राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग भारत में मानवाधिकारों की रक्षा और उनके उल्लंघन की जांच हेतु स्थापित एक महत्वपूर्ण वैधानिक संस्था है, जिसकी स्थापना मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत की गई। यह आयोग नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा, जागरूकता और न्याय सुनिश्चित करने का कार्य करता है। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय के अंतर्गत राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का अध्ययन लोकतांत्रिक प्रणाली की समझ के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना व विधिक स्थिति
- गठन का आधार: संसद द्वारा पारित मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत किया गया।
- प्रारंभिक अध्यादेश: राष्ट्रपति द्वारा 28 सितंबर 1993 को मानवाधिकार संरक्षण संबंधी अध्यादेश जारी किया गया।
- विधेयक की स्वीकृति: मानवाधिकार विधेयक, 1993 संसद में पारित होकर 8 जनवरी 1994 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त की।
- प्रभावी तिथि: यह अधिनियम पूर्व प्रभाव से 28 सितंबर 1993 से लागू हुआ।
- स्थापना : आयोग की स्थापना 12 अक्टूबर 1993 को की गई।
- प्रकृति: यह एक सांविधिक (Statutory) निकाय है, संवैधानिक निकाय नहीं।
अधिनियम
- मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993
- मानव अधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2006
- मानव अधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2019
आयोग की भूमिका व परिभाषा
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को देश में “मानवाधिकारों का प्रहरी” कहा जाता है।
- यह उन अधिकारों की रक्षा करता है जो:
- भारतीय संविधान द्वारा सुनिश्चित हैं,
- अंतर्राष्ट्रीय संधियों में वर्णित हैं, और
- भारतीय न्यायालयों द्वारा प्रवर्तित किए जा सकते हैं।
- इसमें शामिल हैं:
- जीवन का अधिकार,
- स्वतंत्रता,
- समानता,
- व्यक्तिगत गरिमा (dignity) आदि।
दृष्टि और मिशन
- भारत का राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, मानव अधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन के लिए, 1993 के मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत संसद द्वारा स्थापित किया गया है।
- आयोग के कार्य अधिनियम की धारा 12 में वर्णित हैं।
- आयोग मानव अधिकारों के उल्लंघन या सार्वजनिक कर्मचारी द्वारा ऐसे उल्लंघन की रोकथाम में लापरवाही की शिकायतों की जांच करता है।
- आयोग मानव अधिकारों पर संधियों और अंतर्राष्ट्रीय उपकरणों का अध्ययन करता है।
- आयोग उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सरकार को सिफारिशें करता है।
- आयोग आम जनता में मानव अधिकार जागरूकता फैलाने के लिए जिम्मेदार है।
- आयोग मानव अधिकार साक्षरता के क्षेत्र में सभी हितधारकों के प्रयासों को प्रोत्साहित करता है।
- यह जिम्मेदारी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होती है।
- NHRC दुनिया के कुछ राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थानों (NHRIs) में से एक है, जिसका अध्यक्ष देश का पूर्व मुख्य न्यायाधीश होता है।
- दुनिया भारत के NHRC को मानव अधिकारों के संवर्धन और संरक्षण के प्रभावी कार्यान्वयन में आदर्श मॉडल के रूप में देखती है।
- PHR अधिनियम की धारा 2(1)(d) में मानव अधिकारों को जीवन, स्वतंत्रता, समानता और व्यक्ति की गरिमा से संबंधित अधिकारों के रूप में परिभाषित किया गया है।
- ये अधिकार संविधान द्वारा गारंटीकृत हैं या अंतर्राष्ट्रीय संविधानों में शामिल हैं और भारत में न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं।
- NHRC मानव अधिकारों के दृष्टिकोण से जागरूकता बढ़ाने के लिए दुनिया के अन्य NHRIs के साथ समन्वय में सक्रिय भूमिका निभाता है।
- आयोग ने यूएन निकायों और अन्य राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोगों के प्रतिनिधिमंडलों, नागरिक समाज, वकीलों और राजनीतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की मेजबानी की है।
स्थापना के उद्देश्य
- संस्थागत व्यवस्थाओं को मजबूत करना- जिससे मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों का समुचित समाधान हो सके।
- सरकार से स्वतंत्र रूप में निगरानी करना- ताकि सरकार को उसकी मानवाधिकार रक्षा की प्रतिबद्धता का एहसास कराया जा सके।
- मानवाधिकार संरक्षण के प्रयासों को सशक्त बनाना – और उन्हें व्यवस्थित, प्रभावी और व्यापक रूप देना।
NHRC की संरचना (धारा 3)
मानव अधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2019 के अनुसार
- आयोग की प्रकृति:
- यह एक बहु-सदस्यीय संस्था है।
- कुल सदस्य : 1 अध्यक्ष + 5 पूर्णकालिक सदस्य + 7 पदेन सदस्य
- 01 अध्यक्ष – उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या अन्य न्यायाधीश
- प्रारंभ में केवल सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय ही अध्यक्ष बन सकते थे।
- 2006 के संशोधन के बाद अब उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त अन्य न्यायाधीश भी अध्यक्ष बनने के पात्र हैं।
- 5 पूर्णकालिक सदस्य-
- 01 सदस्य – उच्चतम न्यायालय का सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश
- 01 सदस्य – किसी उच्च न्यायालय का सेवारत या सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश
- 03 सदस्य – तीन सदस्य, जिनमें कम से कम एक महिला हो, मानव अधिकारों के ज्ञान या अनुभव वाले व्यक्तियों में से नियुक्त।
- पहले संख्या 02 थी । महिला प्रावधान नहीं था।
- 07 पदेन सदस्य (Ex-officio Members):
- इनमें निम्नलिखित आयोगों के अध्यक्ष शामिल होते हैं:
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
- राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग
- राष्ट्रीय महिला आयोग
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
- राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग
- विकलांग व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक्त
- (संशोधन से पहले 4 सदस्य, अब 7 पदेन सदस्य)
- आयोग में एक महासचिव होगा, जो मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा।
- आयोग का मुख्यालय दिल्ली में होगा।
- केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति से अन्य स्थानों पर कार्यालय खोला जा सकता है।
- इनमें निम्नलिखित आयोगों के अध्यक्ष शामिल होते हैं:
नियुक्ति – (धारा 4)
- आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में गठित छह सदस्यीय समिति की सिफारिश पर होती है।
- चयन समिति के सदस्य:
- प्रधानमंत्री – अध्यक्ष के रूप में
- लोकसभा अध्यक्ष
- राज्यसभा के उपसभापति
- लोकसभा में विपक्ष के नेता
- राज्यसभा में विपक्ष के नेता
- गृह मंत्रालय का भारसाधक मंत्री
- यदि सदस्य सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश हों, तो उनकी नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर की जाती है।
अध्यक्ष एवं सदस्यों को हटाने की प्रक्रिया – (धारा 5)
- हटाए जाने की विधि:
- राष्ट्रपति ही आयोग के अध्यक्ष या किसी सदस्य को हटा सकता है।
- यदि दुराचार (misconduct) या अक्षमता (incapacity) के आरोप हों, तो:
- राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट से जांच करवाता है।
- सुप्रीम कोर्ट की सहमति मिलने पर ही उन्हें पद से हटाया जा सकता है।
- अन्य आधार जिन पर अध्यक्ष या सदस्य को हटाया जा सकता है:
- वे दिवालिया (Insolvent) घोषित हो जाएं
- पद पर रहते हुए अन्य नौकरी या व्यावसायिक गतिविधि में संलिप्त पाए जाएं।
- मानसिक या शारीरिक अक्षमता से ग्रस्त हों।
- न्यायालय द्वारा मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित किए जाएं।
- किसी अपराध में दोषी ठहराए जाएं।
कार्यकाल – (धारा 6)
- आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल:
- 3 वर्ष या 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)
- (पहले यह कार्यकाल 5 वर्ष था, जिसे 2019 में संशोधित किया गया)
- पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र, लेकिन 70 वर्ष की आयु के बाद पद नहीं धारण कर सकते।
- पद से हटने के बाद अध्यक्ष या सदस्य किसी सरकार के अधीन अन्य नियोजन के पात्र नहीं होंगे।
- 3 वर्ष या 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)
सदस्य का अध्यक्ष के रूप में कार्य (धारा 7)
- अध्यक्ष की मृत्यु, पदत्याग या रिक्ति होने पर राष्ट्रपति किसी सदस्य को कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त कर सकता है।
- अध्यक्ष अनुपस्थित होने पर, राष्ट्रपति किसी सदस्य को कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में कर्तव्य निभाने के लिए अधिसूचना द्वारा प्राधिकृत करेगा।
वेतन, भत्ते और सेवा शर्तें – (धारा 8)
- अध्यक्ष और सदस्यों को मिलने वाला वेतन, भत्ते और अन्य सेवा शर्तें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाएंगी।
- लेकिन नियुक्ति के बाद कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
आयोग की कार्यवाही की वैधता – (धारा 9)
- आयोग का कोई कार्य या निर्णय रिक्ति या गठन में त्रुटि के कारण अवैध नहीं माना जाएगा।
प्रक्रिया और विनियम – (धारा 10)
- आयोग का अधिवेशन अध्यक्ष द्वारा तय समय और स्थान पर होगा।
- आयोग अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित कर सकता है।
- सभी आदेश और निर्णय महासचिव या अध्यक्ष द्वारा अधिप्रमाणित किए जाएंगे।
अधिकारी और अन्य कर्मचारी – (धारा 11)
- केन्द्रीय सरकार आयोग को उपलब्ध कराएगी:
- महासचिव – भारत सरकार के सचिव के स्तर का अधिकारी।
- पुलिस और अन्वेषण कर्मचारी, प्रशासनिक और अन्य आवश्यक अधिकारी।
- आयोग अन्य प्रशासनिक, तकनीकी और वैज्ञानिक कर्मचारियों को नियुक्त कर सकता है।
- इन कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और सेवा शर्तें विहित अनुसार निर्धारित होंगे।
आयोग की वार्षिक और विशेष रिपोर्टें – धारा 20
- वार्षिक रिपोर्ट –
- आयोग हर साल अपनी एक वार्षिक रिपोर्ट केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकार को सौंपेगा।
- विशेष रिपोर्ट –
- अगर कोई ऐसा मामला है जो बहुत जरूरी या महत्वपूर्ण है और जिसे वार्षिक रिपोर्ट तक टालना सही नहीं है, तो आयोग उस पर विशेष रिपोर्ट भी कभी भी सरकार को भेज सकता है।
- संसद और विधानमंडल में रिपोर्ट रखना –
- केंद्र सरकार आयोग की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सामने रखेगी।
- राज्य सरकार आयोग की रिपोर्ट संबंधित राज्य विधानमंडल के सामने रखेगी।
- इसके साथ ही सरकार को यह भी प्रस्तुत करना होगा –
- आयोग की सिफारिशों पर क्या कार्रवाई की गई है या आगे क्या की जाएगी।
- अगर किसी सिफारिश को नहीं माना गया, तो उसके कारण भी बताने होंगे।
NHRC की विभागीय संरचना (मुख्य विभाग):
- आयोग में कार्यों की प्रभावी निष्पादन हेतु निम्नलिखित 5 प्रमुख विभाग होते हैं:
- विधि विभाग – कानूनी सलाह, शिकायतों की जाँच और विधिक प्रक्रिया से संबंधित कार्य।
- जाँच विभाग – मानवाधिकार उल्लंघनों की जाँच और तथ्यों का सत्यापन
- नीति अनुसंधान और कार्यक्रम विभाग – नीति निर्माण, अध्ययन व विश्लेषण से संबंधित कार्य।
- प्रशिक्षण विभाग – मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना।
- प्रशासन विभाग – आयोग की आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था और प्रबंधन।
आयोग के कार्य (धारा 12)
- NHRC मानवाधिकारों की रक्षा एवं संवर्धन हेतु निम्नलिखित कार्य करता है:
- जांच संबंधी कार्य
- मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतों की जांच करना, चाहे वह:
- किसी व्यक्ति द्वारा की गई हो।
- किसी लोक सेवक द्वारा अनदेखी की गई हो।
- स्वप्रेरणा से (suo motu) या न्यायालय के निर्देश पर।
- मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतों की जांच करना, चाहे वह:
- न्यायालय में हस्तक्षेप
- न्यायालयों में लंबित मानवाधिकार संबंधी मामलों में हस्तक्षेप करना।
- जेलों/बंदीगृहों का निरीक्षण
- जेलों, बंदीगृहों, सुधारगृहों आदि का निरीक्षण कर वहां की स्थिति का अध्ययन करना और सुधार हेतु सिफारिशें देना।
- संवैधानिक व कानूनी प्रावधानों की समीक्षा
- मानवाधिकारों की रक्षा के लिए बने संवैधानिक और विधिक प्रावधानों की समीक्षा करना।
- इनकी प्रभावी कार्यान्वयन हेतु सुझाव देना।
- आतंकवाद एवं अन्य कारणों की समीक्षा
- मानवाधिकार उल्लंघन के कारणों (जैसे आतंकवाद) की पहचान करना।
- उनके निवारण के उपाय सुझाना।
- अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेजों का अध्ययन
- मानवाधिकारों से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय संधियों, दस्तावेजों का अध्ययन करना।
- उन्हें भारत में प्रभावी रूप से लागू करने की सिफारिशें करना।
- अनुसंधान और अध्ययन
- मानवाधिकारों के क्षेत्र में शोध करना व उसे प्रोत्साहित करना।
- जन-जागरूकता
- जनसामान्य में मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना।
- उनकी सुरक्षा के लिए उपलब्ध उपायों की जानकारी देना।
- NGO सहयोग
- मानवाधिकार क्षेत्र में कार्यरत गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के कार्यों की सराहना करना व सहयोग करना।
- अन्य सहायक कार्य
- मानवाधिकारों के प्रचार-प्रसार से संबंधित अन्य सभी आवश्यक कार्य करना।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की कार्यप्रणाली
मुख्यालय व कार्यालय
- आयोग का प्रधान कार्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
- यह भारत के अन्य स्थानों पर भी कार्यालय खोल सकता है।
न्यायिक स्वरूप व शक्तियाँ
- गवाहों को बुलाने,
- सबूतों की माँग करने,
- दस्तावेज़ प्रस्तुत करने का आदेश देने आदि।
- इसका कार्य न्यायिक प्रकृति का होता है।
सूचना मांगने की शक्ति
- आयोग केंद्र/राज्य सरकारों से रिपोर्ट या जानकारी मांग सकता है।
- यह किसी भी लोक अधिकारी या जांच एजेंसी की सेवाएं ले सकता है
जांच तंत्र
- आयोग के पास अपना स्वतंत्र जांच दल होता है।
- आवश्यकता पड़ने पर सरकारी जांच एजेंसियों की मदद भी ली जा सकती है।
- आयोग NGOs के साथ सहयोग करता है ताकि मानवाधिकार उल्लंघन की प्रारंभिक सूचना मिल सके।
जांच की समय सीमा
- आयोग केवल उन मामलों की जांच कर सकता है जो एक वर्ष के भीतर घटित हुए हों।
- एक वर्ष से अधिक पुराने मामलों में आयोग जांच नहीं कर सकता।
- आयोग की सिफारिश पर ए.एम. अहमदी समिति गठित की गई इसमें कहा गया आयोग को एक वर्ष की समाप्ति पर भी किसी मामले की जांच करने की शक्ति प्रदान की जानी चाहिए।
- यदि तय समय में शिकायत दर्ज न करने का कोई उचित कारण हो।
जांच उपरांत आयोग की सिफारिशें
- जांच पूरी होने पर आयोग निम्नलिखित कदम उठा सकता है:
- पीड़ित को क्षतिपूर्ति (मुआवज़ा) देने की सिफारिश।
- दोषी लोक सेवक के विरुद्ध कार्रवाई की सिफारिश।
- पीड़ित को अंतरिम सहायता प्रदान करने की सिफारिश।
- उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है।
आयोग की भूमिका: सलाहकारी, बाध्यकारी नहीं
- आयोग केवल सिफारिशें या सलाह देता है, यह दंड या आर्थिक सहायता प्रदान नहीं कर सकता।
- सरकारें आयोग की सिफारिशों को अनदेखा कर सकती हैं, लेकिन:
- उन्हें आयोग को 1 महीने के भीतर जवाब देना होता है।
- अधिकांश मामलों में सरकार आयोग की बातों पर विचार करती है।
सशस्त्र बलों से जुड़े मामले
- ऐसे मामलों में आयोग की शक्तियाँ सीमित होती हैं।
- यह केवल केंद्र सरकार से रिपोर्ट प्राप्त कर अपनी राय दे सकता है।
- केंद्र सरकार को 3 महीने के भीतर रिपोर्ट के आधार पर की गई कार्यवाही की जानकारी आयोग को देनी होती है।
रिपोर्टिंग व्यवस्था
- आयोग अपनी वार्षिक व विशेष रिपोर्ट केंद्र व राज्य सरकारों को भेजता है।
- इन रिपोर्ट्स को संबंधित विधानमंडलों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
- रिपोर्ट में यह भी बताया जाता है कि:
- आयोग की सिफारिशों पर क्या कार्यवाही की गई,
- या क्यों नहीं की गई।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को “दंतहीन बाघ” (Toothless Tiger) इसलिए कहा क्योंकि:
- सशस्त्र बलों पर सीमित अधिकार – यदि मानवाधिकार उल्लंघन सशस्त्र बलों द्वारा हो, तो आयोग की शक्तियाँ बहुत सीमित हो जाती हैं।
- दंड देने की शक्ति का अभाव – NHRC के पास दोषियों को दंडित करने की वैधानिक शक्ति नहीं है।
- हितों का टकराव – आयोग में प्रतिनियुक्त पुलिस अधिकारी कार्यरत रहते हैं, जो अपने मूल राज्य/कैडर से जुड़े होने के कारण निष्पक्ष जांच पर सवाल खड़े करते हैं।
- सिफारिशात्मक स्वरूप – NHRC की अधिकांश कार्यवाहियाँ केवल सिफारिश तक सीमित रहती हैं, जिनका पालन संबंधित अधिकारियों के लिए बाध्यकारी नहीं है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का कार्य निष्पादन
श्रमिक, महिला एवं बाल अधिकार
- बंधुआ मजदूरी की समाप्ति।
- बाल श्रम की समाप्ति व रोक।
- बाल विवाह रोक अधिनियम, 1929 की समीक्षा।
- बच्चों के यौन शोषण पर मीडिया मार्गदर्शिका।
- सरकारी कर्मचारियों द्वारा बच्चों को रोजगार में जाने से रोकना (सेवा नियमों में संशोधन)।
- बाल अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय के प्रोटोकॉल पर कार्य।
- महिलाओं एवं बच्चों की तस्करी पर न्यायपालिका हेतु नियमावली तैयार।
- महिलाओं के विरुद्ध यौन पर्यटन एवं तस्करी के विरुद्ध संवेदीकरण।
- कार्यस्थलों पर महिला यौन उत्पीड़न की रोकथाम।
- रेलगाड़ियों में महिला यात्रियों की सुरक्षा के उपाय।
- वृंदावन की परित्यक्त महिलाओं का पुनर्वास।
- मातृत्व रक्ताल्पता एवं मानवाधिकार के मुद्दे।
मानसिक स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य अधिकार
- राँची, आगरा, ग्वालियर के मानसिक अस्पतालों का संचालन।
- आगरा के सरकारी महिला सुरक्षा गृह की निगरानी।
- स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़े विषयों पर कार्य।
- एच.आई.वी./एड्स संक्रमित व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा।
सामाजिक व जातिगत मुद्दे
- हाथ से मैला ढोने की प्रथा का अंत।
- दलितों पर अत्याचार एवं उनसे संबंधित मुद्दे।
- अनधिसूचित एवं घुमंतू जनजातियों की समस्याओं पर कार्य।
- विकलांग व्यक्तियों के अधिकार।
आपदा प्रबंधन एवं राहत
- 1999 के उड़ीसा चक्रवात पीड़ितों हेतु राहत कार्य।
- 2001 गुजरात भूकंप के बाद राहत कार्यों का अनुश्रवण।
विधिक एवं नीति सुधार
- जिला परिवाद प्राधिकरणों की स्थापना।
- जनसंख्या नीति और मानवाधिकार।
- आतंकवाद-निरोधक विधेयक, 2000 एवं TADA अधिनियम की समीक्षा।
- विद्रोह एवं आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में मानवाधिकार की सुरक्षा।
- गिरफ्तारी की शक्ति के दुरुपयोग को रोकने हेतु दिशा-निर्देश।
- राज्य/नगर पुलिस मुख्यालयों में मानवाधिकार सेल का गठन।
- हिरासत में मृत्यु, बलात्कार व यंत्रणा की रोकथाम हेतु कदम।
- यंत्रणा के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय अभिसमय को अपनाना।
- देश में शरणार्थी कानून लाने की सिफारिश।
- पुलिस व बंदीगृह सुधारों के लिए संरचनात्मक सुझाव।
- मानवाधिकार कानूनों की समीक्षा व अंतरराष्ट्रीय संधियों का कार्यान्वयन।
जागरूकता एवं प्रशिक्षण
- शिक्षा प्रणाली में मानवाधिकार शिक्षा व जागरूकता का समावेश।
- सैन्यबलों, पुलिस, प्रशासनिक अधिकारियों व नागरिक समाज के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम।
मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2006
- राज्य मानवाधिकार आयोग के सदस्यों की संख्या 5 से घटाकर 3 की गई।
- सदस्य बनने की योग्यता में संशोधन किया गया।
- आयोग की अनुसंधान व्यवस्था को मजबूत किया गया।
- जांच के दौरान क्षतिपूर्ति की सिफारिश करने का अधिकार मिला।
- राज्य सरकार को सूचना दिए बिना बंदीगृह निरीक्षण का अधिकार मिला।
- गवाहों की गवाही रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया को सुदृढ़ किया गया।
- यह स्पष्ट किया गया कि अध्यक्ष की स्थिति अन्य सदस्यों से भिन्न होगी।
- राज्य आयोग को शिकायत स्थानांतरित करने का अधिकार आयोग को मिला।
- त्यागपत्र संबंधित राष्ट्रपति या राज्यपाल को देने की प्रक्रिया स्पष्ट की गई।
- चयन समिति के किसी सदस्य की अनुपस्थिति चयन प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करेगी।
- राष्ट्रीय SC/ST आयोग के अध्यक्ष NHRC के सदस्य होंगे।
- केन्द्र सरकार को अंतरराष्ट्रीय नियमों को अधिसूचित करने का अधिकार।
मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2019
- भारत के मुख्य न्यायाधीश रह चुके व्यक्ति के अतिरिक्त, उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका व्यक्ति भी आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किये जाने के लिए पात्र माना जाएगा;
- आयोग के सदस्यों की संख्या (मानव अधिकारों के ज्ञान या अनुभव वाले व्यक्तियों) दो से बढ़ाकर तीन करना, जिनमें से एक महिला होगी;
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष और विकलांग व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक्त को आयोग के मानद सदस्य के रूप में शामिल करना; (पहले 4 सदस्य, अब 7 पदेन सदस्य)
- आयोग और राज्य आयोगों के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल पांच वर्ष से घटाकर 3 वर्ष या 70 वर्ष की आयु (जो पहले हो) तथा उन्हें पुनः नियुक्ति का पात्र बनाना;
- यह प्रावधान किया गया है कि राज्य आयोग का अध्यक्ष बनने के लिए केवल उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश ही नहीं, बल्कि कोई ऐसा व्यक्ति भी पात्र होगा जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो।
- दिल्ली संघ राज्य क्षेत्र को छोड़कर अन्य संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा किए जा रहे मानवाधिकारों से संबंधित कार्यों को राज्य आयोगों को सौंपना, जिन्हें आयोग द्वारा निपटाया जाएगा।
आयोग के अध्यक्ष
| क्र. सं. | नाम | कार्यकाल | तथ्य |
| 1 | न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा | 12 अक्टूबर 1993 – 24 नवंबर 1996 | प्रथम |
| 2 | न्यायमूर्ति एम. एन. वेंकटचलैया | 26 नवंबर 1996 – 24 अक्टूबर 1999 | |
| 3 | न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा | 4 नवंबर 1999 – 17 जनवरी 2003 | |
| 4 | न्यायमूर्ति ए. एस. आनंद | 17 फरवरी 2003 – 31 अक्टूबर 2006 | |
| 5 | न्यायमूर्ति शिवराज पाटिल | 1 नवंबर 2006 – 1 अप्रैल 2007 | (कार्यवाहक) |
| 6 | न्यायमूर्ति एस. राजेंद्र बाबू | 2 अप्रैल 2007 – 31 मई 2009 | |
| 7 | न्यायमूर्ति जी. पी. माथुर | 1 जून 2009 – 6 जून 2010 | (कार्यवाहक) |
| 8 | न्यायमूर्ति के. जी. बालकृष्णन | 7 जून 2010 – 11 मई 2015 | |
| 9 | न्यायमूर्ति सिरिएक जोसेफ | 11 मई 2015 – 28 फरवरी 2016 | (कार्यवाहक) |
| 10 | न्यायमूर्ति एच. एल. दत्तू | 29 फरवरी 2016 – 2 दिसंबर 2020 | |
| 11 | न्यायमूर्ति प्रफुल्ल चंद्र पंत | 25 अप्रैल 2021 – 1 जून 2021 | (कार्यवाहक) |
| 12 | न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा | 2 जून 2021 – 1 जून 2024 | |
| 13 | सुश्री विजया भारती सयानी | 2 जून 2024 – 30 दिसंबर 2024 | (कार्यवाहक) |
| 14 | न्यायमूर्ति वी. रामसुब्रमण्यन | 30 दिसंबर 2024 से वर्तमान |
आयोग के पूर्व प्रमुख सदस्य
| क्र. सं. | नाम | तथ्य |
| 1 | श्री सुदर्शन अग्रवाल | पूर्व पद : महासचिव, राज्य सभा |
| 2 | श्री पी. सी. शर्मा | पूर्व पद : निदेशक, सीबीआई |
| 3 | श्री सत्यव्रत पाल | पूर्व पद : पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त |
| 4 | श्री शरद चंद्र सिन्हा | पूर्व पद : महानिदेशक, एनआईए |
वर्तमान अध्यक्ष एवं सदस्य
| क्र. सं. | नाम | कार्य आवंटित | पदभार ग्रहण करने की तिथि |
| 1 | न्यायमूर्ति श्री वी. रामसुब्रमण्यन | अध्यक्ष | 30/12/2024 |
| 2 | डॉ. न्यायमूर्ति विद्युत रंजन षड़ांगी | सदस्य | 30/12/2024 |
| 3 | श्रीमती विजया भारति सायनि | सदस्य | 28/12/2023 |
| 4 | श्री प्रियांक कानूनगो | सदस्य | 24/12/2024 |
