लोकपाल भारत में उच्च पदस्थ लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की जाँच के लिए स्थापित एक महत्वपूर्ण वैधानिक संस्था है। इसका उद्देश्य शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी सुनिश्चित करना है। राजनीतिक व्यवस्था और शासनविषय के अंतर्गत लोकपाल की संरचना, शक्तियाँ और कार्यों का अध्ययन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
लोकपाल : उद्देश्य, अधिकार और भूमिका
भारत में लोकपाल और लोकायुक्त का विकास
प्रारंभिक विचार
भारत में संवैधानिक ओम्बुड्समैन का विचार सर्वप्रथम 1960 के दशक की शुरुआत में सामने आया।
इसे वर्ष 1963 में कानून मंत्री अशोक कुमार सेन ने संसद में प्रस्तुत किया।
शब्द का प्रयोग
लोकपाल एवं लोकायुक्त शब्द का प्रयोग प्रख्यात विधिवेत्ता डॉ. एल. एम. सिंघवी ने किया।
प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-70) की सिफारिश
भारत में, प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-70) ने केंद्रीय स्तर पर लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों की स्थापना की अनुशंसा की थी।
लोकपाल : मंत्रियों तथा केंद्र व राज्य स्तर के सचिवों से संबंधित शिकायतों की जांच करता है।
लोकायुक्त : विशेष उच्च अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतों की जांच करता है।
आयोग ने न्यूजीलैंड की तरह न्यायालयों को लोकपाल-लोकायुक्त के दायरे से बाहर रखा।
लेकिन स्वीडन में न्यायालय भी ओम्बुड्समैन के अंतर्गत आते हैं।
लोकपाल विधेयक का इतिहास
लोकपाल विधेयक पहली बार 1968 में लोकसभा में पेश किया गया।
1968 में लोकसभा ने इसे पारित किया, लेकिन लोकसभा के विघटन के साथ ही यह समाप्त हो गया।
इसके बाद यह विधेयक कई बार लोकसभा में पेश हुआ और हर बार कालातीत होता रहा।
राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना
ओडिशा ने इस संबंध में 1970 में अधिनियम पारित किया, लेकिन इसे 1983 में लागू किया।
महाराष्ट्र ने 1971 में सबसे पहले लोकायुक्त की स्थापना की।
वेंकटचलैया आयोग (2002)
वर्ष 2002 में एम. एन. वेंकटचलैया की अध्यक्षता में गठित संविधान समीक्षा आयोग ने लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति की सिफारिश की।
साथ ही, आयोग ने सुझाव दिया कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाए।
अन्ना हजारे आंदोलन और दबाव
अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध भारत आंदोलन ने तत्कालीन यूपीए सरकार पर दबाव बनाया।
इसके परिणामस्वरूप संसद के दोनों सदनों ने लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक, 2013 पारित किया।
लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक, 2013
अधिनियम का लागू होना
दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद बिल को 1 जनवरी 2014 को राष्ट्रपति ने मंजूरी दी।
यह अधिनियम 16 जनवरी 2014 से लागू हो गया।
पहला लोकपाल दिवस 16 जनवरी 2025 को दिल्ली कैंट में मनाया गया, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) मुख्य अतिथि थे।
राज्यों के लिए प्रावधान
2013 का अधिनियम यह भी प्रावधान करता है कि सभी राज्य सरकारें अधिनियम लागू होने के एक वर्ष के भीतर लोकायुक्त की स्थापना करें।
संवैधानिक दर्जा
लोकपाल और लोकायुक्त संस्थाएँ बिना संवैधानिक दर्जे की केवल वैधानिक निकाय (Statutory Bodies) हैं।
लोकपाल की सरंचना:
लोकपाल का एक अध्यक्ष होगा तथा अधिकतम 8 सदस्य होंगे।
अध्यक्ष-
भारत का वर्तमान में सेवारत या पूर्व मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश या कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति।
चार न्यायिक सदस्य –
जो या तो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे हों, या उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे हों।
चार गैर-न्यायिक सदस्य –
जिनके पास भ्रष्टाचार-रोधी नीति, लोक प्रशासन, सतर्कता, वित्त, कानून, प्रबंधन, बीमा, बैंकिंग इत्यादि क्षेत्रों में कम से कम 25 वर्षों का विशेष ज्ञान और विशेषज्ञता हो।
आरक्षण प्रावधान: लोकपाल के कम-से-कम 50% सदस्य अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अल्पसंख्यक और महिलाएं होंगी।
कार्यकाल:
लोकपाल संस्था के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु तक है।
वेतन और भत्ते:
अध्यक्ष का वेतन और भत्ते भारत के मुख्य न्यायाधीश के समान होते हैं, जबकि सदस्यों को भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान लाभ मिलते हैं।
अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति
अध्यक्ष तथा इसके सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक समिति की सिफारिश पर की जाती है। समिति में –
प्रधानमंत्री
लोकसभा अध्यक्ष
लोकसभा में विपक्ष का नेता
भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय का कार्यरत न्यायाधीश
कोई प्रतिष्ठित न्यायवेत्ता जो राष्ट्रपति द्वारा चयन समिति के चार सदस्यों की अनुशंसा पर नामित हो
लोकपाल अध्यक्ष/सदस्यों को पद से हटाने की प्रक्रिया (धारा 37):
हटाने का अधिकार – लोकपाल के अध्यक्ष या सदस्य को केवल राष्ट्रपति हटा सकते हैं।
कारण – यदि उन पर कदाचार (misbehavior) का आरोप सिद्ध हो।
याचिका की शर्त – हटाने की प्रक्रिया तब शुरू हो सकती है जब इस संबंध में कम से कम 100 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित याचिका राष्ट्रपति को सौंपी जाए।
जांच – राष्ट्रपति इस याचिका को सर्वोच्च न्यायालय को भेजते हैं।
न्यायालय की भूमिका – सर्वोच्च न्यायालय तय प्रक्रिया के अनुसार जांच करता है।
रिपोर्ट – यदि सर्वोच्च न्यायालय अपनी रिपोर्ट में यह पाता है कि आरोप सही हैं और सदस्य/अध्यक्ष को हटाना चाहिए,
अंतिम आदेश – तब राष्ट्रपति उस रिपोर्ट के आधार पर अध्यक्ष या सदस्य को पद से हटा देते हैं।
प्रथम लोकपाल की नियुक्ति
मार्च 2019 में सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश पिनाकी चंद्र घोष को भारत का पहला लोकपाल नियुक्त किया गया।
नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन शामिल थे।
सदस्य नियुक्ति की प्रक्रिया 27 मार्च 2019 से प्रभावी हुई।
लोकपाल खोजबीन समिति
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) पात्र अभ्यर्थियों की सूची तैयार करता है।
यह सूची खोजबीन समिति (Search Committee) को भेजी जाती है।
समिति नामों को शॉर्टलिस्ट कर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति को भेजती है।
चयन समिति खोजबीन समिति द्वारा सुझाए गए नामों को मान भी सकती है और अस्वीकार भी कर सकती है।
सितंबर 2018: पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में खोजबीन समिति गठित की गई।
लोकपाल का क्षेत्राधिकार व शक्तियाँ
क्षेत्राधिकार में शामिल:
प्रधानमंत्री (कुछ अपवादों को छोड़कर)
मंत्रीगण
सांसद
केंद्र सरकार के समूह A, B, C, D अधिकारी
केंद्रीय कानून से स्थापित संस्थाओं/समितियों के अधिकारी
केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित संस्थाओं से जुड़े अधिकारी
इसकी वार्षिक आय 1 करोड़ रुपये से अधिक हो।
विदेशी चंदा लेने वाली संस्थाएँ
उस संस्था को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 के तहत एक वर्ष में किसी विदेशी स्रोत से 10 लाख रुपये से अधिक का दान मिला हो।
प्रधानमंत्री पर सीमाएँ
केवल भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय संबंध, सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष से जुड़े मामलों में अधिकार नहीं।
शक्तियाँ
सभी लोकसेवकों से संपत्ति व देनदारियों की घोषणा कराना।
CBI को जाँच सौंपने और उसे निर्देशित करने का अधिकार।
बिना अनुमति CBI अधिकारी का ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।
सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ (रिकॉर्ड पेश कराना, गवाह बुलाना आदि)।
भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति जब्त करने की शक्ति।
संबंधित अधिकारी के निलंबन/स्थानांतरण की सिफारिश।
रिकॉर्ड नष्ट करने से रोकने का आदेश देने का अधिकार।
सीमाएँ / कमियाँ
2013 का अधिनियम पास होने के 5 साल बाद (2019) लोकपाल नियुक्त हुआ – राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।
केवल 16 राज्यों ने लोकायुक्त नियुक्त किए।
नियुक्ति समिति में राजनीतिक दलों का प्रभुत्व → राजनीतिक प्रभाव से स्वतंत्र नहीं।
‘प्रख्यात न्यायविद’ या ‘सत्यनिष्ठ व्यक्ति’ की परिभाषा अस्पष्ट → मनमानी संभव।
व्हिसलब्लोअर संरक्षण कमजोर – शिकायतकर्ता पर भी कार्रवाई हो सकती है।
न्यायपालिका लोकपाल के दायरे से बाहर।
कोई संवैधानिक आधार नहीं, न ही पर्याप्त अपील तंत्र।
लोकायुक्त नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह राज्यों पर छोड़ी गई।
भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतें 7 साल बाद दर्ज नहीं की जा सकतीं।
मामलों के लिए समय-सीमा: प्रारंभिक जांच-पड़ताल: 90 दिन; जांच: 6 महीने (जरूरत पड़ने पर बढ़ाई भी जा सकती है)।
सुधार हेतु सुझाव
लोकपाल व लोकायुक्त को कार्यात्मक स्वायत्तता, पर्याप्त मानव संसाधन और वित्तीय स्वतंत्रता दी जाए।
नियुक्तियाँ पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से हों।
अधिक पारदर्शिता, RTI की सुदृढ़ता, और नागरिकों/समूहों का सशक्तिकरण।
केवल जांच एजेंसियों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुधार ज़रूरी।
एक ही संस्था में अत्यधिक शक्ति न हो → जवाबदेही + विकेंद्रीकरण आवश्यक।
लोकपाल-लोकायुक्त राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हों।
लोकपाल एवं लोकायुक्त (संशोधन) विधेयक, 2016
जुलाई 2016 में संसद ने लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 में संशोधन पारित किया।
विपक्ष के मान्यता प्राप्त नेता के अभाव में लोकसभा के सबसे बड़े विरोधी दल का नेता चयन समिति का सदस्य होगा।
अधिनियम 2013 की धारा 44 में संशोधन किया गया।
अब 30 दिन में संपत्ति-घोषणा की बाध्यता समाप्त कर दी गई।
लोकसेवक अब सरकार द्वारा तय रूप और तरीके से अपनी संपत्ति व दायित्व घोषित करेंगे।
ट्रस्टियों और बोर्ड सदस्यों को भी अपनी तथा पति/पत्नी की संपत्ति की घोषणा करनी होगी।
यह प्रावधान तब लागू होगा जब वे 1 करोड़ रुपये से अधिक सरकारी या 10 लाख रुपये से अधिक विदेशी धन प्राप्त करते हों।