भारतीय संसद : संरचना एवं कार्य

संसद एवं संसदीय प्रणाली भारत की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का आधार हैं, जिनके माध्यम से कानून निर्माण और कार्यपालिका पर नियंत्रण किया जाता है। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय के अंतर्गत यह अध्याय संसद की संरचना, शक्तियों तथा संसदीय प्रणाली की कार्यप्रणाली को स्पष्ट करता है। भारतीय संविधान में संसद को सर्वोच्च विधायी संस्था के रूप में स्थापित किया गया है।

भारतीय संसद : संरचना एवं कार्य

संसद (विधायिका) का ऐतिहासिक विकास

  • 1853 चार्टर एक्ट → एक सदनीय
  • 1919 अधिनियम → द्विसदनीय
  • 1947 स्वतंत्रता अधिनियम → संविधान सभा (विधायी)
  • 1950 अंतरिम संसद
  • 1952 से वर्तमान स्वरूप : राष्ट्रपति + राज्यसभा + लोकसभा
भारतीय विधान परिषद् (Indian Legislative Council : 1854–1920)
  • 1853 का चार्टर एक्ट → भारत में एक सदनीय विधायिका की स्थापना।
  • इसे ही भारतीय विधान परिषद् या शाही विधान परिषद् कहा गया।

विधानसभा (Legislative Assembly) – 1919 का भारतीय शासन अधिनियम

  • द्विसदनीय विधायिका का प्रावधान किया गया।
केन्द्रीय विधानसभा (Central Legislative Assembly)
  • कुल सदस्य : 140
  • उद्घाटन : 9 फरवरी, 1921
  • प्रथम व द्वितीय विधानसभा का कार्यकाल – 3 वर्ष
  • 6वीं विधानसभा (1946-47) → अगस्त 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 की धारा 8 के तहत स्वतः समाप्त
राज्यों की परिषद् (Council of State)
  • कुल सदस्य : 60
  • अस्तित्व : 1921 से 1946 तक
  • 1935 का अधिनियम →
    • राज्य परिषद् (उच्च सदन) – अधिकतम 260 सदस्य
    • संघीय विधानसभा (निम्न सदन) – अधिकतम 375 सदस्य
  • लेकिन ये प्रावधान कभी लागू नहीं हुए।

संविधान सभा – विधायी (Constituent Assembly as Legislative)

  • 15 अगस्त 1947 → दोनों सदन एक साथ मिलकर एक ही सदन बन गए।
  • अवधि : 17 नवम्बर 1947 – 24 दिसम्बर 1949
  • भूमिका : दोहरी भूमिका – संविधान निर्माण + विधायी कार्य।

अंतरिम संसद (Provisional Parliament)

  • 28 जनवरी 1950 → संविधान सभा (विधायी) को अंतरिम संसद का रूप दिया गया।
  • कार्यकाल : प्रथम आम चुनाव (1951-52) तक।

भारत की संसद (Indian Parliament) – 1950 के बाद

  • संविधान का भाग-5, अध्याय-2 (अनु. 79–122) → संसद का वर्णन।
  • अनुच्छेद 79 → संसद तीन अंगों से मिलकर बनेगी –
    • राष्ट्रपति
    • राज्यसभा
    • लोकसभा
  • राष्ट्रपति संसद का अंग तो है लेकिन सदस्य नहीं।
  • कोई विधेयक तभी कानून बनेगा जब राष्ट्रपति उस पर हस्ताक्षर करेगा।

संसद की शब्दावली (1954 से)

  • 1954 से नए नाम अपनाए गए :
    • राज्य परिषद् → राज्यसभा (Council of States) (23 अगस्त 1954 से)
    • जनता का सदन → लोकसभा (House of the People) (14 मई 1954 से)

लोकसभा (House of the People)

  • प्रतिनिधित्व – संपूर्ण भारत की जनता।
  • प्रथम आम चुनाव : 26 अक्टूबर 1951 – फरवरी 1952
  • प्रथम निर्वाचित लोकसभा : अप्रैल 1952 में अस्तित्व में आई।

राज्यसभा (Council of States)

  • प्रतिनिधित्व – राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के सदस्य।
  • जड़ें – मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919)।
  • 1921 – राज्य परिषद् (द्वितीय सदन) का गठन।
  • 3 अप्रैल 1952 – राज्यसभा का विधिवत गठन।
  • कुल सदस्य : 216 (204 निर्वाचित + 12 मनोनीत)

भारतीय संसद: संरचना, गठन व विशेषताएँ (संविधान अनुच्छेद 79–122)

संसद की विशेषता

  • संसद केंद्र सरकार का विधायी अंग है।
  • यह वेस्टमिंस्टर मॉडल (ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली) पर आधारित है।
  • संविधान के भाग-5 (अनुच्छेद 79 से 122) में संसद की संरचना, अधिकार, कार्य, प्रक्रिया, विशेषाधिकार आदि का वर्णन है।

संसद से संबंधित अनुच्छेद

अनुच्छेद विषयवस्तु
सामान्य
79 संसद का गठन
80 राज्यसभा का संघटन
81 लोकसभा का संघटन
82 जनगणना के बाद पुनर्समायोजन
83 संसद के सदनों की अवधि
84 संसद सदस्यता हेतु योग्यता
85 संसद के सत्र, सत्रावसान एवं विघटन
86 राष्ट्रपति द्वारा सदनों को संबोधित करने और संदेश देने का अधिकार
87 संसद में राष्ट्रपति का विशेष संबोधन
88 मंत्रियों और अटॉर्नी जनरल का सदनों में भाग लेने का अधिकार
संसद के पदाधिकारी
89 राज्यसभा का सभापति एवं उपसभापति
90 उपसभापति पद की रिक्ति, त्यागपत्र और विमुक्ति
91 उपसभापति की शक्ति जब वह सभापति के रूप में कार्य करें
92 जब सभापति या उपसभापति के विरुद्ध विमुक्ति प्रस्ताव लंबित हो, तब उनका अध्यक्षता से विरत रहना
93 लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष
94 लोकसभा अध्यक्ष/उपाध्यक्ष पद की रिक्ति, त्यागपत्र और विमुक्ति
95 अध्यक्ष के अभाव में उपाध्यक्ष या किसी अन्य की अध्यक्षता
96 अध्यक्ष/उपाध्यक्ष के विरुद्ध प्रस्ताव लंबित हो तो अध्यक्षता से विरत रहना
97 सभापति, उपसभापति, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते
98 संसद सचिवालय
कार्यवाही का संचालन 
99 संसद के सदस्यों द्वारा शपथ
100 कोरम के बिना भी सदन की कार्यवाही
सदस्यों की अयोग्यता 
101 सदस्य की सीट रिक्त होना
102 सदस्यता के लिए अयोग्यता
103 अयोग्यता पर निर्णय का अधिकार राष्ट्रपति को
104 अयोग्य होते हुए भाग लेने पर दंड
संसद तथा इसके सदस्यों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार तथा प्रतिरक्षा
105 संसद तथा उसके सदस्यों के विशेषाधिकार एवं शक्तियाँ
106 संसद सदस्यों के वेतन और भत्ते
विधायी प्रक्रिया
107 विधेयकों की प्रस्तुति और पारित करने की प्रक्रिया
108 दोनों सदनों की संयुक्त बैठक
109 धन विधेयकों की विशेष प्रक्रिया
110 धन विधेयक की परिभाषा
111 विधेयकों की राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति
वित्तीय मामलों में प्रक्रिया
112वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट)
113 प्राक्कलन पर संसद की प्रक्रिया
114 विनियोजन विधेयक
115 पूरक, अतिरिक्त और अतिरेक अनुदान
116 लेखा पर मतदान और ऋण
117 वित्तीय विधेयकों से संबंधित विशेष प्रावधान
सामान्य प्रक्रिया
118 संसद की कार्यवाही के लिए नियम
119 संसद में वित्तीय कार्यवाहियों का नियमन
120 संसद में प्रयुक्त भाषा
121 न्यायिक कार्यों पर संसद में चर्चा वर्जित
122संसद की कार्यवाही पर न्यायालय में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता
राष्ट्रपति की विधायी शक्तियाँ
123 संसद अवकाश के दौरान राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति

भारतीय संसद का गठन – अनुच्छेद 79

⇒ संघ के लिए एक संसद → राष्ट्रपति + राज्यसभा + लोकसभा।

  • राष्ट्रपति संसद का अंग है परंतु सदस्य नहीं।
  • राष्ट्रपति संसद की बैठकों में भाग नहीं लेता, लेकिन विधेयक तभी अधिनियम बनेगा जब राष्ट्रपति उस पर हस्ताक्षर करेगा।
राज्यसभालोकसभा
1954 → “राज्य परिषद्” शब्द की जगह राज्यसभा।1954 → “जनता का सदन” शब्द की जगह लोकसभा।
उच्च सदन / दूसरा सदन / बड़ों की सभा।निचला सदन / पहला सदन / लोकप्रिय सभा।
राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों से।सम्पूर्ण भारत के लोगों का प्रतिनिधित्व।
राज्यसभा शब्द का प्रयोग : 23 अगस्त 1954 से।लोकसभा शब्द का प्रयोग : 14 मई 1954 से।
  • प्रथम आम चुनाव → 26 अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 तक।
  • प्रथम निर्वाचित संसद → अप्रैल 1952 में अस्तित्व में आई।
  • राज्यसभा की उत्पत्ति के संकेत → मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार, 1919।
  • भारत सरकार अधिनियम 1919 → राज्य परिषद् (Upper Chamber) का गठन, 1921 में अस्तित्व।
  • 1952 के प्रथम चुनाव तक केंद्रीय विधानमंडल एक सदनीय।
  • 3 अप्रैल 1952 → राज्य परिषद् का गठन → कुल सदस्य 216 (204 निर्वाचित + 12 मनोनीत)।

महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • प्रथम लोकसभा का गठन → 17 अप्रैल 1952
  • प्रथम राज्यसभा का गठन → 3 अप्रैल 1952
  • लोकसभा की प्रथम बैठक → 13 मई 1952
  • प्रथम लोकसभा अध्यक्ष → गणेश वासुदेव मावलंकर
  • प्रथम लोकसभा उपाध्यक्ष → एम.ए. आयंगर
  • प्रथम राज्यसभा सभापति → डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
  • प्रथम राज्यसभा उपसभापति → एस.वी. कृष्णमूर्ति राव
राज्यसभा की संरचना – अनुच्छेद 80
  • [अनुच्छेद 80(1)] : अधिकतम सदस्य – 250।
    • 238 सदस्य (राज्य व संघ राज्य क्षेत्र) 
      • अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित।
    • 12 सदस्य → राष्ट्रपति द्वारा नामित।
  • वर्तमान सदस्य संख्या : 245
    • 233 सदस्य → निर्वाचित (225 राज्य + 8 संघ राज्य क्षेत्र)।
    • 12 सदस्य → राष्ट्रपति द्वारा नामित।
  • संघ राज्य क्षेत्र से सीटें : दिल्ली (3), पुद्दुचेरी (1), जम्मू-कश्मीर (4)।
  • अन्य संघ राज्य क्षेत्रों को जनसंख्या कम होने के कारण प्रतिनिधित्व नहीं।
  • संविधान लागू होने (26 जनवरी 1950) से अब तक राज्यसभा की सदस्य संख्या में कोई परिवर्तन नहीं।
  • संविधान की चौथी अनुसूची में राज्यसभा के लिए राज्यों व संघ राज्य क्षेत्रों में सीटों के आवंटन का वर्णन किया गया है। (आधार : जनसंख्या)। [अनुच्छेद 80(2)]

नाम-निर्देशन (Nominated Members)/मनोनीत

  • अनुच्छेद 80(3): राष्ट्रपति जिन 12 लोगों को नामित करता है, वे ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनके पास निम्न क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव होता है –
    • साहित्य
    • विज्ञान
    • कला
    • समाज सेवा
  • नाम-निर्दिष्ट सदस्य का कार्यकाल : 6 वर्ष।
  • आकस्मिक रिक्ति पर नामांकन → शेष कार्यकाल ही गिना जाएगा।
  • अब तक किसी नामित सदस्य को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं किया गया (संविधान अनुमति देता है)।
  • प्रथम महिला नामित सदस्य : रुक्मिणी देवी अरुण्डेल (1952–1962)।
  • प्रथम अभिनेता नामित सदस्य : पृथ्वीराज कपूर।

निर्वाचन प्रक्रिया

  • राज्य प्रतिनिधित्व – अनुच्छेद 80(4)
    • राज्यसभा सदस्यों का निर्वाचन → अप्रत्यक्ष रूप से।
    • मतदान अधिकार : केवल राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य (मनोनीत नहीं)।
    • पद्धति : एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व।
  • संघ राज्य क्षेत्र प्रतिनिधित्व – अनुच्छेद 80(5)
    • संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों का चुनाव → संसद द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार।

सदस्यता से संबंधित प्रावधान

  • भारत का कोई भी नागरिक राज्यसभा का सदस्य बन सकता है (उस राज्य का निवासी होना आवश्यक नहीं जहाँ से चुनाव लड़ा जा रहा हो)।
  • 1952–2003 : चुनाव गुप्त मतदान द्वारा।
  • 2003 : जन प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 2003 से → खुला मतदान लागू।
  • 2006 : सर्वोच्च न्यायालय ने कुलदीप नैयर केस में इसे संवैधानिक ठहराया।
  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 2003 → प्रत्याशी के लिए राज्य का मतदाता होना आवश्यक नहीं।

रिक्तियों की पूर्ति

  • पूर्ण कार्यकाल सदस्य : 6 वर्ष।
  • आकस्मिक रिक्ति की पूर्ति हेतु चुनाव = उपचुनाव।
  • उपचुनाव में चुना सदस्य केवल शेष कार्यकाल पूरा करेगा।

राज्यसभा की अवधि [अनुच्छेद 83]

  • राज्यसभा एक स्थायी (permanent) संस्था है। इसका कभी विघटन नहीं होता।
  • हर दो वर्ष में राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
  • सेवानिवृत्त सदस्यों की सीटें चुनाव के माध्यम से भरी जाती हैं।
  • राष्ट्रपति द्वारा हर तीसरे वर्ष की शुरुआत में कुछ सदस्यों का नामांकन (nomination) किया जाता है।
  • सेवा निवृत्त सदस्य कई बार फिर से चुनाव लड़ सकते हैं या नॉमिनेट हो सकते हैं।
  • भारतीय संविधान ने राज्यसभा सदस्यों की निर्धारित अवधि नहीं दी, बल्कि यह निर्णय संसद पर छोड़ा गया।
  • जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधान –
    • इस अधिनियम के तहत राज्यसभा सदस्यों की पदावधि 6 वर्ष तय की गई।
    • प्रथम राज्यसभा के लिए विशेष प्रावधान –
      • 1952 में पहली बार चुने गए सदस्यों की पदावधि को कम करने का अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया, ताकि सेवानिवृत्ति का चक्र आरंभ किया जा सके।
      • पहले बैच में यह तय हुआ कि लॉटरी प्रणाली (draw of lots) के माध्यम से यह निर्धारित किया जाएगा कि कौन से सदस्य 2, 4, और 6 वर्षों के बाद सेवानिवृत्त होंगे।
      • निवृत्ति क्रम → राज्यसभा (सदस्यों की पदावधि) आदेश, 1952 द्वारा।
      • 13 मई 1952 → पहली बैठक।
      • 1954 व 1956 में 1/3 सदस्यों की निवृत्ति लॉटरी (श्लाका व्यवस्था) द्वारा की गई।
    • राष्ट्रपति को यह अधिकार भी दिया गया कि वह राज्यसभा सदस्यों की सेवानिवृत्ति से संबंधित नियमों को नियंत्रित करने वाले उपबंध बना सके।
    • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 154 : आकस्मिक रिक्ति होने पर नया सदस्य केवल शेष अवधि के लिए चुना/नामित होगा।
    • नाम-निर्दिष्ट सदस्य का कार्यकाल भी अन्य सदस्यों जैसा (6 वर्ष)।

सदस्यता की योग्यता (अनुच्छेद 84)

  • भारत का नागरिक हो।
  • आयु → 30 वर्ष या उससे अधिक।
  • तीसरी अनुसूची के अनुसार शपथ/प्रतिज्ञान लिया हो।
  • संसद द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताएँ (जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत)।
  • 2003 संशोधन : राज्यसभा सदस्य बनने के लिए उस राज्य का मतदाता होना आवश्यक नहीं। → भारत का कोई भी नागरिक किसी भी राज्य से राज्यसभा का सदस्य बन सकता है।

शपथ या प्रतिज्ञान (Oath or Affirmation)

  • शपथ लेने की आवश्यकता:
    • अनुच्छेद 99 : सभी सदस्यों को शपथ या प्रतिज्ञान राष्ट्रपति या उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति दिलवाता है।
    • शपथ का प्रारूप → तीसरी अनुसूची।
    • व्यवहार में :
      • निर्वाचित सदस्यों को शपथ → सभापति दिलाते हैं।
      • नाम-निर्दिष्ट सदस्यों को शपथ → राष्ट्रपति दिलाते हैं।
  • शपथ/प्रतिज्ञान में सदस्य यह प्रतिज्ञा करता है कि वह:
    1. भारत के संविधान में सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेगा।
    2. भारत की प्रभुता और अखंडता की रक्षा करेगा।
    3. अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करेगा।
  • जब तक शपथ न ले ले:
    • वह सदस्य सदन की बैठक में भाग नहीं ले सकता,
    • वोट नहीं दे सकता, और
    • संसदीय विशेषाधिकारों का लाभ नहीं उठा सकता।
  • बिना शपथ के सदन में बैठने पर दंड: यदि कोई व्यक्ति निम्न स्थितियों में सदन में बैठता है, तो उसे 500 रुपए प्रतिदिन जुर्माना देना होगा:
    • बिना शपथ लिए,
    • यह जानते हुए कि वह अर्ह नहीं है,
    • जबकि उसे मालूम हो कि किसी कानून के तहत वह मत देने या बैठने का अधिकारी नहीं है।

संसद सदस्यों के वेतन और भत्ते – [अनुच्छेद 106]

  • वेतन का निर्धारण:
    • संसद सदस्यों का वेतन और भत्ते संसद द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
    • संविधान में पेंशन का प्रावधान नहीं है, लेकिन संसद द्वारा इसे कानून द्वारा प्रदान किया जाता है।
    • राज्यसभा और लोकसभा सांसदों का वेतन-भत्ता समान है। इसमें कोई अंतर नहीं है।
    • सांसदों को दिए गए निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और कार्यालय व्यय भत्ता उनके कार्यक्षेत्र और कार्यालय खर्चों पर ही खर्च करने होते हैं।
  • प्रमुख अधिनियम:
    • 1954: संसद सदस्य वेतन, भत्ता एवं पेंशन अधिनियम पारित।
    • वर्तमान में:
      • वेतन: ₹100000 प्रति माह
      • निर्वाचन क्षेत्र भत्ता: ₹70,000 प्रति माह
      • दैनिक भत्ता: ₹2,000 (कार्यदिवस पर उपस्थिति हेतु)
      • कार्यालय खर्च भत्ता: ₹60,000 प्रति माह
  • पेंशन: 1976 से, संसद सदस्यों को हर पांच वर्ष की सेवा पर पेंशन का अधिकार प्राप्त है।
    • पूर्व सांसद को ₹25,000 प्रति माह पेंशन
    • हर अतिरिक्त कार्यकाल पर ₹2,000 प्रतिमाह बढ़ोतरी
  • अन्य सुविधाएँ: यात्रा भत्ता, नि:शुल्क आवास, टेलीफोन, चिकित्सा सुविधा, वाहन खर्च आदि मिलते हैं।

संसद पदाधिकारियों का वेतन और भत्ते

  • नियमन:
    • 1953: संसद पदाधिकारियों का वेतन एवं भत्ता अधिनियम पारित।
  • प्रमुख प्रावधान (संशोधित रूप):
    • राज्यसभा के सभापति का वेतन: ₹4.00 लाख प्रति माह
    • लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा उपाध्यक्ष, राज्यसभा उपसभापति:
      • वही वेतन व भत्ते जो संसद सदस्यों को मिलते हैं।
        • 1 लाख रुपये 
      • दैनिक भत्ता – संसद सदस्यों के बराबर
    • निर्वाचन क्षेत्र भत्ता – सभापति को छोड़कर, अन्य को संसद सदस्यों के बराबर
  • न्यायिक भत्ता (Sumptuary Allowance):
    • लोकसभा अध्यक्ष: ₹2,000 प्रति माह (कैबिनेट मंत्री के बराबर)
    • लोकसभा उपाध्यक्ष और राज्यसभा उपसभापति: ₹1,000 प्रति माह (राज्यमंत्री के बराबर)

संसद की सदस्यता हेतु अर्हताएं [अनुच्छेद 84]

  • संविधान द्वारा निर्धारित अर्हताएं:
    1. भारत का नागरिक होना आवश्यक है।
    2. निर्वाचन से पूर्व, चुनाव आयोग द्वारा अधिकृत व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी होती है कि:
      • वह भारत के संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा रखेगा।
      • वह भारत की संप्रभुता एवं अखण्डता को बनाए रखने का वचन देगा।
    3. आयु संबंधी अर्हता –
      • राज्यसभा के लिए न्यूनतम 30 वर्ष की आयु।
      • लोकसभा के लिए न्यूनतम 25 वर्ष की आयु।
    4. उसे वे अतिरिक्त अर्हताएं भी पूरी करनी होंगी, जिन्हें संसद द्वारा कानून के माध्यम से निर्धारित किया गया हो।

संसद की सदस्यता हेतु निरर्हताएं (Disqualifications for Membership of Parliament) – (अनुच्छेद 102)

  • संविधान द्वारा निर्धारित निरर्हताएं: 
    • यदि व्यक्ति भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर हो (मंत्री या संसद द्वारा घोषित पद को छोड़कर)।
    • यदि वह विकृत चित्त (unsound mind) हो और न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित किया गया हो।
    • यदि वह घोषित दिवालिया (undischarged insolvent) हो।
    • यदि वह भारत का नागरिक नहीं है, या उसने किसी विदेशी देश की नागरिकता स्वेच्छा से ले ली हो, या किसी विदेशी देश के प्रति निष्ठा व्यक्त की हो।
    • यदि वह संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के अंतर्गत निरर्ह घोषित किया गया हो।
  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत अतिरिक्त निरर्हताएं:
    • यदि वह चुनावी अपराध या भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया गया हो।
    • यदि उसे दो वर्ष या उससे अधिक की सजा हुई हो।
      • नोट: केवल प्रतिबंधात्मक बंदी (Preventive Detention) निरर्हता नहीं मानी जाती।
    • यदि वह चुनावी खर्च का विवरण समय पर न दे।
    • यदि वह किसी सरकारी ठेके, कार्य या सेवाओं में आर्थिक रूप से संलग्न हो।
    • यदि वह ऐसे निगम/कंपनी में लाभ के पद पर हो, जिसमें सरकार की 25% से अधिक हिस्सेदारी हो।
    • यदि उसे भ्रष्टाचार या निष्ठाहीनता के आधार पर सरकारी सेवा से बर्खास्त किया गया हो।
    • यदि वह धार्मिक, जातीय, भाषाई या क्षेत्रीय आधार पर शत्रुता फैलाने, या रिश्वतखोरी के अपराध में दोषी पाया गया हो।
    • यदि वह छुआछूत, दहेज या सती प्रथा जैसे सामाजिक अपराधों में संलिप्त हो।
लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013)

विवाद का केंद्र बिंदु → जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(4)

प्रावधान :

  • यदि कोई वर्तमान सांसद/विधायक आपराधिक मामले में दोषी ठहराया जाता और 2 वर्ष या उससे अधिक की सजा मिलती, तो उसे तत्काल अयोग्य नहीं ठहराया जाता।
  • उसे 3 महीने तक अपील दायर करने की छूट मिलती थी, और अपील लंबित रहने तक सदस्यता बनी रहती थी।
  • इस विशेषाधिकार को चुनौती लिली थॉमस (एक अधिवक्ता) और लोक प्रहरी संगठन ने दी।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (Judgement)

  • पीठ: न्यायमूर्ति A.K. पटनायक और न्यायमूर्ति S.J. मुखोपाध्याय।
  • वर्ष: 10 जुलाई 2013।
  • धारा 8(4) को असंवैधानिक घोषित किया गया। दोषसिद्धि और ≥2 वर्ष की सजा होते ही सांसद/विधायक तत्काल अयोग्य हो जाएगा।
  • संविधान का अनुच्छेद 102(1)(e) (सांसदों की अयोग्यता) और अनुच्छेद 191(1)(e) (विधायकों की अयोग्यता) स्पष्ट है –
  • “कोई भी व्यक्ति दोषसिद्धि की स्थिति में अयोग्य होगा” – इसमें वर्तमान सदस्य और प्रत्याशी दोनों शामिल हैं।
  • संसद को यह अधिकार नहीं कि वह वर्तमान सदस्यों को तीन महीने की राहत प्रदान करे।

अनुच्छेद 103 :

  • सदस्यों की अयोग्यता/निरर्हता पर निर्णय राष्ट्रपति करेगा।
  • राष्ट्रपति, निर्णय से पहले निर्वाचन आयोग की राय लेगा और उसी के अनुसार कार्य करेगा।
दल-बदल के आधार पर निरर्हता (Disqualification under Anti-Defection Law):
  • दल-बदल कानून (52वाँ संशोधन, 1985; 10वीं अनुसूची) के तहत निम्नलिखित मामलों में सदस्य को निरर्ह ठहराया जा सकता है:
    • यदि वह उस राजनीतिक दल से इस्तीफा दे देता है, जिसके टिकट पर वह चुना गया था।
    • यदि वह अपने राजनीतिक दल द्वारा जारी ह्विप (निर्देश) के विरुद्ध वोट करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है।
    • यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाए।
    • यदि कोई मनोनीत सदस्य छह: महीने की अवधि समाप्त होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।

इन मामलों में निर्णय:

  • लोकसभा में – अध्यक्ष (Speaker) द्वारा
  • राज्यसभा में – सभापति (Chairman) द्वारा दिया जाता है।

नोट:  1992 में, सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि इस संबंध में अध्यक्ष/अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है। (किहोता होलोहान बनाम ज़ाचिल्हु)

संसद सदस्य का स्थान रिक्त होने की परिस्थितियाँ

1. दोहरी सदस्यता (Dual Membership):
  • कोई व्यक्ति एक साथ संसद के दोनों सदनों (लोकसभा व राज्यसभा) का सदस्य नहीं हो सकता।
    • यदि कोई व्यक्ति दोनों सदनों में चुना जाता है, तो उसे 10 दिन के भीतर यह सूचित करना होता है कि वह किस सदन की सदस्यता स्वीकार करेगा। यदि सूचना नहीं देता, तो राज्यसभा की सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है।
    • यदि किसी सदन का सदस्य, दूसरे सदन में निर्वाचित हो जाता है, तो पहले वाले सदन की सीट खाली मानी जाएगी।
    • यदि कोई व्यक्ति एक ही सदन में दो सीटों पर निर्वाचित होता है, तो उसे एक सीट त्यागनी होगी। यदि ऐसा नहीं करता, तो दोनों सीटें रिक्त हो जाती हैं।
  • इसी तरह, कोई व्यक्ति एक साथ संसद और राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं हो सकता। यदि वह दोनों में निर्वाचित होता है, तो उसे 14 दिन के भीतर राज्य विधानमंडल की सीट छोड़नी होगी, अन्यथा संसद की सदस्यता समाप्त मानी जाएगी।
2. निरर्हता (Disqualification):
  • यदि कोई सदस्य संविधान में वर्णित किसी अर्हता से अयोग्य (निरर्ह) पाया जाता है, तो उसकी सीट खाली मानी जाती है।
  • इसमें संविधान की दसवीं अनुसूची में वर्णित दल-बदल के आधार पर अयोग्यता भी शामिल है।
3. पदत्याग (Resignation):
  • कोई सदस्य राज्यसभा के सभापति या लोकसभा के अध्यक्ष को लिखित त्यागपत्र देकर इस्तीफा दे सकता है।
  • यदि अध्यक्ष/सभापति को यह लगता है कि त्यागपत्र स्वेच्छा से नहीं दिया गया या असत्य है, तो वे उसे अस्वीकार भी कर सकते हैं।
4. अनुपस्थिति (Absence):
  • यदि कोई सदस्य बिना अनुमति के लगातार 60 दिनों तक सदन की बैठकों में अनुपस्थित रहता है, तो सदन उसका पद रिक्त घोषित कर सकता है।
  • 60 दिनों की गणना में वे दिन नहीं गिने जाते जिनमें सदन स्थगित या विसर्जित रहा हो (यदि वह 4 दिन से अधिक का हो)।
5. अन्य परिस्थितियाँ:
  1. जब सदस्य का चुनाव अदालत द्वारा अमान्य या शून्य घोषित कर दिया जाता है।
  2. जब सदस्य को सदन द्वारा निष्कासित कर दिया जाता है।
  3. जब सदस्य राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित होता है।
  4. जब सदस्य किसी राज्य का राज्यपाल बना दिया जाता है।

नोट: 

  • यदि कोई अयोग्य व्यक्ति संसद में निर्वाचित होता है, तो संविधान उसे शून्य घोषित नहीं करता। ऐसे मामलों में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 लागू होता है।
  • चुनाव को उच्च न्यायालय शून्य घोषित कर सकता है, और उस निर्णय के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है।

राज्यसभा की उपयोगिता:

  1. विधायिका की समीक्षा – लोकसभा द्वारा जल्दबाज़ी में बनाए गए कानूनों की समीक्षा करती है।
  2. विशेषज्ञों का मंच – राष्ट्रपति द्वारा नामित विशेषज्ञों को प्रतिनिधित्व मिलता है।
  3. राज्यों के हितों की रक्षा – संघीय संतुलन बनाए रखने में सहायक।

राज्यसभा के पदाधिकारी

राज्यसभा का सभापति

  • सभापति (Chairman) : भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है।
    • कार्यकाल : 5 वर्ष।
    • राज्यसभा का सदस्य नहीं होता।
    • जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तब वह राज्यसभा का सभापति नहीं होता।
    • प्रथम सभापति : डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन।
  • पद से हटाना:
    • सभापति को तभी हटाया जा सकता है जब वह उपराष्ट्रपति पद से हटा दिया जाए।
  • शक्तियाँ व सीमाएँ:
    • कार्यक्षेत्र लोकसभा अध्यक्ष के समान।
    • लेकिन दो शक्तियाँ नहीं होतीं:
      • धन विधेयक की प्रकृति तय करने का अधिकार।
      • संसद की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता।
  • मतदान का अधिकार:
    • केवल मत बराबर होने पर निर्णायक मत देता है।
    • सदन का सदस्य नहीं होता।
  • हटाने के प्रस्ताव के दौरान:
    • तब वह अध्यक्षता नहीं करता, पर सदन में उपस्थित रह सकता है, बोल सकता है, पर वोट नहीं कर सकता।
  • वेतन-भत्ता:
    • संसद द्वारा निर्धारित किया जाता है।
    • भारतीय संसदीय समूह का पदेन अध्यक्ष होता है।
  • राष्ट्रपति कार्यकाल में वेतन:
    • जब वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तब राष्ट्रपति का वेतन पाता है।

राज्यसभा का उपसभापति

  • चयन:
    • राज्यसभा अपने सदस्यों में से उपसभापति का चुनाव करती है।
    • कार्यकाल : 6 वर्ष।
    • सभापति की अनुपस्थिति में सदन की अध्यक्षता करता है।
    • वर्तमान उपसभापति : हरिवंश नारायण सिंह (जदयू)।
  • पद त्याग की स्थितियाँ:
    • अनुच्छेद 90 : उपसभापति को पद छोड़ना होगा यदि –
      • वह सदस्यता खो दे।
      • त्यागपत्र दे।
      • राज्यसभा बहुमत से हटाए (14 दिन पूर्व सूचना जरूरी)।
  • त्यागपत्र व्यवस्था :
    • सभापति (उपराष्ट्रपति) → त्यागपत्र राष्ट्रपति को।
    • उपसभापति → त्यागपत्र सभापति को।
  • शक्तियाँ व अंतर :
    • सभापति की शक्तियाँ स्पीकर जैसी हैं।
    • सभापति की अनुपस्थिति या पद रिक्त होने पर सभापति के रूप में कार्य करता है। उस समय सभापति की सभी शक्तियाँ होती हैं।
    • अंतर :
      • धन विधेयक पर निर्णय नहीं करता।
      • संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता।
  • उत्तरदायित्व:
    • उपसभापति सभापति का अधीनस्थ नहीं, सीधे राज्यसभा के प्रति उत्तरदायी होता है।
  • मतदान अधिकार:
    • पहले मत का अधिकार नहीं।
    • मत बराबर होने पर निर्णायक मत देता है।
  • हटाने के संकल्प के दौरान:
    • वह पीठासीन नहीं होता, पर सदन में उपस्थित रह सकता है।
  • सामान्य सदस्य के रूप में:
    • जब सभापति पीठासीन हो, तब वह सामान्य सदस्य के समान कार्य करता है और मतदान कर सकता है।
  • वेतन व भत्ते:
    • संसद द्वारा तय किए जाते हैं, और भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं।
क्रमांकनामकार्यकालपार्टी/गठबंधन
1एस. वी. कृष्णमूर्ति राव31 मई 1952 – 2 अप्रैल 1956भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
2वायलेट अल्वा19 अप्रैल 1962 – 2 अप्रैल 1966भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
3भीमराव देवाजी खोब्रागड़े17 दिसंबर 1969 – 2 अप्रैल 1972रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया
4गोदी मुरारी13 अप्रैल 1972 – 2 अप्रैल 1974संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी
5रामनिवास मिर्धा30 मार्च 1977 – 2 अप्रैल 1980भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
6श्यामलाल यादव30 जुलाई 1980 – 4 अप्रैल 1982भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
7नजमा हेपतुल्ला25 जनवरी 1985 – 20 जनवरी 1986भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
8म. म. जेकब26 फरवरी 1986 – 22 अक्टूबर 1986भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
9प्रतिभा पाटिल18 नवंबर 1986 – 5 नवंबर 1988भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
10नजमा हेपतुल्ला18 नवंबर 1988 – 4 जुलाई 1992भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
11के. रहमान खान22 जुलाई 2004 – 2 अप्रैल 2006भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
12पी. जे. कुरियन21 अगस्त 2012 – 1 जुलाई 2018भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
13हरिवंश नारायण सिंह9 अगस्त 2018 – वर्तमानजनता दल (यूनाइटेड)
  • विशेष तथ्य :
    • प्रतिभा देवी सिंह पाटिल → उपसभापति, बाद में राष्ट्रपति।
    • वायलेट अल्वा → प्रथम महिला उपसभापति (1962–69)।
    • नजमा हेपतुल्ला → सबसे लंबे समय (18 वर्ष) तक उपसभापति।

राज्यसभा के उपसभापतियों की तालिका (Panel of Vice-Chairpersons)

  • निर्वाचन: सभापति राज्यसभा के सदस्यों में से कुछ को उपसभापतियों की तालिका में नामांकित करता है।
  • भूमिका:
    • सभापति और उपसभापति की अनुपस्थिति में ये सदस्य सदन की अध्यक्षता करते हैं।
    • उस समय सभापति के समान अधिकार और शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
  • तालिका की सीमा:
    • सभापति अधिकतम 6 सदस्यों की सूची बनाता है। अनुपस्थिति में इनमें से कोई सदन की अध्यक्षता करता है।
    • यह पैनल उस समय सदन की कार्यवाही नहीं चला सकता, जब सभापति या उपसभापति का पद रिक्त हो।
    • ऐसी स्थिति में नए उपसभापति का शीघ्र चुनाव अनिवार्य होता है।

संसद का सचिवालय

  • पृथक सचिवालय:
    • लोकसभा और राज्यसभा का अलग-अलग सचिवालय होता है।
    • कुछ पद दोनों के लिए समान भी होते हैं।
  • नियुक्ति व सेवा शर्तें:
    • संसद द्वारा निर्धारित की जाती हैं।
  • महासचिव:
    • प्रत्येक सदन के सचिवालय का मुखिया महासचिव होता है।
    • यह स्थायी पद होता है।
    • उसकी नियुक्ति सदन के पीठासीन अधिकारी द्वारा की जाती है।

राज्यसभा की शक्तियाँ व कार्य

  • साधारण विधेयक :
    • दोनों सदनों की समान शक्ति।
    • राज्यसभा लोकसभा द्वारा पारित विधेयक को 6 माह रोक सकती है (समाप्त नहीं कर सकती)।
    • मतभेद होने पर → संयुक्त बैठक (अनु. 108)।
  • संविधान संशोधन विधेयक :
    • दोनों सदनों की समान शक्ति।
    • राज्यसभा पास न करे → विधेयक असफल।
  • धन विधेयक :
    • केवल लोकसभा में पेश।
    • राज्यसभा 14 दिन तक रोक सकती है, अस्वीकार नहीं कर सकती।
  • अन्य कार्य :
    • राष्ट्रपति के महाभियोग में भागीदारी।
    • उपराष्ट्रपति के चुनाव में मतदान।

राज्यसभा की विशिष्ट शक्तियाँ

  • अनुच्छेद 249 :
    • राज्यसभा, 2/3 बहुमत से किसी राज्य सूची विषय को “राष्ट्रीय महत्व” घोषित कर सकती है → संसद कानून बना सकती है।
    • प्रभाव : 1 वर्ष (हर बार बढ़ाया जा सकता है)।
  • अनुच्छेद 312 :
    • 2/3 बहुमत से संसद को नई अखिल भारतीय सेवाएँ बनाने की अनुमति।
    • 1961 : भारतीय इंजीनियर्स सेवा, भारतीय वन सेवा, भारतीय चिकित्सा सेवा।
    • 1965 : भारतीय कृषि सेवा, भारतीय शिक्षा सेवा।
    • उपराष्ट्रपति पद से हटाने का प्रस्ताव → केवल राज्यसभा प्रारंभ कर सकती है।

राज्यसभा का गैर-संघात्मक लक्षण

  • उच्च सदन संघीय इकाइयों के हितों का प्रतिनिधित्व करता है।
  • भारत में समान प्रतिनिधित्व नहीं → जनसंख्या आधारित असमान प्रतिनिधित्व।
  • बड़े राज्यों का वर्चस्व।
  • तुलना :
    • समान प्रतिनिधित्व – अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्ज़रलैंड।
    • असमान प्रतिनिधित्व – भारत, कनाडा, जर्मनी।
  • सदस्य का उस राज्य का निवासी होना आवश्यक नहीं → इकाई प्रतिनिधित्व कमजोर।

प्रासंगिकता पर प्रश्न चिह्न

  • इसे अक्सर कहा जाता है →
    • राजनीतिक शरणस्थली : चुनाव हारे नेताओं, नौकरशाहों, पसंदीदा व्यक्तियों की जगह।
    • धनबल का प्रभाव : क्रॉस-वोटिंग से चुनाव प्रणाली की शुचिता पर प्रश्न। (इसी कारण खुली मतदान प्रणाली लागू की गई)।
  • मनोनीत सदस्यों पर प्रश्न :
    • राष्ट्रपति नामांकन मंत्रीपरिषद की सलाह पर करता है → अक्सर राजनीतिक निष्ठा पर, न कि विशेषज्ञता पर।
    • लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर जैसे सदस्य → अनुपस्थिति के रिकॉर्ड बनाए।
विद्वानों का मत
  • डी.डी. बसु : “भारतीय संवैधानिक प्रणाली में राज्यसभा का महत्व उतना नहीं जितना अमेरिकी सीनेट का है, लेकिन इसकी स्थिति उतनी गिरी हुई भी नहीं जितनी ब्रिटेन की हाउस ऑफ लॉर्ड्स की है।”

लोकसभा की संरचना – अनुच्छेद 81

  • वर्तमान में संविधान में व्‍यवस्‍था है कि सदन की अधिकतम सदस्‍य संख्‍या 552 होगी
    • अनुच्छेद 81 के अनुसार –
      • 530 सदस्य → राज्यों से
      • 20 सदस्य → संघ राज्य क्षेत्रों से 
    • अनुच्छेद 331 के अनुसार
      • 2 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामित (एंग्लो-इंडियन समुदाय से)
  • 31वाँ संविधान संशोधन (1973) व गोवा-दमन दीव पुनर्गठन अधिनियम (1987) के बाद यह संख्या 552 निश्चित हुई।
  • वर्तमान में कुल 543 सदस्य हैं :
    • 524 सदस्य → राज्यों से
    • 19 सदस्य → संघ शासित क्षेत्रों से

लोकसभा की निर्वाचन प्रणाली

  • लोकसभा के 543 सदस्य → प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने जाते हैं।
  • प्रणाली → फर्स्ट पास्ट द पोस्ट (FPTP) (अग्रता ही विजेता), हालांकि संविधान में इस शब्दावली का उल्लेख नहीं।
  • प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र
    • प्रत्येक राज्य को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटा गया है।
    • संविधान के अनुसार:
      • लोकसभा में राज्यों को दी गई सीटों का जनसंख्या के अनुसार समानुपात होना चाहिए।
      • राज्यों के भीतर भी निर्वाचन क्षेत्रों का जनसंख्या आधारित समानुपात सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
        • 60 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्यों पर यह प्रावधान लागू नहीं।
  • चुनाव → प्रत्यक्ष निर्वाचन (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर)।
  • मतदान आयु : 21 से घटाकर 18 वर्ष (61वाँ संविधान संशोधन, 1988; प्रभावी 1989)।
  • संघ राज्य क्षेत्रों में भी प्रत्यक्ष चुनाव (संघ राज्य क्षेत्र लोकसभा प्रत्यक्ष निर्वाचन अधिनियम, 1965)।
  • यदि एंग्लो-इंडियन समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हो तो राष्ट्रपति द्वारा 2 सदस्य नामित कर सकते थे (अनुच्छेद 331)।
    • 104वाँ संशोधन (2019) → 2020 के बाद एंग्लो-इंडियन नामांकन की व्यवस्था समाप्त।
  • प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली
    • लोकसभा में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली नहीं, बल्कि प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनाई गई है।
    • हर निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है (एकल सदस्य निर्वाचन क्षेत्र)।
    • जिसे सबसे अधिक मत मिले, वही विजयी घोषित होता है (First Past the Post System)
  • आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली
    • भारत में यह प्रणाली केवल राज्यसभा, विधान परिषद, राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए लागू है।
    • दो प्रकार:
      1. एकल हस्तांतरणीय मत प्रणाली
      2. सूची प्रणाली
    • लोकसभा में इसे न अपनाने के कारण:
      • जटिलता – भारत में शिक्षा का स्तर कम।
      • बहुदलीय प्रणाली – अस्थिरता का खतरा।
  • आनुपातिक प्रणाली की सीमाएं
    1. महंगी प्रक्रिया
    2. उप-चुनाव का अवसर नहीं
    3. मतदाता व प्रतिनिधि के बीच आत्मीयता की कमी
    4. अल्पसंख्यक हितों का अत्यधिक पक्ष
    5. पार्टी के महत्व को बढ़ावा, मतदाता की भूमिका कम

एंग्लो-इंडियन नामित सदस्य

  • केवल आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रपति नामित करता था।
  • अनुच्छेद 331 के अनुसार – अनुच्छेद 81 में किसी बात के होते हुए भी राष्ट्रपति एंग्लो-इंडियन समुदाय के दो सदस्यों को नामित या नाम निर्देशित कर सकता है।
    • (इस प्रावधान को 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा जनवरी 2020 में समाप्त कर दिया गया था।)
  • एंग्लो-इंडियन परिभाषा (अनुच्छेद 366) :
    • पिता या पितृपक्ष यूरोपीय मूल का हो,
    • भारतीय स्त्री से उत्पन्न संतान हो,
    • स्थायी रूप से भारत में निवासरत हो।
  • 17वीं (2019) व 18वीं (2024) लोकसभा में कोई एंग्लो-इंडियन सदस्य नहीं।
  • 1952 से 2020 तक नामांकन व्यवस्था रही।

भारतीय संविधान के 104वें संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा 

  • संविधान के अनुच्छेद 334 में संशोधन किया गया और लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों (SC) एवं जनजातियों (ST) के लिए आरक्षण की अवधि को 10 वर्ष के लिए और बढा दिया गया था । इससे पहले इस अरक्षण की सीमा 25 जनवरी 2020 थी ।
  • लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में एंग्लो- इंडियन के लिए सीटों के आरक्षण को समाप्त कर दिया।

अनुच्छेद 82 – चुनाव क्षेत्रों का पुनर्समायोजन

  • प्रत्येक जनगणना के बाद चुनाव क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाता है।
  • राज्यों को दी गई सीटों का पुनर्विन्यास (Reallocation of Seats) किया जाता है।
  • राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्विभाजन (Redivision of Constituencies) किया जाता है।
  • इसके लिए परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन किया जाता है।
    • राष्ट्रपति द्वारा चुनाव आयोग की सिफारिश पर गठित किया जाता है । 
    • अंतिम निर्णय । No Challange
  • परिसीमन आयोग की संरचना :
    • अध्यक्ष → उच्चतम न्यायालय का रिटायर्ड न्यायाधीश
    • सदस्य → मुख्य निर्वाचन आयुक्त, राज्य निर्वाचन आयुक्त
    • सहायक सदस्य → लोकसभा व विधानसभा के 5-5 सदस्य (बिना मतदान अधिकार)
  • कार्य : लोकसभा व विधानसभा सीटों का जनसंख्या अनुपात में पुनर्सीमांकन।
  • अब तक चार परिसीमन आयोग : 1952, 1962, 1972, 2002
  • चौथा आयोग (2002) : न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में।
  • कुल सीटों में कोई बदलाव नहीं, केवल आकार में समायोजन।
  • सीट निर्धारण व संशोधन
    • 42वाँ संशोधन (1976) : सीटें 2000 तक स्थिर (1971 जनगणना आधार)।
    • 84वाँ संशोधन (2001) : 2026 तक स्थिर, लेकिन 1991 जनगणना पर राज्य के भीतर क्षेत्रों का पुनर्विन्यास।
    • 87वाँ संशोधन (2003) : परिसीमन को 2001 की जनगणना के आधार पर करने का प्रावधान।
    • आरक्षण (2001 जनगणना आधार पर) :
      • अनुसूचित जाति (SC) → 84 सीटें
      • अनुसूचित जनजाति (ST) → 47 सीटें
  • आरक्षण व्यवस्था
    • अनुच्छेद 330 : लोकसभा में SC/ST के लिए जनसंख्या के अनुपात में आरक्षित सीटें।
    • वर्तमान आरक्षण : SC के लिए 84 सीटें, ST के लिए 47 सीटें।
    • प्रारंभिक अवधि : 10 वर्ष
      • अनुच्छेद 330, 331 – लोकसभा 
      • अनुच्छेद 332, 333 – विधानसभा 
    • शुरुआत में 10 वर्षों के लिए आरक्षण; बाद में हर 10 साल में बढ़ाया गया। :
      • 95वाँ संशोधन (2009) → 2020 तक
      • 104वाँ संशोधन (2019) → SC/ST आरक्षण 2030 तक, पर एंग्लो-इंडियन नहीं।
    • महिलाओं के लिए आरक्षण :
      • 106वाँ संशोधन (2023) → 33% आरक्षण।

राज्यवार प्रतिनिधित्व (उदाहरण)

  • राजस्थान :
    • लोकसभा → 25 सीटें (4 SC, 3 ST आरक्षित)।
    • राज्यसभा → 10 सीटें।
    • प्रथम लोकसभा (1952) → 10 नामित सदस्य (6 जम्मू-कश्मीर, 2 एंग्लो-इंडियन, 1 असम जनजातीय क्षेत्र, 1 अंडमान-निकोबार)।

अर्हताएँ (Qualifications)

  • राज्यसभा व लोकसभा में समान, केवल आयु का अंतर :
  • लोकसभा → 25 वर्ष या अधिक
  • राज्यसभा → 30 वर्ष या अधिक
  • SC/ST आरक्षित सीटों के लिए → वही जाति का होना अनिवार्य।
  • अनुच्छेद 84 : नागरिकता, आयु, शपथ आदि।

निरर्हताएँ (Disqualifications) – अनुच्छेद 102

  1. लाभ का पद धारण करना।
  2. दिवालिया होना।
  3. मानसिक/शारीरिक अक्षमता।
  4. नागरिकता समाप्त होना।
  5. संसद द्वारा बनाई गई विधि अनुसार अयोग्यता।
  • अनुच्छेद 103 :
    • सदस्य की अयोग्यता पर निर्णय → राष्ट्रपति।
    • राष्ट्रपति चुनाव आयोग की सलाह मानने को बाध्य।
    • न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

अन्य अयोग्यताएँ (जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951)

  • चुनावी अपराध या भ्रष्ट आचरण में दोषसिद्ध।
  • न्यायालय द्वारा 2 वर्ष से अधिक की कैद।
  • चुनावी खर्च का विवरण न देना।
  • सरकारी सेवा में भ्रष्टाचार/अविश्वसनीयता के कारण पदमुक्त होना।
  • सरकारी ठेकों या कार्यान्वयन में आर्थिक हित।
  • सरकार से जुड़ी कंपनियों/निगमों में निदेशक/पदधारी होना।
लाभ का पद (Office of Profit) – अनुच्छेद 102(1)(a)
  • अनुच्छेद 102(1)(a): कोई भी व्यक्ति संसद का सदस्य बनने या बने रहने के योग्य नहीं होगा, यदि वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन “लाभ का पद” (office of profit) धारण करता है। लेकिन अगर संसद ने किसी कानून द्वारा यह घोषित किया है कि उस पद को धारण करने से सदस्यता नहीं छिनेगी, तो उस स्थिति में वह व्यक्ति अयोग्य नहीं माना जाएगा।
  • लाभ का पद परिभाषित नहीं, पर संसद को यह तय करने का अधिकार।
  • उद्देश्य : विधायिका और कार्यपालिका का पृथक्करण।
  • संसद (निरर्हता निवारण) अधिनियम, 1959 :
    • कुछ पद लाभ का पद नहीं माने जाएंगे → मंत्री, विपक्ष के नेता, योजना आयोग उपाध्यक्ष, संसदीय सचिव, अल्पसंख्यक/SC/ST/महिला आयोग प्रमुख, NCC, होमगार्ड, कॉफी/चाय/रबर बोर्ड सदस्य आदि।
  • यह सूची समय-समय पर बढ़ाई जाती रही।
  • न्यायालयों ने भी लाभ के पद की व्याख्या की है → वित्तीय लाभ या फायदा पहुँचाने वाला पद।
लाभ का पद समिति
  • 1954 : ठाकुर दास भार्गव समिति गठित।
  • 1959 : संसद (निरर्हता निवारण) अधिनियम लागू।
  • प्रत्येक लोकसभा के गठन पर ‘लाभ के पद’ पर संयुक्त समिति बनती है।
  • समिति → संसद को रिपोर्ट देती है।
  • वेंकटचलैया आयोग (2001) :
  • सुझाव → लाभ का पद निर्धारित करने का अधिकार निर्वाचन आयोग को दिया जाए।
जया बच्चन बनाम भारत संघ वाद (2006)
  • यह वाद ‘लाभ के पद’ अनुच्छेद-102 (1) (A) से जुड़ा हुआ है।
  • 2003 में उत्तर प्रदेश सरकार ने जया बच्चन को उत्तर प्रदेश फिल्म विकास परिषद् का अध्यक्ष बनाया और कैबिनेट मंत्री का दर्जा व सुविधाएँ दीं।
  • उस समय वह राज्यसभा की सदस्य भी थीं।
  • राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग की अनुशंसा पर उनकी राज्यसभा सदस्यता समाप्त कर दी, क्योंकि वह लाभ का पद धारण कर रही थीं।
  • जया बच्चन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और कहा कि उन्होंने कोई आर्थिक लाभ नहीं लिया है।
  • परंतु सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कहा :
    • परिषद् का अध्यक्ष पद लाभ का पद है।
    • यह मायने नहीं रखता कि व्यक्ति ने वास्तव में लाभ लिया या नहीं।
    • केवल इतना पर्याप्त है कि उस पद से लाभ लिया जा सकता है।

राज्यों में संसदीय सचिव और लाभ का पद (अनुच्छेद 191(1)(a))

  • संसद ने अपने कानून में संसदीय सचिव को “लाभ का पद” नहीं माना है।
  • विवाद राज्यों के संसदीय सचिवों पर है।
  • राज्य विधानमंडल कानून बनाकर संसदीय सचिवों को लाभ के पद से बाहर कर सकते हैं।
  • कई राज्यों ने ऐसा किया है, कई ने नहीं।
    • 2016 में दिल्ली सरकार (अरविंद केजरीवाल) ने 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया।
  • दिल्ली में ऐसी कोई विधि नहीं थी, इसलिए उन्हें हटाना पड़ा।
  • संसदीय सचिवों की नियुक्ति पर दो प्रश्न उठते हैं :
    1. लाभ का पद होने का प्रश्न।
    2. मंत्रिपरिषद का आकार – जो लोकसभा/विधानसभा के कुल सदस्यों का 15% से अधिक नहीं हो सकता (91वां संशोधन, 2003)।
  • 2009 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि संसदीय सचिवों की नियुक्ति करना 91वें संशोधन का उल्लंघन है।

दोहरी सदस्यता (अनुच्छेद 101, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951)

  • यदि कोई व्यक्ति दोनों सदनों (लोकसभा व राज्यसभा) के लिए एक साथ निर्वाचित होता है, तो उसे 10 दिन में तय करना होगा कि वह किस सदन की सदस्यता लेगा।
  • यदि तय नहीं करता, तो उसकी राज्यसभा सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
  • यदि किसी सदन का वर्तमान सदस्य दूसरे सदन के लिए निर्वाचित होता है, तो पहले वाले सदन की सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
  • यदि कोई व्यक्ति एक ही सदन में दो अलग-अलग सीटों से चुना जाता है, तो उसे 14 दिन में एक सीट छोड़नी होगी, वरना दोनों सीटें खाली हो जाएँगी।
  • एक व्यक्ति संसद और राज्य विधानमंडल दोनों का सदस्य एक साथ नहीं हो सकता।

अनुपस्थिति (अनुच्छेद 101(4))

  • यदि कोई सदस्य सदन की अनुमति के बिना लगातार 60 दिन तक सदन की बैठकों में अनुपस्थित रहता है, तो उसका स्थान रिक्त घोषित किया जा सकता है।
  • इसमें वे दिन शामिल नहीं होंगे जब सदन स्थगित रहा या सत्रावसान हुआ।
  • यह अधिकार सदन का है, न कि अध्यक्ष/सभापति का।
  • यह प्रावधान निदेशात्मक (Directive) है, अनिवार्य नहीं।
  • उदाहरण :
    • 1956 में लोकसभा ने पहली बार सदस्य को अनुपस्थिति के कारण अयोग्य घोषित किया। (श्री एस.एन. महापात्रा)
    • राज्यसभा में अब तक केवल एक मामला (2000 में बरजिंदर हमदर्द) हुआ है।

दल-बदल से संबंधित अयोग्यता (10वीं अनुसूची, 52वां संशोधन 1985)

  • प्रावधान :
    1. यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है।
    2. यदि वह पार्टी व्हिप के विरुद्ध वोट करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है और 15 दिन में माफ नहीं किया जाता।
    3. यदि कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव के बाद किसी दल में शामिल हो जाता है।
    4. यदि कोई नाम-निर्देशित सदस्य शपथ लेने के 6 माह बाद किसी दल में शामिल होता है।
    5. इन मामलों में दल-बदल माना जाएगा।
      • नोट : अगर किसी सदस्य को उसका दल निष्कासित कर देता है, तो उसकी सदस्यता पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
  • निर्णय कौन करेगा?
    • लोकसभा में – स्पीकर
    • राज्यसभा में – सभापति
    • उनका निर्णय अंतिम नहीं है, न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
  • महत्वपूर्ण केस:
    • किहोता होल्लोहोन बनाम जचील्हू वाद (1992) – SC ने कहा कि स्पीकर/सभापति के निर्णय की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
    • उड़ीसा विधानसभा बनाम उत्कल केशरी परिंदा (2013) – कोई भी व्यक्ति (सदस्य न होते हुए भी) अध्यक्ष को सूचना दे सकता है कि कोई सदस्य अयोग्य हो गया है।
  • 91वाँ संविधान संशोधन, 2003
    • इस संशोधन द्वारा मंत्रिपरिषद के आकार को निश्चित किया गया।
    • 10वीं अनुसूची से यह प्रावधान हटा दिया गया कि किसी दल में 1/3 सदस्यों के टूटने पर वह अयोग्यता से बच जाएगा।
    • अब यह छूट केवल तभी मिलेगी जब 2/3 सदस्य दल-बदल करें।
    • इस संशोधन से एक नया अनुच्छेद 361(B) जोड़ा गया, जिसके तहत दल-बदल के कारण अयोग्य ठहराए गए व्यक्ति किसी भी लाभकारी राजनीतिक नियुक्ति के लिए भी अयोग्य होंगे।
    • हालांकि, संशोधन के बाद भी दल का विलय (Merger) अयोग्यता से बचाव का एक विकल्प बना हुआ है।

अपवाद (दल-बदल अयोग्यता से छूट)

  1. दल का विलय:
    • यदि किसी दल का विलय हो जाए और उसके 2/3 से अधिक सदस्य सहमत हों → अयोग्यता लागू नहीं।
  2. विशेष पदधारी (छूट):
    • लोकसभा अध्यक्ष/उपाध्यक्ष
    • राज्यसभा उपसभापति
    • राज्य विधानसभा अध्यक्ष/उपाध्यक्ष
    • राज्य विधानपरिषद सभापति/उपसभापति
    • ये पदधारी अपने निर्वाचन पर दल छोड़ सकते हैं और पद अवधि में किसी दल से नहीं जुड़ते तो अयोग्य नहीं होंगे।
  3. दल-बदल याचिका:
    • लोकसभा सदस्य → याचिका स्पीकर को।
    • स्पीकर पर मामला → याचिका महासचिव को।

सदस्य का त्यागपत्र

  • लोकसभा का सदस्य – स्पीकर को त्यागपत्र देता है।
  • राज्यसभा का सदस्य – सभापति को त्यागपत्र देता है।
  • राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति/राज्यपाल का पद लेने पर भी सदस्यता समाप्त हो जाती है।

लोकसभा की अवधि [अनुच्छेद 83]

  • लोकसभा, राज्यसभा के विपरीत, एक स्थायी संस्था नहीं है। यह निश्चित अवधि के लिए गठित होती है।
  • सामान्यतः, लोकसभा की अवधि 5 वर्ष होती है, जो आम चुनाव के बाद पहली बैठक से शुरू होती है।
  • निर्धारित अवधि पूर्ण होने के बाद लोकसभा स्वतः विघटित हो जाती है।
  • राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह मंत्रिपरिषद की सलाह पर इसे पाँच वर्षों की अवधि पूरी होने से पहले भी भंग कर सकता है।
  • राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को भंग करने के निर्णय को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में, लोकसभा की अवधि को एक बार में अधिकतम एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
  • आपातकाल की समाप्ति के पश्चात, लोकसभा की अवधि को अधिकतम छह महीने तक ही बढ़ाया जा सकता है।
  • खाली सीट पर 6 माह के भीतर उप-चुनाव होना चाहिए (यदि सदन की अवधि 6 माह से कम नहीं बची है)।

निर्वाचित सदस्यों द्वारा शपथ ग्रहण

  • शपथ की अनिवार्यता
    • संसद के दोनों सदनों (लोकसभा व राज्यसभा) का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले शपथ/प्रतिज्ञान करता है।
    • शपथ संविधान की तीसरी अनुसूची में दिए गए प्रारूप के अनुसार होती है।
  • कौन दिलाता है शपथ?
    • राज्यसभा में → सामान्यतः उपराष्ट्रपति (सभापति) शपथ दिलाते हैं।
    • लोकसभा में → प्रोटेम स्पीकर शपथ दिलाता है।
    • राष्ट्रपति किसी अन्य व्यक्ति को भी शपथ दिलाने हेतु नियुक्त कर सकता है।
  • शपथ/प्रतिज्ञान की विषयवस्तु
    • संविधान के प्रति श्रद्धा और निष्ठा।
    • भारत की प्रभुता और अखण्डता की रक्षा।
    • अपने कर्तव्यों को निष्ठा और शुद्ध अंतःकरण से निभाने की प्रतिज्ञा।
  • शपथ के प्रकार
    • (i) अनुच्छेद 84(A): निर्वाचन में प्रत्याशी बनने के समय, नामांकन पत्र दाखिल करते वक्त, निर्वाचन आयोग द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ/प्रतिज्ञान।
    • (ii) अनुच्छेद 99: निर्वाचित होने के बाद, सदन में स्थान ग्रहण करने से पूर्व, राष्ट्रपति या उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ/प्रतिज्ञान।
    • दोनों प्रकार की शपथ/प्रतिज्ञान का प्रारूप तीसरी अनुसूची में दिया गया है।
  • अनुच्छेद 104 (दण्ड प्रावधान)
    • यदि कोई सदस्य बिना अनुच्छेद 99 के अंतर्गत शपथ/प्रतिज्ञान किए सदन की कार्यवाही में भाग लेता है या मतदान करता है →
      • उस पर 500 रुपये प्रतिदिन का जुर्माना (शास्ति) लगेगा।

लोकसभा के पदाधिकारी

सामायिक अध्यक्ष (Pro Tem Speaker)

  • अर्थ – “प्रोटेम” लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ है – कुछ समय के लिए।
  • नियुक्ति
    • लोकसभा चुनावों के बाद, प्रथम सत्र में राष्ट्रपति लोकसभा के सबसे वरिष्ठ सदस्यों में से एक को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करते हैं।
    • आमतौर पर वह सदस्य चुना जाता है जिसने सर्वाधिक समय तक लोकसभा सदस्य के रूप में कार्य किया हो
    • संसदीय मामलों का मंत्रालय प्रोटेम स्पीकर का चयन करता है।
  • मुख्य कार्य –
    • नवनिर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाना।
    • नये अध्यक्ष (स्पीकर) का चुनाव करवाना।
    • इन कार्यों के बाद उसका पद समाप्त हो जाता है।
  • पहले प्रोटेम स्पीकर –
    • भारत के प्रथम प्रोटेम स्पीकर डॉ सच्चिदानंद सिंह (1946) थे। 
    • पहली लोकसभा (1952): जी.वी. मावलंकर, बी. दास और हुकुम सिंह।
    • 2nd–5th लोकसभा: सेठ गोविन्द दास (4 बार)।
    • 10th–13th लोकसभा: इन्द्रजीत गुप्त (4 बार)।
  • हाल के प्रोटेम स्पीकर –
    • 16वीं लोकसभा (2014): कमलनाथ (छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश)।
    • 17वीं लोकसभा (2019): डॉ. वीरेन्द्र कुमार।
    • 18वीं लोकसभा (2024): भर्तृहरि महताब (कटक, उड़ीसा से भाजपा सांसद)।
  • शपथ –
    • प्रोटेम स्पीकर को राष्ट्रपति राष्ट्रपति भवन में शपथ दिलाता है।
    • यह शपथ केवल लोकसभा सदस्य की होती है, प्रोटेम स्पीकर पद की अलग शपथ नहीं होती।
  • विशेष तथ्य –
    • संविधान में “प्रोटेम स्पीकर” शब्दशः उल्लेखित नहीं है।
    • जब अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों पद रिक्त हों, तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 95(1) के तहत किसी सदस्य को इस कार्य हेतु नियुक्त करता है।
    • नियुक्ति होने के बाद प्रोटेम स्पीकर तब तक पद पर रहता है जब तक स्थायी अध्यक्ष का चयन नहीं हो जाता।
    • संविधान और लोकसभा नियमों के अनुसार प्रोटेम स्पीकर के पास वही सभी शक्तियाँ होती हैं जो अध्यक्ष को प्राप्त होती हैं, परन्तु केवल अस्थायी अवधि तक।
    • राष्ट्रपति प्रोटेम स्पीकर के साथ 3 अन्य सदस्यों को भी नियुक्त करता है।
    • 18वीं लोकसभा में प्रोटेम स्पीकर के रूप में भर्तृहरि महताब को राष्ट्रपति ने शपथ दिलाई।

लोकसभा अध्यक्ष

  • निर्वाचन और पदावधि
    • अनुच्छेद 93 के अनुसार, लोकसभा अपनी पहली बैठक के बाद अपने सदस्यों में से अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चयन करती है।
    • राष्ट्रपति चुनाव की तिथि तय करता है।
    • चयन साधारण बहुमत से होता है।
    • 1952 से मतपत्र द्वारा चुनाव की पद्धति समाप्त कर दी गई और अब खुले मतदान से चयन होता है।
    • अध्यक्ष आमतौर पर लोकसभा के कार्यकाल तक पद पर बना रहता है। यानि वह सदन के जीवनपर्यंत पद धारण करता है।
    • पद समाप्त होने की स्थितियाँ:
      • यदि वह लोकसभा सदस्य नहीं रहता।
      • यदि वह उपाध्यक्ष को लिखित रूप से त्यागपत्र दे।
      • यदि लोकसभा विशेष बहुमत से उसे पद से हटाए (कम से कम 14 दिन पूर्व सूचना आवश्यक)।
    • विशेष तथ्य –
      • भारत में ब्रिटेन जैसी परंपरा “एक बार का अध्यक्ष, सदा के लिए अध्यक्ष” नहीं है।
      • भारत में स्पीकर अपने दल की सदस्यता नहीं छोड़ते, जबकि ब्रिटेन में छोड़नी पड़ती थी (अब वहाँ भी यह परंपरा समाप्त हो गई है)।
      • सोमनाथ चटर्जी (UPA-1 सरकार में स्पीकर) अपवाद थे, जिन्होंने दल की सदस्यता से अलग होकर स्पीकर पद संभाला।
    • संविधान में “चयन” शब्द –
      • संविधान में निम्न पदों के लिए “चयन (Choose)” शब्द प्रयुक्त हुआ है, न कि “निर्वाचन (Election)” –
        • राज्यसभा का उपसभापति – अनुच्छेद 89(2)
        • लोकसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष – अनुच्छेद 93
        • राज्य विधानसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष – अनुच्छेद 178
        • राज्य विधानपरिषद का सभापति और उपसभापति – अनुच्छेद 182
  • शपथ –
    • अध्यक्ष के पद के लिए अलग से शपथ नहीं होती।
    • वह केवल लोकसभा सदस्य के रूप में प्रोटेम स्पीकर के समक्ष शपथ लेता है।
    • इसी प्रकार राज्यसभा उपसभापति, लोकसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष, विधानपरिषद सभापति व उपसभापति को अपने पद की शपथ नहीं लेनी पड़ती।
  • वेतन – लोकसभा अध्यक्ष का वेतन ₹1 लाख प्रति माह है।
  • कार्यकाल –
    • अध्यक्ष का कार्यकाल नई लोकसभा की पहली बैठक तक रहता है।
    • लोकसभा के विघटन होने पर भी अध्यक्ष का पद समाप्त नहीं होता क्योंकि उसे लोकसभा सचिवालय का कार्य देखना होता है।

स्पीकर का पद रिक्त होने की स्थितियाँ

  1. यदि वह सदन का सदस्य नहीं रहता।
  2. त्यागपत्र
    • अनुच्छेद 94 –
      • अध्यक्ष उपाध्यक्ष को संबोधित करके त्यागपत्र दे सकता है।
      • उपाध्यक्ष अध्यक्ष को संबोधित करके त्यागपत्र दे सकता है।
      • यदि उपाध्यक्ष का पद रिक्त हो, तो भी अध्यक्ष का त्यागपत्र उपाध्यक्ष को ही संबोधित होगा (और इसके विपरीत)।
  3. त्यागपत्र की सूचना –
    • अध्यक्ष के त्यागपत्र की सूचना लोकसभा को उपाध्यक्ष देता है।
    • यदि उपाध्यक्ष का पद रिक्त हो, तो त्यागपत्र महासचिव को जाता है और वही लोकसभा को इसकी सूचना देता है।
  4. हटाने का संकल्प
    • लोकसभा अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को हटाने के लिए संकल्प लोकसभा के नियम 200 के तहत लाया जा सकता है।
    • उसे लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित  संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है (सामान्य बहुमत द्वारा नहीं)।
      • इसके लिए 14 दिन की पूर्व सूचना आवश्यक है। 
    • इस प्रक्रिया पर विचार करने या चर्चा के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन जरूरी है।
    • अनुच्छेद 96 के अनुसार, यदि स्पीकर को हटाने का संकल्प विचाराधीन हो तो –
      • वह पीठासीन नहीं होगा।
      • लेकिन वह बैठक में भाग ले सकता है, बोल सकता है और वोट दे सकता है।
      • मत बराबर होने की दशा में उसे निर्णायक मत (Casting Vote) देने का अधिकार नहीं होगा।
  • विघटन के बाद भी पद पर बने रहना
    • लोकसभा के विघटन के बाद भी अध्यक्ष तब तक पद पर बना रहता है जब तक नई लोकसभा का गठन न हो जाए।
  • वरीयता सूची में स्थान : भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ सातवें स्थान पर रखा गया है। यानी वह प्रधानमंत्री या उप-प्रधानमंत्री को छोड़कर सभी कैबिनेट मंत्रियों से ऊपर है।

अध्यक्ष की भूमिका, शक्तियाँ और कार्य

मुख्य भूमिका

  1. अध्यक्ष, लोकसभा और उसके सभी सदस्यों का मुखिया होता है।
  2. वह सदस्यों के विशेषाधिकारों का संरक्षक और लोकसभा का प्रवक्ता होता है।
  3. सभी संसदीय मामलों में उसका निर्णय अंतिम होता है।
  4. वह केवल पीठासीन अधिकारी नहीं, बल्कि सदन में सम्मान, प्रतिष्ठा और सर्वोच्च अधिकार का अधिकारी होता है।

शक्तियों और कर्तव्यों के स्रोत अध्यक्ष को अधिकार व कर्तव्य प्राप्त होते हैं:

  1. भारतीय संविधान से
  2. लोकसभा की प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमों से
  3. संसदीय परंपराओं से

प्रमुख शक्तियाँ व कर्तव्य

  • सदन की कार्यवाही चलाना – नियमों का पालन कराना, निर्णय अंतिम होता है।
  • नियमों का व्याख्या करना – संविधान, प्रक्रिया नियम और परंपराओं का अंतिम व्याख्याकार।
  • धन विधेयक (Money Bill) का निर्णय – कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय केवल स्पीकर करता है।[अनुच्छेद 110(3)]
  • दल-बदल मामलों का निर्णय – अध्यक्ष लोकसभा के किसी सदस्य की निरर्हता के प्रश्न का निपटारा करता है । दसवीं अनुसूची के तहत। 1992 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस संबंध में अध्यक्ष के निर्णय को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
  • संयुक्त बैठक की अध्यक्षता – साधारण विधेयक पर विवाद की स्थिति में राष्ट्रपति द्वारा बुलाई गई संयुक्त बैठक की अध्यक्षता केवल लोकसभा स्पीकर करता है।[अनुच्छेद 118(4)]
  • सदन स्थगित/निलंबित करने की शक्ति –
    • कोरम के अभाव में।
      • कोरम = कुल सदस्यों का 1/10 भाग।
    • या गंभीर अव्यवस्था की स्थिति में।
  • त्यागपत्र स्वीकारना – लोकसभा सदस्यों के त्यागपत्र स्पीकर ही स्वीकार या अस्वीकार करता है।
  • निर्णायक मत का प्रयोग – केवल मतों की समानता की स्थिति में।
  • गुप्त बैठक बुलाना – आवश्यकता पड़ने पर।
  • भारतीय संसदीय समूह के पदेन अध्यक्ष – भारत व विश्व की संसदों के बीच संपर्क हेतु।
  • संसदीय समितियाँ –
    • सभी संसदीय समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति स्पीकर करता है।
    • वह स्वयं कार्य मंत्रणा समिति, नियम समिति और सामान्य प्रयोजन समिति का अध्यक्ष होता है।
    • सभी संसदीय समितियों पर स्पीकर का सर्वोच्च नियंत्रण होता है।
    • उसके कार्यों व आचरण की लोकसभा में न तो चर्चा की जा सकती और न ही आलोचना (स्वतंत्र या मौलिक प्रस्ताव को छोड़कर) ।
  • सचिवालय का प्रमुख –
    • स्पीकर लोकसभा सचिवालय का राजनीतिक प्रमुख होता है।
    • सचिवालय उसके नियंत्रण और निर्देशों के अंतर्गत कार्य करता है।
  • सदन की प्रक्रिया और व्यवस्था –
    • सदन की कार्यवाही विनियमित करने और व्यवस्था बनाए रखने में स्पीकर का आचरण न्यायालय की अधिकारिता के अधीन नहीं होता।  (अनुच्छेद 182)
  • महासचिव की नियुक्ति – लोकसभा के महासचिव की नियुक्ति स्पीकर करता है।

लोकसभा अध्यक्षों की सूची

लोकसभाअध्यक्ष का नामकार्यकालविशेष टिप्पणीपार्टी 
पहलीगणेश वासुदेव मावलंकर15 मई 1952 – फरवरी 1956पद पर रहते हुए निधनभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
एम. ए. आयंगरमार्च 1956 – अप्रैल 1962भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
दूसरीएम. ए. आयंगरमार्च 1956 – अप्रैल 1962दो बार लोकसभा अध्यक्ष बने।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
तीसरीहुकुम सिंहअप्रैल 1962 – मार्च 1967भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
चौथीनीलम संजीव रेड्डीमार्च 1967 – जुलाई 1969भारत के पहले राष्ट्रपति थे जो निर्विरोध चुने गएराष्ट्रपति चुनाव के लिए लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया थाभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
डॉ. गुरदयाल सिंह ढिल्लोअगस्त 1969 – दिसम्बर 1975भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
पांचवींडॉ. गुरदयाल सिंह ढिल्लोअगस्त 1969 – दिसम्बर 1975दो बार लोकसभा अध्यक्ष बने, फिर पद से इस्तीफा दे दिया।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
बलीराम भगतजनवरी 1976 – मार्च 1977भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
छठीनीलम संजीव रेड्डीमार्च 1977 – जुलाई 1977त्यागपत्रजनता पार्टी
के. डी. हेगड़ेजुलाई 1977 – दिसम्बर 1980एकमात्र ऐसे लोकसभा अध्यक्ष हैं जो सुप्रीम कोर्ट के जज भी रहे जनता पार्टी
सातवींडॉ. बलराम जाखड़जनवरी 1980 – दिसम्बर 1989सबसे लंबे समय तक अध्यक्षभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
आठवींडॉ. बलराम जाखड़जनवरी 1980 – दिसम्बर 1989भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
नौवींरवि रायदिसम्बर 1989 – दिसम्बर 1991जनता दल (राष्ट्रीय मोर्चा)
दसवींशिवराज वी. पाटिलजुलाई 1991 – मई 1996भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
ग्यारहवींपी. ए. संगमामई 1996 – मार्च 1998पूर्वोत्तर से पहले अध्यक्ष।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
बारहवींजी. एम. सी. बालयोगीमार्च 1998 – मार्च 2002राजग (तेलुगु देशम पार्टी)
तेरहवींजी. एम. सी. बालयोगीमार्च 1998 – मार्च 2002पहले दलित अध्यक्ष, कार्यकाल के बीच में ही उनकी मृत्यु हो गई, दो बार लोकसभा अध्यक्ष बने।राजग (तेलुगु देशम पार्टी)
मनोहर जोशीमई 2002 – जून 2004राजग (शिवसेना)
चौदहवींसोमनाथ चटर्जीजून 2004 – मई 2009यू.पी.ए. (सी.पी.आई.एम.)
पंद्रहवींमीरा कुमारमई 2009 – जून 2014लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष।यू.पी.ए. (कांग्रेस)
सोलहवींसुमित्रा महाजनजून 2014 – जून 2019दूसरी महिलाराजग (भा.ज.पा.)
सत्रहवीं ओम बिड़ला 19 जून 2019 – 24 जून 2024पुनः: 26 जून 2024 – वर्तमान तकराजग (भा.ज.पा.)
अठारहवीं ओम बिड़ला19 जून 2019 – 24 जून 2024पुनः: 26 जून 2024 – वर्तमान तक राजग (भा.ज.पा.)

लोकसभा अध्यक्षों से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

  • लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर और प्रथम उपाध्यक्ष एम.ए. आयंगर थे।
    • 1946 में जी.वी. मावलंकर संविधान सभा (विधायी) के प्रेसिडेंट चुने गए।
    • वे ही बाद में अंतरिम संसद के भी प्रेसिडेंट रहे।
    • गठित लोकसभा के पहले स्पीकर : जी.वी. मावलंकर
    • पहले डेप्यूटी स्पीकर : एम. अनंतशयम आयंगर
  • मीरा कुमार लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।
    • दूसरी महिला अध्यक्ष सुमित्रा महाजन बनीं।
  • नीलम संजीव रेड्डी दो बार लोकसभा अध्यक्ष रहे।
    • दूसरी बार स्पीकर पद छोड़कर भारत के राष्ट्रपति बने।
  • जी.वी. मावलंकर, एम.ए. आयंगर, हुकुम सिंह और नीलम संजीव रेड्डी – ये चारों पूर्व में संविधान सभा के सदस्य भी थे।
  • पी.ए. संगमा लोकसभा के पहले अध्यक्ष थे जो अनुसूचित जनजाति (ST) से थे।
  • जी.एम.सी. बालयोगी पहले अध्यक्ष थे जो अनुसूचित जाति (SC) से थे।
  • लोकसभा अध्यक्ष को हटाने का प्रथम प्रस्ताव (संकल्प) जी.वी. मावलंकर के विरुद्ध आया था।
  • जी.वी. मावलंकर अंतरिम संसद (1947–1952) के भी अध्यक्ष थे।
    • वे ही लोकसभा के पहले प्रोटेम स्पीकर और पहले स्थायी अध्यक्ष बने।
    • मावलंकर और जी.एम.सी. बालयोगी – ये दो ऐसे अध्यक्ष हैं जिनका पद पर रहते हुए निधन हुआ।
  • वर्तमान (2024) स्पीकर ओम बिरला हैं।
    • वे कोटा (राजस्थान) से लोकसभा सांसद हैं।
    • 2003 से 2014 तक कोटा दक्षिण से विधायक रहे।
    • 2014 से लगातार तीसरी बार लोकसभा सदस्य चुने गए।
  • के.एस. हेगड़े एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो सुप्रीम कोर्ट के जज भी रहे और बाद में लोकसभा अध्यक्ष भी बने।
  • बलराम जाखड़ सबसे लंबे समय (1980–1989) तक लोकसभा अध्यक्ष रहे।
  • सरदार हुकुम सिंह और बलीराम भगत – दोनों बाद में राजस्थान के राज्यपाल बने।
  • अब तक केवल 6 अध्यक्ष दो बार लोकसभा अध्यक्ष बने हैं –
    1. एम.ए. आयंगर
    2. डॉ. गुरदयाल ढिल्लो
    3. डॉ. नीलम संजीव रेड्डी
    4. डॉ. बलराम जाखड़
    5. जी.एम.सी. बालयोगी
    6. ओम बिरला
  • हालांकि, अब तक कोई भी लोकसभा अध्यक्ष 10 वर्ष का पूरा कार्यकाल नहीं कर पाया है।
  • स्पीकर पद छोड़ने के बाद किसी भी दल का सदस्य बन सकता है ।
  • अध्यक्ष, लोकसभा का प्रमुख और पीठासीन अधिकारी होता है।
  • भारत के वरीयता क्रम (Warrant of Precedence) में अध्यक्ष को उच्च स्थान प्राप्त है।
  • प्रोटोकॉल के अनुसार, अध्यक्ष को भारत के मुख्य न्यायाधीश के समकक्ष छठा स्थान प्राप्त है।

लोकसभा उपाध्यक्ष

  • संवैधानिक प्रावधान
    • अनुच्छेद 93 में लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) व उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) के चयन का प्रावधान है।
    • उपाध्यक्ष का पद भी संवैधानिक पद है।
  • चयन और कार्यकाल
    • उपाध्यक्ष का चुनाव लोकसभा के सदस्य, अपने में से ही, साधारण बहुमत से करते हैं।
    • अध्यक्ष चुने जाने के बाद ही उपाध्यक्ष का चुनाव होता है।
    • उपाध्यक्ष के चुनाव की तिथि अध्यक्ष निर्धारित करता है।
    • अध्यक्ष, अगली लोकसभा के गठन तक पद पर बना रहता है; पर उपाध्यक्ष केवल उस लोकसभा के विघटन तक ही पद पर रहता है।
    • वह तब तक पद पर बना रहता है जब तक:
      • वह लोकसभा का सदस्य है,
      • अध्यक्ष को त्यागपत्र देता है, या
      • उसे लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित  संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है (सामान्य बहुमत द्वारा नहीं)। (14 दिन पूर्व सूचना आवश्यक)।
  • कार्य और शक्तियाँ
    • अध्यक्ष की अनुपस्थिति या पद रिक्त होने पर अध्यक्ष के कर्तव्यों का निर्वहन करता है।
    • उपाध्यक्ष, अध्यक्ष के अधीनस्थ नहीं होता है। वह प्रत्यक्ष रूप से सदन के प्रति उत्तरदायी होता है।
    • संसद की संयुक्त बैठक में अध्यक्ष की अनुपस्थिति में अध्यक्षता करता है।
    • अध्यक्ष के अधीन नहीं होता, सीधे संसद के प्रति उत्तरदायी होता है।
    • जब पीठासीन होता है, तब केवल बराबरी की स्थिति में निर्णायक मत देता है।
    • संसदीय समिति का सदस्य बनाए जाने पर स्वतः अध्यक्ष बनता है।
    • उपाध्यक्ष के हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान वह पीठासीन नहीं रह सकता, परन्तु सदन में उपस्थित रह सकता है।
    • अध्यक्ष की उपस्थिति में वह सामान्य सदस्य की तरह होता है — बोलने, भाग लेने और मतदान का अधिकार होता है।
  • वेतन और परंपरा
    • अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के वेतन-भत्ते संसद द्वारा तय किए जाते हैं।
    • यह खर्च भारत की संचित निधि पर भारित होता है।
    • 11वीं लोकसभा से परंपरा: अध्यक्ष सत्ताधारी दल से, उपाध्यक्ष विपक्ष से।
  • त्यागपत्र व हटाना
    • उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को संबोधित करता है।
    • हटाने की प्रक्रिया स्पीकर जैसी ही है।
    • यदि उपाध्यक्ष पीठासीन है तो केवल निर्णायक मत (Casting Vote) दे सकता है।
    • परंतु यदि उसके हटाने का संकल्प विचाराधीन है तो वह न तो पीठासीन होगा, न कास्टिंग वोट देगा।
  • राजनीतिक परंपरा
    • 10वीं लोकसभा तक अध्यक्ष व उपाध्यक्ष प्रायः सत्ताधारी दल से होते थे।
    • 11वीं लोकसभा (1996-98) से परंपरा बनी कि अध्यक्ष सत्ताधारी दल से और उपाध्यक्ष विपक्षी दल से होगा।
    • लोकसभा नियम उपाध्यक्ष के पद को भरने की कोई समय-सीमा नहीं तय करते।
  • हालिया स्थिति
    • अंतिम बार 16वीं लोकसभा (2014-19) में एम. तंबीदुरै (AIADMK) उपाध्यक्ष थे।
    • 17वीं लोकसभा (2019-24) और वर्तमान 18वीं लोकसभा (2024-) में यह पद रिक्त है।
इतिहास और विकास
  • 1921: भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत अध्यक्ष (President) और उपाध्यक्ष (Deputy President) के पद अस्तित्व में आए।
  • गवर्नर जनरल पहले पीठासीन अधिकारी होते थे।
  • फ्रेड्रिक व्हाइट: पहले अध्यक्ष (नामित)
  • सच्चिदानंद सिन्हा: पहले उपाध्यक्ष (नामित)
  • 1925: विट्ठलभाई पटेल – पहले निर्वाचित भारतीय अध्यक्ष।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1935 में पदनाम ‘अध्यक्ष’ और ‘उपाध्यक्ष’ किया गया, लेकिन पूर्णतः 1947 के बाद लागू हुआ।
  • 1946 की संविधान सभा (जो अंतरिम संसद का कार्य करती थी) के अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर और उपाध्यक्ष अनंत शयनाम आयंगर थे।
  • जी.वी. मावलंकर – स्वतंत्र भारत के पहले लोकसभा अध्यक्ष।
  • अनंत सयानाम आयंगर – पहले उपाध्यक्ष।

लोकसभा सभापति तालिका (Panel of Chairpersons)

  • अध्यक्ष, लोकसभा के 10 सदस्यों को इस सभापति तालिका में नामांकित करता है।
  • अध्यक्ष या उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में इनमें से कोई एक बैठक की अध्यक्षता कर सकता है।
  • पीठासीन होने पर उसे अध्यक्ष जैसी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
  • नई तालिका बनने तक सदस्य पद पर बना रहता है।
  • यदि तालिका सदस्य अनुपस्थित हो, तो लोकसभा किसी अन्य को अध्यक्ष नियुक्त कर सकती है।

नोट: जब अध्यक्ष/उपाध्यक्ष का पद रिक्त हो, तो तालिका सदस्य अध्यक्षता नहीं कर सकता। उस स्थिति में राष्ट्रपति किसी सदस्य को अस्थायी अध्यक्ष नियुक्त करता है।

लोकसभा सचिवालय व महासचिव

  • संवैधानिक आधार
    • अनुच्छेद 98 के अनुसार लोकसभा व राज्यसभा के अलग-अलग सचिवालय होंगे।
    • महासचिव इन सचिवालयों का प्रमुख होता है।
  • नियुक्ति व दर्जा
    • लोकसभा अध्यक्ष, महासचिव की नियुक्ति करता है।
    • आमतौर पर IAS अधिकारी होते हैं।
    • दर्जा, कैबिनेट सचिव के समकक्ष होता है।
  • कार्य व विशेषताएँ
    • सदन से संबंधित संपूर्ण रिकॉर्ड व्यवस्थित रखना।
    • सचिवालय स्टाफ की भर्ती व सेवा शर्तों का निर्धारण संसद करती है।
    • यह स्थायी पद है, पर संवैधानिक पद नहीं है।
  • विशेष तथ्य
    • संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप भी लोकसभा के महासचिव रह चुके हैं।
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