प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद्

प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद् भारत की कार्यपालिका के प्रमुख अंग हैं, जो देश के शासन और प्रशासन का संचालन करते हैं। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय के अंतर्गत यह विषय प्रधानमंत्री की भूमिका, मंत्रिपरिषद् की संरचना तथा उनकी सामूहिक जिम्मेदारी को स्पष्ट करता है। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीति निर्माण और प्रशासनिक निर्णयों में इनकी केंद्रीय भूमिका होती है।

  • संसदीय शासन व्यवस्था
    • भारत में संसदीय शासन व्यवस्था लागू है।
    • राष्ट्रपति नाममात्र का प्रधान (Head of State) होता है, जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक प्रधान (Head of Government) होता है।
  • प्रधानमंत्री – वास्तविक कार्यपालिका
    • संविधान में प्रधानमंत्री की शक्तियों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
    • राष्ट्रपति की जो शक्तियाँ संविधान में उल्लिखित हैं, उनका प्रयोग व्यवहार में प्रधानमंत्री ही करता है।
    • प्रधानमंत्री = “Head of the Government”, जबकि राष्ट्रपति = “Head of the State”।
    • इसलिए –
      • राष्ट्रपति = De Jure Executive (विधि सम्मत कार्यपालिका)
      • प्रधानमंत्री = De Facto Executive (तथ्य सम्मत कार्यपालिका)

विद्वानों द्वारा प्रधानमंत्री की भूमिका की व्याख्या

विद्वानकथन
क्रॉसमैनसंसदीय सरकार = प्रधानमंत्री सरकार
लॉर्ड मार्ले“प्रधानमंत्री समानों में प्रथम है”“प्रधानमंत्री कैबिनेट रूपी मेहराब की आधारशिला अर्थात् मंत्रिपरिषद की नीवं का पत्थर”
सर हार्टकोट“प्रधानमंत्री तारों के बीच चन्द्रमा है”
आइवर जेनिंग्स“प्रधानमंत्री सूर्य है, अन्य ग्रह उसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं”
एच.जे. लॉस्की“वह कैबिनेट का जीवन-मरण बिंदु है”
रैम्जे म्योर“राज्य के जहाज का मल्लाह”
डॉ. बी. आर. अंबेडकर“अमेरिकी राष्ट्रपति की तुलना यदि किसी से हो सकती है तो वह भारत का प्रधानमंत्री है”
गाडगिल“प्रधानमंत्री में अधिनायक बनने की संभावनाएँ हैं यदि वह सच्चा लोकतांत्रिक न हो”

राष्ट्रपति के साथ संबंध 

अनुच्छेद 74 – राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद्
  • अनुच्छेद 74(1):  राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद् होगी। इस मंत्रिपरिषद् का प्रधान – प्रधानमंत्री होगा। राष्ट्रपति को अपने कार्यों में इस सलाह के अनुसार कार्य करना होगा।
    • राष्ट्रपति किसी सलाह पर मंत्रिपरिषद् से पुनर्विचार के लिए कह सकता है। पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह के अनुसार ही राष्ट्रपति को कार्य करना होगा।
अनुच्छेद 74(2): यह सवाल कि मंत्रियों ने राष्ट्रपति को क्या सलाह दी या नहीं दी – कोई न्यायालय इसकी जांच नहीं करेगा।
  • यू.एन. राव बनाम इंदिरा गांधी – मंत्रिपरिषद् हर दशा में बनी रहती है और राष्ट्रपति को सलाह देती है।
  • राम जवाया कपूर बनाम पंजाब (1956) व शमशेर सिंह बनाम पंजाब (1974) – राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद् की सलाह माननी ही होगी।
अनुच्छेद 75 – मंत्रियों के संबंध में अन्य प्रावधान
  • अनुच्छेद 75(1) : राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है। अन्य मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति करता है।
  • अनुच्छेद 75(1A) : प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की संख्या लोकसभा की कुल संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती।(संविधान 91वां संशोधन, 2003)
  • अनुच्छेद 75(1B) : यदि कोई सांसद दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अयोग्य घोषित किया गया है, तो वह मंत्री भी नहीं बन सकता जब तक उसकी सदस्यता की अवधि समाप्त नहीं हो जाती या वह दोबारा निर्वाचित नहीं हो जाता।
  • अनुच्छेद 75(2) : मंत्री, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (pleasure of the President) पद पर बने रहते हैं। [व्यक्तिगत उत्तरदायित्व]
  • अनुच्छेद 75(3) : मंत्रिपरिषद्, लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदाय होती है। [सामूहिक उत्तरदायित्व]
  • अनुच्छेद 75(4) : मंत्री पद ग्रहण करने से पहले, राष्ट्रपति द्वारा तीसरी अनुसूची के अनुसार पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई जाती है।
  • अनुच्छेद 75(5) : यदि कोई मंत्री लगातार 6 माह तक संसद का सदस्य नहीं रहता, तो वह मंत्री पद पर नहीं रह सकता।
  • अनुच्छेद 75(6) : मंत्रियों के वेतन व भत्ते संसद द्वारा निर्धारित किए जाएंगे। जब तक संसद नया प्रावधान नहीं करती, वेतन-दर दूसरी अनुसूची के अनुसार होंगे। 
अनुच्छेद 77 – भारत सरकार की कार्यवाहियों का संचालन
  • अनुच्छेद 77(1): भारत सरकार की सभी कार्यपालक कार्यवाहियाँ राष्ट्रपति के नाम से होंगी।
  • अनुच्छेद 77(2): राष्ट्रपति के नाम से पारित आदेशों की वैधता पर यह आधार नहीं दिया जा सकता कि वह राष्ट्रपति ने स्वयं पारित किया या नहीं।
  • अनुच्छेद 77(3): राष्ट्रपति, मंत्रियों के बीच कार्यों के बंटवारे एवं कार्य संचालन हेतु नियम बनाएगा।
अनुच्छेद 78 – प्रधानमंत्री के राष्ट्रपति के प्रति कर्तव्य
  • अनुच्छेद 78(A) : प्रधानमंत्री का कर्तव्य है कि वह मंत्रिपरिषद् द्वारा लिए गए सभी प्रशासनिक व विधायी निर्णयों की सूचना राष्ट्रपति को दे।
  • अनुच्छेद 78(B) : यदि राष्ट्रपति कोई विशेष जानकारी चाहता है, जो प्रशासन या विधायन से जुड़ी हो, तो प्रधानमंत्री वह जानकारी उपलब्ध कराएगा।
  • अनुच्छेद 78(C) : यदि किसी मंत्री ने स्वयं कोई निर्णय ले लिया है, लेकिन उस पर मंत्रिपरिषद् में चर्चा नहीं हुई है, और यदि राष्ट्रपति कहे, तो प्रधानमंत्री को उस निर्णय को मंत्रिपरिषद् के सामने विचार हेतु रखना होगा।
प्रधानमंत्री की नियुक्ति – अनुच्छेद 75
  • संविधान में प्रधानमंत्री की नियुक्ति की स्पष्ट प्रक्रिया नहीं दी गई है।
  • अनुच्छेद 75(1) के अनुसार: “प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा।”
  • संसदीय प्रणाली के अंतर्गत, राष्ट्रपति को लोकसभा में बहुमत दल के नेता को ही नियुक्त करना होता है।
  • जब कोई स्पष्ट बहुमत नहीं होता-
    • ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को विवेक का प्रयोग करना पड़ता है।
    • सामान्यतः वह सबसे बड़े दल या गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
    • और उसे 1 माह के भीतर विश्वास मत (Vote of Confidence) प्राप्त करने को कहता है।
    • उदाहरण:
      • 1979 में राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने चरण सिंह को प्रधानमंत्री नियुक्त किया, जब जनता पार्टी की सरकार गिर गई थी।
प्रधानमंत्री की आकस्मिक मृत्यु की स्थिति
  • प्रधानमंत्री की आकस्मिक मृत्यु पर भी राष्ट्रपति अपने विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकता है।
  • उदाहरण: 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी को कांग्रेस संसदीय दल की औपचारिक बैठक से पूर्व ही प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। बाद में कांग्रेस संसदीय दल ने उन्हें अपना नेता चुना।
    • इससे पहले ऐसी स्थिति में गुलजारी लाल नंदा को दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था।
बहुमत साबित करने की आवश्यकता
  • प्रधानमंत्री बनने के लिए पहले से बहुमत साबित करना आवश्यक नहीं है।
  • राष्ट्रपति पहले नियुक्ति कर सकता है, फिर प्रधानमंत्री को समय सीमा में बहुमत साबित करना होगा।
  • उदाहरण: चरण सिंह (1979), वी.पी. सिंह (1989), चंद्रशेखर (1990), नरसिंह राव (1991), वाजपेयी (1996, 1998), देवेगौड़ा (1996), गुजराल (1997)
सदस्यता न होते हुए भी प्रधानमंत्री नियुक्ति
  • कोई व्यक्ति जो संसद का सदस्य नहीं है, 6 माह के लिए प्रधानमंत्री बन सकता है।
  • लेकिन इस अवधि में उसे संसद का सदस्य बनना अनिवार्य होगा। अन्यथा वह प्रधानमंत्री पद पर नहीं बना रह सकता।
  • उदाहरण: एच.डी. देवगौड़ा, जब प्रधानमंत्री बने, तब वे कर्नाटक विधानसभा के सदस्य थे।
  • बाद में वे राज्यसभा के सदस्य बने।
सदन की सदस्यता संबंधी नियम
  • संविधान के अनुसार, प्रधानमंत्री लोकसभा या राज्यसभा, दोनों में से किसी का भी सदस्य हो सकता है।
  • उदाहरण: राज्यसभा सदस्य
    • इंदिरा गांधी (1966) ➔ पहली बार प्रधानमंत्री बनीं, उस समय उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सदस्य थीं।
    • देवगौड़ा (1996) ➔ नियुक्ति के समय कर्नाटक विधानसभा सदस्य थे, बाद में राज्यसभा सदस्य बने।
    • आई.के. गुजराल (1997) ➔ बिहार से  राज्यसभा सदस्य (बिहार)।
    • डॉ. मनमोहन सिंह (2004–14) ➔ असम से राज्यसभा सदस्य ।
  • मनोनीत सदस्य की नियुक्ति : मनोनीत सदस्य भी प्रधानमंत्री बन सकता है, बशर्ते वह 6 महीने में किसी भी सदन का निर्वाचित सदस्य बन जाए।

प्रधानमंत्री पद के लिए योग्यता

  • भारतीय संविधान में प्रधानमंत्री पद की योग्यता के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया है।
  • केवल वही व्यक्ति प्रधानमंत्री बन सकता है जो संसद के किसी भी सदन का सदस्य (निर्वाचित/मनोनीत) हो या 6 माह के भीतर बन जाए।
  • न्यूनतम आयु 25 वर्ष।

शपथ ग्रहण

  • प्रधानमंत्री पद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति के समक्ष पद एवं गोपनीयता की शपथ लेता है।
  • यह शपथ भारतीय संविधान की तीसरी अनुसूची में उल्लिखित है।
  • वे मंत्री वाली शपथ का ही प्रारूप अपनाते हैं (संविधान में अलग से प्रधानमंत्री की शपथ का उल्लेख नहीं है)।
  • इसमें दो शपथ शामिल होती हैं:
    • पद की शपथ।
    • गोपनीयता की शपथ।
  • पद की शपथ में प्रधानमंत्री कहता है –
    • मैं भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा।
    • मैं भारत की प्रभुता एवं अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा।
    • मैं श्रद्धापूर्वक एवं शुद्ध अंतःकरण से अपने दायित्वों का निर्वहन करूंगा।
    • मैं भय, पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी व्यक्तियों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूंगा।
  • गोपनीयता की शपथ में प्रधानमंत्री कहता है – मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ कि जो विषय मेरे विचारार्थ लाया जाएगा या मुझे ज्ञात होगा, उसे तब तक किसी अन्य को प्रकट नहीं करूंगा, जब तक वह कर्तव्यों के निर्वहन हेतु आवश्यक न हो।

पदावधि (कार्यकाल)

  • प्रधानमंत्री का कार्यकाल निश्चित नहीं होता है।
  • वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर बना रहता है।
  • लेकिन:
    • जब तक प्रधानमंत्री को लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त है, तब तक राष्ट्रपति उसे पद से हटा नहीं सकता।
    • यदि प्रधानमंत्री लोकसभा में विश्वास मत खो देता है, तो उसे:
      • त्यागपत्र देना होगा, या
      • त्यागपत्र न देने की स्थिति में राष्ट्रपति उसे पद से हटा सकता है।
  • संविधान में “कार्यवाहक प्रधानमंत्री” शब्द का उल्लेख नहीं है।

वेतन और भत्ते

  • प्रधानमंत्री का वेतन व भत्ते भारतीय संसद द्वारा समय-समय पर निर्धारित किए जाते हैं।
  • प्रधानमंत्री को संसद सदस्य के समान वेतन, भत्ते, मुफ्त आवास, यात्रा सुविधाएं, स्वास्थ्य सेवाएं आदि प्राप्त होती हैं।
    • वर्ष 2001 में संसद ने प्रधानमंत्री के व्यय विषयक भत्ते को ₹1500 से बढ़ाकर ₹3000 प्रति माह कर दिया था।

प्रधानमंत्री के कार्य एवं शक्तियाँ

मंत्रिपरिषद के संदर्भ में प्रधानमंत्री की शक्तियाँ : 

  1. मंत्री नियुक्ति की सिफारिश: राष्ट्रपति को मंत्रियों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री द्वारा ही नाम सुझाए जाते हैं।
  2. मंत्रालयों का आवंटन: वह विभिन्न मंत्रालयों का बँटवारा करता है और आवश्यकतानुसार फेरबदल करता है।
  3. मंत्रियों को हटाना/त्यागपत्र: वह किसी मंत्री से त्यागपत्र ले सकता है या राष्ट्रपति से उसे बर्खास्त करने की सिफारिश कर सकता है।
  4. मंत्रिपरिषद की अध्यक्षता: मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है और निर्णयों को प्रभावित करता है। मंत्रिपरिषद की बैठकों का कोरम नहीं होता है।  
  5. मंत्रियों के कार्यों का समन्वय: सभी मंत्रियों के बीच निगरानी, निर्देशन और समन्वय करता है।
  6. त्यागपत्र देने की शक्ति: प्रधानमंत्री के त्यागपत्र देने या मृत्यु से पूरी मंत्रिपरिषद स्वतः भंग हो जाती है।
  7. भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम, 1961 का नियम 4(1): मंत्रिमंडल सचिवालय को आवंटित समस्त कार्यों को प्रधानमंत्री को स्वतः आवंटित माना जाता है।

नोट : प्रधानमंत्री के त्यागपत्र या मृत्यु से संपूर्ण मंत्रिपरिषद स्वतः समाप्त हो जाती है, जबकि किसी अन्य मंत्री के त्यागपत्र या निधन पर केवल रिक्ति उत्पन्न होती है।

राष्ट्रपति के संदर्भ में प्रधानमंत्री की शक्तियाँ

  1. राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच सेतु: प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच संवाद की मुख्य कड़ी होता है।
  2. प्रधानमंत्री के कर्तव्य (अनुच्छेद 78 के अंतर्गत):
    • मंत्रिपरिषद के निर्णयों को राष्ट्रपति को सूचित करना।
    • राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई जानकारी देना।
    • किसी मंत्री द्वारा लिए गए निर्णय को, राष्ट्रपति की अपेक्षा पर, मंत्रिपरिषद के समक्ष विचारार्थ रखना।
  3. नियुक्तियों में सलाह देना: प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को विभिन्न प्रमुख पदों की नियुक्तियों पर सलाह देता है, जैसे: भारत के महान्यायवादी, नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक, चुनाव आयोग, संघ लोक सेवा आयोग, वित्त आयोग आदि

संसद के संदर्भ में प्रधानमंत्री की शक्तियाँ

  1. प्रधानमंत्री जिस सदन का सदस्य होता है, वह उसी सदन का नेता होता है।
  2. संसदीय सत्र पर प्रभाव: राष्ट्रपति को सत्र बुलाने (summon) और स्थगित करने (prorogue) की सलाह देता है।
  3. लोकसभा भंग करने की सिफारिश: जब आवश्यक हो, लोकसभा को भंग करने की सिफारिश राष्ट्रपति से कर सकता है।
  4. सरकारी नीतियों की घोषणा: लोकसभा में सरकार की नीति और दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
अन्य कार्य एवं शक्तियाँ
  1. प्रधानमंत्री निम्न संस्थाओं का अध्यक्ष होता है 
    • नीति आयोग 
    • राष्ट्रीय विकास परिषद
    • अंतर्राज्यीय परिषद
    • राष्ट्रीय एकता परिषद
    • राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद
    • वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद
    • राष्ट्रीय सुरक्षा समिति
    • विश्व भारतीय विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन का कुलाधिपति
  2. विदेश नीति का निर्धारण: राष्ट्र की विदेश नीति को दिशा देने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
  3. सरकार का प्रमुख प्रवक्ता: केंद्र सरकार की ओर से जनता और मीडिया से संवाद करता है।
  4. आपातकालीन नेतृत्व: राष्ट्रीय आपदा या आपातकाल में वह राजनीतिक नेतृत्व और समन्वय करता है।
  5. ‘जनसम्पर्क: प्रधानमंत्री विभिन्न राज्यों, समुदायों और वर्गों के लोगों से मिलकर उनकी समस्याएं सुनता है।
  6. सत्ताधारी दल का नेता: वह संसद में सत्ताधारी दल का नेता होता है।
  7. सेनाओं का राजनीतिक प्रमुख: रक्षा मंत्रालय और सेनाओं से संबंधित उच्च राजनीतिक दिशा प्रदान करता है।
    • “हमारे संविधान के अंतर्गत यदि किसी कार्यकारी की तुलना अमेरिका के राष्ट्रपति से की जा सकती है, तो वह प्रधानमंत्री है, न कि राष्ट्रपति।” डॉ. भीमराव अंबेडकर

प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के कार्य

  • प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) देश के प्रधानमंत्री को प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर सहायता प्रदान करता है। इसके मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं:
    1. प्रशासनिक सहायता प्रदान करना – प्रधानमंत्री के अधीन कार्य कर रहे विभागों और मंत्रालयों के कार्यों को संचालित करने में सहयोग देना।
    2. प्रकरणों का निस्तारण – प्रधानमंत्री के कार्यों और दायित्वों से संबंधित विभिन्न प्रशासनिक, संवैधानिक और नीतिगत मामलों का निपटारा करना।
    3. यात्रा और जनसंपर्क प्रबंधन – प्रधानमंत्री की यात्राओं, दौरों, बैठकों और जनसंपर्क कार्यक्रमों की योजना बनाना और उन्हें क्रियान्वित करना।
    4. शिकायतें और नीतिगत विषय – प्रधानमंत्री को प्राप्त होने वाली जन शिकायतों, गंभीर प्रशासनिक मामलों और नीतिगत विषयों की जांच और विश्लेषण करना।
    5. प्रशासनिक सहयोग और मार्गदर्शन – प्रधानमंत्री को निर्णय लेने में सहायता हेतु आवश्यक तथ्यात्मक जानकारी और प्रशासनिक सहयोग प्रदान करना।
    6. राहत कोषों का प्रबंधन – प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) और प्रधानमंत्री राष्ट्रीय रक्षा कोष (PMNRDF) से संबंधित मामलों का निपटारा करना।

मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बने नेता

भारत में अब तक 6 ऐसे व्यक्ति हुए हैं जो पहले किसी राज्य के मुख्यमंत्री रहे और बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने:

क्रम

नेता का नाम

मुख्यमंत्री पद

प्रधानमंत्री पद

प्रमुख विशेषताएँ

1

मोरारजी देसाई

बम्बई राज्य (1952–1956)

मार्च 1977 – जुलाई 1979

  • देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री 
  • जनता पार्टी के नेता

2

चरण सिंह

उत्तर प्रदेश (1967–1968, पुनः 1970)

जुलाई 1979 – जनवरी 1980

  • किसानों के हितैषी
  • लोक दल के नेता

3

वी. पी. सिंह

उत्तर प्रदेश (1980–1982)

दिसंबर 1989 – नवंबर 1990

  • पहली गठबंधन सरकार (1989)
  • मंडल आयोग लागू किया
  • राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के मुखिया

4

पी. वी. नरसिम्हा राव

आंध्र प्रदेश (1971–1973)

जून 1991 – मई 1996

  • दक्षिण भारत से पहले प्रधानमंत्री
  • आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की

5

एच. डी. देवगौड़ा

कर्नाटक (1994–1996)

जून 1996 – अप्रैल 1997

  • संयुक्त मोर्चा सरकार के नेता 
  • जनता दल से जुड़े

6

नरेन्द्र मोदी

गुजरात (2001–2014)

मई 2014 – वर्तमान (2024 में तीसरी बार)

  • सबसे लंबे कार्यकाल वाले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री 
  • भाजपा के प्रमुख नेता
महत्वपूर्ण तथ्य
पद पर रहते हुए मृत्यु:
  1. जवाहरलाल नेहरू
  2. लाल बहादुर शास्त्री 
  3. इंदिरा गांधी 
कार्यवाहक प्रधानमंत्री:
  1. गुलजारीलाल नंदा: नेहरू व शास्त्री की मृत्यु के बाद दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त हुए।
विश्वास मत से पहले त्यागपत्र:
  1. चौधरी चरण सिंह 
  2. अटल बिहारी वाजपेयी (1996):
    • लोकसभा में विश्वास मत हासिल करने से पहले ही त्यागपत्र दे दिया।
अविश्वास प्रस्ताव:
  • भारत का पहला अविश्वास प्रस्ताव 1963 में प्रधानमंत्री नेहरू के विरुद्ध जे.बी. कृपलानी द्वारा लाया गया, पर पारित नहीं हुआ।
विश्वास मत में असफल प्रधानमंत्री:
  1. वी.पी. सिंह (1990)
  2. एच.डी. देवगौड़ा (1997)
  3. अटल बिहारी वाजपेयी (1998)
  • इन सभी को लोकसभा में विश्वास मत नहीं मिलने के कारण इस्तीफा देना पड़ा।
बिना सरकारी अनुभव के प्रधानमंत्री:
  1. राजीव गांधी 
  2. चन्द्रशेखर 
    • प्रधानमंत्री बनने से पूर्व किसी सरकारी पद पर कार्य का अनुभव नहीं था।
विशेष अनुभव वाले प्रधानमंत्री:
  1. पी.वी. नरसिम्हा राव – विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके; प्रधानमंत्री बने उस समय सांसद नहीं थे।

भारत के प्रधानमंत्रियों की सूची (1947 – अब तक)

क्रम

प्रधानमंत्री का नाम

कार्यकाल

दल/पार्टी

विशेष 

1

जवाहरलाल नेहरू

15 अगस्त 1947 – 27 मई 1964

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

  • जन्म – 14 नवम्बर 1889, इलाहाबाद
  • 1916 – पहली बार महात्मा गांधी से मुलाकात
  • 1928 – सर्वदलीय सम्मेलन, नेहरू रिपोर्ट (मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता, जवाहरलाल ने हस्ताक्षरकर्ता)
  • कुल 4 बार कांग्रेस अध्यक्ष रहे
  • लाहौर अधिवेशन 1929 में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए। अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य घोषित
  • कुल 9 बार जेल गए
  • 1942 – भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अहमदनगर किला जेल (सबसे लंबा कारावास)
  • 1935: अल्मोड़ा जेल में अपनी आत्मकथा लिखी – An Autobiography
  • अन्य प्रसिद्ध कृतियाँ – Discovery of India, Glimpses of World History
  • बच्चों से प्रेम के कारण “चाचा नेहरू” कहलाए
  • देश के पहले प्रधानमंत्री
  • सबसे लंबा और निरंतर कार्यकाल।

2

गुलजारीलाल नंदा (कार्यवाहक)

27 मई 1964 – 9 जून 1964

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

  • 1947 – जेनेवा श्रम सम्मेलन में भारत के सरकारी प्रतिनिधि।
  • मार्च 1950 – योजना आयोग के उपाध्यक्ष।
  • 1962 में “कांग्रेस फोरम फॉर सोशलिस्ट एक्शन” की शुरुआत
  • प्रधानमंत्री पद (कार्यवाहक) –
    • 27 मई 1964 – 9 जून 1964 : पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद।
    • 11 जनवरी 1966 – 24 जनवरी 1966 : लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद।
  • दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनने वाले एकमात्र व्यक्ति

3

लाल बहादुर शास्त्री

9 जून 1964 – 11 जनवरी 1966

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

  • रेल दुर्घटना (1956) पर नैतिक जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा
  • प्रसिद्ध कथन- “मेहनत प्रार्थना करने के समान है।”
  • ‘जय जवान जय किसान’ का नारा; भारत-पाक युद्ध (1965) के समय प्रधानमंत्री।

गुलजारीलाल नंदा (कार्यवाहक)

11 जनवरी 1966 – 24 जनवरी 1966

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

                                      _

4

इंदिरा गांधी

24 जनवरी 1966 – 24 मार्च 1977

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

  • जन्म- 19 नवम्बर 1917, एक प्रतिष्ठित परिवार (पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुत्री)
  • बचपन में ‘बाल चरखा संघ’ की स्थापना
  • 1930 में बच्चों की ‘वानर सेना’ बनाई (असहयोग आंदोलन में सहयोग हेतु)
  • 1956 – अखिल भारतीय युवा कांग्रेस व एआईसीसी महिला विभाग की अध्यक्ष
  • 1959-60 व 1978 – कांग्रेस अध्यक्ष
  • 1964-66 – सूचना व प्रसारण मंत्री
  • जनवरी 1966–मार्च 1977 – प्रधानमंत्री
  • जून 1970–नवम्बर 1973 – गृह मंत्री
  • 14 जनवरी 1980 से पुनः प्रधानमंत्री
  • अगस्त 1964–फरवरी 1967: राज्यसभा सदस्य
  • चौथी, पाँचवीं व छठी लोकसभा सदस्य
  • जनवरी 1980: रायबरेली (उ.प्र.) व मेडक (आ.प्र.) से 7वीं लोकसभा के लिए निर्वाचित (रायबरेली छोड़ी)
  • 1967-77 व 1980 – कांग्रेस संसदीय दल की नेता
  • 1972 – भारत रत्न
  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) मामला।
  • 1969 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण – रूस्तम कवासजी बनाम भारत संघ (1970) में अवैध घोषित।
  • 1969 में राजाओं की पेशंन/प्रिवीपर्स समाप्त – माधवराव सिंधिया मामला (1970) में अवैध घोषित।
  • 1971 में 25वां और 26वां संविधान संशोधन लाकर इन निर्णयों के प्रभाव समाप्त किए गए।
  • 1971 भारत-पाक युद्ध (चकमा शरणार्थी मुद्दा) – पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान।
  • आपातकाल (1975) के बाद सरदार स्वर्ण सिंह समिति (1976) गठित – जिसके आधार पर 42वां संविधान संशोधन (लघु संविधान) हुआ। इसे ‘इंदिरा संविधान’ भी कहा गया।

5

मोरारजी देसाई

24 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979

जनता पार्टी

  • 1963: कामराज योजना के तहत मंत्रिमंडल से इस्तीफा।
  • प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष नियुक्त।
  • 1967: श्रीमती इंदिरा गांधी सरकार में उप-प्रधानमंत्री व वित्त मंत्री।
  • जुलाई 1969: इंदिरा गांधी ने उनसे वित्त मंत्रालय का प्रभार लिया → उन्होंने उप-प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया।
  • 1969: कांग्रेस विभाजन के बाद कांग्रेस (O) के साथ रहे।
  • आपातकाल (26 जून 1975): गिरफ्तार, एकान्त कारावास।
  • 1977: जनता पार्टी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका।
  • सूरत से सांसद चुने गए।
  • 24 मार्च 1977: भारत के प्रधानमंत्री बने।
  • प्रधानमंत्री रहते हुए कहा:
    • “कोई भी, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री भी देश के कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए।”
  • उनके लिए सच्चाई और विश्वास जीवन का अंग थे।
  • पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री।
  • पहले प्रधानमंत्री जिन्होंने त्यागपत्र दिया।
  • विश्वास प्रस्ताव से पहले इस्तीफा दिया था । 
  • निशान-ए-पाकिस्तान (पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान) से सम्मानित।
  • उनके कार्यकाल में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे – 1978 में पहली बार UN में हिंदी में भाषण।

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चरण सिंह

28 जुलाई 1979 – 14 जनवरी 1980

जनता पार्टी

  • फरवरी 1970 – कांग्रेस पार्टी के समर्थन से दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
  • कठोर और ईमानदार प्रशासक – प्रशासन में अक्षमता, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करते थे।
  • प्रतिभाशाली सांसद, व्यवहारवादी नेता, वाक्पटु और दृढ़ विश्वास के लिए प्रसिद्ध।

इंदिरा गांधी

14 जनवरी 1980 – 31 अक्टूबर 1984

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई)

                                          _

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राजीव गांधी

31 अक्टूबर 1984 – 2 दिसम्बर 1989

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई)

  • सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री – 40 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री बने
  • अपनी माँ की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस ने 508 में से रिकॉर्ड 401 सीटें जीतीं, यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा जनादेश था।
  • 1968 में इटली की सोनिया मैनो से विवाह।
  • 1980 में भाई संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बाद राजनीति में प्रवेश का दबाव पड़ा।
  • संजय गांधी की मृत्यु से खाली अमेठी सीट पर उपचुनाव जीतकर लोकसभा पहुँचे।
  • 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस अध्यक्ष व प्रधानमंत्री बने।
  • 1984 के चुनाव में लगभग डेढ़ गुना पृथ्वी की परिधि के बराबर यात्रा की, 250 से अधिक सभाएं कीं और लाखों लोगों से सीधे मिले।
  • प्रधानमंत्री बनने से पूर्व कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं।
  • बोफोर्स घोटाला (1987) उनके कार्यकाल में।
  • राजीव गांधी vs राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह टकराव (1987), आपसी संवाद समाप्त हो गया था।
  • ठक्कर आयोग की रिपोर्ट (इंदिरा गांधी हत्या) राष्ट्रपति को नहीं दी गई थी।

8

विश्वनाथ प्रताप सिंह

2 दिसम्बर 1989 – 10 नवम्बर 1990

जनता दल

  • 1969–71 : अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य
  • 1971–74 : लोकसभा सदस्य
  • 9 जून 1980 – 28 जून 1982 : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री
  • 16 जुलाई 1983 : राज्यसभा सदस्य बने
  • 31 दिसंबर 1984 : केंद्रीय वित्त मंत्री बने
  • विश्वास प्रस्ताव में हार गए थे।

9

चन्द्रशेखर

10 नवम्बर 1990 – 21 जून 1991

जनता दल (समाजवादी)

  • 1977 से 1988 तक जनता पार्टी के अध्यक्ष।
  • ‘युवा तुर्क’ नेता के रूप में उभरे।
  • ‘मेरी जेल डायरी’ – आपातकाल के दौरान जेल में लिखी।
  • 25 जून 1975 : आपातकाल घोषित होने पर आंतरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार।
  • 1962 से (1984–89 की संक्षिप्त अवधि को छोड़कर) लगातार सांसद।

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पी. वी. नरसिंह राव

21 जून 1991 – 16 मई 1996

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई)

  • 1971–73 : आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री।
  • 1977–84 : लोकसभा सदस्य।
  • जनवरी 1980 : नई दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO) का तृतीय सम्मेलन – अध्यक्षता।
  • 1982–83 : भारत में गुट निरपेक्ष आंदोलन का सातवाँ सम्मेलन, इंदिरा गांधी की अध्यक्षता में।
  • राव ने गुट निरपेक्ष विदेश मंत्रियों की बैठकों की अध्यक्षता (नई दिल्ली और संयुक्त राष्ट्र)।
  • नवंबर 1983 : विशेष गुट निरपेक्ष मिशन के नेता, फिलिस्तीनी मुक्ति आन्दोलन हेतु पश्चिम एशिया का दौरा।

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अटल बिहारी वाजपेयी

16 मई 1996 – 1 जून 1996(13 दिन)

भारतीय जनता पार्टी

  • जन्म: 25 दिसंबर, 1924, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में, एक विनम्र स्कूल शिक्षक के परिवार में।
  • 1951 में भारतीय जनसंघ (अब भारतीय जनता पार्टी) में शामिल होने पर पत्रकारिता छोड़ी।
  • लोकसभा के सदस्य 9 बार, राज्यसभा के सदस्य 2 बार।
  • प्रधानमंत्री 3 बार बने: तीनों बार गठबंधन सरकार का नेतृत्व।
    1. पहली बार – 1996 (कम समय के लिए), पहली बार 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने। – विश्वास प्रस्ताव से पहले इस्तीफ़ा दे दिया था।  
    2. दूसरी बार – 19 मार्च 1998 – विश्वास प्रस्ताव हार गए थे।  
    3. तीसरी बार – 13 अक्टूबर 1999 (लगातार दूसरी बार एनडीए सरकार के प्रमुख के रूप में)।
  • जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार दो बार प्रधानमंत्री बनने वाले पहले नेता।
  • प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री, विपक्ष के नेता, संसद की स्थायी समितियों के अध्यक्ष रहे।
  • भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण।
  • 1994 में ‘सर्वश्रेष्ठ सांसद’ चुने गए।
  • 5 साल का कार्यकाल पूरा करने वाले पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री (1999-2004)
  • 1998 – भारत का दूसरा परमाणु परीक्षण (11 और 13 मई)।
  • फरवरी 1999 – पाकिस्तान यात्रा, लाहौर घोषणा पत्र।
  • जुलाई 1999 – कारगिल युद्ध के लिए ऑपरेशन विजय।
  • 13 दिसम्बर 2001 – संसद पर हमला, ऑपरेशन पराक्रम।
  • ‘25 दिसम्बर – वाजपेयी का जन्मदिन, सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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एच. डी. देवेगौड़ा

1 जून 1996 – 21 अप्रैल 1997

जनता दल

  • 11 दिसम्बर 1994 को कर्नाटक के 14वें मुख्यमंत्री बने।
  • 1969 में कांग्रेस विभाजन के बाद निजलिंगप्पा गुट में शामिल।
  • 1971 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद विपक्ष के मजबूत नेता के रूप में उभरे।
  • 1994 में जनता दल अध्यक्ष।
  • 30 मई 1996 को भारत के 11वें प्रधानमंत्री बने।

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इंदर कुमार गुजराल

21 अप्रैल 1997 – 19 मार्च 1998

जनता दल

  • 1976–1980 : सोवियत संघ (USSR) में भारत के राजदूत (मंत्रिमंडल स्तर)।
  • 1996 से राज्यसभा में नेता।
  • संसद सदस्य : 1964–1976, 1989–1991।
  • 1960 : दिल्ली रोटरी क्लब के अध्यक्ष।
  • 1992 : बिहार से राज्यसभा सदस्य।
  • दक्षिण एशियाई सहकारिता परिषद के अध्यक्ष।
  • 1996 : संयुक्त राष्ट्र महासभा (भारत के प्रतिनिधिमंडल के नेता)।
  • 1977 : UNESCO (शिक्षा और पर्यावरण सम्मेलन) – भारत के नेता।
  • भारत-पाक मैत्री संस्था के अध्यक्ष।

अटल बिहारी वाजपेयी

19 मार्च 1998 – 22 मई 2004

भारतीय जनता पार्टी

  • 19 मार्च 1998 से 13 अक्टूबर 1999  (13 माह)
    • विश्वास प्रस्ताव हार गए थे। 
  • 13/10/1999 से 22/5/2004 (5 साल)

14

डॉ. मनमोहन सिंह

22 मई 2004 – 26 मई 2014

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

  • UNCTAD सचिवालय में कार्य किया।
  • वित्त मंत्रालय के सचिव।
  • योजना आयोग के उपाध्यक्ष।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर।
  • प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार।
  • विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के अध्यक्ष।
  • 1991–96 : भारत के वित्त मंत्री।
  • आर्थिक सुधारों (LPG Policy : Liberalisation, Privatisation, Globalisation) के मुख्य शिल्पी।
  • 22 मई 2004 – प्रधानमंत्री बने।
  • 22 मई 2009 – पुनः प्रधानमंत्री (लगातार दूसरी बार)।
  • प्रधानमंत्री के रूप में 14वें प्रधानमंत्री।
  • 1998–2004 : राज्यसभा में विपक्ष के नेता।
  • 1991 से लगातार राज्यसभा सदस्य।
  • 2004–2014: सर्वाधिक समय तक गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया।
  • 1987 – पद्म विभूषण (भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान)।

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नरेंद्र मोदी

26 मई 2014 – वर्तमान

भारतीय जनता पार्टी

  • 2014 से वर्तमान (तीसरा कार्यकाल 2024) – सबसे लंबा गैर-कांग्रेसी कार्यकाल।
  • 2014 में बहुमत मिलने के बावजूद भी गठबंधन सरकार बनाई गई।
  • 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने 99वां संविधान संशोधन (NJAC) पूरी तरह निरस्त किया – पहली बार ऐसा हुआ।

कुछ प्रमुख प्रधानमंत्रियों के विशेष कार्य

गठबंधन दौर के प्रधानमंत्री

अवधि 

नाम प्रधानमंत्री 

विशेष 

1977- 80

  1. मोरारजी देसाई 
  2. चौधरी चरण सिंह 

1989-91

  1. वी.पी. सिंह 
  2. चंद्रशेखर   

1991-1996

  1. पी.वी. नरसिम्हा राव  

1996-99

  1. अटल बिहारी वाजपेयी 
  2. एच.डी. देवगौड़ा 
  3. इंद्र कुमार गुजराल
  4.  अटल बिहारी वाजपेयी

उप प्रधानमंत्री: (7)

क्रमनामकार्यकालविशेष
1वल्लभभाई पटेल(अक्टूबर 1947 – दिसम्बर 1950)सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले उप प्रधानमंत्री 
2मोरारजी देसाई(मार्च 1967 – जुलाई 1969)दूसरा सबसे लंबा कार्यकाल 
1967 में उप प्रधानमंत्री बने
बाद में प्रधानमंत्री बने
3चरण सिंह(जनवरी 1979 – जुलाई 1979)बाद में प्रधानमंत्री बने 
4जगजीवन राम(जनवरी 1979 – जुलाई 1979)अलग-अलग मंत्रालयों में बिना किसी ब्रेक के लगातार उप प्रधानमंत्री बने। 
5यशवंतराव चव्हाण(जुलाई 1979 – जनवरी 1980)अलग-अलग मंत्रालयों में बिना किसी ब्रेक के लगातार उप प्रधानमंत्री बने।
6चौधरी देवी लालदिसम्बर 1989 – अगस्त 1990नवम्बर 1990 – जून 1991)एक ही पद पर दोनों पार्टियों का प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र उप प्रधानमंत्री। 
7लाल कृष्ण आडवाणी(जून 2002 – मई 2004)वे उप प्रधानमंत्री के रूप में सेवा करने वाले सातवें और अंतिम व्यक्ति थे। 

भारत की शासन प्रणाली ब्रिटिश संसदीय प्रणाली पर आधारित है। इसमें कार्यपालिका का वास्तविक नेतृत्व मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) करती है, जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है।

मंत्रीपरिषद् से संबंधित अनुच्छेद

अनुच्छेदविषयवस्तु
74मंत्रीपरिषद द्वारा राष्ट्रपति को सहयोग एवं परामर्श देना
75मंत्रियों से संबंधित अन्य प्रावधान 
77भारत सरकार द्वारा कार्यवाहियों का संचालन
78राष्ट्रपति को सूचनाएँ प्रदान करने से संबंधित प्रधानमंत्री के दायित्व
अनुच्छेद 74 – राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह
  • राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने हेतु एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा।
  • राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह माननी होगी। वह एक बार पुनर्विचार के लिए कह सकता है, लेकिन दोबारा भेजी गई सलाह को मानना अनिवार्य होगा।
  • राष्ट्रपति को दी गई मंत्रिपरिषद की सलाह की वैधता की जांच किसी न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती।
अनुच्छेद 75 – मंत्रियों की नियुक्ति, कार्यकाल और उत्तरदायित्व
  • प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर होती है।
  • मंत्रिपरिषद की कुल संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या की 15% से अधिक नहीं हो सकती (91वां संविधान संशोधन, 2003)। अनुच्छेद 75(1A) → वर्तमान में अधिकतम 82 हो सकते है। 
  • यदि कोई सदस्य दलबदल के कारण संसद से अयोग्य ठहराया जाता है, तो वह मंत्री भी नहीं बन सकता। अनुच्छेद 75(1B)
  • मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद धारण करते हैं, अर्थात जब तक राष्ट्रपति चाहे।
  • मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।
  • राष्ट्रपति मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाता है।
  • कोई भी व्यक्ति 6 महीने के भीतर संसद का सदस्य नहीं बनता है तो वह मंत्री पद पर नहीं रह सकता।
  • मंत्रियों का वेतन और भत्ते संसद द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
अनुच्छेद 77 – भारत सरकार की कार्यवाहियों का संचालन
  • भारत सरकार की सभी कार्यपालक कार्यवाहियाँ राष्ट्रपति के नाम से होंगी।
  • राष्ट्रपति के नाम से पारित आदेशों की वैधता पर यह आधार नहीं दिया जा सकता कि वह राष्ट्रपति ने स्वयं पारित किया या नहीं।
  • राष्ट्रपति, मंत्रियों के बीच कार्यों के बंटवारे एवं कार्य संचालन हेतु नियम बनाएगा।
अनुच्छेद 78 – प्रधानमंत्री के कर्तव्य
  • राष्ट्रपति को प्रशासनिक मामलों व विधायी प्रस्तावों की जानकारी देना।
  • राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई सूचनाएँ उपलब्ध कराना।
  • राष्ट्रपति चाहे तो किसी एक मंत्री द्वारा लिए गए निर्णय को मंत्रिपरिषद के समक्ष विचारार्थ भेज सकता है।
  • राष्ट्रपति को सलाह देना व संसद व मंत्रिपरिषद् के बीच सेतु का कार्य करना।
अनुच्छेद 88 – संसद में मंत्रियों के अधिकार
  • प्रत्येक मंत्री को संसद के किसी भी सदन में बोलने व कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार है, चाहे वह उस सदन का सदस्य हो या न हो।
  • लेकिन उसे उस सदन में मतदान का अधिकार नहीं होगा यदि वह उस सदन का सदस्य नहीं है।

नोट : 

  • 42वें व 44वें संशोधन द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि मंत्रिपरिषद की सलाह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगी।
  • 1971 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा – लोकसभा भंग होने पर भी मंत्रिपरिषद भंग नहीं होगी।
  • 1974 में निर्णय हुआ – जब भी संविधान में “राष्ट्रपति की संतुष्टि” की बात हो, तो वह व्यक्तिगत नहीं बल्कि मंत्रिपरिषद की संतुष्टि मानी जाएगी।

मंत्रियों की नियुक्ति

  • राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है।
  • अन्य मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति करता है।
  • सामान्यतः संसद के सदस्यों को ही मंत्री नियुक्त किया जाता है।
  • यदि कोई व्यक्ति सांसद नहीं है, तो वह अधिकतम 6 माह के भीतर संसद (लोकसभा या राज्यसभा) की सदस्यता ले ले, अन्यथा उसका मंत्रिपद समाप्त हो जाएगा।
  • कोई मंत्री जो एक सदन का सदस्य है, वह दूसरे सदन की कार्यवाही में भाग और वक्तव्य दे सकता है, लेकिन मतदान नहीं कर सकता।

शपथ एवं गोपनीयता

  • मंत्रिपद ग्रहण करने से पहले, राष्ट्रपति द्वारा दो शपथें दिलाई जाती हैं:
  • पद की शपथ:
    • संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा।
    • भारत की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा।
    • निष्ठापूर्वक कर्तव्यों का निर्वहन।
    • बिना पक्षपात या द्वेष के न्याय करना।
  • गोपनीयता की शपथ:
    • मंत्री अपने कार्यकाल के दौरान प्राप्त किसी भी जानकारी को गोपनीय रखेगा जब तक कि वह कर्तव्य निर्वहन के लिए आवश्यक न हो।
  • उपप्रधानमंत्री की शपथ पर न्यायालय का दृष्टिकोण
    • देवीलाल की उपप्रधानमंत्री के रूप में शपथ (1990) को चुनौती दी गई।
    • उच्चतम न्यायालय ने इसे वैध माना और कहा:
      • उपप्रधानमंत्री की पदावली केवल व्याख्यात्मक है।
      • शपथ का वास्तविक भाग यदि संवैधानिक हो, तो पदनाम कोई फर्क नहीं डालता।

मंत्रियों का वेतन और भत्ते

  • मंत्रियों का वेतन और भत्ते संसद द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
  • उन्हें एक सांसद के समान वेतन एवं भत्ते मिलते हैं, जैसे:
    • व्यय विषय भत्ता, आवास, यात्रा भत्ता, स्वास्थ्य सुविधा आदि।
    • 2001 में संशोधन के अनुसार:
      • प्रधानमंत्री: ₹1500 → ₹3000 प्रतिमाह।
      • केंद्रीय मंत्री: ₹1000 → ₹2000 प्रतिमाह।
      • राज्यमंत्री: ₹500 → ₹1000 प्रतिमाह।
      • उपमंत्री: ₹300 → ₹600 प्रतिमाह।

दल परिवर्तन और मंत्री पद

  • यदि कोई मंत्री दल बदल कानून के तहत लोकसभा/राज्यसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित होता है:
    • तो वह अयोग्यता की तिथि से मंत्री नहीं बन सकता, जब तक पुनः निर्वाचित न हो या उस सदन का कार्यकाल समाप्त न हो जाए।
    • अनुच्छेद 75(1B) के अनुसार, यदि वह राज्यसभा सदस्य है, तो उसे मंत्री पद त्यागना अनिवार्य होगा।

मंत्रियों की उत्तरदायित्व प्रणाली

मंत्रियों के उत्तरदायित्त्व तीन प्रकार के होते हैं:

व्यक्तिगत उत्तरदायित्त्व (अनुच्छेद 75(2))
  • प्रत्येक मंत्री राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त अपने पद पर बना रहता है।
  • राष्ट्रपति किसी भी मंत्री को प्रधानमंत्री की सलाह पर पद से हटा सकता है।
  • यदि प्रधानमंत्री किसी मंत्री के काम से असंतुष्ट हो, तो वह त्यागपत्र माँग सकता है। यदि मंत्री त्यागपत्र नहीं देता, तो प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से कहकर उसे पद से हटवा सकता है।
  • प्रत्येक मंत्री अपने विभागीय कार्यों और अधीनस्थ कर्मचारियों के कार्यों के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होता है।
  • यह व्यक्तिगत उत्तरदायित्त्व, सामूहिक उत्तरदायित्त्व का ही पूरक है।
सामूहिक उत्तरदायित्त्व (अनुच्छेद 75(3))
  • मंत्रिपरिषद्, लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।
  • यदि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित होता है, तो पूरी मंत्रिपरिषद् को त्यागपत्र देना पड़ता है, चाहे कोई मंत्री राज्यसभा का सदस्य ही क्यों न हो।
  • इसे इस प्रकार कहा जाता है – “सभी मंत्री एक साथ तैरते हैं और एक साथ डूबते हैं।”
  • मंत्रिपरिषद् के निर्णय सभी मंत्रियों के लिए बाध्यकारी होते हैं। निर्णय से असहमति होने पर भी, मंत्री को उसे लोकसभा के भीतर और बाहर समर्थन करना होता है।
  • मंत्रिपरिषद लोकसभा को भंग करने की सिफारिश कर सकती है, परंतु राष्ट्रपति बाध्य नहीं है उसे मानने के लिए।
  • मंत्रिपरिषद के निर्णय सभी मंत्रियों के लिए बाध्यकारी होते हैं।
  • यदि कोई मंत्री निर्णय से सहमत नहीं है, तो उसे त्यागपत्र देना पड़ता है।
  • उदाहरण:
    • डॉ. भीमराव अंबेडकर – 1953 (हिंदू कोड बिल)
    • आरिफ मोहम्मद खान – 1986 (मुस्लिम महिला अधिनियम)
    • सी.डी. देशमुख: राज्यों के पुनर्गठन पर मतभेद।
  • नोट : डॉ. अंबेडकर के अनुसार: सामूहिक उत्तरदायित्व प्रधानमंत्री की शक्ति से ही सम्भव है।
अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित तथ्य
  • केवल लोकसभा में ही अविश्वास, विश्वास, निंदा और कार्यस्थगन प्रस्ताव लाए जा सकते हैं।
  • 1979: मोरारजी देसाई ने प्रस्ताव से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।
  • वी.पी. सिंह, देवगौड़ा, अटल बिहारी वाजपेयी (1998 में एक मत से) – विश्वासमत हासिल करने में असफल रहे।
  • पहला अविश्वास प्रस्ताव – अगस्त 1963, आचार्य कृपलानी द्वारा (भारत-चीन युद्ध के बाद)
  • सबसे अधिक अविश्वास प्रस्तावों का सामना इंदिरा गांधी (15 बार) – ज्योति बसु ने लगातार 04 बार 
  • अब तक कुल प्रस्ताव – कुल 28 (2023 तक), कोई भी पारित नहीं हुआ
  • नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रस्ताव – 2 बार (27 वाँ, 28 वाँ)
    • 27 वाँ – 
      • 20 जुलाई 2018 (पहला कार्यकाल) – केसिनेनी श्रीनिवास (तेलुगू देशम पार्टी)
      • कारण: आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा न मिलना
      • 135-330
    • 28 वाँ – 
      • 26 जुलाई 2023 (दूसरा कार्यकाल) – गौरव गोगोई (कांग्रेस के लोकसभा में उपनेता) 
      • कारण: मणिपुर हिंसा पर विरोधी गठबंधन INDIA की नाराजगी
      • ध्वनि मत से गिरा 
अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया (लोकसभा नियम 198(1))
  • अविश्वास प्रस्ताव पूरी मंत्रिपरिषद् के विरुद्ध होता है, किसी एक मंत्री के विरुद्ध नहीं।
  • अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति स्वयं लोकसभा देती है न कि लोकसभा अध्यक्ष।
  • कोई सदस्य प्रस्ताव लाना चाहता है तो लोकसभा अध्यक्ष को सूचना देता है।
  • अध्यक्ष सदन से अनुमति प्राप्त करने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत करता है।
  • कम से कम 50 सदस्य यदि खड़े होते हैं, तो प्रस्ताव को स्वीकार किया जाता है। (पहले 30 था)
  • प्रस्ताव स्वीकृत होने पर 10 दिनों के भीतर चर्चा अनिवार्य।
  • एक सत्र में एक ही बार ऐसा प्रस्ताव लाया जा सकता है (नियम 338)।
  • इस प्रस्ताव को लाने के लिए कोई कारण बताना आवश्यक नहीं होता।
  • चर्चा के बाद प्रधानमंत्री जवाब देते हैं और अंत में वोटिंग होती है।
विधिक उत्तरदायित्त्व
  1. भारत में मंत्रियों का कोई विधिक उत्तरदायित्व नहीं होता।
  2. यह परंपरा ब्रिटेन में प्रचलित है, जहाँ राजा के आदेश पर मंत्री हस्ताक्षर करता है और मंत्री उत्तरदायी होता है।
  3. ब्रिटेन में सिद्धांत है – “राजा गलत नहीं हो सकता, मंत्री गलत होता है।”
  4. भारत में:
    1. संविधान में मंत्रियों के लिए कोई विधिक जिम्मेदारी नहीं है।
    2. राष्ट्रपति के आदेश पर मंत्री का हस्ताक्षर आवश्यक नहीं।
    3. 74(2) के अनुसार मंत्रिपरिषद की राष्ट्रपति को दी गई सलाह की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।

अविश्वास प्रस्ताव बनाम निन्दा प्रस्ताव

बिंदु अविश्वास प्रस्तावनिन्दा प्रस्ताव
आधार कारण बताना आवश्यक नहींकारण या आरोप बताना आवश्यक
अनुमति लोकसभा की अनुमति आवश्यकलोकसभा की अनुमति आवश्यक नहीं
लक्ष्य सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद के विरुद्धएक मंत्री, समूह या पूरी मंत्रिपरिषद के विरुद्ध
उद्देश्य सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी को चुनौती देनाकिसी कार्य या नीति की आलोचना करना
प्रभाव पारित होने पर सरकार को इस्तीफा देना पड़ता हैप्रतीकात्मक आलोचना, इस्तीफा आवश्यक नहीं

अविश्वास प्रस्ताव बनाम विश्वास प्रस्ताव

बिंदु अविश्वास प्रस्तावविश्वास प्रस्ताव
नियम नियम लोकसभा नियम 198 के अंतर्गतकोई विशिष्ट नियम नहीं, प्रायः नियम 184 के अंतर्गत
भाषा नकारात्मक (“इस सदन को मंत्रिपरिषद पर विश्वास नहीं है”)सकारात्मक (“इस सदन को मंत्रिपरिषद पर विश्वास है”)
उद्देश्य सरकार को गिरानासरकार का समर्थन दिखाना
प्राथमिकता कमअधिक (सरकारी कार्य को प्राथमिकता नियम 25 के अनुसार)
प्रक्रिया स्पीकर की अनुमति आवश्यक, चर्चा 10 दिन मेंसरकार द्वारा लाया जाता है, चर्चा सुनिश्चित

लोकसभा में विश्वास प्रस्तावों का इतिहास

वर्षलोकसभाप्रधानमंत्रीपरिणाम
19909वींवी.पी. सिंहविश्वास मत प्राप्त नहीं कर सके
199611वींअटल बिहारी वाजपेयीविश्वास मत से पहले त्यागपत्र दे दिया
199711वींएच.डी. देवेगौड़ाविश्वास मत प्राप्त नहीं कर सके
199812वींअटल बिहारी वाजपेयीएक मत से विश्वास मत असफल
संवैधानिक और नियमात्मक प्रावधान
  • अनुच्छेद 75(3): मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।
  • यह प्रावधान तब तक प्रभावी रहता है जब तक लोकसभा का विघटन (अनुच्छेद 85(2)(b)) नहीं हो जाता।
  • विश्वास प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, निन्दा प्रस्ताव और स्थगन प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
मंत्रिपरिषद की संरचना : 
  • संविधान में मंत्रियों का कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री, और उपमंत्री के रूप में कोई औपचारिक वर्गीकरण नहीं है।
  • यह वर्गीकरण ब्रिटिश परंपरा और प्रशासनिक सुविधा के अनुसार अनौपचारिक रूप से अपनाया गया है।
  • 1952 के अधिनियम की धारा 2 के अनुसार, मंत्रियों के वर्गीकरण को वैधानिक स्वीकृति मिली।
  • लोकसभा व राज्यसभा की प्रक्रिया नियमावली के अनुसार, “मंत्री” शब्द में सभी प्रकार के मंत्री (कैबिनेट, राज्य, उप, संसदीय सचिव) शामिल हैं।
  • यदि कोई सांसद दल परिवर्तन कानून (10वीं अनुसूची) के तहत अयोग्य (Disqualified) घोषित होता है तो वह मंत्री नहीं रह सकता।
  • अनुच्छेद 75(1B) के अनुसार, यदि कोई मंत्री राज्यसभा का सदस्य है और दल परिवर्तन के कारण अयोग्य ठहराया जाता है, तो उसे मंत्री पद से इस्तीफ़ा देना होगा।

मंत्रिपरिषद में तीन श्रेणियों के मंत्री होते हैं:

कैबिनेट मंत्री (Cabinet Ministers)
  • ये केंद्र सरकार के प्रमुख मंत्रालयों (गृह, रक्षा, वित्त, विदेश आदि) का कार्यभार संभालते हैं।
  • ये कैबिनेट की बैठकों में भाग लेते हैं और नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • इनका उत्तरदायित्व पूरे केंद्र सरकार पर होता है।
  • कैबिनेट मंत्री के रूप में जगजीवन राम का कार्यकाल सबसे लंबा – 32 वर्ष रहा।
  • भारत की पहली द्विस्तरीय मंत्रिपरिषद् (केवल कैबिनेट मंत्री व राज्य मंत्री) मोरारजी देसाई के कार्यकाल (14 अगस्त 1977 – 28 जुलाई 1979) में कार्यरत रही।
राज्य मंत्री (Ministers of State)
  • इन्हें दो प्रकार से नियुक्त किया जा सकता है:
    • स्वतंत्र प्रभार के साथ: अपने मंत्रालय को स्वतंत्र रूप से चलाते हैं, लेकिन कैबिनेट के सदस्य नहीं होते। केवल विशेष आमंत्रण पर कैबिनेट बैठक में भाग लेते हैं।
    • सहायक रूप में: किसी कैबिनेट मंत्री की देखरेख में कार्य करते हैं, उनके विभागों को संभालते हैं या विशेष कार्य करते हैं।
उपमंत्री (Deputy Ministers)
  • इन्हें कोई स्वतंत्र मंत्रालय नहीं दिया जाता।
  • ये कैबिनेट या राज्य मंत्री की सहायता करते हैं – प्रशासनिक, राजनीतिक और संसदीय कार्यों में।
  • ये कैबिनेट के सदस्य नहीं होते, इसलिए बैठक में भाग नहीं लेते।

अन्य श्रेणियाँ:

संसदीय सचिव (Parliamentary Secretaries)
  • मंत्रिपरिषद की सबसे निचली श्रेणी में आते हैं।
  • यह पद संवैधानिक नहीं है और इसके पास कोई विभाग नहीं होता।
  • ये वरिष्ठ मंत्रियों की संसदीय कार्यों में सहायता करते हैं।
  • इनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री करता है और वही इन्हें शपथ दिलाता है।
  • ये केवल सांसद ही होते हैं और इन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया जाता है।
  • मंत्री की तरह का 06 माह वाला नियम नहीं है।  
  • 91वें संविधान संशोधन (2003) के अनुसार ये 15% मंत्रिपरिषद् की सीमा में नहीं गिने जाते।
  • अनुच्छेद 88 के अधिकार नहीं। 
  • ये कैबिनेट या सदन की बैठकों में भाग नहीं लेते।
  • संसदीय सचिव पद 1951 में बनाया गया था, पहले संसदीय सचिव थे: – सतीश चंद्रा और एस.एन. मिश्रा।
  • 1984 में राजीव गांधी ने दोबारा संसदीय सचिव नियुक्त किए।
  • संसदीय सचिव मंत्री नहीं होते, इसलिए वे मंत्रिमंडल या सदन की बैठक में भाग नहीं लेते।
उपप्रधानमंत्री (Deputy Prime Minister)
  • यह कोई संवैधानिक पद नहीं है।
  • यह पद राजनीतिक संतुलन और गठबंधन कारणों से दिया जाता है।
  • यह प्रधानमंत्री का उत्तराधिकारी नहीं होता, केवल पदनाम होता है।
  • वह मंत्रिपरिषद् का हिस्सा होता है, लेकिन शपथ केवल “मंत्री” के रूप में ही लेता है।
  • “उपप्रधानमंत्री” शब्द का प्रयोग केवल मौखिक रूप से किया जाता है, लिखित रूप में नहीं।
  • K.S. शर्मा बनाम देवीलाल (1990) केस – 1989 में वी.पी. सिंह सरकार के शपथ समारोह में देवीलाल ने “उपप्रधानमंत्री” शब्द का प्रयोग किया, जिसे अदालत में चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया गया कि शपथ संविधान के अनुरूप ही हुई थी।

मंत्रिपरिषद बनाम मंत्रिमंडल

क्र. सं.मंत्रिपरिषदमंत्रिमंडल
1एक बड़ा निकाय होता है, जिसमें लगभग 60–70 मंत्री होते हैं।एक लघु निकाय होता है, जिसमें लगभग 15–20 कैबिनेट मंत्री होते हैं।
2इसमें तीनों प्रकार के मंत्री होते हैं: कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री, व उपमंत्री।इसमें केवल कैबिनेट मंत्री ही होते हैं। यह मंत्रिपरिषद का ही भाग है।
3यह एक साथ बैठकों में भाग नहीं लेती, इसका कोई सामूहिक कार्य नहीं होता।यह एक सक्रिय निकाय है, नियमित रूप से बैठक करती है और सामूहिक रूप से कार्य करती है।
4शक्तियाँ कागजों में होती हैं, वास्तविक निर्णय नहीं लेती।वास्तव में मंत्रिपरिषद की शक्तियों का प्रयोग करती है।
5इसके कार्यों का निर्धारण मंत्रिमंडल करता है।यह मंत्रिपरिषद को निर्देश देती है, जिनका पालन सभी मंत्रियों के लिए आवश्यक होता है।
6यह मंत्रिमंडल के निर्णयों को लागू करती है।यह निर्णय लेने के बाद उनके अनुपालन की निगरानी करती है।
7यह एक संवैधानिक निकाय है। अनुच्छेद 74 और 75 में इसका उल्लेख है।यह 1978 के 44वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 352 में जोड़ा गया। यह मूल संविधान का भाग नहीं था।
8यह लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।यह मंत्रिपरिषद की सामूहिक उत्तरदायित्व को लागू करती है।
मंत्रिमंडल की प्रमुख भूमिकाएँ
  1. यह देश की उच्चतम निर्णय लेने वाली इकाई है।
  2. केंद्र सरकार की नीति निर्माण का प्रमुख अंग है।
  3. यह मुख्य कार्यकारी निकाय के रूप में कार्य करता है।
  4. विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय करता है।
  5. राष्ट्रपति को सलाह देने वाली संस्था है, जिसकी सलाह मानना राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी है।
  6. आपातकालीन परिस्थितियों में यह मुख्य प्रबंधन संस्था होती है।
  7. विधायी और वित्तीय नीतियों के निर्माण और क्रियान्वयन में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
  8. यह संवैधानिक पदों और वरिष्ठ प्रशासकों की नियुक्ति की सिफारिश करता है।
  9. यह विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को संचालित करता है।

विद्वानों द्वारा प्रधानमंत्री की भूमिका की व्याख्या

विद्वानकथन
रैम्जे म्योर  “कैबिनेट राज्य रूपी जहाज की स्टीयरिंग व्हील है।”
लोवेल “कैबिनेट राजनीतिक संरचना की आधारशिला है।”
सर जान मैरियट – “कैबिनेट वह धुरी है जिसके चारों ओर सम्पूर्ण राजनीतिक प्रणाली घूमती है।”
ग्लैडस्टोन – “कैबिनेट सूर्य की भांति है, जिसके चारों ओर अन्य निकाय परिक्रमा करते हैं।”
बार्कर “कैबिनेट नीतियों का चुम्बक है।”
बेगेहाट  “कैबिनेट एक हाइफन है, जो कार्यपालिका और विधायिका को जोड़ता है।”
सर आइवर जेनिंग्स  “कैबिनेट ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था का केंद्र बिंदु है, जो सरकार को एकता प्रदान करता है।”
एल.एस. एमरी “कैबिनेट सरकार को दिशा देने वाला मुख्य यंत्र है।”
रैम्जे म्योर की आलोचनात्मक टिप्पणी:
  • उन्होंने कैबिनेट को ‘तानाशाही संस्था’ कहा।
  • अपनी पुस्तक How Britain is Governed में लिखा:
    • “कैबिनेट अत्यधिक शक्तिशाली है, जिसे एक सर्वशक्तिमान निकाय कहा जा सकता है।”
    • “बहुमत के बल पर यह अर्हक निरंकुशता की स्थिति को प्राप्त कर लेती है।
    • “इसका प्रभाव पिछले दो पीढ़ियों से अधिक पूर्णतावादी है।”
आंतरिक कैबिनेट (किचन कैबिनेट):
  • आंतरिक कैबिनेट एक अनौपचारिक, छोटा समूह होता है जिसमें प्रधानमंत्री के 2 से 4 विश्वासी सहयोगी होते हैं।
  • इसमें कैबिनेट मंत्रियों के साथ-साथ प्रधानमंत्री के निजी मित्र या परिवारजन भी शामिल हो सकते हैं।\
  • मुख्य विशेषताएँ:
    • यह निर्णय लेने वाली अनौपचारिक संस्था होती है।
    • यह प्रधानमंत्री को राजनीतिक एवं प्रशासनिक सलाह देती है।
    • इसमें छोटे समूह में गहन चर्चा होती है और निर्णय शीघ्रता से लिए जाते हैं।
    • इसका प्रयोग गोपनीयता बनाए रखने हेतु भी किया जाता है।
    • उदाहरण: इंदिरा गांधी के कार्यकाल में किचन कैबिनेट अत्यंत प्रभावशाली थी। इसे “घेरे के अंदर घेरा” कहा गया।
  • किचन कैबिनेट की उपयोगिता:
    • छोटा समूह होने के कारण निर्णय लेने में अधिक कुशल।
    • तेजी से बैठकें कर सकता है और कार्य निष्पादन में तत्पर।
    • प्रधानमंत्री को राजनीतिक गोपनीयता बनाए रखने में मदद करता है।
  • किचन कैबिनेट की सीमाएँ/दोष:
    • यह औपचारिक कैबिनेट की भूमिका को कम कर देता है।
    • बाहरी व्यक्तियों की भागीदारी संवैधानिक प्रक्रिया को अस्पष्ट बनाती है।
    • पारदर्शिता की कमी होती है।

छाया मंत्रिमण्डल (Shadow Cabinet)

  • छाया मंत्रिमंडल एक ऐसी “वैकल्पिक कैबिनेट” होती है जो विपक्षी दल के प्रमुख सदस्यों से मिलकर बनी होती है।
  • इसे “Shadow Cabinet” कहा जाता है क्योंकि यह सत्तारूढ़ सरकार के कैबिनेट के समानांतर कार्य करता है।
  • प्रत्येक मंत्रालय के लिए विपक्ष में एक “छाया मंत्री” होता है।
  • ये छाया मंत्री संबंधित मंत्री के कार्यों पर निगरानी रखते हैं और वैकल्पिक प्रस्तावों पर चर्चा करते हैं।
  • यह प्रणाली ब्रिटेन की संसदीय परंपरा में प्रचलित है।
  • भारत के संविधान या संसदीय व्यवस्था में छाया मंत्रिमंडल का कोई संवैधानिक आधार नहीं है।
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