरा, पीला, लाल, नीला।
    • उत्कृष्ट डिजाइन; अजंता शैली का प्रभाव; प्रकृति, पक्षी—मोर, चकोर, कपोत आदि का सजीव चित्रण।

2. जूनागढ़ की गुफाएँ

  • गुजरात स्थित।
  • पूर्ण गुफाएँ नहीं, दो स्थल—बाबा प्यारे और ऊपर कोट
  • विशेषता: प्रार्थना स्थल के सामने 30–35 फुट ऊँचा किले जैसा दुर्ग “ऊपर कोट”।

3. नासिक की गुफाएँ

  • स्थान: महाराष्ट्र; 24 बौद्ध गुफाएँ, पांडव लेनी
  • समय: 1वीं सदी ईस्वी।
  • हीनयान से संबंधित, बाद में महायान प्रभाव।

4. अर्मामलई गुफा चित्रकला

  • स्थान: वेल्लोर (तमिलनाडु)।
  • समय: 8वीं सदी; जैन मंदिर।
  • विषय: अष्ट-दिक्पालक कथाएँ, जैन धर्म।
  • संरचना: जैन संतों के विश्राम स्थल।
  • तकनीक: मिट्टी के आधार पर रंगीन चित्र।

5. सित्तानवासल गुफा चित्रकला

  • स्थान: तमिलनाडु, पुदुकोट्टै।
  • प्रसिद्ध: जैन चित्रकला; अजंता/बाघ जैसी शैली।
  • विषय: समवसरण (तीर्थंकरों का उपदेश मंडप)।
  • तकनीक: खनिज–वनस्पतिक रंग; गीले प्लास्टर (फ्रेस्को)।
  • प्रमुख दृश्य: कमल तालाब में हंस, मछलियाँ, कमल चुनते भिक्षु।
  • पल्लव काल/पाण्ड्य जीर्णोद्धार (7वीं सदी)।

6. रावण छाया चट्टानी आश्रय

  • स्थान: ओडिशा, क्योंझर।
  • आकार: आधी खुली छतरी जैसा आश्रय।
  • विषय: 7वीं सदी का शाही जुलूस, चोल काल (11वीं सदी) के अवशेष।

7. लेपाक्षी चित्रकला

  • स्थान: अनंतपुर (आंध्र प्रदेश)—वीरभद्र मंदिर।
  • समय: 16वीं सदी, विजयनगर काल।
  • विषय: रामायण, महाभारत, विष्णु अवतार।
  • विशेषता: नीला रंग अनुपस्थित; काले रंग से रेखांकन; गुणवत्ता में पतन।

दक्षिण भारत की गुफा परंपरा

  • महाराष्ट्र के बाहर—कर्नाटक (बादामी, ऐहोली), आंध्र (विजयवाड़ा), तमिलनाडु (पल्लव—महाबलीपुरम)।

8. बादामी गुफाएँ

  • स्थान: कर्नाटक; चालुक्य राजधानी।
  • समय: 6वीं सदी।
  • संख्या: 4 गुफाएँ—3 हिन्दू, 1 जैन।
  • चित्रकला:
    • आरंभिक हिन्दू चित्रों का दुर्लभ उदाहरण।
    • आकृतियाँ बड़ी अंडाकार आँखें, बाहर की ओर होंठ; कृपा-दया भाव।
    • विषय: चालुक्य राजा, शिव–पार्वती, जैन संत, ब्रह्मा हंस पर।
    • तकनीक: बाघ जैसी परंतु श्रेष्ठ।
    • अजन्ता प्रभाव।

9. एलीफेंटा की गुफाएँ

  • स्थान: मुंबई से 6 मील दूर; असली नाम—धारापुरी।
  • शैव केंद्र; दो पहाड़ों को काटकर निर्मित।
  • मंदिर लगभग 130×130 फुट।
  • मुख्य विषय: शिव की विशाल मूर्तियाँ; अन्य देवी-देवता भी।
  • मूर्तिकला विशेषताएँ:
    • विशाल आकृतियाँ; पतला शरीर; गहरी-हल्की छाया; स्त्रियाँ कोमल व अलंकृत।
    • होंठ मोटे व बाहर की ओर।

महेश मूर्ति

  • समय: 6वीं सदी।
  • तीन मुख—शिव (मध्य), भैरव, उमा; ऊपर–पीछे के मुख अदृश्य (5 मुख का संदर्भ)।
  • सतह चिकनी, लयबद्धता व जटिल संरचना का उत्कृष्ट उदाहरण।
  • अर्द्धनारीश्वर, गंगाधर पैनल पास में।

पूर्वी भारत की गुफा परम्परा – संक्षिप्त नोट्स

1. आंध्र प्रदेश में बौद्ध गुफाओं की परम्परा

(a) गुंटापल्ली (एलुरु जिला)

  • बौद्ध स्तूप, विहार और गुफाओं का एक ही स्थान पर निर्माण।
  • चैत्य गुफा – गोलाकार; पश्चिमी भारत की तुलना में आकार में छोटी।
  • विहार गुफाएँ
    • संख्या अधिक, आकार में छोटी
    • आयताकार संरचना
    • मेहराबदार छतें
    • एक–मंजिली और दो–मंजिली गुफाएँ
    • मुख्य विहारों के बाहर चैत्य–तोरणों से सजावट
  • निर्माण काल: ईसा पूर्व 2वीं शताब्दी

(b) रामपरेम्पल्लम

  • पहाड़ी की चट्टान काटकर निर्मित छोटा स्तूप

(c) अनकापल्ली (विशाखापट्टनम के पास)

  • चौथी–पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में गुफा निर्माण।
  • पहाड़ी काटकर बड़ा स्तूप—देश के सबसे बड़े शिलाचित्र स्तूपों में से एक
  • मुख्य स्तूप के चारों ओर छोटे-छोटे पूजा-स्तूप निर्मित।

2. ओडिशा की गुफा परम्परा

(a) खंडगिरि और उदयगिरि

  • भुवनेश्वर के पास स्थित; ओडिशा की सबसे प्रारंभिक गुफाओं में शामिल।
  • जैन राजा खारवेल के शिलालेख यहाँ पाए जाते हैं।
  • मूलतः जैन मुनियों के निवास और साधना के लिए निर्मित।

(b) प्रमुख विशेषताएँ

  • कुछ गुफाएँ एक कक्ष वाली।
  • कुछ गुफाओं को पशु-आकृतियों में तराशा गया।
  • बड़ी गुफाओं में—
    • स्तंभों की श्रेणियाँ
    • चैत्य–तोरणों से सुसज्जित प्रवेश द्वार

प्राचीन भारत के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय

ओदांतपुरी –

  • बिहार में स्थित था और पाल वंश के राजा गोपाल के संरक्षण में बनवाया था। 
  • यह बौद्ध महाविहार था। 
  • इसे बख्तियार खिलजी ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

विक्रमशिला –

  • स्थान: बिहार (भागलपुर जिला)
  • स्थापना – पाल वंश के राजा धर्मपाल ने 
  • बौद्ध धर्म, विशेषकर वज्रयान संप्रदाय का केंद्र।
  • तांत्रिक शिक्षा, तर्कशास्त्र, खगोल विज्ञान, विधि, दर्शन जैसे विषय पढ़ाए जाते थे।

जगद्दल –

  • बंगाल में बौद्ध धर्म के वज्रयान संप्रदाय का शिक्षा का केंद्र था। नालंदा और विक्रमशिला के पतन के बाद कई विद्वानों ने यहां शरण ली। संभवतः पाल वंश के राजा रामपाल द्वारा इसकी स्थापना की गई थी।

वल्लभी – 

  • वल्लभी सौराष्ट्र, गुजरात में स्थित। 
  • हीनयान बौद्ध धर्म की शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र था। 
  • प्रशासन और शासनकला, विधि, दर्शन आदि जैसे विभिन्न विषय यहां पढ़ाए जाते थे। 
  • चीनी विद्वान, ह्वेनत्सांग ने यहां भ्रमण किया था। 
  • गुजरात के मैत्रक वंश के शासकों के अनुदान द्वारा यह सहायतित था।

नालंदा – 

  • गुप्तकाल में नालंदा विश्वविद्यालय अस्तित्व में था। हर्षवर्धन के शासनकाल और पाल राजाओं के अधीन इसने प्रतिष्ठा प्राप्त की। 
  • महायान बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। वेद, ललित कला, व्याकरण, दर्शन, तर्कशास्त्र, चिकित्सा आदि जैसे विषय भी यहां पढ़ाए जाते थे। 
  • इसने मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और विश्व के अन्य भागों से विद्वानों को आकर्षित किया। 
  • इस विश्वविद्यालय में शिक्षा तिब्बती बौद्ध धर्म से बहुत अधिक प्रभावित थी। 
  • नालंदा के प्रसिद्ध विद्वान नागार्जुन (माध्यमिक शून्यवाद) और आर्यभट खगोलविद थे।
  • ह्वेनत्सांग ने इस विश्वविद्यालय में दो वर्ष बिताए थे। एक और चीनी विद्वान इत्सिंग ने सातवीं सदी के उत्तरार्ध में नालंदा में दस वर्ष बिताए थे।

तक्षशिला –

  • वर्तमान समय में पाकिस्तान में स्थित है। 
  • प्राचीनतम शिक्षा केंद्र, 5वीं सदी ई पू तक अस्तित्व में।
  • माना जाता है कि चाणक्य ने इसी स्थान पर अर्थशास्त्र की रचना की थी। 
  • बौद्ध और हिंदू दोनों धर्मशास्त्रियों को यहां पढ़ाया जाता था। 
  • राजनीति, शिकार, चिकित्सा, सैन्य रणनीति, विधि की शिक्षा।
  • 405 ई. में फाह्यान यहाँ आया था। पाणिनि एवं चरक जैसे विद्वान इससे जुड़े थे।

कांचीपुरम –

  • पहली सदी ईस्वी से हिंदू धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म की शिक्षा का केंद्र था और पल्लवों के शासन के अधीन इसने बड़ी ख्याति प्राप्त की।

मान्यखेतः 

  • अब मल्खेड़ (कर्नाटक) कहा जाता है। 
  • राष्ट्रकूट शासन के अधीन इसने ख्याति प्राप्त की। 
  • यहां जैन धर्म, बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के विद्वान अध्ययन करते थे। यहां द्वैत दर्शन संप्रदाय का ‘मठ’ भी था।

पुष्पगिरि विहार और ललितगिरी (उड़ीसा) –

  •  उदयगिरि की पहाड़ियों के निकट लगभग तीसरी सदी ईस्वी के आसपास कलिंग राजाओं ने इसकी स्थापना की थी। 
  • यह मुख्य रूप से बौद्ध शिक्षा का केंद्र था।

शारदा पीठ – 

  • वर्तमान में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में स्थित था। यह संस्कृत विद्वानों के लिए महत्वपूर्ण स्थान था और यहां कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे गए। यहां शारदा देवी का मंदिर भी था।

नागार्जुनकोंडा –

  • आंध्र प्रदेश में अमरावती से 160 किलोमीटर दूर स्थित है और यह प्रमुख बौद्ध केंद्र था जहां उच्च शिक्षा के लिए श्रीलंका, चीन आदि से विद्वान आते थे। 
  • यहां कई विहार, स्तूप आदि थे। 
  • इसका नामकरण महायान बौद्ध धर्म के दक्षिण भारतीय विद्वान नागार्जुन के नाम पर किया गया था।
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