संसद में नेता एवं संसदीय प्रावधान

संसद में नेता संसदीय कार्यवाही के सुचारु संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय के अंतर्गत यह विषय लोकसभा एवं राज्यसभा में नेता सदन और नेता प्रतिपक्ष की भूमिका, अधिकारों और दायित्वों को स्पष्ट करता है। संसदीय लोकतंत्र में नीति-निर्माण और जवाबदेही सुनिश्चित करने में इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

लोकसभा में नेताओं की भूमिका

  • सदन का नेता (Leader of the House)
    • केवल नियमावली में है , संविधान में नहीं है।
    • लोकसभा में प्रधानमंत्री सदन का नेता होता है, बशर्ते वह लोकसभा का सदस्य हो।
    • यदि प्रधानमंत्री राज्यसभा से है तो वह लोकसभा से किसी अन्य मंत्री को सदन का नेता नियुक्त करता है।
    • राज्यसभा में प्रधानमंत्री स्वयं या उनके द्वारा नामित मंत्री सदन का नेता होता है।
  • ऐतिहासिक तथ्य
    • लोकसभा में पहले सदन के नेता : जवाहरलाल नेहरू
    • राज्यसभा में पहले सदन के नेता : एन. गोपालस्वामी आयंगर
    • डॉ. मनमोहन सिंह (प्रधानमंत्री) राज्यसभा से थे, उस समय लोकसभा में प्रणव मुखर्जी (2004-12) व सुशील कुमार शिंदे (2012-14) सदन के नेता थे।
    • इंदिरा गांधी जब 1966 में पहली बार प्रधानमंत्री बनीं, तब वह राज्यसभा की सदस्य थीं और एम.सी. छागला राज्यसभा के नेता थे।
  • वर्तमान स्थिति (18वीं लोकसभा, 2024)
    • लोकसभा में सदन के नेता : नरेन्द्र मोदी
    • राज्यसभा में सदन के नेता : जेपी नड्डा
  • राज्यसभा में 
    • प्रधानमंत्री किसी राज्यसभा सदस्य मंत्री को सदन का नेता नामित करता है।
  • महत्व:
    • सदन की कार्यवाही के समुचित संचालन में इनकी अहम भूमिका होती है।
    • यह अमेरिका के ‘Majority Leader’ के समान होता है।

विपक्ष का नेता (Leader of Opposition) – 

  • पद की मान्यता
    • दोनों सदनों में एक-एक विपक्ष का नेता होता है।
    • किसी दल को विपक्षी दल का दर्जा पाने के लिए सदन की कुल संख्या का कम से कम 1/10 (10%) सीटें चाहिए।
      • लोकसभा : कम से कम 55 सीटें।
      • राज्यसभा : कम से कम 25 सीटें।
    • यह प्रावधान कानून में नहीं बल्कि लोकसभा अध्यक्ष के निर्देश 121 में है।
    • केवल नियमावली में है , संविधान में नहीं है।
  • भूमिका:
    • सरकार की आलोचना करना व वैकल्पिक नीतियाँ प्रस्तुत करना।
    • वैकल्पिक सरकार की तैयारी करना।
  • ऐतिहासिक तथ्य
    • 1965: पहली बार मान्यता मिली।
    • 1977: इस पद को कानूनी मान्यता प्राप्त हुई।
    • 18 दिसम्बर 1969 : राज्यसभा में कांग्रेस (O) को विपक्षी दल का दर्जा मिला। पहले नेता प्रतिपक्ष : श्याम नंदन मिश्र।
    • 17 दिसम्बर 1969 : लोकसभा में कांग्रेस (O) को मान्यता मिली। पहले नेता प्रतिपक्ष : राम सुभग सिंह।
    • पेज समिति ने अनुशंसा की थी कि सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को यह दर्जा दिया जाए।
    • 1977 का “विपक्ष के नेता (वेतन व भत्ता) अधिनियम” लागू हुआ, जिससे पद को वैधानिक दर्जा मिला।
  • विशेष तथ्य
    • 1980-89 तथा 16वीं लोकसभा (2014-19) और 17वीं लोकसभा (2019-24) में विपक्ष का नेता नहीं था क्योंकि कोई दल 10% सीटें नहीं ला सका।
    • 18वीं लोकसभा (2024) : कांग्रेस ने 99+ सीटें हासिल कीं → विपक्ष का दर्जा मिला।
    • 9 जून 2024 से राहुल गांधी विपक्ष के नेता बने।
  • महत्त्व
    • लोकपाल, मानवाधिकार आयोग, केंद्रीय सतर्कता आयोग, सूचना आयोग आदि पदों पर नियुक्ति में विपक्षी नेता की सहमति आवश्यक।
    • गठबंधन सरकारों में यह पद और भी महत्वपूर्ण है।
  • विदेशी तुलना
    • अमेरिका में विपक्ष के नेता को “Minority Leader” कहते हैं।
    • ब्रिटेन में “Shadow Cabinet” व्यवस्था है, जहाँ विपक्षी नेता को “Alternative Prime Minister” कहा जाता है।
    • आइवर जेनिंग्स: विपक्ष के नेता को “वैकल्पिक प्रधानमंत्री” कहते हैं।

व्हिप (Whip / सचेतक)

  • संवैधानिक स्थिति:
    • ‘व्हिप’ के पद का उल्लेख न तो भारत के संविधान में, न ही सदन के नियमों में और न ही संसदीय क़ानून में किया गया है। यह संसदीय सरकार की परंपराओं पर आधारित है।
    • व्हिप = “Hunter / कोड़ा” (अनुशासन लागू करने का प्रतीक)।
  • नियुक्ति
    • हर राजनीतिक दल (सत्तापक्ष/विपक्ष) अपने सचेतक नियुक्त करता है।
    • एक मुख्य सचेतक और अन्य उपसचेतक होते हैं।
  • भूमिका:
    • अपने दल के सदस्यों की उपस्थिति सुनिश्चित करना।
    • मतदान और व्यवहार को नियंत्रित करना।
    • यदि कोई सदस्य व्हिप का उल्लंघन करता है तो उस पर दल-बदल विरोधी अधिनियम के तहत सदस्यता समाप्ति तक हो सकती है।
  • विशेष तथ्य
    • सत्ताधारी दल का मुख्य सचेतक → संसदीय कार्य मंत्री होता है।
    • व्हिप की आलोचना होती है क्योंकि यह सांसदों की स्वतंत्रता सीमित करता है।
    • व्हिप संसदीय शासन की विशेषता है, अध्यक्षात्मक शासन की नहीं।

संसद सदस्यों के विशेषाधिकार

अनुच्छेद 105 : संसद सदस्यों के विशेषाधिकार

सामान्य प्रावधान
  • संसदीय विशेषाधिकार वे विशेष अधिकार, उन्मुक्तियाँ और छूटें हैं जो संसद के दोनों सदनों, उनकी समितियों और सदस्यों को प्राप्त हैं।
  • इनका उद्देश्य संसद की स्वतंत्रता, गरिमा और कार्यक्षमता को बनाए रखना है।
  • संसदीय विशेषाधिकारों को स्वयं संसद विधि द्वारा निश्चित करती है।
  • जब तक संसद द्वारा विशेषाधिकार तय नहीं किए गए (44वाँ संविधान संशोधन, 1978), तब तक वही विशेषाधिकार लागू रहे जो 26 जनवरी 1950 को ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) के सदस्यों को प्राप्त थे।
  • 44वें संशोधन, 1978 में केवल ब्रिटिश संसद के संदर्भ को हटाया गया, लेकिन विशेषाधिकारों में कोई बदलाव नहीं किया गया।
  • संविधान के अनुच्छेद 105 (संसद) और 194 (विधानमण्डल) के तहत लोकसभा, राज्यसभा तथा राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार समान हैं।
  • ये अधिकार भारत के महान्यायवादी और केंद्रीय मंत्रियों को भी मिलते हैं, जब वे संसद में बोलते हैं या भाग लेते हैं।

नोट: राष्ट्रपति को ये विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हैं, भले ही वे संसद का हिस्सा हैं।

वर्गीकरण:
  1. सामूहिक विशेषाधिकार (Collective Privileges)
  2. व्यक्तिगत विशेषाधिकार (Individual Privileges)
  3. संसदीय समितियों के विशेषाधिकार
विशेषाधिकार समितियाँ
  • लोकसभा → अध्यक्ष द्वारा मनोनीत 15 सदस्यीय समिति
  • राज्यसभा → सभापति द्वारा मनोनीत 10 सदस्यीय समिति
व्यक्तिगत विशेषाधिकार (Individual Privileges)
  1. गिरफ्तारी से छूट
    • सदस्य को सदन के सत्र, समिति की बैठक, संयुक्त बैठक से 40 दिन पूर्व व 40 दिन पश्चात तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
    • यह छूट केवल सिविल मामलों में है, आपराधिक या निवारक निरोध (Preventive Detention) मामलों में नहीं।
  2. साक्षी के रूप में हाजिरी से मुक्ति
    • सत्र के दौरान किसी सांसद को गवाही देने हेतु समन नहीं किया जा सकता।
  3. वाक् स्वतंत्रता
    • सांसद को संसद/समिति में कही गई बात के लिए न्यायालय में उत्तरदायी नहीं ठहराया जाएगा।
    • परंतु यह स्वतंत्रता सदन की आंतरिक कार्यप्रणाली और नियमों के अधीन है।

सामूहिक विशेषाधिकार (Collective Privileges)

  • संसद के दोनों सदनों को सामूहिक रूप से निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं:
    1. कार्यवाही, बहस, रिपोर्ट आदि को प्रकाशित करने और दूसरों को बिना अनुमति प्रकाशित न करने का अधिकार।
      • नोट: 44वें संशोधन (1978) के अनुसार, प्रेस को सदन की अनुमति के बिना भी सही रिपोर्ट प्रकाशित करने की स्वतंत्रता है (गुप्त बैठकों को छोड़कर)।
    2. गुप्त बैठक बुला सकती है और अतिथियों को सदन से बाहर निकाल सकती है।
    3. अपने कार्य संचालन के लिए नियम बना सकती है।
    4. विशेषाधिकार हनन या अवमानना करने पर किसी को दंडित कर सकती है (सदस्यों को निष्कासित भी कर सकती है)।
    5. किसी सदस्य की गिरफ्तारी या सजा की सूचना तुरंत पाने का अधिकार।
    6. जाँच करने और गवाहों तथा दस्तावेजों की मांग करने का अधिकार।
    7. न्यायालय संसद की कार्यवाही की जांच नहीं कर सकते।
    8. पीठासीन अधिकारी की अनुमति के बिना सदन परिसर में किसी सदस्य को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

विशेषाधिकार हनन और सदन की अवमानना:

  • विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege):
    • जब कोई व्यक्ति या संस्था संसद या उसके सदस्य के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करता है अर्थात् संसद की मानहानि को विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) कहा जाता है।
    • अनुच्छेद 122 : न्यायालय संसद की कार्यवाहियों की जाँच नहीं करेगा।
    • यह एक दंडनीय अपराध है।
  • सदन की अवमानना (Contempt of the House):
    • कोई भी कार्य या चूक जो संसद की कार्यवाही को बाधित करे या उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाए।
    • यह विशेषाधिकार हनन से व्यापक है।
  • महत्वपूर्ण अंतर:
    • हर विशेषाधिकार हनन सदन की अवमानना हो सकती है, लेकिन हर अवमानना विशेषाधिकार हनन नहीं होती।
    • संसद के आदेश की अवहेलना – विशेषाधिकार हनन नहीं, परंतु अवमानना हो सकती है।
  • उदाहरण:
    • 1976 → सुब्रह्मण्यम स्वामी राज्यसभा से निष्कासित।
    • इंदिरा गाँधी लोकसभा से निष्कासित।
    • Amrinder Singh बनाम Special Committee (2010) : किसी सदस्य को पूर्व कार्यों के लिए निष्कासित नहीं किया जा सकता।
    • S.M. Sharma बनाम श्रीकृष्ण सिन्हा (1958) : संसद के विशेषाधिकार बनाम मौलिक अधिकार – संसद विशेषाधिकारों को प्राथमिकता दी जाएगी।

विशेषाधिकारों के स्रोत (Sources of Privileges):

  1. संविधान (Article 105)
    • भाषण की स्वतंत्रता और कार्यवाही के प्रकाशन का अधिकार।
  2. ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स की परंपराएं
    • जब तक संसद इन्हें संहिताबद्ध नहीं करती, तब तक 26 जनवरी 1950 के अनुसार इन्हें मान्यता प्राप्त है।
  3. 44वां संशोधन (1978)
    • अन्य विशेषाधिकार भी 20 जून 1979 से मान्य माने गए।
  4. विशेष कानून – संसद द्वारा बनाए गए कानून।
  5. सदन के नियम और परंपराएं।
  6. न्यायिक निर्णय और व्याख्याएं
पी.वी. नरसिम्हा राव वाद (1998)
  1. विषय
    • मामला सांसदों व विधायकों के विशेषाधिकारों से जुड़ा।
    • खासकर अनुच्छेद 105(2) और 194(2) की व्याख्या से संबंधित।
    • यह प्रावधान सांसदों/विधायकों को सदन में भाषण या मतदान के लिए न्यायालयीन कार्रवाई से सुरक्षा देता है।
  2. अनुच्छेद 105(2)
    • संसद में या समिति में सांसद द्वारा कही गई बात या दिए गए मत पर न्यायालय में कोई कार्रवाई नहीं होगी।
    • संसद या उसकी समिति की कार्यवाही, मतों, पत्रों या प्रतिवेदनों के प्रकाशन पर भी कोई न्यायालयीन कार्यवाही नहीं होगी।
  3. पृष्ठभूमि (1993)
    • प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार के खिलाफ CPI(M) ने अविश्वास प्रस्ताव लाया।
    • कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था।
    • सरकार ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और जनता दल के सांसदों के समर्थन से 265 मत जुटाए (विरोध में 251 मत)।
    • सरकार बच गई, लेकिन आरोप लगे कि JMM सांसदों को रिश्वत दी गई थी।
    • यह मामला “नोट के बदले वोट” कांड के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
  4. सर्वोच्च न्यायालय का फैसला (1998)
    • मामला तीन साल बाद सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा।
    • पाँच सदस्यीय पीठ ने बहुमत से निर्णय दिया:
    • सदन में मतदान करना सांसदों का विशेषाधिकार है (अनु. 105(2))।
    • रिश्वत लेने के बावजूद सांसदों पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
    • यानी JMM सांसदों को सुरक्षा मिल गई।
  5. सीता सोरेन मामला (2012)
    • JMM की विधायक सीता सोरेन ने राज्यसभा चुनाव में रिश्वत लेकर वोट दिया।
    • उन पर आपराधिक मुकदमा चला।
    • सोरेन ने सर्वोच्च न्यायालय से पी.वी. नरसिम्हा राव केस (1998) के फैसले के तहत सुरक्षा माँगी।
  6. नया फैसला (मार्च 2024)
    • मामला फिर से बड़ी पीठ (7 सदस्यीय) के पास गया, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चन्द्रचूड़ ने की।
    • पीठ ने 1998 के फैसले की समीक्षा कर सर्वसम्मति से पलट दिया।
  7. निर्णय:
    • रिश्वतखोरी को संसदीय विशेषाधिकारों की छूट नहीं मिलेगी।
    • विधायी विशेषाधिकारों को संवैधानिक मानदंडों के अनुरूप होना चाहिए।

संसद में सीटों का बंटवारा

क्र. सं.राज्य / केंद्रशासित प्रदेशराज्यसभा    सीटेंलोकसभा सीटें
राज्य
1आंध्र प्रदेश  1125
2अरुणाचल प्रदेश12
3असम714
4बिहार1640
5छत्तीसगढ़511
6गोवा12
7गुजरात1126
8हरियाणा510
9हिमाचल प्रदेश34
10जम्मू और कश्मीर46
11झारखंड614
12कर्नाटक1228
13केरल920
14मध्य प्रदेश1129
15महाराष्ट्र1948
16मणिपुर12
17मेघालय12
18मिजोरम11
19नागालैंड11
20ओड़िशा1021
21पंजाब713
22राजस्थान1025
23सिक्किम11
24तमिलनाडु1839
25तेलंगाना717
26त्रिपुरा12
27उत्तराखंड35
28उत्तर प्रदेश3180
29पश्चिम बंगाल1642
केंद्रशासित प्रदेश
1अंडमान और निकोबार द्वीप समूह1
2चंडीगढ़1
3दादरा और नागर हवेली1
4दमन और दीव1
5दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र)37
6लक्षद्वीप1
7पुडुचेरी11
नामित सदस्य
1राष्ट्रपति द्वारा नामित सदस्य122(104वें संशोधन अधिनियम, 2019) समाप्त
कुल245545(वर्तमान -543)

लोकसभा में अनुसूचित जाति (अ.जा.) एवं अनुसूचित जनजाति (अ.ज.जा.) के लिए आरक्षित सीटें(2008 के परिसीमन के बाद संसद में स्थान)

राज्य/केंद्रशासित प्रदेशकुलअ.जा.अ.ज.जा.
राजस्थान2543
कुल सीटें5438447

लोकसभा की अवधियाँ एवं विघटन विवरण

क्रम

लोकसभा

अवधि

विघटन/विशेष टिप्पणी

1

पहली

1952–1957

2

दूसरी

1957–1962

3

तीसरी

1962–1967

4

चौथी

1967–1970

अपना कार्यकाल पूरा करने के 38 दिन पहले विघटित हो गई

5

पांचवीं

1971–1977

  • पांचवीं लोकसभा का सामान्य कार्यकाल 15 मार्च, 1976 को समाप्त होना था।
  • इसे लोकसभा (अवधि विस्तार) अधिनियम, 1976 के अंतर्गत एक वर्ष के लिए 18 मार्च, 1977 तक बढ़ाया गया।
  • इसके बाद, लोकसभा (अवधि विस्तार) संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा इसे एक वर्ष और, यानी 18 मार्च, 1978 तक के लिए फिर से बढ़ाया गया।
  • हालाँकि, यह लोकसभा 18 जनवरी, 1977 को ही पाँच वर्ष, 10 माह, 6 दिन के कार्यकाल के बाद विघटित कर दी गई।

6

छठी

1977–1979

  • 1977 में छठी लोकसभा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की संसद सदस्यता को समाप्त कर दिया।
  • उन्हें सदन की अवमानना के आरोप में एक सप्ताह की जेल की सजा हुई।
  • यह निर्णय उनके प्रधानमंत्री रहते हुए लिया गया था।
  • 1980 में सातवीं लोकसभा ने इस संकल्प को निरस्त कर दिया। सातवीं लोकसभा ने यह कहा कि यह कार्यवाही राजनीतिक कारणों से प्रेरित थी।
  • छठी लोकसभा 2 वर्ष 4 माह 28 दिन में विघटित हो गई

7

सातवीं

1980–1984

कार्यकाल पूरा करने के 20 दिन पहले विघटित हो गई

8

आठवीं

1985–1989

कार्यकाल पूरा करने के 48 दिन पहले विघटित हो गई

9

नौवीं

1989–1991

1 वर्ष 2 माह 25 दिन बाद विघटित हो गई

10

दसवीं

1991–1996

11

ग्यारहवीं

1996–1997

1 वर्ष 2 माह 25 दिन बाद विघटित हो गई

12

बारहवीं

1998–1999

1 वर्ष 1 माह 4 दिन बाद विघटित हो गई

13

तेरहवीं

1999–2004

कार्यकाल से 253 दिन पहले विघटित हो गई

14

चौदहवीं

2004–2009

15

पंद्रहवीं

2009–2014

16

सोलहवीं

2014–2019

17

सत्रहवीं 

2019-2023

18

अठारहवीं 

2023 से अब तक 

संसद का सत्र, सत्रावसान और विघटन

संसद के सत्र

आह्वान (Summoning)

  • संसद के प्रत्येक सदन को राष्ट्रपति समय-समय पर समन जारी कर सत्र के लिए बुलाता है।
  • अधिकतम अंतराल: दो सत्रों के बीच 6 माह से अधिक नहीं हो सकता।
  • वार्षिक सत्र: सामान्यतः 3 होते हैं –
    • बजट सत्र: फरवरी – मई
    • मानसून सत्र: जुलाई – सितंबर
    • शीतकालीन सत्र: नवंबर – दिसंबर

सत्रावसान (Prorogation)

  • यह राष्ट्रपति द्वारा सत्र समाप्त करने की औपचारिक प्रक्रिया है।

स्थगन (Adjournment)

  • संसद की बैठक को कुछ समय (घंटे/दिन/सप्ताह) के लिए निलंबित करना।
  • बैठकें सामान्यतः दो सत्रों में होती हैं:
    • सुबह: 11:00 AM – 1:00 PM
    • दोपहर: 2:00 PM – 6:00 PM

संसद का सत्र बुलाना (Summon) – अनुच्छेद 85(1)

  • राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) को आहूत (Summon) करता है अर्थात सदस्यों को सदन में उपस्थित होने का आदेश देता है।
  • एक सत्र की अंतिम बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक के बीच अधिकतम 6 माह का अंतर हो सकता है।
  • इसका अर्थ है कि संसद को कम से कम वर्ष में दो बार मिलना आवश्यक है।
  • राष्ट्रपति कभी-कभी विशेष बैठक भी बुला सकता है।
  • दो सत्रों के बीच की अवधि को अवकाश (Recess) कहा जाता है।
संसद के सामान्य सत्र
  • भारत में सामान्यतः संसद के तीन सत्र होते हैं:
    1. बजट सत्र (Budget Session) – 1 फरवरी से 7 मई तक। (सबसे लम्बा और महत्वपूर्ण)
    2. मानसून सत्र (Monsoon Session) – 15 जुलाई से 15 सितम्बर तक।
    3. शीतकालीन सत्र (Winter Session) – 5 नवम्बर (या दिवाली के बाद चौथा दिन, जो बाद में हो) से 22 दिसम्बर तक।
आहूत करने का आदेश
  • राष्ट्रपति अनुच्छेद 85(1) के तहत संसद के दोनों सदनों को अलग-अलग आदेश द्वारा आहूत कर सकता है।
  • यह आवश्यक नहीं है कि लोकसभा और राज्यसभा को एक साथ या एक ही तारीख को आहूत और सत्रावसित किया जाए।
  • 1962 से प्रायः दोनों सभाओं की बैठकें साथ आरंभ होती हैं।
  • विशेष उदाहरण: 28 फरवरी 1977 – लोकसभा विघटित थी और चुनाव प्रक्रिया चल रही थी, परन्तु राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने हेतु केवल राज्यसभा की बैठक बुलाई गई।

सत्रावसान (Prorogation) – अनुच्छेद 85(2)(a)

  • राष्ट्रपति के आदेश द्वारा किसी सदन के सत्र की समाप्ति को सत्रावसान कहते हैं।
  • यह सत्र की समाप्ति है, संसद की नहीं।
  • राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद से विचार-विमर्श कर सत्रावसान करता है।
  • सत्रावसान कभी भी किया जा सकता है, चाहे सदन की बैठक चल ही क्यों न रही हो।
  • आदेश तत्काल प्रभाव से लागू होता है (पूर्वलक्षी या भूतलक्षी नहीं)।
  • सत्रावसान के बाद:
    • सदन में लंबित संकल्प और प्रस्ताव समाप्त हो जाते हैं।
    • परंतु विधेयक समाप्त नहीं होते।
  • सत्रावसान और अगले सत्र के बीच की अवधि को अन्तःसत्रावधि (Inter-session) / सत्रावकाश / Recess कहते हैं।
  • किसी बैठक के स्थगन और अगली बैठक के बीच की अवधि को स्थगन (Adjournment) कहते हैं।

स्थगन (Adjournment)

  • स्थगन का अर्थ है – सदन के कार्य को अस्थायी रूप से रोकना।
  • स्थगन केवल अध्यक्ष (लोकसभा) या सभापति (राज्यसभा) करते हैं।
  • यह निश्चित समय के लिए या अनिश्चितकाल (Adjournment Sine Die) तक किया जा सकता है।
  • अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद राष्ट्रपति सामान्यतः सदन का सत्रावसान करता है।
  • यदि गणपूर्ति (Quorum) पूरी न हो तो पीठासीन अधिकारी अधिवेशन को निलंबित (Suspend) कर सकता है।
  • यदि अन्य कारण से बैठक रोकी जाती है तो वह स्थगन कहलाता है, न कि निलंबन।
अनिश्चित काल के लिए स्थगन (Adjournment sine die)
  • इसका अर्थ है – सदन को बिना अगली बैठक की तारीख घोषित किए स्थगित कर देना।
  • यह निर्णय लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति द्वारा लिया जाता है।
  • अध्यक्ष/सभापति आवश्यकता अनुसार पहले से तय दिन/समय से पहले या बाद में भी बैठक बुला सकते हैं।

स्थगन बनाम सत्रावसान

क्र.सं.स्थगन सत्रावसान
1यह सिर्फ एक बैठक को समाप्त करता है न कि सत्र को।यह न केवल बैठक बल्कि सदन के सत्र को समाप्त करता है।
2यह सदन के पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है।इसे राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
3यह किसी विधेयक या सदन में विचाराधीन काम पर असर नहीं डालता क्योंकि वही काम दोबारा होने वाली बैठक में किया जा सकता है।यह भी किसी विधेयक पर प्रभाव नहीं डालता लेकिन बचे हुए काम के लिए अगले सत्र में नया नोटिस देना पड़ता है। 13 ब्रिटेन में सत्रावसान के कारण विधेयक या अन्य लंबित कार्य समाप्त माने जाते हैं।

बैठकें (Sitting)

  • प्रत्येक सदन की बैठकों की तिथि तय करने का अधिकार संबंधित अध्यक्ष/सभापति को है।
  • इसके लिए सरकार की सहमति आवश्यक नहीं है।
  • प्रायः यह निर्णय सदन की इच्छा या कार्य मंत्रणा समिति (Business Advisory Committee) की सिफारिश पर लिया जाता है।

लोकसभा का विघटन (Dissolution) – अनुच्छेद 85(2)(b)

  • विघटन केवल लोकसभा का होता है (राज्यसभा स्थायी सदन है, उसका विघटन नहीं होता)।
  • राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर लोकसभा का विघटन करता है।
  • विघटन के परिणाम:
    • लोकसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाता है।
    • नयी लोकसभा के लिए सामान्य चुनाव कराए जाते हैं।
  • विघटन दो प्रकार से हो सकता है:
    • लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष पूरा होने पर (अनुच्छेद 83(2))।
    • राष्ट्रपति के आदेश द्वारा 5 वर्ष पूर्ण होने से पहले।
  • विघटन के बाद लोकसभा पुनः केवल चुनाव पश्चात् ही समवेत हो सकती है।
  • लोकसभा विघटन के बाद:
    • सभी प्रस्ताव, संकल्प, याचिकाएँ आदि समाप्त हो जाते हैं।
    • विधेयकों की स्थिति अलग-अलग होती है।

लोकसभा विघटन के बाद विधेयकों की स्थिति – अनुच्छेद 107

  • समाप्त होने वाले विधेयक
    • लोकसभा में विचाराधीन विधेयक (चाहे पहली बार प्रस्तुत हुआ हो या राज्यसभा से आया हो)।
    • लोकसभा से पारित किन्तु राज्यसभा में लंबित विधेयक।
  • समाप्त न होने वाले विधेयक
    • दोनों सदनों की असहमति के कारण लंबित विधेयक, यदि राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक बुला ली हो।
    • राज्यसभा में विचाराधीन वह विधेयक जो वहीं से प्रारंभ हुआ हो और लोकसभा तक न पहुँचा हो।
    • दोनों सदनों से पारित विधेयक जो राष्ट्रपति की अनुमति (Assent) हेतु लंबित हो।
    • दोनों सदनों से पारित विधेयक जिसे राष्ट्रपति ने पुनर्विचार हेतु लौटा दिया हो।

गणपूर्ति (कोरम / Quorum)

  • सदन की कार्यवाही चलाने के लिए न्यूनतम सदस्यों की आवश्यकता को “गणपूर्ति” कहा जाता है।
  • यह संख्या सदन की कुल सदस्य संख्या का 1/10 भाग होती है:
  • लोकसभा में: 55 सदस्य
  • राज्यसभा में: 25 सदस्य
  • यदि कोरम पूरा नहीं होता, तो अध्यक्ष/सभापति को सदन स्थगित करना पड़ता है या कार्यवाही रोकनी पड़ती है।

सदन में मतदान (Voting in the House)

  • सामान्य मामलों में निर्णय उपस्थित सदस्यों के बहुमत से होता है।
  • कुछ विशेष मामलों (जैसे महाभियोग, संविधान संशोधन आदि) में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।
  • अध्यक्ष/सभापति सामान्यतः मत नहीं देते, लेकिन मतों की बराबरी की स्थिति में निर्णायक मत देते हैं।
  • अनाधिकृत सदस्य या रिक्तियों की उपस्थिति के बावजूद कार्यवाही वैध मानी जाती है।

लोकसभा में मतदान की प्रक्रिया

  1. अध्यक्ष अंत में प्रश्न पूछते हैं –
    • प्रस्ताव के पक्ष में सदस्य ‘Aye’ कहते हैं।
    • विरोध में सदस्य ‘No’ कहते हैं।
  2. अध्यक्ष घोषणा करते हैं: “मुझे लगता है कि प्रस्ताव अयेस (या नोज) के पक्ष में है।”
    • अगर कोई सदस्य आपत्ति नहीं करता, तो वे कहते हैं: “Ayes (या Noes) have it” और प्रस्ताव पारित हो जाता है।
  3. यदि निर्णय को चुनौती दी जाए:
  1. अध्यक्ष लॉबी खाली करने का आदेश देते हैं।
  2. 3 मिनट और 3 सेकंड बाद पुनः प्रश्न पूछते हैं।
  3. अगर फिर भी आपत्ति हो, तो मतों की रिकॉर्डिंग होती है:
    1. स्वचालित वोट रिकॉर्डर
    2. स्लिप से मतदान
    3. लॉबी में जाकर मतदान
  4. यदि अध्यक्ष को लगता है कि मत विभाजन की आवश्यकता नहीं है, तो वे कह सकते हैं:
    1. “Ayes” और “Noes” वाले सदस्य अपनी-अपनी जगह पर खड़े हों।
    2. गिनती कर के निर्णय घोषित किया जाएगा। (इसमें मतदाताओं के नाम रिकॉर्ड नहीं किए जाते।)

संसद में भाषा

  1. संविधान के अनुसार, संसद की कार्यवाही की भाषा हिंदी और अंग्रेज़ी है।
  2. पीठासीन अधिकारी किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में बोलने की अनुमति दे सकता है।
  3. दोनों सदनों में अनुवाद की समानांतर व्यवस्था उपलब्ध है।
  4. संविधान में यह प्रावधान था कि संविधान लागू होने की तिथि (1950) से 15 वर्षों बाद (यानी 1965 में) अंग्रेजी भाषा समाप्त हो जाएगी।
  5. राजभाषा अधिनियम, 1963 के तहत अंग्रेज़ी को हिंदी के साथ निरंतर प्रयोग में रखने की अनुमति दी गई।

अधिवेशन (Session) और मंत्री व महान्यायवादी के अधिकार

  • संसद के सदनों की प्रतिदिन की बैठक को अधिवेशन (Sitting) कहते हैं।
  • मंत्रियों के अधिकार
    • कोई भी मंत्री दोनों सदनों की बैठक में भाग ले सकता है, बोल सकता है।
    • मतदान केवल उसी सदन में कर सकता है जिसका वह सदस्य है।
    • यदि मंत्री किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तब भी बैठक में भाग लेकर बोल सकता है, पर मतदान नहीं कर सकता।
  • संसदीय सचिव को यह अधिकार नहीं है।
  • महान्यायवादी (Attorney General)
    • दोनों सदनों, संयुक्त बैठक और संसदीय समितियों की बैठक में भाग ले सकता है।
    • बोल सकता है, पर मतदान का अधिकार नहीं है।
    • महान्यायवादी संसद का सदस्य नहीं होता, फिर भी बैठकों में भाग ले सकता है।

लेम-डक सत्र (Lame-duck Session)

  • यह लोकसभा के नए गठन से पहले वर्तमान लोकसभा का अंतिम सत्र होता है।
  • वर्तमान लोकसभा के वे सदस्य, जो नई लोकसभा में पुनः निर्वाचित नहीं होते, उन्हें ‘लेम-डक’ कहा जाता है।

राज्यसभा और लोकसभा की समान शक्तियाँ:

  • साधारण विधेयक एवं संविधान संशोधन विधेयक की प्रस्तुति व पारित करना।
  • राष्ट्रपति का निर्वाचन एवं महाभियोग की प्रक्रिया।
  • उपराष्ट्रपति का निर्वाचन (दोनों सदनों द्वारा), परंतु हटाने की पहल राज्यसभा करती है।
    • राज्यसभा संकल्प पारित करती है → तत्पश्चात लोकसभा की सहमति आवश्यक।
  • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) को हटाने हेतु राष्ट्रपति को सिफारिश करना।
  • राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश को स्वीकृति देना।
  • राष्ट्रपति द्वारा घोषित तीनों प्रकार के आपातकाल (राष्ट्रीय, राज्य, वित्तीय) का अनुमोदन करना।
  • प्रधानमंत्री व मंत्री किसी भी सदन के सदस्य हो सकते हैं।

लोकसभा की विशेष शक्तियाँ

  • स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion), अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion), विश्वास प्रस्ताव (Confidence Motion) और निंदा प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही लाए जा सकते हैं।
  • मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व केवल लोकसभा के प्रति है।
  • धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में प्रस्तुत हो सकता है।
  • राज्यसभा धन विधेयक में संशोधन नहीं कर सकती, सिर्फ सिफारिश दे सकती है। अंतिम निर्णय लोकसभा का ही होता है।
  • राज्यसभा बजट पर चर्चा कर सकती है, पर मतदान नहीं। अनुदान की मांगों पर मतदान का अधिकार केवल लोकसभा को है।
  • दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है।
  • संयुक्त बैठक में लोकसभा का बहुमत प्रभावी होता है।
  • राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) समाप्त करने का संकल्प केवल लोकसभा पारित कर सकती है।

राज्यसभा की विशेष शक्तियाँ:

  1. राज्य सूची पर कानून बनाने की अनुमति दे सकती है – अनुच्छेद 249 के तहत।
  2. नई अखिल भारतीय सेवाओं का निर्माण कर सकती है – अनुच्छेद 312 के तहत।
  3. उपराष्ट्रपति को हटाने का संकल्प।

संसदीय कार्यवाही के साधन

प्रश्नकाल (Question Hour)

  • संसद का पहला घंटा (11–12 बजे) प्रश्नकाल कहलाता है।
  • सांसद मंत्रियों से प्रश्न पूछते हैं। प्रश्न तीन प्रकार के होते हैं:
    1. तारांकित प्रश्न – मौखिक उत्तर दिया जाता है; पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। (15 दिन पूर्व नोटिस)
    2. अतारांकित प्रश्न – लिखित उत्तर दिया जाता है; पूरक प्रश्न नहीं होते।
    3. अल्प सूचना प्रश्न – सार्वजनिक महत्व का प्रश्न, 10 दिन पूर्व नोटिस, उत्तर मौखिक और पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
  • प्रश्न केवल मंत्रियों को ही नहीं, बल्कि प्राइवेट सदस्यों से भी किए जा सकते हैं, यदि विषय उनके कार्य से जुड़ा हो।
  • प्रश्नों की छपाई का रंग:
    1. तारांकित – हरा
    2. अतारांकित – सफेद
    3. अल्प सूचना – गुलाबी
    4. प्राइवेट सदस्य प्रश्न – पीला
  • लोकसभा
    • एक सदस्य प्रतिदिन केवल 1 तारांकित प्रश्न पूछ सकता है।
    • एक दिन में कुल 20 तारांकित प्रश्न।
    • अतारांकित प्रश्न प्रतिदिन अधिकतम 230।
    • एक सदस्य यदि तारांकित प्रश्न पूछे तो अधिकतम 4 अतारांकित प्रश्न और यदि न पूछे तो 5 अतारांकित प्रश्न पूछ सकता है।
  • राज्यसभा
    • अधिकतम अतारांकित प्रश्न प्रतिदिन – 175।
    • अन्य नियम लोकसभा जैसे ही।
  • शून्यकाल (Zero Hour)
    • प्रश्नकाल के बाद 12–1 बजे तक।
    • 1962 से प्रचलित, भारतीय संसदीय परम्परा की विशेष देन।
    • बिना पूर्व सूचना के महत्त्वपूर्ण विषयों पर चर्चा।
    • मंत्री तत्काल उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं।
    • यह संविधान या नियमों में उल्लिखित नहीं है; यह एक अनौपचारिक प्रक्रिया है।
    • प्रो. एन. जी. रंगा के शब्दों में – “शून्यकाल का आरंभ होना अत्यन्त विलक्षण और उत्तेजक घटना है।”
  • अल्पकालिक चर्चा
    • भारतीय परम्परा की देन।
    • सप्ताह में सामान्यतः दो दिन, लगभग 2 घंटे।
    • सार्वजनिक महत्व के विषयों पर चर्चा।
  • आधे घंटे की बहस
    • पर्याप्त लोक महत्व के विषय पर।
    • सामान्यतः सप्ताह में तीन दिन।
    • पीठासीन अधिकारी की अनुमति आवश्यक।
  • प्रस्ताव (Motions)
    • सदस्य अपने विचार/इच्छा व्यक्त करने हेतु प्रस्ताव लाते हैं।
    • लोकमहत्व के किसी मुद्दे पर पीठासीन अधिकारी की स्वीकृति से ही बहस संभव होती है। विभिन्न विषयों पर सदन अपना मत या निर्णय किसी मंत्री या गैर-सरकारी सदस्य द्वारा लाये गये प्रस्ताव को स्वीकृत या अस्वीकृत करके देता है।
    • मुख्य प्रकार:
      • मूल प्रस्ताव (Substantive Motion) – स्वतंत्र प्रस्ताव जैसे महाभियोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त का हटाना, धन्यवाद प्रस्ताव आदि।
        • अविश्वास प्रस्ताव 
        • विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव 
        • विशेष अभिभाषण के ऊपर धन्यवाद प्रस्ताव
    • स्थानापन्न प्रस्ताव (Substitute Motion) – मूल प्रस्ताव को प्रतिस्थापित करता है। स्वीकृति मिलने पर मूल प्रस्ताव निरस्त हो जाता है।
    • पूरक/सहायक प्रस्ताव (Subsidiary Motion) – मूल प्रस्ताव पर निर्भर। जैसे विधेयक में संशोधन प्रस्ताव। इसका अकेले कोई अर्थ नहीं होता; मूल प्रस्ताव से संबंधित होता है। इसके तीन प्रकार:
      • सहायक प्रस्ताव – नियमित कार्यों में सहायता के लिए प्रयुक्त।
      • स्थान लेने वाला प्रस्ताव – बहस के दौरान किसी प्रस्ताव का स्थान लेता है।
      • संशोधन प्रस्ताव – मूल प्रस्ताव के किसी भाग को बदलने के लिए लाया जाता है।
अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion)
  • अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।
  • लोकसभा में इसे स्वीकार करने का कारण बताना आवश्यक नहीं है। 
  • यह सिर्फ पूरे मंत्रिपरिषद के विरुद्ध ही लाया जा सकता है।
  • यह मंत्रिपरिषद में लोकसभा के विश्वास के निर्धारण हेतु लाया जाता है।
  • यदि यह लोकसभा में पारित हो जाए तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र  देना ही पड़ता है।
  • इस प्रस्ताव के लिए 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है।
  • मंत्रिमण्डल के विरूद्ध सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए सदन की अनुमति प्राप्त होने की तिथि से 10 दिन के अन्दर अविश्वास प्रस्ताव पर वाद-विवाद होता है।
  • नियम 198(1) लोकसभा प्रक्रिया नियमों में इसका उल्लेख।
  • पहला अविश्वास प्रस्ताव: 1963, नेहरू सरकार के विरुद्ध, जे.बी. कृपलानी द्वारा।

विश्वास प्रस्ताव (Motion of Confidence)

  • सरकार द्वारा लाया जाता है, विरोधी दल द्वारा नहीं।
  • लोकसभा प्रक्रिया नियम 184 के अंतर्गत “लोकहित के मामलों” के तहत।
  • पहली बार प्रयोग: 1979, राष्ट्रपति ने चरण सिंह को बहुमत सिद्ध करने को कहा।
  • उदाहरण: वी.पी. सिंह (1990) और देवगौड़ा (1997) विश्वास मत हार गए।
  • अटल बिहारी वाजपेयी (1999) एक वोट से विश्वास मत हार गए।
  • मनमोहन सिंह (2008) ने विश्वास प्रस्ताव जीत लिया।
  • 15 अगस्त 2023 तक 9 विश्वास प्रस्ताव रखे जा चुके हैं
निंदा प्रस्ताव (Censure Motion)
  • केवल लोकसभा में।
  • विपक्ष द्वारा किसी मंत्री/मंत्रियों की आलोचना हेतु।
  • कारण बताना आवश्यक।
  • यह किसी एक मंत्री या मंत्रिसमूह के खिलाफ होता है (पूरे मंत्रिपरिषद के खिलाफ नहीं)।
  • यह अविश्वास प्रस्ताव से भिन्न होता है क्योंकि यह केवल नीति या कार्रवाई की निंदा करता है, यदि यह लोकसभा में पारित हो जाए तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं है।
अविश्वास प्रस्तावनिंदा प्रस्ताव
कारण बताना आवश्यक नहींकारण बताना आवश्यक (निन्दा का कारण स्पष्ट करना होता है)
पूरी मंत्रिपरिषद के विरुद्धकिसी एक मंत्री या मंत्रियों के समूह के विरुद्ध
मंत्रिपरिषद के विश्वास निर्धारण हेतुमंत्रियों की नीतियों या कार्यों की निन्दा हेतु
पारित होने पर मंत्रिपरिषद को अनिवार्य रूप से त्यागपत्र देना पड़ता हैपारित होने पर त्यागपत्र आवश्यक नहीं
लोकसभा (सदन) की अनुमति से स्वीकार किया जाता हैअध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है
  • अविश्वास बनाम 
    • पूरे मंत्रिपरिषद के खिलाफ, कारण बताना आवश्यक नहीं, पारित होने पर मंत्रिपरिषद त्यागपत्र दे।
    • निंदा प्रस्ताव → किसी मंत्री/नीति के खिलाफ, कारण बताना आवश्यक, पारित होने पर त्यागपत्र आवश्यक नहीं।
  • ध्यानाकर्षण प्रस्ताव
    • यह प्रक्रिया नियमों में उल्लिखित है और 1954 से अस्तित्व में है। भारतीय संसदीय देन।
    • पीठासीन की अनुमति से किसी मंत्री का ध्यान तत्कालीन सार्वजनिक महत्व के मुद्दे पर आकृष्ट करना।
  • स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion)
    • किसी राष्ट्रीय महत्व के केवल गंभीर, तात्कालिक, सार्वजनिक महत्त्व के मुद्दों पर चर्चा हेतु चल रही कार्यवाही रोकना।
    • केवल लोकसभा में।
    • 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक।
    • सामान्य कार्यवाही स्थगित, फिर कम से कम 2.30 घंटे चर्चा।
    • केवल एक ही निश्चित विषय पर, वह भी सार्वजनिक महत्व का।
  • विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव
    • यह तब लाया जाता है जब किसी सदस्य को लगता है कि किसी मंत्री ने सदन या उसके सदस्यों के विशेषाधिकार का उल्लंघन किया है।
    • इसका उद्देश्य संबंधित मंत्री की निंदा करना होता है।
    • सदन द्वारा अवमानना पर न्यायपालिका में जा सकते है। 
  • कटौती प्रस्ताव (Cut Motions)
    • केवल लोकसभा में, बजटीय अनुदान में कटौती हेतु। प्रकार:
      • मितव्ययता कटौती (Economy Cut Motion) – निश्चित राशि की कटौती।
      • सांकेतिक कटौती (Token Cut Motion) – किसी नीति की आलोचना हेतु केवल ₹100 की कटौती।
      • नीति संबंधी कटौती (Disapproval of Policy Cut Motion) – किसी नीति की अस्वीकृति हेतु अनुदान को केवल ₹1 करना।
    • कटौती प्रस्ताव तब लाया जाता है जब कोई सदस्य चर्चा को समाप्त कर मतदान की मांग करता है। इसके चार प्रमुख प्रकार हैं:
      • साधारण कटौती: चर्चा पूरी हो चुकी है, अब मतदान कराया जाए।
      • घटकों में कटौती: किसी विधेयक या प्रस्ताव के एक समूह को चर्चा के लिए लिया जाता है और संपूर्ण खंड पर मतदान होता है।
      • कंगारू कटौती: केवल महत्वपूर्ण खंडों पर ही बहस होती है, बाकी को पारित मान लिया जाता है।
      • गिलोटिन प्रस्ताव: यदि किसी विधेयक के भागों पर चर्चा नहीं हो पाई हो, तब समय सीमा के कारण उन्हें चर्चा के बिना ही मतदान के लिए रखा जाता है।
    • कटौती प्रस्ताव को स्वीकृति देना या नहीं, इसका निर्णय लोकसभा अध्यक्ष करता है।
  • धन्यवाद प्रस्ताव (Motion of Thanks)
    • राष्ट्रपति द्वारा संसद के उद्घाटन सत्र में दिए गए अभिभाषण पर चर्चा होती है।
    • इसे दोनों सदनों में पारित करना आवश्यक होता है। अस्वीकार होने पर यह सरकार की हार मानी जाती है।
  • अनियत दिवस प्रस्ताव (Motion on No-Day-Yet-Named)
    • ऐसा प्रस्ताव जिसे चर्चा के लिए कोई तिथि निर्धारित नहीं की जाती है।
    • अध्यक्ष और सदन के नेता के परामर्श से तिथि निर्धारित की जाती है।
  • औचित्य प्रश्न (Point of Order)
    • जब सदन की कार्यवाही नियमों के अनुसार नहीं चलती, तब सदस्य इसके माध्यम से ध्यान आकर्षित करते हैं।
    • इस पर बहस की अनुमति नहीं होती।
  • विशेष उल्लेख (Special Mention)
    • राज्यसभा में महत्वपूर्ण मामले उठाने की व्यवस्था।
    • लोकसभा में यह प्रक्रिया नियम 377 के अंतर्गत ‘नोटिस’ के रूप में जानी जाती है।
  • संकल्प (Resolution)
    • सामान्य जनहित के मामलों पर ध्यान आकर्षित करने के लिए लाया जाता है।
    • प्रकार:
      • गैर-सरकारी संकल्प: गैर-सरकारी सदस्य द्वारा शुक्रवार को लाया जाता है।
      • सरकारी संकल्प: मंत्री द्वारा सोमवार से गुरुवार के बीच लाया जाता है।
      • सांविधिक संकल्प: किसी अधिनियम या संविधान के प्रावधानों के अनुसार लाया जाता है।
    • हर संकल्प एक प्रस्ताव होता है, लेकिन हर प्रस्ताव संकल्प नहीं होता।
    • ऐसे संकल्प जिन्हें संविधान या संसद के किसी अधिनियम के प्रावधान के अनुसार सभा पटल पर रखा जाता है, उन्हें सांविधिक संकल्प कहते हैं।
    • संविधान के अंतर्गत संसद में निम्न प्रयोजनार्थ संकल्प पेश किए जा सकते हैं –
      • राष्ट्रपति पर महाभियोग – अनुच्छेद 61
      • उपराष्ट्रपति को पद से हटाना – अनुच्छेद 67
      • राज्यसभा के उपसभापति को पद से हटाना – अनुच्छेद 90
      • लोकसभा के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाना – अनुच्छेद 94
      • राष्ट्रपति द्वारा प्रस्थापित अध्यादेशों का अनुमोदन – अनुच्छेद 123
      • राज्य सूची के किसी विषय पर संसद द्वारा कानून बनाना – अनुच्छेद 249
      • आपातकालीन उद्घोषणाओं का अनुमोदन –
        • राष्ट्रीय आपात (अनु. 352)
        • राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर (अनु. 356)
        • वित्तीय आपात (अनु. 360)

संकल्प और प्रस्ताव में अंतर

  • सभी संकल्प, मूल प्रस्तावों (Original Motions) की श्रेणी में आते हैं।
  • प्रत्येक संकल्प एक प्रकार का प्रस्ताव होता है, लेकिन हर प्रस्ताव आवश्यक रूप से संकल्प नहीं होता।
  • सभी संकल्पों पर मतदान अनिवार्य होता है, जबकि सभी प्रस्तावों पर मतदान आवश्यक नहीं होता।
  • किसी संकल्प पर स्थानापन्न प्रस्ताव (Substitute Motion) पेश नहीं किया जा सकता।
  • मूल प्रस्तावों पर स्थानापन्न प्रस्ताव प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

संसदीय कार्य प्रक्रिया (लोकसभा) के कुछ प्रमुख नियम

  1. नियम 193
    • अविलम्बनीय लोक महत्व के विषय पर चर्चा के लिए प्रयुक्त।
    • कोई भी सदस्य स्पष्टता और तथ्यों के साथ लिखित सूचना महासचिव को देता है।
    • इस नियम के अंतर्गत सिर्फ चर्चा होती है, मतदान नहीं होता।
  2. नियम 184
    • अध्यक्ष की अनुमति से लोकहित के विषयों पर चर्चा कराई जाती है।
    • इस नियम के अंतर्गत चर्चा के साथ मतदान भी होता है।
    • विश्वास प्रस्ताव (Confidence Motion) इसी नियम के तहत आता है।
  3. नियम 377
    • ऐसे मामले उठाने का प्रावधान जो अन्य नियमों (प्रश्न, अल्पसूचना प्रश्न, प्रस्ताव आदि) के अधीन नहीं उठाए जा सकते।
    • इस नियम के तहत लोकसभा सदस्य एक दिन में अधिकतम 20 मामले उठा सकते हैं।

युवा संसद (Youth Parliament)

  • यह योजना चौथे अखिल भारतीय व्हिप सम्मेलन की अनुशंसा पर शुरू की गई।
  • उद्देश्य:
    • युवाओं को संसदीय कार्यप्रणाली से अवगत कराना।
    • अनुशासन व लोकतांत्रिक मूल्यों की समझ बढ़ाना।
    • लोकतांत्रिक संस्थाओं के कार्यप्रणाली की जानकारी देना।

संसद में विधायी प्रक्रिया

संसद का मुख्य कार्य

  • संसद का मुख्य कार्य विधि निर्माण (Law Making) है।
  • दोनों सदनों (लोकसभा व राज्यसभा) में प्रत्येक विधेयक के चरण समान होते हैं।

संसद में विधेयकों के प्रकार

  • संसद में विधेयक दो प्रकार के होते हैं –
    • सरकारी विधेयक (Government Bill)
    • गैर-सरकारी विधेयक (Private Member’s Bill)

सरकारी विधेयक बनाम गैर-सरकारी विधेयक

क्र.सं.सरकारी विधेयकगैर-सरकारी विधेयक
1इसे संसद में मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।इसे संसद में मंत्री के अलावा किसी अन्य सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।
2यह विधेयक सरकार की नीतियों को दर्शाता है।यह विधेयक विपक्ष या अन्य सदस्यों की राय या सुझाव को प्रदर्शित करता है।
3इसके पारित होने की संभावना अधिक होती है।इसके पारित होने की संभावना कम होती है।
4अस्वीकृत होने पर सरकार को इस्तीफा देना पड़ सकता है।अस्वीकृत होने पर सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
5इसे पेश करने के लिए 7 दिन का नोटिस देना होता है।इसे पेश करने के लिए 1 माह का नोटिस देना होता है।
6यह विधेयक विधि विभाग के परामर्श से तैयार किया जाता है।इसका मसौदा संबंधित सदस्य द्वारा स्वयं तैयार किया जाता है।
7              –2023-24 तक केवल 14 गैर-सरकारी विधेयक पारित हुए हैं।
8                –पहला: मुस्लिम वक्फ विधेयक, 1952 (1954 में पारित, सैयद मोहम्मद अहमद कासनी द्वारा प्रस्तुत)।
9              –अंतिम: सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार) का विस्तार, 1970।

प्रक्रिया के आधार पर विधेयकों के प्रकार

  1. साधारण विधेयक (Ordinary Bill) –
    • वित्तीय विषयों और संविधान संशोधन विधेयक के अलावा अन्य सभी विधेयक।
  2. धन विधेयक (Money Bill) –
    • वित्तीय विषयों जैसे करारोपण, लोक व्यय आदि से संबंधित।
  3. वित्त विधेयक (Finance Bill) –
    • धन विधेयक से भिन्न वित्तीय विषयों से संबंधित।
  4. संविधान संशोधन विधेयक (Constitutional Amendment Bill) –
    • संविधान संशोधन हेतु।
साधारण विधेयक :
  • भारतीय संविधान में विशेष रूप से किसी एक अनुच्छेद में परिभाषित नहीं किया गया है।
  • भारतीय संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले उन विधेयकों को कहा जाता है जो संविधान संशोधन, धन विधेयक या वित्त विधेयक की श्रेणी में नहीं आते। ये विधेयक सामान्य कानूनों से संबंधित होते हैं।
साधारण विधेयक की प्रक्रिया: (Steps in Passage of Ordinary Bill)
  1. प्रथम पाठन (First Reading):
    • अनुच्छेद 107 के अनुसार, साधारण विधेयक किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।
    • यह सरकारी या गैर-सरकारी दोनों हो सकता है।
    • प्रस्तुत करने से पहले पीठासीन अधिकारी को अग्रिम सूचना देनी होती है।
    • यदि विधेयक प्रस्तुति से पहले राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित है तो अनुमति की आवश्यकता नहीं।
    • प्रस्तुति के बाद (यदि पूर्व में न हुआ हो) तो इसे राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है।
    • प्रस्तुतकर्ता विधेयक का शीर्षक और उद्देश्य बताता है।
    • इस चरण में कोई चर्चा नहीं होती।
    • विधेयक का प्रस्तुतीकरण एवं उसका राजपत्र में प्रकाशित होना ही प्रथम पाठन कहलाते हैं।
    • एक दिन में कितने भी साधारण विधेयक प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
  2. द्वितीय पाठन (Second Reading): 
    • इस चरण में विधेयक की विस्तृत समीक्षा होती है। इसमें तीन उप-चरण होते हैं:
      • साधारण बहस की अवस्था:
        1. विधेयक की प्रतियां सदस्यों में वितरित की जाती हैं।
        2. विधेयक के उद्देश्य एवं सिद्धांतों पर सामान्य चर्चा होती है।
        3. चार विकल्प:
          1. सदन स्वयं द्वारा तत्काल चर्चा की जाए।
          2. प्रवर समिति को भेजा जाए।
          3. संयुक्त समिति को भेजा जाए।
          4. जनता से राय के लिए सार्वजनिक किया जाए।
    • प्रवर समिति: केवल उसी सदन के सदस्य।
    • संयुक्त समिति: दोनों सदनों के सदस्य।
      • समिति अवस्था:
        • सामान्यतः विधेयक को प्रवर समिति को भेजा जाता है।
        • समिति विधेयक की खंडवार व विस्तारपूर्वक समीक्षा करती है।
        • समिति विधेयक के मूल स्वरूप/विषय को नहीं बदल सकती।
        • समीक्षा के बाद समिति अपने सुझावों सहित इसे सदन को लौटाती है।
      • विचार-विमर्श की अवस्था:
        • सदन विधेयक की प्रत्येक धारा पर विस्तृत चर्चा करता है।
        • प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।
        • संशोधन प्रस्तावित किए जा सकते हैं, स्वीकृत होने पर वे विधेयक का हिस्सा बन जाते हैं।
  3. तृतीय पाठन (Third Reading):
    • विधेयक पर केवल स्वीकृति या अस्वीकृति की चर्चा होती है।
    • संशोधन संभव नहीं।
    • बहुमत से पारित होने पर दूसरे सदन में भेजा जाता है।
  4. दूसरे सदन में प्रक्रिया:
    • दूसरे सदन में भी यही तीन वाचन होते हैं।
    • दूसरे सदन के सामने 4 विकल्प होते हैं –
      1. बिना संशोधन, जैसे का तैसा पारित कर देना → राष्ट्रपति को भेजा जाएगा।
      2. संशोधन कर पारित कर प्रथम सदन को लौटाना → यदि प्रथम सदन अस्वीकार करे तो गतिरोध।
      3. विधेयक को अस्वीकार करना।
      4. विधेयक पर कार्यवाही न करना और 6 माह तक लंबित रखना।
    • उपर्युक्त 3 स्थितियों में गतिरोध (Deadlock) उत्पन्न होता है तो गतिरोध दूर करने के लिए –
      • राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक सकता है।
      • यदि संयुक्त बैठक में बहुमत से पारित हो जाए तो विधेयक पास माना जाता है।
  5. राष्ट्रपति की स्वीकृति (अनुच्छेद 111 के अंतर्गत):
    • विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति के पास तीन विकल्प होते हैं:
      • स्वीकृति दे देना – विधेयक अधिनियम (कानून) बन जाता है।
      • स्वीकृति देने से रोक लेना – राष्ट्रपति निर्णय लेने में विलंब कर सकता है।
      • पुनर्विचार हेतु वापस भेजना – यदि राष्ट्रपति विधेयक को पुनर्विचार हेतु संसद को लौटाता है और संसद उसे संशोधन सहित या बिना संशोधन के दोबारा राष्ट्रपति को भेज देती है, तो राष्ट्रपति इस पर अनुमति देने के लिए बाध्य (Compelled) होता है।
    • राष्ट्रपति केवल “निबंलनकारी वीटो” (Suspensive Veto) का उपयोग कर सकता है।
  • अनुच्छेद 110 – धन विधेयक की परिभाषा दी गई है।
  • अनुच्छेद 109 – धन विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया बताता है।
  • धन विधेयक के विषय (अनुच्छेद 110)
    • कोई कर लगाना, हटाना या परिवर्तित करना (अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन)।
    • सरकार द्वारा धन उधार लेना।
    • भारत की संचित निधि (Consolidated Fund) या आकस्मिक निधि (Contingency Fund) की अभिरक्षा तथा इनमें धन जमा या निकासी।
    • संचित निधि से धन का विनियोग।
    • किसी व्यय को संचित निधि पर भारित करना।
    • संचित निधि या लोकलेखा निधि से धन प्राप्त करना तथा संघ या राज्य के लेखों की संपरीक्षा।
    • विनियोग विधेयक और वार्षिक वित्त विधेयक धन विधेयक माने जाते हैं।
  • लेकिन धन विधेयक में ये शामिल नहीं होते –
    • जुर्माना लगाना,
    • अर्थदण्ड लगाना,
    • लाइसेंस फीस,
    • स्थानीय प्राधिकरण/निकाय द्वारा लगाए गए कर।
  • धन विधेयक की प्रमाणिकता (Certification)
    • यदि यह प्रश्न उठे कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, तो लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है। [अनुच्छेद 110(3)]
    • लोकसभा अध्यक्ष को प्रत्येक धन विधेयक पर प्रमाण-पत्र (Certificate) देना पड़ता है। यह दो बार होता है –
      • जब विधेयक राज्यसभा को भेजा जाता है।
      • जब वह राष्ट्रपति की अनुमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है।
  • पारित करने की प्रक्रिया (अनुच्छेद 109)
    1. धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश होता है, राज्यसभा में नहीं। विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
    2. यह केवल मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है (सरकारी विधेयक)।
    3. लोकसभा द्वारा पारित होने के बाद, इसकी एक प्रति राज्यसभा को भेजी जाती है, जिस पर लोकसभा अध्यक्ष का प्रमाण-पत्र होता है। लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं – अंतिम होता है।
    4. राज्यसभा की शक्ति बहुत सीमित है –
      • वह इसमें संशोधन नहीं कर सकती, केवल सिफारिश कर सकती है।
      • उसे विधेयक 14 दिन के भीतर सिफारिश सहित या बिना सिफारिश लौटाना होता है।
      • यदि वह 14 दिन में वापस नहीं करती, तो विधेयक स्वतः पारित माना जाता है।
    5. लोकसभा राज्यसभा की सिफारिशें स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। दोनों स्थितियों में विधेयक पारित माना जाता है।
    6. इसके बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास अनुमति के लिए जाता है।
    7. राष्ट्रपति इस पर केवल स्वीकृति दे सकता है या रोक सकता है लेकिन पुनर्विचार हेतु नहीं लौटा सकता, क्योंकि यह उनकी सिफारिश से ही लोकसभा में पेश होता है।
    8. राष्ट्रपति को अनुमति देना अनिवार्य होता है।

साधारण विधेयक बनाम धन विधेयक

क्र.संसाधारण विधेयकधन विधेयक
1इसे लोकसभा या राज्यसभा में कहीं भी प्रस्तुत किया जा सकता है।इसे केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।
2इसे मंत्री या गैर-सरकारी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।इसे केवल मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।
3इसे राष्ट्रपति की संस्तुति के बिना भी प्रस्तुत किया जा सकता है।इसे प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की संस्तुति अनिवार्य होती है।
4राज्यसभा इसे संशोधित या अस्वीकार कर सकती है।राज्यसभा इसमें संशोधन नहीं कर सकती और न ही अस्वीकार कर सकती है।
5राज्यसभा इसे अधिकतम 6 माह तक रोक सकती है।राज्यसभा इसे अधिकतम 14 दिन तक ही रोक सकती है।
6इसे राज्यसभा में भेजने हेतु अध्यक्ष के प्रमाणन की आवश्यकता नहीं होती।इसे अध्यक्ष द्वारा धन विधेयक घोषित करना आवश्यक होता है।
7यदि दोनों सदनों में मतभेद हो तो राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुला सकते हैं।इसमें संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है क्योंकि केवल लोकसभा की स्वीकृति आवश्यक है।
8यदि लोकसभा में अस्वीकृत हो जाए (मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया गया हो), तो सरकार को त्यागपत्र देना पड़ सकता है।यदि यह लोकसभा में अस्वीकृत हो जाता है तो सरकार को त्यागपत्र देना ही पड़ता है।
9राष्ट्रपति इसे अस्वीकृत, पारित या पुनर्विचार हेतु लौटा सकते हैं।इसे राष्ट्रपति द्वारा केवल पारित या अस्वीकृत किया जा सकता है, पुनर्विचार हेतु लौटाया नहीं जा सकता।

वित्त विधेयक (Finance Bill)

  • वित्त विधेयक सामान्यतः राजस्व और व्यय से संबंधित होता है।
  • इसमें आगामी वित्तीय वर्ष में नए कर लगाने या करों में संशोधन से जुड़े प्रावधान होते हैं।
  • वित्त विधेयक के प्रकार:
    1. धन विधेयक (Money Bill) – अनुच्छेद 110
      • प्रत्येक धन विधेयक वित्त विधेयक होता है, पर प्रत्येक वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होता।
      • केवल वे वित्त विधेयक ही धन विधेयक कहलाते हैं जिनका उल्लेख अनुच्छेद 110 में है।
    2. वित्त विधेयक (I) – अनुच्छेद 117(1)
      • यह दो रूपों में धन विधेयक जैसा है –
        • यह केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जाता है।
        • इसे राष्ट्रपति की सिफारिश (Recommendation) पर ही पेश किया जाता है।
      • बाकी मामलों में यह साधारण विधेयक जैसा है –
        • राज्यसभा इसे संशोधित कर सकती है।
        • इसे अधिकतम 6 माह तक रोक सकती है।
        • इसे अस्वीकार भी कर सकती है।
      • वित्त विधेयक (प्रथम) राज्यसभा द्वारा पारित किया जाना अनिवार्य है।
      • यदि अंतिम रूप से असहमति हो जाती है तो अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक बुलाई जाती है।
      • संयुक्त बैठक केवल धन विधेयक को छोड़कर अन्य सभी मामलों में संभव है।
    3. वित्त विधेयक (II) – अनुच्छेद 117(3)
      • इसमें संचित निधि से जुड़े वे व्यय शामिल रहते हैं जिनका संबंध अनुच्छेद 110 (धन विधेयक) से नहीं है।
      • इसे साधारण विधेयक की तरह प्रयोग किया जाता है इसे प्रस्तुत करने के लिये राष्ट्रपति की सहमति की आवश्यकता नहीं होती है । दोनों ही सदन इसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
      • इसे किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।
      • इसकी एक विशिष्टता है – जब तक राष्ट्रपति सिफारिश न करे, इसे किसी भी सदन द्वारा पारित नहीं किया जा सकता।
      • राष्ट्रपति इसे स्वीकृत कर सकता है, रोक सकता है या पुनर्विचार के लिए भेज सकता है।

धन विधेयक बनाम वित्त विधेयक

बिंदुधन विधेयकवित्त विधेयक (I और II)
अनुच्छेद110117 (1) और 117 (3)
प्रस्तुत करने की शक्तिकेवल लोकसभा मेंदोनों सदनों में
राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिशआवश्यक I मेंआवश्यक, II में नहीं
राज्यसभा की शक्तिकेवल सिफारिशपूरी शक्ति (स्वीकृति, अस्वीकृति, संशोधन)
संयुक्त बैठकनहीं होतीहो सकती है
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिकप्रमाणन अनिवार्यआवश्यक नहीं

लोकसभा और राज्यसभा की भूमिका

पक्ष लोकसभाराज्यसभा
धन विधेयक प्रस्तुत करना          ✔️❌ नहीं किया जा सकता
अनुदान मांगों पर मतदान          ✔️❌ नहीं कर सकती
14 दिनों में धन विधेयक वापस भेजना          —✔️ आवश्यक

संयुक्त बैठक (Joint Sitting of Parliament)

  • संवैधानिक आधार
    • अनुच्छेद 108 में संसद की संयुक्त बैठक का प्रावधान है।
    • इसका स्रोत: भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 31।
    • यह ऑस्ट्रेलिया के संविधान से नहीं लिया गया है।
  • संयुक्त बैठक बुलाने की परिस्थितियाँ
    • यदि किसी विधेयक को एक सदन द्वारा पारित करने के बाद दूसरे सदन को भेजा गया हो और –
      1. दूसरे सदन ने विधेयक अस्वीकार कर दिया हो।108 (1) (क)
      2. दोनों सदन विधेयक में संशोधन पर अंतिम रूप से असहमत (disagree) हो गए हों। 108 (1) (ख)
        • संविधान में केवल अनुच्छेद 108 में ही “disagree” शब्द प्रयुक्त है।
      3. दूसरे सदन को विधेयक प्राप्त हुए 6 माह से अधिक समय बीत गया हो और उसने पारित न किया हो। 108 (1) (ग)
        • नोट: इस 6 माह की अवधि में वे दिन शामिल नहीं होते जब दूसरा सदन चार या अधिक दिनों के लिए स्थगित रहा हो।
    • उपर्युक्त तीन स्थितियों में राष्ट्रपति दोनों सदनों को संयुक्त बैठक हेतु बुला सकता है।

राष्ट्रपति की सूचना (Intimation by President)

  • राष्ट्रपति का आशय (Intention) होना चाहिए कि गतिरोध वाले विधेयक पर चर्चा व मतदान हेतु संयुक्त बैठक बुलायी जाए।
  • सूचना देने के दो तरीके –
    • यदि सदन बैठक में हैं → संदेश (by message) द्वारा।
    • यदि सदन बैठक में नहीं हैं → लोक अधिसूचना (Public Notification) द्वारा।
  • संयुक्त बैठक किसके लिए संभव है?
    • साधारण विधेयक (Ordinary Bill)
    • वित्त विधेयक (Financial Bill)
  • संयुक्त बैठक कब नहीं होती?
    • धन विधेयक (Money Bill) पर संयुक्त बैठक लागू नहीं होती।
    • संविधान संशोधन विधेयक (Constitutional Amendment Bill) पर भी संयुक्त बैठक नहीं होती।
      • यदि दोनों सदन इसे अनुच्छेद 368 के अनुसार समान शब्दों में पारित न करें, तो विधेयक समाप्त हो जाता है।
    • संयुक्त बैठक केवल साधारण विधेयक और वित्तीय विधेयक पर बुलाई जा सकती है।
  • संयुक्त बैठक में विधेयक व संशोधन
    • यदि संयुक्त बैठक में विधेयक (संशोधनों सहित) उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत से पारित हो जाता है → इसे दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाएगा।
  • लोकसभा का विघटन (Dissolution of Lok Sabha)
    • यदि बैठक के लिए नोटिस लोकसभा के विघटन से पहले जारी किया गया हो, तो बैठक लोकसभा विघटन के बावजूद बुलाई जा सकती है और उसमें विधेयक पारित किया जा सकता है।
    • लेकिन अगर नोटिस नहीं जारी हुआ और लोकसभा भंग हो गई, तो संयुक्त बैठक नहीं बुलाई जा सकती।
  • संयुक्त बैठक की प्रक्रिया (Procedure – अनु. 118(3))
    • राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति से परामर्श कर संयुक्त बैठक से संबंधित नियम बनाता है।
    • इन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर संसद (संयुक्त बैठकें एवं संवाद) नियम, 1952 बनाए गए।
      • (क) बैठक का समय व स्थगन
        • समय राष्ट्रपति प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और लोकसभा अध्यक्ष की सहमति से तय करते हैं।
        • नियम 4: लोकसभा अध्यक्ष तय करते हैं कि बैठक कब स्थगित होगी और किस दिन/समय पुनः होगी।
      • (ख) पीठासीन अधिकारी
        • अनु. 118(4): संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करेंगे।
        • अनुपस्थिति की स्थिति में क्रम:
          • लोकसभा उपाध्यक्ष
          • राज्यसभा उपसभापति
          • उपस्थित सदस्यों द्वारा चुना गया अन्य सदस्य।
        • राज्यसभा का सभापति (उपराष्ट्रपति) अध्यक्षता नहीं करता क्योंकि वह किसी सदन का सदस्य नहीं होता।
        • उदाहरण: 26 मार्च 2002 की संयुक्त बैठक – लोकसभा अध्यक्ष पद रिक्त होने पर उपाध्यक्ष पी.एम. सईद ने अध्यक्षता की।
      • (ग) गणपूर्ति (Quorum)
        • कोरम: दोनों सदनों की कुल सदस्य संख्या का 1/10।
        • यह संविधान में नहीं, बल्कि 1952 के नियमों में प्रावधानित है।
  • विधेयक कैसे पारित होता है?
    • संयुक्त बैठक में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत से यदि विधेयक पारित हो जाता है, तो माना जाता है कि दोनों सदनों ने विधेयक पारित कर दिया।
    • आमतौर पर लोकसभा में सदस्य संख्या अधिक होने के कारण उसकी भूमिका प्रभावशाली होती है।
  • भारत में अब तक हुई संयुक्त बैठकें
    • अब तक स्वतंत्र भारत में केवल 3 बार संयुक्त बैठक हुई है –
      • 1961 – दहेज प्रतिषेध विधेयक, 1959
        • लोकसभा में पारित, राज्यसभा में अटका → मई 1961 में संयुक्त बैठक से पारित।
      • 1978 – बैंकिंग सेवा आयोग (निरसन) विधेयक, 1978
        • लोकसभा में पारित, राज्यसभा में असहमति → मई 1978 में संयुक्त बैठक से पारित।
      • 2002 – आतंकवाद निरोधक विधेयक, 2002 (POTA)
        • लोकसभा ने पारित किया, राज्यसभा ने निरस्त किया → मार्च 2002 में संयुक्त बैठक से पारित।
  • तीनों बैठकों में अटल बिहारी वाजपेयी सदस्य के रूप में उपस्थित थे।
  • भारतीय संविधान में ‘बजट’ शब्द का प्रयोग नहीं है, बल्कि इसे “वार्षिक वित्तीय विवरण” कहा गया है।
  • इसका उल्लेख अनुच्छेद 112 में किया गया है।
  • बजट अवधि
    • बजट एक वित्तीय वर्ष के लिए तैयार किया जाता है:
    • 1 अप्रैल से 31 मार्च तक।

ऐतिहासिक तथ्य

  • 1921 – एक्वर्थ समिति की सिफारिश पर 1924 से रेल बजट और आम बजट अलग किए गए।
  • 2016 तक ये अलग रहे।
  • 2017 – विवेक देबरॉय समिति की सिफारिश पर रेल और आम बजट को मिलाकर संयुक्त बजट पेश किया गया। 
  • रेलवे बजट और आम बजट का विलय
    • पहले भारत में दो बजट होते थे:
      • रेलवे बजट – केवल रेलवे मंत्रालय से संबंधित
      • आम बजट – सभी मंत्रालयों का विवरण (रेलवे को छोड़कर)
    • 2017 में रेल बजट को आम बजट में मिला दिया गया। (यह घोषणा सितंबर 2016 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा की गई थी।)
    • पहला संयुक्त बजट 1 फरवरी 2017 को पहली बार रेल बजट और आम बजट को एक साथ प्रस्तुत किया गया।
  • पहले बजट फरवरी के अंतिम कार्य दिवस को शाम 5 बजे पेश होता था।
  • 1999 से इसे सुबह 11 बजे प्रस्तुत किया जाने लगा।
  • 2017 से बजट हर वर्ष 1 फरवरी को पेश किया जाता है।
  • आज भारत में केवल एक ही बजट है – आम बजट (Railway + General)।

बजट में क्या शामिल होता है?

  • अनुमानित राजस्व और पूंजी प्राप्तियाँ
  • करों और अन्य साधनों से राजस्व बढ़ाने के उपाय
  • विभिन्न मंत्रालयों का खर्च
  • पिछले वर्ष की वास्तविक प्राप्तियाँ और खर्च
  • आगामी वर्ष की आर्थिक नीति, नवीन योजनाएँ, कर प्रस्ताव और वित्तीय योजनाएँ

बजट से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  1. राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष में बजट दोनों सदनों में पेश करवाता है।
  2. अनुदान की मांग राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना नहीं की जा सकती।
  3. अनुदान की मांग केवल लोकसभा में प्रस्तुत होती है और केवल लोकसभा ही उस पर मतदान कर सकती है।
  4. राज्यसभा को अनुदान की मांग पर मतदान का अधिकार नहीं है।
  5. संसद की अनुमति के बिना संचित निधि से कोई धन नहीं निकाला जा सकता।
  6. विधि द्वारा प्राधिकृत किए बिना कोई कर नहीं लगाया या वसूला जा सकता।
  7. संसद किसी कर को कम या समाप्त कर सकती है, पर बढ़ा नहीं सकती।

बजट के दो प्रकार के व्यय

  1. संचित निधि वाले व्यय –
    • इन पर सदन में चर्चा और मतदान दोनों हो सकता है।
    • इन्हें कम किया जा सकता है।
  2. भारत की संचित निधि पर भारित व्यय –
    • इन पर केवल चर्चा हो सकती है, मतदान या आलोचना नहीं।
    • वित्तीय आपातकाल को छोड़कर इन्हें कम नहीं किया जा सकता।
    • भारित व्ययों की सूची:
      • राष्ट्रपति के वेतन, भत्ते और कार्यालय व्यय
      • उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, राज्यसभा उपसभापति के वेतन व भत्ते
      • उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों का वेतन, भत्ते और पेंशन
      • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पेंशन
      • नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) का वेतन, भत्ते और पेंशन
      • संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के वेतन, भत्ते और पेंशन
      • उपर्युक्त कार्यालयों के प्रशासनिक व्यय
      • ऐसे ऋण भार, जिनका दायित्व भारत सरकार पर है, जिनमें शामिल हैं:
        • ब्याज
        • निक्षेप
        • निधि भार
        • मोचन भार
      • उधार लेने, ऋण सेवा एवं ऋण मोचन से संबंधित अन्य व्यय
      • किसी न्यायालय, मध्यस्थम अधिकरण या प्राधिकरण के निर्णय, आदेश या डिक्री की पालना हेतु अपेक्षित राशियाँ
      • संसद द्वारा विधि द्वारा घोषित कोई अन्य व्यय, जिसे भारित व्यय घोषित किया गया हो

बजट पारित होने की प्रक्रिया

बजट पारित होने की प्रक्रिया (अनुच्छेद 112) :- भारतीय संसद में बजट पारित होने की प्रक्रिया छह प्रमुख चरणों से होकर गुजरती है:

बजट का प्रस्तुतिकरण

  • बजट पहले वित्त मंत्री द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है, फिर राज्यसभा में।
  • राज्यसभा में बजट केवल विचारार्थ रखा जाता है, उसे अनुदानों पर मतदान या कटौती का अधिकार नहीं होता।
  • वित्त मंत्री द्वारा दिये गये भाषण को बजट भाषण कहा जाता है।
  • 2017 से बजट 1 फरवरी को प्रस्तुत किया जाने लगा।
  • रिकॉर्ड –
    • मोरारजी देसाई – 10 बार (सर्वाधिक)
    • पी. चिदम्बरम – 9 बार
    • प्रणब मुखर्जी – 8 बार
    • निर्मला सीतारमण – लगातार 7 बार बजट प्रस्तुत करने वाली पहली वित्त मंत्री (2024)।

आम बहस (General Discussion)

  • बजट पेश करने के कुछ दिन बाद दोनों सदनों में 3–4 दिन तक आम बहस होती है।
  • इस बहस में बजट के सिद्धांतों, नीति और पूरे प्रस्ताव पर चर्चा की जाती है।
  • बहस के अंत में वित्त मंत्री उत्तर देते हैं, कोई मतदान नहीं होता।
  • इसके बाद बजट विभागीय समितियों को सौंप दिया जाता है।
  • आम बहस के बाद संसद को 3–4 सप्ताह के लिए स्थगित किया जाता है।

विभागीय समितियों द्वारा जांच

  • इस अवधि में 24 विभागीय स्थायी समितियां संबंधित मंत्रालयों की अनुदान मांगों की जांच करती हैं और रिपोर्ट बनाती हैं।
  • ये रिपोर्टें विचारार्थ दोनों सदनों में रखी जाती हैं।
  • यह व्यवस्था 1993 में शुरू हुई थी, और 2004 में विस्तृत की गई थी।

अनुदान की मांगों पर मतदान (Demand for Grants)

  • विभिन्न मंत्रालयों की मांगों पर बहस और मतदान होता है।
  • राज्यसभा को मतदान का अधिकार नहीं है। (सिर्फ चर्चा कर सकती है)।
  • संचित निधि पर भारित व्यय पर केवल चर्चा हो सकती है, मतदान नहीं। 
  • कटौती प्रस्ताव (Cut Motions) भी इसी चरण में लाए जाते हैं:
  • कटौती प्रस्ताव के प्रकार:
    • नीतिगत कटौती प्रस्ताव (Policy Cut Motion):
      • सरकार की नीतियों के विरोध में
      • मांग की राशि ₹1 करने का प्रस्ताव।
    • आर्थिक कटौती प्रस्ताव (Economic Cut Motion):
      • व्यय के आर्थिक प्रभाव पर आपत्ति।
      • किसी मांग में से निश्चित राशि घटाने का प्रस्ताव।
    • सांकेतिक कटौती प्रस्ताव (Token Cut Motion):
      • सरकार के किसी दायित्व की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
      • मांग में ₹100 घटाने का प्रस्ताव।
  • कटौती प्रस्ताव की शर्तें:
    • स्पष्ट, एक विषय से संबंधित, अनावश्यक/न्यायिक/भारित व्यय से संबंधित न हो आदि।
    • भारत में अब तक एक भी कटौती प्रस्ताव पारित नहीं हुआ।
    • यदि कटौती प्रस्ताव पारित हो जाए तो सरकार का इस्तीफा आवश्यक नहीं, पर माना जाता है कि सरकार ने लोकसभा में बहुमत खो दिया है।
    • गिलोटिन – समयाभाव में बहस अधूरी रहने पर बिना बहस के मांगें पास हो जाना।
    • अनुदान मांगों पर चर्चा हेतु कुल 26 दिन निर्धारित हैं।

विनियोग विधेयक का पारित होना (Appropriation Bill) – (अनुच्छेद 114)

  • संचित निधि से धन केवल विनियोग विधेयक के माध्यम से निकाला जा सकता है।
  • यह एक धन विधेयक होता है और राष्ट्रपति की सिफारिश से ही प्रस्तुत होता है।
  • यह विधेयक दो मदों को विनियमित करता है:
    • लोकसभा द्वारा स्वीकृत अनुदान
    • संचित निधि पर भारित व्यय
  • संशोधन नहीं किए जा सकते (क्योंकि यह धन निकासी से जुड़ा है)।
  • राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही यह अधिनियम बनता है।
  • जब तक यह विधेयक पारित न हो, सरकार कोई धन खर्च नहीं कर सकती।
  • अंतरिम व्यवस्था के रूप में, सरकार लेखानुदान (Vote on Account) पारित करवाती है।
    • यह 2 महीने के खर्च की स्वीकृति देता है।
    • आम बहस के बाद पारित किया जाता है।

वित्त विधेयक का पारित होना (Finance Bill)

  • यह बजट पारित होने का अंतिम चरण है।
  • इसमें उस वर्ष के लिए सरकार के वित्तीय प्रस्तावों को विधिक रूप दिया जाता है (जैसे – कर बढ़ाना या कम करना)।
  • यह धन विधेयक की श्रेणी में आता है – इसलिए केवल लोकसभा में ही पारित होता है।
  • संशोधन संभव होते हैं।
  • इसे 75 दिनों के भीतर पारित करना अनिवार्य होता है (अनन्तिम कर संग्रहण अधिनियम, 1931 के अनुसार)।
  • यह विधेयक बजट के आय पक्ष को वैधता प्रदान करता है और बजट को पूर्ण रूप से प्रभावी बनाता है।

अनुदान (Other Grants): अनुच्छेद 116

  • सामान्य बजट के अलावा संसद द्वारा विशेष परिस्थितियों में निम्नलिखित प्रकार की अनुदानें दी जाती हैं:
  1. लेखानुदान
    • सरकार विनियोग विधेयक पारित होने पर ही संचित निधि से धन निकाल सकती है।
    • लेकिन विनियोग विधेयक पारित होते-होते अप्रैल–मई आ जाता है, जबकि 1 अप्रैल से खर्च की आवश्यकता होती है।
    • इसलिए लेखानुदान की व्यवस्था की गई।
    • इसे बजट पर आम बहस के उपरांत पारित किया जाता है।
    • यह कुल बजट का 1/6 भाग और 2 माह के लिए होता है।
  2. प्रत्ययानुदान (Vote of Credit):
    • यह लोकसभा द्वारा कार्यपालिका को दिया गया ब्लैंक चेक है।
    • जब किसी सेवा/मद पर आकस्मिक रूप से अत्यधिक धन की आवश्यकता हो तो बिना बहस/विस्तृत आंकलन के यह अनुदान दिया जाता है।
  3. अपवादानुदान (Exceptional Grant):
    • किसी विशेष उद्देश्य हेतु दी जाती है,
    • वह अनुदान जो पहले किसी सेवा का हिस्सा न हो।

अन्य अनुदान (Other Grants): अनुच्छेद 115

  1. अनुपूरक अनुदान (Supplementary Grant):
    • जब किसी विशेष सेवा के लिए स्वीकृत राशि अपर्याप्त हो जाती है,
    • उसी वित्तीय वर्ष में अतिरिक्त धन की आवश्यकता हो,
    • तब संसद से अनुपूरक अनुदान की स्वीकृति ली जाती है।
  2. अतिरिक्त अनुदान (Additional Grant):
    • जब बजट में किसी नई सेवा के लिए कोई राशि नहीं रखी गई हो और वर्ष के दौरान अचानक उस सेवा के लिए खर्च की जरूरत हो जाए।
  3. सांकेतिक अनुदान (Token Grant):
    • जब किसी प्रस्तावित सेवा के अतिरिक्त खर्च की जरूरत हो,
    • तो नाममात्र की राशि प्रस्तावित कर उस पर मतदान होता है।
    • नोट: इन सभी अनुदानों के लिए वही प्रक्रिया अपनाई जाती है, जैसी सामान्य बजट की होती है।

निधियाँ

  • भारत के संविधान में केंद्र सरकार के लिए तीन प्रकार की निधियों का प्रावधान है:
    • भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) [अनुच्छेद 266(1)]
    • भारत की लोक लेखा निधि (Public Account of India) [अनुच्छेद 266(2)]
    • भारत की आकस्मिक निधि (Contingency Fund of India) [अनुच्छेद 267]

भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) – अनुच्छेद 266(1): 

  • इसमें सरकार की समस्त राजस्व आय, लिये गये ऋण, तथा दिये गये ऋणों की वापसी जमा की जाती है।
  • इससे दो प्रकार के व्यय होते हैं :
    • साधारण व्यय (Ordinary Expenditure)
    • भारित व्यय (Charged Expenditure)
  • भारित व्यय (Charged Expenditure) पर संसद में केवल चर्चा हो सकती है, लेकिन आलोचना या मतदान नहीं किया जा सकता।
  • यह निधि लोकसभा के नियंत्रण में होती है। इसमें से कोई भी व्यय करने के लिए संसद की पूर्व अनुमति आवश्यक है।
  • अनुच्छेद 357 : अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के तहत जब लोकसभा सत्र में न हो, तब संसद की मंजूरी लंबित रहने तक, राज्य की संचित निधि से व्यय के लिए राष्ट्रपति स्वयं अधिकृत (Authorize) कर सकता है।

भारत का लोक लेखा (Public Account of India) – अनुच्छेद 266(2):

  • यह बैंकिंग आदान-प्रदान (Banking Transactions) की तरह होती है।
  • इसमें संचित निधि को छोड़कर अन्य सभी सार्वजनिक धन जमा किया जाता है।
  • इसमें शामिल होते हैं :
    • भविष्य निधि जमा (Provident Fund Deposits)
    • बचत (Savings)
    • विभागीय जमा (Departmental Deposits)
  • इस निधि पर कार्यपालिका (Executive) का नियंत्रण होता है।

भारत की आकस्मिकता निधि (Contingency Fund of India) – अनुच्छेद 267:

  • अप्रत्याशित खर्चों के लिए गठित की गई निधि।
  • संसद द्वारा 1950 में इसे अधिनियमित किया गया।
  • यह राष्ट्रपति के नियंत्रण में होती है और वित्त सचिव इसके भंडारी होते हैं।
  • राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह किसी भी आकस्मिक और अप्रत्याशित व्यय (Unexpected Expenditure) के लिए, बिना पूर्व संसदीय स्वीकृति के, इस निधि से धन खर्च करने की अनुमति दे सकता है।
  • इससे अग्रिम भुगतान किया जा सकता है, जिसे बाद में संसद से स्वीकृति दिलवाई जाती है।

संसदीय समितियाँ

  • संसद अपना अधिकांश कार्य संसदीय समितियों के माध्यम से करती है।
  • कानून निर्माण और कार्यपालिका पर नियंत्रण हेतु इनका उपयोग होता है।
  • इन्हें “लघु संसद” कहा जाता है।
  • भारत में इनका आरम्भ भारत शासन अधिनियम, 1919 से हुआ।
  • संसदीय समितियाँ दो प्रकार की होती हैं –
    • तदर्थ (Ad-hoc) समितियाँ
    • स्थायी (Standing) समितियाँ

1. तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees)

  • ये अस्थायी समितियाँ होती हैं, कार्य पूरा होने पर भंग हो जाती हैं।
    1. प्रवर समिति / संयुक्त प्रवर समिति (Select or Joint Select Committee)
      • किसी विशेष विधेयक पर विचार के लिए गठित।
      • रिपोर्ट देने के बाद भंग हो जाती है।
      • प्रवर समिति – अधिकतम 30 सदस्य।
      • संयुक्त प्रवर समिति – लोकसभा 30 + राज्यसभा 15 = कुल 45 सदस्य।
      • रिपोर्ट देने की समय-सीमा – 3 माह अथवा सदन द्वारा निर्धारित।
    2. जाँच समितियाँ (Inquiry Committees)
      • अलग-अलग सदनों की या संयुक्त रूप से गठित हो सकती हैं।
      • एक सदन की समिति – 30 सदस्य।
      • संयुक्त समिति – 45 सदस्य (लोकसभा 30, राज्यसभा 15)।
      • रिपोर्ट देने के बाद स्वतः भंग।
  • महत्वपूर्ण संयुक्त जाँच समितियाँ (JPCs)
    • 1987 – बी. शंकरानन्द समिति → बोफोर्स घोटाला।
    • 1992 – राम निवास मिर्धा समिति → हर्षद मेहता शेयर घोटाला।
    • 2003 – शरद पवार समिति → शीतल पेयों में कीटनाशक।
    • 2007 – प्रकाशमणि त्रिपाठी समिति → केतन पारिख शेयर घोटाला।
    • 2011 – पी.सी. चाको समिति → 2G स्पेक्ट्रम घोटाला।

2. स्थायी समितियाँ (Standing Committees)

  • इनका गठन प्रतिवर्ष होता है।
  • कार्य सतत चलता रहता है।
  • इनकी सिफारिशें परामर्शकारी (Advisory) प्रकृति की होती हैं।
  • तीन प्रमुख वित्तीय समितियाँ + 24 विभागीय समितियाँ + अन्य।
  1. वित्तीय समितियाँ (Financial Committees)
    1. लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee – PAC)
      • स्थापना – 1921 (भारत शासन अधिनियम 1919 के आधार पर)।
      • सदस्य संख्या – 22 (लोकसभा 15 + राज्यसभा 7)।
      • 1969 से परंपरा – अध्यक्ष विपक्षी दल से। प्रथम अध्यक्ष – मीनु मसानी (1969)।
      • कार्य –
        • कार्यपालिका द्वारा धन खर्च की वैधानिकता, अनियमितता, भ्रष्टाचार, अपव्यय व अकुशलता की जाँच।
        • नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के आधार पर कार्य करता है।
        • इसे “सार्वजनिक धन का चौकीदार” और CAG का मित्र कहा जाता है।
      • आलोचना – यह केवल “शव परीक्षण” करती है (यानी धन खर्च होने के बाद समीक्षा)।
      • लोकसभा के सदस्य – आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली द्वारा एकल संक्रमणीय मत पद्धति से चुने जाते हैं।
      • राज्यसभा के सदस्य – नामनिर्देशित।
      • कोई मंत्री सदस्य नहीं हो सकता।
    2. प्राक्कलन समिति / अनुमान समिति (Estimates Committee)
      • स्थापना – 1950 (वित्त मंत्री जॉन मथाई की सिफारिश पर)।
      • सदस्य – 30 (सभी लोकसभा से)।
      • मंत्री सदस्य नहीं हो सकते।
      • चुनाव – एकल संक्रमणीय मत पद्धति से।
      • कार्य – सरकारी व्यय में मितव्ययिता (Economy) हेतु सुझाव देना।
    3. सार्वजनिक उपक्रम समिति (Public Enterprises Committee)
      • स्थापना – 1964 (कृष्णमेनन समिति की सिफारिश पर)।
      • सदस्य संख्या – 22 (लोकसभा 15 + राज्यसभा 7)।
  2. (B) विभागीय स्थायी समितियाँ
    • आरम्भ – 1993।
    • 1998 में संख्या 17 थी।
    • 2004 में 7 और समितियाँ बनीं।
    • वर्तमान संख्या – 24 समितियाँ।
    • अध्यक्ष –
      • 16 समितियों के अध्यक्ष लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त।
      • 8 समितियों के अध्यक्ष राज्यसभा सभापति द्वारा नियुक्त।
    • कार्य –
      • अपने विभाग के बजट अनुमानों की जाँच करना।
      • विभागीय अनुदान माँगों पर विचार कर रिपोर्ट देना।
      • विभागीय विधेयकों पर गुण-दोष पर चर्चा।
      • विभागीय प्रतिवेदनों की समीक्षा।
    • कार्यकाल – 1 वर्ष।
    • कोई मंत्री सदस्य नहीं हो सकता।
    • एक सांसद एक से अधिक समितियों का सदस्य हो सकता है।
  3. अन्य स्थायी समितियाँ
    1. विशेषाधिकार समिति (Privileges Committee) –
      • सदन और सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा।
      • विशेषाधिकार उल्लंघन मामलों की जाँच।
    2. सरकारी आश्वासन समिति (Committee on Government Assurances) –
      • मंत्रियों द्वारा सदन में दिए गए आश्वासनों की समीक्षा।
      • देखती है कि आश्वासन कितनी सीमा तक पूरे हुए।

अन्य प्रावधान:

  • सदस्य अध्यक्ष को संबोधित कर त्यागपत्र दे सकता है → यह स्वतः प्रभावी होता है, अध्यक्ष/सभापति की स्वीकृति आवश्यक नहीं।
  • समिति बैठक के लिए कोरम – कुल सदस्यों का लगभग 1/3।
  • निर्णय – उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत से।
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