प्राचीन भारत में कला एवं वास्तु

प्राचीन भारत में कला एवं वास्तु प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के अध्ययन में कला और वास्तुकला अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये उस युग की सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक प्रगति को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं। विविध मूर्तिकला, चित्रकला और स्थापत्य शैलियाँ न केवल उस समय के सौंदर्यबोध को प्रकट करती हैं, बल्कि उन्नत तकनीकी दक्षता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी प्रमाण देती हैं।

प्राचीन भारत में कला एवं वास्तु

1. स्थापत्य कला

सिंधु/हड़प्पा नगर नियोजन

  • मुख्य नगर
  • हड़प्पा (पंजाब, पाकिस्तान)
  • मोहनजोदड़ो (सिंध, पाकिस्तान)
  • धोलावीरा, लोथल, सुरकोटड़ा (गुजरात)
  • कालीबंगा (राजस्थान)
  • बनावली, राखीगढ़ी (हरियाणा)

मुख्य विशेषताएँ

1. योजनाबद्ध नगर (Grid Pattern)

  • नगर आयताकार ग्रिड पैटर्न।
  • सड़के N–S तथा E–W दिशा में।
  • कालीबंगा की सड़के: 1.8, 3.6, 5.4, 7.2 मी.
  • मुख्य सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
प्राचीन भारत में कला एवं वास्तु

2. दो भागों में नगर

उच्चवर्ती 
  • पश्चिम में, ऊँची भूमि पर, दुर्गीकृत, चौड़ी दीवार।
  • बड़े सार्वजनिक भवन: अन्नागार, प्रशासनिक भवन, स्तंभित हाल।
  • कम जनसंख्या, बड़े भवन, पक्की ईंटें।
निम्नवर्ती 
  • पूर्व में, सतह पर, आम लोगों का निवास।
  • सामान्यतः बिना सुरक्षा दीवार।
  • अपवाद: कालीबंगा (दोनों भाग घिरे),
    लोथल–सुरकोटड़ा (एक ही दीवार),
    चहूँदड़ो (दुर्गीकृत नहीं),
    धोलावीरा (तीन भाग + मध्य नगर केवल यहीं)।

3. भवन व घर

  • घर: 3–4 कक्ष, आंगन, रसोई, स्नानागार, शौचालय, कुआँ।
  • मोहनजोदड़ो: 700+ कुएँ।
  • कुछ घर दो मंजिला (सीढ़ियों के कारण)।
  • तीन प्रकार: निवास गृह, सार्वजनिक भवन, सार्वजनिक स्नानागार।

4. ईंटें व निर्माण

  • पकी व कच्ची ईंटें।
  • पक्की ईंटों का मानक अनुपात—1:2:4
    • घर: 7×14×28 सेमी
    • शहर की दीवार: 10×20×40 सेमी
  • अंग्रेजी बांड शैली।
  • नालियाँ व स्नानघर—पक्की ईंटों + जिप्सम से जलरोधक।

5. जल निकास प्रणाली

  • विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्राचीन जल निकासी।
  • घरों की छोटी नालियाँ → मुख्य ढकी नालियाँ।
  • जिप्सम/चूने से प्लास्टर।
  • मैनहोल (तरमोखे) + चेंबर (शोषगर्त)।
  • व्यक्तिगत व सार्वजनिक स्वच्छता पर जोर।

6. विशाल स्नानागार – मोहनजोदड़ो

  • स्थान: उत्तरी भाग, कृत्रिम टीले पर।
  • आकार: 39×23×8 फीट
  • ईंटों की सीढ़ियाँ, चारों तरफ बरामदे।
  • जलरोधक बिटुमेन + जिप्सम गारा।
  • पास में कुआँ, 8 छोटे स्नानागार।
  • धार्मिक अनुष्ठान, पुरोहितों के कक्ष।
  • सर जॉन मार्शल: “विश्व का आश्चर्य”।
  • कौशांबी ने पुष्कर/कमलताल से तुलना की।

7. विशाल अन्नागार

मोहनजोदड़ो अन्नागार
  • स्थान: स्नानागार के पश्चिम में।
  • 45.71×15.23 मी.
  • 27 कोठरियाँ, हवा हेतु व्यवस्था।
  • राजकीय भंडार हेतु (कर का अनाज)।
हड़प्पा अन्नागार
  • ऊँचे चबूतरे पर।
  • दो खण्ड, क्षेत्रफल: 55×43 मी
  • प्रत्येक में 6–6 कोठरियों की दो पंक्तियाँ।
  • प्रवेश रावी नदी की ओर।

8. जलाशय, स्टेडियम, गोदी

धोलावीरा
  • 16 जलाशय।
  • मुख्य जलाशय: 95×11.42×4 मी चट्टान काटकर।
  • स्टेडियम: 283×45 मी, दर्शक दीर्घाएँ।
लोथल—गोदी (Dockyard)
  • पक्की ईंटों का ढांचा।
  • आकार: 214×36 मी, गहराई 3.3 मी।
  • उत्तरी दीवार में 12 मी चौड़ा द्वार—भोगवा नदी से जुड़ा।
  • राव: “फिनिशिया व रोम की तुलना में अधिक उन्नत।”
  • वर्तमान विशाखापत्तनम डाकयार्ड से बड़ा।

9. अन्य जल संरचनाएँ

  • मोहनजोदड़ो—700+ कुएँ।
  • कालीबंगा—स्नानागार, नालियाँ।
  • मनहर—चट्टान काटकर तालाब।
  • बनावली—सुरक्षा हेतु खाई।

10. जल प्रबंधन

  • मानसून पर निर्भर कृषि → नहरें, तालाब, जलाशय।
  • वर्षाजल संचयन संरचनाएँ।
  • लोथल—सबसे उन्नत हाइड्रोलिक संरचनाएँ।
  • अल्लाहदीनो—छोटे व्यास के कुंए (हाइड्रोलिक दबाव से जल उठता)।

11. आधुनिक शहरों के लिए सीख (IVC → Modern India)

  • ग्रिड पैटर्न — भीड़ नियंत्रण, व्यवस्थित विकास (जैसे चंडीगढ़)।
  • बंद जल निकासी + कचरा पृथक्करण — संक्रामक रोगों से बचाव।
  • आवासीय व सार्वजनिक क्षेत्रों का स्पष्ट विभाजन — ट्रैफिक कम।
  • प्राकृतिक प्रकाश व वेंटिलेशन — ऊर्जा बचत।
  • धोलावीरा जैसी जल संरक्षण तकनीकें — जल संकट से बचाव (चेन्नई उदाहरण)।

2. मूर्तिकला

1. प्रस्तर (पाषाण) मूर्तियाँ

मोहनजोदड़ो – पुरोहित/योगी की मूर्ति
  • सामग्री: सेलखड़ी पत्थर, पारदर्शी वस्त्र।
  • स्थिति: केवल सिर–वक्ष भाग शेष।
  • वस्त्र: त्रिफुलिया आकृति युक्त शाल, बाएँ कंधे से दाएँ भुजा के नीचे।
  • मुद्रा/रूप:
    • नेत्र अधखुले, दृष्टि नाक के अग्रभाग पर।
    • सुंदर नाक, होंठ आगे निकले, बीच की गहरी रेखा।
    • दाढ़ी, मूंछें, गलमूंछ उभरी हुई।
    • कान सीप-आकृति, बीच में छेद।
    • बाल बीच से मांग, सिर पर साधारण फीता।
    • दाहिने भुजा पर बाजूबंद, गर्दन पर छोटे छेद (हार का संकेत)।
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हड़प्पा – दो उल्लेखनीय धड़
  1. लाल बलुआ पत्थर का धड़
    • युवा पुरुष, शरीर का सूक्ष्म अध्ययन।
    • सिर व भुजाएं जोड़ने हेतु गर्दन/कंधों में गड्ढे।
    • कंधे मांसल, पेट थोड़ा बाहर।
  1. स्लेटी चूना पत्थर का धड़ (नृत्य-मुद्रा)
    • आकर्षक अंग-विन्यास।
    • संभवतः नटराज की प्रारंभिक आकृति।
  • हड़प्पा + मोहनजोदड़ो की प्रस्तर मूर्तियाँ – त्रिआयामी कला का उत्कृष्ट उदाहरण।
  • चूना पत्थर की भेड़–हाथी संयुक्त मूर्ति (भेड़ का शरीर/सींग + हाथी की सूंड) भी मिली।

2. धातु मूर्तियाँ (ताँबा + कांसा)

  • तकनीक: लुप्त मोम विधि।
  • प्रसिद्ध मूर्तिया
    • कालीबंगा – ताँबे का वृषभ।
    • लोथल – ताँबे का कुत्ता व पक्षी।
    • मोहनजोदड़ो – कांस्य नर्तकी (सबसे प्रसिद्ध)।
    • दैमाबाद – रथ, गोल पहिए, लंबा चालक, ढाले हुए बैल (एम.के. धवलीकर: उत्कृष्ट शिल्प)।
कांस्य नर्तकी की मूर्ति
  • ऊँचाई: 10.5 सेमी (4.1 इंच)।
  • द्रवीय मोम विधि से निर्मित।
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वृषभ की कांस्य प्रतिमा (मोहनजोदड़ो)
  • आक्रामक मुद्रा, सिर दाईं ओर घूमे हुआ।
  • गले में रस्सी, भारी-भरकम शरीर।

कांस्य तकनीक का विकास

  • 2500 BCE – IVC, मोहनजोदड़ो की नर्तकी (सबसे प्राचीन)।
  • 1500 BCE – दैमाबाद की कांस्य मूर्तियाँ।
  • कुषाण काल – चौसा (बिहार) से जैन तीर्थंकर कांस्य प्रतिमाएँ।
  • 5th–7th Century CE –
    • जैन कांस्य (अकोटा, बड़ौदा)।
    • बुद्ध प्रतिमाएँ (सारनाथ/गुप्त शैली), महाराष्ट्र के फोफनर – वाकाटककालीन, अमरावती प्रभाव।
  • 8th–10th Century – कश्मीर व हिमाचल की बौद्ध/हिन्दू कांस्य प्रतिमाएँ।
  • 10th–12th Century – तमिलनाडु में कांस्य कला चरम पर।
  • विजयनगर (16th Century) – तिरुपति में कृष्णदेवराय व रानियों की आदमकद कांस्य प्रतिमाएँ।

3. मृण्मूर्तियाँ (Terracotta)

  • सामग्री: काँचली मिट्टी (लाल मिट्टी + क्वार्ट्ज पाउडर)।
  • तकनीक: पिंचिंग विधि।
  • प्रकार: मनुष्य, पशु; नारी मूर्तियाँ अधिक → मातृसत्तात्मक संकेत।
  • कालीबंगा व लोथल की नारी-मूर्तियाँ हड़प्पा/मोहनजोदड़ो से भिन्न।
  • मूर्तियाँ अपेक्षाकृत कम परिष्कृत; बड़ी आँखें, चोंच जैसी नाक।
  • दाढ़ी-मूंछ वाले पुरुषों की छोटी आकृतियाँ – संभवतः देवता।
  • अन्य:
    • पहिएदार गाड़ियाँ
    • सीटियाँ
    • पशु-पक्षी
    • खेल सामग्री (पासे, गिट्टियाँ, चकरी)
  • एक-सींग वाले देवता का मुखौटा भी मिला।
मातृका प्रतिमाएँ
  • भद्दी, अपरिष्कृत, खड़ी मुद्रा।
  • उन्नत उरोज, हार, कमर पर अध-वस्त्र, करधनी।
  • सिर पर पंखा-जैसा आवरण, दोनों ओर प्यालेनुमा उभार।
  • गोल आँखें, चोंच जैसी विशाल नाक, मुँह चीरा हुआ-सा।

3. मृदभांड कला

मुख्य विशेषताएँ

  • लाल रंग के मृदभांड सबसे अधिक प्रचलित।
  • अधिकांश बर्तन कुम्हार की चाक से बने — हाथ से बने बहुत कम।
  • बर्तनों पर लिपियाँ अंकित — “अभिलेख युक्त मृदभांड”।
  • चित्रित वस्तुएँ — मानव, मछली, तालाब, हिरण, हाथी, बाघ, बतख आदि।
  • काली पट्टिकायुक्त लाल मृदभांड (Black Striped Red Ware–BSRW)
    → निर्यात किए जाते थे, इसलिए यह व्यावसायिक उद्योग था।
  • कुछ बर्तनों पर ज्यामितीय आकृतियाँ, वनस्पति, पशु आकृतियाँ (काले रंग से चित्रित)।
  • लोथल से विशेष मृदभांड — कौआ और लोमड़ी की आकृति उत्कीर्ण।

मृदभांड प्रकार (Types of Pottery)

1. सादा मृदभांड (Plain Pottery)

  • संख्या में सबसे अधिक।
  • लाल चिकनी मिट्टी के बने; कभी-कभी लाल या सलेटी लेप।
  • उपयोग — अनाज, पानी का भंडारण, घरेलू कार्य।
  • कुछ पर घुंडीदार (knobbed) सजावट।

2. चित्रित मृदभांड (Painted Pottery)

  • लाल आधार पर काले रंग से चित्रण।
  • मुख्यतः — ज्यामितीय आकृतियाँ, पौधे, जानवर।
  • सजावटी और अनुष्ठानिक उद्देश्यों के लिए।
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3. बहुरंगी मृदभांड (Polychrome Pottery) — बहुत दुर्लभ

  • छोटे कलश।
  • रंग — लाल, काला, हरा, सफेद, पीला।
  • ज्यामितीय डिज़ाइन।

4. उत्कीर्णित मृदभांड (Incised Pottery) — दुर्लभ

  • उत्कीर्ण सजावट मुख्यतः पेंदे और तश्तरियों पर।

5. छिद्रित पात्र (Perforated Jars)

  • तल में एक बड़ा छिद्र और दीवारों पर छोटे छेद।
  • सम्भवतः छानने (filtering) के लिए उपयोग।

6. सूक्ष्म/सजावटी पात्र (Miniature Pottery)

  • आकार अक्सर ½ इंच से भी कम।
  • अत्यंत सुंदर, पूरी तरह सजावटी — उच्च कौशल का प्रमाण।

आकार व प्रकार (Shapes & Forms)

  • स्टैंड पर रखी थालियाँ
  • भंडारण मटके
  • छिद्रयुक्त मटके
  • प्याले
  • S-आकृति के मटके
  • कटोरे, प्लेटें, थालियाँ
  • घरेलू उपयोग के विविध बर्तन
  • लगभग सभी बर्तनों में सुंदर मोड़ (curvature) — सीधे कोणीय रूप बहुत कम।

4. अन्य आयाम

काष्ठ शिल्प

  • उन्नत काष्ठ शिल्प – इसका प्रमाण लोथल की मुहर पर जहाज का अंकन।
  • नदी मार्ग के व्यापार हेतु नौका निर्माण के प्रमाण भी मिले — यह उन्नत शिल्प कौशल दर्शाता है

मुद्राएँ (Seals)

निर्माण सामग्री

  • प्रमुखतः सेलखड़ी (Steatite)
  • कभी–कभी गोमेद, चकमक पत्थर, तांबा, कांस्य, मिट्टी, हाथीदांत
  • लोथल व देसलपुर – ताँबे की मुहरें

मुद्राओं पर आकृतियाँ

  • एक सींग वाला साँड़ (Unicorn), गैंडा, बाघ, हाथी, जंगली भैंसा, बकरा, साकिन, मगरमच्छ
  • गाय का साक्ष्य नहीं
  • कल्पित पशु, अर्ध-मानव–अर्ध-पशु आकृतियाँ
  • लोथल व मोहनजोदड़ो – 1–1 मुहर पर नाव का चित्र
  • अधिकांश मुहरों पर 3–8 अक्षरों की सिंधु लिपि
  • कुल लगभग 2000 मुहरें, जिनमें 500 मोहनजोदड़ो से

मुद्राओं के प्रकार

  • वर्गाकार (सबसे सामान्य), आयताकार, बेलनाकार, वृत्ताकार
उद्देश्य
  • व्यावसायिक
  • संचार व व्यापार (मेसोपोटामिया–लोथल)
  • ताबीज, शव पर एक छेद वाली मुहर
  • शैक्षणिक उद्देश्य (गणितीय आकृतियाँ)

मानक मुद्रा

  • मानक आकार 2 × 2 इंच
  • सेलखड़ी पर उकेरी गई चित्रात्मक लिपि (अभी तक अपठित)

विशेष मुहरें

1. पशुपति मुहर

  • मोहनजोदड़ो से, सेलखड़ी निर्मित
  • जॉन मार्शल – इसे पशुपति शिव माना
  • आकार : 3.53 × 3.53 सेमी, मोटाई 0.64 सेमी
  • मानव आकृति पद्मासन में
  • दाईं ओर – हाथी, बाघ
  • बाईं ओर – गैंडा, भैंसा
  • नीचे – 2 बारहसिंगा
  • सिर पर – बड़े सींगों वाला मुकुट
  • अत्यंत महीन नक्काशी → उन्नत शिल्प कौशल

2. कूबड़दार बेल (Unicorn) मुहर

  • मोहनजोदड़ो से
  • सबसे अधिक मिलने वाली डिजाइन

3. ताँबे की पट्टियाँ (Tablets)

  • वर्गाकार/आयताकार
  • एक ओर मानव आकृति, दूसरी ओर अभिलेख
  • नोकदार औजार से सावधानीपूर्वक अंकन
  • संभवतः बाजूबंद की तरह पहचान हेतु उपयोग

लिपि

  • अभी तक अपठित
  • भावचित्रात्मक 
  • पंक्तियाँ – पहली दाएँ से बाएँ, दूसरी बाएँ से दाएँ
  • प्रथम नमूने – 1853, कनिंघम
  • अन्य नाम –
    • सर्पिलाकार लिपि
    • गोमूत्राक्षर
    • ब्रस्टोफेदन
  • सबसे पहले पढ़ने का प्रयास – Waden
  • प्रथम भारतीय प्रयास – नटवर झा
  • 64 मूल चिह्न, 250–400 चित्राक्षर
  • सर्वाधिक चित्र – मछली का
  • लिपि के साक्ष्य – हड़प्पा का कब्रिस्तान H
  • अब तक 2500 लेख, सबसे लंबा 26 अक्षर

विज्ञान

  • गणित के प्रतीक → संख्या, गुणा, योग का ज्ञान
  • चिकित्सा – कालीबंगा से बालक की खोपड़ी पर 6 छेद (Trephination का प्रमाण)
  • धातु विज्ञान – ढलाई तकनीक, उपकरण निर्माण की उन्नत विधि
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