भारत पर अरब व तुर्क आक्रमण

भारत पर अरब व तुर्क आक्रमणों की शुरुआत यामिनी वंश के शासक महमूद गजनवी से मानी जाती है, जिसके बाद मोहम्मद गौरी के अभियानों ने भारत में तुर्क सत्ता की नींव रखी। प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के अंतर्गत मामलूक (गुलाम) वंश (1206–1290 ई.) तथा उसके संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक (1206–1210 ई.) का शासन भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जाता है।

इस्लाम का उदय

  • ईस्लाम दुनिया का सबसे नवीन धर्म है एवं सबसे तेज गति से फैलने वाला धर्म है। 
  • ईस्लाम का संस्थापक पैगम्बर मुहम्मद साहब को माना गया है 
  • 622 में हिजरी कलेंडर की शुरुआत हुई। 
  • 622 में ही मोहम्मद साहब ने मक्का से मदीना की यात्रा की जिसे हिजरत कहा जाता है
    • आधुनिक इतिहास में प्रथम प्रयोगकर्ता = महात्मा गाँधी 
  • ईस्लाम की सबसे पवित्र पुस्तक कुरान शरीफ है जिसकी रचना मदीना में हुई। 
  • मोहम्मद साहब ईस्लाम के अंतिम पैगम्बर थे, इस धर्म में कुल ढाई लाख पैगम्बर हुए, प्रथम पैगम्बर – मोहम्मद एडम थे। 
  • मो. साहब को नबी, रसूल, ईमाम साहब आदि नामो से जाना जाता है 
  • खुदा के प्रति पूर्ण समर्पण ही ईस्लाम है।
  • एक सच्चे मुसलमान की पांच विशेषताए बताई गई – 
    1. शहादा – गवाही देना 
    2. सलात – नमाज 
    3. सौम – रोजा 
    4. हज 
    5. जकात – कुल आय का 2 – 2% गरीबो को देना 
  • 632 इ. में मो. साहब के जन्नत जाने के बाद एक नवीन पद का सृजन हुआ जो मदीना की गद्दी का उत्तराधिकारी था जिसे खलीफा कहा गया।
  • खलीफाओ का क्रम – 
    1. अबू बक्र – साहब के ससुर जां – सुन्नी 
    2. हजरत उमर 
    3. हजरत उस्मान 
    4. हजरत अली – साहब के दामाद – शिया  
  • ये सभी कुरैशी वंश के है।

करबला का युद्ध 

  • यह युद्ध 10 अक्टूबर 680 इ. में ईराक स्थित कत्र्बला के मैदान में हुआ इस युद्ध में हजरत अली के पुत्रो हसन व हुसैन को सेनापति मो. याजिद ने मार दिया।
  • इस घटना को शोक दिवस के रूप में ताजिया त्यौहार कहा जाता है जो मोहर्रम के महीने की तारीख 10 को मनाया जाता।

खलीफाओ की क्रमश राजधानियां – 

  1. मदीना (नबी का शहर) – अबू बक्र, उमर, उस्मान, अली की राजधानी 
  2. दमिश्क (सीरिया) – उम्म्या वंश की राजधानी –  मो. याजिद 
  3. बग़दाद ( ईराक) – अब्बासी वंश की राजधानी – ख्वाजा बाकी बिल्लाह
  4. तुर्की –  खलीफाओ की अंतिम राजधानी।
  5. अंतिम खलीफा – अब्दुल म्मजीद द्वितीय बिन मुहम्मद।
  6. ईस्लामिक विधि विधान को जवाबित कहा जाता है 
  7. जवाबित के भीतर केवल धार्मिक विधि विधान को शरीयत कहा जाता है 
  8. शरीयत का उल्लंधन कर्ता – काफिर 
  9. काफ़िरो के खिलाफ जारी आदेश को फतवा कहा जाता है।

भारत पर तुर्क आक्रमण दो वंशो ने किया

  1. यामिनी वंश
  2. संशबनी वंश

अलप्तगीन

  • अलप्तगीन समनी वंश के शासक अबुल मलिक का ग़ुलाम था। उसकी प्रतिभा और सैनिक गुणों से प्रभावित होकर अबुल मलिक ने उसे खुरासान का गवर्नर नियुक्त कर दिया था।
  • जब अबुल मलिक की मृत्यु हो गई, तब अलप्तगीन ने अफ़ग़ानिस्तान के पास एक नया राज्य स्थापित किया और ग़ज़नी को अपनी राजधानी बनाया।
  • यह गजनी साम्राज्य यामिनी वंश/गजनी वंश का संस्थापक था।

सुबुक्तगीन

  • सुबुक्तगीन (977-997) ग़ज़नी की गद्दी पर अलप्तगीन की मृत्यु के बाद बैठा था। 
  • प्रारंभ में वह एक ग़ुलाम था, जिसे अलप्तगीन ने ख़रीद लिया था। अपने ग़ुलाम की प्रतिभा से प्रभावित होकर अलप्तगीन ने उसे अपना दामाद बना लिया था और ‘अमीर-उल-उमरा’ की उपाधि से उसे सम्मानित किया।
  • सुबुक्तगीन भारत पर आक्रमण करने वाला पहला तुर्क शासक था।
  • इसने 986 ई. में जयपाल(शाही वंश के राजा) पर आक्रमण किया और जयपाल को पराजित किया। 
  • जयपाल का राज्य सरहिन्द से लमगान(जलालाबाद) और कश्मीर से मुल्तान तक था। शाही शासकों की राजधानी क्रमशः ओंड, लाहौर और भटिण्डा थी।

महमूद गजनवी

  • उपाधि – सुल्तान, यामीन-उद्दौला तथा ‘अमीन – ऊल – मिल्लाह’
  • महमूद गजनवी का जन्म 1 नवंबर 971 ई. को हुआ।
  • महमूद गजनवी सुबुक्तगीन का पुत्र था।
  • 998 ई. में सुबुक्तगीन की मृत्यु के बाद महमूद गजनवी गजनी का शासक बना।
  • खलीफा अल-कादिर-बिल्लाह ने महमूद को ‘सम्मान का चोगा’ दिया और यमीन उद्दौला(साम्राज्य की दक्षिण भुजा), अमीन-उल-मिल्लत(धर्म संरक्षक) की उपाधियां प्रदान की।
  • सुल्तान की उपाधि तुर्की शासकों ने प्रारंभ की थी। उसे यह उपाधि बगदाद के खलीफा ने प्रदान की। सुल्तान की उपाधि लेने वाला पहला शासक महमूद गजनवी था।
महमूद गजनवी के आक्रमण के कारण
  1. अपने राज्य की सुरक्षा हेतु शाही वंश पर आक्रमण करना।
  2. राज्य विस्तार एवं अपने शत्रुओं को पराजित करने के लिए धन की आपूर्ति करना।
  3. अपने विरूद्ध भारतीय राजाओं को संगठित या दलबंदी करने का अवसर नहीं देना चाहता था।
  4. इस्लाम का प्रचार-प्रसार करना भी उसका एक गौण उद्देश्य था।
गजनवी के भारतीय आक्रमण
  • इसने खैबर दर्रे से रास्ते से भारत पर प्रथम आक्रमण 1001 ई. में पंजाब के आस-पास के क्षेत्रों में किया। महमूद गजनवी का पहला आक्रमण हिन्दुशाही शासक जयपाल के विरूद्ध था।
  • महमूद गजनबी ने 1001 ई. से 1027 ई. के बीच भारत पर 17 बार आक्रमण किए।
  • 1.पंजाब का सीमावर्ती क्षेत्र, 2. पेशावर, 3.भटिण्डा, 4.मुल्तान, 5.मुल्तान, 6.वैहिद (पेशावर), 7.नारायणपुर (अलवर), 8.मुल्तान, 9.थानेश्वर, 10.नन्दन, 11. कश्मीर, 12. मथुरा व कन्नौज, 13. कालिंजर, 14. कश्मीर, 15. ग्वालियर व कालिंजर, 16. सोमनाथ मंदिर, 17. सिंध के जाट।
  • वैहिन्द की पहली लड़ाई – महमूद गजनवी एवं जयपाल (गजनवी की विजय)
  • वैहिन्द की दूसरी लड़ाई – महमूद गजनवी एवं आनन्दपाल (गजनवी की विजय)
  • महमूद गजनवी ने 1015 में कश्मीर पर आक्रमण किया परन्तु असफल रहा।
  • महमूद गजनवी का सबसे चर्चित आक्रमण सोमनाथ के मन्दिर पर सन् 1025 में किया गया। महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया तथा शिव मन्दिर को नष्ट कर दिया और अपार धन संपदा लूटी। यह आक्रमण चालुक्य(सोलंकी) वंश के शासक भीम देव/भीम-1 के समय में हुआ। यह मन्दिर गुजरात प्रान्त के काठियावाड़ जिला में समुद्र तट पर स्थित था।
  • सोमनाथ के आक्रमण में दो हिन्दुओं सेवन्तराय और तिलक ने उसका साथ दिया था।
  • गजनवी के जाने बाद भीम-1 ने ही सोमनाथ मन्दिर का पुनर्निमाण करवाया।
  • 17 वां और अन्तिम आक्रमण (1027 ई.) —
    • जाटों व खोखरों को दण्डित  देने के लिए महमूद गजनवी ने 1027 ई. में भारत पर अन्तिम आक्रमण किया क्योकिं सोमनाथ मंदिर को लूट कर जाते समय जाटों व खोखरों ने महमूद की सेना को अत्यधिक क्षति पहुंचाई थी। 1030 ई. में महमूद गजनवी की मृत्यु हो गयी।
आक्रमण के परिणाम
  1. उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन।
  2. मुस्लिम व्यापारियों के माध्यम से मध्य एवं पश्चिम एशिया के साथ भारतीय व्यापर में वृद्धि।
  3. मुस्लिम व्यापारियों के साथ इस्लाम प्रचारकों का भारत में प्रवेश।
  4. लाहौर अरबी तथा फारसी साहित्य का केन्द्र बन गया।
  5. मुस्लिम राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।
  • महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण करने का उद्देश्य केवल लूटपाट एवं धन प्राप्ति था। वह भारत में स्थायी साम्राज्य स्थापित करने अथवा अपना साम्राज्य विस्तार के लिए भारत नहीं आया था।
    • तर्क – गजनवी विजित प्रदेशों में स्थायी रूप से नहीं रहता था वह बार-बार गजनी लौट जाता था।
  • गजनवी ने न तो विजित प्रदेशों को अपने राज्य में मिलाया और न ही विजित प्रदेशों में कोई स्थायी बन्दोबस्त किया।
  • गजनवी भारत से धन लूटकर मध्य एशिया में विशाल साम्राज्य स्थापित करना चाहता था।
  • गजनवी ने मथुरा के कई मंदिरों को तोड़ा यह भारत का बेथलेहम कहा जाता है।
  • गजनवी को भारतीय इतिहास में बुतशिकन(मूर्तिभंजक) के नाम से जाना जाता है।
प्रमुख इतिहासकार
  1. अलबरूनी – अलबरूनी फारसी भाषा के लेखक थे जो महमूद गजनवी के साथ भारत आए प्रसिद्ध पुस्तक किताब उल हिन्द (तहकीक-ए-हिन्द) की रचना की।
  2. फिरदौसी – ये फारसी कवि थे इन्होंने शाहनामा कहाकाव्य की रचना की।
  3. उत्बी – किताब-उल-यामिनी
  4. वैहाकी – तारीख-ए-सुबुक्तगीन

मोहम्मद गौरी

  • मुहम्मद गौरी को भारत में तुर्क साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है।
  • वह शंसबनी वंश का था और गजनी तथा हेरात के बीच स्थित गजनी राज्य से आया था।
  • गोर, जो वर्तमान अफगानिस्तान का हिस्सा है, पहले गज़नवी साम्राज्य के अधीन था। महमूद गज़नवी की मृत्यु (1030 ई.) के बाद गज़नवी साम्राज्य कमजोर पड़ गया, जिससे ख्वारिज्मी और गोरी शक्तियों का उदय हुआ।
  • ख्वारिज्मी साम्राज्य का आधार इरान था, जबकि गोरी साम्राज्य का आधार उत्तरी पश्चिमी अफगानिस्तान था।
  • इस संघर्ष के दौरान गोर के कुत्बुद्दीन मुहम्मद एवं उसका भाई सैफुद्दीन ने कुछ समय के लिए गज़नी पर अधिकार कर लिया था। किन्तु यह अधिकार स्थायी नहीं बन सका और गज़नी के शासक बहरामशाह द्वारा सैफुद्दीन की हत्या कर दी गई। 
  • गोर के अलाउद्दीन हसन ने गज़नी पर हमला कर भयंकर विनाश मचाया, जिससे उसे “जहाँसोज़” (विश्वदाहक) की उपाधि मिली। 
  • गज़नी दस वर्षों तक ग्रुज तुर्कमानों के अधिकार में रही। “विश्वदाहक” अलाउद्दीन हसन का पुत्र और उसका उत्तराधिकारी सैफुद्दीन मुहम्मद ग्रुज तुर्कमानों के विरुद्ध लड़ता हुआ मरा। परन्तु उसके चचेरे भाई एवं उत्तराधिकारी गयासुद्दीन मुहम्मद ने 1173 ई. में गज़नी पर स्थायी रूप से अधिकार कर लिया और ग्रुजतुर्कों को गज़नी से भगा दिया।
  • ग्यासुद्दीन मुहम्मद गौरी ने 1163 ई.में गोर को राजधानी बनाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करा।
  • 1173 ई. में ग्यासुद्दीन ने अपने छोटे भाई  शिहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी को गोर का क्षेत्र सौंप दिया तथा स्वयं गजनी पर अधिकार कर ख्वारिज्म के विरुद्ध संघर्ष शुरु कर दिया।
  • मुहम्मद गौरी ने भारत की ओर प्रस्थान कर दिया। महम्मद गौरी एक अफगान सेनापति था। यह एक महान विजेता तथा सैन्य संचालक भी था।

मुहम्मद गोरी का भारत पर आक्रमण

वर्षराज्यशासकपरिणाम
1175मुल्तानकरमाथी शासकविजय
1176उच्छकरमाथी शासकविजय
1178अन्हिलवाड़गुजरातचालुक्य रानी नाईक देवी (अल्पवयस्क भीम II)पराजय
1179पेशावरमालिक खुसरोविजय
1181लाहौरमालिक खुसरोविजय
1182देवल व् सिंधसुम्र शासकविजय
1185स्यालकोटमालिक खुसरोविजय
1186लाहौरमालिक खुसरोविजय
1189भटिंडाचौहान सूबेदारविजय
1191तराईनपृथ्वीराज चौहानपराजय
1192तराईनपृथ्वीराज चौहान विजय
1193हांसी, कुहराम, सरसुतह व दिल्ली
1194कन्नौज (चंदावर)जयचंदविजय
1195-96बयानाकुमार पालविजय
1196ग्वालियरसुलक्षणपालविजय

पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के युद्ध

  • अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान III और गजनी के मुहम्मद गोरी के बीच पंजाब के भटिण्डा (तबरहिन्द) पर अधिकार को लेकर संघर्ष हुआ।
तराइन का पहला युद्ध (1191 ई.):
  • तराइन के मैदान (थानेश्वर) में हुआ यह युद्ध पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के बीच लड़ा गया। 
  • पृथ्वीराज ने राजपूत राजाओं के सहयोग से गोरी को बुरी तरह हराया। घायलावस्था में गोरी गजनी लौट गया, और भटिण्डा पर पृथ्वीराज का अधिकार स्थापित हुआ।
तराइन का दूसरा युद्ध (1192 ई.):
  • पिछली हार का बदला लेने के लिए मुहम्मद गोरी ने 1,20,000 घुड़सवारों की विशाल सेना और सेनानायकों की मदद से फिर हमला किया। 
  • इस बार पृथ्वीराज पराजित हुए, और यह युद्ध भारत में मुस्लिम शासन की शुरुआत का कारण बना।

कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा किये गए भारतीय अभियान/भारत पर आक्रमण :

  • उसने 1192 ई. में हाँसी, मेरठ, बरन (आधुनिक बुलन्दशहर), रणथम्भौर पर तथा 1193 ई. में दिल्ली, 1194 ई. में कोयल (अलीगढ़) पर विजय प्राप्त की। 
  • 1194 ई. में मुहम्मद गोरी वापस भारत आया। दोआब में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कन्नौज के शक्तिशाली राजधानी गहड़वाल के राजा जयचंद को पराजित करना जरूरी था।
चंदावर का युद्ध 1194 – 
  • गोरी ने अपने 50,000 अश्वारोहियों सहित कन्नौज और बनारस की ओर कूच किया। ऐबक अग्रिम दल का सरदार।
  • यमुना नदी के तट पर इटावा जिले के चंदावर में गोरी और कन्नौज के गहड़वाल राजा जयचंद के बीच युद्ध हुआ।
  • इस युद्ध में जयचंद पराजित हुआ और मारा गया। गहड़वाल राज्य पर पूरी तरह अधिकार नहीं हो सका, लेकिन बनारस और अस्नी जैसे स्थानों पर सैनिक चौकियां स्थापित की गईं। कन्नौज सहित राज्य के कई महत्त्वपूर्ण केंद्र 1198-99 ई. तक स्वतंत्र बने रहे।
कुतुबुद्दीन ऐबक की अन्य विजयें – 
  • 1197 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुजरात के राजा भीम द्वितीय को पराजित किया और कई नगरों में लूटपाट की। 
  • इसके बाद बदायूं (1197-98 ई.) और कन्नौज (1198-99 ई.) पर विजय प्राप्त की। 
  • 1199-1200 ई. में उसने कालिंजर के दुर्ग पर आक्रमण किया, जो चंदेल परमार्दिदेव का प्रमुख केंद्र था। ऐबक ने कालिंजर, महोबा और खजुराहो पर अधिकार कर इन्हें अपने नियंत्रण में रखा।
पूर्वी भारत की ओर तुर्कों का प्रसार – 
  • ऐबक ने बख्तियार खल्जी को पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों पर शासन सौंपा। खल्जी ने बिहार और बंगाल पर आक्रमण किया, नालंदा और विक्रमशिला जैसे बौद्ध शिक्षा केंद्रों को नष्ट किया। उदण्डपुर नामक स्थान पर दुर्ग बनवाया 
  • उसने सेन शासक लक्ष्मणसेन को हराकर बंगाल में गौड़ (लखनौती) को अपनी राजधानी बनाया। 
  • हालाँकि असम में अभियान के दौरान उसे पराजय का सामना करना पड़ा, और उसकी हत्या कर दी गई।

निष्कर्ष – 

  • 13वीं शताब्दी तक तुर्कों ने सिन्धु से गंगा तक अधिकांश उत्तर भारत पर अधिकार कर लिया। 15 मार्च, 1206 ई. में खोखरों के विद्रोह को दबाने के बाद गजनी लौटते समय सिन्धु नदी के किनारे मुहम्मद गोरी की हत्या हो गई। यह भारत में तुर्की शासन का स्थायित्व सुनिश्चित करने वाला युग साबित हुआ।

सामान्य जानकारी

  • कुल अवधि – 320 वर्ष (1206–1526 ई.)
  • कुल 5 राजवंश – मामलूक (गुलाम), खिलजी, तुगलक, सैय्यद, लोदी
  • प्रथम राजवंश – मामलूक / गुलाम वंश (1206–1290 ई.), 90 वर्ष शासन
  • तीन शाखाएँ – कुतुबी, शम्सी, बल्बनी वंश
  • कुल 11 सुल्तान
भारत पर अरब व तुर्क आक्रमण
क्र.सुल्तानशासनकाल
1कुतुबुद्दीन ऐबक1206–1210
2आरामशाह1210
3इल्तुतमिश1211–1236
4रुकनुद्दीन फिरोज1236
5रजिया सुल्तान1236–1240
6बहरामशाह1240–1242
7अलाउद्दीन मसूदशाह1242–1246
8नासिरुद्दीन महमूद1246–1265
9बलबन1266–1287
10कैकुबाद1287–1290
11कैयूमर्स1290

अन्य राजवंश

वंशअवधिसुल्तान संख्याप्रमुख तथ्य
खिलजी1290–13206सबसे छोटा काल
तुगलक1320–14128सबसे लम्बा शासन
सैय्यद1414–14504लघु शासनकाल
लोदी1451–15263अन्तिम वंश, अफगान वंश

 कुतुबुद्दीन ऐबक (1206–1210) ई.

  • जन्म: तुर्किस्तान में
  • बाल्यावस्था में दास → काजी फखरुद्दीन (निशापुर) ने खरीदा
  • बाद में मुहम्मद गौरी ने गजनी में खरीदा
  • अर्थ:
    • ऐबक = चन्द्रमा का स्वामी
    • सिराज के अनुसार: “अटी उंगुली वाला”
  • हबीबुल्ला ने कहा – “मामलूक” (अरबी में अर्थ: स्वतंत्र माता-पिता से उत्पन्न दास)
  • उपाधियाँ:
    • “कुरान खाँ” – मधुर आवाज़ में कुरान पाठ करता था
    • “लाख बख्श” – अत्यधिक उदारता
    • मिनहाज सिराज: “हातिम द्वितीय”

 कुतुबुद्दीन ऐबक की राजनीतिक उपलब्धियाँ

ऐबक की राजनीतिक उपलब्धियों को 3 भागों में रखा जा सकता है- 

(1192-1206 ई.)  – 
  • मुहम्मद गौरी के प्रतिनिधि के रूप में इस अवधि में उसने अजमेर के दूसरे विद्रोह (1192 ई.) का दमन किया। 
  • 1194 ई. में चन्दावर के युद्ध में जयचन्द्र गहड़वाल को पराजित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया ।
  •  1195 ई. में अलीगढ़ पर विजय प्राप्त की व अजमेर में चौहानों के तीसरे विद्रोह का दमन किया। रणथम्भौर के दुर्ग पर विजय प्राप्त की।
  • 1197 ई. में गुजरात की राजधानी अन्हिलवाड़ को लूटा।
  • 1197-1198 ई. में उसने बदायूँ, चन्दावर एवं कन्नौज पर अधिकार कर लिया। 
  • 1202 ई. में परमर्दिदेव को पराजित कर महोबा, खजुराहो एवं कालिंजर पर अधिकार कर लिया। 
(1206-1208 ई.)-
  •  1206 ई. में गौरी की हत्या हो गई। गौरी के प्रमुख 3 दास ऐबक, कुबाचा, यल्दौज समान शक्ति युक्त थे। 
  • फखे मुदब्बिर के अनुसार 1205-1206 ई में गौरी ने ऐबक को भारत में अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया था तथा मलिक की उपाधि प्रदान की। 
  • डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव व प्रो. हबीबुल्लाह इस मत का समर्थन करते है है किन्तु के.ए. निजामी इस मत का खंडन करते हैं।
  •  गोरी की मृत्यु के पश्चात लाहौर के नागरिकों के अनुरोध पर ऐबक दिल्ली से लाहौर पहुंचा व सत्ता ग्रहण की।
  •  ऐबक ने सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की वह मलिक व सिपहसालार की उपाधि से ही संतुष्ट था। 
  • ऐबक को दासता के बंधन से मुक्त कर दिया। 
  • दासता मुक्ति पत्र एवं सुल्तान के प्रतीक चिन्ह हसन निजामी लेकर लाहौर पहुंचा। 
(1208-1210 ई. कठिनाइयों का समय)- 
  •  ऐबक के लिए इस समय 3 बड़ी चुनौतियां थी, यह थे- ख्वारिज्म के शाह, कुबा के यल्दुज़। 

मृत्यु

  • 1210 ई., लाहौर में चौगान (पोলো) खेलते समय घोड़े से गिरकर मृत्यु

 मूल्यांकन

  • श्रेष्ठ सेनानायक, कूटनीतिज्ञ
  • भारत में गजनी से स्वतंत्र तुर्की राज्य की स्थापना
  • हबीबुल्ला – “तुर्कों की निर्भीकता व फारसियों की शालीनता”
  • मिनहाज सिराज – “उदार एवं विशाल हृदय वाला सुल्तान”

 निर्माण कार्य

  • कुतुब मीनार की नींव रखी
  • रायपिथौरा (दिल्ली) के निकट नया नगर बसाया (दिल्ली के सात नगरों में प्रथम)
  • अजमेर – ढाई दिन का झोंपड़ा मस्जिद
  • हसन निजामी व फख्र-ए-मुदब्बिर जैसे लेखकों का संरक्षण
  • अली-मदीन-खाँ को बंगाल का सूबेदार बनाया — बंगाल को सल्तनत का अंग बनाया

इल्तुतमिश (1211–1236 ई.)

आरंभिक परिचय

  • तुर्किस्तान की इल्बारी जनजाति का था — इसलिए “इल्बारी वंश” भी कहा जाता है।
  • अर्थ: इल्तुतमिश = राज्य का स्वामी
  • बदायूंनी के अनुसार — चन्द्रग्रहण की रात जन्म, इसलिए नाम “इल्तुतमिश”।
  • विभिन्न इतिहासकारों ने अलग नाम दिए इलियट → अल्तम्श, एलिफिस्टन → अल्तमिश
  • कुतुब मीनार पर उसका नाम “इल्तुतमिश” अंकित है।
  • पाँच बार गुलाम के रूप में बेचा गया → “गुलामों का गुलाम” कहा गया।
  • कुतुबुद्दीन ऐबक ने उसे एक लाख जीतल में खरीदा।
  • ऐबक ने उसे शाही अंगरक्षक प्रमुख → अमीर-ए-शिकारी → बरन की इक्ता दी।
  • गौरी की खोखर अभियान (1205-06) में साथ रहा → दास्ता-मुक्ति प्राप्त करने वाला पहला तुर्क गुलाम।
  • ऐबक का दामाद था और बदायूं का सूबेदार रहा।

 सत्ता प्राप्ति

  • ऐबक की मृत्यु के बाद आरामशाह सत्ता में आया (संभवतः ऐबक का पुत्र/भाई)।
  • अव्यवस्था के समय तीन दावेदार — इल्तुतमिश, कुबाचा, अली मर्दान।
  • जूद के मैदान (1211 ई.) में इल्तुतमिश ने आरामशाह को हराया व सिंहासन प्राप्त किया।
  • उसने लाहौर की बजाय दिल्ली को राजधानी बनाया।
  • उसे दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

मुख्य कठिनाइयाँ व सैन्य सफलताएँ

  • विरोधी:
    • यल्दौज (गजनी)
    • कुबाचा (मुल्तान-सिंध)
    • अली मर्दान (बंगाल)

प्रमुख युद्ध:

  • 1216 ई. – तराईन का तीसरा युद्ध → यल्दौज पर विजय, बंदी बनाकर बदायूं में वध।
  • बंगाल विजय → ग्यासुद्दीन को हराकर बंगाल पर अधिकार।
  • कुबाचा पर विजय – सिंध, मुल्तान, उच्छ पर अधिकार।
  • कुबाचा की मृत्यु – 1228 ई., सिंधु में डूबकर आत्महत्या। 

प्रशासनिक उपलब्धियाँ

  • 40 तुर्की अमीरों की परिषद – तुर्कान-ए-चहलगनी (Forty) का गठन।
    • प्रथम उल्लेख: इसामी की “फुतुह-उस-सलातीन”
  • गैर-तुर्कों को भी उच्च पद दिए – वज़ीर मोहम्मद जुनैदी (ताजिक)।
  • इमादुल-मुल्क को “रावत-ए-अर्ज” की उपाधि।
  • इक्ता प्रणाली का विकास – वेतन के बदले भू-राजस्व क्षेत्र (स्थानांतरनीय, अवंशानुगत नहीं)।
  • पहला स्थायी सेना संगठित करने वाला सुल्तान।
  • दोआब के आर्थिक महत्व को पहचाना (पहला सुल्तान)।

 मुद्रा प्रणाली

  • पहला शुद्ध अरबी सिक्का जारी करने वाला सुल्तान।
  • सिक्कों पर टकसाल का नाम अंकित करने की परंपरा शुरू की।
  • चाँदी का टंका (175 ग्रेन) व ताँबे का जीतल जारी किया।

 मंगोल समस्या (1221 ई.)

  • चंगेज़ ख़ाँ ने ख्वारिज्म के जलालुद्दीन मंगबरनी का पीछा करते हुए सिंध तक पहुँचा।
  • जलालुद्दीन के दूत को मारकर, शरण देने से इनकार किया → दिल्ली को मंगोल आक्रमण से बचाया।
  • मंगबरनी व कुबाचा के संघर्ष से कुबाचा कमजोर हुआ → इल्तुतमिश ने पंजाब पर अधिकार किया।

राजपूत राज्यों पर विजय

  • रणथम्भौर (1226) – शासक वीरनारायण पर विजय।
  • बयाना, सांभर, अजमेर, नागौर, जालौर (1228) – जालौर के उदयसिंह ने अधीनता स्वीकार की।
  • भूताला युद्ध (1227) – मेवाड़ के जैत्रसिंह से संघर्ष (जैत्रसिंह की विजय मानी जाती)।
  • ग्वालियर (1231) – प्रतिहार शासक मंगलदेव भागा।
  • मालवा (1234–35) – भिलसा व उज्जैन के महाकाल मंदिर को नष्ट किया; विक्रमादित्य की मूर्ति दिल्ली लाई।

बंगाल अभियान (1226 ई.)

  • बंगाल–बिहार दो भागों में बाँटा।
    • बिहार का गवर्नर – अलाउद्दीन जानी
    • बंगाल का गवर्नर – हिसामुद्दीन

खलिफा से मान्यता (1229 ई.)

  • बगदाद के खलीफा अल-मुस्तनसिर बिल्लाह से औपचारिक स्वीकृति।
  • उपाधि – “नासिर-अमीर-उल-मौमिनीन”।
  • उल्लेख – तबकात-ए-नासिरी में।
  • परिणाम – इल्तुतमिश बना दिल्ली का पहला वैधानिक सुल्तान।
  • इब्न बतूता (रिहला), शम्स-ए-सिराज अफीफ (तारीख-ए-फिरोजशाही) ने भी प्रथम सुल्तान माना।

निर्माण व सांस्कृतिक उपलब्धियाँ

  • कुतुब मीनार का निर्माण पूर्ण किया।
  • सुल्तानगढ़ी मकबरा – पुत्र नासिरुद्दीन महमूद की स्मृति में।
  • मदरसा-ए-नासिरी व मदरसा-ए-मुइज्जी का निर्माण।
  • नागौर का अतरकिन दरवाजा, बदायूं का होज-ए-शम्सी, शम्सी ईदगाह, जामा मस्जिद।
  • कला-साहित्य संरक्षण –
    • विद्वान: मिनहाज-उल-सिराज, मलिक ताजुद्दीन दबीर, शैख शरफुद्दीन, अबूबक्र रूहानी, नूरुद्दीन
  • उसने इस्लामीकरण का विरोध किया — “भारत अरब नहीं है, इसे दारुल-इस्लाम बनाना संभव नहीं।”

मूल्यांकन

  • हबीबुल्लाह – “ऐबक ने सीमा रेखा बनाई, इल्तुतमिश ने उसका ढांचा खड़ा किया।”
  • निजामी – “ऐबक ने कल्पना की, पर ठोस रूप इल्तुतमिश ने दिया।”
  • आर.पी. त्रिपाठी – “भारत में मुस्लिम राज्य का वास्तविक संस्थापक।”
  • ईश्वरी प्रसाद – “गुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक।”
  • सर वूल्जले हेग – “गुलाम शासकों में सर्वश्रेष्ठ।”

मृत्यु

  • 1236 ई., खोखरों के विरुद्ध अभियान में बीमार पड़ा।
  • 30 अप्रैल 1236 को मृत्यु (बमियान क्षेत्र)।
  • पुत्र नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु (1229 ई.) ने उसे गहरा आघात दिया।

इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी (1236–1265 ई.)

शासकशासनकालप्रमुख घटनाएँ व विशेषताएँ
रूक्नुद्दीन फिरोजशाहमई 1236 – नव. 1236• इल्तुतमिश का पुत्र, ऐय्याशी व विलासप्रियता में लिप्त।• वास्तविक सत्ता उसकी माँ शाहतुर्कान के हाथ में।• शाहतुर्कान ने इल्तुतमिश के पुत्र कुतुबुद्दीन को अंधा कर मरवा दिया।• मलिकों-अमीरों ने बगावत की; जनता ने रजिया का समर्थन किया।• 7 माह बाद रूक्नुद्दीन व शाहतुर्कान की हत्या।
रजिया सुल्ताना1236 – 1240• दिल्ली की प्रथम एवं अंतिम मुस्लिम महिला शासिका।• पर्दा त्याग, दरबार में पुरुष वेश में उपस्थित।• सिक्कों पर उपाधि – “उमदत-उल-निस्वां”।• हब्शी याकूत को अमीरे-आखूर नियुक्त किया → तुर्क अमीर नाराज़।• गैर-तुर्कों को प्रोत्साहन देकर तुर्कान-ए-चहलगनी का संतुलन साधने का प्रयास।• दो अभियान – रणथम्भौर, ग्वालियर (असफल)।• विद्रोह: 1238 में कबीर खाँ अयाज, 1240 में अल्तूनिया का विद्रोह।• अल्तूनिया से विवाह, संयुक्त रूप से दिल्ली पर आक्रमण – पराजय।• कैथल के पास हत्या (1240)।• कारण: तुर्क अभिजात वर्ग की महत्वाकांक्षा व उसका स्त्री होना।
मुइनुद्दीन बहरामशाह1240 – 1242• रजिया के पतन के बाद तुर्क अमीरों द्वारा गद्दी पर बैठाया गया।• “नायब-ए-मुमलकत” पद की शुरुआत – प्रथम नायब इख्तियारुद्दीन एतगीन।• सत्ता के तीन केन्द्र – सुल्तान, नायब, वजीर।• 1241 में लाहौर पर प्रथम मंगोल आक्रमण (ताइर बहादुर)।• मंगोल आक्रमण के बाद सीमा व्यास नदी तक सिमटी।• अमीरों द्वारा बहरामशाह की हत्या (1242)।
अलाउद्दीन मसूद शाह1242 – 1246• रूक्नुद्दीन का पुत्र; नाम मात्र का सुल्तान।• वास्तविक सत्ता मलिक कुतुबुद्दीन हसन व चालीसा के हाथ में।• बलबन को अमीरे-हाजिब नियुक्त किया।• उसके सिक्कों पर पहली बार अब्बासी खलीफा अल-मुस्तसीम-बिल्लाह का नाम अंकित।• 1246 में अमीरों ने हटाया; कारागार में मृत्यु।
नासिरुद्दीन महमूद1246 – 1265• इल्तुतमिश का पौत्र (नासिरुद्दीन महमूद का पुत्र)।• धार्मिक, सरल, विलासरहित जीवन।• स्वयं कुरान की नकल करता था – “दरवेश राजा”।• वास्तविक सत्ता बलबन के हाथ में।• बलबन को ‘उलुग खाँ’ उपाधि व नायब-ए-मुमलकत नियुक्त (1249)।• 1253 में भारतीय मुस्लिम नेता इमादुद्दीन रायहान नायब बना (असफल प्रयास)।• प्रमुख इतिहासकार मिन्हाज-उस-सिराज की तबकाते-नासिरी इसी को समर्पित।• 1265 ई. में मृत्यु; बाद में बलबन सुल्तान बना।

 बलबन (1266–1287 ई.) – दूसरे इल्बरी वंश का संस्थापक

प्रारंभिक जीवन

  • मूल नाम बहाउद्दीन बलबन, इल्बारी तुर्क।
  • मंगोलों द्वारा भाई किशलु खाँ व चचेरे भाई शेर खाँ सहित बंदी बनाया गया।
  • ख्वाजा जमालुद्दीन बसरी ने खरीदा → दिल्ली लाया गया → इल्तुतमिश की ओर से वजीर जुनैदी ने खरीदा।
  • चालीसा का सदस्य बना।
  • क्रमिक पदोन्नति: खासादार → अमीर-ए-शिकार (रजिया काल) → अमीर-ए-आखूर (बहरामशाह काल) → अमीर-ए-हाजिब (मसूदशाह काल) → नायब (नासिरुद्दीन काल)।

नायब बलबन (1249–1265 ई.) की उपलब्धियाँ

1. विरोधी तुर्की अमीरों का दमन
  • “चालीसा” के शक्तिशाली अमीरों को हटाया।
  • भाई सैफुद्दीन को अमीर-ए-हाजिब नियुक्त किया, किशलु खाँ की उपाधि दी।
  • चचेरे भाई शेर खाँ को तबर-हिन्द का प्रभारी बनाया।
  • विरोध के कारण नायबी पद से हटाया गया; इमादुद्दीन रेहान नायब बना, जिसे बाद में बलबन ने हटवाकर पुनः नायब पद प्राप्त किया (1254 ई.)।
2.विद्रोहों का दमन
  • कुतुबुद्दीन हसन गौरी की हत्या, कुतलुग खाँ व किशलु खाँ का विद्रोह असफल।
3.बंगाल विद्रोह (1255–1258 ई.)
  • तुगरिल खाँ ने लखनौती में विद्रोह किया → 1258 ई. में पराजित व मृत।
  • बंगाल लगभग स्वतंत्र हो गया।
4.हिन्दू विद्रोहों का दमन
  • दोआब, कटेहर, मेवात में नरसंहार; 9 वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों की हत्या।
  • दल्फी-मल्का विद्रोह दमन (नासिरुद्दीन काल)।
  • मालवा, ग्वालियर, चन्देरी, रणथम्भौर, जालौर, मेवाड़ पर अभियान (अस्थायी सफलता)।

सुल्तान बलबन (1266–1287 ई.)

 सिंहासनारोहण
  • नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु (1265 ई.) के बाद सिंहासन पर बैठा।
  • गियासुद्दीन की उपाधि धारण की।
  • कुछ इतिहासकारों के अनुसार बलबन ने नासिरुद्दीन को जहर दिलवाया।

मुख्य चुनौतियाँ एवं समाधान

चालीसा के अमीर
  • विद्रोही अमीर मलिक बकबक (बदायूं), हैबता खाँ (अवध), अमीन खाँ (अयोध्या), शेर खाँ – सभी का दमन या वध।
  • बलबन को “खुफिया कातिल” कहा गया।
हिन्दू व स्थानीय विद्रोह
  • मेवात, दोआब, कटेहर, खोखर आदि का निर्मम दमन।
  • गोपालगिरी दुर्ग का निर्माण; चौकियाँ स्थापित।
  • हज़ारों मेवातियों की हत्या; खोखरों का नरसंहार।
बंगाल विद्रोह (1279–1280 ई.)
  • दास तुगरिल खाँ ने स्वतंत्रता घोषित की।
  • बलबन स्वयं पुत्र बुगरा खाँ सहित बंगाल पहुँचा → तुगरिल का वध → विद्रोह समाप्त।
  • बुगरा खाँ को बंगाल का प्रभारी बनाया।
मंगोल आक्रमण (1285 ई.)
  • सीमांत किले: लाहौर, मुल्तान, दीपालपुर, समाना, सुनाम, उच्छ।
  • पुत्र शाहजादा मुहम्मद को सीमांत सुरक्षा सौंपी → वीरगति प्राप्त (1285 ई.)।
  • शेर खाँ को सीमांत रक्षा, बाद में उसके प्रभाव से डरकर उसे विष दिलवाया।

राजत्व सिद्धान्त (Theory of Kingship)

  • सिद्धान्त: “लौह एवं रक्त नीति” (Blood and Iron Policy)।
  • सुल्तान = नायब-ए-खुदाई (ईश्वर का प्रतिनिधि), जिल्ले इलाही (ईश्वर की छाया)।
  • फारसी प्रभाव: सिजदा, पायबोस, नौरोज पर्व (19 दिन), ईरानी वस्त्र व नाम (कैकुबाद, कैखुसरो, क्यूमर्स)।
  • दरबार में हंसी-मजाक, शराब, नृत्य-संगीत निषिद्ध।
  • गढ़मुक्तेश्वर लेख: “खलीफा का सहायक”;
    पालम बावली लेख: “विष्णु का अवतार” कहा गया।

प्रशासनिक व सैन्य सुधार

  • वजीर का प्रभाव घटाया, नायब पद समाप्त।
  • उच्च पदों पर उच्च वंशावली को प्राथमिकता।
  • उलेमा को दो वर्गों में बाँटा – उलमा-ए-दुनिया, उलमा-ए-आख़िरत
  • गुप्तचर विभाग (दीवान-ए-बरीद) की स्थापना।
  • दीवान-ए-अर्ज (सैन्य विभाग) की स्थापना; सेनाध्यक्ष: इमाद-उल-मुल्क (अहमद अयाज)।
  • इक्ताओं की जाँच, अधिशेष राजकोष में भेजने का आदेश।
  • 1279 ई. में “ख्वाजा अधिकारी” नियुक्त किया – इक्तादारों की आय का लेखा रखता था।
  • वसीयत (वसैय्या) तैयार की – बरनी ने संकलित किया।

अंतिम दिन व मृत्यु

  • पुत्र शाहजादा मुहम्मद की मृत्यु से दुखी होकर 1287 ई. में मृत्यु।
  • इतिहासकार हबीबुल्लाह: “बलबन का काल सुदृढ़ीकरण का काल था।”
  • के.ए. निजामी: “बलबन एक उत्तम अभिनेता था।”
  • बरनी: “मलिकों ने शोक में वस्त्र फाड़ डाले।”

   बलबन के उत्तराधिकारी (1287–1290 ई.)

बलबन की मृत्यु के समय स्थिति

  • पुत्र शाहजादा मुहम्मद की मृत्यु के बाद बलबन का वंश कमजोर पड़ गया।
  • दूसरा पुत्र बुगरा खाँ बंगाल चला गया; दिल्ली बुलाने पर भी नहीं लौटा।
  • बलबन (1286 ई.) की मृत्यु निराश अवस्था में हुई।
  • मृत्यु से पूर्व बलबन ने मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को उत्तराधिकारी घोषित किया।

कैखुसरो का प्रकरण

  • वजीर हसनू बसरी ने समर्थन किया, परंतु कोतवाल फखरुद्दीन ने विरोध किया।
  • परिणामस्वरूप कैखुसरो सुल्तान न बन सका, उसे मुल्तान भेज दिया गया।

कैकुबाद (1287–1290 ई.)

  • बलबन का पौत्र एवं बुगरा खाँ का पुत्र।
  • आयु: लगभग 17–18 वर्ष।
  • कठोर नियंत्रण में पला, परंतु सत्ता मिलते ही भोग-विलास में लिप्त हो गया।
 विलासी जीवन
  • फरिश्ता: कैकुबाद ने यमुना तट पर “किलोखरी (केलूगढ़ी)” नामक प्रासाद बनवाया — जहाँ नर्तक, बाजीगर, भांड रहते थे।
  • बरनी: “यदि मलिक निजामुद्दीन व मलिक कवामुद्दीन दबीर न होते तो उसका शासन 7 दिन भी नहीं चलता।”
  • “प्रत्येक दीवार पर वेश्याओं की छाया और प्रत्येक छज्जे पर सुन्दर चेहरे।”

  निजामुद्दीन का षड्यंत्र

विषयविवरण
संबंधकोतवाल फखरुद्दीन का भतीजा व दामाद
पदनायब (मुख्य प्रशासक)
कार्यशासन की वास्तविक सत्ता अपने हाथों में ली
षड्यंत्र① कैखुसरो की हत्या ② वजीर ख्वाजा खातिर का अपमान – गधे पर बैठाकर नगर भ्रमण ③ बलबन कालीन अमीर मलिक तुजको व मलिक शाहिक की हत्या
फखरुद्दीन की चेतावनी“तुम प्याज के डंठल का भय नहीं करते और राजमुकुट का स्वप्न देखते हो।”

पिता–पुत्र का मिलन (बुगरा खाँ–कैकुबाद)

  • बुगरा खाँ, बंगाल से दिल्ली की स्थिति देख रहा था; उसने स्वयं को नासिरुद्दीन कहकर स्वतंत्र शासक घोषित कर लिया था।
  • दोनों में अविश्वास था।
  • मुलाकात अवध में हुई।
  • अमीर खुसरो ने अपनी मसनवी “किरान-उस-सादेन” में इस भेंट का वर्णन किया।
  • ए. के. निजामी: “बुगरा अपने पुत्र से मिलने को उतना ही आतुर था जितना याकूब यूसुफ से।”
  • बुगरा ने पुत्र को सलाह दी – “विलास त्यागो और निजामुद्दीन से सावधान रहो।”
  • शीघ्र ही कैकुबाद ने निजामुद्दीन को विष देकर मरवा दिया।

 फिरोज खिलजी का उदय

  • निजामुद्दीन की मृत्यु के बाद कैकुबाद ने मलिक फिरोज खिलजी को दिल्ली बुलाया।
  • पद: आरिज-ए-मुमालिक (सैन्य प्रमुख)
  • उपाधि: शाईस्ता खाँ
  • बरन (Bulandshahr) की इक्ता प्रदान की।
  • फिरोज ने पहले मंगोलों से अनेक युद्ध लड़े थे, अतः उसकी प्रतिष्ठा अधिक थी।

कैकुबाद का पतन और अंत

  • निरंतर भोग-विलास व शक्ति वर्धक औषधियों के सेवन से लकवा हो गया।
  • उसका ढाई वर्षीय पुत्र क्यूमर्स (उपनाम शम्सुद्दीन द्वितीय) को सुल्तान घोषित किया गया।
  • अमीरों के षड्यंत्र:
    • मलिक कच्छन व मलिक सुर्खा ने फिरोज खिलजी की हत्या की योजना बनाई।
    • अहमद चप ने इसकी सूचना दी → दोनों का वध।
  • कैकुबाद को खिलजी सैनिक तरकेश ने 1290 ई. में चादर में लपेटकर यमुना में फेंक दिया।
  • क्यूमर्स को भी शीघ्र ही मार दिया गया।

गुलाम वंश का अंत (1290 ई.)

  •  अंतिम सुल्तान  – कैकुबाद 
  •  मृत्यु  – 1290 ई. 
  •  कारण  – तरकेश नामक खिलजी सैनिक द्वारा हत्या
  •  अंतिम उत्तराधिकारी  – शिशु सुल्तान क्यूमर्स (शम्सुद्दीन द्वितीय) 
  •  वंश का अंत – 1290 ई. 
  • उत्तराधिकारी वंश  – खिलजी वंश 
  • प्रथम सुल्तान – जलालुद्दीन फिरोज खिलजी
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