चालुक्य/सोलंकी राजवंश

चालुक्य/सोलंकी राजवंश प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के इतिहास में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरकर सामने आया। इस राजवंश ने अन्हिलवाड़, बादामी, वेंगी और कल्याणी जैसे क्षेत्रों पर शासन करते हुए प्रशासन, राजनीति एवं कला-संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अन्हिलवाड़ के चालुक्य

सोलंकी राजवंश, जिसे गुजरात के चालुक्य के नाम से भी जाना जाता है, ने 950 से 1300 ई. तक भारत में वर्तमान गुजरात और काठियावाड़ के कुछ हिस्सों पर शासन किया । वे सोलंकी राजपूतों के नाम से प्रसिद्ध थे और उनकी राजधानी अनहिलवाड़ा थी , जो हिंद महासागर व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। उनके शासनकाल में क्षेत्रीय विस्तार और सांस्कृतिक उत्कर्ष दोनों देखे गए , जो महत्वपूर्ण वास्तुकला और धार्मिक विकास द्वारा चिह्नित थे।

सोलंकी वंश का उत्थान और पतन

  • अग्निकुल किंवदंती: पृथ्वीराज रासो में अग्निकुल किंवदंती का उल्लेख है, जो बताता है कि सोलंकी की उत्पत्ति माउंट आबू के एक अग्नि कुंड से हुई थी ।
  • जबकि औपनिवेशिक युग के इतिहासकारों ने इसे एक विदेशी उत्पत्ति के रूप में व्याख्यायित किया, सोलंकी शिलालेख इसे परमारों से जोड़ते हैं , स्वयं से नहीं।
  • प्रादेशिक विस्तार: 950 से 1300 ई. तक भारत के वर्तमान गुजरात और काठियावाड़ के कुछ हिस्सों पर शासन किया ।
  • सोलंकी राजवंश गुजरात के चालुक्य या सोलंकी राजपूतों के रूप में जाने जाने वाले , वे स्वयं को “चालुक्य” कहते थे।
  • यह तब समाप्त हुआ जब अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात पर विजय प्राप्त की ।
  • राजधानी और व्यापार: अन्हिलवाड़ा (आधुनिक पाटन, गुजरात) में राजधानी, हिंद महासागर व्यापार का एक प्रमुख केंद्र।
  • सोमनाथ का विनाश : 1026 में महमूद गजनवी ने गुजरात में सोमनाथ मंदिर परिसर को नष्ट कर दिया।

मूलराज प्रथम 

  • 940-941 ई. में मूलराज ने गुजरात के अंतिम चावड़ा शासक को हराया और अन्हिलवाड़ में अपनी राजधानी स्थापित करते हुए अपना स्वयं का राज्य स्थापित किया।
  • वह एक शैव राजा था। 
  • उन्होंने दिगंबरों के लिए मूलवसतिका मंदिर और श्वेतांबरों के लिए मूलनाथ-जिनदेव मंदिर का निर्माण कराया।

भीम प्रथम (1022-1064 ई.) : 

  • उन्होंने मोढेरा में सूर्य मंदिर का निर्माण कराया । 
  • उनकी स्मृति में उनकी पत्नी उदयमती ने रानी की वाव नामक बावड़ी का निर्माण करवाया । 
  • सोलंकी राजवंश प्रभास स्थित सोमनाथ को अपने संरक्षक देवता के रूप में पूजते थे, उनके शासन के दौरान महमूद गजनवी ने इस पवित्र मंदिर पर आक्रमण कर इसे लूटा।

कर्ण: 

  • भीम प्रथम के बाद, उनके उत्तराधिकारी कर्ण ने एक भील सरदार पर विजय प्राप्त की और कर्णावती की स्थापना की, जो आधुनिक अहमदाबाद है । 
  • कर्ण ने मयनाल्लादेवी से विवाह किया ।

जयसिंह सिद्धराज (1092-93 ई.) 

  • राज्य को मजबूत और विस्तारित किया। 
  • मालवा के कुछ हिस्सों पर विजय प्राप्त करने के बाद (1137 ई.), उन्होंने अवंतिनाथ ( मालवा के भगवान ) की उपाधि धारण की।
  • वह शिव के भक्त थे और उन्होंने सिद्दपुरा में रुद्रमहाकाल मंदिर का निर्माण कराया था।
  • वह जैन विद्वान हेमचंद्र के संरक्षक थे ।
  • हेमचन्द्र : एक जैन भिक्षु, ने प्रसिद्धि प्राप्त की तथा राजा के साथ उनके अच्छे संबंध थे।
  • विस्तार: 
    • सौराष्ट्र और कच्छ के अलावा जयसिंह ने मालवा पर भी विजय प्राप्त की।
    • एक लोकप्रिय किंवदंती के अनुसार जयसिंह द्वारा जूनागढ़ की घेराबंदी की गई, जिसके परिणामस्वरूप उस पर कब्ज़ा कर लिया गया।
    • घेराबंदी के दौरान, चुडासमा शासक रा खेंगर की पत्नी रणकदेवी ने जयसिम्हा से पुनर्विवाह करने के बजाय सती होने का फैसला किया।
    • जयसिंह ने उन्हें वढवाण में चिता पर सती होने की अनुमति दी , जहां अब उनकी स्मृति में रणकदेवी मंदिर स्थित है।

कुमारपाल: 

  • जैन धर्म के अंतिम प्रसिद्ध शाही समर्थक थे । 
  • कुमारपाल के नाबालिग पोते के शासनकाल के दौरान, गुजरात को मुहम्मद ग़ौरी के आक्रमण का सामना करना पड़ा ।
  • हेमचंद्र के साथ उनके अच्छे संबंध थे और उन्होंने गुजरात में अपने शासन के दौरान जैन धर्म को बढ़ावा दिया ।
  • उन्होंने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया।
  • कुमारपाल के शासनकाल के दौरान गुजरात अपनी समृद्धि के चरम पर पहुंच गया ।

कर्ण द्वितीय : 

  • गुजरात के अंतिम हिंदू राजा, ने अलाउद्दीन खिलजी की सेनाओं का सामना किया।

बादामी / वातापी चालुक्य – (543 – 757 ई. से 552 – 750 ई. तक)

  • इस शाखा का संस्थापक पुलकेशिन प्रथम था।
  • इस शाखा की राजधानी वातापी / बादामी कर्नाटक राज्य के बीजापुर में स्थित है।
  • यह शाखा चालुक्यों की मूल / प्राचीनतम शाखा मानी जाती है।

जानकारी के प्रमुख स्रोत – अभिलेख

एहोल अभिलेख

  • एहोल अभिलेख प्रशस्ति के रूप में है।
  • यह अभिलेख कर्नाटक के बीजापुर में स्थित है।
  • मेगुती मंदिर (जैन मंदिर) के पश्चिमी भाग की दीवार पर उत्कीर्ण है।
  • यह अभिलेख 643 ई. का माना जाता है।
  • इस अभिलेख की भाषा संस्कृत है।
  • इस अभिलेख की शैली पद्य (काव्य) शैली है।
  • लिपि: दक्षिणी ब्राह्मी
  • इसकी रचना पुलकेशिन द्वितीय के जैन दरबारी ‘रवि कीर्ति’ द्वारा की गई है।
  • इस अभिलेख में रवि कीर्ति ने स्वयं की तुलना ‘तुलसीदास’ व  ‘भास’ के साथ की है।
  • चालुक्य वंश व उसके शासक पुलकेशिन द्वितीय के बारे में इस अभिलेख द्वारा जानकारी मिलती है।
  • इसमें पुलकेशिन द्वितीय को ‘सत्याश्रय’ अर्थात् सत्य को आश्रय देने वाला कहा गया है।
  • इसमें पुलकेशिन द्वितीय व हर्ष के मध्य हुए युद्ध की जानकारी मिलती है।
  • इस युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को नर्मदा के तट पर पराजित करके ‘परमेश्वर’ की उपाधि धारण की थी।

नोट – एहोल के मंदिरों को ‘नगर’ कहा जाता है। जिनेन्द्र मंदिर व मेंगुती मंदिर प्रसिद्ध है।

  • बादामी शिलालेख:-
    • यह शिलालेख बादामी किले के एक शिलाखंड पर उत्कीर्ण है।
    • इस शिलालेख पर पुलकेशिन प्रथम (543 ई.) द्वारा बादामी किले के निर्माण की बात लिखी गई है।
    • चालुक्य वंश की प्रारंभिक जानकारी इसी शिलालेख से मिलती है।
    • चालुक्यों को ‘हारिति पुत्र’ व  ‘मानव्य गौत्रिय’ बताया गया है।
  • महाकूट अभिलेख:
    •  महाकूट स्तंभ लेख – कर्नाटक से प्राप्त
    • यह 602 ई. का माना जाता है।
    • इस स्तंभ लेख में पुलकेशिन प्रथम से पूर्व के दो शासकों का उल्लेख जय सिंह व रणराग (पुलकेशिन प्रथम के पिता)
    • इनके अलावा महाकूट स्तंभ लेख से कीर्तिवर्मन प्रथम की जानकारी भी मिलती है।
  • हैदराबाद दानपात्र :
    •  यह 612 ई. का है।
    • इसमें पुलकेशिन II द्वारा दिए गए दान के बारे में उल्लेख मिलता है।

चालुक्य कौन? इतिहासकारों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं-

  1. विंसेट स्मिथ : चालुक्य ‘चप’ जाति के लोग थे।
    • ये मध्य एशिया के निवासी थे।
  2. ह्वेनसांग :
    • 641 ई. में पुलकेशिन II के दरबार में गया था।
    • इसने चालुक्यों को ‘क्षत्रिय’ बताया है।
  3. डॉ. नीलकण्ठ शास्त्री :
  4. चालुक्यों को कदम्बों का सामंत बताया है।
  • इनके मूल वंश का नाम ‘चल्क्य’ जो बाद में चालुक्य कहलाए।
  • इन्हें क्षत्रिय बताया है।

महाकूट अभिलेख के अनुसार चालुक्य शासकों का क्रम 

अंतिम चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन II को राष्ट्रकूट दंतिदुर्ग ने मार डाला व राष्ट्रकूट वंश की स्थापना की।

पुलकेशिन प्रथम (543 – 566 ई.) 

  • वातापी चालुक्य वंश का संस्थापक था।
  • इसने दक्षिणापथ पर विजय प्राप्त की तथा अश्वमेध व वाजपेय यज्ञों का आयोजन किया था।

कीर्तिवर्मन प्रथम : (566 – 597 ई.)

  • पुलकेशिन प्रथम का पुत्र था।
  • कीर्तिवर्मन प्रथम को वातापी चालुक्यों का प्रथम निर्माता कहा जाता है।
  • उपाधियाँ : सत्याश्रय, व पृथ्वीवल्लभ
  • एहोल अभिलेख में कीर्तिवर्मन प्रथम को, कदम्बों, नलों व मौर्यों के लिए कालरात्रि के समान बताया गया है।
  • साम्राज्य विस्तार हेतु किए गए अभियान:
  1. वनवासी अभियान :
    • कहाँ – कर्नाटक
    • यहाँ कदम्ब वंश के शासक अजयवर्मन को पराजित कर उसकी राजधानी पर अधिकार कर लिया।
  2. वेल्लूर अभियान :-
    • नलवंशी शासकों को पराजित किया।
    • वेल्लूर को नलवाड़ी कहा जाता था।
  3. कोंकण अभियान:-
    • यहाँ परवर्ती मौर्य शासन था, कीर्तिवर्मन ने इन्हें पराजित कर राजधानी “धारापुरी” पर अधिकार कर लिया।
    • धारापुरी को “पश्चिमी समुद्र की देवी” कहा जाता है।
    • कोंकण पर अधिकार होने के कारण कीर्तिवर्मन का अधिकार क्षेत्र गोवा तक हो गया था।
    • गोवा का प्राचीन नाम “खेती द्वीप” था।
    • कीर्तिवर्मन ने बादामी का राजधानी के रूप में पुन: निर्माण करवाया तथा यहाँ अनेक सुंदर मंदिर व इमारतों का निर्माण करवाया, अत: इसे बादामी का प्रथम निर्माता कहा जाता है।

मंगलेश

  • कीर्तिवर्मन प्रथम की मृत्यु के बाद शासक बना।
  • कीर्तिवर्मन का भाई था।
  • अभियान:-
  1. कलचूरी अभियान:-
    • इस क्षेत्र में खानदेश, मालवा व गुजरात का दक्षिणी भाग शामिल था।
    • आक्रमण क्यों? मंगलेश उत्तर भारत पर विजय प्राप्त करना चाहता था।
    • मंगलेश ने कलचूरी राज्य के शासक बुद्धराज को पराजित किया।
  2. कोंकण अभियान
    • उल्लेख :- नरूरदान पत्रलेख         
    • शासक – स्वामीराज
    • स्वामीराज चालुक्यों का सामंत था, जिसकी नियुक्ति कीर्तिवर्मन प्रथम द्वारा दी गई।
    • मंगलेश ने स्वामीराज पर आक्रमण कर मार डाला।
उपाधियाँ:-
  • अभियानों को पूर्ण करने के बाद निम्नलिखित उपाधियाँ धारण की:-
    1. परमभागवत – वैष्णव धर्म का अनुयायी होने के कारण
    2. रणविक्रांत
    3. श्री पृथ्वीवल्लभ
  • मंगलेश ने कीर्तिवर्मन प्रथम द्वारा प्रारंभ करवाए गए बादामी गुहा मंदिर के निर्माण को पूर्ण करवाया तथा उसमें भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करवाई।

पुलकेशिन II 

  • पुलकेशिन I के पोते पुलकेशिन II (609-642 ई.) ने मंगलेश को पराजित करने के बाद स्वयं को राजा घोषित कर दिया, जिसका उल्लेख ऐहोल अभिलेख में किया गया है।
  • चालुक्य वंश का सबसे प्रतापी शासक।
  • सत्याश्रय श्री पृथ्वीवल्लभ महाराज की उपाधि धारण की।
  • इसका दरबारी कवि रविकीर्ति था।
  • अभियान
    • पुलकेशिन ने बनवासी के कदम्बों को पराजित किया।
    • लाट व मालवा प्रदेशों पर विजय प्राप्त की।
    • तलाकड़ (मैसूर) के गंगों पर विजय प्राप्त की।
    • 630 ई. – 634 ई. के मध्य नर्मदा के तट पर हर्ष को पराजित किया। इस विजय के पश्चात् पुलकेशिन-2 को परमेश्वर की उपाधि दी।
चालुक्य पल्लव संघर्ष:-
  • यह संघर्ष प्रारंभ करने का श्रेय- पुलकेशिन द्वितीय को जाता है।
  • जो लगभग 200 वर्ष तक चला।
  • पल्लव शासक महेन्द्रवर्मन प्रथम को पराजित कर काँची के उत्तरी-पूर्वी हिस्से पर अधिकार कर लिया।
  • इसी भाग पर पूर्वी चालुक्य (वेंगी) की नींव डाली – संस्थापक अपने भाई “कुब्ज विष्णुवर्धन” को बनाया।
  • महेन्द्र वर्मन की मृत्यु के बाद पुन: काँची पर आक्रमण किया।
  • महेन्द्रवर्मन के पुत्र – नरसिंह वर्मन ने पुलकेशिन द्वितीय को पराजित किया।
  • नरसिंह वर्मन ने श्रीलंका के शासक “मानवर्मा” की सहायता से पुलकेशिन द्वितीय को बादामी मे पुन: पराजित कर उसके शरीर पर “विजित” लिखवा दिया।
  • नरसिंह वर्मन ने वातापीकोंड (वातापी को तोड़ने वाला) की उपाधि धारण की।
  • पुलकेशिन द्वितीय ने शर्मसार होकर आत्महत्या कर ली।

नोट:- अजंता की गुफा संख्या एक में पुलकेशिन द्वितीय को ईरानी राजदूत शाह परवेज खुसरो द्वितीय का स्वागत करते हुए दिखाया गया है।

विक्रमादित्य प्रथम (655 ई. – 681 ई.)

  • पुलकेशिन द्वितीय का पुत्र था।
  • येवूर अभिलेख (कर्नाटक) के अनुसार “पुलकेशिन II” की मृत्यु के बाद लगभग – 13 वर्ष तक पल्लव सामंत “अमर व आदित्यवर्मन” ने बादामी पर शासन किया था।
  • विक्रमादित्य ने अपने नाना – गंग वंश के “दुर्रविनित” व अपने भाई जयसिंह वर्मन की सहायता से वातापी पर पुन: अधिकार किया।
  • अपने पिता की हत्या का बदला लेने हेतु पल्लवों पर आक्रमण कर नरसिंह वर्मन के पुत्र “महेन्द्रवर्मन द्वितीय” को मार डाला।

विनादित्य – (681 ई. – 696 ई.)

  • इसने पल्लव, केरल, चोल, पाण्ड्य पर विजय प्राप्त की।
  • उपाधियाँ – राजाश्रय, युद्धधमल्ल

विजयादित्य :- (696 ई. – 733 ई.)

  • सबसे लम्बे समय तक शासक रहा।
  • श्रेष्ठ निर्माता माना जाता है।
  • इसने पट्डक्कल (कर्नाटक) में विशाल शिव मंदिर का निर्माण द्रविड़ शैली में करवाया।

विक्रमादित्य II (733 ई.- 747 ई.)

  • विजयादित्य का पुत्र था।
  • इसके समय दक्षिण भारत पर अरबों का आक्रमण हुआ।
  • इस आक्रमण का सामना करने हेतु अपने भाई “जयसिंह वर्मन प्रथम” को भेजा।
  • जयसिंह ने अरबों को पराजित कर भागने पर बाध्य कर दिया।
  • विक्रमादित्य II ने जयसिंह को “अवनिजनाश्रे (पृथ्वी के लोगों को शरण देने वाला)” की उपाधि दी।
  • विक्रमादित्य II ने पल्लव शासक नंदिवर्मन को पराजित कर काँचीकोण्ड की उपाधि धारण की।
  • विक्रमादित्य II की दो पत्नियाँ थी –
  1. लोकमहादेवी –
    • लोकेश्वर शिव मंदिर का निर्माण वर्तमान (विरूपाक्ष) मंदिर कर्नाटक हम्पी पट्टकल में स्थित है। यहाँ पर रामायण से संबंधित दृश्य और गरुड़ की विशाल प्रतिमा है।
  2. त्रलोक्यमहादेवी –
    • त्रिलोकेश्वर शिव मंदिर मल्लिकार्जुन शिव मंदिर हम्पी (कर्नाटक) में स्थित है।

कीर्तिवर्मन II (747 ई. – 757 ई.)

  • कीर्तिवर्मन ने अपने पिता के शासनकाल के दौरान ही पल्लवों को पराजित किया था। अत: विक्रमादित्य II ने इसे अपना उत्तराधिकारी बनाया।
  • वातापी/बादामी के चालुक्यों का अंतिम शासक था।
  • इसी के शासनकाल के दौरान राष्ट्रकूटों का उदय हुआ।
  • राष्ट्रकूट दंतिदुर्ग ने अपनी पुत्री का विवाह पल्लव नरेश नंदिवर्मन के साथ किया था।
  • दंतिदुर्ग ने आक्रमण कर चालुक्यों से महाराष्ट्र व गुजरात के क्षेत्र छीन लिए।
  • कीर्तिवर्मन II ने इन क्षेत्रों पर पुन: अधिकार करने हेतु आक्रमण किया, परन्तु दन्तिदुर्ग ने कीर्तिवर्मन II को मार डाला इस प्रकार वातापी बादामी चालुक्यों के अंत के साथ राष्ट्रकूटों का उदय हुआ।

चालुक्य (कल्याणी) :

  • राष्ट्रकूट नरेश कर्क II को तैलप II ने पराजित कर कल्याणी को अपनी राजधानी बनाया। 
  • इनका राज्य चिह्न – वराह था।
  • कौन – 
    • नीलकंठ शास्त्री के अनुसार तैलप II से पूर्व इस वंश के लोग बीजापुर के आस-पास के क्षेत्रों में राष्ट्रकूटों के सामंत थे।
    • मूलत: यह कन्नड़ देश (केरल) के निवासी थे।
  • तैलप II से पूर्व कीर्तिवर्मन III तैलप प्रथम, विक्रमादित्य III भीमराज, अय्यण विक्रमादित्य चतुर्थ का उल्लेख मिलता है।
  • निलगुंड अभिलेख के अनुसार अय्यण ने राष्ट्रकूट वंश के शासक कृष्ण II की पुत्री के साथ विवाह किया – पुत्र विक्रमादित्य IV
  • विक्रमादित्य IV का पुत्र तैलप II कल्याणी चालुक्यों का संस्थापक था।

तैलप – II (973 – 997 ई.)

  • पिता का नाम विक्रमादित्य चतुर्थ था।
  • माता कलचुरी के शासक लक्ष्मण सेन की पुत्री बोन्था देवी थी।
  • कल्याणी चालुक्य की स्वतंत्रता का संस्थापक माना जाता है।
  • राष्ट्रकूट वंश के शासक कर्क III को पराजित कर उसकी राजधानी मान्यखेत पर अधिकार कर लिया था।
  • अपनी राजधानी कल्याणी को बनाया।
  • तैलप द्वितीय ने राष्ट्रकूट सामंतों को पराजित करने हेतु
  • निम्नलिखित अभियान किए –
  • शिमोगा कर्नाटक के राष्ट्रकूट सामंत शांति वर्मा को पराजित किया।
  • गंगवंश के शासक पांचालदेव को पराजित कर मार डाला।
  • वनवासी के शासक कन्नप व शोभन को अधीनता स्वीकार करवाई।
  • दक्षिणी कोंकण के शालिहार वंश को पराजित कर दक्षिणी कोंकण पर अधिकार कर लिया।
  • 980 ई. में चोल साम्राज्य पर आक्रमण कर वहाँ के शासक उत्तम चोल को पराजित किया था।

इस प्रकार कल्याणी चालुक्य व चोल संघर्ष प्रारंभ हुआ था।

मालवा आक्रमण-
  • शासक – मुंज परमार
  • उल्लेख – प्रबंध चिंतामणि
  • प्रबंध चिंतामणि का लेखक मेरूतुंग था।
  • प्रबंध चिंतामणि में गुजरात का इतिहास लिखा गया है।
  • तैलप II ने मालवा के मुंज परमार पर छह बार आक्रमण किया था परन्तु हर बार तैलप II पराजित हुआ।
  • अंतत: मुंज ने तैलप पर निर्णायक विजय प्राप्त करने हेतु सातवीं बार गोदावरी नदी को पार करते हुए तैलप II पर आक्रमण किया।
  • तैलप II ने मुंज परमार को युद्ध में पराजित कर बंदी बनाकर मार डाला।
  • तैलप II ने महाराजाधिराज, चक्रवर्ती, परमेश्वर व “अश्वमाल” की उपाधि धारण की थी।

सत्याश्रय (997 ई. – 1008 ई.)

  • तैलप-II के उत्तराधिकारी सत्याश्रय को राजेन्द्र चोल के नेतृत्व में दो आक्रमणों का सामना करना पड़ा।
  • तैलप II का पुत्र था, साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया था।
  • अपने साम्राज्य विस्तार हेतु निम्नलिखित अभियान किए –
    • उत्तरी कोंकण सत्याश्रय ने शालिहार वंश को पराजित कर उत्तरी कोंकण पर अधिकार कर लिया था।
    • गुर्जर राज्य पर विजय यहाँ के शासक चामुण्डराय को पराजित करके की।
    • मालवा संघर्ष – मुंज परमार की मृत्यु के बाद सिन्धुराज शासक बना था।

सत्याश्रय ने मालवा पर अनेक आक्रमण किए प्रत्येक बार सिन्धुराज ने उसे पराजित किया व मालवा के खोए प्रदेश पुन: प्राप्त कर लिए थे। सत्याश्रय का यह अभियान असफल हो गया था।

विक्रमादित्य पंचम (1008 – 1014 ई.)

  • सत्याश्रय के बाद विक्रमादित्य V शासक बना।
  • दर्शवर्मन का पुत्र था।
  • इसने दक्षिणी कौशल (छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम) के शासक “भीमरथ महाभव गुप्त II” को पराजित कर चालुक्य साम्राज्य में दक्षिणी कौशल का विलय कर लिया था।
  • त्रिभुवनमल्ल व वल्लभ नरेन्द्र की उपाधि धारण की थी।

जयसिंह II, (1015 ई. – 1043 ई.)

  • विक्रमादित्य पंचम का भाई था।
  • उपाधियाँ : जगदेकमल्ल, त्रैलोक्यमल्ल विक्रमसिंह
  • मालवा के साथ संघर्ष :-
    • मालवा के शासक भोज परमार ने लाट पर आक्रमण कर इसके कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया तथा उत्तरी कोंकण भाग पर भी अधिकार कर लिया था।
    • जयसिंह II ने कुछ समय पुन: इन क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था।
  • चोलों के साथ संघर्ष
    • कारण – 1019 ई. वेंगी चालुक्य शासक ”विमलादित्य” की मृत्यु हो गई।
    • विमलादित्य के दो पुत्रों में उत्तराधिकार संघर्ष हुआ।
      1. राजराज          
      2. विष्णु वर्धन विजयादित्य सप्तम
    • जयसिंह II ने विजयादित्य VII के पक्ष में एक सेना वेंगी भेजी।
    • राजेन्द्र प्रथम (चोल) अपनी दो सेनाएँ क्रमश: प्रथम सेना ने जयसिंह II को पराजित किया, द्वितीय सेना ने विजयादित्य II को पराजित किया।
    • इस प्रकार राजेन्द्र प्रथम “राजराज” को वेंगी का शासक बना दिया। अगले 20 वर्षों तक कोई संघर्ष नहीं हुआ।

सोमेश्वर प्रथम : (1043 – 1068  ई.)

  • सोमेश्वर प्रथम ने कल्याणी का राजधानी के अनुरूप विकास कराकर इसे पूर्ण रूपेण अपनी राजधानी बनाया।
  • चोल संघर्ष:-
    • सोमेश्वर प्रथम ने वेंगी पर आक्रमण किया और राजराज को पराजित कर दिया और विक्रमादित्य VII को शासक बना दिया था।
      • सोमेश्वर प्रथम ने त्रैलोक्यमल की उपाधि धारण की।
    • राजराज भागकर चोलों की शरण में चला गया। राजेन्द्र चोल ने पुन: राजराज को शासक बना दिया परन्तु कुछ समय बाद राजेन्द्र चोल की मृत्यु हो गई।
    • राजराज ने सोमेश्वर की अधीनता स्वीकार कर ली।
    • राजाधिराज चोल ने वेंगी पर आक्रमण कर जीत लिया और विजेन्द्र की उपाधि धारण की थी।
    • सोमेश्वर प्रथम कोप्पम तथा कुडलसंगम के युद्ध में चोलों से परास्त हुआ तथा पराजित होने पर तुंगभद्रा नदी में डुबकर आत्महत्या कर ली।

विक्रमादित्य VI (1076- 1126 ई.)

  • विक्रमादित्य VI योग्य शासक था।
  • अपने राज्याभिषेक के समय 1076 ई. में चालुक्य विक्रम संवत् चलाया था।
  • इसने एक नए नगर विक्रमपुर की स्थापना की थी।
  • अंतिम महान चालुक्य शासक विक्रमादित्य VI था।
  •  उसके दरबार में ‘विक्रमांकदेवचरित’ के लेखक विल्हण तथा स्मृतियों पर ‘मिताक्षरा’ नामक टीका के प्रसिद्ध टीकाकार विज्ञानेश्वर थे।
  • महत्त्वपूर्ण कार्य :-
    • वेंगी पर आक्रमण कर विक्रमादित्य VI ने चोलों को पराजित कर वहाँ अपने सेनापति अनंतपाल को शासक बनाया था।
    • कोंकण पर अधिकार कर अपना सामंत – कामदेव को नियुक्त किया था।
    • यादवों के विद्रोह का दमन
    • श्रीलंका के शासक – विजयबाहु की सभा में एक दूतमंडल भेजा।

सोमेश्वर III (1126-1138 ई.)

  • अंतिम प्रतापी शासक माना जाता है।
  • उपाधि – सर्वज्ञभूप:
  • ग्रंथ : मानसोल्लास (शिल्पशास्त्र पर आधारित)
  • इसकी मृत्य के बाद इसके दो पुत्र जगदेकमल्ल II (1139-1151 ई.) व तैलप III ने शासन किया।
    • तैलप III के समय होयसेलों, कलचूरि, यादव आदि सामंतों ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर लिया साम्राज्य निर्बल हो गया।
    • तैलप III के बाद उसका पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ (1181-1189 ई.) शासक बना, इसने कल्याणी की प्रतिष्ठा पुन: स्थापित करने का प्रयास किया असफल रहा।
    • 1190 ई. में देवगिरि के यादवों ने कल्याणी पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया।
    • दक्षिणी भागों पर होयसेलों ने अधिकार कर लिया।
    • सोमेश्वर चतुर्थ ने भागकर वनवासी में शरण ली।
    • कल्याणी चालुक्यों का अंत हो गया।

वेंगी के चालुक्य

  • वेंगी के चालुक्य वंश का संस्थापक विष्णुवर्धन था।
  • विष्णुवर्धन ने विषम सिद्धि की उपाधि धारण की थी।
  • जयसिंह प्रथम ने पृथ्वीवल्लभ, पृथ्वी जयसिंह तथा सर्वसिद्धि जैसी उपाधियाँ धारण की थी।
  • विजयादित्य तृतीय ने पंडरंग महेश्वर नाम से शैव मन्दिर निर्मित करवाया था।
  • विजयादित्य तृतीय का महान एवं सुयोग्य सेनापति पंडरंग था।
  • भीम द्वितीय ने विजयवाड़ा में मल्लेश्वर स्वामी का मन्दिर बनवाया था।
  • भीम द्वितीय ने विष्णुवर्धन, लोकाश्रय, राजमार्तण्ड, त्रिभुवनांकुश जैसी उपाधियाँ धारण की थी।
  • वेंगी के चालुक्य वंश का अंतिम शासक विजयादित्य VII था।

चालुक्य प्रशासन

राज्य

  • राज्य का प्रमुख राजा। 
  • वंशानुगत उत्तराधिकार के मामले में पुत्रोत्पत्ति के नियम (Primogeniture) का कठोरता से पालन नहीं। 
  • आमतौर पर, राजा के कार्यकाल के दौरान बड़े पुत्र को युवराज नियुक्त। युवराज को साहित्य, कानून, दर्शन, युद्धकला आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था। 
  • चालुक्य राजाओं ने दावा किया कि वे धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र के अनुसार शासन करते हैं। 
  • पुलकेशिन I मनु-स्मृति, पुराणों, और इतिहास का ज्ञाता था। 
  • प्रारंभ में, चालुक्य राजा महाराज़, सत्याश्रय और श्री-पृथ्वी-वल्लभ जैसे उपाधियाँ धारण करते थे। हर्षवर्धन को पराजित करने के बाद पुलकेशिन II ने परमेश्वरन की उपाधि धारण की। भट्टारकन और महाराजाधिराजन जैसी उपाधियाँ भी लोकप्रिय हो गईं। 
  • पल्लव राज्य में, राजा धर्म महाराजाधिराजा, महाराजाधिराजा, धर्म महाराजा, महाराजा जैसी उपाधियों से सुशोभित होते थे। हिरहदगल्लि ताम्रपत्र में राजा को अग्निष्टोम, वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों के अनुष्ठानकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

चिह्न

  • चालुक्यों का राजचिह्न – जंगली सूअर था, जिसे विष्णु के वराह अवतार का प्रतीक माना जाता था। 
  • पल्लवों का प्रतीक – सांड (शिव का वाहन) था।

राज परिवार की महिलाएँ

  • जयसिंह I के वंश की चालुक्य रियासत में राजसी महिलाओं को प्रांतीय राज्यपाल नियुक्त किया जाता था और उन्होंने कुछ मौकों पर सिक्के भी जारी किए। 
  • चालुक्य राजकुमारी विजया भट्टारिगा ने ताम्रपत्र जारी किए थे। 
  • इसके विपरीत, पल्लव रानियाँ राज्य के प्रशासन में सक्रिय भाग नहीं लेती थीं, लेकिन उन्होंने मंदिरों का निर्माण, देवताओं की मूर्तियों की स्थापना और मंदिरों को दान दिया। पल्लव राजा राजसिंह की रानी रंगापटाका की मूर्ति का उल्लेख कांचीपुरम के कैलासनाथ मंदिर के अभिलेखों में मिलता है।

राजा और उनके मंत्री

  • सभी शक्तियाँ राजा के अधीन थीं। शिलालेखों में मंत्रिपरिषद का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन इसमें महासंधिविग्राहिक नामक एक अधिकारी का उल्लेख है। 
  • अन्य चार प्रकार के मंत्रियों का उल्लेख भी मिलता है:
    • प्रधान (मुख्य मंत्री)
    • महासंधिविग्राहिक (विदेश मामलों के मंत्री)
    • अमात्य (राजस्व मंत्री)
    • समहर्ता (कोष मंत्री)

प्रशासनिक विभाजन

  • चालुक्यों ने राज्य को प्रभावी प्रशासन के लिए विषयम, राष्ट्रम, नाडु और ग्राम में विभाजित किया। 
  • शिलालेखों में विषयपति, सामंत, ग्रामपोहि और महात्र जैसे अधिकारियों का उल्लेख। 
  • विषयपति राजा के आदेश पर शक्ति का प्रयोग करते थे। 
  • सामंत राज्य के अधीनस्थ जागीरदार होते थे। 
  • ग्रामपोहि और ग्रामकुद गाँव के अधिकारी होते थे, जबकि महात्र गाँव के प्रमुख व्यक्ति माने जाते थे।
प्रांतीय और जिला प्रशासन
  • आमतौर पर, राजा अपने पुत्रों को प्रांतीय राज्यपाल नियुक्त करते थे। ये राज्यपाल स्वयं को राजा, मरक्क-राजन और राजादित्य राजा-परमेश्वरन कहते थे। कुछ राज्यपालों ने महासामंत की उपाधि धारण की और अपनी सेनाएँ बनाए रखीं। 
  • विषय का प्रमुख विषयपति होता था, और विषय को पुक्ति में विभाजित किया जाता था, जिसका प्रमुख पोगपति कहलाता था।
ग्राम प्रशासन
  • गाँवों में पारंपरिक राजस्व अधिकारी – नाला-कवुंडा। 
  • गाँव प्रशासन का केंद्रीय अधिकारी- कामुंडा या पोकीगन [राजा द्वारा नियुक्त]। 
  • गाँव का लेखा-जोखा रखने वाला अधिकारी-करन [ग्रामणी] 
  • गाँव में क़ानून और व्यवस्था का दायित्व महाजनम् नामक समूह के पास होता था। 
  • गाँव में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए महापुरुष नामक एक विशेष अधिकारी नियुक्त। 
  • नगरों के अधिकारी नगरपति या पुरपति

चालुक्य कला संस्कृति

धर्म

  • चालुक्य शासक शैववाद और वैष्णववाद दोनों का संरक्षण करते थे। उन्होंने शिव और विष्णु के मंदिर बनवाए। 
  • गंगा क्षेत्र से ब्राह्मणों को आमंत्रित कर बसाया गया ताकि वे नियमित पूजा और मंदिरों में त्योहारों व अनुष्ठानों का आयोजन कर सकें। 
  • कीर्तिवर्मन I, मंगलेश (597-609), और पुलकेशिन II (609-642) जैसे प्रमुख चालुक्य शासकों ने यज्ञों का आयोजन किया। वे परम वैष्णव और परम महेश्वर जैसी उपाधियाँ धारण करते थे। 
  • चालुक्य शासकों ने कार्तिकेय (युद्ध देवता) को भी प्रमुख स्थान दिया। 
  • शैव मठ शैववाद के प्रसार के केंद्र बन गए थे। 
  • चालुक्यों ने विरोधी संप्रदायों का भी संरक्षण किया और जैन केंद्रों को भूमि का उदारतापूर्वक दान दिया। 
  • पुलकेशिन II के कवि-राजकवि रविकीर्ति जैन विद्वान थे। 
  • कीर्तिवर्मन II के शासनकाल में एक जैन गाँव अधिकारी ने अन्निगेर नामक स्थान पर एक जैन मंदिर बनवाया। 
  • राजकुमार कृष्ण ने गुणपत्र, एक जैन भिक्षु, को अपना गुरु नियुक्त किया। 
  • ह्वेनसांग के अनुसार, चालुक्य क्षेत्र में कई बौद्ध केंद्र थे, जहाँ हीनयान और महायान संप्रदाय के 5000 से अधिक अनुयायी रहते थे।

साहित्य और शिक्षा

  • चालुक्य शासकों ने स्तंभलेखों जैसे कि एहोल और महाकुडम / महाकुट  में संस्कृत का उपयोग किया। 
  • सातवीं सदी के चालुक्य राजा के बादामी में एक शिलालेख में कन्नड़ को स्थानीय प्राकृत (जनता की भाषा) और संस्कृत को संस्कृति की भाषा के रूप में उल्लिखित किया गया है। 
  • पुलकेशिन II के एक सामंत ने संस्कृत में व्याकरण ग्रंथ सप्तावतारम की रचना की।

नोट – भारत : कला संस्कृति विषय में इन सभी साम्राज्य संबधी कला संस्कृति पहलू को विस्तार से समझाया गया है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

function getUTM(param) { const urlParams = new URLSearchParams(window.location.search); return urlParams.get(param); } document.addEventListener("DOMContentLoaded", function() { const utmParams = ["utm_source","utm_medium","utm_campaign","utm_term","utm_content"]; utmParams.forEach(function(param){ let value = getUTM(param); if(value){ let field = document.querySelector('input[name="'+param+'"]'); if(field){ field.value = value; } } }); });
error: Content is protected !!
×
New RAS course according to updated syllabus
Visit youtube channel now
Scroll to Top
Telegram WhatsApp Chat