संविधान की उद्देशिका/प्रस्तावना भारतीय संविधान की प्रस्तावना उसके मूल दर्शन और उद्देश्यों को संक्षेप में प्रस्तुत करती है। यह भारत को संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करते हुए न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की स्थापना का संकल्प व्यक्त करती है। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय में उद्देशिका/प्रस्तावना संविधान की वैचारिक आधारशिला और शासन की दिशा को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

संविधान की प्रस्तावना के मुख्य विषय
संविधान की प्रस्तावना का अर्थ एवं परिचय
- “हम, भारत के लोग – (We, the people of India)
- ये शब्द U.S.A. के संविधान की प्रस्तावना – We, the people of united states के समरूप है।
- प्रस्तावना सर्वप्रथम U.S.A. के संविधान में थी। अत: प्रस्तावना का विचार U.S.A. से लिया गया।
- प्रस्तावना की भाषा – आस्ट्रेलिया का संविधान
- उद्देशिका के प्रारंभिक व अंतिम शब्द – आयरलैंड का संविधान
- संविधान द्वारा अन्तिम प्रभुसत्ता ‘ भारतीय जनता’ में निहित की गयी है । वही समस्त शक्तियों का केन्द्र बिन्दु है।
- भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आधार पण्डित नेहरू द्वारा संविधान सभा में प्रस्तावित उद्देश्य प्रस्ताव (13 दिसम्बर 1946 को प्रस्तुत तथा 22 जनवरी 1947 को पारित) है।
- संविधान सभा ने उद्देशिका को प्रारूप संविधान के द्वितीय वाचन के अन्तिम दिन 17 अक्टूबर, 1949 को स्वीकार किया।
- उद्देशिका 26 जनवरी, 1950 को प्रवर्तन (लागू हूई) में आयी।
- भारत शासन अधिनियम, 1919 में उद्देशिका का उल्लेख था किन्तु भारत शासन अधिनियम, 1935 में उद्देशिका का उल्लेख नहीं किया गया।
- भारतीय संविधान की प्रस्तावना में अब तक केवल 1 बार ही संशोधन किया गया है। (42वें संविधान संशोधन – 1976)
- मूल प्रस्तावना में ‘समाजवादी ‘ ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘अखण्डता’ शब्द नहीं थे। ये बाद में 42वें संविधान संशोधन – 1976 द्वारा जोड़े गये।
- संविधान की मूल उद्देशिका में ‘एकता ‘ शब्द ही था। किन्तु 42वें संविधान संशोधन द्वारा ‘अखण्डता’ शब्द जोड़कर ‘राष्ट्र की एकता’ की भावना को औरअधिक मजबूत करने का उद्देश्य स्पष्ट किया गया है।
- ये शब्द सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर जोड़े गए थे। सरदार स्वर्ण सिंह उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी मंत्रिमंडल में प्रतिरक्षा मंत्री थे।
प्रस्तावना क्या नहीं है –
- प्रस्तावना न्याय/वाद योग्य नहीं है।
- प्रस्तावना को स्वतंत्र रूप से अदालत में लागू नहीं किया जा सकता।
- उद्देशिका शक्ति का स्रोत नहीं है।
- केवल संविधान के उद्देश्यों और मूल्यों को दर्शाती है, परंतु इससे कोई कार्यकारी शक्ति प्राप्त नहीं होती।
- उद्देशिका विधानमण्डल की शक्तियों पर प्रतिबंध या मर्यादा लगाने का स्रोत नहीं है।
- यह विधानमंडल की शक्तियों की सीमाओं को सीधे नियंत्रित या सीमित नहीं करती।
संविधान की प्रस्तावना के चार मूल तत्व
संविधान के अधिकार का स्रोत :
- प्रस्तावना में स्पष्ट कहा गया है कि संविधान की शक्ति ‘भारत के लोगों’ से प्राप्त होती है।
- इसका तात्पर्य यह है कि संप्रभुता जनता में निहित है, और भारत में लोकतंत्र की जड़ें जन-इच्छा में हैं।
भारत की प्रकृति :
- प्रस्तावना के अनुसार, भारत एक:
- संप्रभु (Sovereign)
- समाजवादी (Socialist)
- धर्मनिरपेक्ष (Secular)
- लोकतांत्रिक (Democratic)
- गणराज्य (Republic) है।
संविधान के उद्देश्य :
- प्रस्तावना में जिन मूल लक्ष्यों की प्राप्ति का उल्लेख है, वे हैं:
- न्याय (Justice) – सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक
- स्वतंत्रता (Liberty) – विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की
- समता (Equality) – प्रतिष्ठा और अवसरों की समानता
- बंधुत्व (Fraternity) – जिससे व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित हो
संविधान लागू होने की तिथि :
- प्रस्तावना के अंत में उल्लेख है कि संविधान को “26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया”
- यद्यपि इसे 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया।
संविधान की प्रस्तावना में मुख्य शब्दों का अर्थ
1. संप्रभुता (Sovereignty)
- भारत अपने आंतरिक और बाह्य मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र है।
- राष्ट्रमंडल की सदस्यता (1949) ब्रिटेन की प्रमुखता को प्रतीकात्मक मानती है, कोई प्रभुत्व नहीं।
- संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता भी भारत की संप्रभुता को सीमित नहीं करती।
- सत्ता का स्रोत भारत की जनता है – वही संविधान की शक्ति का स्रोत है।
- मगनभाई ईश्वरभाई पटेल केस (1970): भारत एक संप्रभु देश है; वह अपनी सीमाओं को संशोधित कर सकता है।
2. समाजवादी (Socialist)
- “समाजवादी ‘ शब्द 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा उद्देशिका में अन्त: स्थापित किया गया किन्तु यह संविधान में परिभाषित नहीं है।
- भारतीय समाजवाद “लोकतांत्रिक समाजवाद’ है न कि ‘साम्यवादी समाजवाद’, जिसे ‘राज्याश्रित समाजवाद’ भी कहा जाता है
- उद्देश्य: गरीबी, बीमारी, उपेक्षा और अवसर की असमानता को समाप्त करना।
- यह मिश्रित अर्थव्यवस्था को मान्यता देता है (निजी + सार्वजनिक क्षेत्र दोनों साथ-साथ)।
- डी.एस.नकारावाद(1982) – यह गांधीवाद + मार्क्सवाद का मिश्रण है, लेकिन गांधीवादी दृष्टिकोण का अधिक प्रभाव है।
- नेहरू के नेतृत्व में 1951 में पहले संविधान संशोधन ने दो महत्त्वपूर्ण प्रावधान समाजवादी लक्ष्य को निर्धारित करने के लिए किए गए।
- अंबेडकर – किसी विचारधारा विशेष के प्रति झुकाव सही नहीं है।
- 1955 का अवाडी सत्र – ‘समाज का समाजवादी प्रारूप पदो को स्वीकारा’
- आंद्रेबेतेई – संविधान दिशा दिखता है ।
- पंजाब राज्य बनाम मॉडर्न वाद (2004) – समाजवाद हमारे इतिहास का आकर्षक शब्द रहा होगा।
- दुर्गादास बसु – देश “पेंडुलम समाजवाद से दूर निर्बन्धन अर्थव्यवस्था की और चला गया है ” (1991 के बाद)
- आर्थिक समानता के लिहाज से सम्पत्ति के मूल अधिकार को संशोधित करने और भूमि अधिग्रहण के राज्य निर्धारित कानूनों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने के लिहाज से नौवीं अनुसूची का समावेशन और सामाजिक समानता के दायरे को विस्तृत करने के लिए सामाजिक-शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े नागरिकों के हित में विशेष प्रावधान करने की शक्ति राज्य को देना।
- यह दोनों कार्य करने के लिए संविधान में नए अनुच्छेद 31 A और 31 8 तथा अनुच्छेद 15 में नया खंड 15 (4) जोड़ा गया।
3. पंथ-निरपेक्ष (Secular)
- 42वें संशोधन से जोड़ा गया (1976)।
- राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं।
- सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण।
- प्रथम -U.S.A.
- संविधान में कही भी पंथनिरपेक्षता को परिभाषित नहीं किया गया है।
- भारत की पंथनिरपेक्षता का दर्शन पश्चिम की तरह नकारात्मक नहीं है जो धर्म व राजसत्ता के पूर्ण अलगाव की बात करता है। बल्कि भारतीय पंथनिरपेक्षता – सकारात्मक हस्तक्षेप के विचार पर आधारित है।
- कामेश्वर प्रसाद – उद्देशिका में पंथनिरपेक्ष शब्द की माँग लेकिन स्वीकार नहीं की गई थी।
- डी.डी.बसु – भ्रांतिया अधिक लाभ कम
- S.R. बोम्बई वाद (1994) में पंथनिरपेक्षता को संविधान का मूल ढांचा घोषित किया गया था।
- अनुच्छेद 25–28 में धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित।
- न्यायमूर्ति एम.सी. सीतलवाड़ – “पंथनिरपेक्ष राज्य के अंतर्गत सभी नागरिकों के साथ एक समान व्यवहार होना चाहिए।”
- 45वां संविधान संशोधन विधेयक – यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया कि पंथनिरपेक्षता एक बुनियादी विशेषता है, लेकिन यह विधेयक पारित नहीं हो सका।
- राजीव भार्गव ने भारतीय सेकुलरवाद (पंथनिरपेक्षता) की ऐसी 6 विशेषताएँ बताई है जो मुख्यधारा सेकुलरवाद से अलग है –
- उसूली फासला या सैद्धांतिक अलगाव – विभेदीकृत व्यवहार की इजाजत देता।
- विशिष्ट सामुदायिक अधिकारों की व्यवस्था
- धर्म का पूर्ण बहिष्करण नहीं
- यह सामाजिक दुनिया को ‘ आधुनिक पाश्चात्य ‘ और पारम्परिक, गैर-पश्चिमी (देशज) जैसे कठोर दायरों में नहीं बांटता।
- यह नैतिक तार्किकता के ‘संदर्भयुक्त’ (Contectual) संकल्पना को स्वीकार करता है। यह असीमवादी नैतिकता की बजाए परिवर्तन व समायोजन को स्वीकार करता है।
- बहुमूल्य-चरित्र
- राजीव भार्गव का अत्यन्त प्रसिद्ध कथन है “भारतीय सेकुलरवाद विभिन्न समूहों और मूल्यों के बीच एक खास तरह का समझौता है, जो नैतिक रूप से बहुत संवेदनशील है। इस रूप में नहीं देखे जाने पर यह या तो एक मृत सूत्र (dead formula) में बदल जाता है या राजनीतिक चालबाजी का हथियार बन जाता है।
नरासु अप्पवाद बनाम द स्टेट ऑफ़ बॉम्बे (1952) वाद (उसूली फासला से संबंधित)–
- विधायिका सभी बुराइयों के ख़िलाफ़ एक ही समय पर कानून बनाने के लिए बाध्य नहीं है।
पाश्चात्य पंथनिरपेक्षता (मुख्यधारा)
- धर्म का निजीकरण
- अन्तर धार्मिक प्रभुत्व व अंतरा धार्मिक प्रभुत्व को सही से नहीं रोक पाना ।
- धर्म के प्रति सम्मान का भाव नहीं
- प्रोटेस्टेंट नैतिकता से प्रभावित
- समूह आधारित अधिकारों के प्रति असंवेदनशील
- अन्तर सांस्कृतिक आदर्श नहीं
- संदर्भों के प्रति असंवेदनशील
4. लोकतांत्रिक (Democratic)
- भारतीय संविधान प्रत्यक्ष की बजाय प्रतिनिधियात्मक लोकतंत्र की व्यवस्था करता है । राजनीतिक के साथ-साथ सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना का भी प्रयास किया गया है।
- वयस्क मताधिकार, स्वतंत्र चुनाव, उत्तरदायी सरकार।
- डॉ. अम्बेडकर: “राजनीतिक लोकतंत्र तभी स्थायी होगा जब सामाजिक लोकतंत्र हो।”
5. गणराज्य (Republic)
- राज्य का प्रमुख (राष्ट्रपति) चुना हुआ होता है।
- कोई वंशानुगत शासक नहीं।
- सभी नागरिकों को समान अवसर – बिना किसी विशेषाधिकार के।
6. न्याय (Justice)
- प्रस्तावना मे तीन प्रकार का न्याय वर्णित है – सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय
- सामाजिक – भेदभावरहित समाज।
- आर्थिक – संसाधनों में समानता।
- राजनीतिक – समान राजनीतिक अधिकार
- सामाजिक व आर्थिक न्याय का विचार 1917 की रूस क्रांति से प्रभावित है तथा नीति-निदेशक तत्वों में परिलक्षित होता है।
- राजनीतिक न्याय – समानता का अधिकार (अनु. 14 से 18), सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार, राजनीतिक जन सहभागिता राजनीतिक न्याय के ही रूप है।
7. स्वतंत्रता (Liberty)
- प्रस्तावना में न्याय के बाद क्रमश; ‘ स्वतंत्रता-समानता-बंधुता ‘ शब्द है जो कि 1789 की फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरित है।
- प्रस्तावना में 5 प्रकार की स्वतंत्रता का उल्लेख है –
- विचार
- अभिव्यक्ति
- विश्वास
- धर्म
- उपासना की स्वतंत्रता
- यह स्वतंत्रता (अबाध) नहीं है। अनु. 19 तथा 25-28 में इसकी व्यवस्था है।
- कार्ल मार्क्स – एक स्वतंत्र व्यक्ति वो है जो अपने वातावरण को नियंत्रित करता है और जो वातावरण से नियंत्रित होता है।
8. समता (Equality)
- प्रस्तावना में प्रतिष्ठा व अवसर की समता – सामाजिक व आर्थिक समानता की ओर बढ़ना।
- सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हैं।
- अनु. 14 से 18 समता का अधिकार देता है।
- प्रस्तावना का समता वाला उपबन्ध – समता के तीन आयामों को समेटता है-
- नागरिक समता (अनु. 14 से 18)
- राजनीतिक समता ( अनु. 325 धर्म-जाति-लिंग अथवा वर्ग के आधार पर मतदाता सूची में शामिल करने में भेदभाव नहीं। अनु. 326 – वयस्क मताधिकार )
- आर्थिक समता – अनु. 39 व अवसर की समता के लिए – संरक्षणात्मक विभेद
9. बंधुत्व (Fraternity)
- प्रस्तावना में व्यक्ति की गरिमा व राष्ट्र की एकता और अखण्डता बढ़ाने वाली बंधुता है।
- व्यक्तिवाद + समष्टिवाद
- सभी भारतीयों के सर्वसामान्य भाईचारे की भावना।
- इसका उद्देश्य: भारतीय समाज में एकता और अखंडता की स्थापना करना।
- अर्नेस्ट बार्कर ने बन्धुता को ‘सहकारिता का सिद्धान्त’ कहा है।
- बंधुता का सिद्धान्त – व्यक्तिवाद व समष्टिवाद दोनों पर आधारित है।
- स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुता – (यूनियन ऑफ ट्रिनिटी) – भीमराव अम्बेडकर ने सभा में महत्त्वपूर्ण वक्तव्य दिया था।
- स्वतंत्रता, समानता व बन्धुत्व – फ्रांसीसी क्रांति (1789) से ज्यादा प्रभावित है।
10. व्यक्ति की गरिमा
- संविधान निर्माताओं के लिए यह सर्वोपरि मूल्य था।
- उद्देश्य: व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता में सुधार।
- अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता की समाप्ति — व्यक्ति की गरिमा की रक्षा।
- अनुच्छेद 32: मूल अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे उच्चतम न्यायालय में याचिका — गरिमा की सुरक्षा।
11. राष्ट्र की एकता और अखंडता
- बहुवादी समाज में एकता और अखंडता के लिए बंधुता अनिवार्य है
- अनुच्छेद 51(क): भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना।
- अखंडता हेतु – 16 वाँ संशोधन (1963)
- अनुच्छेद 19(2), 19(3), 19(4) जोड़ा युक्तियुक्त निर्बन्धन
प्रस्तावना के संबंध में प्रमुख कथन
- के.एम. मुंशी – ‘यह संविधान की राजनीतिक कुण्डली (Political Horoscope) है ।’
- हमारी संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य का भविष्यफल है।
- वी.एन. गाडगिल – ‘उद्देशिका की तुलना प्राचीन नाटकों के नान्दी पाठ से की जा सकती है।’
- सर अर्नेस्ट बार्कर प्रस्तावना को संविधान का “कुंजी नोट” कहते हैं।
- प्रस्तावना लिखने वाले को राजनीतिक बुद्धिजीवी कहा।
- अपनी book – Principle of social and political theory की शुरुवात प्रस्तावना से की है।
- पं. ठाकुर दास भार्गव के अनुसार,
- ‘उद्देशिका संविधान का सर्वाधिक अमूल्य भाग है।’
- ‘उद्देशिका हमारे संविधान की आत्मा है।’
- ‘उद्देशिका संविधान की कुंजी है।’
- संविधान का आभूषण
- ‘उद्देशिका उत्कृष्ट गद्य काव्य ही नहीं, यह परिपूर्णता की तस्वीर है।’
- प्रख्यात न्यायविद् व संवैधानिक विशेषज्ञ एन.ए. पालकीवाला ने उद्देशिका को ‘संविधान का परिचय पत्र’ कहा है।
- जे. बी. कृपलानी – ये (उद्देशिका में रखे सिद्धांत) गहन सिद्धांत है।
- प. गोविन्द दास – उद्देशिका आदि वाक्य (Adi Vakya) और संविधान की आधारशिला है।
- अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर – “हमारे दीर्घकालीन सपनों का विचार है ।”
- सुभाष कश्यप के अनुसार,
- “संविधान शरीर है तो उद्देशिका उसकी आत्मा,
- उद्देशिका आधारशिला है तो संविधान उस पर खड़ी अट्टालिका
- प्रस्तावना निर्देश है तो संविधान के विभिन्न अनुच्छेद उस तथ्य की सिद्धि के साधन ।”
- हंसा मेहता – प्रस्तावना द्वारा दिए हुए वचन के पूर्ण होने पर ही यह देश अपनी प्राचीन प्रतिष्ठा को प्राप्त करेगा।
क्या प्रस्तावना संविधान का भाग है
बेरूवारी वाद (इनरी बेरूबारी यूनियन वाद) (1960) –
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि –
- प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है।
- जहां संविधान की भाषा अस्पष्ट व संदिग्ध हो वहां यह संविधान निर्माताओं के विचारों को जानने की कुंजी है।
- बेरूबारी क्षेत्र – जलाईपगुड़ी जिला (पं. बंगाल) में था। इसे 9 वें संविधान संशोधन – 1960 द्वारा पाकिस्तान (बांग्लादेश) को दिया गया।
सज्जन सिंह बनाम राजस्थान सरकार (1965) –
- उद्देशिका विधि निर्माताओं के मस्तिष्क की कुंजी है। इसे किसी भी रीति से संविधान का औपचारिक भाग नहीं कहा जा सकता है।
केशवानन्द भारती वाद (1973) –
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि –
- प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है, इसने बेरूवादी वाद का निर्णय पलट दिया।
- प्रस्तावना में संशोधन किया जा सकता है, मूल ढांचे को छोड़कर।
- प्रस्तावना न्याय योग्य नहीं है।
- निर्वाचन (समझने) में महत्व
- इस प्रकार केशवानन्द वाद के बाद प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है तथा अनु. 368 के तहत इसमें संशोधन भी किया जा सकता है। पर मूल ढांचे को छोड़कर।
इंदिरा गाँधी बनाम राजनारायण (1975) –
- उद्देशिका संविधान के विशिष्ट प्रावधानों को रद्द नहीं कर सकती है।
- उद्देशिका न तो किसी शक्ति का कोई स्रोत है और न ही उसको किसी प्रकार सीमित करती है।
S.R. बॉम्बई वाद (1994) – जस्टिस रामास्वामी
- उद्देशिका अभिन्न अंग है ।
- पंथनिरपेक्षता संविधान का मूल ढांचा।
Lic of India वाद (1995) –
- सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः कहा – प्रस्तावना संविधान का आन्तरिक हिस्सा है।
A.K. गोपालन (1950) –
- न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है।
- शक्ति का स्रोत नहीं है।
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य वाद (1967)
- जस्टिस हिदायतुल्ला
- प्रस्तावना संविधान की मूल आत्मा
मिनर्वा मिल्स मामले (1980) –
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि, ” भारतीय संविधान की नींव मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक सिद्धांतों के संतुलन पर रखी गई है।”
वर्तमान स्थिति –
प्रस्तावना में संशोधन-
- 368 के तहत संशोधन हो सकता है पर मूल ढाँचा नहीं बदलना चाहिए।
अन्य महत्वपूर्ण – अनुच्छेद 14, 16, 39 घ के अंतर्गत स्त्री तथा पुरुष दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन का अधिकार एक संवैधानिक लक्ष्य है, अतः यह एक मूल अधिकार है। – रणधीर सिंह बनाम भारत संघ
