उच्चतम न्यायालय भारत का सर्वोच्च न्यायिक संस्थान है, जो संविधान की व्याख्या एवं संरक्षण का कार्य करता है। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय के अंतर्गत यह संस्था मौलिक अधिकारों की रक्षा तथा न्यायिक पुनरावलोकन की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह विधि के शासन को सुदृढ़ बनाता है।
उच्चतम न्यायालय:

एकीकृत न्याय व्यवस्था (भारत):
- भारतीय संविधान में एकीकृत न्याय प्रणाली अपनाई गई है।
- शीर्ष पर: उच्चतम न्यायालय।
- उसके नीचे: उच्च न्यायालय।
- सबसे नीचे: अधीनस्थ न्यायालय (जिला न्यायालय और अन्य)।
- यह प्रणाली भारत सरकार अधिनियम, 1935 से ली गई है।
- यह व्यवस्था केंद्र और राज्य, दोनों के कानूनों को लागू करती है।
महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य
- 1773 : रेग्युलेटिंग एक्ट द्वारा कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना।
- पहला सुप्रीम कोर्ट स्थापित।
- अधिकार क्षेत्र केवल कलकत्ता तक सीमित।
- 1861 : कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे में उच्च न्यायालयों की स्थापना।
- 1866 : इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना।
- 1937 : संघीय न्यायालय की स्थापना (मुख्य न्यायाधीश – सर मोरिस ग्वेयर)।
- एम.आर. जयकर और हीरालाल जे. कानिया इस संघीय न्यायालय से जुड़े रहे।
भारत का उच्चतम न्यायालय:
- उच्चतम न्यायालय का उद्घाटन: 28 जनवरी 1950।
- यह भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत बने संघीय न्यायालय का उत्तराधिकारी है।
- इसने ब्रिटेन के प्रिवी काउंसिल का स्थान लिया, जो पहले सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय था।
संघीय न्यायालय (Federal Court)
- स्थापना: 1937, भारत सरकार अधिनियम 1935 के अंतर्गत।
- कार्यक्षेत्र:
- राज्यों के बीच विवाद।
- राज्य और केंद्र सरकार के बीच विवाद।
- प्रथम मुख्य न्यायाधीश: सर मोरिस ग्वेयर।
- संविधान सभा सदस्य एम. आर. जयकर भी संघीय न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश रहे।
- हीरालाल जे. कानिया:
- संघीय न्यायालय के चौथे और अंतिम मुख्य न्यायाधीश।
- स्वतंत्र भारत के प्रथम मुख्य न्यायाधीश (CJI)।
संविधानिक प्रावधान
- संविधान का भाग 5 (अनुच्छेद 124 से 147) उच्चतम न्यायालय से संबंधित है।
- संसद को भी उच्चतम न्यायालय के संबंध में विनियमन का अधिकार है।
- अनु. 348 में यह स्पष्ट उल्लेखित है कि उच्चतम न्यायालय की सभी कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में की जाएगी।
- न्यायाधीशों की संख्या:
- प्रारंभ में मूलतः केवल 8 न्यायाधीश (1 मुख्य + 7 अन्य) थे।
- वर्तमान में कुल 34 न्यायाधीश हैं : 1 मुख्य न्यायाधीश + 33 अन्य न्यायाधीश,

उच्चतम न्यायालय से संबंधित अनुच्छेद (124 से 147)
| अनुच्छेद | उप अनुच्छेद | विषय-वस्तु |
124 | 124 | उच्चतम न्यायालय की स्थापना तथा गठन |
| 124(1) | स्थापना और गठन | |
| 124(2) | नियुक्ति और कार्यकाल | |
| 124(2क) | आयु निर्धारण | |
| 124(3) | योग्यता | |
| 124(4) | पद से हटाना | |
| 124(5) | प्रक्रिया का विनियमन | |
| 124(6) | शपथ | |
| 124(7) | पद-त्याग के बाद प्रतिबंध | |
| 124A | राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) (निरस्त) | |
| 124B | आयोग के कार्य (निरस्त) | |
| 124C | संसद की कानून बनाने की शक्ति (निरस्त) | |
| 125 | न्यायाधीशों का वेतन, भत्ते आदि | |
| 126 | कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति | |
| 127 | तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति | |
| 128 | सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति | |
| 129 | अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्चतम न्यायालय | |
| 130 | उच्चतम न्यायालय का आसन | |
131 | 131 | उच्चतम न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार |
| 131A | केंद्रीय कानूनों की वैधता पर विशेष क्षेत्राधिकार (निरस्त) | |
| 132 | संविधानिक मामलों में अपील संबंधी अपीलीय अधिकार | |
| 133 | सिविल मामलों में अपीलीय अधिकार | |
134 | 134 | आपराधिक मामलों में अपीलीय अधिकार |
| 134A | उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए प्रमाण-पत्र | |
| 135 | संघीय न्यायालय के अधिकारों का उपयोग | |
| 136 | विशेष अनुमति याचिका (SLP) द्वारा अपील | |
| 137 | निर्णयों की पुनरीक्षा की शक्ति | |
| 138 | क्षेत्राधिकार को विस्तारित करना | |
139 | 139 | रिट जारी करने की शक्ति |
| 139A | मामलों का स्थानांतरण | |
| 140 | आनुषंगिक शक्तियाँ | |
| 141 | उच्चतम न्यायालय का निर्णय सभी अदालतों पर बाध्यकारी | |
| 142 | न्यायिक आदेशों को लागू कराने की शक्ति | |
| 143 | राष्ट्रपति द्वारा परामर्श माँगना | |
144 | 144 | सभी सिविल एवं न्यायिक अधिकारियों की सहायता |
| 144A | संवैधानिक वैधता से जुड़े मामलों के लिए विशेष प्रावधान (निरस्त) | |
| 145 | नियम बनाने की शक्ति | |
| 146 | पदाधिकारी, सेवक एवं उनके वेतन | |
| 147 | व्याख्या (संविधान के संबंध में) |
अनुच्छेद 124 – उच्चतम न्यायालय की स्थापना तथा गठन
- अनुच्छेद 124(1) – भारत का एक सर्वोच्च न्यायालय होगा जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश (CJI) होगा तथा सात से अधिक अन्य न्यायाधीश नहीं हो सकते जब तक कि कानून द्वारा संसद अन्य न्यायाधीशों की अधिक संख्या निर्धारित नहीं करती है।
- संसद को विधि द्वारा न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का अधिकार है।
- 1950 के बाद न्यायाधीशों की संख्या में 6 बार वृद्धि की जा चुकी है।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि हेतु संविधान में संशोधन नहीं किया जाता है।
- वर्तमान में 1 मुख्य न्यायाधीश + 33 अन्य न्यायाधीश, कुल 34 न्यायाधीश हैं।
- 2008 के संशोधन अधिनियम द्वारा फरवरी, 2009 में केंद्र सरकार यह संख्या 26 से बढ़ाकर 31 की गई।
- 2019 में, केंद्र ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 31 से बढ़ाकर 34 कर दी हैं।
- समय-समय पर यह संख्या बढ़ाई गई:
- 1950: 8 (मूलतः)
- 1956: 11
- 1960: 14
- 1977: 18
- 1986: 26
- 2008: 31
- 2019: 34
- अनु. 348 में यह स्पष्ट उल्लेखित है कि उच्चतम न्यायालय की सभी कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में की जाएगी।
- अनुच्छेद 124(2):उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति
- उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है ।
- मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति अन्य न्यायाधीशों एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की सलाह के बाद करता है।
- मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश का परामर्श आवश्यक है।
- प्रत्येक न्यायाधीश तब तक पद धारण करेगा, जब तक वह पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेता है
- कोई न्यायाधीश राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा;
- किसी न्यायाधीश को 124(4) में उपबंधित रीति से उसके पद से हटाया जा सकेगा।
- मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में संविधान मौन है, परंतु परंपरा रही है – वरिष्ठतम न्यायाधीश को CJI बनाया जाता है।
- लेकिन यह परंपरा दो बार टूटी —
- 1973 – अजीत नाथ रे की नियुक्ति
- इंदिरा गांधी सरकार ने वरिष्ठता तोड़कर अजीत नाथ रे को CJI नियुक्त किया।
- तीन वरिष्ठ न्यायाधीश (J.M. शेलट, K.S. हेगड़े और A.N. ग्रोवर) की अनदेखी की गई।
- कारण – केशवानंद भारती वाद (1973) में इन तीनों ने मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) के पक्ष में निर्णय दिया था, जिससे संसद की संशोधन शक्ति सीमित हो गई थी।
- 1977 – M.H. बेग की नियुक्ति
- इंदिरा गांधी सरकार ने वरिष्ठतम जज H.R. खन्ना की अनदेखी करते हुए M.H. बेग को CJI नियुक्त किया।
- कारण – ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (आपातकाल मामला, 1976) में जस्टिस H.R. खन्ना ने जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को निलंबित करने के विरुद्ध फैसला दिया था।
- अन्य 4 न्यायाधीश (अजीत नाथ रे, M.H. बेग, P.N. भगवती, Y.V. चंद्रचूड़) ने सरकार के पक्ष में निर्णय दिया था (4:1 से)।
- 1973 – अजीत नाथ रे की नियुक्ति
- लेकिन यह परंपरा दो बार टूटी —
ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) – “बंदी प्रत्यक्षीकरण मामला”:
- आपातकाल (1975) के दौरान अनुच्छेद 359(1) के तहत अनुच्छेद 21 निलंबित किया गया।
- कई लोगों को MISA कानून के तहत गिरफ़्तार किया गया।
- H.C. ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (अनुच्छेद 32) रिट स्वीकार की। केंद्र सरकार ने S.C. में चुनौती दी।
- फैसले का सार:
- 4 न्यायाधीश (रे, बेग, भगवती, चंद्रचूड़) – सरकार के पक्ष में
- आपातकाल के दौरान जब अनुच्छेद 21 निलंबित है, तब किसी को हैबियस कॉर्पस रिट का अधिकार नहीं है।
- न्यायाधीश H.R. खन्ना – असहमति (व्यक्ति के जीवन का अधिकार केवल संविधान से नहीं, बल्कि प्राकृतिक और विधायी अधिकारों से भी सुरक्षित है)
- 4 न्यायाधीश (रे, बेग, भगवती, चंद्रचूड़) – सरकार के पक्ष में
उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित विभिन्न मामले हुए है:-
परामर्श पर विवाद
प्रथम न्यायाधीश मामला (S.P. Gupta बनाम भारत सरकार, 1982)
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि:
- राष्ट्रपति द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति में “परामर्श” का अर्थ केवल विचार-विमर्श (consultation) है, सहमति (concurrence) नहीं।
- अंतिम निर्णय राष्ट्रपति (कार्यपालिका) का होगा।
- परिणाम: कार्यपालिका को नियुक्ति में अधिक शक्ति मिली।
↓ फैसला पलटा
द्वितीय न्यायाधीश मामला (सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ, 1993)
- सर्वोच्च न्यायालय ने पहले फैसले को पलटते हुए कहा:
- “परामर्श” का अर्थ मुख्य न्यायाधीश की सहमति है।
- मुख्य न्यायाधीश (CJI) अपनी सलाह देने से पहले अपने दो वरिष्ठतम सहयोगी न्यायाधीशों से परामर्श करेगा।
- नतीजा:
- कॉलेजियम प्रणाली की नींव पड़ी।
- CJI की सलाह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी मानी गई।
तीसरा न्यायाधीश मामला (राष्ट्रपति की सलाह पर राय, 1998)
- राष्ट्रपति के परामर्श पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय दी कि:
- CJI अकेले निर्णय नहीं करेगा, बल्कि यह निर्णय 5 न्यायाधीशों का होगा — CJI + 4 वरिष्ठतम जज। → 5-सदस्यीय कॉलेजियम व्यवस्था
- निर्णय सर्वसम्मति से होगा, बहुमत से नहीं।
- कॉलेजियम प्रणाली का औपचारिक विस्तार इसी फैसले से हुआ।
चौथा न्यायाधीश मामला (2015) – NJAC को असंवैधानिक ठहराना
- 99वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 एवं राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014 के तहत:
- कॉलेजियम प्रणाली को समाप्त कर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) गठित किया गया।
- उद्देश्य: नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और कार्यपालिका की भागीदारी।
- लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में NJAC को असंवैधानिक घोषित कर दिया:
- यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है।
- परिणाम: कॉलेजियम प्रणाली पुनः लागू हो गई।
निष्कर्ष:
- वर्तमान में भारत में कॉलेजियम प्रणाली के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति होती है।
- कॉलेजियम में:
- CJI + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
- निर्णय सर्वसम्मति से होता है।
- यह प्रणाली न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करती है, लेकिन इसे पारदर्शिता की कमी के लिए आलोचना भी मिलती है।
कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना
- पारदर्शिता का अभाव
- भाई-भतीजावाद के आरोप
- कार्यपालिका और विधायिका की भूमिका नहीं
- लोकतांत्रिक भावना के विरुद्ध माना जाता है।
अनुच्छेद 124 (2क): उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की आयु
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की आयु ऐसे प्राधिकारी द्वारा और ऐसी रीति से अवधारित की जाएगी, जैसा संसद विधि द्वारा उपबंधित करे। [15 वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया]
- अनुच्छेद 124(3) योग्यताएं
- न्यायाधीशों की अहर्ताएं –
- भारत का नागरिक हो।
- किसी उच्च न्यायालय का ऐसे दो या दो से अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम पाँच वर्ष तक न्यायाधीश हो या
- किसी उच्च न्यायालय का ऐसे दो या दो से अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो।
- राष्ट्रपति के मत में पारंगत विधिवेता (Distinguished Jurist) हो।
- इस श्रेणी से अभी तक किसी भी व्यक्ति को न्यायाधीश नहीं बनाया गया है।
- नोट: न्यूनतम आयु का कोई उल्लेख नहीं, अधिकतम आयु 65 वर्ष।
- न्यायाधीशों की अहर्ताएं –
- अनुच्छेद 124(4) – न्यायाधीशों को पद से हटाना – दो आधार हैं-
- साबित कदाचार व
- असमर्थता
- संविधान में कदाचार को परिभाषित नहीं किया गया है।
सावन्त समिति (रामास्वामी प्रकरण)
- सावन्त समिति ने निम्न कार्यों को कदाचार की श्रेणी में माना –
- पद/कार्यालय का जानबूझकर व गंभीर दुरुपयोग।
- कर्तव्यों के निर्वहन में लगातार विफलता या लापरवाही।
- सार्वजनिक खजाने पर आदतन अपव्यय।
- नैतिक अधमता (Moral turpitude)।
- निजी उद्देश्यों के लिए सार्वजनिक धन का उपयोग।
- न्यायिक पद की गरिमा को ठेस पहुँचाना।
रेड्डी समिति की राय
- “कदाचार” का अर्थ है अच्छे व्यवहार (Good Behaviour) का उल्टा।
- यदि कोई न्यायाधीश अच्छे व्यवहार के मानकों का उल्लंघन करता है, तो यह कदाचार है।
- ऐसा आचरण, न्यायिक पद पर रहते हुए गारंटीकृत कार्यकाल की शर्तों का उल्लंघन करता है।
न्यायाधीश जांच अधिनियम (1968) :उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने के संबंध में प्रक्रिया का उपबंध करता है-
- संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 124(5) : न्यायाधीश को हटाने संबंधी कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद की होगी।
- इसके लिए संसद ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 बनाया।
- प्रस्ताव की प्रक्रिया
- लोकसभा में प्रस्ताव → कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक।
- राज्यसभा में प्रस्ताव → कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक।
- अध्यक्ष या सभापति प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
- प्रस्ताव पर चर्चा से 14 दिन पहले संबंधित न्यायाधीश को सूचना दी जाएगी ताकि वह अपना पक्ष रख सके।
- जांच समिति
- प्रस्ताव स्वीकार होने पर तीन सदस्यीय समिति बनाई जाती है:
- उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश / कोई न्यायाधीश।
- किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश।
- एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता।
- समिति के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है।
- प्रस्ताव स्वीकार होने पर तीन सदस्यीय समिति बनाई जाती है:
- विशेष बहुमत व राष्ट्रपति की भूमिका
- यदि समिति न्यायाधीश को कदाचार या अयोग्यता का दोषी पाती है, तो संसद इस पर विचार करती है।
- दोनों सदनों से प्रस्ताव अलग-अलग पारित होना चाहिए।
- बहुमत का नियम :
- कुल सदस्य संख्या का बहुमत।
- उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम 2/3 बहुमत।
- इसके बाद प्रस्ताव राष्ट्रपति को भेजा जाता है और राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं।
- प्रस्ताव एक सत्र में स्वीकार होना चाहिए।
- इस प्रकार हटाए जाने हेतु संसद द्वारा उसी सत्र में ऐसा संबोधन किया गया हो और उसी सत्र में इसे दोनों सदनों से विशेष बहुमत से पारित कर दिया गया हो, तभी किसी न्यायाधीश को हटाया जा सकता है।
- दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
- न्यायाधीशों को हटाने संबंधी एक प्रस्ताव लोकसभा विद्यटित होने पर समाप्त नहीं होगा।
- प्रक्रिया का न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) किया जा सकता है।
- प्रमुख उदाहरण
- अब तक किसी भी उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश का महाभियोग पूर्ण नहीं हुआ।
- न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी → दोषी पाए गए, लेकिन लोकसभा में प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। इसके तुरंत बाद रामास्वामी ने इस्तीफा दे दिया।
- दीपक मिश्रा (CJI) → अप्रैल, 2018 में कांग्रेस ने प्रस्ताव लाया, पर सभापति वेंकैया नायडू ने अस्वीकार कर दिया।
- सोमित्र सेन (2011) → पहले न्यायाधीश जिन्होंने संसद (राज्यसभा) में स्वयं पक्ष रखा। राज्यसभा ने प्रस्ताव पारित किया, लेकिन लोकसभा में चर्चा से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
- अब तक किसी भी उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश का महाभियोग पूर्ण नहीं हुआ।
- अन्य मामलों में :
- पी.डी. दीनाकरन (कर्नाटक, सिक्किम)
- जी.बी. पारदीवाला (गुजरात)
- एस.के. गंगेले (मध्य प्रदेश)
- तीनो पर राज्यसभा में प्रस्ताव लाया गया।लेकिन पूर्ण प्रक्रिया नहीं हो सकी।
- एस.एन. शुक्ला (इलाहाबाद HC) → CJI ने राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को पत्र लिखा (2018, 2019)।
इन-हाउस प्रोसीजर (1999)
- उच्चतम न्यायालय ने खुद 7 चरणों की आंतरिक प्रक्रिया बनाई।
- अंतिम (7वें) चरण में CJI संबंधित न्यायाधीश को हटाने हेतु राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं।
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की व्यापकता
- यह अधिनियम केवल उच्चतम और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों पर ही नहीं, बल्कि निम्न पदों पर भी लागू होता है:
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) – अनुच्छेद 148
- राज्य निर्वाचन आयुक्त – अनुच्छेद 243 ट (2)
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त – अनुच्छेद 324 (5)
- न्यायिक अवमानना अधिनियम, 1971
- इसके तहत वर्तमान न्यायाधीश को भी दंडित किया जा सकता है।
- इससे न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।
- सी.एस.कर्णन (2017) भारत के न्यायिक इतिहास के एकमात्र ऐसे न्यायाधीश है जिन्हें पद पर रहते हुए 6 माह की सजा दी गई। उस समय वे कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे।
- उच्चतम न्यायालय राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद न्यायालय की प्रक्रिया और संचालन हेतु नियम बना सकता है | संवैधानिक मामलों एवं संदर्भो को राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143 के तहत बनाया जाता है और न्यायाधीशों की पीठ (पांच न्यायाधीशों ) द्वारा निर्णित किया जाता है| अन्य मामलों का निर्णय सामान्यतया तीन न्यायाधीशों की पीठ करती है।
K. Veeraswami v. Union of India (1991) – सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
- महाभियोग प्रस्ताव का स्थायित्व
- न्यायाधीश के विरुद्ध लाया गया महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा भंग होने पर व्यपगत (लुप्त) नहीं होगा।
- अगली लोकसभा उस प्रस्ताव पर विचार कर सकती है।
- न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की सीमा
- न्यायाधीश पर महाभियोग की प्रक्रिया जाँच संबंधी चरण तक ही न्यायिक पुनरावलोकन किया जा सकता है।
- एक बार प्रस्ताव सदन में चला जाए (चर्चा और मतदान की स्थिति में), तब उस पर Judicial Review संभव नहीं है।
- कदाचार/अक्षमता की जाँच का अधिकार
- सुप्रीम कोर्ट स्वयं किसी न्यायाधीश के सिद्ध कदाचार (proved misbehavior) या अक्षमता की जाँच नहीं कर सकता।
- यह अधिकार केवल संसद को है।
- संसद ही जाँच समिति बनाएगी और उसी के द्वारा जाँच होगी।
- महाभियोग प्रक्रिया के दौरान पद
- जब संसद में महाभियोग प्रस्ताव विचाराधीन है, तब भी न्यायाधीश अपने पद पर बना रहेगा।
- अंतिम निर्णय राष्ट्रपति द्वारा ही लिया जाएगा, और उनके आदेश के बाद ही पदमुक्ति होती है।
न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 – लागू क्षेत्र
- यह अधिनियम और इससे संबंधित नियम एवं प्रक्रियाएँ न केवल उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों पर लागू होते हैं, बल्कि अन्य संवैधानिक पदों पर भी लागू होते हैं :
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) – अनुच्छेद 148
- राज्य निर्वाचन आयुक्त – अनुच्छेद 243T(2) का परंतुक
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त – अनुच्छेद 324(5)
अनुच्छेद 124(6) – शपथ
- उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) का न्यायाधीश बनने वाला प्रत्येक व्यक्ति, पद ग्रहण करने से पहले शपथ (Oath) या प्रतिज्ञान (Affirmation) करेगा।
- यह शपथ भारत के राष्ट्रपति या इस कार्य के लिए नियुक्त व्यक्ति के सामने भारतीय संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा व पक्षपात रहित विधियों की मर्यादा की रक्षा के लिए शपथ लेता है।
- शपथ का प्रारूप संविधान की तीसरी अनुसूची (Third Schedule) में दिया गया है।
- शपथ लेने/प्रतिज्ञान करने के बाद न्यायाधीश उस पर हस्ताक्षर करता है।
अनुच्छेद 124(7) – सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों पर प्रतिबंध
- वकालत पर रोक
- सेवानिवृत्ति के बाद उच्चतम न्यायालय का कोई भी न्यायाधीश भारत के किसी भी न्यायालय में वकील के रूप में सेवाएँ नहीं दे सकता।
- लाभ का पद (Office of Profit)
- सेवानिवृत्त न्यायाधीश भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन कोई भी लाभ का पद स्वीकार नहीं कर सकते।
- अपवाद उदाहरण (गैर-लाभ के पद)
- राज्यपाल का पद लाभ का पद नहीं माना जाता।
- उदाहरण:
- पी. सदाशिवम् (पूर्व CJI) → केरल के राज्यपाल नियुक्त हुए।
- राज्यसभा से जुड़े उदाहरण
- अब तक कुल तीन सुप्रीम कोर्ट जज राज्यसभा सदस्य रहे हैं –
- रंगनाथ मिश्र (पूर्व CJI) → 1998 से 2004 तक राज्यसभा सदस्य (कांग्रेस पार्टी, निर्वाचित)।
- बहारूल ईस्लाम (सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश) → पहले राज्यसभा सदस्य (कांग्रेस पार्टी, निर्वाचित)।
- रंजन गोगोई (पूर्व CJI) → 2020 में राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए मनोनीत।
- अब तक कुल तीन सुप्रीम कोर्ट जज राज्यसभा सदस्य रहे हैं –
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) –
- संविधान समीक्षा आयोग की अनुशंसा –
- न्यायाधीशों की नियुक्ति के सन्दर्भ में न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) की स्थापना करने की सिफारिश की गई थी।
- 99वाँ संविधान संशोधन, 2014 –
- कॉलेजियम प्रणाली में मौजूद भेदभाव और कमियों को दूर करने के लिए यह संशोधन लाया गया।
- इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 124(A) के तहत NJAC के गठन का प्रावधान किया गया।
- पहला विधेयक (2012) –
- 120वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश हुआ।
- लेकिन 2014 में लोकसभा भंग होने के कारण यह विधेयक समाप्त हो गया।
- दूसरा विधेयक (2014) –
- अगस्त 2014 में 121वाँ संविधान संशोधन विधेयक लाया गया।
- यह विधेयक पारित हुआ और 1 जनवरी 2015 से 99वें संविधान संशोधन के रूप में लागू हो गया।
इसके द्वारा तीन अनु. जोड़े गये –
- अनु. 124(A) – NJAC की संरचना
- अनु. 124(B) – NJAC के कार्य
- नियुक्ति के लिए सिफारिश करना।
- स्थानांतरण के लिए सिफारिश करना।
- अनु. 124(C) – NJAC के सन्दर्भ में कानून बनाने की शक्ति संसद को दी गई।
अनुच्छेद 124 (A) – NJAC की संरचना
- NJAC में कुल 6 सदस्य थे।
- भारत के मुख्य न्यायाधीश ( अध्यक्ष)
- उच्चतम न्यायालय के 2 वरिष्ठतम न्यायाधीश
- भारत सरकार के विधि मंत्री (पदेन सदस्य)
- 2 विधि विशेषज्ञ सदस्य
- (इनमें से एक सदस्य SC/ST, अल्पसंख्यक या महिला का होना आवश्यक था)
- इन दो विधि विशेषज्ञ का कार्यकाल – 3 वर्ष
- पुनर्नियुक्ति नहीं हो सकती (इस पद पर)
- नियुक्ति एक समिति द्वारा की जाएगी।
- समिति में सदस्य –
- CJI
- PM
- विपक्ष का नेता
NJAC को असंवैधानिक घोषित करना (Fourth Judges Case, 2015)
- मामला: Supreme Court Advocates – on – Record Association v. Union of India (2015)
- पीठ अध्यक्ष: न्यायमूर्ति जे.एस. केहर
- फैसला: 16 अक्टूबर, 2015 को उच्ततम न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से NJAC और 99वां संशोधन असंवैधानिक घोषित।
- कॉलेजियम व्यवस्था को पुनः मान्यता दी गई।
- निर्णय का कारण:
- NJAC न्यायपालिका की स्वतंत्रता के विरुद्ध था।
- NJAC में कार्यपालिका की भूमिका से न्यायिक नियुक्तियाँ प्रभावित हो सकती थीं।
- इस वाद को ‘फोर्थ जजेज केस” 2015 (Fourth Judges Case) भी कहते हैं।
मेमोरेण्डम ऑफ प्रॉसीजर (MoP)
- NJAC को निरस्त करने के बाद, न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में मेमोरेण्डम ऑफ प्रॉसीजर (MoP) बनाया गया।
- MoP एक दस्तावेज है जो न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया तय करता है।
- यह उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालयों में नियुक्ति को लेकर भारत सरकार और कॉलेजियम के बीच सहमति से तैयार किया गया।
(अनुच्छेद 124(B) – NJAC के कार्य
- भारत के मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सिफारिश करना।
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीशों का एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण के लिए सिफारिश करना।
- यह सुनिश्चित करना कि जिस व्यक्ति की नियुक्ति की सिफारिश की गई है, वह सक्षम, योग्य एवं सत्यनिष्ठ हो।
अनुच्छेद 124(C) – संसद की शक्ति
- NJAC से संबंधित नियम और प्रक्रियाएँ बनाने की शक्ति संसद को दी गई।
अनुच्छेद 125 : न्यायाधीशों के वेतन आदि
- संवैधानिक प्रावधान
- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते संसद द्वारा कानून द्वारा निर्धारित किए जाएंगे।
- जब तक उस संबंध में प्रावधान नहीं किया जाता है, वे द्वितीय अनुसूची में निर्दिष्ट अनुसार होंगे।
- द्वितीय अनुसूची की व्यवस्था
- द्वितीय अनुसूची में निम्न पदों के वेतन निर्दिष्ट किए गए हैं–
- भारत के मुख्य न्यायाधीश
- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश
- उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश
- उच्च न्यायालयों के अन्य न्यायाधीश
- द्वितीय अनुसूची में निम्न पदों के वेतन निर्दिष्ट किए गए हैं–
- अलाभकारी परिवर्तन पर रोक
- किसी न्यायाधीश के न तो विशेषाधिकारों,
- न भत्तों,
- न ही अनुपस्थिति छुट्टी या पेंशन के संबंध में उसके अधिकारों में
- उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन किया जाएगा।
- वेतन, भत्ते एवं पेंशन की निधि
- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, पेंशन और भत्ते भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते राज्यों की संचित निधि पर भारित होते हैं।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित होती है।
- वर्तमान वेतनमान (₹ प्रति माह)
- भारत के मुख्य न्यायाधीश – ₹ 2,80,000/-
- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश – ₹ 2,50,000/-
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश – ₹ 2,50,000/-
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीश – ₹ 2,25,000/-
- अन्य सुविधाएँ
- निशुल्क आवास
- चिकित्सा सुविधा
- कार एवं फोन आदि सुविधाएँ
- पेंशन प्रावधान
- सेवानिवृत्ति के बाद 50% पेंशन।
- विशेष स्थिति
- वित्तीय आपातकाल में वेतन कम किया जा सकता है।
अनुच्छेद 126 – कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति
- राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जा सकता है यदि:
- पद रिक्त हो,
- मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थित हों,
- दायित्व निर्वहन में असमर्थ हों।
अनुच्छेद 127 – तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति
- नियुक्ति का प्रावधान: भारत के मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से तथा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को तदर्थ न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने का अनुरोध कर सकते हैं।
- नियुक्ति की अवधि: तदर्थ न्यायाधीश को केवल आवश्यक अवधि तक के लिए उच्चतम न्यायालय में नियुक्त किया जाता है।
- नियुक्ति का स्थान: तदर्थ न्यायाधीश केवल उच्चतम न्यायालय में ही नियुक्त किए जाते हैं, उच्च न्यायालयों में नहीं।
- न्यायिक योग्यता: तदर्थ न्यायाधीश के रूप में केवल वही व्यक्ति नियुक्त किया जा सकता है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने की अर्हता रखता हो।
अनुच्छेद 128 – उच्चतम न्यायालय की बैठकों में सेवानिवृत न्यायाधीशों की उपस्थिति
- नियुक्ति का प्रावधान: भारत का मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से अल्पकाल के लिए उच्चतम न्यायालय में कार्य करने का अनुरोध कर सकता है।
- सहमति आवश्यक: इस नियुक्ति के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की स्वीकृति अनिवार्य होती है।
- वेतन-भत्ते: सेवानिवृत्त न्यायाधीश को राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित वेतन और भत्ते दिए जाते हैं।
- अधिकार एवं शक्तियाँ: उसे उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों के समान न्यायनिर्णयन शक्तियाँ, अधिकार एवं विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।
- पदनाम पर प्रतिबंध: हालांकि वह उच्चतम न्यायालय में कार्य करता है, लेकिन वह “उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश” पदनाम का प्रयोग नहीं कर सकता।
- कार्यकाल: सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अधिकतम नियुक्ति अवधि 2 वर्ष हो सकती है।
अनुच्छेद 129 – अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्चतम न्यायालय
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 129 उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय (Court of Record) घोषित करता है।
- इसके तहत, उच्चतम न्यायालय के पास अपनी अवमानना (Contempt) से संबंधित मामलों में दंड देने की पूर्ण शक्ति होती है।
- Contempt of Court Act, 1971 के अंतर्गत न्यायिक अवमानना (Judicial Contempt) के प्रकार:
- सिविल अवमानना (Civil Contempt)
- अर्थ: न्यायालय के किसी आदेश, निर्णय, निर्देश, या रिट की जानबूझकर अवहेलना या अवज्ञा करना।
- उदाहरण:
- अदालत के आदेश का पालन न करना।
- न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों की अनदेखी करना।
- उदाहरण:
- अर्थ: न्यायालय के किसी आदेश, निर्णय, निर्देश, या रिट की जानबूझकर अवहेलना या अवज्ञा करना।
- आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt)
- अर्थ: कोई ऐसा कार्य या प्रकाशन जिससे –
- न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुँचे (अनुच्छेद 129 के अंतर्गत),
- या न्यायिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हो (अनुच्छेद 215 के अंतर्गत)।
- उदाहरण: न्यायालय के विरुद्ध अपमानजनक या अविश्वासपूर्ण बयान देना
- अर्थ: कोई ऐसा कार्य या प्रकाशन जिससे –
- सिविल अवमानना (Civil Contempt)
अनुच्छेद 130 – उच्चतम न्यायालय का स्थान
- संवैधानिक प्रावधान
- उच्चतम न्यायालय का स्थान दिल्ली में होगा।
- इसे किसी अन्य स्थान पर भी रखा जा सकता है जिन्हें भारत का मुख्य न्यायमूर्ति राष्ट्रपति के अनुमोदन से समय-समय पर निर्धारित करें।
- डॉ. अम्बेडकर का कथन
- “अभिलेख न्यायालय वह होता है जिसके अभिलेखों का साक्ष्य की दृष्टि से मूल्य हो और जब उन्हें किसी न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए तो उन पर कोई संदेह नहीं किया जाए।”
- कार्य स्थान
- उच्चतम न्यायालय का कार्य स्थान दिल्ली में स्थापित किया गया है।
- परंतु मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति से, इसकी बैठक किसी और स्थान पर भी कर सकता है।
- अभी तक हैदराबाद और श्रीनगर में इसकी बैठक हो चुकी है।
- उच्चतम न्यायालय की क्षेत्रीय न्यायपीठ (Regional Bench)
- अनुच्छेद 130 के तहत् क्षेत्रीय न्यायपीठ की स्थापना की जा सकती है।
- इसके लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं है।
- अनुच्छेद 131 – उच्चतम न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार
- अनुच्छेद 132 – संवैधानिक मामलों में अपील- यदि उच्च न्यायालय के किसी फैसलें में विधि का पूरक प्रश्न निहित है या संविधान की व्याख्या निहित है
- अनुच्छेद 133 – सिविल मामलों में उच्च न्यायालय में अपील से सम्बन्धित उच्चतम न्यायालय का अपीलीय क्षेत्राधिकार
- अनुच्छेद 134 – उच्चतम न्यायालय का आपराधिक मामलों में अपीलीय क्षेत्राधिकारअनुच्छेद 135 – उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्तमान कानूनों के अंतर्गत संघीय न्यायालय के क्षेत्राधिकार तथा शक्तियों का उपयोग
- संघीय न्यायालय (Federal Court) की सारी शक्तियाँ उच्चतम न्यायालय के पास होगी।
- अर्थात फेडरल कोर्ट की अधिकारिता व शक्तियों का प्रयोग उच्चतम न्यायलय करेगा।
- अनुच्छेद 136 – उच्चतम न्यायालय द्वारा विशेष अनुमति याचिका
- अनुच्छेद 137 – उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वयं के निर्णयों अथवा आदेशों की समीक्षा (Review)
- सुप्रीम कोर्ट अपने द्वारा दिए गए निर्णयों या आदेशों की पुनःसमीक्षा कर सकता है।
- यह सुधारात्मक न्याय की प्रक्रिया है।
- अनुच्छेद 138 – उच्चतम न्यायालय के क्षेत्राधिकार को विस्तारित करना
- संसद उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता में वृद्धि कर सकती है।
- अनुच्छेद 139 – कतिपय विषयों पर रिट जारी करने की उच्चतम न्यायालय की शक्ति
- संसद उच्चतम न्यायालय की रिट अधिकारिता में वृद्धि कर सकती है अर्थात् अनुच्छेद-32 के अतिरिक्त अन्य मामलें में भी रिट जारी करने का अधिकार दे सकती है।
- अनुच्छेद 139-A: सुप्रीम कोर्ट किसी उच्च न्यायालय से मामला स्थानांतरित (transfer) कर सकता है यदि विधिक प्रश्न जटिल या महत्व का हो।
- अनुच्छेद 141 – उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित कानून का सभी न्यायालयों पर लागू होना
- अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय के आदेशों तथा साथ हीं अन्वेषण आदि से संबंधित आदेशों को लागू कराना
- उच्चतम न्यायालय के आदेशों का प्रवर्तन अर्थात पूर्ण न्याय के लिए उच्चतम न्यायालय अपने आदेशों को लागू करवाने के लिए विधायिका व कार्यपालिका को निर्देशित कर सकता है।
- उदाहरण:
- Union Carbide Case (1989): सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को मुआवजा दिलाने के लिए संसदीय कानून की अवहेलना करते हुए, कंपनी और पीड़ितों के मध्य समझौता कराया तथा मुआवजा राशि जारी करने का आदेश दिया।
- इसमें संसदीय कानून को Over Ride किया गया।
- कोयला आवंटन मामला (2014):
- सुप्रीम कोर्ट ने कोयला ब्लॉकों के आवंटन को निरस्त कर दिया।
- हाईवे पर शराब की दुकानें (2016):
- सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि हाईवे पर 500 मीटर की परिधि में शराब का ठेका नहीं होगा।
- Union Carbide Case (1989): सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को मुआवजा दिलाने के लिए संसदीय कानून की अवहेलना करते हुए, कंपनी और पीड़ितों के मध्य समझौता कराया तथा मुआवजा राशि जारी करने का आदेश दिया।
अनुच्छेद 143 – राष्ट्रपति की उच्चतम न्यायालय से सलाह करने की शक्ति
- संविधान (अनुच्छेद 143) राष्ट्रपति को दो श्रेणियों के मामलों में उच्चतम न्यायालय से राय लेने का अधिकार देता है–
- (अ) सार्वजनिक महत्व के किसी मसले पर विधिक प्रश्न उठने पर।
- (ब) किसी पूर्व संवैधानिक संधि, समझौते, प्रसंविदा आदि सनद मामलों पर किसी विवाद के उत्पन्न होने पर ।
- पहले मामले में उच्चतम न्यायालय अपना मत दे भी सकता है और देने से इनकार भी कर सकता है।।
- दूसरे मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति को अपना मत देना अनिवार्य है।
- दोनों ही मामलों में उच्चतम न्यायालय का मत सिर्फ सलाह होती है। इस तरह, राष्ट्रपति इसके लिए बाध्य नहीं है कि वह इस सलाह को माने। ”
- अनुच्छेद 143(1) के अनुसार यह अनुच्छेद न तो राष्ट्रपति को बाध्य करता है कि सार्वजनिक महत्त्व के विषय पर उच्चतम न्यायालय की राय ले और न ही उच्चतम न्यायालय को बाध्य करता है कि राष्ट्रपति द्वारा भेजे गये विषयों पर अपनी राय दे।
- उच्चतम न्यायालय का परामर्श न्यायिक निर्णय नहीं है अतः न तो राष्ट्रपति इस परामर्श को मानने के लिए बाध्य है और न ही भारत के अधीनस्थ न्यायालय इसे मानने के लिए बाध्य हैं।
अनुच्छेद 144 सिविल तथा न्यायिक अधिकारियों का उच्चतम न्यायालय का सहायक होना
- भारत के राज्य क्षेत्र के सभी सिविल और न्यायिक प्राधिकारी उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे।
अनुच्छेद 145 न्यायालय के नियम इत्यादि
- उच्चतम न्यायालय अपने नियम और विनियम स्वयं बनाएगा।
- यदि किसी वाद (Case) में असहमत जज हों, तो वे भी अपने मत/फैसला सुनाएंगे।
- उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रत्येक निर्णय और ऐसी प्रत्येक राय मामले की सुनवाई में उपस्थित न्यायाधीशों की बहुसंख्या की सहमति से ही दी जाएगी, अन्यथा नहीं।
- अनुच्छेद 145(3) – संविधान के निर्वचन से संबंधित विधि के किसी सारवान प्रश्न से संबंधित किसी मामले का निर्णय करने के लिए या अनुच्छेद 143 के अधीन किसी संदर्भ की सुनवाई के लिए बैठने वाले न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या पांच होगी।
- साधारणतया संविधान पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश करते हैं।
- शांति भूषण बनाम भारत संघ (2017) के मामले में यह निर्णय दिया गया था कि मुख्य न्यायाधीश ही संविधान पीठ का गठन करेंगें।
अनुच्छेद 145 (5): निर्णय बहुमत (Majority) से ही मान्य होगा।
संवैधानिक पीठ (Constitutional Bench)
- परिभाषा
- पाँच या अधिक जजों की पीठ को संवैधानिक पीठ कहा जाता है।
- संवैधानिक आधार
- इसका उल्लेख अनुच्छेद 145 में है।
- अनुच्छेद 145 के अनुसार संविधान पीठ में कम से कम 5 न्यायाधीश होना अनिवार्य है।
- किन मामलों में गठित की जाती है?
- (a) संविधान की व्याख्या से संबंधी मामलों में।
- (b) राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के चुनाव संबंधी विवादों के संदर्भ में।
- (c) अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्वारा किसी विषय पर परामर्श मांगे जाने पर।
- अध्यक्षता
- सामान्यतः संविधान पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश (CJI) करते हैं।
- महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय
- शांति भूषण बनाम भारत संघ (2017) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि –
- केवल मुख्य न्यायाधीश (CJI) ही संविधान पीठ का गठन करेंगे।
- शांति भूषण बनाम भारत संघ (2017) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि –
अनुच्छेद 146 – उच्चतम न्यायालय के अधिकारी, सेवक तथा व्यय
- नियुक्ति का प्रावधान
- उच्चतम न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) करेंगे।
- मुख्य न्यायाधीश किसी अन्य न्यायाधीश/अधिकारी को यह अधिकार सौंप सकते हैं।
- राष्ट्रपति नियम बनाकर यह प्रावधान कर सकता है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) से परामर्श अनिवार्य होगा।
- सेवा शर्तें
- अधिकारियों और सेवकों की सेवा शर्तें CJI द्वारा बनाए गए नियमों से निर्धारित होंगी।
- वेतन, भत्ते, छुट्टी या पेंशन संबंधी नियमों के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है।
- व्यय
- सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक व्यय (वेतन, भत्ते, पेंशन आदि) भारत की संचित निधि पर भारित होंगे।
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा वसूली गई फीस और अन्य धनराशि भी इसी निधि का हिस्सा होगी।
अनुच्छेद 147 – निर्वचन (Interpretation)
- इस अनुच्छेद के अंतर्गत निर्वचन संबंधी विधि के सारगर्भित प्रश्न का दायरा स्पष्ट किया गया है।
- इसमें शामिल हैं –
- भारत शासन अधिनियम, 1935 और उसके संशोधन/पूरक अधिनियम।
- सपरिषद आदेश और उसके अधीन बनाए गए आदेश।
- भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 और उसके अधीन बनाए गए आदेश।
- इसमें शामिल हैं –
उच्चतम न्यायालय की स्वतंत्रता
भारतीय लोकतंत्र में उच्चतम न्यायालय को एक संघीय न्यायालय, मूल अधिकारों का संरक्षक और संविधान का अभिभावक माना गया है। इसकी स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने हेतु संविधान ने निम्नलिखित व्यवस्थाएँ की हैं:
न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया:
- न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति (कार्यपालिका) द्वारा की जाती है, लेकिन वह अनुभवी न्यायिक सदस्यों (उच्च न्यायालय/उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों) की सलाह से की जाती है।
- इससे कार्यपालिका का प्रभाव कम होता है और नियुक्ति की राजनीतिक निर्भरता घटती है।
कार्यकाल की सुरक्षा
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है।
- उन्हें केवल राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अंतर्गत ही महाभियोग प्रक्रिया द्वारा हटाया जा सकता है।
- अब तक किसी भी न्यायाधीश को हटाया नहीं गया है, जिससे इसकी सुरक्षा की शक्ति स्पष्ट होती है।
निश्चित सेवा शर्तें
- न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते, पेंशन आदि का निर्धारण संसद करती है।
- ये शर्तें कार्यकाल के दौरान प्रतिकूल रूप से परिवर्तित नहीं की जा सकतीं, सिवाय वित्तीय आपातकाल के।
- यह व्यवस्था उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष निर्णय क्षमता को बनाए रखती है।
संचित निधि से व्यय
- न्यायाधीशों का वेतन, पेंशन और प्रशासनिक व्यय भारत की संचित निधि से दिए जाते हैं।
- इस पर संसद में मतदान नहीं हो सकता, केवल चर्चा की जा सकती है।
- इससे न्यायपालिका की आर्थिक निर्भरता कार्यपालिका पर नहीं रहती।
न्यायाधीशों के आचरण पर बहस पर रोक- (अनुच्छेद 121)
- महाभियोग की प्रक्रिया को छोड़कर संसद या राज्य विधानमंडलों में न्यायाधीशों के आचरण पर बहस नहीं की जा सकती।
- यह उन्हें राजनीतिक दवाब से बचाता है और न्यायिक गरिमा की रक्षा करता है।
सेवानिवृत्ति के बाद वकालत पर रोक
- सेवानिवृत्त न्यायाधीश भारत के किसी भी न्यायालय या प्राधिकरण में वकालत नहीं कर सकते।
- इसका उद्देश्य निर्णय करते समय निष्पक्षता बनाए रखना है।
अपनी अवमानना पर दंड देने की शक्ति
- उच्चतम न्यायालय को अपनी अवमानना करने वालों को दंडित करने की शक्ति प्राप्त है।
- इससे वह अपनी प्रतिष्ठा, अधिकार और गरिमा को बनाए रखता है।
स्टाफ की नियुक्ति की स्वतंत्रता
- भारत के मुख्य न्यायाधीश को कार्यालयीन कर्मचारियों की नियुक्ति और उनकी सेवा शर्तें स्वतः तय करने का अधिकार है।
- इसमें कार्यपालिका का कोई हस्तक्षेप नहीं होता।
न्यायक्षेत्र में कटौती नहीं
- संसद उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र या शक्तियों में कटौती नहीं कर सकती, केवल वृद्धि कर सकती है।
- न्यायालय की शक्तियाँ संविधान में सुनिश्चित की गई हैं।
कार्यपालिका से पृथकता
- संविधान के अनुसार कार्यपालिका और न्यायपालिका को पृथक रखा गया है।
- कार्यपालिका को न्यायिक अधिकार नहीं दिए गए हैं।
- इससे न्यायिक प्रशासन में कार्यकारी हस्तक्षेप समाप्त हो गया है।
उच्चतम न्यायालय की शक्तियाँ एवं क्षेत्राधिकार
- भारतीय संविधान के अनुसार, उच्चतम न्यायालय को विस्तृत शक्तियाँ और क्षेत्राधिकार प्राप्त हैं। यह न केवल संघीय ढांचे की व्याख्या करता है, बल्कि नागरिकों के अधिकारों का रक्षक भी है। इसे “संविधान का संरक्षक और सर्वोच्च व्याख्याता” भी कहा जाता है।
- डॉ. अल्लादी कृष्ण अय्यर के अनुसार: “भारतीय उच्चतम न्यायालय को विश्व के अन्य सर्वोच्च न्यायालयों से अधिक शक्तियाँ प्राप्त हैं।”
- उच्चतम न्यायालय के क्षेत्राधिकार के प्रकार:
- मूल (Original) क्षेत्राधिकार → अनुच्छेद 131
- न्यायादेश (Writ) क्षेत्राधिकार → अनुच्छेद 32
- अपीलीय (Appellate) क्षेत्राधिकार→अनुच्छेद 132 से 136
- सलाहकार (Advisory) क्षेत्राधिकार → अनुच्छेद 143
- अभिलेखों का न्यायालय (Court of Record)
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) अनुच्छेद 137
- अन्य शक्तियाँ
1. मूल क्षेत्राधिकार (Article 131)
- संघीय ढांचे के अंतर्गत केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का निपटारा।
- केवल विधिक अधिकारों से संबंधित विवादों में लागू, न कि राजनीतिक प्रकृति के मामलों में।
- इन मामलों में मूल क्षेत्राधिकार लागू होता है:
- केंद्र बनाम एक या अधिक राज्य।
- केंद्र और एक या अधिक राज्य बनाम अन्य राज्य।
- दो या अधिक राज्यों के बीच विवाद।
- निष्क्रिय मामले (जहाँ क्षेत्राधिकार लागू नहीं):
- संविधान पूर्व संधि या समझौते।
- पूर्व संधियों में तय विशेष प्रावधान।
- अंतर-राज्यीय जल विवाद (अनु. 262)।
- वित्त आयोग से जुड़े मामले (अनु. 280)।
- पेंशन और व्यय संबंधी विवाद (अनु. 290)।
- वाणिज्यिक प्रकृति के विवाद
- नोट : अनु. 131 के तहत कोई राज्य केन्द्र के खिलाफ मुआवजा या हर्जाना वसूल करने का दावा नहीं कर सकता।
- चुनावी विवाद
- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव से संबंधित विवादों पर सर्वोच्च न्यायालय का आरम्भिक क्षेत्राधिकार है तथा इसका निर्णय अंतिम होता है।
- उदाहरण: 1969 में राष्ट्रपति पद पर वी. वी. गिरि और उपराष्ट्रपति पद पर जी. एस. पाठक के निर्वाचन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति एस. एम. सीकरी ने दोनों के निर्वाचन को वैध ठहराया।
- अनु. 139-A
- सर्वोच्च न्यायालय स्वयं एक या अधिक उच्च न्यायालयों से मामले अपने पास स्थानांतरित कर सकता है यदि उनमें विधि या भारी महत्व का प्रश्न जुड़ा हो।
- न्याय के हित में एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में भी मामला स्थानांतरित कर सकता है।
- मूल न्यायक्षेत्र के पहला मामला : पश्चिम बंगाल बनाम केंद्र सरकार (1961) – कोयला खदान अधिनियम की वैधता पर विवाद।
2. न्यायादेश क्षेत्राधिकार/मौलिक अधिकारों का संरक्षक और रिट अधिकारिता (Article 32)
- सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए रिट अधिकारिता प्राप्त है।
- सामान्यतः इसे आरम्भिक अधिकारिता के रूप में देखा जाता है।
- नागरिक सीधे उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है।
- परंतु डी. डी. बसु के अनुसार यह आरम्भिक अधिकारिता से भिन्न है क्योंकि इसमें विवाद संघ की इकाइयों के बीच नहीं, बल्कि पीड़ित व्यक्ति और सरकार के अभिकरणों के बीच होता है।
- इसलिए अनुच्छेद 32 के अधीन अधिकारिता और अनुच्छेद 131 की अधिकारिता में कोई समानता नहीं है।
- अनुच्छेद 139 – संसद विधि द्वारा सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों के संरक्षण के अलावा अन्य प्रयोजनों के लिए भी निर्देश, आदेश या रिट जारी करने की शक्ति दे सकती है।
- उच्चतम न्यायालय निम्नलिखित 5 प्रकार के रिट्स (न्यायादेश) जारी कर सकता है:
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) – किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत से मुक्त कराने हेतु।
- परमादेश (Mandamus) – सरकारी अधिकारी या संस्था को कर्तव्य पालन के लिए बाध्य करने हेतु।
- उत्प्रेषण (Certiorari) – न्यायालय या प्राधिकरण के गलत आदेश को निरस्त करने हेतु।
- प्रतिषेध (Prohibition) – न्यायालय या निकाय को अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकने हेतु।
- अधिकार प्रेच्छा (Quo Warranto) – किसी व्यक्ति से यह पूछने हेतु कि वह किसी सार्वजनिक पद पर किस अधिकार से बैठा है।
- विशेषताएँ:
- यह मूल अधिकारों तक सीमित है।
- उच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अधिक व्यापक रिट क्षेत्राधिकार प्राप्त है।
- उच्च न्यायालय:
- मूल अधिकारों की रक्षा के लिए तो रिट जारी कर ही सकता है,
- साथ ही अन्य विधिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में भी रिट जारी कर सकता है।
- इस प्रकार, रिट न्यायक्षेत्र के संदर्भ में उच्च न्यायालय की शक्ति अधिक व्यापक है।
3. अपीलीय क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 132 से 136)
- उच्चतम न्यायालय अंतिम अपीलीय न्यायालय है। अपील चार श्रेणियों में की जा सकती है:
- संवैधानिक अपील (अनु. 132):
- जब उच्च न्यायालय के फैसले में संविधान की व्याख्या आवश्यक हो।
- दीवानी अपील (अनु. 133):
- जब मामला सामान्य महत्व के विधिक प्रश्न पर आधारित हो।
- ₹20,000 की सीमा को 30वें संविधान संशोधन (1972) से हटाया गया।
- आपराधिक अपील (अनु. 134):
- उच्च न्यायालय द्वारा दोषमुक्ति को पलटकर मृत्युदंड देने पर।
- उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ अदालत से मामला लेकर निर्णय देने पर।
- यदि उच्च न्यायालय प्रमाणित करे कि मामला सुप्रीम कोर्ट योग्य है।
- 1970 में विस्तार: उम्रकैद या 10 वर्षों की सजा के मामलों में भी अपील की जा सकती है।
- प्रमाणपत्र द्वारा अपील – अनु. 134A
- उच्च न्यायालय संवैधानिक, सिविल और आपराधिक मामलों में सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए प्रमाणपत्र दे सकता है।
विशेष अनुमति अपील (Special Leave Petition – SLP, Article 136):
- सुप्रीम कोर्ट अपने विवेक से किसी भी न्यायालय/अधिकरण के निर्णय के विरुद्ध अपील की अनुमति दे सकता है।
- यह सिविल, संवैधानिक या आपराधिक किसी भी प्रकार का मामला हो सकता है।
- केस किसी भी स्तर पर लंबित हो सकता है।
- अपवाद: सैन्य न्यायालय या कोर्ट मार्शल के मामलों में अपील का अधिकार नहीं है, परंतु उनके निर्णय के उपरांत सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।
- यह शक्ति विवेकाधीन है, इसे अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता।
4. सलाहकार क्षेत्राधिकार (Advisory Jurisdiction) — अनुच्छेद 143
- प्रावधान
- राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय से विधिक या संवैधानिक मामलों पर परामर्श लेने की शक्ति है।
- प्रकार
- A. सार्वजनिक महत्व से संबंधित विधिक प्रश्न
- यदि कोई महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न उत्पन्न होता है जो जनहित से जुड़ा हो, तो राष्ट्रपति परामर्श मांग सकता है।
- सर्वोच्च न्यायालय चाहे तो उत्तर दे या न दे।
- B. संविधान, संधि, समझौते या पूर्व निर्णयों से उत्पन्न विवाद
- यदि कोई संविधान पूर्व संधि, समझौता, या कानूनी दस्तावेज से विवाद उत्पन्न होता है, तो राष्ट्रपति परामर्श ले सकता है।
- इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय को उत्तर देना अनिवार्य होता है।
- A. सार्वजनिक महत्व से संबंधित विधिक प्रश्न
- नोट (Note)
- दोनों ही मामलों में न्यायालय की राय केवल सलाह होती है।
- यह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं होती।
- अब तक की स्थिति (2013 तक)
- 2013 तक राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय से 15 मामलों में परामर्श लिया।
- पहला मामला – दिल्ली विधि अधिनियम (1951)
- अंतिम मामला – 2जी स्पेक्ट्रम विवाद (2012)
- 2013 तक राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय से 15 मामलों में परामर्श लिया।
5. अभिलेख न्यायालय (Court of Record) — अनुच्छेद 129
- मुख्य शक्तियाँ:
- सर्वकालिक अभिलेख के रूप में निर्णयों का संधारण
- उच्चतम न्यायालय के निर्णय और कार्यवाहियाँ प्रामाणिक साक्ष्य माने जाते हैं।
- किसी अन्य न्यायालय में इनकी वैधता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
- अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति
- सिविल और आपराधिक दोनों प्रकार की अवमानना में दंड दे सकता है।
- अधिकतम 6 वर्ष की जेल या ₹2000 तक जुर्माना या दोनों।
- अवमानना के प्रकार:
- सिविल अवमानना: आदेश/निर्णय की जानबूझकर अवहेलना।
- आपराधिक अवमानना:
- न्यायालय की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना।
- न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालना।
- न्याय प्रशासन को प्रभावित करना।
- नोट: निष्पक्ष आलोचना या रिपोर्टिंग को अवमानना नहीं माना जाएगा।
- सर्वकालिक अभिलेख के रूप में निर्णयों का संधारण
6. न्यायिक समीक्षा की शक्ति (Judicial Review)
- उच्चतम न्यायालय केंद्र एवं राज्यों द्वारा पारित विधायी व कार्यकारी कार्यों की संवैधानिकता की समीक्षा करता है।
- यदि कोई कानून या आदेश संविधान के विरुद्ध पाया जाए, तो उसे:
- अविधिक (Ultra Vires)
- असंवैधानिक (Unconstitutional)
- अमान्य (Void/Null & Void) घोषित किया जा सकता है।
- यह संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) की रक्षा की गारंटी है।
7. अन्य प्रमुख शक्तियाँ
- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन विवादों का समाधान
- एकमात्र और अंतिम निर्णयकर्ता।
- UPSC के सदस्यों के आचरण की जाँच
- अनुचित आचरण पाए जाने पर राष्ट्रपति को हटाने की सिफारिश करता है।
- राष्ट्रपति इस सिफारिश को मानने के लिए बाध्य होता है।
- अपने ही फैसले की समीक्षा करने की शक्ति
- न्याय के हित में पूर्व निर्णय को पलट सकता है।
- उदाहरण: केशवानंद भारती केस (1973) में गोलकनाथ केस (1967) को पलटा।
- उच्च न्यायालयों से मामले मंगवाने व स्थानांतरण की शक्ति
- किसी मामले को एक उच्च न्यायालय से दूसरे में स्थानांतरित कर सकता है।
- पूरे देश में निर्णयों की बाध्यता
- इसकी व्याख्याएँ सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होती हैं।
- सभी न्यायालय व प्रशासनिक अधिकारी सहयोग करने के लिए बाध्य होते हैं।
- संविधान का सर्वोच्च व्याख्याता
- इसकी व्याख्या अंतिम और निर्णायक होती है।
- देशभर के न्यायालयों व पंचाटों पर न्यायिक अधीक्षण
- उनके कार्यों व प्रक्रिया पर नियंत्रण रखता है।
- संसद द्वारा क्षेत्राधिकार विस्तार की शक्ति
- संसद द्वारा इसके न्यायिक क्षेत्र को विस्तारित किया जा सकता है।
- केंद्र-राज्य समझौते द्वारा भी क्षेत्राधिकार बढ़ाया जा सकता है।
उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ताओं की तीन श्रेणियाँ
वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate)
- ऐसे अधिवक्ता जिन्हें उच्चतम न्यायालय विशेष विधिक ज्ञान, अनुभव और प्रतिष्ठा के आधार पर वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता देता है।
- यह मान्यता न्यायालय स्वयं या अधिवक्ता की सहमति से देता है।
- वरिष्ठ अधिवक्ता को कुछ प्रतिबंधों का पालन करना होता है:
- बिना एडवोकेट ऑन रिकार्ड (AOR) के अदालत में बहस नहीं कर सकते।
- अधीनस्थ न्यायालय या न्यायाधिकरण में बिना कनिष्ठ अधिवक्ता के पेश नहीं हो सकते।
- वे:
- प्रार्थना-पत्र या शपथपत्र संबंधी निर्देश नहीं ले सकते,
- न्यायालय या अधिकरण में प्रारूप कार्य, कानूनी सलाह, साक्ष्य एकत्र करने या प्रसार कार्य नहीं कर सकते।
- लेकिन, कनिष्ठ अधिवक्ता के साथ परामर्श में रहकर मामले का निपटारा कर सकते हैं।
एडवोकेट ऑन रिकार्ड (Advocate-on-Record / AOR)
- केवल AOR को ही उच्चतम न्यायालय में:
- अपील फाइल करने,
- रिकॉर्ड प्रस्तुत करने,
- और किसी पक्ष की ओर से पेश होने का अधिकार है।
- AOR बनने के लिए विशेष परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है।
अन्य अधिवक्ता (Other Advocates)
- वे अधिवक्ता जिनका नाम अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत किसी राज्य बार काउंसिल में पंजीकृत है।
- ये:
- उच्चतम न्यायालय में बहस कर सकते हैं,
- किसी पक्ष की ओर से पेश हो सकते हैं,
- लेकिन कोई दस्तावेज या अपील फाइल नहीं कर सकते।
उच्चतम न्यायालय से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य
- निर्णय प्रक्रिया
- उच्चतम न्यायालय में निर्णय बहुमत से होते हैं।
- जो न्यायाधीश बहुमत से सहमत नहीं होते, वे अपनी असहमति और उसके कारण (Dissenting Opinion) प्रस्तुत करते हैं।
- (2) पीठ (Bench)
- संवैधानिक मामलों पर न्यूनतम 5 न्यायाधीशों की पीठ बनती है।
- अन्य मामलों में सामान्यतः 3 न्यायाधीशों की पीठ बनती है।
- मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायाधीशों से संबंधित तथ्य
- हीरालाल जे. कानिया : पहले मुख्य न्यायाधीश (मृत्यु पद पर रहते हुए)।
- सब्यसाची मुखर्जी : 3।
- वाई.वी. चंद्रचूड़ : सबसे लंबी अवधि तक मुख्य न्यायाधीश (1978–1985)।
- कमल नारायण सिंह : सबसे कम समय तक मुख्य न्यायाधीश।
- के.जी. बालकृष्णन : पहले दलित मुख्य न्यायाधीश।
- पी.एन. भगवती : जनहित याचिका के प्रणेता।
- के.एस. हेगड़े: एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो सुप्रीम कोर्ट के जज भी रहे और बाद में लोकसभा अध्यक्ष भी बने।
- उच्चतम न्यायालय में अब तक एक भी महिला मुख्य न्यायाधीश नहीं बनी है जबकि 11 महिलाएं न्यायाधीश बन चुकी है।
- मीरा साहिब फातिमा बीबी
- सुजाता मनोहर
- इन्दु मल्होत्रा
- ज्ञान सुधा मिश्रा
- बी.वी. नागरत्ना
- आर. भानुमति
- रूमा पॉल
- इन्दिरा बनर्जी
- हिमा कोहली
- बेला त्रिवेदी
- रंजना प्रकाश देसाई
- न्यायिक इतिहास में पहली बार – सुप्रीम कोर्ट में एक साथ चार महिला न्यायाधीश कार्यरत हैं।
- ज्ञान सुधा मिश्रा – राजस्थान उच्च न्यायालय में भी न्यायाधीश रही हैं।
- मदन बी. लोकुर – सेवानिवृत्ति के बाद फिजी के सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्त।
- स्वपनिल त्रिपाठी बनाम भारत संघ (2018): सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण (Live Streaming) की अनुमति।
- अनुच्छेद 348 – सुप्रीम कोर्ट की सभी कार्यवाही अंग्रेज़ी भाषा में होगी।
- रोस्टर आवंटन – मुख्य न्यायाधीश ही सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न न्यायाधीशों के बीच कार्यों का आवंटन करते हैं। कामिनी जायसवाल बनाम भारत संघ (2017) में यह स्पष्ट किया गया।
- उपचारात्मक याचिका (Curative Petition): यह ऐसी याचिका होती है जिससे सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय को चुनौती दी जा सकती है, यदि उसमें न्यायिक चूक हो।
भारत के मुख्य न्यायाधीशों की सूची
| क्र.सं. | नाम | विवरण |
| 1 | एच जे कानिया | स्वतन्त्र भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश थे। |
| 10. | के एन वान्चू | |
| 11. | एम हिदायतुल्ला | भारत के पहले मुस्लिम मुख्य न्यायाधीश थे। उन्होंने दो अवसरों पर भारत के कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में भी कार्यभार संभाला था। इसके साथ ही वो एक पूरे कार्यकाल के लिए भारत के छठे उपराष्ट्रपति भी रहे। |
| 16 | वाई वी चंद्रचूड़ | वह सबसे अधिक समय तक मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहे |
| 17. | पी एन भगवती | |
| 37. | के. जी. बालकृष्णन | |
| 38. | एस एच कापड़िया | पारसी समुदाय से सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बनने वाले प्रथम व्यक्ति थे। |
| 41. | राजेन्द्र मल लोढ़ा | |
| 42. | एच एल दत्तु | |
| 43. | टी एस ठाकुर | |
| 44. | जगदीश सिंह खेहर | सिख समुदाय से उच्चतम न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश हैं। |
| 45. | दीपक मिश्रा | |
| 46. | रंजन गोगोई | |
| 47 | शरद अरविंद बोबडे | |
| 48 | एन वी रमण | |
| 49 | उदय यू ललित | ये अधिवक्ता से सीधे सुप्रीम कोर्ट के जज बने है। |
| 50 | धनञ्जय यशवंत चंद्रचूड़ | |
| 51 | संजीव खन्ना | (वर्तमान में) |
उच्चतम न्यायालय के कुछ वाद और उनसे संबंधित निर्णय
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वाद 155488_0302fc-5a> |
निर्णय 155488_298a98-13> |
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एस.आर. बोम्मई वाद 1994 155488_3564f4-dc> |
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इंदिरा साहनी वाद (मंडल वाद) 1992 155488_78edc7-26> |
|
|
नागराजन वाद 2017 155488_a0f47b-01> |
|
|
बालाजी राघवन विवाद 1994 155488_614012-b8> |
|
|
पी.यू सी.एल. 2003 155488_2ed548-2b> |
|
|
रोमेश थापर तथा बृजभूषण केस 155488_e0e3fb-c7> |
|
|
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया वाद 155488_597ac2-28> |
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आंध्र प्रदेश बनाम कृष्ण मेनन वाद 155488_6bcf97-50> |
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दस्तगीर वाद 155488_446e0e-d3> |
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मेनका गांधी वाद 1978 155488_2d4766-7f> |
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RC कपूर वाद 155488_6b3c6e-19> |
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SC गुप्ता बनाम भारत संघ (1982) 155488_b62270-d7> |
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कीहोतो होल्लोहन बनाम जाचील्लहु, 1992 155488_8b2e1b-3e> |
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विशाखा व अन्य बनाम राजस्थान राज्य 155488_3d68ba-89> |
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रोयेप्पा वाद 155488_7e277a-d4> |
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