भारतीय संसद की महत्वपूर्ण विधिक शब्दावली

भारतीय संसद की महत्वपूर्ण विधिक शब्दावली संसद की कार्यप्रणाली और विधायी प्रक्रिया को समझने के लिए आवश्यक तकनीकी एवं संवैधानिक शब्दों का समुच्चय है। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय के अंतर्गत यह विषय संसद में प्रयुक्त प्रमुख विधिक शब्दों, उनके अर्थ तथा महत्व को स्पष्ट करता है। इससे विधायी कार्यवाही की बेहतर समझ विकसित होती है।

कंगारू समाप्ति व कंगारू कटौती
  • जब किसी विधेयक की बारीकी से जाँच न होकर केवल मुख्य प्रावधानों पर चर्चा करके मतदान कराया जाए, तो इसे कंगारू समाप्ति कहते हैं।
  • इसे ही कंगारू कटौती प्रस्ताव भी कहा जाता है।
  • शेष खण्डों को बिना चर्चा के ही पारित मान लिया जाता है।
गिलोटिन
  • जब किसी विधेयक, प्रस्ताव या संकल्प पर बिना चर्चा के ही मतदान हो जाए → इसे गिलोटिन कहते हैं।
  • यह मुख्यतः अनुदान मांगों से संबंधित है।
  • अंतिम दिन कई मांगों पर चर्चा नहीं हो पाती → उन्हें भी मतदान के लिए रख दिया जाता है।
  • अधिकतर मांगें बिना चर्चा के पास हो जाएँ → यही गिलोटिन कहलाता है।
कास्टिंग वोट (Casting Vote)
  • संसद में पीठासीन अधिकारी केवल तब मतदान करता है जब पक्ष व विपक्ष के वोट बराबर हो जाएँ।
  • यही उसका निर्णायक मत (Casting Vote) है।
त्रिशंकु संसद (Hung Parliament)
  • जब आम चुनाव के बाद किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिले।
पंगु सत्र (Lame Duck Session)
  • नई लोकसभा के गठन से पहले वर्तमान लोकसभा का अंतिम सत्र।
  • जिन सदस्यों का पुनः निर्वाचन नहीं हुआ उन्हें “लेम डक” (लंगड़ी बतख) कहा जाता है।
  • लंगड़ी बत्तखों का सम्मेलन
    • जब चुनाव हो चुके हों और परिणाम घोषित हो चुका हो लेकिन नई लोकसभा का गठन न हुआ हो, इस बीच पुरानी लोकसभा का सत्र हो → इसे पंगु सत्र/लेमडक सेशन कहते हैं।
  • भारत में लेमडक सेशन
    • केवल दो बार (1957 व 1962) हुआ।
    • उद्देश्य – लेखानुदान पारित करना ताकि नई लोकसभा के गठन तक सरकार काम चला सके।
    • तीसरी लोकसभा और बाद में कभी लंगड़ी बत्तख सम्मेलन नहीं हुआ।
फ्लोर क्रॉसिंग (पक्ष-त्याग)
  • जब कोई सदस्य अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी के हित में कार्य करे या उसकी सदस्यता ले।
गतिरोध (Deadlock)
  • जब किसी विधेयक पर दोनों सदनों को समान अधिकार हो और सहमति न बने।
सचेतक (Whip)
  • प्रत्येक राजनीतिक दल द्वारा नियुक्त पदाधिकारी।
  • सदन में अपने दल के सदस्यों के आचरण और मतदान पर नियंत्रण रखता है।
छाया मंत्रिमंडल (Shadow Cabinet)
  • ब्रिटिश संसदीय परंपरा।
  • विपक्षी दल का भावी या वैकल्पिक मंत्रिमंडल।
गणपूर्ति (Quorum)
  • सदन की बैठक हेतु आवश्यक न्यूनतम सदस्य संख्या।
  • गणपूर्ति न होने पर पीठासीन अधिकारी बैठक निलंबित/स्थगित कर देता है।
गैरीमैण्डरिंग (Gerrymandering)
  • अमेरिका में प्रचलित व्यवस्था।
  • सत्ताधारी दल चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन इस प्रकार करता है कि उसे चुनावी लाभ मिले।
अल्पमत सरकार (Minority Government)
  • ऐसी सरकार जिसके पास पर्याप्त बहुमत न हो।
अंतरिम सरकार (Interim Government)
  • संक्रमणकालीन सरकार।
  • भारत में 15 अगस्त 1947 से अप्रैल 1952 तक की सरकार।
कार्यवाहक सरकार (Caretaker Government)
  • जब सरकार विश्वास मत प्राप्त न कर पाए और चुनाव तक कार्य करे।
  • यह केवल सामान्य कार्य करती है, नीतिगत फैसले नहीं ले सकती।
विश्रांति काल व स्थगन
  • विश्रांति काल (Recess) – दो सत्रों के बीच की अवधि।
  • स्थगन (Adjournment) – एक ही सत्र की दो बैठकों के बीच की अवधि।
संयुक्त बैठक”, “संयुक्त अधिवेशन”, “संयुक्त सत्र”, और “समवेत बैठक

संयुक्त सत्र (Joint Session)

  • संविधान में “संयुक्त सत्र” (Joint Session) शब्द का उल्लेख नहीं।

संयुक्त अधिवेशन (Joint Meeting)

  • मूल संविधान के अनुच्छेद 66 में उपराष्ट्रपति चुनाव हेतु प्रावधान था।
  • 11वाँ संशोधन (1961) द्वारा इसे हटा दिया गया।

संयुक्त बैठक (Joint Sitting)

  • अनुच्छेद 108 के तहत दोनों सदनों की संयुक्त बैठक।

एक साथ समवेत (Assembled Together)

  • अनुच्छेद 87(1) के अनुसार, राष्ट्रपति आम चुनाव के बाद और प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र की शुरुआत में दोनों सदनों को संबोधित करता है।
सांसद निधि (MP LADS)
  • शुरुआत – 1992-93।
  • कोई सांसद प्रति वर्ष 5 करोड़ रुपये विकास कार्य हेतु खर्च कर सकता है।
  • धनराशि → जिलाधीश (DM) के माध्यम से खर्च।
  • लोकसभा सदस्य → अपने निर्वाचन क्षेत्र में।
  • राज्यसभा सदस्य → अपने राज्य में।
  • मनोनीत सदस्य → पूरे भारत में कहीं भी।
  • देखरेख – भारत सरकार का सांख्यिकी व क्रियान्वयन मंत्रालय।
  • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने इसे समाप्त करने की सिफारिश की थी।

बहुमत के प्रकार

सामान्य बहुमत (Simple Majority / Functional / Working Majority)

  • उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या का आधे से एक अधिक।
  • उपयोग:
    • धन विधेयक, वित्त विधेयक और बजट पारित करना।
    • कटौती प्रस्ताव और कार्य स्थगन प्रस्ताव।
    • अनुच्छेद 3: राज्यों के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन।
    • विश्वास प्रस्ताव व अविश्वास प्रस्ताव।
    • उपराष्ट्रपति को हटाने हेतु लोकसभा का बहुमत।
    • राष्ट्रपति शासन (अनु. 356) व वित्तीय आपातकाल (अनु. 360) का अनुमोदन।
    • लोकसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव।
    • अनुच्छेद 368 के तहत ऐसे संविधान संशोधन, जिन्हें राज्यों को नहीं भेजा जाता।
    • अनुच्छेद 169: विधान परिषद का निर्माण व समाप्ति।

प्रभावी बहुमत (Effective Majority)

  • सदन की वास्तविक सदस्य संख्या का आधे से एक अधिक (रिक्तियों को घटाने के बाद)।
  • उपयोग:
    • राज्यसभा द्वारा उपराष्ट्रपति को हटाना (अनु. 67(ब))।
    • लोकसभा द्वारा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष को हटाना।

पूर्ण बहुमत / आत्याधिक बहुमत (Absolute Majority)

  • सदन की कुल सदस्य संख्या का आधे से एक अधिक
  • उपयोग:
    • आम चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत।

विशेष बहुमत (Special Majority)

  • विशेष बहुमत के चार प्रकार होते हैं:
    1. अनुच्छेद 249 और अनुच्छेद 312 के तहत
      • उपस्थित और मतदान करने वालों का दो-तिहाई (⅔) बहुमत।
      • उपयोग:
        • अनुच्छेद 249: राज्यसभा द्वारा राज्य सूची के विषय को राष्ट्रीय महत्व का घोषित करना।
        • अनुच्छेद 312: राज्यसभा द्वारा किसी सेवा को अखिल भारतीय सेवा घोषित करने का प्रस्ताव।
    2. अनुच्छेद 368 – संविधान संशोधन
      • सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत।
      • उपस्थित और मतदान करने वालों का दो-तिहाई (⅔) बहुमत।
        • दोनों शर्तें पूरी होना आवश्यक।
      • उपयोग:
        • मूल अधिकारों व राज्य नीति निदेशक तत्त्वों में परिवर्तन।
        • अनु. 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन।
        • अनु. 169: विधान परिषद का निर्माण व समाप्ति।
        • अनु. 352: राष्ट्रीय आपातकाल का अनुमोदन।
        • अनु. 148: CAG को हटाना।
        • अनु. 124(5): सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाना।
        • अनु. 217(1): उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाना।
    3. अनुच्छेद 368 – दूसरा प्रकार का संशोधन
      • सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत।
      • उपस्थित और मतदान करने वालों का दो-तिहाई (⅔) बहुमत।
      • आधे राज्यों की विधानसभाओं का साधारण बहुमत से अनुसमर्थन (Ratification)।
        • विधानसभा संविधान संशोधन के अनुसमर्थन हेतु संकल्प पारित कर सकती है।
        • विधानसभा संकल्प अस्वीकार कर सकती है
        • ऐसे संकल्प में कोई संशोधन प्रस्तावित नहीं किया जा सकता
      • उपयोग
        • अनु. 54: राष्ट्रपति का निर्वाचन मंडल।
        • अनु. 55: राष्ट्रपति की निर्वाचन प्रणाली।
        • संघ व राज्यों की कार्यपालिका शक्तियों का विस्तार।
        • सातवीं अनुसूची की सूचियों में विषय परिवर्तन।
        • अनु. 245–255: संघ-राज्य के मध्य विधायी संबंध।
        • भाग V (अनु. 124–147): सर्वोच्च न्यायालय संबंधी प्रावधान।
        • भाग VI (अनु. 214–231): उच्च न्यायालय संबंधी प्रावधान।
        • अनु. 241: केंद्रशासित प्रदेशों के उच्च न्यायालय।
        • अनु. 279(A): GST परिषद।
        • संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व।
        • स्वयं अनुच्छेद 368 में संशोधन।
    4. अनुच्छेद 61 – राष्ट्रपति पर महाभियोग
      • शर्त: लोकसभा और राज्यसभा की कुल सदस्य संख्या का दो-तिहाई (⅔) बहुमत।
      • उपयोग:
        • राष्ट्रपति पर महाभियोग।
        • न्यायाधीशों को हटाना (कुल सदस्य बहुमत + उपस्थित व मतदान करने वालों का ⅔)।
        • उपराष्ट्रपति को हटाना: राज्यसभा की तात्कालिक सदस्य संख्या का बहुमत + लोकसभा की सहमति।
        • अनु. 249 और 312: राज्यसभा द्वारा ⅔ बहुमत से प्रस्ताव।
        • अनु. 108: संयुक्त बैठक में उपस्थित और मतदान करने वालों का बहुमत।

भारत सरकार का वरीयता अनुक्रम

भारत सरकार का वरीयता अनुक्रम जो कि 26 मई, 1979 को जारी किया गया और इसमें समय समय पर संशोधन किए जाते रहते हैं। वर्तमान में यह तालिका इस प्रकार है

क्रम संख्यापदनाम
1राष्ट्रपति ।
2उपराष्ट्रपति ।
3प्रधानमंत्री।
4अपने-अपने राज्यों में राज्यपाल।
भूतपूर्व राष्ट्रपति ।
5क उप प्रधानमंत्री।
6भारत के मुख्य न्यायाधीश, तथा लोकसभा के अध्यक्ष।
7कैबिनेट मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री अपने-अपने राज्यों में, नीति आयोग उपाध्यक्ष, भूतपूर्व प्रधानमंत्री, राज्यसभा और लोकसभा में विपक्ष के नेता।
7कभारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति ।
8भारत में स्थित दूसरे राष्ट्रों के असाधारण और पूर्ण अधिकार प्राप्त राजदूत और राष्ट्रमंडल देशों के उच्चायुक्त, राज्यों के मुख्यमंत्री अपने अपने राज्य से बाहर, राज्यों के राज्यपाल अपने-अपने राज्यों से बाहर।
9उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश।
9कसंघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, मुख्य चुनाव आयुक्त, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ।
10राज्यसभा के उपसभापति, राज्यों के उप मुख्यमंत्री, लोकसभा उपाध्यक्ष, नीति आयोग के सदस्य, केंद्र की मंत्री परिषद में राज्य मंत्री (और रक्षा मंत्रालय में रक्षा मामलों के लिए अन्य मंत्री)।
11भारत का महान्यायवादी, मंत्रिमंडलीय सचिव या कैबिनेट सचिव, उपराज्यपाल अपने-अपने केंद्र शासित प्रदेशों में।
12जनरल या समान रैंक वाले सेना अध्यक्ष।
13भारत स्थित विदेशों के असाधारण दूत और पूर्ण अधिकार प्राप्त मंत्री।

भारतीय संसद की बहुक्रियात्मक भूमिका

भारतीय संविधान के अनुसार संसद देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है, जिसकी भूमिका बहुपक्षीय है। इसे विभिन्न कार्यों और शक्तियों के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

विधायी शक्तियाँ एवं कार्य

  • संसद का प्रमुख कार्य कानून बनाना है।
  • इसे संघ सूची (वर्तमान में 99 विषय), समवर्ती सूची (वर्तमान में 52 विषय), और अवशिष्ट विषयों पर विधि निर्माण का अधिकार है।
  • विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची (वर्तमान में 61 विषय) पर भी संसद कानून बना सकती है:
    1. राज्यसभा का संकल्प
    2. राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति
    3. दो या अधिक राज्यों का संयुक्त अनुरोध
    4. अंतर्राष्ट्रीय संधियों को लागू करने हेतु
    5. राष्ट्रपति शासन लागू होने पर
  • राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेशों को संसद की 6 सप्ताह के भीतर स्वीकृति अनिवार्य होती है।
  • संसद, प्रत्यायोजित विधान (डेलीगेटेड लेजिस्लेशन) की अनुमति देती है, जिसके तहत कार्यपालिका नियम बनाती है। इन नियमों को संसद की निगरानी में प्रस्तुत किया जाता है।

कार्यकारी शक्तियाँ एवं कार्य

  • कार्यपालिका, संसद विशेषकर लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
  • संसद कार्यपालिका पर निम्नलिखित संसदीय उपकरणों द्वारा नियंत्रण रखती है:
    • प्रश्नकाल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव
    • अल्पावधि चर्चा, स्थगन प्रस्ताव, निन्दा प्रस्ताव अविश्वास प्रस्ताव इत्यादि
  • संसद की समितियाँ जैसे:
    • सरकारी आश्वासन समिति
    • अधीनस्थ विधान समिति
    • याचिका समिति आदि कार्यपालिका की निगरानी करती हैं।
  • मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
  • लोकसभा, सरकार के प्रति विश्वास की कमी इन माध्यमों से व्यक्त कर सकती है:
    • राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव अस्वीकार कर
    • धन विधेयक अस्वीकार कर
    • स्थगन या निन्दा प्रस्ताव पारित कर
    • महत्वपूर्ण विषय पर पराजय द्वारा
    • कटौती प्रस्ताव द्वारा

वित्तीय शक्तियाँ एवं कार्य

  • संसद की अनुमति के बिना:
    • कोई कर नहीं लगाया जा सकता,
    • कोई राशि व्यय नहीं की जा सकती।
  • सरकार का बजट संसद में प्रस्तुत किया जाता है जो आगामी वर्ष की आय-व्यय की अनुमति देता है।
  • वित्तीय नियंत्रण के दो प्रमुख रूप:
    • बजटीय नियंत्रण: अनुदान मांगों पर चर्चा द्वारा
    • उत्तर-बजटीय नियंत्रण: तीन वित्तीय समितियों के माध्यम से
      • लोक लेखा समिति
      • प्राक्कलन समिति
      • सार्वजनिक उपक्रम समिति
  • छास सिद्धांत: वर्षांत तक अनव्ययित धन संचित निधि में लौट जाता है।
  • मार्च रश: वित्त वर्ष के अंत में खर्चों की हड़बड़ी

सांविधानिक शक्तियाँ एवं कार्य

  • संसद को संविधान संशोधन की शक्ति प्राप्त है:
  • तीन प्रकार से संशोधन संभव हैं:
    • साधारण बहुमत से
    • विशेष बहुमत से
    • विशेष बहुमत + आधे राज्यों की सहमति से
  • कुछ संशोधन जैसे राज्यों की विधान परिषद का गठन/समापन राज्यों की पहल पर संसद करती है।
  • संसद की संशोधन शक्ति “मूल संरचना सिद्धांत” से सीमित है (केशवानंद भारती केस, 1973; मिनर्वा मिल केस, 1980)।

न्यायिक शक्तियाँ एवं कार्य

  • संसद न्यायिक स्वरूप में निम्नलिखित कार्य करती है:
    • राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा हटाना
    • उपराष्ट्रपति को संकल्प द्वारा पद से हटाना
    • उच्चतम/उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, मुख्य चुनाव आयुक्त एवं नियंत्रक-महालेखा परीक्षक को हटाने की अनुशंसा करना
    • सदस्यों/बाहरी व्यक्तियों को अवमानना या विशेषाधिकार उल्लंघन पर दंडित करना

निर्वाचक शक्तियाँ एवं कार्य

  • संसद निम्नलिखित पदों का निर्वाचन करती है:
    • राष्ट्रपति (राज्य विधानसभाओं के साथ मिलकर)
    • उपराष्ट्रपति (संसद के दोनों सदनों द्वारा)
    • लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष (लोकसभा द्वारा)
    • राज्यसभा उपसभापति (राज्यसभा द्वारा)
  • संसद निर्वाचन से संबंधित कानून बनाती/संशोधित करती है:
    • राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव अधिनियम, 1952
    • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 एवं 1951

अन्य शक्तियाँ एवं कार्य

  • संसद की अन्य प्रमुख भूमिकाएँ:
    • विचार-विमर्श का सर्वोच्च मंच – राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस
    • तीनों प्रकार के आपातकाल (राष्ट्रीय, राज्य, वित्तीय) की मंजूरी
    • राज्य विधान परिषद का गठन या समाप्ति राज्य विधानसभा की सहमति से
    • राज्यों के क्षेत्र, सीमा और नाम में बदलाव
    • उच्चतम/उच्च न्यायालय के गठन, न्यायक्षेत्र निर्धारण एवं साझा न्यायालयों की स्थापना

संसदीय प्रणाली

भारत की संसदीय सरकार (Parliamentary Government) : 

  • संसदीय सरकार वह व्यवस्था है जिसमें कार्यपालिका, विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है और उसके विश्वास पर निर्भर करती है। इसे कैबिनेट सरकार, उत्तरदायी सरकार, या वेस्टमिंस्टर मॉडल भी कहा जाता है।
  • आइवर जेनिंग्स ने संसदीय व्यवस्था को ‘कैबिनेट व्यवस्था’ कहा है क्योंकि इसमें शक्ति का केंद्र बिंदु कैबिनेट होता है।

संवैधानिक आधार

  • अनुच्छेद 74 व 75 – केंद्र में संसदीय व्यवस्था की व्यवस्था करता है।
  • अनुच्छेद 163 व 164 – राज्यों में इसी प्रकार की व्यवस्था करता है।

संसदीय सरकार की प्रमुख विशेषताएँ

  1. नामिक और वास्तविक कार्यपालिका:
  • राष्ट्रपति – नामिक प्रमुख (De jure head)
  • प्रधानमंत्री – वास्तविक कार्यकारी (De facto head)
  • इस तरह राष्ट्रपति, राज्य का मुखिया नामिक होता है, जबकि प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है। अनुच्छेद 74 प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद की व्यवस्था करता है, जो राष्ट्रपति को कार्य संपन्न कराने में परामर्श देगी। उसके परामर्श को मानने के लिए राष्ट्रपति बाध्य होगा।’
  1. बहुमत प्राप्त दल का शासन:
  • लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन सरकार बनाता है।
  • प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। अन्य मंत्रियों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के परामर्श से ही करता है।
  1. सामूहिक उत्तरदायित्व:
  • मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है।
  • लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर मंत्रिपरिषद को हटा सकती है।
  1. राजनीतिक एकरूपता:
  • अधिकांशतः मंत्री एक ही राजनीतिक दल से होते हैं।
  • गठबंधन सरकार में सहमति से निर्णय लेना आवश्यक होता है।
  1. दोहरी सदस्यता:
  • मंत्री, कार्यपालिका और विधायिका दोनों के सदस्य होते हैं।
  • यदि कोई गैर-सांसद मंत्री बनता है, तो 6 माह में उसे संसद सदस्य बनना होता है।
  1. प्रधानमंत्री का नेतृत्व:
  • प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद, संसद व सत्तारूढ़ दल का नेता होता है।
  • वह नीति-निर्माण और प्रशासनिक निर्णयों में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
  1. निचले सदन का विघटन:
  • प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति लोकसभा को भंग कर सकता है।
  • यह व्यवस्था कार्यपालिका को चुनाव के लिए रास्ता खोलने का अवसर देती है।
  1. गोपनीयता का सिद्धांत:
  • मंत्री गोपनीयता की शपथ लेते हैं।
  • वे अपने निर्णयों व चर्चाओं को गोपनीय रखते हैं।

संसदीय व्यवस्था के गुण

भारत में अपनाई गई संसदीय प्रणाली में निम्नलिखित प्रमुख गुण/लाभ हैं:

  1. विधायिका एवं कार्यपालिका के मध्य सामंजस्य
  • संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका, विधायिका का एक भाग होती है।
  • दोनों अंगों में सहयोग और तालमेल बना रहता है।
  • इस सहयोग के कारण उनके बीच टकराव की संभावना बहुत कम होती है।
  1. उत्तरदायी सरकार (Responsible Government)
  • मंत्रिपरिषद, संसद (विशेषकर लोकसभा) के प्रति जवाबदेह होती है।
  • संसद प्रश्नकाल, अल्पकालिक चर्चा, अविश्वास प्रस्ताव, आदि के माध्यम से कार्यपालिका पर निगरानी रखती है।
  • यह व्यवस्था जनता के प्रति पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करती है।
  1. निरंकुशता का प्रतिषेध (Prevention of Despotism)
  • कार्यपालिका सामूहिक होती है (मंत्रिपरिषद), न कि किसी एक व्यक्ति में केंद्रित।
  • यह शक्तियों के केंद्रीकरण को रोकती है।
  • कार्यपालिका को अविश्वास प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है, जिससे तानाशाही प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रहता है।
  1. वैकल्पिक सरकार की व्यवस्था (Provision for Alternative Government)
  • अगर सत्तारूढ़ दल बहुमत खो देता है तो राष्ट्रपति/राज्यपाल विपक्षी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकता है।
  • इससे बिना आम चुनाव कराए नई सरकार बन सकती है।
  • डॉ. आइवर जेनिंग्स के अनुसार: “विपक्ष का नेता वैकल्पिक प्रधानमंत्री होता है।”
  1. व्यापक प्रतिनिधित्व (Broad Representation)
  • कार्यपालिका में विभिन्न वर्गों, क्षेत्रों और समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाता है।
  • इससे यह सुनिश्चित होता है कि सरकार जनता के विविध हितों का प्रतिनिधित्व करती है।

संसदीय व्यवस्था के दोष

अस्थिर सरकार (Unstable Government)
  • संसदीय प्रणाली में सरकार बहुमत के समर्थन पर निर्भर करती है।
  • बहुमत खोने पर सरकार गिर सकती है जिससे बार-बार सरकार बदलने की नौबत आ जाती है।
  • उदाहरण:
    • मोरारजी देसाई (1977-79)
    • चरण सिंह (1979-80)
    • वी. पी. सिंह (1989-90)
    • चंद्रशेखर (1990-91)
    • एच. डी. देवगौड़ा (1996-97)
    • आई. के. गुजराल (1997-98)
नीतियों की निश्चितता का अभाव (Lack of Policy Continuity)
  • बार-बार सरकार बदलने से दीर्घकालिक नीतियाँ प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पातीं।
  • सत्ता परिवर्तन से पूर्ववर्ती सरकार की नीतियाँ बदल दी जाती हैं।
  • उदाहरण:
    • 1977 में जनता सरकार ने कांग्रेस की नीतियों को पलटा।
    • 1980 में कांग्रेस ने फिर सत्ता में आकर जनता पार्टी की नीतियों को बदल दिया।
मंत्रिमंडल की निरंकुशता (Cabinet Dictatorship)
  • जब सत्तारूढ़ दल को स्पष्ट बहुमत होता है, तो कैबिनेट अत्यधिक शक्तिशाली हो जाती है।
  • संसद का नियंत्रण कमजोर हो जाता है।
  • टिप्पणी:
    • एच. जे. लास्की: “संसदीय प्रणाली कार्यपालिका को तानाशाही का अवसर देती है।”
    • रैमसे मैकडोनाल्ड (ब्रिटेन): “कैबिनेट की तानाशाही”।
  • उदाहरण:
    • इंदिरा गांधी (1975-77)
    • राजीव गांधी का कार्यकाल
शक्ति पृथक्करण के विरुद्ध (Against Separation of Powers)
  • विधायिका और कार्यपालिका के बीच स्पष्ट पृथक्करण नहीं होता।
  • मंत्रिमंडल दोनों अंगों में शामिल होता है।
  • बेगहॉट: “कैबिनेट कार्यपालिका एवं विधायिका के बीच हाइफन (hyphen) की तरह है।”
    • परिणामतः संविधान में वर्णित शक्तियों का पृथक्करण सिद्धांत कमज़ोर पड़ता है।
अकुशल व्यक्तियों द्वारा सरकार का संचालन (Rule by Inexperienced Individuals)
  • मंत्रियों का चयन संसद के सदस्यों में से होता है, जो जरूरी नहीं कि प्रशासनिक रूप से कुशल हों।
  • बाहरी विशेषज्ञों को मंत्री बनाने का विकल्प सीमित होता है।
  • मंत्री अपने संसदीय कार्यों, कैबिनेट बैठकों, और राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं, जिससे प्रशासनिक दक्षता प्रभावित होती है।

संसदीय व्यवस्था की स्वीकार्यता के कारण

  • भारत के संविधान निर्माताओं ने अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली की तुलना में ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को निम्नलिखित कारणों से स्वीकार किया:
व्यवस्था से निकटता (Familiarity with the System)
  • भारत में ब्रिटिश शासनकाल से ही संसदीय प्रणाली की जड़ें रही हैं।
  • भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में उत्तरदायित्व, प्रतिनिधित्व आदि की परंपरा विकसित हो चुकी थी।
  • के. एम. मुंशी ने कहा: “हमारी संवैधानिक परंपरा संसदीय बन चुकी है, तो अब पीछे क्यों लौटें?”
उत्तरदायित्व को अधिक वरीयता (Preference to Responsibility over Stability)
  • डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट किया कि:
    • “लोकतांत्रिक कार्यकारिणी को दो शर्तें पूरी करनी चाहिए – स्थायित्व और उत्तरदायित्व।”
  • राष्ट्रपति प्रणाली स्थायित्व देती है, पर उत्तरदायित्व नहीं।
  • संसदीय प्रणाली उत्तरदायित्व पर बल देती है, जो लोकतंत्र में अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • इसलिए प्रारूप समिति ने उत्तरदायित्व को प्राथमिकता दी।
विधायिका और कार्यपालिका में टकराव से बचाव (Avoidance of Conflict between Legislature and Executive)
  • अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली में विधायिका और कार्यपालिका के बीच अक्सर टकराव होता है।
  • भारत में लोकतंत्र की शुरुआत में ऐसे टकराव अस्थिरता ला सकते थे।
  • संसदीय प्रणाली में दोनों अंगों में सहयोग बना रहता है।
भारतीय समाज की प्रकृति (Nature of Indian Society)
  • भारत एक विविधतापूर्ण, बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुजातीय देश है।
  • संसदीय प्रणाली में विभिन्न वर्गों, जातियों, और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकता है।
  • इससे राष्ट्रीय एकता, समावेशिता और संघात्मक भावना को बल मिलता है।
स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश (Recommendation of Swaran Singh Committee)
  • 1975 में गठित स्वर्ण सिंह समिति ने इस विषय पर गहन विचार किया।
  • समिति का निष्कर्ष था: “संसदीय व्यवस्था अच्छी तरह काम कर रही है, इसलिए इसे राष्ट्रपति प्रणाली में बदलने की आवश्यकता नहीं है।”

निष्कर्ष (Conclusion)

  • भारत के संविधान निर्माताओं ने राजनीतिक स्थायित्व से अधिक लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को महत्त्व दिया। इसलिए, देश के बहुलवादी और जटिल सामाजिक ढांचे के अनुसार संसदीय प्रणाली को अधिक उपयुक्त और स्वीकार्य माना गया।

भारत में संसदीय नियंत्रण की अप्रभाविता

  • भारतीय संसद द्वारा कार्यपालिका और प्रशासन पर नियंत्रण सैद्धांतिक रूप से तो मजबूत है, लेकिन व्यवहार में यह प्रभावी नहीं दिखता। इसके पीछे कई कारण हैं:
  • संसदीय नियंत्रण की अप्रभाविता के प्रमुख कारण:
    1. प्रशासन की विशालता और जटिलता – भारतीय प्रशासन इतना बड़ा और जटिल है कि संसद के पास समय और विशेषज्ञता की कमी है जिससे प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं हो पाता।
    2. अनुदान मांगों की तकनीकी प्रकृति – वित्तीय मामलों की जटिलता के कारण संसद का वित्तीय नियंत्रण कमजोर हो जाता है।
    3. कार्यपालिका पर विधायी निर्भरता – संसद स्वयं नीति निर्माण में कार्यपालिका पर निर्भर रहती है।
    4. संसद का बड़ा आकार – इसके कारण संचालन और नियंत्रण की प्रक्रिया जटिल बन जाती है।
    5. कार्यपालिका को बहुमत का समर्थन – सत्तापक्ष को संसद में बहुमत होने से उसकी आलोचना मुश्किल हो जाती है।
    6. वित्तीय समितियों की सीमित भूमिका – लोक लेखा समिति जैसी संस्थाएं व्यय के बाद जांच करती हैं, जिससे यह प्रक्रिया पोस्टमार्टम जैसी हो जाती है।
    7. गिलोटिन प्रणाली का प्रयोग – इसके कारण अनुदान मांगों पर चर्चा सीमित होती है और वित्तीय नियंत्रण कमज़ोर होता है।
    8. प्रत्यायोजित विधान का विस्तार – इससे विधायी शक्तियाँ कार्यपालिका की ओर शिफ्ट हो जाती हैं।
    9. अत्यधिक अध्यादेश – राष्ट्रपति द्वारा बार-बार अध्यादेश लाना संसद की विधायी भूमिका को कमज़ोर करता है।
    10. राजनीतिक प्रकृति का नियंत्रण – संसदीय नियंत्रण अक्सर ढीला, औपचारिक और राजनीति-प्रधान होता है।
    11. सशक्त विपक्ष की कमी – प्रभावी विपक्ष और संसदीय मर्यादाओं की अनुपस्थिति से नियंत्रण कमज़ोर होता है।

भारतीय और ब्रिटिश संसदीय मॉडल में प्रमुख अंतर

बिंदु भारतीय मॉडलब्रिटिश मॉडल
शासन प्रणाली का स्वरूपगणतंत्र (Republic) – राष्ट्रपति निर्वाचित होता है।राजशाही (Monarchy) – राजा या रानी आनुवंशिक रूप से सत्ता में होता है।
संसद की सर्वोच्चतासंसद सर्वोच्च नहीं – संविधान, मूल अधिकार, न्यायिक समीक्षा आदि से सीमित।संसद संप्रभु है – कानून सर्वोपरि होता है, कोई न्यायिक समीक्षा नहीं।
प्रधानमंत्री की पात्रतालोकसभा या राज्यसभा, किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है।केवल हाउस ऑफ कॉमन्स (निचला सदन) का सदस्य होना अनिवार्य है।
मंत्री की नियुक्तिसंसद सदस्य न होने पर भी 6 माह तक मंत्री बन सकते हैं।केवल संसद सदस्य ही मंत्री बन सकते हैं।
मंत्रियों की कानूनी जिम्मेदारीकोई स्पष्ट कानूनी उत्तरदायित्व नहीं।मंत्रियों की कानूनी जिम्मेदारी होती है – वे कार्यों के लिए उत्तरदायी होते हैं।
कैबिनेट निर्णयों पर राष्ट्रपति की भूमिकाराष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह माननी होती है – केवल औपचारिक प्रमुख।राजा/रानी कैबिनेट सलाह मानता है – भी औपचारिक प्रमुख, पर ऐतिहासिक महत्व।
शैडो कैबिनेट (छाया मंत्रिमंडल)ऐसी कोई औपचारिक संस्था नहीं है।विपक्ष द्वारा गठित “छाया कैबिनेट” की परंपरा है।
संविधान की प्रकृतिलिखित, विस्तृत और सर्वोच्च – संविधान सर्वोपरि है।अलिखित और लचीला – संसद सर्वोपरि है।

निष्कर्ष (Conclusion)

  • हालांकि भारत ने ब्रिटिश संसदीय प्रणाली से प्रेरणा ली है, फिर भी उसे अपने संविधान, राजनीतिक संस्कृति और सामाजिक संरचना के अनुसार अनुकूलित एवं परिवर्तित किया गया है। इसलिए भारतीय मॉडल ‘ब्रिटिश मॉडल की प्रतिकृति नहीं बल्कि संशोधित रूप है।

नया संसद भवन (New Parliament Building)

  • यह भवन सेंट्रल विस्टा परियोजना का हिस्सा है।
  • इसकी कुल क्षमता 1272 सीटें है।
निर्माण और डिज़ाइन
  • वास्तुविद् (Architect): बिमल हसमुख पटेल।
  • भवन का आकार त्रिभुजाकार है।
  • शिलान्यास: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, 10 दिसम्बर 2020।
  • निर्माण: टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड द्वारा।
लोकसभा कक्ष
  • थीम: राष्ट्रीय पक्षी – मोर।
  • दीवारों व छत पर मोर के पंख जैसी नक्काशी।
  • पुराना भवन:
    • सेंट्रल हॉल की क्षमता = 436 सदस्य।
    • संयुक्त बैठक के समय गलियारों में लगभग 200 अस्थायी सीटें जोड़ी जाती थीं।
  • नया भवन:
    • लोकसभा सीटें: 888 (पहले 552)।
    • संयुक्त बैठक के लिए अब लोकसभा कक्ष का उपयोग होगा (सेंट्रल हॉल का अभाव)।
राज्यसभा कक्ष
  • थीम: राष्ट्रीय पुष्प – कमल।
  • सजावट: लाल कालीन।
  • पुरानी क्षमता: 250 सदस्य।
  • नई क्षमता: 384 सदस्य।

अन्य विशेषताएँ

  • संविधान सभागार: भारतीय लोकतंत्र की यात्रा का दस्तावेजीकरण।
  • निर्माण सामग्री:
    • धौलपुर (सरमथुरा) का बलुआ पत्थर।
    • जैसलमेर (लाखा गाँव) का ग्रेनाइट।
    • नागपुर की लकड़ी।
    • उत्तर प्रदेश, भदोही के बुनकरों द्वारा हाथ से बुने पारंपरिक कालीन।

महत्वपूर्ण प्रतीक और मूर्तियाँ

  • महात्मा गांधी प्रतिमा (16 फुट ऊँची):
    • 1993 में संसद के मुख्य द्वार पर स्थापित।
    • अब पुराने व नए भवन के बीच स्थानांतरित।
  • राष्ट्रीय चिह्न (अशोक स्तंभ का सिंह): भवन के शीर्ष पर स्थापित।
  • अशोक चक्र और सत्यमेव जयते: प्रवेश द्वार पर पत्थरों पर अंकित।
  • गोल्डन राजदंड (सेंगोल):
    • जवाहरलाल नेहरू को तमिलनाडु के पुजारियों द्वारा दिया गया।
    • अब लोकसभा कक्ष में स्पीकर के पोडियम के पास रखा गया।
    • “सेंगोल” का अर्थ: नीति पालन, संबंध: चोल साम्राज्य।
  • प्रवेश द्वारों पर संरक्षक मूर्तियाँ: हाथी, घोड़ा, चील, हंस।

सेंट्रल विस्टा परिसर

  • इसमें शामिल: राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, उत्तर और दक्षिण ब्लॉक, इंडिया गेट, राष्ट्रीय अभिलेखागार।
  • पुराना संसद भवन:
    • वास्तुकार: एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर।
    • शैली: यूरोपीय शास्त्रीयवाद।

उद्घाटन

  • नया संसद भवन राष्ट्र को समर्पित: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, 28 मई 2023।
  • प्रमुख द्वार: ज्ञान द्वार, शक्ति द्वार और कर्म द्वार।
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