भारत का राष्ट्रपति : पद, शक्तियाँ और कार्य भारतीय संविधान के अंतर्गत सर्वोच्च संवैधानिक पद है, जो राष्ट्र की एकता और अखंडता का प्रतीक माना जाता है। राष्ट्रपति की नियुक्ति, शक्तियाँ और कार्य संविधान द्वारा निर्धारित होते हैं, जिनमें कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका से संबंधित महत्वपूर्ण भूमिकाएँ शामिल हैं। यह विषय राजनीतिक व्यवस्था और शासन के अंतर्गत भारतीय शासन प्रणाली की संरचना और कार्यप्रणाली को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति की भूमिका
भाग-5 में संविधान के अनुच्छेद 52 से 78 तक संघीय कार्यपालिका का विवरण है।
संघ की कार्यपालिका में शामिल:
- राष्ट्रपति (राज्य प्रमुख)
- उप-राष्ट्रपति
- प्रधानमंत्री
- मंत्रिपरिषद
- महान्यायवादी (Attorney General)
राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक तथा राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं सुदृढ़ता का प्रतीक होता है।
प्रत्यक्ष चुनाव पर विचार-विमर्श (संविधान सभा में बहस):
- अप्रत्यक्ष चुनाव के पक्ष में तर्क:
- भारत में संसदीय प्रणाली है; राष्ट्रपति के पास वास्तविक शक्तियाँ नहीं होतीं।
- प्रत्यक्ष चुनाव महंगा व समयसाध्य होता।
- केवल संसद से चुनाव कराने पर केंद्र का प्रभुत्व होता, जिससे राज्यों का उचित प्रतिनिधित्व नहीं होता।
संसदीय शासन व्यवस्था (भारत)
- संविधान में “संसदीय शासन व्यवस्था” शब्द नहीं है, परंतु केशवानंद भारती वाद (1973) में इसे संविधान की आधारभूत संरचना माना गया।
- कार्यपालिका का निर्माण व्यवस्थापिका (संसद) से होता है।
- कार्यपालिका, व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है।
- दो प्रकार की कार्यपालिका पाई जाती है –
- नाममात्र/औपचारिक कार्यपालिका (राष्ट्रपति)
- वास्तविक कार्यपालिका (प्रधानमंत्री व मंत्रिपरिषद)
राष्ट्रपति, कार्यपालिका के नाममात्र/संवैधानिक/औपचारिक प्रमुख तथा राष्ट्राध्यक्ष (Head of the State) हैं।
- वर्तमान प्रणाली के लाभ:
- राज्यों और केंद्र दोनों का संतुलित प्रतिनिधित्व होता है।
- चुनाव में संसदीय व्यवस्था के अनुकूलता बनी रहती है।
- सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित मामलों में राष्ट्रपति को औपचारिक/नाममात्र प्रमुख माना:
- राय साहब राम जवाया कपूर बनाम पंजाब राज्य (1955)
- शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974)
- यू.एन. राव बनाम इंदिरा गांधी (1975)
- संविधान सभा ने राष्ट्रपति प्रणाली को अस्वीकार कर संसदीय प्रणाली को चुना।
‘राष्ट्रपति’ शब्द की उत्पत्ति
- सबसे पहले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 30 अप्रैल 1947 को “राष्ट्रपति” शब्द का प्रस्ताव रखा।
- अंततः संविधान सभा ने डॉ. अंबेडकर और के.एम. पनिक्कर के सुझाव पर “The President of India” पदनाम को अपनाया।
- राष्ट्रपति, भारत का प्रथम नागरिक होता है और संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित ‘गणराज्य’ शब्द का यही अर्थ है —
- राष्ट्रपति निर्वाचित होता है, न कि वंशानुगत राजा की तरह।
राष्ट्रपति भवन व अन्य आवास
- राष्ट्रपति भवन:
- ब्रिटिश वास्तुकार एडविन ल्यूटियन्स की डिजाइन पर निर्मित।
- 1911 में दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा के बाद वायसराय निवास के रूप में बनाया गया।
- 1950 तक वायसराय यहीं रहते थे।
- स्थान – रायसीना हिल्स, नई दिल्ली।
- द रिट्रीट (The Retreat Building):
- स्थान – धरबरा (शिमला, हिमाचल प्रदेश)।
- राष्ट्रपति का ग्रीष्मकालीन निवास।
- राष्ट्रपति निलयम (Rashtrapati Nilayam):
- स्थान – हैदराबाद, तेलंगाना।
- इसे रेजीडेन्सी हाउस भी कहा जाता है।
- राष्ट्रपति सामान्यतः दिसम्बर–जनवरी में दक्षिण भारत प्रवास के दौरान यहीं ठहरते हैं।
राष्ट्रपति से संबंधित अनुच्छेद
| अनुच्छेद | विषयवस्तु |
| 52 | भारत के राष्ट्रपति |
| 53 | संघ की कार्यपालक शक्ति |
| 54 | राष्ट्रपति का चुनाव |
| 55 | राष्ट्रपति के चुनाव का तरीका |
| 56 | राष्ट्रपति का कार्यकाल |
| 57 | पुनर्चुनाव के लिए अर्हता |
| 58 | राष्ट्रपति चुने जाने के लिए योग्यता |
| 59 | राष्ट्रपति कार्यालय की दशाएँ |
| 60 | राष्ट्रपति द्वारा शपथ ग्रहण |
| 61 | राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया |
| 62 | राष्ट्रपति पद की रिक्ति की पूर्ति के लिए चुनाव कराने का समय |
| 65 | उप-राष्ट्रपति का राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना |
| 70 | अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन – संसद जैसा उचित समझे |
| 71 | राष्ट्रपति के चुनाव से संबंधित मामले |
| 72 | राष्ट्रपति की क्षमादान इत्यादि की शक्ति तथा कतिपय मामलों में दंड का स्थगन, माफी अथवा कम कर देना |
| 74 | मंत्रिपरिषद का राष्ट्रपति को परामर्श एवं सहयोग प्रदान करना। |
| 75 | मंत्रियों से संबंधित अन्य प्रावधान, जैसे-नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन इत्यादि |
| 76 | भारत के महान्यायवादी |
| 77 | भारत सरकार द्वारा कार्यवाही का संचालन |
| 78 | राष्ट्रपति को सूचना प्रदान करने से संबंधित प्रधानमंत्री के दायित्व इत्यादि |
| 85 | संसद के सत्र, सत्रावसान तथा भंग करना |
| 86 | राष्ट्रपति का अभिभाषण और संदेश |
| 87 | राष्ट्रपति का विशेष अभिभाषण |
| 111 | संसद द्वारा पारित विधेयकों पर सहमति प्रदान करना |
| 112 | संघीय बजट (वार्षिक वित्तीय विवरण) |
| 123 | राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति |
| 143 | राष्ट्रपति की सर्वोच्च न्यायालय से सलाह लेने की शक्ति |
अनुच्छेद 52: भारत का राष्ट्रपति
- भारत में एक राष्ट्रपति होगा।
- वह राज्य का प्रमुख (Head of the State) होगा।
- अनुच्छेद 52 संविधान का सबसे छोटा अनुच्छेद है।
के. टी. शाह के विचार (संविधान सभा में)
- ‘राष्ट्रपति’ शब्द के स्थान पर “भारत संघ का मुख्य कार्यपालक” (Chief Executive) और “राज्य का अध्यक्ष” (Head of the State) शब्द प्रयोग के पक्षधर थे।
- राष्ट्रपति का निर्वाचन वयस्क मताधिकार द्वारा कराने के समर्थक थे।
अनुच्छेद 53: संघ की कार्यपालिका शक्ति
- 53(1) – संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। वह स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से संविधान के अनुसार उसका प्रयोग करेगा।
- कार्यपालिका शक्ति की कोई परिभाषा संविधान में नहीं है।
- यह अनुच्छेद भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 7 से प्रभावित है।
- 53(2) – राष्ट्रपति रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश (Supreme Command) धारण करता है । इसका प्रयोग विधि द्वारा विनियमित होगा।
- 53(3) यह अनुच्छेद निम्न बातों को स्पष्ट करता है:
- (क) किसी राज्य सरकार या अन्य प्राधिकारी को किसी कार्य की शक्ति देने वाली वर्तमान विधि को राष्ट्रपति को वह शक्ति सौंपने वाला नहीं माना जाएगा।
- (ख) संसद को यह अधिकार है कि वह राष्ट्रपति के अलावा अन्य प्राधिकारी को भी विधि द्वारा कार्य प्रदान कर सकती है।
अनुच्छेद 54: राष्ट्रपति का चुनाव
- राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान से नहीं होता।
- निर्वाचन मंडल (Electoral College) द्वारा चुनाव होता है, जिसमें शामिल होते हैं:
- संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य
- राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
- केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली व पुडुचेरी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
- [70वां संविधान संशोधन (1992) द्वारा दिल्ली व पांडिचेरी को जोड़ा गया।] [यह अधिनियम 1 जून 1995 से लागू हुआ।]
- इसके बाद हुआ पहला राष्ट्रपति चुनाव था 1997 का राष्ट्रपति चुनाव।
- इस चुनाव में के. आर. नारायणन निर्वाचित हुए (भारत के 10वें राष्ट्रपति)।
- संविधान के अनुसार राष्ट्रपति निर्वाचन मंडल में संघराज्य क्षेत्र सीधे प्रतिनिधित्व नहीं करते।
- परंतु दिल्ली व पुड्डुचेरी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों को अनुच्छेद 54(B) के अंतर्गत ‘राज्य’ माना गया है।
- इसलिए इनके निर्वाचित सदस्यों को भी राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में स्थान प्राप्त है।
डेरेक ओ’ब्रायन (तृणमूल कांग्रेस):
- 2011 में पश्चिम बंगाल से राज्यसभा सदस्य निर्वाचित।
- पहले आंग्ल-भारतीय, जो संसद में निर्वाचित हुए।
- 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में मत देकर पहले आंग्ल-भारतीय मतदाता बने।
संविधान संशोधन (25 जनवरी 2020 के बाद):
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीयों के मनोनीत सदस्य का प्रावधान समाप्त।
कौन भाग नहीं लेता?
- संसद व विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य
- राज्य विधानपरिषदों के सदस्य (निर्वाचित व मनोनीत)
- विघटित विधानसभाओं के सदस्य (यदि चुनाव नहीं हुआ है)
अनुच्छेद 55: राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति
मुख्य प्रावधान
- राज्यों के प्रतिनिधित्व की एकरूपता सुनिश्चित की जाएगी।
- राज्यों और संघ के बीच समतुल्यता।
- आनुपातिक प्रतिनिधित्व की पद्धति (प्र.सं. 55(3)) – एकल संक्रमणीय मत प्रणाली।
चुनाव की विधि:
- आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली द्वारा
- एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote)
- गुप्त मतदान द्वारा
राष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति के दो सिद्धांत हैं
- समरूपता व समतुल्यता का सिद्धांत
- संसद और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों के वोटों का भार निर्धारित किया जाएगा।
- एकल संक्रमणीय मत प्रणाली सिद्धांत
समरूपता (Uniformity) का सिद्धांत
- प्रत्येक विधायक के मत का मूल्य निर्धारित किया जाता है।
- सभी राज्यों में एक ही सूत्र लागू होता है –

- 2026 तक जनसंख्या का आधार → 1971 की जनगणना।
- 42वाँ संशोधन (1976) → 2000 तक 1971 की जनगणना।
- 84वाँ संशोधन (2001) → 2026 तक 1971 की जनगणना।
- मत मूल्य उदाहरण:
- उत्तर प्रदेश – 208
- राजस्थान – 129
- छत्तीसगढ़ – 129
- सिक्किम – 7
- इसलिए अलग-अलग राज्यों में विधायक का मत मूल्य अलग-अलग होता है।
समतुल्यता (Parity) का सिद्धांत
- सभी राज्यों के विधायकों के मत मूल्यों का योग = संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों के मत मूल्यों का योग।

- उदाहरण (2017 राष्ट्रपति चुनाव):
- राज्यों का कुल मत मूल्य → 5,49,474
- संसद का कुल मत मूल्य → 5,49,408
- एक सांसद का मत मूल्य → 708
- जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा समाप्त (2019) → सांसदों का कुल मत मूल्य कम हुआ।
एकल संक्रमणीय मत पद्धति (Single Transferable Vote System)
मतदान की पद्धति:
- राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से, गुप्त मतदान और आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की एकल संक्रमणीय मत पद्धति से होता है।
- प्रत्येक निर्वाचक (सांसद/विधायक) को केवल एक मत मिलता है, लेकिन वह मत वरियता क्रम (1, 2, 3…) में दिया जाता है।
- मतदाता अपनी पसंद के अनुसार अभ्यर्थियों को प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि क्रम में अधिमान (preference) देता है। कुछ वरीयताएँ छोड़ना भी वैध है।
- निर्वाचक को उतने अधिमान देने का अधिकार है, जितने उम्मीदवार चुनाव में होते हैं।
मतगणना की प्रक्रिया:
- रिटर्निंग अधिकारी सर्वप्रथम अवैध मतों को छाँटकर अलग कर देता है।
- वैध मतों को दो भागों में बाँटा जाता है:
- निश्शेषित (Exhausted): जिसमें केवल प्रथम वरीयता दी गई हो और आगे कुछ न लिखा हो।
- अनिश्शेषित (Unexhausted): जिसमें एक से अधिक वरीयताएँ दी गई हों।
निर्वाचन कोटा (Quota):
- जीतने के लिए एक उम्मीदवार को निर्वाचन कोटा प्राप्त करना होता है।

- यदि कोई भी प्रत्याशी कोटा प्राप्त नहीं कर पाता है, तो सबसे कम प्रथम वरीयता प्राप्त करने वाले प्रत्याशी को बाहर कर दिया जाता है, और उसके मतों को दूसरी वरीयता वाले उम्मीदवार को ट्रांसफर किया जाता है।
- यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती है जब तक कोई एक उम्मीदवार कोटा नहीं प्राप्त कर लेता।
उदाहरण:
- 1969 में वी.वी. गिरी और नीलम संजीव रेड्डी के बीच मुकाबले में वी.वी. गिरी ने द्वितीय वरीयता के आधार पर विजय प्राप्त की थी।
राष्ट्रपति का निर्वाचन – प्रक्रिया व प्रावधान
निर्वाचन पद्धति व गणना
- यदि सभी वरीयताओं की गणना के बाद भी कोई उम्मीदवार निर्वाचन कोटा प्राप्त नहीं करता → अंततः मैदान में बचे अंतिम उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित किया जाता है।
- आलोचना:
- यदि निर्वाचक दूसरी या अन्य वरीयता न दें तो यह प्रणाली साधारण बहुमत प्रणाली बन सकती है।
- यदि उम्मीदवार दो से अधिक हों और केवल एक वरीयता ही व्यक्त की जाए तो कठिनाई उत्पन्न हो सकती है।
- संविधान में निर्वाचन कोटा का उल्लेख नहीं, इसे राष्ट्रपतीय एवं उपराष्ट्रपतीय निर्वाचन नियम, 1974 में स्पष्ट किया गया।
- राष्ट्रपति चुनाव में चुनाव-चिह्न का प्रयोग नहीं होता (निष्पक्षता हेतु)।
निर्वाचन संचालन
- राष्ट्रपति का चुनाव निर्वाचन आयोग कराता है।
- लोकसभा/राज्यसभा महासचिव क्रमवार निर्वाचन अधिकारी (Returning Officer) नियुक्त होते हैं।
- 2022 चुनाव में Returning Officer – राज्यसभा महासचिव पी.सी. मोदी।
- अधिसूचना:
- पदावधि समाप्ति से 8वें दिन पहले या तुरंत बाद जारी।
- नामांकन की अंतिम तिथि – अधिसूचना से 14वाँ दिन।
- उसके अगले दिन संवीक्षा, फिर अगले दिन नाम वापसी।
- मतदान – नाम वापसी के 15वें दिन या उसके बाद।
- नामांकन पत्र – अधिकतम 4।
मतपत्र व मतदान
- परोक्ष मतदान (Proxy Voting) निषिद्ध – धारा 9, अधिनियम 1952।
- केवल निवारक निरोध में रखे निर्वाचक डाक मतपत्र द्वारा वोट डाल सकते हैं (नियम 26, 1974)।
- मतपत्र का रंग:
- संसद सदस्यों हेतु – हरा
- राज्य विधानसभाओं हेतु – गुलाबी
- मतपत्र में 2 कॉलम –
- उम्मीदवार का नाम
- वरीयता क्रम (Order of Preference)
- चुनाव गुप्त मतदान से होता है, मत दिखाना वर्जित।
- NOTA विकल्प नहीं।
- व्हिप लागू नहीं → चुनाव दलगत राजनीति से परे।
नामांकन की पात्रता व जमानत
- 1952 अधिनियम – प्रस्तावक 1, अनुमोदक 1, जमानत ₹0।
- 1974 संशोधन – प्रस्तावक 10, अनुमोदक 10, जमानत ₹2,500।
- 1997 संशोधन – प्रस्तावक 50, अनुमोदक 50, जमानत ₹15,000।
- जमानत राशि RBI/सरकारी खजाने में जमा करनी होती है।
- यदि अभ्यर्थी को आवश्यक मतों का 1/6 हिस्सा भी न मिले → जमानत जब्त।
विवाद व न्यायिक प्रक्रिया
- अनुच्छेद 71: राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति चुनाव विवाद का निपटारा सुप्रीम कोर्ट करेगा।
- निर्णय अंतिम।
- याचिका केवल –
- स्वयं उम्मीदवार, या
- कम से कम 20 निर्वाचकों द्वारा दी जा सकती है।
- शिकायत चुनाव परिणाम के 30 दिन के भीतर होनी चाहिए।
- सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ (5+ न्यायाधीश) सुनवाई करती है।
- चुनाव निरस्त होने पर भी निर्वाचित राष्ट्रपति के कार्य वैध माने जाते हैं।
- 11वाँ संशोधन (1961) – निर्वाचन को निर्वाचक मंडल में किसी रिक्ति के आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जा सकता। (अनुच्छेद 74(4) add) – डॉ. खरे बनाम चुनाव आयोग (1959) द्वारा बाद में किया गया।
राष्ट्रपति निर्वाचन प्रक्रिया की कमियाँ (Defects in the Presidential Election Process)
आम जनता की भागीदारी नहीं होती
- राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष रूप से निर्वाचक मंडल (electoral college) द्वारा होता है।
- इससे जनता की सीधी लोकतांत्रिक भागीदारी नहीं हो पाती, जो राष्ट्रपति के जनाधार को कमजोर करता है।
सत्तारूढ़ दल का वर्चस्व
- संसद और विधानसभाओं में सत्ताधारी दल के बहुमत से राष्ट्रपति चुनाव प्रायः एकतरफा हो जाता है।
- यह निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
राजनीतिक दलों का प्रभाव
- राष्ट्रपति पद के चुनाव में दलगत राजनीति का अत्यधिक हस्तक्षेप होता है।
- आदर्शतः यह पद गैर-राजनीतिक होना चाहिए, परंतु राजनीतिक जोड़-तोड़, समर्थन और समझौते की राजनीति प्रमुख भूमिका निभाती है।
दलीय अनुशासन का दबाव
- निर्वाचक मंडल के सदस्य आमतौर पर अपनी पार्टी की लाइन के अनुसार मतदान करते हैं, जिससे उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है।
मतदान प्रणाली जटिल है
- राष्ट्रपति चुनाव में अनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति और एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) प्रणाली अपनाई जाती है, जो कई बार तकनीकी दृष्टि से जटिल मानी जाती है।
- यह आम नागरिकों के लिए समझना कठिन होता है।
वोटों का मूल्य असमान
- सांसदों और विधायकों के मतों का मूल्य भिन्न होता है, जो ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत के विरोधाभासी है।
- इससे राज्यों के बीच असंतुलन भी उत्पन्न हो सकता है।
स्वतंत्र प्रत्याशियों की संभावना नगण्य
- किसी स्वतंत्र या गैर-दलीय व्यक्ति का राष्ट्रपति बन पाना लगभग असंभव है।
- क्योंकि नामांकन के लिए भी 50 प्रस्तावक और 50 अनुमोदक की आवश्यकता होती है – यह शर्त सिर्फ प्रमुख दलों के उम्मीदवार ही पूरी कर सकते हैं।
बहुमत के अभाव में द्वितीय वरीयता विवादास्पद
- जब कोई प्रत्याशी प्रथम वरीयता में बहुमत नहीं प्राप्त करता, तो द्वितीय वरीयता के आधार पर गणना होती है, जो कई बार विवादास्पद और अपारदर्शी मानी जाती है (जैसे – 1969 का राष्ट्रपति चुनाव)।
मतदान में अनुशासन की बाध्यता नहीं
- राष्ट्रपति चुनाव में व्हिप लागू नहीं होता, जिससे निर्वाचक मंडल के सदस्य दल के विपरीत मतदान कर सकते हैं, जो राजनीतिक अस्थिरता या रणनीति को जन्म दे सकता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
- राष्ट्रपति भारत का संवैधानिक प्रमुख है, अतः उसके निर्वाचन की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए। यद्यपि वर्तमान प्रणाली कुछ हद तक संतुलन बनाने का प्रयास करती है, फिर भी इसमें सुधार की आवश्यकता है।
अनुच्छेद 56: राष्ट्रपति की पदावधि
- राष्ट्रपति की पदावधि 5 वर्ष होती है (पद ग्रहण की तिथि से गिनी जाती है)।
- राष्ट्रपति का पद 5 वर्ष से पूर्व भी रिक्त हो सकता है:
- त्यागपत्र – उपराष्ट्रपति को दिया जाता है, जो तत्काल लोकसभा अध्यक्ष को सूचना देता है।
- मृत्यु
- महाभियोग – अनुच्छेद 61 के तहत “संविधान का उल्लंघन (Violation of Constitution)” करने पर।
- महत्वपूर्ण प्रावधान
- अनुच्छेद 56(1)(a) – पदावधि 5 वर्ष।
- अनुच्छेद 56(1)(b) – संविधान के उल्लंघन पर महाभियोग (प्रक्रिया अनुच्छेद 61 में)।
- अनुच्छेद 56(1)(c)- पदावधि समाप्ति के बाद भी राष्ट्रपति तब तक पद पर रहता है जब तक नया राष्ट्रपति पद ग्रहण नहीं कर ले।
अनुच्छेद 62 : चुनाव संबंधी प्रावधान
- राष्ट्रपति की पदावधि समाप्त होने से पूर्व ही नया चुनाव करा लिया जाता है।
- यदि आकस्मिक रिक्ति (मृत्यु, त्यागपत्र, महाभियोग आदि) हो तो 6 माह के भीतर नया चुनाव होना आवश्यक है।
- नया राष्ट्रपति पूरे 5 वर्ष के लिए चुना जाता है (अमेरिका की तरह शेष अवधि के लिए नहीं)।
अनुच्छेद 65 : कार्यवाहक व्यवस्था
- राष्ट्रपति की अनुपस्थिति, बीमारी या पद रिक्ति की स्थिति में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है।
- यदि उपराष्ट्रपति का पद भी रिक्त हो तो – संविधान मौन है।
अनुच्छेद 70 और राष्ट्रपति (कृत्यों का निर्वहन) अधिनियम, 1969
- संसद को यह शक्ति दी गई कि ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति के कार्य किसके द्वारा संपन्न होंगे।
- अधिनियम 1969 के अनुसार:
- उपराष्ट्रपति
- उपराष्ट्रपति के अभाव में – सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश
- मुख्य न्यायाधीश अनुपलब्ध होने पर – वरिष्ठतम न्यायाधीश
- ऐतिहासिक उदाहरण (1969)
- राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन का निधन (3 मई 1969) → उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरी ने कार्यभार संभाला।
- राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने हेतु वी.वी. गिरी ने त्यागपत्र दिया (20 जुलाई 1969)।
- इसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एन. हिदायतुल्ला ने कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार ग्रहण किया।
- ध्यान दें : संविधान में “कार्यवाहक राष्ट्रपति” शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
अनुच्छेद 57: पुनर्निर्वाचन के लिए पात्रता
- कोई भी व्यक्ति, जो राष्ट्रपति के पद पर है या रहा है, पुनः राष्ट्रपति बनने के लिए पात्र है।
- एकमात्र राष्ट्रपति जो पुनः निर्वाचित हुए वे हैं डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
- अनुच्छेद 57 के तहत यह पुनर्निर्वाचन की पात्रता संविधान के अन्य उपबन्धों के अधीन है।
अनुच्छेद 58: राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अर्हताएं
- राष्ट्रपति पद के लिए पात्रता:
- वह व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए।
- 35 वर्ष या अधिक आयु का होना चाहिए।
- लोकसभा का सदस्य बनने की अर्हता होनी चाहिए।
- लाभ के पद पर रोक: यदि कोई व्यक्ति भारत सरकार, राज्य सरकार, या उनके अधीनस्थ स्थानीय/अन्य प्राधिकरण के लाभ के पद पर है, तो वह राष्ट्रपति बनने के लिए अर्ह नहीं होगा।
- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, अथवा मंत्री (संघ/राज्य) लाभ के पद के अंतर्गत नहीं माने जाएंगे।
- संसद को यह अधिकार प्राप्त है कि वह किसी विशेष पद को “लाभ का पद” घोषित कर सकती है।
- कम से कम 50 निर्वाचकों (इलेक्टोरल कॉलेज के सदस्य) का प्रस्तावक और अन्य 50 निर्वाचकों का समर्थक होना चाहिए।
- आरबीआई (RBI) में 15,000 रुपये की जमानत राशि जमा करानी होगी। (1997 से पहले प्रस्तावकों और समर्थकों की संख्या 10-10 थी और जमानत राशि 2,500 रुपये थी)
- यदि उम्मीदवार चुनाव में डाले गए वोटों का छठा हिस्सा हासिल करने में विफल रहता है तो जमानत राशि जब्त कर ली जाती है।
“लाभ का पद” : परिभाषा व प्रावधान
- संविधान में “लाभ का पद” की परिभाषा स्पष्ट नहीं है।
- इसे परिभाषित करने की जिम्मेदारी संसद को दी गई है।
- इसके लिए संसद सदस्य (निरर्हता निर्धारण) अधिनियम, 1959 बनाया गया।
- जया बच्चन बनाम भारत संघ (2006): लाभ का पद धारण करने के कारण उनकी संसद सदस्यता समाप्त करना उचित ठहराया गया।
- प्रणव मुखर्जी बनाम पी.ए. संगमा (2012): राष्ट्रपति चुनाव को “लाभ का पद” के आधार पर चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनौती खारिज कर दी और चुनाव वैध ठहराया।
अनुच्छेद 59: राष्ट्रपति के पद की शर्तें
- सदस्यता से संबंधित शर्तें
- राष्ट्रपति संसद या किसी राज्य विधानमण्डल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं हो सकता।
- यदि कोई सांसद या विधायक राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है, तो उसके राष्ट्रपति पद ग्रहण करने की तिथि से उसकी सदस्यता स्वतः रिक्त मानी जाएगी।
- अन्य पद पर रोक
- राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में कोई अन्य पद या लाभ का पद (Office of Profit) नहीं ले सकता।
- वेतन और भत्ते
- राष्ट्रपति का वेतन और भत्ते संसद द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
- जब तक संसद द्वारा विधि न बनाई जाए, तब तक दूसरी अनुसूची में दिए गए भत्ते लागू होंगे।
- पद पर रहते हुए उसके वेतन में हानिकारक परिवर्तन (Alabhkari Parivartan) नहीं किया जा सकता।
- राष्ट्रपति को निम्न सुविधाएँ प्राप्त होंगी:
- बिना किराया दिए शासकीय निवास का उपयोग।
- उपलब्धियाँ, भत्ते, विशेषाधिकार — जिन्हें संसद विधि द्वारा निर्धारित करती है।
- 2018 के बजट के अनुसार राष्ट्रपति का वेतन ₹5 लाख प्रति माह है। – आयकर से मुक्त
- राष्ट्रपति के वेतन और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किए जा सकते।
- पेंशन और सुविधाएँ
- सेवानिवृत्ति के बाद राष्ट्रपति को वेतन का 50% पेंशन के रूप में मिलता है।
- वेतन, भत्ते और पेंशन का व्यय भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से होता है।
- राष्ट्रपति पेंशन और अन्य सुविधाओं का अधिकार तभी पाएगा जब—
- उसने अपना कार्यकाल पूरा किया हो, या
- स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया हो।
- यदि राष्ट्रपति को महाभियोग (Impeachment) द्वारा हटाया जाता है, तो उसे पेंशन और सुविधाएँ नहीं मिलेंगी।
- पेंशन और सुविधाएँ
अनुच्छेद 60: राष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
- राष्ट्रपति पद की शपथ सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिलाई जाती है।
- यदि मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थित हों, तो शपथ सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा दिलाई जाती है।
- राष्ट्रपति शपथ में यह वचन देता है कि वह :
- संविधान का परिरक्षण (Preserve) करेगा।
- संविधान का संरक्षण (Protect) करेगा।
- संविधान का प्रतिरक्षण (Defend) करेगा।
- जनता की सेवा और कल्याण के लिए कार्य करेगा।
- राष्ट्रपति केवल पद की शपथ लेता है।
- मंत्रियों की तरह गोपनीयता की शपथ राष्ट्रपति को नहीं दिलाई जाती।
- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यपाल की शपथ का उल्लेख अनुच्छेद 60, 69 और 159 में है,
- यह प्रावधान तीसरी अनुसूची में नहीं है।
हटाने का प्रावधान (Removal by Resolution/Address)
- कुछ पदाधिकारी संकल्प (Resolution) द्वारा हटाए जा सकते हैं, जैसे:
- राष्ट्रपति,
- उपराष्ट्रपति,
- लोकसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष,
- राज्यसभा उपसभापति,
- विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष,
- विधानपरिषद् सभापति व उपसभापति।
- अन्य उच्च पदों के लिए विशेष प्रक्रिया (Address by Parliament) होती है:
- सर्वोच्च व उच्च न्यायालय के न्यायाधीश,
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG),
- भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त,
- राज्य निर्वाचन आयुक्त।
- इन पदों से हटाने के लिए :
- संसद के प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत की आवश्यकता होती है।
- साथ ही, उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 बहुमत द्वारा समर्थित (Supported) समावेदन (Address) के पश्चात्
- यह प्रस्ताव उसी सत्र में राष्ट्रपति के समक्ष रखा जाता है और राष्ट्रपति के आदेश द्वारा हटाया जाता है।
- इन पदों से हटाने के लिए :
अनुच्छेद 61: राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया
- महाभियोग का आधार:
- यदि राष्ट्रपति संविधान का अतिक्रमण करता है, तो संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
- संसद का कोई भी सदन राष्ट्रपति पर आरोप लगाकर संकल्प (Resolution) प्रस्तावित कर सकता है।
- महाभियोग प्रस्ताव लाने की पूर्व शर्तें:
- प्रस्ताव लाने से कम से कम 14 दिन पूर्व लिखित सूचना दी जानी चाहिए।
- उस प्रस्ताव पर संसद के उस सदन के कम से कम 1/4 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
- प्रस्ताव तभी पारित माना जाएगा जब 2/3 सदस्यीय बहुमत से पारित हो।
- दूसरे सदन की भूमिका:
- आरोप लगने के बाद दूसरा सदन स्वयं जाँच करता है या किसी न्यायालय/अधिकरण/निकाय को नियुक्त करता है।
- राष्ट्रपति को जांच में उपस्थित होने और अपना पक्ष रखने का अधिकार होगा।
- राष्ट्रपति का अधिकार
- राष्ट्रपति स्वयं उपस्थित होकर या प्रतिनिधि द्वारा अपना पक्ष रख सकता है।
- महाभियोग सिद्ध होने की स्थिति:
- यदि जांच के बाद दूसरा सदन यह संकल्प पारित करता है कि आरोप सिद्ध हो गया है, और यह संकल्प 2/3 बहुमत से पारित होता है, तो राष्ट्रपति को पद से हटाया जाएगा, और यह प्रभाव उस संकल्प के पारित होते ही होगा।
- इस प्रकार महाभियोग संसद की एक अर्द्ध-न्यायिक प्रक्रिया है।
- महाभियोग प्रक्रिया में केवल संसद (लोकसभा और राज्यसभा दोनों) के सदस्य (निर्वाचित एवं मनोनीत) भाग लेते हैं
- राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य और दिल्ली व पुदुचेरी की विधानसभाओं के सदस्य, जिन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में भाग लिया था, महाभियोग प्रक्रिया में भाग नहीं लेते।
- संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है।
- प्रक्रिया के दौरान राष्ट्रपति के सभी कार्य वैध माने जाते हैं।
- आज तक किसी भी राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हुआ।
- महाभियोग के बाद हटाए गए राष्ट्रपति को पेंशन/सुविधा नहीं मिलती। तथा पुनः निर्वाचित हो सकते हैं या नहीं – इस पर संविधान मौन है।
संबंधित अनुच्छेद →
- अनु. 56(1)(b) → महाभियोग का उल्लेख
- अनु. 61 → महाभियोग की प्रक्रिया
- अनु. 361 → जाँच प्रक्रिया से संबंधित उपबंध
अमेरिका में राष्ट्रपति का महाभियोग (Impeachment of US President)
- महाभियोग लाने का आधार
- राजद्रोह (Treason)
- रिश्वत (Bribery)
- अन्य बड़ा अपराध (High Crimes)
- दुराचार / यौन उत्पीड़न जैसे आरोप (Misdemeanors)
- महाभियोग की प्रक्रिया
- प्रतिनिधि सभा (House of Representatives)
- महाभियोग प्रस्ताव हमेशा यहीं से शुरू होता है।
- प्रस्ताव पारित करने के लिए कुल सदस्य संख्या का साधारण बहुमत आवश्यक है।
- सीनेट (Senate)
- प्रस्ताव प्रतिनिधि सभा से पारित होने के बाद सीनेट को भेजा जाता है।
- सीनेट में सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) अध्यक्षता करते हैं।
- यदि सीनेट अपनी कुल सदस्य संख्या के 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित करती है → राष्ट्रपति पद से हटाया जाता है।
- महत्वपूर्ण तथ्य
- अब तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा पद से नहीं हटाया गया है।
- महाभियोग की प्रक्रिया में संसद न्यायिक स्वरूप प्राप्त कर लेती है, इसलिए इसे अर्द्ध-न्यायिक प्रक्रिया (Quasi-judicial Process) कहा जाता है।
राष्ट्रपति को प्राप्त विशेषाधिकार (Article 361)
- विशेषाधिकार का स्वरूप
- राष्ट्रपति और राज्यपाल को अनुच्छेद 361 के तहत विशेषाधिकार व उन्मुक्तियाँ प्राप्त हैं।
- यह विधि के समक्ष समानता (Article 14) का अपवाद है।
- विशेषाधिकार (Privileges)
- राष्ट्रपति अपने पद पर रहते हुए किए गए कार्यों के लिए किसी न्यायालय में उत्तरदायी नहीं ठहराए जा सकते।
- उनकी पदावधि के दौरान गिरफ्तारी या कारावास का आदेश किसी न्यायालय द्वारा नहीं दिया जा सकता।
- राष्ट्रपति के विरुद्ध उनकी पदावधि के दौरान कोई आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं की जा सकती।
- सिविल कार्यवाही तभी प्रारंभ होगी जब –
- राष्ट्रपति को दो माह पूर्व सूचना दी गई हो।
- महत्वपूर्ण तथ्य
- ये विशेषाधिकार राज्यपाल को भी प्राप्त हैं।
- लेकिन उपराज्यपाल को यह विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है।
- ऐतिहासिक तथ्य
- अंतरिम राष्ट्रपति –
- अनुच्छेद 380 में अंतरिम राष्ट्रपति का प्रावधान था।
- 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा (जो अंतरिम संसद के रूप में कार्य कर रही थी) ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारत का अंतरिम राष्ट्रपति चुना।
- पहला राष्ट्रपति चुनाव –
- 13 मई 1952 को हुआ।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पहले निर्वाचित राष्ट्रपति बने।
- विशेष उपलब्धि –
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एकमात्र व्यक्ति हैं जो दो बार राष्ट्रपति बने।
- उनका कार्यकाल लगभग 12 वर्ष रहा (भारत के राष्ट्रपति के रूप में सबसे लंबा)।
- अंतरिम राष्ट्रपति –
अनुच्छेद 62: राष्ट्रपति पद की रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन
- राष्ट्रपति की पदावधि समाप्त होने से पहले ही नए राष्ट्रपति का चुनाव संपन्न कर लिया जाएगा।
- यदि किसी कारण (मृत्यु, त्यागपत्र, महाभियोग आदि) से राष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाता है, तो रिक्ति की तारीख से 6 माह के भीतर चुनाव कराया जाएगा।
- निर्वाचित व्यक्ति, अपने कार्यभार ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष की अवधि तक राष्ट्रपति पद पर रहेगा (अनुच्छेद 56 के अधीन)।
अनुच्छेद 72: राष्ट्रपति की क्षमा संबंधी शक्तियाँ
- क्षमा देने और दंड में बदलाव की शक्ति: राष्ट्रपति को निम्नलिखित मामलों में दोष सिद्ध व्यक्ति के दंड को क्षमा, स्थगन (suspension), परिहार (remission) या लघुकरण (commutation) करने का अधिकार है:
- सेना न्यायालय द्वारा दिए गए दंडों में,
- संघ सरकार के विषय से संबंधित अपराधों में,
- मृत्युदंड के मामलों में।
- यह अनुच्छेद सेना के अधिकारियों द्वारा दंड के विरुद्ध विधिक प्रक्रिया के अधिकार को प्रभावित नहीं करता।
- राज्यपाल को भी मृत्यु दंड को निलंबित, परिवर्तित या क्षमा करने की शक्ति होती है, और यह अनुच्छेद उस पर प्रभाव नहीं डालता।
- राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति न्यायपालिका से स्वतंत्र है; यह एक कार्यकारी शक्ति है।
- राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग करते समय अपील न्यायालय के रूप में नहीं बैठते हैं।
- वह केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर ही इस शक्ति का प्रयोग कर सकता हैं।
- राष्ट्रपति द्वारा शक्ति के प्रयोग के लिए सर्वोच्च न्यायालय को विशिष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
- दया याचिका दोबारा दाखिल नहीं की जा सकती (एक बार खारिज होने पर)।
- क्षमादान याचिका पर निर्णय के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है।
- क्षमादान की प्रक्रिया सामान्यतः गृह मंत्रालय के अधीन होती है।
- केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989)
- क्षमादान शक्ति संवैधानिक है।
- अपराधी को राष्ट्रपति के समक्ष मौखिक सुनवाई का अधिकार नहीं है।
- यह विवेकाधीन शक्ति है लेकिन मंत्रिपरिषद की सलाह पर आधारित होगी।
- मरू राम बनाम भारत संघ (1980)
- राष्ट्रपति की शक्ति न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के अधीन है।
- शक्ति का प्रयोग मनमाना या दुर्भावनापूर्ण (Mala Fide) नहीं होना चाहिए।
- श्री हरण उर्फ़ मुरुगन बनाम भारत संघ (2001)
- दया याचिका पर अनावश्यक विलम्ब, अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है।
- इपुरु सुधाकर बनाम आंध्र प्रदेश (2006)
- यदि क्षमादान जाति, धर्म या राजनीति से प्रेरित है → न्यायिक समीक्षा संभव है।
राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति
- क्षमा – इसमें दण्ड और बंदीकरण दोनों को हटा दिया जाता है तथा दोषी की सभी दण्ड, दण्डादेशों और निर्रहताओं से पूर्णतः मुक्त कर दिया जाता है।
- लघुकरण – इसका अर्थ है कि दंड के स्वरूप को बदलकर कम करना। उदाहरणार्थ मृत्युदंड का लघुकरण कर कठोर कारावास में परिवर्तित करना,जिसे साधारण कारावास में परिवर्तित किया जा सकता है।
- परिहार – इसका अर्थ है, दंड की प्रकृति में परिवर्तन किए बिना उसकी अवधि कम करना। उदाहरण के लिए दो वर्ष के कठोर कारावास को एक वर्ष के कठोर कारावास में परिहार करना।
- विराम – इसका अर्थ है किसी दोषी को मूल रूप में दी गई सजा को किन्हीं विशेष परिस्थिति में कम करना, जैसे-शारीरिक अपंगता अथवा महिलाओं को गर्भावस्था की अवधि के कारण
- प्रविलंबन – इसका अर्थ है किसी दंड (विशेषकर मृत्यु दंड) पर अस्थायी रोक लगाना। इसका उद्देश्य है कि दोषी व्यक्ति को क्षमा याचना अथवा दंड के स्वरूप परिवर्तन की याचना के लिए समय देना।
क्षमादान के मामले में राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की तुलनात्मक शक्तियां
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क्र.सं. 155095_b05946-b1> |
राष्ट्रपति 155095_f392cb-38> |
राज्यपाल 155095_9dfd41-dd> |
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उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति पर विभिन्न मामलों में निम्नलिखित सिद्धांत स्थापित किए हैं:
- मौखिक सुनवाई का अधिकार नहीं: दया की याचना करने वाले व्यक्ति को राष्ट्रपति से मौखिक सुनवाई का अधिकार नहीं है।
- साक्ष्य का पुनः अध्ययन: राष्ट्रपति प्रमाणी (साक्ष्य) का पुनः अध्ययन कर सकता है, और उसका विचार न्यायालय से भिन्न हो सकता है।
- मंत्रिमंडल का परामर्श: राष्ट्रपति अपनी क्षमादान शक्ति का प्रयोग केंद्रीय मंत्रिमंडल के परामर्श पर करेगा।
- कारण बताने की आवश्यकता नहीं: राष्ट्रपति अपने आदेश के कारण बताने के लिए बाध्य नहीं है।
- दंड और प्रमाणिक भूल पर राहत: राष्ट्रपति न केवल दंड पर राहत दे सकता है, बल्कि प्रमाणिक भूल के लिए भी राहत दे सकता है।
- न्यायालय के दिशा-निर्देशों की आवश्यकता नहीं: राष्ट्रपति को अपनी शक्ति का प्रयोग करने के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा कोई दिशा-निर्देश निर्धारित करने की आवश्यकता नहीं है।
- न्यायिक समीक्षा की सीमा: राष्ट्रपति की इस शक्ति पर न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती, सिवाय वहां जहां राष्ट्रपति का निर्णय स्वेच्छाचारी, विवेकरहित, दुर्भावना या भेदभावपूर्ण हो।
- पुनः याचिका दायर नहीं की जा सकती: जब राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान की पूर्व याचिका रद्द कर दी जाती है, तो उस पर दूसरी याचिका दायर नहीं की जा सकती।
राष्ट्रपति की शक्तियां व कर्तव्य
राष्ट्रपति द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियां व किए जाने वाले कार्य निम्नलिखित हैं:
- कार्यकारी शक्तियां
- विधायी शक्तियां
- वित्तीय शक्तियां
- न्यायिक शक्तियां
- कूटनीतिक शक्तियां
- सैन्य शक्तियां
- आपातकालीन शक्तियां
1. कार्यकारी शक्तियाँ (Executive Powers)
1. कार्यपालिका शक्ति का स्वरूप
- अनु. 53 – संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है।
- राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग –
- स्वयं कर सकता है या
- अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से कर सकता है।
- राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग –
- अनु. 74 – प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रीपरिषद राष्ट्रपति को कार्यों में सलाह देती है।
- 42वाँ संशोधन (1976) – राष्ट्रपति मंत्रीपरिषद की सलाह मानने को बाध्य।
- 44वाँ संशोधन (1978) – राष्ट्रपति एक बार पुनर्विचार हेतु सलाह लौटा सकता है; लेकिन यदि वही सलाह दुबारा दी जाए तो मानना अनिवार्य है।
- अनु. 160 – आकस्मिक या असाधारण परिस्थितियों में राज्यपाल के कृत्यों के निर्वहन हेतु उपबंध कर सकता है।
- शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) – राष्ट्रपति व राज्यपाल संसदीय शासन में नाममात्र प्रमुख हैं। निर्णय दिया गया कि राष्ट्रपति को मंत्रीपरिषद की सलाह पर ही कार्य करना चाहिए।
- डॉ. अंबेडकर: “राष्ट्रपति का स्थान वही है जो ब्रिटिश सम्राट का है — वह राष्ट्र का प्रधान है, शासन का नहीं।”
2. मंत्रिपरिषद गठन व कार्य
- अनु. 75(1) – प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
- अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर करता है।
- लोकसभा में बहुमत दल/गठबंधन के नेता को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नियुक्त करता है (संवैधानिक प्रावधान नहीं, परंपरा है)।
- हरशरण वर्मा बनाम चौधरी चरणसिंह (1984) – प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति का स्वविवेक।
- यू.एन. राव बनाम इंदिरा गांधी (1971) – लोकसभा भंग होने पर भी राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता है।
- मंत्रियों को विभाग बाँटना प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है।
- अनु. 77 – राष्ट्रपति कार्य आवंटन के नियम बनाता है।
- अनु. 75(2) – मंत्री राष्ट्रपति के “प्रसाद पर्यन्त” पद पर रहते हैं (वास्तव में राष्ट्रपति मंत्रीपरिषद की सलाह पर कार्य करता है)।
- अनु. 75(3) – मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है।
- अनु. 75(4) – राष्ट्रपति मंत्रियों को पद व गोपनीयता की शपथ दिलाता है।
- मंत्री अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को देते हैं।
- भारत सरकार की सभी कार्यपालिका कार्रवाई राष्ट्रपति के नाम से होती है [अनु. 77(1)]।
- राष्ट्रपति ने कार्य आवंटन नियम, 1961 बनाए।
3. नियुक्ति की शक्तियाँ (Appointments)
- राष्ट्रपति निम्न प्रमुख पदों पर नियुक्तियाँ करता है – राष्ट्रपति के अधिपत्र अर्थात् वारंट द्वारा
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश [अनु. 124]
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक [अनु. 148]
- राज्यपाल [अनु. 155] व विशेष स्थिति में [अनु. 160]
- उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश [अनु. 217]
- संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासक / उपराज्यपाल [अनु. 239]
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष/सदस्य
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष/सदस्य
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष/सदस्य
- UPSC और संयुक्त आयोग के अध्यक्ष/सदस्य [अनु. 316]
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त व अन्य निर्वाचन आयुक्त [अनु. 324]
- राष्ट्रीय आयोगों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व सदस्य –
- अनुसूचित जाति [अनु. 338]
- अनुसूचित जनजाति [अनु. 338A]
- पिछड़ा वर्ग आयोग [अनु. 338B, 102वाँ संशोधन]
- नोट : ये सभी नियुक्तियाँ राष्ट्रपति मंत्रीपरिषद की सलाह पर करता है, अपनी स्वतंत्र इच्छा से नहीं।
मुख्यमंत्री की नियुक्ति (विशेष प्रावधान):
- दिल्ली – संविधान के अनुच्छेद 239AA (5) के अंतर्गत दिल्ली के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- पुड्डुचेरी – यहाँ मुख्यमंत्री की नियुक्ति संघ राज्य क्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 की धारा 45 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। यह अधिनियम संसद ने अनुच्छेद 239A के तहत पारित किया था।
- जम्मू और कश्मीर (31 अक्टूबर 2019 से संघ राज्य क्षेत्र) – यहाँ मुख्यमंत्री की नियुक्ति का प्रावधान उप-राज्यपाल द्वारा किया गया है।
- इस प्रकार दिल्ली और पुड्डुचेरी में नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति के पास है, जबकि जम्मू-कश्मीर में यह कार्य उप-राज्यपाल करते हैं।
4. आयोगों व परिषदों का गठन
- अंतर्राज्य परिषद (अनु. 263)
- वित्त आयोग (हर 5 वर्ष पर) [अनु. 280]
- अनुसूचित क्षेत्र/जनजातियों के प्रशासन हेतु आयोग [अनु. 339(1)]
- पिछड़ा वर्ग आयोग [अनु. 340] (काका कालेलकर आयोग 1953, मंडल आयोग 1978, रोहिणी आयोग 2017)
- राजभाषा आयोग [अनु. 344(1)]
- भाषाई अल्पसंख्यक के विशेष अधिकारी [अनु. 350B]
5. पद से हटाने की शक्ति
- राष्ट्रपति द्वारा संसद के समर्थन से हटाए जा सकने वाले संवैधानिक पदाधिकारी:
- यदि संसद के दोनों सदन विशेष प्रक्रिया से कदाचार या असमर्थता के आधार पर समावेदन (address) प्रस्तुत करें, तो राष्ट्रपति निम्नलिखित को पद से हटा सकता है:
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश – अनु. 124(4)
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) – अनु. 148(1)
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीश – अनु. 217
- राज्य निर्वाचन आयुक्त – अनु. 243K(2)
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त – अनु. 324 (अन्य निर्वाचन आयुक्त मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर हटाए जा सकते हैं)
- यदि संसद के दोनों सदन विशेष प्रक्रिया से कदाचार या असमर्थता के आधार पर समावेदन (address) प्रस्तुत करें, तो राष्ट्रपति निम्नलिखित को पद से हटा सकता है:
- राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट पर हटाए जाने वाले पदाधिकारी:
- उच्चतम न्यायालय द्वारा जाँच व रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रपति निम्नलिखित को हटा सकता है:
- संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष/सदस्य – अनु. 317
- संयुक्त लोक सेवा आयोग (यदि गठित हो) – अनु. 317
- राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष/सदस्य – अनु. 317 (निलंबन का अधिकार राज्यपाल के पास)
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष/सदस्य
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष/सदस्य
- उच्चतम न्यायालय द्वारा जाँच व रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रपति निम्नलिखित को हटा सकता है:
6. राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त (Pleasure) पद
- केंद्रीय मंत्री [अनु. 75(2)]
- भारत का महान्यायवादी [अनु. 76]
- राज्यपाल [अनु. 156]
- उपराज्यपाल/प्रशासक (केंद्र शासित प्रदेशों में)
- दिल्ली व पुडुचेरी के मुख्यमंत्री व मंत्री (अनु. 239AA, 1963 अधिनियम)
- रक्षा व सिविल सेवाओं के सदस्य [अनु. 310(1)]
7. अन्य शक्तियाँ
- संघ राज्य क्षेत्रों का प्रशासन [अनु. 239]।
- दिल्ली विधानसभा निलंबन (अनु. 239AB)।
- किसी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित करना (5वीं व 6वीं अनुसूची)।
- भाषा को राज्य में आधिकारिक मान्यता देने का निर्देश [अनु. 347]।
राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियाँ (Discretionary Powers):
- हालांकि सामान्यतः राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है, लेकिन निम्नलिखित परिस्थितियों में वह विवेक का प्रयोग कर सकता है:
1. प्रधानमंत्री की नियुक्ति से जुड़ी शक्तियाँ
- स्पष्ट बहुमत मिलने पर – राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
- खण्डित जनादेश मिलने पर – राष्ट्रपति किसी ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता है, जिसे उसकी राय में लोकसभा में विश्वास मत मिल सकता हो।
- प्रधानमंत्री का आकस्मिक निधन होने पर – राष्ट्रपति ruling पार्टी के ऐसे सदस्य को प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता है जिसे अभी पार्टी ने आधिकारिक रूप से नेता नहीं चुना हो।
- उदाहरण: इन्दिरा गांधी की मृत्यु (1984) के बाद राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री नियुक्त किया।
2. लोकसभा के विघटन से जुड़ी शक्तियाँ
- सामान्यत: राष्ट्रपति, मंत्रीपरिषद की सलाह पर लोकसभा भंग करता है।
- लेकिन यदि –
- सरकार लोकसभा में बहुमत खो दे
- या उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाये
- और फिर भी मंत्रीपरिषद लोकसभा भंग करने की सलाह दे, तो राष्ट्रपति अपने विवेक से निर्णय ले सकता है।
3. सरकार बर्खास्त करने की शक्ति
- यदि मंत्रीपरिषद लोकसभा में विश्वास खो दे, लेकिन त्यागपत्र न दे, तो राष्ट्रपति विवेक से सरकार को बर्खास्त कर सकता है।
- नोट: राष्ट्रपति की ये विवेकाधीन शक्तियाँ संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं हैं, बल्कि परंपरा और संवैधानिक व्यवहार से विकसित हुई हैं।
राष्ट्रपति की नियम व विनियम बनाने की शक्तियाँ
(A)नियम बनाने की शक्तियाँ
- कार्य आवंटन हेतु नियम –
- राष्ट्रपति, भारत सरकार के कार्यों को अधिक सुविधाजनक बनाने हेतु मंत्रियों में कार्यों का विभाजन करने के लिए नियम बना सकता है। – अनुच्छेद 77(3)
- संसद की संयुक्त बैठक से संबंधित नियम
- राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के अध्यक्ष से परामर्श के बाद, दोनों सदनों की संयुक्त बैठक और उनके बीच परस्पर संचार की प्रक्रिया से संबंधित नियम बना सकता है। – अनुच्छेद 118(3)
- दोहरी सदस्यता की स्थिति –
- यदि कोई व्यक्ति संसद और राज्य विधानमंडल दोनों का सदस्य चुना जाता है, तो उसकी सदस्यता की रिक्ति से संबंधित नियम राष्ट्रपति बना सकता है। – अनुच्छेद 101(2)
(B) विनियम बनाने की शक्तियाँ
- राष्ट्रपति निम्न संघ-राज्य क्षेत्रों की शांति, प्रगति और सुशासन के लिए विनियम बना सकता है –
- अण्डमान और निकोबार द्वीप – अनु. 240(1)(a)
- लक्षद्वीप – अनु. 240(1)(b)
- दादरा और नगर हवेली व दमन और दीव – अनु. 240(1)(c)
- पुडुचेरी – अनु. 240(1)(d)
2. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)
- सत्र बुलाने, सत्रावसान और लोकसभा भंग करने की शक्ति (अनु. 85)
- संसद को विधेयकों व विषयों पर संदेश भेज सकता है और सदनों में बोलने का अधिकार (अनु. 86)
- लोकसभा चुनाव के बाद पहले सत्र की शुरुआत में तथा हर वर्ष पहले सत्र की शुरुआत में दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में विशेष अभिभाषण देते हैं (अनु. 87)
- लोकसभा में सबसे वरिष्ठ सदस्य को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करते हैं। (अनु. 95(1))
- अनु. 240 – विनियम बनाने की शक्ति – संघ राज्य क्षेत्रों (UTs) के लिए नियम/विनियम।
- अनु. 372 क – अनुकूलन शक्ति – विधियों का संविधान के अनुरूप अनुकूलन।
- अनु. 373, 392 – संक्रमणकालीन शक्तियाँ – संविधान लागू होने के प्रारंभिक दौर की शक्तियाँ।
- संसदीय गतिरोध की स्थिति में संयुक्त बैठक बुलाने की शक्ति (अनु. 108)
- यदि साधारण विधेयक पर दोनों सदनों में मतभेद हो, तो संयुक्त बैठक बुला सकते हैं (अनु. 108)
- संविधान संशोधन विधेयकों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति अनिवार्य होती है। राष्ट्रपति उन्हें अस्वीकार नहीं कर सकते
- धन विधेयक केवल राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही संसद में प्रस्तुत किया जा सकता है (अनु. 110)
- किसी राज्य की सीमा, नाम या क्षेत्र में परिवर्तन से संबंधित विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही संसद में प्रस्तुत किया जा सकता है
- विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के प्रतिवेदन संसद में प्रस्तुत करवाता है।
- संसद सत्र में न हो तो आपात स्थिति में अध्यादेश जारी कर सकते हैं (अनु. 123) (प्रथम सत्र आरंभ के 6 सप्ताह के भीतर अनुमोदन आवश्यक)।
- संसद सदस्यों की निरर्हता पर निर्णय लेता है (चुनाव आयोग से परामर्श के बाद)।
- केंद्रशासित क्षेत्रों हेतु विनियम व नियम बना सकता है।
- अनुच्छेद 255 : राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति
- राष्ट्रपति की सिफारिश या पूर्व मंजूरी लेना केवल प्रक्रियागत विषय (Procedural Matter) है।
- यदि किसी अधिनियम में राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति/सिफारिश नहीं ली गई है तो भी वह अवैध (Invalid) नहीं माना जाएगा।
- राष्ट्रपति संसद में विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के प्रतिवेदन प्रस्तुत करवाता है –
- भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का प्रतिवेदन (अनु. 151)।
- वित्त आयोग की सिफारिशें और उन पर सरकार का ज्ञापन (अनु. 281)।
- संघ लोकसेवा आयोग का प्रतिवेदन और अस्वीकृति के कारण (अनु. 323(1))।
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का प्रतिवेदन (अनु. 338(6))।
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का प्रतिवेदन (अनु. 338A(6))।
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का प्रतिवेदन (अनु. 338B – 102वाँ संशोधन, 2018)।
- भाषायी अल्पसंख्यक आयुक्त का प्रतिवेदन (अनु. 350B)।
- राजभाषा आयोग एवं संसदीय समिति का प्रतिवेदन।
अनुच्छेद 123 : राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति
- विशेषताएँ
- राष्ट्रपति संसद के दोनों सदन सत्र में न होने पर अध्यादेश जारी कर सकता है।
- अध्यादेश की शक्ति केवल उन्हीं विषयों पर है, जिन पर संसद कानून बना सकती है।
- संसद पुनः आहूत होने के बाद 6 सप्ताह में अनुमोदन आवश्यक, अन्यथा अध्यादेश स्वतः समाप्त।
- अधिकतम अवधि = 6 माह + 6 सप्ताह।
- अध्यादेश का बल और प्रभाव = संसद के अधिनियम जैसा।
2. न्यायिक दृष्टिकोण
- आर.सी. कूपर्स बनाम भारत संघ (1970) → अध्यादेश की वैधता को चुनौती दी जा सकती है कि वास्तव में “तत्काल आवश्यकता” थी या नहीं।
- ए.के. राय बनाम भारत संघ → अध्यादेश न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं।
- 38वाँ संशोधन (1975) → न्यायिक हस्तक्षेप समाप्त किया गया।
- 44वाँ संशोधन (1978) → न्यायिक समीक्षा पुनः बहाल।
- डी.सी. बधवा बनाम बिहार राज्य (1988) → बार-बार अध्यादेश जारी करना संसदीय लोकतंत्र के साथ धोखाधड़ी।
3. सीमाएँ
- अध्यादेश द्वारा संविधान संशोधन नहीं हो सकता।
- अध्यादेश भी “विधि” है (अनु. 13(3)), इसलिए यदि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे तो न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
- राष्ट्रपति अध्यादेश को भूतलक्षी (Retrospective Effect) से लागू कर सकता है।
4. विशेष बिंदु
- आपातकाल (अनु. 352 या 356) के दौरान राष्ट्रपति राज्य सूची (State List) विषयों पर भी अध्यादेश जारी कर सकता है।
- दिल्ली और पुडुचेरी के उपराज्यपाल राष्ट्रपति के निर्देश पर अध्यादेश जारी कर सकते हैं।
- जम्मू-कश्मीर UT में उपराज्यपाल को इसके लिए राष्ट्रपति की अनुमति की आवश्यकता नहीं।
5. दुरुपयोग के उदाहरण
- कई बार सरकारें संसद में बहुमत न होने पर विधेयक पारित कराने के बजाय अध्यादेश का सहारा लेती हैं।
- उदाहरण: भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, 2014 (मोदी सरकार) → राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण अध्यादेश का प्रयोग।
3. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers)
- प्रत्येक वित्तीय वर्ष की शुरुआत में राष्ट्रपति की ओर से ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ (Annual Financial Statement) संसद में प्रस्तुत किया जाता है। (अनुच्छेद 112)
- जब आवश्यक हो, राष्ट्रपति संसद के समक्ष अनुपूरक (Supplementary), अतिरिक्त (Additional) या अधिक अनुदान (Excess Grants) से संबंधित विवरण प्रस्तुत करवाता है। (अनुच्छेद 115)
- राष्ट्रपति महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा तैयार की गई वार्षिक रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों के समक्ष प्रस्तुत करवाता है।
- धन विधेयक (Money Bill) अथवा बजट में अनुदान की माँगें राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही संसद में प्रस्तुत की जाती हैं।
- केंद्र सरकार की आकस्मिक निधि (₹500 करोड़ की राशि) राष्ट्रपति के नियंत्रण में होती है।
- केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व के वितरण के लिए, राष्ट्रपति हर 5 वर्ष में एक बार वित्त आयोग का गठन करता है। (अनुच्छेद 280)
4. न्यायिक शक्तियाँ (Judicial Powers)
- जब राष्ट्रपति को ऐसा कोई कानूनी या तथ्यात्मक प्रश्न प्रतीत हो जो सार्वजनिक महत्त्व का हो, तो वह उच्चतम न्यायालय से परामर्श ले सकता है। न्यायालय राय देने के लिए बाध्य नहीं है। [अनुच्छेद 143(1)]
- क्षमादान, राहत, माफी, दंड में परिवर्तन आदि दे सकता है (अनुच्छेद 72)
- सैन्य अदालतों द्वारा दिए गए दंड में।
- केंद्र सरकार के कानूनों के उल्लंघन में।
- मृत्युदंड में।
नोट : न्यायाधीशों की नियुक्ति और पद से हटाना राष्ट्रपति की न्यायिक शक्ति नहीं, बल्कि कार्यपालिका शक्ति (Executive Power) है। न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण और पदच्युति कार्यपालिका की प्रक्रिया का हिस्सा होती है, न्यायिक कार्य नहीं।
5. कूटनीतिक शक्तियाँ (Diplomatic Powers)
- सभी अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ और समझौते उसके नाम पर होते हैं (संसद की स्वीकृति आवश्यक)।
- भारत में नियुक्त किए गए विदेशी राजदूतों एवं उच्चायुक्तों को राष्ट्रपति मान्यता प्रदान करता है।
- वह भारत की ओर से अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व करता है।
- राजदूतों/उच्चायुक्तों को नियुक्त करता है एवं विदेश से आए कूटनीतिज्ञों का स्वागत करता है।
6. सैन्य शक्तियाँ (Military Powers)
- वह सशस्त्र बलों का सर्वोच्च सेनापति होता है।
- थल, जल व वायु सेना के प्रमुखों की नियुक्ति करता है।
- युद्ध की घोषणा अथवा समाप्ति की घोषणा करता है (संसद की अनुमति से)।
7. आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency Powers)
- राष्ट्रपति को तीन प्रकार की आपातकालीन शक्तियाँ प्राप्त हैं:
- राष्ट्रीय आपातकाल – अनुच्छेद 352
- राष्ट्रपति शासन – अनुच्छेद 356 और 365
- वित्तीय आपातकाल – अनुच्छेद 360
1. राष्ट्रीय आपातकाल – अनुच्छेद 352
घोषणा के आधार
- राष्ट्रपति, युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की संभावना या वास्तविक स्थिति में राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर सकता है।
- 44वाँ संविधान संशोधन (1978) द्वारा “आंतरिक अशांति” को हटाकर “सशस्त्र विद्रोह” जोड़ा गया क्योंकि इसके वस्तुनिष्ठ प्रमाण हो सकते हैं।
राष्ट्रीय आपात के प्रकार
- बाह्य आपातकाल – युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर।
- आंतरिक आपातकाल – सशस्त्र विद्रोह के आधार पर।
घोषणा की प्रक्रिया
- आपातकाल अब केवल मंत्रिपरिषद की लिखित सिफारिश पर ही घोषित किया जा सकता है (44वाँ संशोधन, 1978)।
- 38वें संशोधन (1975) द्वारा आपातकाल को न्यायिक पुनरवलोकन से बाहर किया गया था, लेकिन 44वें संशोधन से यह फिर से न्यायिक समीक्षा के अधीन आ गया।
संसदीय अनुमोदन व समयावधि
- आपातकाल की उद्घोषणा बिना संसद की मंजूरी केवल 1 माह (पहले 2 माह) तक रहती है।
- आगे जारी रखने के लिए – संसद के विशेष बहुमत से अनुमोदन आवश्यक।
- एक बार अनुमोदन मिलने पर 6 माह तक आपातकाल प्रभावी रहता है।
- हर 6 माह में पुनः अनुमोदन आवश्यक है – अधिकतम समयसीमा निर्धारित नहीं है।
- यदि लोकसभा भंग हो, तो राज्यसभा अनुमोदन दे सकती है।
- नई लोकसभा के गठन के 30 दिन के भीतर उसकी भी स्वीकृति जरूरी है।
समाप्ति के तरीके
- राष्ट्रपति स्वयं उद्घोषणा वापिस ले सकते हैं।
- संसद समय पर अनुमोदन न करे तो आपातकाल स्वतः समाप्त।
- लोकसभा, यदि 1/10 सदस्य लिखित प्रस्ताव दें, तो 14 दिन में विशेष बैठक बुलाकर साधारण बहुमत से आपातकाल समाप्त कर सकती है।
- नोट:
- घोषणा के लिए संसद के दोनों सदनों का विशेष बहुमत जरूरी है।
- समाप्ति के लिए केवल लोकसभा का साधारण बहुमत पर्याप्त है।
- राज्य विधानसभाएँ भंग नहीं होतीं, लेकिन केंद्र-राज्य शक्तियों का संतुलन समाप्त होता है।
- आपातकाल के दौरान बने राज्य-सूची वाले कानून आपातकाल समाप्ति के 6 माह बाद तक प्रभावी रहते हैं।
- संसद लोकसभा व राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल हर बार 1-1 वर्ष के लिए।
मौलिक अधिकारों पर प्रभाव
- अनुच्छेद 358 – अनु. 19 का निलंबन
- केवल युद्ध या बाहरी आक्रमण की स्थिति में स्वतः निलंबित होता है।
- सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में अनु. 19 लागू रहता है (44वाँ संशोधन)।
- यह पूरे देश में स्वतः लागू होता है, राष्ट्रपति को अलग से आदेश देने की आवश्यकता नहीं होती।
- अनुच्छेद 359 – अन्य अधिकारों का निलंबन
- राष्ट्रपति, अन्य मौलिक अधिकारों को लागू करने की प्रक्रिया निलंबित कर सकते हैं।
- लेकिन अनु. 20 (दोष सिद्धि) व अनु. 21 (जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता) को निलंबित नहीं किया जा सकता (44वाँ संशोधन)।
- केवल वे अधिकार निलंबित होते हैं, जिन्हें राष्ट्रपति स्पष्ट रूप से उद्घोषणा में शामिल करते हैं।
- न्यायालय में याचिका दायर करने का अधिकार (अनु. 32 व 226) निलंबित हो सकता है।
- यह स्वतः लागू नहीं होता, बल्कि राष्ट्रपति को अलग से घोषणा करनी पड़ती है।
2. राष्ट्रपति शासन – अनुच्छेद 356 और 365
- परिभाषा: राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता की स्थिति में राष्ट्रपति द्वारा शासन अपने अधीन लेना।
- अनुच्छेद 355:
- संघ का दायित्व है कि:
- बाहरी आक्रमण से राज्यों की रक्षा करे।
- आंतरिक अशांति को रोके।
- संविधान के अनुसार शासन सुनिश्चित करे।
- संघ का दायित्व है कि:
- अनुच्छेद 356:
- संवैधानिक तंत्र की विफलता पर राष्ट्रपति शासन की घोषणा।
- दो आधार:
- राज्यपाल की रिपोर्ट
- राष्ट्रपति को स्वयं विश्वास हो (बिना राज्यपाल रिपोर्ट के)
- अनुच्छेद 365:
- यदि राज्य संघ के निर्देशों की पालना नहीं करता, तो उसे संवैधानिक विफलता माना जाएगा।
राष्ट्रपति शासन की प्रक्रिया:
- उद्घोषणा:
- राष्ट्रपति द्वारा (गजट में प्रकाशित)
- 2 माह के भीतर संसद की साधारण बहुमत से स्वीकृति आवश्यक।
- अवधि:
- एक बार में 6 माह तक।
- अधिकतम: 3 वर्ष।
- 1 वर्ष से अधिक बढ़ाने के लिए शर्तें:
- देश में राष्ट्रीय आपात (अनु. 352) लागू हो।
- चुनाव आयोग घोषित करे कि चुनाव संभव नहीं।
- समाप्ति:
- राष्ट्रपति अपनी मर्जी से कभी भी वापिस ले सकते हैं।
- संसद की स्वीकृति आवश्यक नहीं।
राष्ट्रपति शासन के प्रभाव:
- राज्य सरकार, मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद् भंग।
- राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है।
- संसद राज्य विषयों पर कानून बना सकती है।
- राज्य विधानमंडल निलंबित या भंग। विधानसभा भंग केवल तभी जब संसद दोनों सदनों से अनुमोदन कर दे।
- राज्य का बजट संसद द्वारा पारित।
- मूल अधिकार व उच्च न्यायालय प्रभावित नहीं होते।
न्यायिक समीक्षा:
- 38वां संविधान संशोधन (1975): न्यायिक समीक्षा से बाहर किया गया।
- 44वां संशोधन (1978): पुनः न्यायिक समीक्षा लागू।
- एस.आर. बोम्मई मामला (1994):
- अनुच्छेद 356 की न्यायिक समीक्षा संभव।
- दुरुपयोग पर राष्ट्रपति शासन रद्द हो सकता है।
- पहली बार – पंजाब (1951), विधानसभा निलंबित।
- पहली बार विधानसभा भंग – आंध्रप्रदेश (1954)।
- एक साथ सबसे अधिक राज्यों में –
- 1977: जनता सरकार ने 9 राज्यों में।
- 1980: इंदिरा गांधी ने 9 राज्यों में।
- 1992: बाबरी विध्वंस के बाद 4 राज्यों (उ.प्र., म.प्र., राजस्थान, हिमाचल) में।
- सबसे अधिक प्रयोग – इंदिरा गांधी के शासनकाल में।
- सबसे लंबा राष्ट्रपति शासन – जम्मू-कश्मीर (18 जुलाई 1990 – 9 अक्टूबर 1996, कुल 6 वर्ष 2 माह 20 दिन)।
- सबसे छोटा राष्ट्रपति शासन – कर्नाटक (10–17 अक्टूबर 1990) और बिहार (28 मार्च – 4 अप्रैल 1995) = 8 दिन।
- कभी राष्ट्रपति शासन न लगने वाले राज्य (2020 तक) – छत्तीसगढ़ और तेलंगाना।
- सर्वाधिक बार राष्ट्रपति शासन (2020 तक) –
- केरल, पंजाब, उत्तरप्रदेश = 10 बार।
- मणिपुर व बिहार = 8 बार (लेकिन मणिपुर में कुल 10 प्रशासनिक हस्तक्षेप, जिनमें 2 बार धारा 51, संघ राज्य क्षेत्र अधिनियम, 1963 के तहत)।
- डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि यह अनुच्छेद “Dead Letter” (मृत पत्र) की तरह होगा और केवल अत्यंत असाधारण परिस्थिति में प्रयोग किया जाएगा।
- सरकारिया आयोग (1983):
- अनुच्छेद 356 का प्रयोग अंतिम विकल्प हो।
- विधानसभा का बहुमत परीक्षण सदन के भीतर हो।
- राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा संसद में रखी जाए।
- संसद की अनुमति से पहले विधानसभा भंग न की जाए।
3. वित्तीय आपातकाल – अनुच्छेद 360
- यह अनुच्छेद तब लागू होता है जब:
- भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता संकट में हो।
- देश की आर्थिक साख गिर रही हो।
- घोषणा: राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- अनुमोदन:
- घोषणा की तिथि से 2 माह के भीतर संसद से साधारण बहुमत से स्वीकृति आवश्यक।
- साधारण बहुमत = उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत।
- अवधि:
- यदि वित्तीय आपातकाल की घोषणा करने के दौरान यदि लोकसभा विघटित हो जाए अथवा दो माह के भीतर इसे मंजूर करने से पूर्व लोकसभा विद्यटित हो जाए तो यह घोषणा पुनर्गठित लोकसभा की प्रथम बैठक के बाद तीस दिनों तक प्रभावी रहेगी, परंतु इस अवधि में इसे राज्यसभा की मंजूरी मिलना आवश्यक है। एक बार यदि संसद के दोनों सदनों से इसे मंजूरी प्राप्त हो जाए तो वित्तीय आपात अनिश्चित काल के लिए तब तक प्रभावी रहेगा जब तक इसे वापस न लिया जाए।
- यह निम्न बातों को इंगित करता है:
- इसकी अधिकतम समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है
- इसे जारी रखने के लिए संसद की पुन:मंजूरी आवश्यक नहीं है।
- राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय एक अनुवर्ती घोषणा द्वारा वित्तीय आपात की घोषणा वापस ली जा सकती है। ऐसी घोषणा को किसी संसदीय मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।
- न्यायिक समीक्षा:
- अनुच्छेद 360 की भी न्यायिक समीक्षा संभव है।
- 38वें संशोधन (1975) में इसे न्यायिक समीक्षा से बाहर किया गया था, परंतु 44वें संशोधन (1978) में फिर से न्यायिक समीक्षा को बहाल किया गया।
- वित्तीय आपात के प्रभाव
- संघ सरकार को राज्यों को वित्तीय मामलों में निर्देश देने का अधिकार।
- संघ व राज्य सेवाओं के कर्मियों के वेतन-भत्तों में कटौती की जा सकती है।
- यहां तक कि राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायधीशों के वेतन में भी कटौती संभव।
- राज्य विधानमंडल द्वारा पारित धन विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित किया जा सकता है।
- ऐतिहासिक स्थिति:
- अब तक भारत में एक भी बार वित्तीय आपात घोषित नहीं हुआ है।
- 1991 में गंभीर आर्थिक संकट के बावजूद इसे लागू नहीं किया गया।
- इसकी तुलना अमेरिका के 1933 के ‘National Recovery Act’ से की जा सकती है।
आपातकालीन प्रावधानों की समीक्षा
आलोचना:
- संघीय ढांचे पर आघात
- राष्ट्रपति के निरंकुश बनने की आशंका
- राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता समाप्त
- मूल अधिकारों का निलंबन
पक्ष में मत
- अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर: इन प्रावधानों को उन्होंने “संविधान के जीवन साथी (Companions of the Constitution)” की संज्ञा दी।
- महावीर त्यागी: इन्हें देश की “सुरक्षा वॉल्व” कहा, जो संकट की स्थिति में राष्ट्र की रक्षा के लिए आवश्यक हैं।
- डॉ. बी.आर. अम्बेडकर: भारतीय संघ को “अनोखा” बताया क्योंकि यह आपातकाल में पूर्ण एकात्मक राज्य का रूप ले सकता है, जो किसी अन्य संघीय व्यवस्था में संभव नहीं है।
तीसरा आपातकाल(1975 Emergency)
पृष्ठभूमि (Background of 1975 Emergency)
- भारत के इतिहास में अब तक तीन बार राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) लगाया गया है —
- 1962 – चीन युद्ध के कारण (बाहरी आक्रमण पर)
- 1971 – भारत-पाक युद्ध के कारण
- 1975 – आंतरिक अशांति (Internal Disturbance) के कारण
- तीसरा आपातकाल सबसे विवादास्पद और ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
आपातकाल की घोषणा (Declaration of Emergency)
- तारीख: 25 जून, 1975
- घोषणा करने वाले राष्ट्रपति: फखरुद्दीन अली अहमद
- प्रधानमंत्री: इंदिरा गांधी
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 352 (1) – “भारत की सुरक्षा को आंतरिक अशांति से गंभीर खतरा”
- कारण बताया गया: देश में आंतरिक अशांति और अस्थिरता से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा
- राष्ट्रपति ने यह घोषणा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर की थी।
आपातकाल से पहले की घटनाएँ (Events Leading to the Emergency)
- न्यायिक चुनौती (Judicial Challenge):
- 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता को अवैध घोषित कर दिया।
- अदालत ने उन्हें 6 साल तक किसी संवैधानिक पद पर रहने से रोका।
- यह फैसला राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी केस में आया था।
- राजनीतिक विरोध और जनांदोलन:
- जयप्रकाश नारायण (जेपी आंदोलन) ने “संपूर्ण क्रांति” का नारा दिया और इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की।
- बड़े पैमाने पर छात्र आंदोलन, मजदूर हड़तालें, और विपक्षी एकजुटता देखने को मिली।
- देश भर में अराजकता और प्रशासनिक अस्थिरता फैलने लगी।
- सरकार की प्रतिक्रिया:
- इंदिरा गांधी ने इस स्थिति को “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा” बताया।
- 25 जून की रात को ही राष्ट्रपति से आपातकाल की घोषणा करवाई गई।
आपातकाल के बाद उठाए गए कदम (Major Actions During Emergency)
- मूल अधिकारों का निलंबन:
- अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति, संगठन आदि की स्वतंत्रता) को निलंबित किया गया।
- अनुच्छेद 359 के तहत न्यायालयों में मूल अधिकारों के प्रवर्तन पर रोक लगाई गई।
- विरोधी नेताओं की गिरफ्तारी:
- लगभग 60,000 से अधिक राजनीतिक कार्यकर्ता और विपक्षी नेता गिरफ्तार किए गए।
- जिनमें जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चंद्रशेखर आदि प्रमुख थे।
- प्रेस सेंसरशिप:
- समाचार पत्रों पर कड़ी निगरानी और सेंसरशिप लगाई गई।
- विरोधी खबरों को प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा।
- “इंडियन एक्सप्रेस” और “स्टेट्समैन” जैसे अखबारों को चेतावनी दी गई।
- संविधान संशोधन:
- 42वाँ संविधान संशोधन (1976) पारित किया गया।
- इसके तहत सरकार ने संसद और प्रधानमंत्री की शक्तियाँ बढ़ाईं तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता सीमित की।
- नसबंदी अभियान (Forced Sterilization):
- संजय गांधी द्वारा चलाया गया विवादास्पद परिवार नियोजन कार्यक्रम।
- इसके अंतर्गत जबरन नसबंदी के कई मामले सामने आए।
आपातकाल की समाप्ति (End of Emergency)
- घोषणा समाप्ति की तारीख: 21 मार्च, 1977
- अवधि: लगभग 21 महीने (25 जून 1975 – 21 मार्च 1977)
- राष्ट्रपति: फखरुद्दीन अली अहमद (इस दौरान उनका निधन भी हो गया)
- नया चुनाव: मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव कराए गए।
- परिणाम:
- कांग्रेस पार्टी को करारी हार मिली।
- जनता पार्टी ने पहली बार केंद्र में सरकार बनाई।
- मोरारजी देसाई भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।
संवैधानिक एवं न्यायिक समीक्षा (Constitutional and Judicial Review)
- ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976):
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपातकाल के दौरान नागरिकों को हैबियस कॉर्पस (न्यायिक संरक्षण) का अधिकार नहीं है।
- यह निर्णय बाद में व्यापक रूप से आलोचित हुआ।
- 44वाँ संविधान संशोधन (1978):
- जनता सरकार ने आपातकाल की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सुधार किए:
- “Internal Disturbance” शब्द हटाकर “Armed Rebellion (सशस्त्र विद्रोह)” जोड़ा गया।
- अब आपातकाल केवल कैबिनेट की लिखित सिफारिश पर ही लगाया जा सकता है।
- नागरिक अधिकारों को अधिक मजबूत सुरक्षा दी गई।
राष्ट्रपति की वीटो शक्ति (अनुच्छेद 111 के अंतर्गत)
- कोई विधेयक संसद द्वारा पारित होने के बाद तभी कानून बनता है जब राष्ट्रपति उसे स्वीकृति प्रदान करता है। राष्ट्रपति के पास तीन विकल्प होते हैं:
- विधेयक को स्वीकृति देना।
- विधेयक को स्वीकृति के लिए सुरक्षित रखना।
- विधेयक को (यदि वह धन विधेयक नहीं है) संसद को पुनर्विचार हेतु लौटाना।
- यदि संसद विधेयक को संशोधित या बिना संशोधन के पुनः पारित कर भेजे तो राष्ट्रपति को स्वीकृति देना अनिवार्य होता है।
राष्ट्रपति की वीटो शक्तियों के प्रकार
| वीटो का प्रकार | विवरण | भारत में लागू |
| अत्यांतिक वीटो | राष्ट्रपति विधेयक को अस्वीकृत कर देता है; विधेयक समाप्त हो जाता है। | ✅ हाँ |
| निलंबनकारी वीटो | राष्ट्रपति विधेयक को पुनर्विचार हेतु संसद को लौटाता है। | ✅ हाँ |
| पॉकेट वीटो | राष्ट्रपति अनिश्चित काल तक विधेयक पर कोई निर्णय नहीं लेता। | ✅ हाँ |
| विशेषित वीटो | केवल अमेरिका में लागू; विधेयक को उच्च बहुमत से ही निरस्त किया जा सकता है। | ❌ नहीं |
अत्यांतिक वीटो (Absolute Veto)
- राष्ट्रपति विधेयक को पूरी तरह अस्वीकार कर देता है।
- दो स्थितियों में उपयोग:
- गैर-सरकारी विधेयक (Private Member’s Bill) के मामले में।
- सरकारी विधेयक, जब संसद द्वारा पारित होने के बाद मंत्रिमंडल त्यागपत्र दे और नया मंत्रिमंडल विधेयक का समर्थन न करे। / लोसभा विघटित हो जाए और नई संसद ऐसा करने के लिए मना कर दे।
- उदाहरण:
- 1954: डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने PEPSU विनियोग विधेयक पर निर्णय टाला।
- 1991: डॉ. आर. वेंकटरमण ने सांसद वेतन विधेयक को अस्वीकृत किया।
निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto)
- राष्ट्रपति विधेयक को पुनर्विचार हेतु संसद को लौटा सकता है।
- यदि संसद पुनः साधारण बहुमत से विधेयक पारित करे, तो राष्ट्रपति को स्वीकृति देना अनिवार्य होता है।
- धन विधेयक (Money Bill) पर यह लागू नहीं होता।
पॉकेट वीटो (Pocket Veto)
- राष्ट्रपति विधेयक को न तो मंजूरी देता है, न अस्वीकृत करता है, और न ही पुनर्विचार हेतु लौटाता है।
- संविधान में कोई समय-सीमा नहीं तय होने के कारण राष्ट्रपति अनिश्चित काल तक विधेयक को लंबित रख सकता है।
- उदाहरण: 1986: राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भारतीय डाक (संशोधन) विधेयक को लंबित रखा।
नोट:
- संविधान संशोधन विधेयकों (Constitution Amendment Bills) पर राष्ट्रपति को अनिवार्य रूप से स्वीकृति देनी होती है। (24वां संविधान संशोधन, 1971)
राज्य विधायिकाओं पर राष्ट्रपति की वीटो शक्ति
राज्यपाल के विकल्प (अनुच्छेद 200):
- विधेयक को स्वीकृति देना।
- स्वीकृति सुरक्षित रखना।
- पुनर्विचार हेतु विधेयक को लौटाना (यदि धन विधेयक नहीं है)।
- राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयक को आरक्षित करना।
राष्ट्रपति के विकल्प (अनुच्छेद 201):
- विधेयक को स्वीकृति देना।
- स्वीकृति सुरक्षित रखना।
- राज्यपाल को निर्देश देना कि वह विधेयक (यदि धन विधेयक नहीं है) को पुनर्विचार हेतु राज्य विधायिका को लौटाए।
- यदि राज्य विधायिका पुनः विधेयक पारित कर भेजे भी, तो राष्ट्रपति स्वीकृति देने के लिए बाध्य नहीं होता।
- कोई समय-सीमा नहीं तय है; राष्ट्रपति पॉकेट वीटो का प्रयोग कर सकता है।
उच्चतम न्यायालय से परामर्श लेने की शक्ति (अनुच्छेद 143)
- स्रोत – भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 213।
- अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में ऐसा प्रावधान नहीं है, जबकि कनाडा में है।
- (A) अनुच्छेद 143(1)
- यदि राष्ट्रपति को लगे कि
- (i) कोई विधि या तथ्य से जुड़ा प्रश्न उत्पन्न हुआ या होने की संभावना है।
- (ii) वह प्रश्न सार्वजनिक महत्व का है।
- तब वह प्रश्न उच्चतम न्यायालय को विचार हेतु भेज सकता है।
- न्यायालय राय देने या मना करने – दोनों का अधिकार रखता है।
- (B) अनुच्छेद 143(2)
- संविधान लागू होने से पहले (26 जनवरी 1950 से पूर्व) की नयी संधियों, करारों, समझौतों से संबंधित विवाद।
- ये मामले अनुच्छेद 131 (न्यायालय की प्रारंभिक अधिकारिता) से बाहर किए गए हैं।
- ऐसे मामलों में न्यायालय राष्ट्रपति को राय देने के लिए बाध्य है।
- (C) महत्वपूर्ण उदाहरण
- 1960 – बेरुबारी मामला (भारत-पाक सीमा विवाद)।
- 1993 – बाबरी मस्जिद विवाद।
विशेष – न्यायालय की दी गई राय सलाहकारी (Advisory) होती है, सरकार इसे मानने के लिए बाध्य नहीं है।
वर्तमान वीटो शक्ति संबंधित मुद्दे
संवैधानिक प्रावधान:
- अनुच्छेद 200: राज्यपाल को विधेयक पर सहमति देने, असहमति जताने, पुनर्विचार के लिए वापस करने या राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करने का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 201: राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयक पर निर्णय लेने की शक्ति देता है।
- राष्ट्रपति के पास तीन प्रकार की वीटो शक्तियां हैं: आत्यंतिक वीटो, निलंबनकारी वीटो, और पॉकेट वीटो। हालांकि, संविधान में कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है।
मुद्दे
- वीटो शक्ति का राजनीतिक दुरुपयोग
- राष्ट्रपति और राज्यपाल की वीटो शक्ति का उपयोग केंद्र सरकार (प्रधानमंत्री के नेतृत्व में) द्वारा राजनीतिक विरोधियों को कमजोर करने के लिए किया जाता है।
- संघीय ढांचे पर प्रभाव
- वीटो शक्ति का दुरुपयोग राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर करता है।
- यह केंद्र की कार्यकारी शक्तियों को बढ़ाता है।
- पॉकेट वीटो की प्रासंगिकता
- पॉकेट वीटो की अनिश्चितकालीन प्रकृति लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करती है।
- यह विधायी प्रक्रिया को अनुचित रूप से रोकता है।
वर्तमान उदाहरण
- केरल में विधेयकों पर देरी
- केरल में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और LDF सरकार के बीच तनाव 2022-2023 में बढ़ा, जब राज्यपाल ने कई विधेयकों (जैसे विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक, लोकायुक्त संशोधन) को लंबित रखा या राष्ट्रपति को भेजा।
- तमिलनाडु में राज्यपाल की भूमिका
- तमिलनाडु में राज्यपाल आर.एन. रवि ने 2022-2023 में कई विधेयकों (जैसे ऑनलाइन जुआ प्रतिबंध, विश्वविद्यालय नियुक्ति) को लंबित रखा या पुनर्विचार के लिए लौटाया। DMK सरकार ने इसे संवैधानिक शक्तियों का दुरुपयोग बताया।
- पंजाब बनाम केंद्र विवाद
- विवरण: पंजाब में AAP सरकार और राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित के बीच 2023 में विधेयकों पर देरी को लेकर विवाद हुआ। राज्यपाल ने कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति को भेजा, जिसे पंजाब ने संवैधानिक हस्तक्षेप माना।
- सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2023 में पंजाब सरकार के पक्ष में फैसला दिया, यह कहते हुए कि राज्यपाल विधायी प्रक्रिया को अनुचित रूप से रोक नहीं सकते।
- राष्ट्रपति द्वारा विधेयकों का लंबित रहना
- विवरण: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के समक्ष कई राज्य विधेयक (जैसे केरल, तमिलनाडु, पंजाब के) लंबित हैं, जिन्हें राज्यपालों ने अनुच्छेद 201 के तहत भेजा। विपक्ष का आरोप है कि यह केंद्र सरकार (प्रधानमंत्री के नेतृत्व में) की सलाह पर जानबूझकर देरी है।
‘तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल’ (2023)
- वीटो शक्ति पर सीमाएं:
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न तो राज्यपाल और न ही राष्ट्रपति किसी विधेयक पर पूर्ण वीटो (Absolute Veto) या पॉकेट वीटो(अनिश्चितकाल तक लंबित रखना) का प्रयोग कर सकते हैं।
- राष्ट्रपति और राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत विधेयकों पर सहमति देना, असहमति जताना या पुनर्विचार के लिए वापस करना होगा।
- समय-सीमा का निर्धारण:
- राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखने का निर्णय लेते हैं, तो अधिकतम समय एक महीना होगा।
- राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचारार्थ भेजे गए विधेयकों पर पावती से तीन माह के अंदर फैसला लेना होगा। देर हुई तो वजह दर्ज करनी होगी और राज्य को भी बतानी होगी।
- अगर राज्य विधानसभा विधेयक को पुनर्विचार करके फिर भेजती है, तो राज्यपाल को एक महीने में उस पर सहमति देनी होगी।
- यदि समय-सीमा का पालन न हो, तो यह न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा, और राज्य सरकार रिट याचिका (परमादेश) दायर कर सकती है।
- जिन विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति की आवश्यकता होती है, उन पर राज्य सरकार को पूर्व में केंद्र सरकार से परामर्श करना चाहिए।
- असंवैधानिकता पर सलाह:
- यदि कोई विधेयक असंवैधानिकता के आधार पर राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि राष्ट्रपति को अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेनी चाहिए। हालांकि, यह सलाह बाध्यकारी नहीं है।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान की व्याख्या का अंतिम अधिकार संवैधानिक अदालतों के पास है, न कि कार्यपालिका के पास।
- न्यायिक समीक्षा:
- राष्ट्रपति के निर्णय (अनुच्छेद 201 के तहत) की न्यायिक समीक्षा हो सकती है, खासकर यदि निर्णय में मनमानी या दुर्भावना हो।
- कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि द्वारा 10 विधेयकों को राष्ट्रपति के पास भेजने को असंवैधानिक करार दिया, क्योंकि यह दूसरी बार पारित होने के बाद किया गया था।
- विवाद और प्रतिक्रियाएं:
- उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर आपत्ति जताई, इसे लोकतंत्र के खिलाफ बताते हुए कहा कि अदालतें राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं।
- यह फैसला केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन स्थापित करता है और निर्वाचित राज्य सरकारों की भूमिका को सम्मान देता है।
- राज्यों के विधायी अधिकारों की रक्षा होगी और केंद्र द्वारा राजनीतिक कारणों से विधेयकों को रोकने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा।
- इस फैसले को “संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत न्यायालय की असाधारण शक्ति का विवेकपूर्ण प्रयोग” माना गया है।
आपात प्रावधानों की तुलना
| क्र. | विषय / बिंदु | राष्ट्रीय आपातकाल (अनु. 352) | राष्ट्रपति शासन (अनु. 356) | वित्तीय आपातकाल (अनु. 360) |
| 1 | आधार | युद्ध, बाहरी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता | भारत की वित्तीय साख को खतरा / वित्तीय अस्थिरता |
| 2 | संसद से अनुमोदन | 30 दिन (1 माह) के भीतर | 2 माह के भीतर | 2 माह के भीतर |
| 3 | अनुमोदन हेतु बहुमत | विशेष बहुमत | साधारण बहुमत | साधारण बहुमत |
| 4 | अवधि | 6 माह → बार-बार बढ़ाकर अनिश्चित काल तक | 6 माह → अधिकतम 3 वर्ष | केवल एक बार अनुमोदन के बाद अनिश्चित काल तक |
| 5 | समाप्ति | राष्ट्रपति की घोषणा से या लोकसभा के साधारण बहुमत प्रस्ताव से | राष्ट्रपति की घोषणा से | राष्ट्रपति की घोषणा से |
| 6 | मौलिक अधिकारों पर प्रभाव | अनु. 19 स्वतः निलंबित (युद्ध/आक्रमण पर), अन्य अधिकार राष्ट्रपति द्वारा निलंबित; अनु. 20 व 21 अप्रभावित | कोई प्रभाव नहीं | कोई प्रभाव नहीं |
| 7 | प्रभावित क्षेत्र | पूरे देश या उसका कोई भाग | किसी राज्य या राज्यों में | पूरे देश या उसका कोई भाग |
| 8 | राज्य कार्यपालिका व विधायिका | बनी रहती है | कार्यपालिका बर्खास्त; विधानसभा निलंबित या भंग | बनी रहती है |
| 9 | नियम बनाने की शक्ति | संसद राज्य विषयों पर भी कानून बना सकती है | संसद, राष्ट्रपति को राज्य के लिए नियम बनाने की शक्ति सौंप सकती है | _ |
| 10 | विधानसभा / लोकसभा कार्यकाल | लोकसभा व विधानसभा का कार्यकाल 1–1 वर्ष कर बढ़ाया जा सकता है | कार्यकाल अप्रभावित | कार्यकाल अप्रभावित |
| 11 | न्यायिक समीक्षा | हो सकती है | हो सकती है | हो सकती है |
| 12 | परामर्श | कैबिनेट का लिखित परामर्श आवश्यक | आवश्यक नहीं | आवश्यक नहीं |
राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की वीटो शक्ति की तुलना
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राष्ट्रपति 155095_5646db-47> |
राज्यपाल 155095_4af9fb-34> |
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सामान्य विधेयकों से संबंधित 155095_c30f2d-d2> | 155095_5fbcb3-c9> |
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जब संसद द्वारा पारित कोई सामान्य विधेयक राष्ट्रपति के पास अनुमोदन के लिए भेजा जाता है, तो अनुच्छेद 111 के तहत राष्ट्रपति के पास निम्नलिखित तीन विकल्प होते हैं:
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जब कोई सामान्य विधेयक राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों (जहाँ द्विसदनीय व्यवस्था है) या एकमात्र सदन द्वारा पारित होकर राज्यपाल के पास स्वीकृति हेतु भेजा जाता है, तब राज्यपाल के पास निम्नलिखित चार विकल्प होते हैं:
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राज्य विधायिका के संदर्भ में राष्ट्रपति की वीटो शक्ति (Article 200 और 201)
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धन विधेयकों के बारे में 155095_6f5bdf-a2> | 155095_a74317-21> |
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संसद द्वारा पारित प्रत्येक वित्त विधेयक के संदर्भ में राष्ट्रपति के विकल्प:
नोट:
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राज्य विधानमंडल द्वारा पारित वित्त विधेयक के संदर्भ में राज्यपाल के विकल्प:
नोट:
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राज्य विधानमंडल द्वारा पारित धन विधेयक जब राष्ट्रपति के पास राज्यपाल द्वारा विचारार्थ भेजा जाता है, तब राष्ट्रपति के पास दो विकल्प होते हैं:
नोट:
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अध्यादेश जारी करने की शक्ति
| अध्यादेश जारी करने की शक्ति | ||
| विषय | राष्ट्रपति (अनुच्छेद 123) | राज्यपाल (अनुच्छेद 213) |
| क्षेत्राधिकार | संघीय व समवर्ती सूची के विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है। | राज्य व समवर्ती सूची के विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है। |
| अध्यादेश जारी कर सकते हैं | जब संसद के दोनों सदन या कोई एक सदन सत्र में न हो। | जब राज्य विधानमंडल या दोनों सदन सत्र में न हों। |
| अध्यादेश जारी करने के लिए परिस्थितियाँ | राष्ट्रपति को यह संतुष्ट होना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनके कारण तत्काल कार्यवाही आवश्यक हो। | राज्यपाल को यह संतुष्ट होना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनके कारण तत्काल कार्यवाही आवश्यक हो। |
| निर्देश की आवश्यकता | अध्यादेश को प्रख्यापित करने के लिए राष्ट्रपति को किसी अन्य के निर्देश की आवश्यकता नहीं होती। | राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने के लिए किसी अन्य के निर्देश की आवश्यकता नहीं होती, सिवाय कुछ विशिष्ट मामलों के। |
| विवेकाधीन शक्ति | अध्यादेश जारी करने की शक्ति विवेकाधीन नहीं है; यह केवल प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की सलाह पर किया जा सकता है। | अध्यादेश जारी करने की शक्ति विवेकाधीन नहीं है; यह केवल मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की सलाह पर किया जा सकता है। |
| अधिनियम का समान बल | अध्यादेश का वही बल होता है जो संसद के अधिनियम का होता है, और उसकी मर्यादाएं भी संसद के अधिनियम के समान होती हैं। | अध्यादेश का वही बल होता है जो राज्य विधानमंडल के अधिनियम का होता है, और उसकी मर्यादाएं भी राज्य विधानमंडल के अधिनियम के समान होती हैं। |
| संसद/विधानमंडल में विचार | जब संसद पुनः समवेत होती है, तो अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाता है। | जब राज्य विधानमंडल पुनः समवेत होता है, तो अध्यादेश को राज्य विधानसभा या दोनों सदनों के समक्ष रखा जाता है। |
| समय सीमा और निरसन | यदि संसद के दोनों सदन छः सप्ताह के भीतर विचार नहीं करते या किसी एक सदन द्वारा अध्यादेश के निरसन का प्रस्ताव पारित होता है, तो अध्यादेश प्रवर्तन में नहीं रहेगा। | यदि राज्य विधानमंडल के पुनः समवेत होने के बाद छः सप्ताह के भीतर कोई संकल्प पारित नहीं होता, तो अध्यादेश प्रवर्तन में नहीं रहेगा। |
| राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति | राज्यपाल को राज्य विषयों से संबंधित अध्यादेश के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती। | राज्यपाल को कुछ मामलों में राष्ट्रपति से पूर्व स्वीकृति आवश्यक होती है, जैसे: जब राज्य विधानमंडल में विधेयक की प्रस्तुति के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति जरूरी हो। यदि राज्यपाल राष्ट्रपति के विचारार्थ कोई समान विधेयक भेजते हैं। यदि राज्य विधानमंडल का कोई अधिनियम राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना अवैध हो सकता है। |
अनुच्छेद-361 – राष्ट्रपति और राज्यपालों और राजप्रमुखों का संरक्षण / उन्मुक्तियाँ (Immunities) :
- अपने कार्यों के लिए उसे न्यायालय के समक्ष उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता ।
- परंतु अनुच्छेद 61 के तहत, संसद के किसी सदन द्वारा नियुक्त निकाय या न्यायालय राष्ट्रपति के आचरण की जाँच कर सकता है, लेकिन यह किसी व्यक्ति के अधिकार को प्रभावित नहीं करता जो भारत सरकार या राज्य सरकार के खिलाफ समुचित कार्यवाही करना चाहता हो।
- राष्ट्रपति या राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान उसके विरुद्ध कोई फौजदारी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, न ही उसे बन्दी बनाया जा सकता है।
- राष्ट्रपति या राज्यपाल की पदावधि के दौरान उसकी गिरफ्तारी या कारावास के लिए कोई भी न्यायालय आदेश जारी नहीं कर सकता।
- राष्ट्रपति या राज्यपाल के रूप में पद ग्रहण करने से पहले या उसके पश्चात् उसके द्वारा अपने व्यक्तिगत कार्य के संबंध में कोई सिविल कार्यवाही जिसमें उसके विरूद्ध अनुतोष (Relief) का दावा किया गया है तो ऐसी कार्यवाही शुरू करने से पूर्व निम्न शर्ते पूरी करनी होती है-
- कम से कम दो महीने पूर्व राष्ट्रपति या राज्यपाल को लिखित सूचना देनी होती है।
- सूचना में पक्षकार को अपना नाम, पता, कार्यवाही की प्रकृति तथा मांगे गये अनुतोष का विवरण देना होता है। इस प्रकार दीवानी मुकदमा व्यक्तिगत रूप से राज्यपाल के विरुद्ध 2 माह की पूर्व सूचना के पश्चात् ही दायर किया जा सकता है।
- नोट: अनुच्छेद 361 में राष्ट्रपति व राज्यपाल के लिए विशेषाधिकारों का उल्लेख है। अनुच्छेद 361 में (उपराज्यपाल जैसे शब्द का उल्लेख नहीं है।)
राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति पर प्रमुख बिंदु:
- संसदीय शासन प्रणाली: भारतीय संविधान में सरकार का स्वरूप संसदीय है, जिसके तहत राष्ट्रपति केवल कार्यकारी प्रधान होते हैं। राष्ट्रपति की शक्तियां प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं और वह अपनी कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से करते हैं।
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर का मत: डॉ. अंबेडकर ने राष्ट्रपति की स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय संविधान में राष्ट्रपति का कार्यभार सिर्फ प्रतीकात्मक है, जैसे ब्रिटिश संविधान में राजा का था। राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रमुख होता है, लेकिन शासन का कार्य नहीं करता। वह मंत्रिपरिषद की सलाह पर निर्भर होता है।
- अमेरिका और भारत की व्यवस्था में अंतर: अमेरिका में राष्ट्रपति की कार्यकारी और प्रशासनिक शक्तियां निहित होती हैं, जबकि भारतीय राष्ट्रपति के पास ये शक्तियां नहीं होतीं। भारतीय राष्ट्रपति का कार्य औपचारिक होता है, और वह मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कार्य करता है।
- संविधान में प्रावधान (अनुच्छेद 53, 74, 75):
- अनुच्छेद 53: संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है, और इसका प्रयोग वह अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है।
- अनुच्छेद 74: राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रीपरिषद द्वारा सलाह दी जाती है, और राष्ट्रपति अपने कार्यों का निर्वहन मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है।
- अनुच्छेद 75: मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।
- संविधान संशोधन:
- 42वां संविधान संशोधन (1976): यह संशोधन राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सलाह को बाध्यकारी बनाता है।
- 44वां संविधान संशोधन (1978): राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया कि वह मंत्रिपरिषद को पुनर्विचार के लिए कह सकता है, लेकिन मंत्रिपरिषद की पुनः दी गई सलाह को मानने के लिए वह बाध्य होता है।
- राष्ट्रपति के विवेक का प्रयोग: राष्ट्रपति के पास कोई संवैधानिक विवेक स्वतंत्रता नहीं होती, लेकिन कुछ परिस्थितियों में वह अपनी विवेकाधीन स्वतंत्रता का प्रयोग कर सकते हैं:
- जब लोकसभा में किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत न हो या प्रधानमंत्री की मृत्यु हो जाए और उत्तराधिकारी न हो।
- स्पष्ट बहुमत न होने की स्थिति में तथा पद पर आसीन प्रधानमंत्री की अचानक मृत्यु हो जाने तथा उसका कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी न होने की स्थिति में प्रधानमंत्री की नियुक्ति।
- राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद को विघटित कर सकते हैं, यदि वह विश्वास मत सिद्ध न कर सके।
- राष्ट्रपति लोकसभा को विघटित कर सकते हैं, यदि मंत्रिपरिषद ने अपना बहुमत खो दिया हो।
- यदि मंत्रिपरिषद अपना बहुमत खो दे तो वह लोकसभा को भंग कर देता है और चुनाव की मांग करता है।
- कानून बनाने पर वीटो शक्तियाँ।
- संवैधानिक संकटों का समाधान करना।
- आपातकाल में विदेशी मामलों और रक्षा पर विवेकाधीन नियंत्रण।
- असंतुलित संसद में गठबंधन बनाना।
- मामले का उदाहरण:
- अक्टूबर 1997 में, राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश को पुनर्विचार के लिए लौटा दिया था। बाद में मंत्रिपरिषद ने इस सिफारिश को आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया।
- सितंबर 1998 में, राष्ट्रपति नारायणन ने बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश को पुनर्विचार के लिए लौटा दिया। कुछ महीनों बाद उसी सिफारिश को स्वीकार कर बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया।
राष्ट्रपति से संबंधित तथ्य
- वह राष्ट्रपति जिनका कार्यकाल के दौरान निधन हुआ –
- डॉ. जाकिर हुसैन
- फखरुद्दीन अली अहमद (कृषि मंत्री)
- निर्विरोध चुने गए राष्ट्रपति –
- एन. संजीव रेड्डी
- वह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री थे।
- वी.वी. गिरि के खिलाफ अपना पहला राष्ट्रपति चुनाव हार गए।
- एकमात्र राष्ट्रपति जो लोकसभा अध्यक्ष के पद पर भी रहे।
- एन. संजीव रेड्डी
- उपराष्ट्रपति जो राष्ट्रपति बने –
- डॉ. एस. राधाकृष्णन
- डॉ. जाकिर हुसैन (बिहार के राज्यपाल)
- वी.वी. गिरि (केरल के राज्यपाल)
- आर. वेंकटरमन
- डॉ. शंकर दयाल शर्मा (महाराष्ट्र के राज्यपाल)
- के.आर. नारायणम
- कार्यवाहक राष्ट्रपति –
- वी.वी. गिरि – जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद
- एम. हिदायतुल्ला (भारत के मुख्य न्यायाधीश)
- बी.डी. जट्टी – फखरुद्दीन अली अहमद की मृत्यु के बाद
- राष्ट्रपति बनने से पहले मुख्यमंत्री:
- नीलम संजीव रेड्डी
- ज्ञानी जैल सिंह
- शंकर दयाल शर्मा
- सबसे छोटा कार्यकाल – डॉ. जाकिर हुसैन
- सबसे लंबा कार्यकाल – डॉ. राजेंद्र प्रसाद
- नीलम संजीव रेड्डी ने 1969 और 1977 में दो बार लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। 1977 में नीलम संजीव रेड्डी निर्विरोध राष्ट्रपति चुने गए थे।
- के. सुब्बाराव (पूर्व मुख्य न्यायाधीश) ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था।
- राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुनाव अधिनियम, 1952 — इसे वर्ष 1997 में संशोधित किया गया।
- राष्ट्रपति की उपलव्धियां एवं पेंशन अधिनियम — इसे वर्ष 2008 में संशोधित किया गया।
- कार्यवाहक राष्ट्रपति की नियुक्ति का उदाहरण — मई 1969 में डॉ. जाकिर हुसैन के निधन के बाद, तत्कालीन उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि कार्यवाहक राष्ट्रपति बने। बाद में राष्ट्रपति चुनाव लड़ने हेतु उन्होंने इस्तीफा दे दिया। तत्पश्चात, भारत के मुख्य न्यायाधीश एम. हिदायतुल्लाह ने 20 जुलाई 1969 से 24 अगस्त 1969 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया।
भारत के राष्ट्रपति अब तक
| भारत के राष्ट्रपति | |||||
| क्र.सं. | नाम | संबंधित राज्य | कार्यकाल | विशेष तथ्य / टिप्पणी | प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी |
| 1 | डॉ. राजेंद्र प्रसाद | बिहार | 1952–1957 | भारत के प्रथम राष्ट्रपति (अंतरिम + निर्वाचित)। प्रस्ताव – नेहरू अनुमोदन – पटेल 1952 और 1957 में दो बार निर्वाचित, अभी तक के एकमात्र दोबारा निर्वाचित राष्ट्रपति। सबसे लंबे समय तक राष्ट्रपति (12 वर्ष)। प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू को सबसे अधिक (3 बार) शपथ दिलाई। किसी राजनीतिक दल (कांग्रेस) के अध्यक्ष रह चुके।अनुच्छेद 87 के तहत सबसे अधिक अभिभाषण दिए। | के. टी. शाह |
| 2 | 1957–1962 | एन. एन. दास | |||
| 3 | डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन | तमिलनाडु | 1962–1967 | दार्शनिक व विचारक, राष्ट्रपति पद से पूर्व भारत रत्न (1954)। पहले दक्षिण भारतीय राष्ट्रपति। पहले दार्शनिक राष्ट्रपति – “Philosopher King” कहे गए। दो बार उपराष्ट्रपति निर्विरोध व एक बार राष्ट्रपति रहे। राष्ट्रपति रहते समय 1962 का भारत-चीन युद्ध। पहली बार किसी महिला (इंदिरा गांधी) को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। निर्वाचन में प्रतिद्वन्द्वी: चौ. हरिराम। | सी. एच. राम |
| 4 | डॉ. जाकिर हुसैन | हैदराबाद | 1967–1969 | प्रथम मुस्लिम राष्ट्रपति। पद पर रहते हुए निधन होने वाले पहले राष्ट्रपति। निर्वाचन में प्रतिद्वन्द्वी: के. सुब्बाराव (पूर्व CJI)। निर्वाचन में सबसे ज़्यादा प्रतिद्वन्द्वी -17 राष्ट्रपति अभिभाषण (अनु. 87) हिन्दी में पढ़ने वाले पहले राष्ट्रपति। राष्ट्रपति रहते हुए किसी प्रधानमंत्री को नियुक्त नहीं किया। | के. सुब्बाराव |
| 5 | वी. वी. गिरि | ओडिशा | 1969–1974 | पहले कार्यवाहक राष्ट्रपति, बाद में निर्वाचित। 1969 में निर्दलीय प्रत्याशी बनकर कांग्रेस उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को हराया। राष्ट्रपति रहते समय 1971 का भारत–पाक युद्ध। स्वतंत्रता पूर्व AITUC (Trade Union) के प्रमुख नेता। पहले उपराष्ट्रपति जिन्होंने इस्तीफा देकर राष्ट्रपति चुनाव लड़ा। सबसे कम मतो से जीत | नीलम संजीव रेड्डी |
| 6 | फखरुद्दीन अली अहमद | दिल्ली | 1974–1977 | दूसरे मुस्लिम राष्ट्रपति। 1975 में आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर किए। पद पर रहते हुए निधन होने वाले दूसरे राष्ट्रपति। निर्वाचन में पहली बार जमानत राशि का प्रावधान। | टी. चौधरी |
| 7 | नीलम संजीव रेड्डी | आंध्रप्रदेश | 1977–1982 | एकमात्र निर्विरोध निर्वाचित राष्ट्रपति। अब तक के सबसे कम उम्र में राष्ट्रपति बनने वाले। आंध्रप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री। लोकसभा अध्यक्ष से राष्ट्रपति बनने वाले पहले व्यक्ति। | निर्विरोध |
| 8 | ज्ञानी जैल सिंह | पंजाब | 1982–1987 | प्रथम सिख राष्ट्रपति। पंजाब के मुख्यमंत्री व पहले गृहमंत्री जो राष्ट्रपति बने। इंदिरा गांधी की हत्या (1984) के समय राष्ट्रपति थे। पॉकेट वीटो का प्रयोग (डाकघर संशोधन विधेयक)। | एच. आर. खन्ना |
| 9 | आर. वेंकटरमन | तमिलनाडु | 1987–1992 | चार प्रधानमंत्रियों के साथ कार्य किया (राजीव गांधी, वी.पी. सिंह, चन्द्रशेखर, नरसिम्हा राव)। वित्त एवं रक्षा मंत्री रह चुके। संविधान सभा के सदस्य व स्वतंत्रता सेनानी। | वी. आर. कृष्ण अय्यर |
| 10 | डॉ. शंकर दयाल शर्मा | मध्यप्रदेश | 1992–1997 | चार प्रधानमंत्रियों के साथ कार्य किया (नरसिम्हा राव, वाजपेयी, देवगौड़ा, गुजराल)। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, कई राज्यों के राज्यपाल। कांग्रेस अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति भी रहे। | जी. जी. स्वेल |
| 11 | के. आर. नारायणन | केरल | 1997–2002 | प्रथम दलित राष्ट्रपति। निर्वाचन में सबसे अधिक मतों के अंतर से जीत। राष्ट्रपति रहते हुए केन्द्र सरकार की सिफारिश (राष्ट्रपति शासन) को पुनर्विचार के लिए लौटाया – राष्ट्रपति पद की गरिमा बढ़ाई। पूर्व राजनयिक, JNU के पूर्व कुलपति। | टी. एन. शेषन |
| 12 | डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम | तमिलनाडु | 2002–2007 | “मिसाइल मैन ऑफ इंडिया”, प्रसिद्ध वैज्ञानिक। पहले गैर-राजनीतिक राष्ट्रपति। निर्वाचन में महिला उम्मीदवार लक्ष्मी सहगल से मुकाबला। जनता में सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रपति। | लक्ष्मी सहगल |
| 13 | प्रतिभा पाटिल | महाराष्ट्र | 2007–2012 | प्रथम महिला राष्ट्रपति। राजस्थान की राज्यपाल रह चुकीं। निर्वाचन में भैरोंसिंह शेखावत प्रतिद्वन्द्वी। | भैरों सिंह शेखावत |
| 14 | प्रणब मुखर्जी | प. बंगाल | 2012–2017 | राजनीति में चार दशक का अनुभव, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता। पूर्व वित्त, रक्षा व विदेश मंत्री। योजना आयोग के उपाध्यक्ष। निर्वाचन में प्रतिद्वन्द्वी: पी.ए. संगमा। | पी. ए. संगमा |
| 15 | राम नाथ कोविंद | उत्तरप्रदेश | 2017–2022 | दूसरे दलित राष्ट्रपति। चुनाव से पहले बिहार के राज्यपाल। निर्वाचन में प्रतिद्वन्द्वी: मीरा कुमार (लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष)। | मीरा कुमार |
| 16 | द्रौपदी मुर्मू | ओडिशा | 2022–वर्तमान | प्रथम जनजातीय (ST) राष्ट्रपति। भारत की दूसरी महिला राष्ट्रपति। आज़ादी के बाद जन्मी पहली राष्ट्रपति। झारखण्ड की राज्यपाल और ओडिशा विधानसभा सदस्य रह चुकीं। निर्वाचन में प्रतिद्वन्द्वी: यशवंत सिन्हा। | यशवंत सिन्हा |
राष्ट्रपति चुनाव से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
- चुनाव संपन्न – कुल 16
- व्यक्ति – 15 (राजेंद्र प्रसाद दो बार)
- और शपथ कुल – 18 व्यक्ति
भारत में अब तक 7 महिलाओं ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ा है
| क्रम सं. | महिला प्रत्याशी | वर्ष | टिप्पणी |
| 1 | श्रीमती कृष्णा कुमार चटर्जी | 1952 | पहली महिला प्रत्याशी |
| 2 | श्रीमती मनोहरा होलकर | 1967 | |
| 3 | श्रीमती फूलचरण कौर | 1969 | |
| 4 | श्रीमती लक्ष्मी सहगल | 2002 | नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज से जुड़ी थीं |
| 5 | श्रीमती प्रतिभा पाटिल | 2007 | भारत की पहली महिला राष्ट्रपति |
| 6 | श्रीमती मीरा कुमार | 2017 | पूर्व लोकसभा अध्यक्ष |
| 7 | श्रीमती द्रौपदी मुर्मू | 2022 | भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति |
विशेष तथ्य
- प्रतिभा पाटिल (2007) – पहली महिला राष्ट्रपति।
- राजेन्द्र प्रसाद (1957) और नीलम संजीव रेड्डी (1969) – ऐसे प्रत्याशी जिन्हें सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री की इच्छा के विपरीत नामित किया गया।
- उपराष्ट्रपति से राष्ट्रपति बने – राधाकृष्णन, जाकिर हुसैन, वी.वी. गिरी, वेंकटरमण, शंकर दयाल शर्मा और के.आर. नारायणन।
- कार्यवाहक राष्ट्रपति –
- 1969 – न्यायमूर्ति एम. हिदायतुल्ला (वी.वी. गिरी के इस्तीफे के बाद)
- 1977 – बी. डी. जत्ती (फखरुद्दीन अली अहमद की मृत्यु के बाद)
- पूर्व मुख्यमंत्री होकर राष्ट्रपति बने – नीलम संजीव रेड्डी, ज्ञानी जैल सिंह, शंकर दयाल शर्मा।
- सबसे अधिक बार चुनाव लड़ने वाले – चौधरी हरिराम (5 बार)।
1969 का ऐतिहासिक राष्ट्रपति चुनाव
- राष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन के निधन के बाद 1969 में मध्यावधि राष्ट्रपति चुनाव हुआ।
- इसमें मुख्य मुकाबला तत्कालीन उपराष्ट्रपति वी. वी. गिरी और कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी के बीच था।
- उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पार्टी लाइन से हटकर सांसदों और विधायकों से “अंतरात्मा की आवाज़” के अनुसार मतदान करने की अपील की।
- यह भारत का एकमात्र ऐसा राष्ट्रपति चुनाव है जिसमें विजेता का निर्णय द्वितीय वरीयता मतों की गिनती से हुआ और वी. वी. गिरी राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।
- इस चुनाव में नीलम संजीव रेड्डी ने भाग लेने के लिए अपने लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया था।
न्यायमूर्ति और राष्ट्रपति चुनाव
- के. सुब्बाराव – सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) थे जिन्होंने राष्ट्रपति चुनाव लड़ा।
- एच.आर. खन्ना और वी.आर. कृष्ण अय्यर – सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जिन्होंने चुनाव लड़ा।
क्षेत्रीय पहलू
- तमिलनाडु से सर्वाधिक राष्ट्रपति (3):
- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
- आर. वेंकटरमण
- डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
