भारत में लोक चित्रकारी

भारत में लोक चित्रकारी जनजीवन, आस्था और परंपराओं की सशक्त अभिव्यक्ति है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों की सांस्कृतिक पहचान झलकती है। प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के अंतर्गत मधुबनी चित्रकला, पटुआ कला (बंगाल), फड चित्रकला (राजस्थान), चेरियाल लपेटन (स्क्रॉल) चित्रकलाएँ (तेलंगाना), कालीघाट चित्रकारी, पैटकार चित्रकारी (झारखंड), कलमकारी चित्रकला (आंध्र प्रदेश), वरली चित्रकारी, थांका चित्रकला, मन्जूषा चित्रकारी, सौरा चित्रकला (ओड़ीशा) तथा पिथोरा चित्रकलाएँ लोककला की समृद्ध परंपरा को दर्शाती हैं।

मधुबनी चित्रकला

  • परंपरागत रूप से मधुबनी शहर के आसपास ग्रामीण महिलाओं द्वारा की जाने वाली इस चित्रकारी को मिथिला चित्रकारी भी कहा जाता है। 
  • विषय-वस्तु: धार्मिक व सांस्कृतिक विषय, प्रमुख देवी-देवता कृष्ण, राम, दुर्गा, लक्ष्मी, शिव
  • यह चित्रकला शुभ अवसरों जैसे जन्म, विवाह, और त्योहारों के समय बनाई जाती है। इसमें अंतराल को पुष्प, वृक्ष, और जन्तुओं के चित्रण से भरा जाता है। 
  • पारंपरिक रूप से गोबर व मिट्टी के लेप पर चित्रण, चावल की लेई व प्राकृतिक रंगों का प्रयोग। अब हस्तनिर्मित कागज, वस्त्र, कैनवास पर भी चित्रण।
  • कोई छाया प्रभाव नहीं, चित्रकला द्विआयामी होती है।
  • 1970 में जब भारत के राष्ट्रपति ने जितबारपुर गांव की जगदंबा देवी को पुरस्कार से सम्मानित किया तब इस कला को पहचान प्राप्त हुई। उसके अतिरिक्त, इससे संबंधित चित्रकारों में बुआ देवी, भाति दयाल, गंगा देवी’ और सीता देवी सम्मिलित हैं।

पट्टचित्र, ओड़िशा

  • ओड़िशा की पारंपरिक चित्रकला, पट्टचित्र, संस्कृत के “पट्ट” (कपड़ा/कैनवास) और “चित्र” (चित्रकारी) शब्दों से मिलकर बनी है। यह कला शास्त्रीय और लोक तत्वों के मिश्रण को दर्शाती है, जिसमें लोक तत्व अधिक प्रभावी हैं।
  • उपचारित वस्त्र पर चित्रांकन, प्राकृतिक रंगों (नारियल खोल, हिंगुला, दीप कज्जल आदि) का उपयोग।
  •  पत्तियों, पुष्पों से अलंकृत पृष्ठभूमि, महीन फ्रेम, लाख की चमकीली परत।
  • इस चित्रकला की विषय-वस्तुएँ जगन्नाथ और वैष्णव मत और कभी-कभी शक्ति और शिव मत से प्रेरित होती हैं। 

पटुआ कला, बंगाल

  • बंगाल की प्राचीन पटुआ कला लगभग एक हजार साल पुरानी परंपरा है। यह कला मंगल काव्यों और देवताओं-देवियों की शुभ कहानियों को चित्रित करती थी।
  • पटुआ चित्रकार स्क्रॉल चित्रों के साथ कहानियाँ गाकर व सुनाकर गाँवों में प्रदर्शित करते थे।
  • पहले पटों (कपड़ों) पर बनाई जाती थी, अब सिली हुई कागज़ की शीटों पर पोस्टर रंगों से चित्रण।
  • अब यह कला राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर टिप्पणी का माध्यम बनी।

फड चित्रकला, राजस्थान

  • राजस्थान की फड़ चित्रकला धार्मिक स्क्रॉल पेंटिंग है, जिसमें पाबुजी और देवनारायण जैसे लोक देवताओं की गाथाएँ कपड़े (फड़) पर चित्रित की जाती हैं। 
  • प्राकृतिक रंगों से बनी ये 15-30 फीट लंबी पेंटिंग्स बड़ी आँखों और गोल चेहरों की आकृतियों के साथ ठाट-बाट और जुलूस दर्शाती हैं।

चेरियाल लपेटन (स्क्रॉल) चित्रकलाएँ, तेलंगाना

  • तेलंगाना की लपेटन चित्रकला नक्काशी कला का रूप है, जिसमें लोकगायक समुदाय हिन्दू महाकाव्य और पौराणिक कथाओं को संगीत के साथ चित्रित करते हैं।
  • कलाकारों द्वारा लपेटन (स्क्रॉल) चित्रकलाओं का उपयोग विभिन्न स्थानों पर जा-जाकर संगीत के साथ कथाओं को अभिव्यक्त करने के लिए किया जाता है। 

कालीघाट चित्रकारी

  • कालीघाट चित्रकला, 19वीं शताब्दी में कोलकाता में उत्पन्न हुई, जिसे ग्रामीण प्रवासियों ने विकसित किया। 
  • मिल के कागज पर बछड़े और गिलहरी के बालों से बने ब्रशों का उपयोग कर जलरंगों का प्रयोग किया जाता था। इस शैली से बनाए हुए चित्रों में तटस्थ पृष्ठभूमि पर फलकों जैसा प्रभाव होता था जो छायांकित रूपरेखाओं और गतियों को व्यक्त करता था।
  • शुरू में यह धार्मिक चित्रण के लिए थी, लेकिन समय के साथ इसका विस्तार सामाजिक मुद्दों और व्यंग्यात्मक चित्रण तक हुआ। यह कला विशेष रूप से समाज के निचले वर्ग की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए जानी जाती है।
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पैटकार चित्रकारी, झारखंड

  • झारखंड की पैटकार चित्रकला एक प्राचीन स्क्रॉल चित्रकला शैली है, जो आदिवासी लोगों द्वारा बनाई जाती है। 
  • इसका सांस्कृतिक संबंध माँ मनसा से है, जो बंगाली घरों में पूजी जाती हैं। 
  • ये चित्रकला सामाजिक और धार्मिक रीतियों से संबंधित हैं। 
  • इस कला का सामान्य विषय मृत्यु के बाद के जीवन से जुड़ा होता है।
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कलमकारी चित्रकला, आंध्र प्रदेश

  • कलम चित्रकला, आंध्र प्रदेश की एक प्रमुख कला है, जो नुकीले बांस की लेखनी से बनाई जाती है।
  • इस कला का आधार सूती वस्त्र होता है और रंग वनस्पति रंजकों से बनाए जाते हैं। 
  • प्रमुख केंद्र श्रीकलाहस्ती और मछलीपट्टनम् हैं, जहां कलाकार पारंपरिक डिजाइन जैसे रथ पहिये, कमल पुष्प, और पत्तियों के पैटर्नों का प्रयोग करते हैं। 
  • कलम को कटी हुई गुड़ और पानी के मिश्रण में मिलाते हैं और इन्हें एक-एक करके सूखी सब्जियों पर लागू किया जाता है।
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वरली चित्रकारी

  • उत्पत्ति: ईसा पूर्व 2500-3000 से प्रचलित, महाराष्ट्र-गुजरात सीमा के वरली जनजाति से जुड़ी। 
  • प्रागैतिहासिक समानता: भीमबेटका की गुफाओं की भित्तिचित्र शैली से मेल खाती है।
  • मुख्य विषय:
    • मछली पकड़ना, शिकार, खेती, नृत्य, उत्सव, पशु-पक्षी व वृक्ष।
    • पलघटा देवी (उर्वरता की देवी) और आत्मारूपी पुरुष देवताओं का चित्रण।
  • तकनीक:
    • चित्रण में त्रिभुज, वृत्त, वर्ग जैसे प्राकृतिक प्रेरित आकृतियों का उपयोग।
    • आधार हेतु मिट्टी, शाखाओं व गोबर से लाल गेरुआ रंग तैयार किया जाता है।
    • चित्रण केवल सफेद रंग से, जो चावल के चूर्ण व गोंद से बनता है।
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थांका चित्रकला

  • स्थान: सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश में प्रचलित।
  • उद्देश्य: बौद्ध धर्म के उच्च सिद्धांतों का सम्मान, परंपरागत रूप से बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित।
  • तकनीक:
    • सूती कैनवास पर प्राकृतिक रंगों से चित्रण।
    • रंगों का विशेष महत्वलाल (भावनात्मक तीव्रता), श्वेत (शांति) आदि।
    • पूर्ण होने के बाद रेशमी बेलबूटेदार वस्त्र में मढ़ा जाता है।
  • थांका चित्रकलाओं को तीन प्रकारों में विभाजित किया जाता है: बुद्ध के जीवन से संबंधित, जीवन-मृत्यु चक्र को दर्शाने वाली,और ध्यान या देवताओं के सम्मान हेतु चित्रित कलाएँ। 
भारत में लोक चित्रकारी

मन्जूषा चित्रकारी

  • कला का यह रूप बिहार के भागलपुर क्षेत्र से संबंधित है। इसे अंगिका कला भी कहा जाता है, जहाँ ‘अंग’ का संदर्भ एक महाजनपद से है। 
  • इसमें सर्प का रूपांकन सदैव विद्यमान रहता है इसलिए इसे सर्प चित्रकला भी कहा जाता है। 
  • इस चित्रकला को जूट और कागज के डिब्बों पर निर्मित किया जाता है।
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पिथोरा चित्रकलाएँ

  • ये चित्रकलाएँ गुजरात और मध्य प्रदेश के कुछ आदिवासी समुदायों द्वारा बनाई जाती हैं और इनका प्रयोजन धार्मिक एवं आध्यात्मिक बताया जाता है। 
  • वे शांति और समृद्धि लाने के लिए घरों की दीवारों पर चित्रित की जाती हैं। 
  • उन्हें विशेष पारिवारिक अवसरों पर रस्म के रूप में उकेरा जाता है। 
  • इनमें पशुओं, विशेष रूप से घोड़ों, का चित्रण सामान्य है।

सौरा चित्रकला, ओड़ीशा

  • वे ओड़ीशा की सौरा जनजाति द्वारा बनाई जाती हैं एवं वरली चित्रकला के समान होती हैं। 
  • यह वस्तुतः भित्ति-चित्रकला है एवं रीतिपरक है।
  • सौरा भित्ति चित्रकला इटालोन (Italon) या आइकोन भी कही जाती हैं और ये सौरों के प्रमुख इष्ट देव इडिटल को समर्पित होती हैं। 
  • इन चित्रकारियों को मुख्य रूप से सफेद रंग से उकेरा जाता है जबकि पृष्ठिभूमि का रंग लाल या पीला होता है। 
  • मानव आकृतियाँ ज्यामितीय एवं छड़ी जैसी होती हैं।
  • ये डिजाइन हाल के समय में फैशन में आ गई हैं और अनेक टी-शर्टी, महिलाओं के परिधानों पर सौरा शैली की इन डिजाइनों का चित्रण मिलने लगा है।
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