भारतीय संविधान के मूल अधिकार

भारतीय संविधान के मूल अधिकार नागरिकों को स्वतंत्रता, समानता और गरिमा सुनिश्चित करने वाले मौलिक प्रावधान हैं, जिनका उल्लेख संविधान के भाग 3 में किया गया है। ये अधिकार राज्य की शक्तियों पर नियंत्रण रखते हुए नागरिकों के हितों की रक्षा करते हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाते हैं। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय के अंतर्गत मूल अधिकारों का अध्ययन भारतीय लोकतंत्र की संरचना और कार्यप्रणाली को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अधिकार → व्यक्ति के दावे → समाज द्वारा स्वीकृत → राज्य द्वारा मान्यता

अधिकारो के प्रकार – 

  • प्राकृतिक – विधिक – ऐतिहासिक 
  • नकारात्मक – सकारात्मक 

अधिकारो का विकास – 

  • नागरिक अधिकर → राजनीतिक → सामाजिक व आर्थिक → मानवाधिकार

कारेल वसाक – अधिकारों की तीन पीढ़ियाँ  

अधिकारो का इतिहास 

  • 1215 मैग्नाकार्टा – U.K.
  • 1689 Bill of Rights – U.K.
    • रक्त हीन क्रांति के बाद प्रिंस विलियम और मेरी ने साइन किए 
  • 1789 Diclaration of the right of man – France
  • 1791 Bill of rights अमेरिका
    • 1791 में USA के संविधान में प्रथम 10 संशोधन करके सामूहिक रूप से   Bill of rights कहलाये। 
  • 10 दिसंबर 1948 सार्वभौमिक घोषणा U.N.O द्वारा

भारत में अधिकारो का विकास – 

  • 1895 – स्वराज बिल – तिलक (सर्वप्रथम मूल अधिकार माँग)
  • 1925 – एनिबिसेंट – 07 मूल अधिकार 
    1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता 
    2. विवेक की स्वतंत्रता 
    3. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 
    4. एकत्र होने की 
    5. लिंग भेदभाव नहीं 
    6. अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा 
    7. सार्वजनिक स्थलों को उपयोग की 
  • मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित (1928) समिति का मत था कि आयरिश स्वतन्त्र राज्य के संविधान ( 1921 ) की भाँति भारत में भी मूल अधिकार शीर्षक से कुछ अधिकारों को संविधान में दर्जा दिया जाना चाहिए। 
    • नोट :- ग्रेनविल ऑस्टिन – नेहरू रिपोर्ट को संविधान में निर्दिष्ट मूल अधिकारो का अग्रदूत कहा जा सकता है।  
  • संविधान सभा में मूल अधिकारों व अल्पसंख्यक अधिकारों के सम्बंध में परामर्श देने के लिए एक परामर्श समिति बनायी गयी। इस समिति के अध्यक्ष – सरदार पटेल थे।
  • मूल अधिकारों के सम्बंध में एक उपसमिति भी बनायी गयी जिसके सभापति – जे.बी. कृपलानी थे जबकि अल्पसंख्यक अधिकार उपसमिति H.C. मुखर्जी के सभापतित्व में बनाई गई। 
  • मौलिक अधिकारों की उप समिति के सदस्य:-
    • जेबी कृपलानी (सभापति)
    • मीनू मसानी, के.टी. शाह, अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर, के.एम. मुंशी, सरदार हरनाम सिंह, मौलाना आजाद, डॉ. अम्बेडकर, हंसा मेहता, जयरामदास दौलतराम, के पन्निकर, राजकुमारी अमृत कौर।
    • सप्रू समिति (1945) ने मूल अधिकारों को वाद योग्य और अवाद योग्य दो भागों में बाँटा था। 

मूल अधिकार की विशेषताएँ

  1. मूल अधिकार संविधान द्वारा परिभाषित नहीं है। 
  2. कुछ सिर्फ नागरिकों के लिए उपलब्ध हैं, जबकि कुछ अन्य सभी व्यक्तियों के लिए उपलब्ध हैं चाहे वे नागरिक,विदेशी लोगों या कानूनी व्यक्ति, जैसे-परिषद्‌ एवं कंपनिया हों। 
  3. सीमित है, निरंकुश नहीं 
  4. प्राकृतिक / अगणित नहीं 
  5. कुछ मूल अधिकार राज्य के अलावा व्यक्तियों के विरुद्ध भी 
    • अनुच्छेद 15,17,18,23,24
  6. ये असीमित नहीं है, लेकिन वादयोग्य होते हैं। राज्य उन पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है। हालांकि ये कारण उचित है या नहीं इसका निर्णय अदालत करती है। 
  7. कुछ मामलों को छोड़कर इनमें से ज्यादातर अधिकार राज्य के मनमाने रवैये के खिलाफ हैं। 
  8. ये न्यायोचित हैं। ये व्यक्तियों को अदालत जाने की अनुमति देते हैं।
  9. मूल अधिकारों को संविधान द्वारा गारंटी एवं सुरक्षा प्रदान की गई है।  
  10. इन्हें उच्चतम न्यायालय द्वारा गारंटी व सुरक्षा प्रदान की जाती है। हालांकि पीड़ित व्यक्ति सीधे उच्चतम न्यायालय जा सकता है। 
  11. ये स्थायी नहीं हैं। संसद इनमें कटौती या कमी कर सकती है लेकिन संशोधन अधिनियम के तहत, न कि साधारण विधेयक द्वारा। 
  12. ये नकारात्मक हैं जैसा कि ये राज्य को कुछ मसलों पर कार्य करने से प्रतिबंधित करते हैं।   – अनुच्छेद 14,15,16,20,21
  13. ये सकारात्मक हैं जैसा कि ये राज्य को कुछ मसलों पर कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं।    – अनुच्छेद 21(A), 25, 29(1), 30(1)
  14. इनको लागू करने के लिए विधान की आवश्यकता नहीं, ये स्वत: लागू हैं।
  15. न्यायालय इस बात के लिए बाध्य है कि किसी भी मूल अधिकार के हनन की विधि को वह गैर-संवैधानिक एवं अवैध घोषित करे। 
  16. राष्ट्रीय आपातकाल की सक्रियता के दौरान (अनुच्छेद 20 और 21 में प्रत्याभूत अधिकारों को छोड़कर) इन्हें निलंबित किया जा सकता है। अनुच्छेद 19 में उल्लिखित 6 मूल अधिकारों को तब स्थगित किया जा सकता है, जब युद्ध या विदेशी आक्रमण के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की गई हो। इसे सशस्त्र विद्रोह (आंतरिक आपातकाल) के आधर पर स्थगित नहीं किया जा सकता। 
  17. मूल अधिकार सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय सुनिश्चित नहीं करते है, जबकि नीति निर्देशक तत्व करते है। 
  18. अनुच्छेद 31क (संपत्ति आदि के अधिग्रहण पर कानून की रक्षा) द्वारा इनके कार्यान्वयन की सीमाएं हैं। 
  19. मूल अधिकारों का अधित्याग नहीं – (Doctrine of Waiver) – अधित्याग का सिद्धांत
    • ओलगा टेलिस वाद (1985) [आजीविका का अधिकार से संबंधित] – मूल अधिकारों का अधित्याग (Waiver) नहीं किया जा सकता। 
    • U.S.A.में कर सकते है । 
  20. उपहार (Gift) नहीं- 
    • एम. नागराज वाद (2007) [Promotion में reservation से संबंधित] में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मूल अधिकार राज्य द्वारा अपने नागरिकों को उपहार (Gift) नहीं हैं। 
  21. मूल अधिकार त्याग नहीं – विश्वेसरनाथ मामला
मूल अधिकार विधिक अधिकार 
गारंटी और सुरक्षा – स्वयं संविधान सुरक्षा – कानूनों द्वारा 
वाद योग्य वाद योग्य है भी और नहीं भी 
परिवर्तन – संविधान संशोधन परिवर्तन – साधारण बहुमत से 
समाप्त / कम नहीं समाप्त / कम 
प्रतिबंध – केवल आपातकाल में ऐसा संरक्षण प्राप्त नहीं है 
रिट – सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद -32), उच्च न्यायालय (अनुच्छेद -226)रिट – केवल उच्च न्यायालय (अनुच्छेद -226)

विधिक अधिकार –

  • भाग – 3 के बाहर 
  • सांविधिक / ग़ैर मूल अधिकार 
  • संवैधानिक (जो संविधान में है) –
  • अनु. 265– विधि के प्राधिकार के बिना किसी कर को लगाया या संग्रहित नहीं किया जा सकता।
  • अनु. 300 (क) विधि के प्राधिकार के बिना व्यक्ति को सम्पति से वंचित नहीं किया जा सकता।
  • अनु. 301- भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र व्यापार, वाणिज्य व समागम अबाध होगा।
  • अनु. 325 धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग भेद के बिना मतदाता सूचि में स्थान ।
  • अनु. 326 – सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार (For MLA/MP के निर्वाचन हेतु)
  • इन अधिकारों की सुरक्षा हेतु केवल उच्च न्यायालय ही अनु. 226 के तहत रिट जारी कर सकता है। स्वर्वोच्च न्यायलय नहीं अनु. 32 के तहत ।
  • संसदीय अधिनियम द्वारा प्रदान – RTI, मनरेगा 
संविधान में दो ऐसे उपबंध हैं, जो राजनीतिक समता को सुनिश्चित करते प्रतीत होते हैं:- 
  1. (अनुच्छेद- 325) –  धर्म, जाति, लिंग अथवा वर्ग के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल होने के अयोग्य करार नहीं दिया जाएगा।   
  2. (अनुच्छेद- 326) – लोकसभा और विधानसभाओं के लिए वयस्क मतदान का प्रावधान।
संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकारों का विवरण है:-
  • संविधान के भाग 3 को ‘ भारत का मैग्नाकार्ट ” की संज्ञा दी गयी है। ‘मैग्ना कार्टा’ अधिकारों का वह प्रपत्र है, जिसे इंग्लैंड के किंग जॉन द्वारा 1215 में सामंतों के दबाव में जारी किया गया। यह नागरिकों के मूल अधिकार से संबंधित पहला लिखित प्रपत्र था।
  • मूल अधिकारों के सम्बन्ध में संविधान में कुल 23 अनुच्छेद है। जिसके तहत प्रत्येक नागरिक को 6 मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।

मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित अनुच्छेद

अनुच्छेद विषय-वस्तु
सामान्य
12राज्य की परिभाषा
13 कानून जो मूल अधिकारों के प्रति असंगति अथवा अप्रतिष्ठापूर्ण हैं।
समानता का अधिकार
14कानून के समक्ष समानता
15धर्म, प्रजाति अथवा नस्ल, जाति, लिंग अथवा जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
16सार्वजनिक रोजगारों के मामलों में अवसर की समानता
17अस्पृश्यता का उन्मूलन
18उपाधियों का उन्मूलन
स्वतंत्रता का अधिकार
19अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से सम्बन्धित अधिकारों का संरक्षण
20अपराधों के लिए दोषसिद्धि से संरक्षण
21जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण
21A शिक्षा का अधिकार
22कुछ मामलों में गिरफ्तारी तथा निरुद्धता से संरक्षण
शोषण के विरुद्ध अधिकार
23मानव व्यापार तथा बलात् श्रम से संरक्षण
24कारखानों में बच्चों के रोजगार का निषेध
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
25अंतःकरण, तथा धर्म के प्रकटन, अभ्यास एवं प्रचार-प्रसार की स्वतंत्रता
26धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता
27किसी विशेष धर्म को प्रोत्साहित करने के लिए कर भुगतान की स्वतंत्रता
28. कुछ शैक्षणिक संस्थाओं में धार्मिक निर्देशों अथवा धार्मिक उपासना के लिए उपस्थित होने की स्वतंत्रता
सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार
29अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण
30अल्पसंख्यकों को अपनी शैक्षणिक संस्था खोलने और चलाने का अधिकार
31सम्पत्ति का अनिवार्य अधिग्रहण (निरस्त)
कुछ कानूनों की सुरक्षा
31A सम्पदा के अधिग्रहण के लिए कानून की सुरक्षा
31B कुछ अधिनियमों एवं विनियमनों की वैधता
31C नीति-निदेशक सिद्धांतों पर प्रभाव डालने वाले कानूनों की सुरक्षा
31D राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से सम्बन्धित कानूनों की सुरक्षा (निरस्त)
संवैधानिक उपचारों का अधिकार
32इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को लागू करने से सम्बन्धित उपचार
32A अनुच्छेद 32 के अंतर्गत राज्य-कानूनों की संवैधानिक वैधता पर विचार नहीं (निरस्त)
33इस भाग द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों को संशोधित करने की संसद की शक्ति
34.इस भाग द्वारा प्रदत्त पर उन स्थितियों में रोक जबकि किसी स्थान पर सैन्य शासन लगा हो
35इस भाग के प्रावधानों को प्रभावी बनाने सम्बन्धी विधायन

अनुच्छेद- 12: राज्य की परिभाषा 

  • मौलिक अधिकार भाग 3 में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, “राज्य” के अंतर्गत
    • भारत की सरकार और संसद 
    • राज्यों में से प्रत्येक राज्य की सरकार और विधान- मंडल 
    • भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन सभी स्थानीय और अन्य प्राधिकारी (सजातीयता का सिद्धांत) हैं।

(अन्य सभी निकाय अर्थात् वैधानिक या गैर-संवैधानिक प्राधिकरण, जैसे-एलआईसी, ओएनजीसी, सेल आदि।)[Art.26 में राज्य की same definition]

अन्य प्राधिकारी
जो राज्य हैजो राज्य नहीं है
L.I.C. , O.N.G.C., F.C.I., UPSC, ISO, UniversitiesNCERT, SCERT, CSIR 
राष्ट्रपति जब अनुच्छेद 359 के अंतर्गत आदेश जारी करता है।BCCI, वक़्फ़ बोर्ड, ICICI 
उच्च न्यायालयो में मुख्य न्यायाधीश (जब प्रशासनिक आधिकारिता का प्रयोग करे)निजी महाविद्यालय 
राष्ट्रीयकृत बैंक (ICICI नहीं)संविधानिक व संसदिय अध्ययन संस्थान नई दिल्ली (टेकराजवाद)
विधिक व्यक्ति न्यायपालिका 
राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ 
  • कॉमनकॉज बनाम भारत संघ वाद – न्यायपालिका , कार्यपालिका व विधायिका तीनो ही राज्य माने जा सकेंगे।
  • सजातीयता का सिद्धांत – अनुच्छेद 12 के तहत ‘अन्य प्राधिकारी’ को परिभाषित किया जाता है । 

अनुच्छेद- 13: मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियाँ

[नोट : अनुच्छेद 13 → अनुच्छेद 32 व 226  द्वारा रिट की शक्ति
का आधार है ।] 

  • अनु. 13(1) – संविधान पूर्व विधियाँ 
    • इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले भारत के राज्यक्षेत्र में प्रवत्त (Force) सभी विधियां उस मात्रा तक शून्य होगी जिस तक वे इस भाग के उपबंधों से असंगत है।
    • संविधान पूर्व विधियों की न्यायिक समीक्षा हो सकती है। 
    • [आच्छादन का सिद्धांत → संविधान पूर्व व पश्चात् दोनों विधियों पर लागू होता है – संविधान पूर्व विधियाँ जो भाग -3 से असंगत है – 26 जनवरी 1950 के बाद प्रभावहीन हो जाती है।] 
    • [भविष्यलक्षी सिद्धांत (भूतलक्षी नहीं) → प्रारंभ से ही शून्य नहीं]- अनु. 13(1) भूतलक्षी नहीं है। 
  • अनु. 13(2) – संविधान पश्चात् विधियाँ
    • राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती (Takes away) या न्यून (Abriddges) करती है और इस भाग के उल्लंघन में बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी। → न्यायिक पुनरावलोकन  [प्रथक्करणीयता का सिद्धांत → संविधान पश्चात् विधियाँ मूल अधिकारों के उलंघन की सीमा तक शून्य]
  • अनुच्छेद 13 (3) :- विधि के अंतर्गत भारत में विधि के समान कोई अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, उपनियम, अधिसूचना, रूढ़ि व प्रथा आते हैं अर्थात इनमें से किसी के भी द्वारा मूल अधिकारों का उल्लंघन होता है तो उन्हें न्यायालय में रिट के द्वारा चुनौती दी जा सकती है। → विधि की परिभाषा [विधि की परिभाषा के तहत → पर्सनल लॉ ✗]
  • क्या संविधान संशोधन ‘विधि’ है –
    • शंकरी प्रसाद वाद (1951) – विधि नहीं
      • क्योकि विधि (कानून) के अंतर्गत साधारण बहुमत से बनायी संसदीय विधि आती है जबकि 368 में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। 
        • ↓निर्णय दोहराया  
    • सज्जन सिंह वाद (1965) – विधि नहीं
    • गोलकनाथ वाद (1967) – विधि है
      • सामान्य विधि और संविधान संशोधन विधि में कोई अन्तर नहीं है।  
      • भविष्यलक्षी सिद्धांत 
      • डी.सुब्बाराव पीठ 
      • 11 सदसयीय 
        • ↓गोलकनाथ निर्णय को समाप्त करने हेतु
      • 24 वाँ संविधान संशोधन – विधि नहीं
        • गोलकनाथ वाद (1967) के विरोध में 
        • अनुच्छेद -13 (4) add किया गया। 
      • केशवानंद वाद (1973) – विधि नहीं
        • एस.एम.सीकरी पीठ 
        • 13 सदसयीय –  सबसे बड़ी पीठ 
  • अनुच्छेद -13 (4) : इस अनुच्छेद की कोई बात अनुच्छेद 368 के अधीन किए गए इस संविधान के किसी संशोधन को लागू नहीं होगी । 24वाँ संशोधन 1971 द्वारा जोड़ा गया।  
  • इस प्रकार अनुच्छेद 13 बहुत महत्वपूर्ण अनु. है जो मूल अधिकारों की सुरक्षा की व्यवस्था करता है। 
  • भारत के संविधान में ‘न्यायिक पुनरावलोकन” (Judicial Review) शब्द का कहीं भी उल्लेख नहीं है। 
  • अनु. 13 के तहत मूल अधिकारों से अंसगत विधियों को उच्चतम न्यायालय (अनु. 32) व उच्च न्यायालय (अनु. 226) के तहत अवैधानिक घोषित कर सकते हैं। यहीं शक्ति – न्यायिक पुनरावलोकन कहलाती है।  
  • अर्थात् अनुच्छेद 13, 32, 226 जैसे संवैधानिक उपबंध न्यायालय को न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार देते हैं।

क्या संविधान संशोधन ‘विधि’ है?

अनु. 368 के अन्तर्गत क्या संविधान संशोधन ‘विधि’ है या नहीं ?
  • शंकरी प्रसाद वाद (1951) –
    • संविधान संशोधन विधि नहीं है क्योंकि विधि (कानून) के अन्तर्गत ‘साधारण बहुमत ‘ से बनायी संसदीय विधि आती है । जबकि 368 में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।
    • पहले संशोधन अधिनियम (1951) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई जिसमें सम्पत्ति के अधिकार में कटोती की गई थी।
  • सज्जन सिंह वाद (1965) – उक्त निर्णय ही दोहराया सर्वोच्च न्यायालय ने। 
  • गोलकनाथ बाद (1967) – विधि में संविधान संशोधन भी आता है।
    • नोट:- गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) के मामले में यह निर्णय दिया गया था कि सामान्य विधि व संविधान संशोधन विधि में कोई अन्तर नहीं है। गोलकनाथ वाद में दिये गये निर्णय के प्रभाव को समाप्त करने हेतु 1971 में 24वाँ संशोधन किया गया। इस संशोधन के द्वारा अनु.13 में 13(4) धारा जोड़ी गई। गोलकनाथ केस में 11 सदस्यीयपीठ थी तथा मुख्य न्यायधीश के. सुब्बाराव थे। 
    • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निर्देशक सिद्धांतों के कार्यान्वयन के लिये मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं किया जा सकता है।
  • केशवानन्द भारती वाद (1973) –
    • अनु. 13(3) में वर्णित विधि में संविधान संशोधन नहीं आते।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने गोलकनाथ मामले में अपने निर्णय को प्रत्यादिष्ट (overrule) कर दिया। 
    • इसने 24वें संशोधन अधिनियम (1971) की वैद्यता को बहाल रखा और व्यवस्था दी कि संसद मौलिक अधिकारों को सीमित कर सकती हे, अथवा किसी अधिकार को वापस ले सकती है।

संविधान प्रदत्त मूल अधिकार

समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)

अनुच्छेद – 14: विधि के समक्ष समता एवं विधियों का समान संरक्षण  
  • “राज्य भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति (नागरिकों ,अनागरिकों, विधिक व्यक्तियों) को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।”

तत्व

स्रोत

अर्थ

विधि के समक्ष समता (Equality before Law)

ब्रिटिश प्रणाली

  • नकारात्मक अवधारणा (क्योकि किसी को विशेषाधिकार नहीं है।) 
  • विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति
  • समान न्यायालय एवं समान विधियों द्वारा व्यवहार
  • सभी व्यक्ति विधि के अधीन हैं, कोई विधि से ऊपर नहीं

विधियों का समान संरक्षण (Equal Protection of Laws)

अमेरिकी संविधान

  • सकारात्मक अवधारणा 
  • समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के साथ में समान व्यवहार
  • अगर परिस्थितियों असमान है तो व्यवहार आसमान किया जा सकता है।  
  • बिना भेदभाव के एकसमान नियमों का प्रयोग
  • विधियों के अधिकार और दायित्व सभी पर समान रूप से लागू
  • ई.रोमप्पा / तमिलनाडु वाद (1974) – 
    • वर्गीकरण/भेदभाव युक्तिसंगत 
    • समता व स्वेच्छाचारिता एक दूसरे के कट्टर शत्रु है।
  • अनुच्छेद 14:
    • श्रेणी विधान (Class Legislation) को निषिद्ध करता है।
    • तर्कसंगत वर्गीकरण (Reasonable Classification) की अनुमति देता है, बशर्ते:
      • वर्गीकरण विवेकपूर्ण (Intelligible Differentia) हो।
      • वर्गीकरण और उद्देश्य के बीच तर्कपूर्ण संबंध (Rational Nexus) हो।

समता के अधिकार के अपवाद :-

  1. अनु. 15(3) –  स्त्रियों व बच्चों के लिए विशेष उपबन्ध
  2. अनु. 15(4) – OBC/SC/ST को शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण
  3. अनु. 15(5) –  SC/ST/OBC को निजी शिक्षण संस्थाओ में आरक्षण
  4. अनु. 15(6 ) –  आर्थिक रूप से दुर्बल वर्गों (EWS) को सरकारी व निजी शिक्षण संस्थाओं में 10% आरक्षण
  5. अनु. 16(4) – SC/ST/OBC को सरकारी नौकरियों में आरक्षण
  6. अनु. 16(5) – लोक नियोजन में धर्म के आधार पर राज्य को विभेद की अनुमति
  7. अनु. 16(6) –  आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) को सार्वजनिक नियोजन (सरकारी नौकरियों) में 10 प्रतिशत आरक्षण
  8. राष्ट्रपति, राज्यपाल, विदेशी राजनयिक, SC व HC के जजों व MP/MLA को प्रदत विशेषाधिकार समता के अपवाद है।
    • अनुच्छेद 361 – राष्ट्रपति और राज्यपाल को विशेष संरक्षण
      • न्यायालय के समक्ष उत्तरदायी नहीं 
      • आपराधिक/न्यायिक कार्यवाही न शुरू न जारी 
      • दीवानी कार्यवाही – 02 मास का अग्रिम नोटिस 
    • अनुच्छेद 105 – संसद सदस्यों के भाषणों और मतों पर छूट (विशेषाधिकार एवम् उन्मुक्तियाँ)
    • अनुच्छेद 194 – राज्य विधानमंडल के सदस्यों को संरक्षण (विशेषाधिकार एवम् उन्मुक्तियाँ)
  9. अनुच्छेद 361-क – संसदीय कार्यवाही का प्रकाशन  
  10. नीति निदेशक तत्वों से संबंधित विधियाँ – (अनुच्छेद 31-C)- यदि कोई कानून अनुच्छेद 39 (ख) या (ग) को लागू करता है तो वह अनुच्छेद 14 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। 
    • [अनुच्छेद 31(C) add- 25 वाँ संशोधन 1971 द्वारा]
    • SC का कथन: “जहाँ अनुच्छेद 31- ग आता है, वहाँ अनुच्छेद 14 चला जाता है।”
  11. विदेशी शासकों, राजदूतों और कूटनीतिज्ञों को दीवानी एवं फौजदारी कार्यवाही से प्रतिरक्षा प्राप्त।
  12. संयुक्त राष्ट्र एवं इसकी एजेंसियाँ को भी कूटनीतिक छूट प्राप्त है।
    • मिनर्वा मिल्स वाद ( 1980) में विधि का शासन’ को संविधान का मूलभूत ढांचा घोषित किया गया।
    • M. नागराजन/Union of india (2007) –  समता का सिद्धांत  को संविधान का मूल ढाँचा  
    • अकूल चंद्र प्रधान वाद (1997) – वोट करने के अधिकार का वर्गीकरण किया जा सकता है। 
    • शिव शंकर वाद (1951) –  
      • विधि के समक्ष समता – समान न्याय 
      • विधि के समान संरक्षण – समान न्याय
    • संजीव कोक मैन्युफ़ैक्चरिंग कंपनी वाद (2014) –
    • अनुच्छेद 31(A) शुरू तब अनुच्छेद 14 की सीमा समाप्त 
    • चिरंजीलाल बनाम भारत संघ – व्यक्ति स्वयं एक वर्ग माना जा सकता है । अतः निगम जो विधिक व्यक्ति है उसे भी विधि के समक्ष समता का अधिकार  
    • सचिव रक्षा मंत्रालय बनाम बबीता (2020) – भारतीय सशत्रबलों में महिलाओं को भी स्थायी कमीशन दिया जाएगा ।
    • अनुच्छेद 14 मूल विधि (substantive law) and व्यक्तिगत विधि (personal law) दोनों पर ही लागू होती है।
अनुच्छेद – 15: जाति, लिंग, धर्म, जन्मस्थान, मूलवंश (05 आधार) के आधार पर राज्य नागरिकों में भेदभाव नहीं करेगा, सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त है।
  • अनु.15(1) – केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग व जन्म स्थल के आधार पर नागरिकों के मध्य राज्य भेदभाव नहीं करेगा।
    • केवल का तात्पर्य है – इन 5 आधार पर भेदभाव नहीं परन्तु ‘ भाषा’ व “निवास स्थान’ के आधार पर भेदभाव किया जा सकता है। 
  • अनु.15(2) – धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर दुकानों, होटल, मनोरंजन स्थल, सार्वजनिक, स्थलों राज्य पोषित या साधारण जनता के प्रयोग वाले कुओं, तालाबों, स्नानघरों, सड़कों पर भेदभाव निषेध है।
    • नोट – यहाँ मन्दिर का उल्लेख नहीं है। 
    • यह राज्य व नागरिक दोनों के विरूद्ध है।
अनु. 15(3), 15(4), 15(5), 15(6) उपर्युक्त अधिकारों के अपवाद है- 
  • अनु. 15(3) – राज्य स्त्रियों व बच्चों के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है। उदा. महिला घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम 2005 , बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा (RTE Act के तहत)।, स्थानीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण।
    • डी.पोलराज बनाम भारत संघ –  महिला घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम 2005
  • अनु. 15(4) – सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है।
    • ST/SC/OBC वर्गो को सरकारी शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण।
      • अनुच्छेद 15(4) को ‘चम्पाकम दोराइजन वाद’ (1951) के निर्णय के बाद प्रथम संविधान संशोधन द्वारा 1951 में जोड़ा गया।
      • श्रीमती चम्पाकम दोराइजन v/s मद्रास स्टेट वाद (1951) का सम्बन्ध सरकारी शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण से है।
      • बालाजी बनाम मैसूर राज्य वाद (1963) – पिछड़ेपन का आधार जाति ही एक मात्र निर्धारण नहीं हो सकता बल्कि अन्य मापदंड भी देखें जाने चाहिए।  
  • अनु. 15(5) –  राज्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से ST/SC/OBC के लिए निजी शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में विशेष सुविधा दे सकता है।
  • यह 93 वें संविधान संशोधन – 2005 द्वारा जोड़ा गया। 
    • इमामदार बनाम महाराष्ट्र निर्णय को पलटने हेतु – राज्य अपनी आरक्षण नीति अल्पसंख्यक संस्थानों व निजी पर लागू नहीं करा सकता
    • अशोक ठाकुर बनाम भारत संघ  – संवैधानिक घोषित किया 
      • इसके तहत OBC/SC/ST को निजी शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण दिया गया है। इसकी (2) शर्तें है –
  • OBC में क्रिमीलेयर को नहीं मिलेगा। 
    • केंद्र सरकार ने “केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम, 2006” पारित किया।
    • इसके तहत 27% आरक्षण पिछड़े वर्गों के लिए (OBC) सुनिश्चित किया गया।
    • IITs, IIMs जैसे संस्थान भी इसमें शामिल हैं।
क्रीमीलेयर (Creamy Layer)
  • पिछड़े वर्ग (OBC) के ऐसे संपन्न और उच्च सामाजिक – आर्थिक स्थिति वाले वर्ग, जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाता।
  • क्रीमीलेयर में आने वाले तबके 
    1. संवैधानिक पदधारी व्यक्ति
    2. ग्रुप A व B सेवा के अधिकारी
    3. सशस्त्र बलों के उच्च अधिकारी
    4. स्वतंत्र पेशेवर (Professional) – डॉक्टर, इंजीनियर, अधिवक्ता, लेखक, कलाकार, सलाहकार आदि
    5. व्यापार / उद्योग / वाणिज्य में संलग्न व्यक्ति
    6. संपत्ति धारक – शहरी क्षेत्रों में भवनधारी तथा बड़ी कृषि भूमि / शहरी प्लॉट / अचल संपत्ति रखने वाले व्यक्ति
    7. आय आधारित मापदंड – सीमा ₹8 लाख तक
  • अल्पसंख्यक संस्थाओ पर लागू नहीं
    • अनु. 15(6) – आर्थिक रूप से दुर्बल वर्गों (EWS) को सरकारी व निजी शिक्षण संस्थाओं में 10% आरक्षण (103वां संशोधन, 2019)
अनुच्छेद – 16: लोक नियोजन में अवसर की समानता
  • अनु.16(1) व (2) – किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान, उद्भव व निवास (7 आधार) के आधार पर सार्वजनिक नियोजन (Public Employment) (सरकारी नौकरियों ) में भेदभाव नहीं किया जायेगा।
अनु. 16(3), 16(4), 16(5) व 16(6) – लोक नियोजन में अवसर की समता के अपवाद है।
  • अनु. 16(3) – सरकारी नौकरियों में संसद निवास स्थान के आधार भेदभाव की इजाजत दे सकती है। पर राज्य विधान मण्डल ऐसा नहीं कर सकता।
    • संसद विधि बनाकर निवास स्थान के आधार पर लोक नियोजन में प्राथमिकता दे सकता है। [हिमाचल प्रदेश, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक (98 वाँ सशोधन), अरुणाचलप्रदेश, त्रिपुरा, मणिपुर में निवास के आधार पर दे रखा है संसद द्वारा]
  • अनु. 16(4) – पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण/पिछड़े वर्ग ST/SC/OBC
    • यह आरक्षण कुछ शर्तों के अधीन मिलेगा –
      1. सामाजिक शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा हो।
      2. उस वर्ग का सार्वजनिक सेवाओ में पर्याप्त प्रतिनिधित्व ना हो। 
      3. प्रशासनिक दक्षता प्रभावित ना हो । 
        • 1901 में कोल्हापुर रियासत में शाहू जी महाराज ने आरक्षण दिया (सर्वप्रथम आरक्षण) 
        • ST/SC ➡️ साइमन कमीशन (1929) ने शब्द दिया 
        • मिलर कमीशन ➡️ 1895 में मैसूर राज्य ने पिछड़े वर्गों को प्रशासन व शिक्षा में आरक्षण 
        • ST/SC को लोक सभा व विधान सभा में आरक्षण क्रमशः अनु. 330 व 332 के तहत मिलता है।
        • [राजकुमार गिजरोया वाद (2016)-  आरक्षण में संबंध में [(समान अवसर देना) + लोक नियोजन में असमानता ख़त्म करना]
  • अनु. 16(4)A – S.C. व S.T. को सरकारी नौकरियों की पदोन्नति में आरक्षण
    • 77 वाँ संविधान संशोधन 1995 द्वारा add
  • [मुकेश कुमार बनाम उत्तराखंडवाद (2020) – सरकार का विवेकाधिकार , संवैधानिक कर्तव्य नहीं (पदोन्नति में )]
  • अनु. 16(4)B – बैक लॉग की भर्ती करते समय 50% की सीमा को क्रॉस किया जा सकता है।
    • 81 वें संविधान संशोधन 2000 द्वारा add
  • अनु. 16(5) – यह धर्म के आधार पर विभेद की राज्य को अनुमति देता है 
    • किसी धार्मिक संशा के किसी पदाधिकारी या सदस्य के रूप में किसी विशिष्ठ धर्म के लोगो को नियुक्त किए जाने का प्रावधान करता है।
  • अनु. 16(6) – आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) को सार्वजनिक नियोजन (सरकारी नौकरियों) में 10 प्रतिशत आरक्षण
  • 103वां संविधान संशोधन (2019) – आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) के लिए आरक्षण अनु. 15 (6) – शिक्षण संस्थाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण

OBC आरक्षण मुद्दा – 

राष्ट्रपति – 340 के तहत सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग व उनकी पहचान के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग बनाता है। 

1. काका कालेलकर आयोग – प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग। 1953 में बना। 1955 में Report दी।  

2. बी.पी.मण्डल आयोग – द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग। 1 जनवरी 1979 , 1980 में रिपोर्ट दी। 

  • OBC की चार आधार पर पहचान – सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व शैक्षणिक
मण्डल आयोग और उसके परिणाम :
मंडल आयोग की स्थापना
  • वर्ष 1979 में मोरारजी देसाई सरकार द्वारा
  • बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में गठित
  • अनुच्छेद 340 के अंतर्गत: सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान और सिफारिशें देने हेतु
आयोग की रिपोर्ट (1980)
  • 3743 जातियों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा माना
  • इनकी जनसंख्या लगभग 52% (SC/ST शामिल नहीं)
  • 27% आरक्षण की सिफारिश अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) के लिए
सरकार की कार्यवाही
  • 1990: वी.पी. सिंह सरकार ने 27% आरक्षण लागू किया
  • 1991: नरसिंह राव सरकार द्वारा दो संशोधन:
    • आर्थिक रूप से कमजोर OBC को प्राथमिकता
    • उच्च जातियों के गरीबों को 10% आरक्षण
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय – मंडल केस (Indra Sawhney Case, 1992)
  • OBC को 27% आरक्षण कुछ शर्तों के साथ वैध
  • क्रीमीलेयर को आरक्षण से बाहर किया जाए
  • आरक्षण केवल नियुक्ति के समय, प्रोन्नति में नहीं
  • कैरी फॉरवर्ड (backlog) नियम मान्य, पर 50% सीमा के भीतर
अस्वीकृत
  • आर्थिक आधार पर उच्च जातियों को 10% आरक्षण असंवैधानिक
  • कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए
निर्णयों के बाद उठाए गए कदम
  1. राम नंदन समिति (1993) – क्रीमीलेयर की पहचान हेतु
  2. OBC आयोग (1993) – सूची में नाम जोड़ने/निकालने का कार्य
  3. 76वां संशोधन (1994) – तमिलनाडु में 69% आरक्षण को नौवीं अनुसूची में डाला ताकि न्यायिक समीक्षा से बचे
  4. 77वां संशोधन (1995) – SC/ST को प्रोन्नति में आरक्षण का अधिकार
  5. 81वां संशोधन (2000) – बैकलॉग पदों में आरक्षण हेतु 50% सीमा हटाई गई
  6. 85वां संशोधन (2001) – प्रोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता की व्यवस्था

3. रोहिणी आयोग (2017) – 

  • तृतीया पिछड़ा वर्ग आयोग
  • OBC में उपवर्गीकरण व विभाजन स्वीकार 
इन्दिरा साहनी वाद (1993) – (मण्डलवाद – 1993)
  • सर्वोच्च न्यायलय की 9 न्यायाधीशों की पीठ ने निर्णय दिया। सर्वोच्च न्यायलय ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश MH. कानिया उस पीठ के अध्यक्ष थे।
  • बी.पी.मण्डल रिपोर्ट लागू – के विरुद्ध हुआ 
  • S.C. ने अपने निर्णय में अन्य पिछड़ा वर्ग की पहचान का आधार – ‘जाति’ को सही माना तथा V.P. Singh द्वारा केन्द्र में सरकारी नौकरियों में दिये आरक्षण (27 प्रतिशत) को भी सही माना।
  • साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्ते लगा दी – 
    1. O.B.C में नॉन – क्रिमिलेयर को ही आरक्षण
      • मलाईदार परत का सिद्धांत – O.B.C में नॉन – क्रिमिलेयर को ही आरक्षण मिलेगा। क्रिमीलेयर को नहीं।
      • क्रिमीलेयर की पहचान के लिए – 1993 में ‘राम नंदन समिति” गठन किया गया। 
      • फिर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) – 1993 बनाया गया।
        • (विधिक/सांविधिक आयोग)
        • 102 वाँ संविधान संशोधन 2018 द्वारा 338(B) के तहत NCBC को संवैधानिक दर्जा    
      • Only OBC पर लागू 
      • [जरनेल सिंह बनाम लक्ष्मीनारायण (2018)- क्रिमिलेयर ST/SC पर भी लागू किया जा सकता है। निर्णय राज्य सरकार लेवे।]
    2. आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं होगी। 
      • अपवाद 
        • तमिलनाडु – 76 वाँ संशोधन(1995) – 69% आरक्षण , 9वीं अनुसूची में add
        • बैकलॉग आरक्षण 50 % क्रॉस हो सकता है – 81 वाँ संशोधन(2000)
    3. प्रमोशन में आरक्षण  नहीं 
      • 77 वाँ संशोधन(1995)  – ST/SC को प्रमोशन आरक्षण 
      • obc नहीं 
      • 16(4)(A) add 
    4. विशेषज्ञता/परम विशेषज्ञता क्षेत्र में कोई आरक्षण नहीं 
    5. केवल 01 पद पर आरक्षण नहीं  
M. नागराज वाद बनाम भारत संघ (2006):- 
  • इसका संबंध Backlog आरक्षण से है। 
  • 76 वें संविधान संशोधन 1995 में तमिलनाडु राज्य के लिए 69% आरक्षण का प्रावधान कर उसे 9th अनुसूची में शामिल किया गया है।  
  • 77, 81, 82, 85 वाँ संशोधन को चुनौती दी गई थी ।
    • 77 वाँ संशोधन(1995) 
      • ST/SC को प्रमोशन आरक्षण
      • 16(4)(A) add
    • 81 वाँ संशोधन(2000)
      • बैकलॉग आरक्षण 50 % क्रॉस हो सकता है। 
      • 16(4)(B) add
    • 82 वाँ संशोधन(2000)
      • ST/SC को अहर्ता में अंकों की छूट – अनुच्छेद 335 में
    • 85 वाँ संशोधन(2002)
      • ST/SC को वरीयता के आधार पर प्रमोशन लाभ 
      • 16(4)(A) add

भारत की तीन प्रकार का आरक्षण है –

  1. शिक्षण संस्थानों में – अनुच्छेद 15(4), 15(5), 15(6)
  2. सरकारी नौकरियों में – अनुच्छेद 16(4), 16(4)A, 16(4)B, 16(6)
  3. राजनीतिक आरक्षण – अनुच्छेद 330, 331, 332, 333
    • अनुच्छेद 330 – इसके तहत  लोकसभा में SC/ST के लिए आरक्षण का प्रावधान है।
    • अनुच्छेद 331 – यदि राष्ट्रपति को ऐसा लगता है कि लोकसभा में आंग्ल – भारतीयों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है तो राष्ट्रपति दो आंग्ल भारतीयों को लोकसभा में मनोनीत करेंगे।
    • अनुच्छेद 332 – विधानसभा में SC / ST को आरक्षण।
    • अनुच्छेद 333 – राज्यपाल द्वारा विधानसभा में एक आंग्ल भारतीय का मनोनयन। 
  4. संविधान संधोधन 104 (2019) द्वारा अनु. 334 में संशोधन कर संसद ने लोक सभा व राज्य विधान सभा में अनुसूचित जाति व जनजाति का आरक्षण 10 वर्ष (2020-30) बढ़ा दिया है वहीं आंग्ल-भारतीयों का आरक्षण आगे नहीं बढ़ाया गया है। 
    • अनुच्छेद 334 – अनुसूचित जाति, जनजाति व आंग्ल आरक्षण 10 वर्ष में पुनर्परीक्षण
    • अनुच्छेद 335 – लोक सेवाओ में आरक्षण देते समय प्रशासनिक दक्षता का ध्यान
आंग्ल-भारतीय (Constitutional Definition)
  • “आंग्ल-भारतीय” उस व्यक्ति को कहा जाता है—
    • जिसके पिता या अन्य पुरुष पूर्वज (पुरुष प्रपिता) यूरोपीय मूल (European descent) के हों,
    • और वह व्यक्ति भारत के क्षेत्र में निवास करता हो,
    • तथा भारत में जन्मा हो,
    • और जो भारत में अस्थायी उद्देश्य से न रह रहा हो।
  • यह परिभाषा भारतीय संविधान की अनुच्छेद 366 (2) में दी गई है।
(अनुच्छेद – 17): अस्पृश्यता का निषेध
  • राज्य व नागरिकों के विरुद्ध 
  • अनुच्छेद – 35(A) (2) में संसद को यह शक्ति दी गयी है कि वह विधि द्वारा इस अपराध के लिए दण्ड विहित करे।
  • ‘अस्पृश्यता’ की परिभाषा न तो संविधान में दी गई है और न ही उपर्युक्त अधिनियम में।
अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 – 
  • अनुच्छेद 17 के तहत पारित कानून।
  • 1976 में इसका नाम बदला गया और इसे कहा गया
    • “नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (Protection of Civil Rights Act, 1955)”
नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (The Protection of Civil Rights Act, 1955): 
  • इस कानून के माध्‍यम से किसी भी रूप में अस्‍पृश्‍यता अर्थात् छुआछूत का आचरण करने वाले को दंड देने का प्रावधान है। वर्ष 1955 में अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 बनाया गया था। यह अधिनियम 1 जून, 1955 से प्रभावी हुआ था, लेकिन अप्रैल 1965 में गठित इलायापेरूमल समिति की अनुशंसाओं के आधार पर 1976 में इसमें व्यापक संशोधन किये गए तथा इसका नाम बदलकर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (Protection of Civil Rights Act, 1955) कर दिया गया था। यह संशोधित अधिनियम 19 नवंबर, 1976 से प्रभावी हुआ और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के अस्पृश्यता उन्मूलन संबंधी प्रावधानों के अनुरूप है।
  • जन अधिकार सुरक्षा अधिनियम (1955) के अंतर्गत छुआछूत को दंडनीय अपराध घोषित किया गया। 
    • इसके तहत 6 माह का कारावास या 500 रुपये का दंड अथवा दोनों शामिल हैं। 
    • जो व्यक्ति इसके तहत दोषी करार दिया जाए, उसे संसद या राज्य विधानमंडल चुनाव के लिए अयोग्य करार देने की व्यवस्था की गई।
(अनुच्छेद – 18): विशेष वर्गों को प्रदत्त राजकीय उपाधियों की समाप्ति। 

[अनु. 18 निदेशात्मक है, आदेशात्मक नहीं (उल्लंघन दण्डनीय नहीं) हालांकि संसद ऐसा कर सकती है।]

  • अनुच्छेद – 18(1): राज्य केवल सेना या विद्या (academic) संबंधी सम्मान के अलावा कोई उपाधि नहीं देगा।
  • अनुच्छेद – 18(2): भारत का नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई भी उपाधि प्राप्त नहीं करेगा।
  • अनुच्छेद – 18(3): कोई विदेशी नागरिक, यदि वह भारत में राज्य के अधीन किसी लाभ या विश्वास के पद पर है, तो राष्ट्रपति की अनुमति के बिना किसी विदेशी उपाधि को स्वीकार नहीं करेगा।
  • अनुच्छेद – 18(4): कोई व्यक्ति, जो राज्य के अधीन लाभ या विश्वास का पद धारण करता है, वह किसी विदेशी भेंट, उपलब्धि या पद को राष्ट्रपति की अनुमति के बिना स्वीकार नहीं करेगा।
  • बालाजी राघवन वाद (1996) में S.C.  ने कहा कि भारत रत्न, पद्म विभूषण, पदम्‌ भूषण, पदमश्री सम्मान / अलंकरण (Award) है, उपाधि (Titels) नहीं क्योंकि इनका प्रयोग किसी व्यक्ति के नाम के आगे या पीछे उपाधि की तरह नहीं किया जाता। 
  • पद्म विभूषण, पद्म भूषण एवं पद्म श्री पुरूस्कार – 
    • ये पुरस्कार उपाधि नहीं हैं तथा अनुच्छेद 18 में वर्णित प्रावधानों का इनसे उल्लंघन नहीं होता है। इस तरह ये समानता के सिद्धांत के प्रतिकूल नहीं हैं । हालांकि यह भी व्यवस्था की गई कि पुरस्कार पाने वालों के नाम के प्रत्यय या उपसर्ग के रूप में इनका इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, अन्यथा उन्हें पुरस्कारों को त्यागना होगा। 
    • इन राष्ट्रीय पुरस्कारों की संस्थापना 1954 में हुई। 
    • 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी ने उनका क्रम तोड़ दिया लेकिन 1980 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा उन्हें पुनः प्रारंभ कर दिया गया।
    • रोक – 1978, 1979 तथा 1993, 1997
    • K.M.मुंशी ने अनुच्छेद 18 का उल्लंघन कह कर पद्म श्री लेने से मना कर दिया था।  

स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)

(अनुच्छेद – 19): स्वतंत्रता का अधिकार जिसमें विचार अभिव्यक्ति, शान्तिपूर्ण सम्मेलन, अबाध विचरण, संगठन निर्माण, व्यापार एवं निवास संबंधी की स्वतंत्रता।
  • अनुच्छेद 19(1) सभी नागरिकों को 06 मूलभूत स्वतंत्रताओं के  अधिकारों की गारंटी देता है। (44 वाँ संविधान संशोधन से पहले 7 थी) 
  • 06 स्वतंत्रताओं की रक्षा केवल राज्य के ख़िलाफ़ मामलो में है, न कि निजी मामलो में। 
  • 19(1) में वर्णित स्वतंत्रताएं आत्यान्तिक या निर्बाध नहीं है अपितु इन अधिकारों पर राज्य अनुच्छेद 19(2), 19(3), 19(4), 19(5) व 19 (6) के द्वारा निम्न आधार पर ‘उचित प्रतिबंध’ लगा सकता है, जैसे:
    • भारत की संप्रभुता, एकता, सुरक्षा
    • सार्वजनिक व्यवस्था
    • नैतिकता
    • न्यायालय की अवमानना
19(1) – छ: प्रकार की स्वतंत्रताये
क्र.सं.अनुच्छेद युक्तियुक्त प्रतिबंध अनुच्छेद
119(1)(a)19(2)युक्तियुक्त निर्बन्धन शब्द add प्रथम संविधान संशोधन (1951)
219(1)(b)19(3)

युक्तियुक्त निर्बन्धन शब्द मूल संविधान से ही add 
319(1)(c)19(4)
419(1)(d)

19(5)
519(1)(e)
619(1)(g)19(6)
19(1)(f)44 वाँ संशोधन (1978) द्वारा समाप्त 
अनु. 19(1)(a) –  वाक्‌ व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • प्रेस की स्वतंत्रता 
    • संविधान सभा सदस्य K.T.शाह 19(1) में उल्लेख के हिमायती थे।
    • बृजभूषण वाद – सेंसरशिप लगाना 19(1)(a) का उल्लंघन 
    • राज्य बनाम चारुलता जोशी वाद(1999) – प्रेस की स्वतंत्रता absolute नहीं। क़ैदी का साक्षात्कार नहीं 
    • रोमेश थापर वाद (1950)- 1st संशोधन द्वारा तीन आधारो पर प्रतिबंध –
      1. विदेशी राज्यो के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध 
      2. लोक व्यवस्था  
      3. अपराध उद्धीपन
    • [भारत की प्रभुता और अखंडता शब्द 16 वाँ संशोधन (1963) द्वारा add]
    • अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) इंटरनेट के माध्यम से वाक् स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति 
  • राष्ट्रीय ध्वज फहराने की स्वतंत्रता 
  • मतदाता को सूचना का अधिकार 
  • सूचना का अधिकार
    • सूचना का अधिकार संविधान में कहीं भी उल्लेखित नहीं लेकिन – 
    • S.P. गुप्ता बनाम भारत संघ (1982)- सूचना का अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
    • सुभाष चंद्र अग्रवाल वाद (2019)- CJI, राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री भी RTI में लेकिन राजनीतिक दल नहीं 
  • उम्मीदवार के बारे में जानने व नोटा का अधिकार 
    • PUCL वाद (2003) + NOTA का अधिकार 
    • PUCL – पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल सर्विसेज  जे.पी.नारायण → NGO
  • इमैनुअल बनाम केरल राज्य वाद (1986)  
    • मौन/चुप रहने का अधिकार 
  • राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार 
    • नवीन जिंदल बनाम भारत संघ वाद (2004)
  • फोन टैपिंग के विरुद्ध अधिकार।
  • शांति का अधिकार। 
  • किसी अखबार पर पूर्व प्रतिबंध के विरुद्ध अधिकार। 
  • प्रदर्शन एवं विरोध का अधिकार, लेकिन हड़ताल व बंद का अधिकार नहीं।
  • अरुंधति रॉय वाद (2002)
    • न्यायालय की गरिमा हेतु रोक लगाया जा सकता है।  
  • सहारा इंडिया रियल स्टेट कारपोरेशन लिमिटेड (2012)
    • Open Trial absolute अधिकार नहीं है। 
वाक् अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध के आधार –
  • अनु.19(2) में कुल 8 युक्तियुक्त प्रतिबंध है।
  • मूल संविधान में अनुच्छेद  19(2) के तहत ‘युक्तियुक्त निर्बन्धन’ शब्द उल्लेखित नहीं थे, किन्तु पहले संविधान संशोधन (1951) द्वारा इस उपखण्ड में ‘युक्तियुक्त निर्बन्धन ‘ शब्द जोड़े गये। यद्यपि अनुच्छेद 19(3)(4)(5) और (6) में शब्द ‘युक्तियुक्त निर्बन्धन’ संविधान लागू होने के दिन से ही उल्लेखित थे
  • प्रतिबंध लगाने के आधार इस प्रकार हैं-भारत की एकता एवं संप्रभुता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मित्रवत संबंध, सार्वजनिक आदेश, नैतिकता की स्थापना, न्यायालय की अवमानना, किसी अपराध में संलिप्तता, मानहानि आदि। [अनु. 19 (2)]
  1. अनु. 19(1)(b) – शांतिपूर्ण व निरायुद्ध सम्मेलन की स्वतंत्रता।
    • दो आधारों पर प्रतिबंध लगा सकता है- 
    • भारत की एकता व अखंडता एवं लोक व्यवस्था, सहित संबंधित क्षेत्र में यातायात नियंत्रण। [अनु. 19 (3)]
  2. अनु. 19(1)(c) – संघ या संगम बनाने की स्वतंत्रता (Union, Association and Co-operative Societies)
    • राज्य द्वारा युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने के आधार हैं- [अनु. 19 (4)]
      • भारत की एकता एवं संप्रभुता
      • लोक व्यवस्था 
      • नैतिकता। 
        • 97 वाँ संशोधन (2011) – सहकारी समितियों का गठन मूल अधिकार 
  3. अनु. 19(1)(d) – भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र अंबाध संचरण की स्वतंत्रता
    • उचित प्रतिबंध लगाने के दो कारण हैं- [अनु. 19 (5)]
      • आम लोगों का हित 
      • किसी अनुसूचित जनजाति की सुरक्षा या हित। 
  4. अनु. 19(1)(e) – भारत के किसी भाग में निवास व बसने की स्वतंत्रता
    • उचित प्रतिबंध दो आधारों पर लगा सकता है- [अनु. 19 (5)]
      • विशेष रूप से आम लोगों के हित में 
      • अनुसूचित जनजातियों के हित में। 
  5. अनु. 19(1)(g) – वृत्ति, आजीविका, कारोबार की स्वतंत्रता
    • नोट: अनुच्छेद – 19 (1) में वर्णित स्वतंत्रताएँ आयरलैण्ड के संविधान ( 1937) व डेन्जिग स्वतंत्र नगर का संविधान (1922) से प्रेरित है।
    • राज्य सार्वजनिक हित में इसके प्रयोग पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है। [अनु. 19 (6)]
      • सोदन सिंह बनाम नई दिल्ली नगरपालिका (1989) – फुटपाथ पर व्यापार करना मूल अधिकार है।
    • अनु. 19(1)(f) – सम्पति अर्जन की स्वतंत्रता – इसे 44वें संविधान संशोधन – 1978 द्वारा 20.06.1979 को समाप्त कर दिया गया।
(अनुच्छेद – 20): अपराध के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण 
  • अनु. 20(1):  कार्योत्तर विधियों से संरक्षण (भूतलक्षी विधि)
    • कोई भी व्यक्ति उस कृत्य के लिए दंडित नहीं किया जाएगा:
      • जो कृत्य के समय अपराध नहीं था, लेकिन बाद में अपराध घोषित कर दिया गया। या, 
      • जिस पर उस समय जितनी सजा निर्धारित थी, उससे अधिक सजा बाद में नहीं दी जा सकती।  
  • अनु. 20(2):  दोहरे जोखिम या दण्ड का सिद्धांत 
    • एक व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए:
      • दो बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता
      • दो बार दंडित नहीं किया जा सकता
    • न्यायिक कार्यो पर लागू विभागीय कार्य पर नहीं 
  • अनु. 20(3):  आत्म अभिशंसन/दोषारोपण का सिद्धांत 
    • अभियुक्त व्यक्ति को:
      • स्वयं अपने खिलाफ साक्ष्य देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता
        • सेलवीवाद बनाम कर्नाटक (2000) – नार्को/पॉलीग्राफ/ब्रेनमैपिंग वर्जित 
        • मिस्टर X बनाम मिस्टर Z वाद (2002) – D.N.A  Test Valid 
(अनुच्छेद – 21): जीवन एवं दैहिक स्वतंत्रता
  • अनु. 21-  “किसी व्यक्ति को उसकी प्राण व दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है, अन्यथा नहीं।’ 
  • अम्बेडकर – “यह संविधान का मेरूदण्ड तथा मेग्नाकार्टा है।’
  • अनु. 20 व 21 –  44वें संविधान संशोधन – 1978 के बाद से राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपात (अनु. 352) के समय अनु. 359 के तहत निलम्बित नहीं किये जा सकते।

विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया 

विधि की उचित प्रक्रिया 

  • भारत में 
  • अमेरिका में 
  • जापान से लिया गया है 
  • प्राकृतिक न्याय समतुल्य 

ए.के . गोपालन बनाम मद्रास राज्य – (1950)

  • केवल कार्यपालिका की मनमानी के विरुद्ध संरक्षण 
  • विधानमंडल विधि द्वारा कर सकता है।
  • अनुच्छेद – 14,19,21

मैनका गांधी वाद – (1978)

  • विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया Just, Fair and Reasonable हो ।
  • नैसर्गिक स्वतंत्रता 
  • गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार 
  • अनुच्छेद – 14,19,21 की त्रिमूर्ति को मूल अधिकार की नाभि माना। 
  • निः शुल्क शिक्षा का अधिकार: अनुच्छेद 21(क)
    • अनुच्छेद 21क के अनुसरण में, संसद ने बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 अधिनियमित करके इस अधिनियम के अंतर्गत यह व्यवस्था है कि राज्य 6 से 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगा। 
    • मोहनी जैन बनाम कर्नाटक वाद (1992)के बाद 
    • यह व्यवस्था 86वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2002 के अंतर्गत की गयी है।
86वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2002 के बाद
मौलिक अधिकार नीति निदेशक तत्व मूल कर्तव्य 
Art. 21(क) जोड़ा गया Art. 45 में change Art. 51(क) जोड़ा गया
6 से 14 वर्ष अनिवार्य निः शुल्क शिक्षा (कक्षा 01 से 08)2002 से पूर्व ➤ 6-14 वर्ष 2002 के बाद  ➤ 0-6 वर्ष↓प्रारंभिक बचपन व निः शुल्क अनिवार्य शिक्षा 11 वाँ कर्तव्य 
2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम 
अप्रैल 2010 में RTE
  • ए.के . गोपालन बनाम मद्रास राज्य, (1950) – विधान मण्डल विधि द्वारा किसी व्यक्ति को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित कर सकता है। 
  • मैनका गांधी वाद – (1978)
    • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विधि की स्थापित प्रक्रिया को न्यायपूर्ण, उचित व युक्तियुक्त होना चाहिए। 
    • इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने मैनका गांधी वाद (1978) में गोपालन वाद (1950) के निर्णय को पलट दिया तथा ‘विधि की स्थापित प्रक्रिया’ के साथ-साथ अनु. 21 के तहत प्राकृतिक न्याय (नैसर्गिक न्याय के) महत्व देते हुए अमेरीका वाली विधि की “उचित प्रक्रिया’ को भी प्रति स्थापित कर दिया। 
    • मेनका वाद (1978) में अनु. 14, 19 व 21 की त्रिमूर्ति को मूल अधिकार की नाभि मानते हुए इन्हें परस्पर सम्बन्धित माना व गोपालन निर्णय को उलट दिया। (गोपालन में 14, 19, 21 को अलग-अलग माना) 
  • अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय द्वारा मेनका गांधी मामले (1978) के पश्चात विकसित विस्तारित अधिकारों की सूची –
    • मानवीय गरिमा के साथ जीवन का अधिकार
    • स्वच्छ जल और वायु सहित प्रदूषण-मुक्त पर्यावरण में जीने का अधिकार
    • जीवन रक्षा (Right to Livelihood)
    • निजता का अधिकार (Right to Privacy)
    • स्वास्थ्य का अधिकार
    • 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा का अधिकार (अब अनुच्छेद 21A में)
    • निःशुल्क कानूनी सहायता का अधिकार
    • त्वरित न्याय/सुनवाई का अधिकार
    • हथकड़ी लगाए जाने के विरुद्ध अधिकार
    • देर से फांसी पर रोक का अधिकार
    • निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार
    • सार्वजनिक फांसी के विरुद्ध अधिकार
    • सुनवाई का अधिकार (Audi Alteram Partem)
    • सूचना का अधिकार (Right to Information)
    • शयन का अधिकार (Right to Sleep)

अनुच्छेद – 21 से संबंधित महत्वपूर्ण वाद – 

  • ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला वाद (1976) – बंदी प्रत्यक्षीकरण व प्राण/दैहिक स्वतंत्रता से संबंधित 
  • हुसैन आरा ख़ातून वाद बनाम बिहार (1979) – 
    • मामले की वकील – पुष्पा हिंगोरानी (भारत की लोकहितवाद की जननी)
    • प्रथम P.I.L. शुरुवात 
    • त्वरित सुनवाई का अधिकार 
    • गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता पाने का अधिकार 
    • नोट : PIL प्रेरक – P.N. भगवती व वी.आर.कृष्ण अय्यर (न्यायधीश ) 
  • खेलगांव वाद (1982) –
    • न्यूनतम मजदूरी पाने का अधिकार 
  • ओलगा टेलिस वाद (1985) –
    • आजीविका का अधिकार 
  • परमानंद कटारा वाद (1989) – 
    • चिकित्सा सहायता पाने का अधिकार 
  • परमानंद कटारा वाद (1995) – 
    • मृत्युपरांत भी गरिमा का अधिकार 
  • सुभाष कुमार बनाम बिहार (1992) – 
    • प्रदूषण मुक्त जल व वायु का अधिकार 
  • मोहिनी जैन वाद (1992) – 
    • शिक्षा पाने का अधिकार 
  • उन्नीकृष्णन बनाम आंध्रप्रदेश वाद – 
    • अधिकार absolute नहीं 
  • ज्ञानकौर वाद (1996) – 
    • जीवन के अधिकार में मृत्यु का अधिकार नहीं 
  • M.C. मेहतावाद (1997) – 
    • स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार 
  • इंडिया स्टेटवारी कॉरपोरेशन (1997)  – 
    • आजीविका का अधिकार नहीं हालांकि मूल अधिकार नहीं लेकिन राज्य का कर्तव्य है। 
  • विशाखा बनाम राजस्थान स्टेट (1997) – 
    • कार्यस्थल पर महिला  उत्पीड़न  रोक 
  • नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन वाद (1996) – 
    • नागरिक व ग़ैर नागरिक दोनों को जीवन का अधिकार 
  • राजदेव शर्मा वाद (1998) – 
    • शीघ्र विचारण का अधिकार 
  • मुरली देवड़ा वाद (2001) – 
    • धूम्रपान निषेध सार्वजनिक स्थलों पर 
  • PUCL वाद (2000) – 
    • निः शुल्क खाद्य सामग्री पाने का अधिकार
  • PUCL बनाम भारत संघ वाद (2004) – 
    • फ़ोन टैपिंग- निजता का अधिकार का उल्लंघन
  • M.K. आचार्य वाद (2008) – 
    • विद्युत का अधिकार 
  • शुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन (2010) –
    • कोई महिला अपने बच्चे पैदा करे या नहीं उसका अधिकार है। 
  • रामलीला मैदान वाद (2012) – 
    • गहरी नींद लेने का अधिकार 
  • रत्ती राम वाद (2012) – 
    • निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार 
  • एनिमल वेलफेयर बोर्ड इंडिया बनाम ए.नागराजन (2014) – 
    • पशुओं के जीवन को भी जीवन के अधिकार में शामिल 
  • के.एस.पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) – 
    • सभी सेवाओ में आधार कार्ड अनिवार्यता समाप्त → निजता का अधिकार  
संविधान समीक्षा आयोग (2000) –
  • अटल बिहारी 
  • संविधान के कार्यकरण की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग (बैंकटचलैया आयोग) (2002)
  • गठन : फ़रवरी 2000 
  • रिपोर्ट : 31 मार्च 2000
  • अध्यक्ष: जस्टिस वेंकटचलैया।(Ret.CJI) 
  • निष्कर्ष: मूल ढाँचे का सिद्धांत संविधान की परिपक्वता के लिए बेहतर।
  • राज्यपाल की नियुक्ति एक समिति के द्वारा
  • निजता का अधिकार को अलग मूल अधिकार में शामिल की अनुशंसा
  • कॉमन कॉज बनाम भारत संघ वाद (2018) – गरिमापूर्ण मरने की अवधारणा मरने के बाद  
  • कॉमन कॉज → NGO
    • अरुणा शानबाग 
    • निर्णय – 09 मार्च 2018
      • passive (यूथेनेशिया) निष्क्रिय इच्छा मृत्यु ✔
      • active (यूथेनेशिया) इच्छामृत्यु ✗
      • लिविंग will
  • नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत सरकार (2018) 
    • यौन स्वायत्तता, यौन साथी चुनने, लैंगिकता का अधिकार
  • शहजादा पूनावाला बनाम भारत संघ (2018) –  
    • मॉब लिचिंग रोकना 
      • राजस्थान पहला जो कानून बनाया 
  • सबरीमाला केस (2018) –
    • मंदिरों में स्त्री पुरुष को समान रूप से प्रवेश का अधिकार 
  • शक्तिवाहिनी बनाम भारत संघ (2018) 
    • ऑनर किलिंग पर प्रतिबंध 
  • फाहिमा शरीन बनाम केरल (2019) 
    • Internet का उपयोग का अधिकार 
  • महान्यायवादी बनाम लिछमा देवी (1996) 
    • आम जानता के विरुद्ध फाँसी देने के विरुद्ध संरक्षण 
  • नीलवती बोहरा बनाम उड़ीसा (1993) 
    • पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु के विरुद्ध संरक्षण 
  • प्रेमशंकर बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) 
    • हथकड़ी लगाने के विरुद्ध संरक्षण 
    • (अनुच्छेद – 22):  निरोध एवं गिरफ्तारी से संरक्षण
  • निवारक निरोध- किसी व्यक्ति को अपराध करने से पहले ही संभावित खतरे के आधार पर रोकथाम हेतु हिरासत में लेना।
हिरासत के प्रकार
  1. दंडात्मक (Punitive) हिरासत:
    • अपराध सिद्ध होने पर दी जाती है।
    • अदालत में सुनवाई के बाद दोषी ठहराया जाता है।
  2. निवारक (Preventive) हिरासत:
    • केवल संदेह के आधार पर
    • उद्देश्य: अपराध को रोकना, दंड देना नहीं
    • व्यक्ति को बिना ट्रायल हिरासत में लिया जा सकता है।

अनुच्छेद 22 के दो भाग-

  1. सामान्य गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार (केवल भारतीय नागरिकों के लिए लागू)
    • गिरफ्तारी के कारण की जानकारी पाने का अधिकार
    • वकील से सलाह लेने और रक्षा का अधिकार
    • 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने का अधिकार
    • मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना अधिक समय तक हिरासत नहीं दी जा सकती
  2. निवारक हिरासत वाले व्यक्ति के अधिकार(नागरिक और विदेशी – दोनों पर लागू
    1. हिरासत 3 महीने से अधिक नहीं हो सकती, जब तक:
      • सलाहकार बोर्ड (High Court के न्यायाधीशों द्वारा गठित) उसकी पुष्टि न करे
        • सलाहकार बोर्ड 1- पीठासीन उच्च न्यायालय न्यायाधीश
        • सलाहकार बोर्ड 1 – कार्यरत/retired H.C. जज
    2. निरोध के कारण बताए जाने चाहिए, परंतु:
      • यदि सार्वजनिक हित में हानि हो, तो न बताने की छूट
    3. निरुद्ध व्यक्ति को प्रतिवेदन (representation) का अधिकार होता है
    4. संसद को अधिकार:
      • किन परिस्थितियों में 3 महीने से अधिक हिरासत संभव हो
      • सलाहकार बोर्ड द्वारा प्रक्रिया निर्धारण करने का अधिकार
44वां संविधान संशोधन अधिनियम (1978)
  • निरोध अवधि: 3 महीने से घटाकर 2 महीने की गई
  • लेकिन यह संशोधन लागू नहीं किया गया, आज भी 3 महीने की अवधि प्रभावी
    • निवारणात्मक कार्यवाही 
    • आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन का अवसर 
    • समवर्ती सूची विषय 
    • पंडित ठाकुर दास भार्गव – असफलताओं का शिरोमणि 
    • ए. के गोपालन वाद 1950 – सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 22(2) को ‘संविधान का एक भद्‌दा प्रावधान (Ugly Provision of the Constitution) कहा।
संसद ने अनु. 22 के तहत मिली शक्ति का प्रयोग कर निम्नाखित अधिनियम बनाये है-
  1. निवारक निरोध अधि. – 1950 – (1950 से 1969 तक रहा)
    • AK. गोपालन्‌ को इसी के तहत गिरफ्तार किया गया था।
  2. मीसा (MISA) (1971 से 1979 तक) (MISA – Maintenance of Internal Security act – 1971) – आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम।
    • यह कानून इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लाया गया था। 1975 की इमरजेन्सी में इनका खुब दुरूपयोग हुआ। लालू प्रसाद की बेटी मीसा भारती का नाम इसी से सम्बन्धित है। 
    • 1978 – जनता पार्टी ने इसे समाप्त कर दिया।
  3. राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NASA – National Securty Act – 1980) रासुका के नाम से चर्चित यह अधिनियम आज भी लागू है जो कि साम्प्रदायिक व जातीय दंगों को प्रेरित करने वाले पर लगता है।
  4. TADA – (1985-1995) –
    • Terriorist and Disruptive Activities (Prevention) Act – 1985 – संजय दत्त पर लगा 
    • तात्कालिक परिस्थितियाँ – पंजाब का आतंकवाद, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इन्दिरा गांधी की हत्या 
  5. POTA (2002-2004) – (Prevention Of Terrorist Act-2002) आतंकवाद निरोधी अधिनियम 
    • यह TADA के स्थान पर लाया गया था। 
    • अटल जी ने सयुंक्त अधिवेशन में पारित 
    • नोट: “अनुच्छेद 20,21,22 द्वारा व्यक्तिगत मौलिक स्वतन्त्रताओं की व्यवस्था की गई है”
  • ग़ैर कानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम – मूलतः 1967 में संशोधन पर प्रभावी – दिसंबर 2008 से 
  • COFEPOSA ( विदेशी मुद्रा संरक्षण व निवारण ) 1974
    • अवधि 02 वर्ष तक
  • PBMSECA – 1980 
    • चोर बाज़ारी निवारण और आवश्यक बस्तु प्रदाय अधिनियम – 1980
  • PITNDPSA – 1980
शोषण के विरूद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24) → राज्य व नागरिक दोनों के विरुद्ध 
(अनुच्छेद – 23): मानव के अवैध व्यापार, बल पूर्वक श्रम एवं शोषण का प्रतिषेध। 
  • मानव दुर्व्यापार, बेगार (बिना मजदूरी का कार्य), और अन्य बलात् श्रम पूर्णतः निषिद्ध।
  • यह प्रावधान नागरिक और गैर-नागरिक दोनों पर लागू होता है।
  • इसमें निजी व्यक्तियों द्वारा किए गए शोषण से भी संरक्षण शामिल है।
  • संसद द्वारा बनाए गए प्रमुख कानून:
    • अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956
    • बंधुआ मजदूरी (उन्मूलन) अधिनियम, 1976
    • न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948
    • समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976
    • अपवाद: राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों हेतु अनिवार्य सेवाएँ (जैसे- सैन्य सेवा) ले सकता है, बशर्ते भेदभाव न किया जाए।
    • बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम 2012 (पॉक्सो)-
      • बालकों के अधिकारों की रक्षा हेतु संसद ने बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 पारित किया फलस्वरूप 2009 में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग बनाया गया। यह आयोग संसदीय अधिनियमों से बना वैधानिक आयोग है ना कि संवैधानिक आयोग।
      • इसमें बालक की परिभाषा में 0-18 वर्ष तक के बालक है।
अनुच्छेद 23(1) – मानव का व्यापार, बेगारी, बलात श्रम निषिद्ध
  • बंधुआ मजदूर प्रणाली उन्मूलन अधिनियम (1976) 
  • दीना बनाम भारत संघ वाद (1983)
    • केदीयों को अपने काम हेतु उचित मजदूरी का हक 
  • न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (1984)
  • गुजरात राज्य वाद (1998)
    • कठोर कारावास से दंडित व्यक्ति से अनिवार्य शारीरिक श्रम बलात् श्रम नहीं
  • नीरजा चौधरी बनाम M.P.(1984)
    • बंधुआ मजदूर मुक्त कराना + पुनर्वास व्यवस्था 
  • बंधुआ मजदूर पुनर्वास योजना – 17 मई 2016 (केंद्र)
    • ↓अनुच्छेद 23(1) के अपवाद
अनुच्छेद 23(2) – राज्य सार्वजनिक प्रयोजन हेतु अनिवार्य श्रम निर्धारित कर सकता है –
  • बशर्ते यह – धर्म, मूलवंश, जाति, वर्ग – के आधार पर विभेद न हो।
(अनुच्छेद – 24): कारखानों में बालकों के नियोजन पर प्रतिबन्ध
  • 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक कार्यों या कारखानों, खानों आदि में नियोजित करना वर्जित है।
  • Absolute है (अपवाद नहीं है)
  • निर्दोष कार्यों में सीमित रूप से कार्य की अनुमति है (जैसे पारिवारिक मदद)।
  • संबंधित प्रमुख कानून:
    • बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 (अब संशोधित)
    • कारखाना अधिनियम, 1948
    • खान अधिनियम, 1952
    • शिशु अधिनियम – 1966
    • बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005
बाल श्रम उन्मूलन अधिनियम, 1986
  • 13 व्यवसाय Ban
  • अधिनियम का नया नाम: बाल एवं किशोर श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 ➔ 05 से 14 वर्ष के बालक पर अपराध 
  • उल्लंघन पर सजा:
    • पहली बार: 6 माह से 2 वर्ष की जेल या ₹20,000 – ₹50,000 जुर्माना
    • दोहराव पर: 1 से 3 वर्ष की जेल
बाल श्रम संशोधन अधिनियम, 2016
  • 14 वर्ष से कम बच्चों को सभी कार्यों में निषिद्ध। 
  • जोखिम भरा ना होने पर प्रतिषेध नहीं
    • पारिवारिक व्यवसाय 
    • बच्चे कलाकार के रूप में 
  • संगठित + असंघटित क्षेत्र पर लागू 
  • परिवार से जुड़े व्यवसाय को छूट – स्कूल के बाद only 03 hour ही
  • कलाकार के रूप में ➔ total 05 घंटे (बिना आराम के 03 घंटे की अनुमति)
  • उल्लंघन पर सजा:
    • पहली बार: 6 माह से 2 वर्ष की जेल या ₹20,000 -₹50,000 जुर्माना
    • दोहराव पर: 1 से 3 वर्ष की जेल
  • बंधुआ मुक्ति मोर्चा वाद (1997) – गलीचा उद्योग में बच्चे ✗
  • बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम – 2005

  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग बना – 2007
    • बालक – 0 से 18 वर्ष 
    • वैधानिक 
  • बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम -2012 (पॉक्सो)

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)

(अनुच्छेद -25): अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता
  • आयरलैंड के संविधान अनुच्छेद 44(2) से लिया गया। 
  • Absolute नहीं प्रतिबंध है  
  • सभी व्यक्तियों (नागरिक और गैर-नागरिक) के लिए लागू
  • धार्मिक स्वतंत्रता के चार घटक:
    • अंतःकरण की स्वतंत्रता
    • मानने का अधिकार
    • आचरण का अधिकार
    • प्रसार का अधिकार
  • प्रतिबंध के तीन आधार
    • लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य
  • हिंदुओं की धार्मिक संस्थाओ को हिंदुओं के सभी वर्गों के लिए खोलना 
  • राज्य द्वारा आर्थिक / वित्तीय / राजनैतिक / अन्य लौकिक (Secular) क्रियाकलाप से संबंध हो
    •  Secular शब्द – only उद्देशिका + Art. 25 (लौकिक)
  • कृपाण को सिख धर्म का हिस्सा माना गया → मोतीलाल नेहरू समिति (1928) की अनुशंसा  
  • हिंदुओं में सिख, बौद्ध व जैन भी सम्मिलित हैं।
    • स्टेंसलॉस बनाम M.P. वाद (1997) 
      • धार्मिक स्वतंत्रता में धर्म परिवर्तन नहीं 
    • अरुणा रॉय वाद (2002)
      • विधालयी शिक्षा में धार्मिक शिक्षा का अध्ययन संविधान की पंथनिरपेक्षता भावना विरुद्ध नहीं 
    • इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल (2010)
      • सबरीमाला महिला प्रवेश
    • शायराबानो बनाम भारत संघ ( 2017) के मामले में तीन तलाक (तलाक ए बिद्दत) पर रोक लगाई गई है। 
    • तीन तलाक कानून – मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम 
    • अधिनियम लागू  – 19 सितंबर 2018 से

लोक व्यवस्था (Public Order)

  • लोक व्यवस्था शब्द  → 19(2), 19(3), 19(4), 25(1), 26, 33(ख)
  • लोक व्यवस्था राज्य सूची का विषय → सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि -1
  • समवर्ती सूची की प्रविष्टि -3 →लोक व्यवस्था के आधार पर निवारक निरोध विधि संघ व राज्य बना सकते है।

लोक हित (Public Interest)

‘लोक हित’ शब्द

  • अनुच्छेद 22(b) – (निवारक निरोध) – प्राधिकारी लोक हित  के विरुद्ध समझे तो तथ्यों के लिए इंकार
  • अनुच्छेद 31(क), (ख), (ग) – लोक हित में संपत्ति रोक 
  • Art. 263 – राष्ट्रपति लोक हित की सिद्धि के लिए अंतर्राज्य परिषद की स्थापना 
  • Art. 302 – संसद लोकहित में व्यापार, वाणिज्य और कारोबार पर निषेध या प्रतिबंध हेतु विधि बना सकती है।
  • Art. 304 – कोई राज्य विधानमंडल विधि द्वारा लोक हित के आधार पर राज्यो के बीच व्यापार, वाणिज्य और कारोबार पर उचित कारण से प्रतिबंध लगा सकते हैं किंतु राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक।  
  • सातवीं अनुसूची – संघ सूची की प्रविष्ठि 52, 54, 56
    • संघ लोकहित में कानून बना सकती है।

(अनुच्छेद- 26): धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता

  • धार्मिक संस्थाओं की स्थापना और पोषण का अधिकार।
  • अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार।
  • संपत्ति प्राप्त और स्वामित्व का अधिकार।
  • संपत्ति का कानून अनुसार प्रशासन करने का अधिकार।
  • प्रतिबंध के तीन आधार
    • लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य
  • धार्मिक कार्यो के प्रबंध की छूट व्यक्तियों द्वारा स्थापित संस्थाओ को है, संसदीय अधिनियम से बनी संस्थाओ को नहीं। जैसे – अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को नहीं।    

(अनुच्छेद- 27): धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय से स्वतंत्रता

  • कोई भी व्यक्ति किसी विशेष धर्म के प्रचार में खर्च के लिए कर देने हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता।
  • राज्य करों का उपयोग किसी एक धर्म के पोषण/प्रचार में नहीं कर सकता। बिना भेदभाव के धार्मिक व लौकिक संस्थान को समान रूप से करता है तो उल्लंघन नहीं है।  
  • सभी धर्मों के प्रति राज्य की निष्पक्षता (secularism) सुनिश्चित होती है।
  • यह प्रावधान केवल करों पर लागू है, शुल्क (fees) पर नहीं।
  • उदाहरण:
    • तीर्थ यात्रियों से शुल्क लिया जा सकता है सुविधा हेतु।
    • धार्मिक समारोहों के प्रशासन हेतु शुल्क मान्य है।

(अनुच्छेद-28): धार्मिक शिक्षा में उपस्थित होने से स्वतंत्रता

  • अनुच्छेद 28 चार प्रकार की शैक्षणिक संस्थानों में विभेद करता है: 
  1. ऐसे संस्थान, जिनका पूरी तरह रख-रखाव राज्य करता है।
    • धार्मिक निर्देश पूरी तरह प्रतिबंधित हैं
  2. ऐसे संस्थान, जिनका प्रशासन राज्य करता है लेकिन उनकी स्थापना किसी विन्यास या न्यास के तहत हो। 
    • धार्मिक शिक्षा की अनुमति है
  3. राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान ।
    • स्वैच्छिक आधार पर धार्मिक शिक्षा की अनुमति है।
  4. ऐसे संस्थान, जो राज्य द्वारा वित्त सहायता प्राप्त कर रहे हों।
    • स्वैच्छिक आधार पर धार्मिक शिक्षा की अनुमति है।
  • बिना सहमति किसी व्यक्ति (या नाबालिग के संरक्षक) को धार्मिक शिक्षा/उपासना में भाग लेने हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता।
    • अरुणाराय वाद (2002) 
      • राष्ट्रीय करिकुलम फ्रेमवर्क विधालयी शिक्षा में मूल्य परक विकास के लिए 
    • कैथोलिक बिशप बनाम M.P. (2012)
      • नैतिक शिक्षा पर प्रतिबंध नहीं 
      • गीता तात्विक रूप से भारतीय दर्शन है ना की भारतीय धर्म पर 
संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)
  • यह अधिकार ‘एकता में विविधता का व बहुसंस्कृतिवाद का प्रतीक है। 
  • विदेशियों को नहीं 
  • अल्पसंख्यक हितों का संरक्षण 
(अनुच्छेद -29): अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण
  • अनु. 29(1) – भारत के प्रत्येक नागरिक को अपनी भाषा, लिपि व संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार है।
    • समूह अधिकार (Collective Right): एक समूह के अधिकारों की रक्षा करती है
    • यह अधिकार अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक दोनों को उपलब्ध है।
  • अनु. 29(2) शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश
    • राज्य की स्वयं की संस्थाओं या राज्य द्वारा पोषित संस्थाओं में प्रवेश के समय केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा।
    • व्यक्तिगत अधिकार (Individual Right): नागरिक के व्यक्तिगत सम्मान की रक्षा करती है फिर चाहे वह किसी भी समुदाय से संबद्ध हो।
(अनुच्छेद – 30): शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार    → पाठ्यक्रम निर्मित करने का अधिकार नहीं 
  • अनु. 30 केवल अल्पसंख्यकों हेतु है, बहुसंख्यकों हेतु नहीं।
  • अनु. 30(1) – धार्मिक व भाषीय अल्पसंख्यकों को अपनी रूचि अनुसार शिक्षण संस्थाओं की स्थापना का अधिकार है। इसका प्रशासन व प्रबन्ध करने का अधिकार है।
  • अनु. 30(2) – सरकार सहायता देते समय ऐसी संस्थाओं के मध्य भेदभाव नहीं करेगी।
  • RTI – 2009 अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओ पर लागू नहीं 
  • अल्पसंख्यक शब्द परिभाषित नहीं।  
  • अनुच्छेद 30(1A) – यदि राज्य किसी अल्पसंख्यक संस्था की संपत्ति का अधिग्रहण करता है, तो उचित क्षतिपूर्ति देनी होगी (44वां संविधान संशोधन, 1978)।
  • राज्य से सहायता पाने वाले अल्पसंख्यक संस्थानों के साथ विभेद नहीं किया जाएगा। 
  • तीन प्रकार की अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाएं:
    • राज्य से सहायता एवं मान्यता प्राप्त संस्थाएं – नियमों का पालन करना होता है।
    • केवल मान्यता प्राप्त, पर बिना आर्थिक सहायता – शिक्षण और प्रशासन में कुछ स्वतंत्रता।
    • न सहायता, न मान्यता प्राप्त संस्थाएं – कानूनी रूप से स्वतंत्र लेकिन सामान्य कानून जैसे श्रम, कर, ठेका इत्यादि लागू होते हैं।
  • कुछ महत्वपूर्ण सीमाएँ और शर्तें:
    • अनुच्छेद 30 के अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं हैं:
      • शैक्षणिक उत्कृष्टता सुनिश्चित करने के लिए राज्य नियमन (regulations) लागू कर सकता है।
      • कुप्रबंधन या प्रशासनिक अराजकता की स्थिति में राज्य हस्तक्षेप कर सकता है।
        • मो.रफीक बनाम कोताई रहमिया उच्च मदरसा प्रबंधन समिति एवम अन्य – 
          • 06 जनवरी 2020
          • अल्पसंख्यक संस्थाओ को विनियमित किया जा सकता है (सरकार द्वारा) (शिक्षा की उत्कृष्टता) 
          • अनु. 30(1) के तहत अल्पसंख्यको के अधिकार न तो निरपेक्ष है न ही कानून से ऊपर है।
        • सैंट स्टीफनकॉलेज बनाम दिल्ली विश्वविधालय – 
          • सरकारी सहायता प्राप्त  अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान, अपने विशिष्ट समुदाय के लिए 50 प्रतिशत सीटे आरक्षित कर सकता है।

अन्य महत्वपूर्ण-

  • (भाग 17 में अनुच्छेद 350 क में):- अल्पसंख्यक-वर्गों के बालकों को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास करेगा ।
  • (भाग 17 में अनुच्छेद 351):- हिंदी भाषा का विकास: संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामायिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम  न सके। 
  • ‘अल्पसंख्यक’ शब्द की परिभाषा संविधान में नहीं है।
  • इसका निर्धारण सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 द्वारा किया गया है।
  • अनुच्छेद 29 और 30 में अंतर:
    • अनुच्छेद 29 – सभी नागरिकों के एक अनुभाग को भाषा, लिपि, संस्कृति की सुरक्षा।
    • अनुच्छेद 30 – केवल धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार।
संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31)
  • (अनुच्छेद 31): के अनुसार, प्रारंभ में सम्पति का अर्जन एक मूल अधिकार था जो कि अनुच्छेद 31 की श्रेणी में आता था, को मूल अधिकार से हटा कर संविधान के भाग 12 के अध्याय 4 के तहत अनुच्छेद 300 (A) के अंतर्गत एक विधिक या कानूनी (Legal) अधिकार बना दिया गया।

मूल स्थिति (संविधान लागू होने पर)

बिंदुविवरण
अनुच्छेद 19(1) (F)प्रत्येक नागरिक को सम्पत्ति के अधिग्रहण व रखने की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 31नागरिकों एवं गैर-नागरिकों को बिना विधि के संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता; दो शर्तें – (1) अधिग्रहण सार्वजनिक उद्देश्य के लिए हो (2) मालिक को पर्याप्त हरजाना अनिवार्य

विवाद एवं संविधान संशोधन

बिंदु

विवरण

विवाद का कारण

संसद द्वारा भूमि सुधार व अधिग्रहण हेतु कानून, और न्यायपालिका द्वारा मूल अधिकार की सुरक्षा

प्रमुख संशोधन

  • प्रथम संविधान संशोधन 1951 – अनुच्छेद 31(A) व 31(B) जोड़ गये।
  • बेला बनर्जी वाद (1954)- मुवावजा हेतु 
  • चौथा संशोधन अधिनियम, 1955 – राज्य द्वारा भूमि सुधार, संपत्ति अधिग्रहण, और लोकहित से जुड़ी योजनाओं को न्यायिक हस्तक्षेप से मुक्त करना। अनुच्छेद 31, 31A, 305, 306, 19(1)(f) (अब निरस्त), 19(6) मुख्य रूप से प्रभावित अनुच्छेद है।  
  • 25वें संशोधन द्वारा 1971 में 31(C) नामक नया अनुच्छेद जोड़ा गया अनुच्छेद 31(C) में यह उल्लेखित है कि अनुच्छेद 39(b) व 39(c) को मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता दी जायेगी।
  • 40वां संशोधन अधिनियम, 1976– केंद्र सरकार को कुछ संसाधनों और क्षेत्रों पर विशेष नियंत्रण देना और न्यायिक समीक्षा को सीमित करना
  • 42 वें संशोधन द्वारा 1976 में अनुच्छेद 31C में यह प्रावधान किया गया कि सभी नीति – निदेशक तत्वों को मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता दी जायेगी।
    • ↓चुनौती
  • मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ(1980) 
    • उच्चतम न्यायालय ने इस विस्तार को शून्य कर दिया।
    • अनुच्छेद 39(b) व 39(c) तो प्राथमिकता सही लेकिन सभी नीति निर्देशक तत्व नहीं 
    • मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व पूरक + सामंजस्यता

जोड़े गए अनुच्छेद

अनुच्छेद 31A, 31B, 31C — राज्य को समाजवाद की दिशा में कानून बनाने की छूट

  • अनुच्छेद 31A– लोकहित में सरकार संपत्ति अधिग्रहीत कर सकती है।  
  • अनुच्छेद 31B– संपत्ति अधिग्रहीत कानून – न्यायालय में चुनौती नहीं।  नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों को न्यायिक समीक्षा से छूट
  • अनुच्छेद 31C – राज्य नीति के निदेशक तत्वों को लागू करने वाले कानूनों को मूल अधिकारों से बचाना (विशेषतः अनुच्छेद 39(b) व 39(c))
    • (अनुच्छेद 39(b) -समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार वितरित किया जाए कि आम हित की पूर्ति हो सके)
    • (अनुच्छेद 39(c) – राज्य को धन को कुछ हाथों में केंद्रित करने से बचना होगा।)

अनुच्छेद 31D 

  • राष्ट्र विरोधी क्रियाकलापों के संबंध में विधियों की व्यावृति 
  • 43 वाँ संशोधन 1977 द्वारा समाप्त
संपत्ति का अधिकार: विधिक अधिकार बना (44वां संशोधन, 1978)
बिंदुविवरण
मूल अधिकार से हटाया गयाअनुच्छेद 19(1)(च) और अनुच्छेद 31 को हटा दिया गया
नया प्रावधानअनुच्छेद 300A जोड़ा गया – “किसी व्यक्ति को विधि के अधिकार के बिना संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा।”
अधिकार का दर्जाअब यह एक संवैधानिक / विधिक अधिकार है, मूल अधिकार नहीं

विधिक अधिकार के रूप में विशेषताएँ

  • साधारण कानून द्वारा संशोधन संभव – संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं।
  • कार्यपालिका के विरुद्ध सुरक्षा – लेकिन विधायिका द्वारा बनाए गए कानून को चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • अनुच्छेद 32 के तहत रिट नहीं मिलेगी – केवल अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय जा सकते हैं।
  • हरजाने की कोई गारंटी नहीं – सरकार चाहे तो दे, चाहे तो नहीं दे।

दो अपवाद – जहां हरजाना अनिवार्य है: (जहां अब भी मूल अधिकारों के अंतर्गत मुआवजा सुनिश्चित है)

  1. अनुच्छेद 30 – अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की संपत्ति अधिग्रहण पर हरजाना अनिवार्य (जोड़ा गया – 44वां संशोधन, 1978)
  2. अनुच्छेद 31A – कृषि भूमि अधिग्रहण पर यदि कोई व्यक्ति स्वयं खेती करता है एवं भूमि सीमित दायरे में है, तो हरजाना मिलेगा (जोड़ा गया – 17वां संशोधन, 1964) 

संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

  • भाग -3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित करने के लिए उपचार है। 
  • भीम राव अम्बेडकर ने अनु. 32 को ‘संविधान का हृदय व आत्मा ‘ (Heart and soul) कहा है । डॉ. अम्बेडकर ने इसी अनुच्छेद को संविधान की प्राचीर (दीवार) की संज्ञा दी है। 
  • पूर्व मुख्य न्यायाधीश गजेंद्र गड़कर – प्रजातांत्रिक भवन की आधारशिला कहा।  
  • दरयाव बनाम U.P. स्टेट (1961) – S.C.की ड्यूटी- संरक्षक व गारंटर  

(अनुच्छेद -32): मूल अधिकारों के संरक्षण हेतु गांरटी, प्रभावी, सुलभ और संक्षेप उपचारों की व्यवस्था है।

  • अनुच्छेद 32(1): नागरिकों को यह अधिकार कि वे अपने मूल अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे उच्चतम न्यायालय में आवेदन कर सकते हैं।
    • कोच्चि बनाम मद्रास (1959) – याचिका लगाना स्वयं में ही एक मौलिक अधिकार 
  • अनु. 32(2) – उच्चतम न्यायालय मूल अधिकारों को लागू कराने के लिए (05 प्रकार) बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा व उत्प्रेषण रिट (समादेश) निकालने की शक्ति रखता है।
  • अनु. 32(3) – के तहत्‌ संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह S.C. के अलावा अन्य न्यायालयों को भी मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर याचिकाएँ जारी करने का अधिकार दे सकती है।
  • अनुच्छेद 32(4): जब तक संविधान अन्यथा न कहे, तब तक यह अधिकार निलंबित नहीं किया जा सकता।
    • लेकिन आपातकाल (Art. 359) के तहत राष्ट्रपति द्वारा स्थगन संभव।
  • अनुच्छेद 32 के अंतर्गत केवल मूल अधिकारों की ही गारंटी दी गई है, अन्य अधिकारों की नहीं, जैसे-गैर मूल संवैधानिक अधिकार, असंबैधानिक अधिकार, लौकिक अधिकार आदि।
  • सुप्रीम कोर्ट = मूल अधिकारों का संरक्षक और गारंटर
  • उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32 के तहत) एवं उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226 के तहत) रिट जारी कर सकते हैं। ये हैं–बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण एवं अधिकार पृच्छा।
बंदी प्रत्यक्षीकरण:
  • इसे लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘को प्रस्तुत किया जाए’/सशरीर उपस्थित करना। 
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट सार्वजनिक प्राधिकरण हो या व्यक्तिगत दोनों के खिलाफ जारी किया जा सकता है । 
  • यह रिट तब जारी नहीं किया जा सकता है जब यदि 
    1. हिरासत कानून सम्मत है। 
    2. कार्यवाही किसी विधानमंडल या न्यायालय की अवमानना के तहत हुई हो।
    3. न्यायालय के द्वारा हिरासत। 
    4. हिरासत न्यायालय के न्यायक्षेत्र से बाहर हुई हो।
  • बन्दीकरण से संरक्षण से संबंधित अनुच्छेद 22 है।
    • उसे बन्दी बनाने का कारण जानने का अधिकार है।
    • उसे इच्छानुसार स्वंय के लिए कानूनी सहायता प्राप्त करने का अधिकार दिया गया है।
    • 24 घण्टे के अन्दर बन्दी को न्यायाधीश के सम्मुख पेश किया जाना आवश्यक है। ये अधिकार शत्रु  देश के निवासियों एवं निवारक नजरबन्दी अधिनियम के तहत गिरफ्तार किये गये अपराधियों पर लागू नहीं होंगे
  • कानू सान्याल वाद (1974) – निरुद्ध व्यक्ति का न्यायालय के समक्ष सशरीर प्रस्तुत जरूरी नहीं 
  • ADM जबलपुर बनाम शशिकांत शुक्ला (1975)
परमादेश: 
  • इसका शाब्दिक अर्थ है ‘हम आदेश देते हैं ‘। 
  • यह एक नियंत्रण है, जिसे न्यायालय द्वारा सार्वजनिक अधिकारियों को जारी किया जाता है 
  • व्यक्ति + लोक प्राधिकारी + अधीनस्थ न्यायालय + सरकार 
  • सार्वजनिक कर्तव्यों को करने / अवैध रूप से न करने का आदेश 
  • परमादेश रिट जारी नहीं किया जा सकता-
    • निजी व्यक्तियों या इकाई के विरुद्ध, 
    • ऐसे विभाग जो गैर-संवैधानिक हैं, 
    • जब कर्तव्य विवेकानुसार हो, जरूरी नहीं, 
    • संविदात्मक दायित्व को लागू करने के विरुद्ध, 
    • भारत के राष्ट्रपति या राज्यों के राज्यपालों के विरुद्ध और 
    • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जो न्यायिक क्षमता में कार्यरत हैं। 
प्रतिषेध: 
  • इसका शाब्दिक अर्थ ‘रोकना/मना करना’। 
  • इसे किसी उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को या अधिकरणों को अपने न्यायक्षेत्र से उच्च न्यायिक कार्यों को करने से रोकने के लिए जारी किया जाता है।
  • प्रतिषेध संबंधी रिट सिर्फ न्यायिक एवं अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों के विरुद्ध ही जारी किए जा सकते हैं।  
  • रिट नहीं – यह प्रशासनिक प्राधिकरणों, विधायी निकायों एवं निजी व्यक्ति या निकायों के विरुद्ध उपलब्ध नहीं है। 

उत्प्रेषण:

  • इसका शाब्दिक अर्थ “प्रमाणित होना’ या ‘सूचना देना’ है। 
  • उत्प्रेषण की रिट सिर्फ न्यायिक या अर्ध न्यायिक प्राधिकरणों के खिलाफ ही जारी किया जा सकता है।
  • उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय, अधीनस्थ न्यायालयो से किसी भी विषय को अपने पास मँगवा सकता है। सूचना प्राप्त कर सकता है।   
  • रिट नहीं – यह विधायी निकायों एवं निजी व्यक्ति या निकायों के विरुद्ध उपलब्ध नहीं है। 
  • अन्तर
    • प्रतिषेध –
      • निर्णय देने से पूर्व या सुनवाई के दौरान जारी होती है।
      • यह न्यायिक त्रुटि रोकती है।
    • उत्प्रेषण
      • निर्णय देने के बाद जारी होती है।
      • यह त्रुटि सुधार करती है।

अधिकार पृच्छा

  • शाब्दिक संदर्भ में इसका अर्थ किसी ‘ प्राधिकृत या वारंट के द्वारा’ है। 
  • किस अधिकार से लोक पद को धारण कर रखा है। 
  • इसे न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक कार्यालय में दायर अपने दावे की जांच के लिए जारी किया जाता है।
  • रिट नहीं – मंत्रित्व कार्यालय / निजी कार्यालय 
  • ऐसे किसी भी इच्छुक व्यक्ति द्वारा जारी किया जा सकता है न की पीड़ित व्यक्ति द्वारा
रिट के संबंध में  सबंध में सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट में तुलना –
  • मूल अधिकारों के क्रियान्वयन के बारे में सर्वोच्च न्यायलय का न्यायिक क्षेत्र मूल तो है पर अनन्य नहीं। अर्थात H.C. के समवर्ती है। 
  • अनु.32 के तहत S.C केवल मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए रिट जारी कर सकती है जबकि H.C.-226 के तहत मूल अधिकारों के साथ-साथ अन्य संवैधानिक व सांविधिक अधिकारों की रक्षा हेतु भी रिट जारी कर सकती है। इस तरह उच्चतम न्यायालय के रिट संबंधी न्यायिक अधिकार, उच्च न्यायालय से कम विस्तृत हैं।
  • उच्चतम न्यायालय किसी एक व्यक्ति या सरकार के विरुद्ध रिट जारी कर सकता है,जबकि उच्च न्यायालय सिर्फ संबंधित राज्य के व्यक्ति या अपने क्षेत्र के राज्य को या यदि मामला दूसरे राज्य से संबंधित हो तो वहां के खिलाफ ही जारी कर सकता है। इस तरह रिट जारी करने के संबंध में उच्चतम न्यायालय का क्षेत्रीय न्यायक्षेत्र , ज्यादा विस्तृत है।
क्र.सं.अनुच्छेद 32अनुच्छेद 226
1S.C. द्वारा रिट जारी H.C. द्वारा रिट जारी
2S.C. में समावेदन करना संविधान द्वारा प्रत्याभूत H.C. द्वारा प्रत्याभूत नहीं 
3S.C.  रिट / निदेशन से इंकार नहीं जारी / इंकार कर सकता है 
4only मूल अधिकारों के लिए रिट Article 140 – संसद सुप्रीम कोर्ट को और अनुपूरक शक्तियाँ दे सकती है।मूल अधिकार + अन्य प्रयोजन हेतु भी रिट 
5मूलभूत ढाँचे का महत्वपूर्ण व अभिन्न भाग मूलभूत ढाँचे का अभिन्न भाग नहीं 
6S.C. का मूल अधिकार लेकिन अनन्य नहीं H.C. के समवर्ती है।  
7Article 139 – संसद सुप्रीम कोर्ट को कुछ भिन्न प्रयोजनो के लिए भी रिट का अधिकार दे सकती है।अंतरिम राहत उपलब्ध करवाने हेतु इंजंक्शन रिट जारी करता है 
लॉक्स स्टेण्डी – 
  • न्याय के लिए प्रभावित पक्ष ही आए । 
  • प्रक्रिया imporant ना की न्याय 
  • फिर PIL आ गई।
(अनुच्छेद- 33-34) : सशस्त्र बल एवं मूल अधिकार –
  • अनुच्छेद 33 व 34 मौलिक अधिकारों के अपवाद है। 
  • अनुच्छेद 33 व 34 अनुच्छेद 32 के अपवाद है। 
(अनुच्छेद-33): सशस्त्र बल एवं मौलिक अधिकार 
  • संसंद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस बलों, खुफिया एजेंसियों एवं अन्य के मूल अधिकारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सके।
  • अनुच्छेद 32 पर रोक 
  • इसके तहत –
    • सशस्त्र बलों – (सेना , वायु , नौ सेना)
    • लोक व्यवस्था बनाये रखने वाले बल → अर्धसैनिक बल (BSF, ITBP, CRPF) + राज्य पुलिस 
    • आसूचना ब्यूरो (I.B.)
    • ऐसे बलों से जुड़ी दूरसंचार प्रणाली  
  • इन्हे अनुच्छेद 32 के तहत संवैधानिक उपचार भी नहीं मिलता है।
विषयविवरण
उद्देश्यसशस्त्र बलों में अनुशासन बनाए रखना और संचालन में प्रभावशीलता
विधि निर्माण का अधिकारकेवल संसद को (राज्य विधानमंडल को नहीं)
कोर्ट में चुनौतीऐसे कानून को मूल अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती
किस पर लागू होता हैसशस्त्र बल, अर्धसैनिक बल, पुलिस, खुफिया एजेंसियां और उनके तकनीकी कर्मचारी (जैसे- नाई, बावर्ची, दर्जी आदि)
प्रमुख अधिनियमसैन्य अधिनियम 1950, वायुसेना अधिनियम 1950, पुलिस बल अधिनियम 1966 आदि
रिट अधिकार से अपवर्जनकोर्ट मार्शल जैसे सैन्य न्यायालय, रिट अधिकार से बाहर
(अनुच्छेद- 34): मार्शल लाॅ एवं मूल अधिकार 
  • मूल अधिकारों पर तब प्रतिबंध लगाता है जब भारत में कहीं भी मार्शल लाॅ लागू हो।
मार्शल लॉ (सैन्य कानून) 
  • ‘मार्शल लॉ’ का अर्थ सैन्य प्रशासन द्वारा नागरिक प्रशासन को संभालना
  • मार्शल लॉ कब – युद्ध, अशांति, दंगे जैसी असाधारण परिस्थितियों में
  • संसद द्वारा पारित अधिनियम पारित कर 
  • लक्ष्य- कानून व्यवस्था बनाए रखना । यह कानून एवं व्यवस्था के भंग होने पर उसे दोबारा निर्धारित करता है।
  • कानून की वैधता संसद के बनाए कानूनों को मूल अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती
  • यह सिर्फ मूल अधिकारों को प्रभावित करता है। 
  • यह सरकार एवं साधारण कानूनी न्यायालयों को निलंबित करता है। 
  • इसे देश के कुछ विशेष क्षेत्रों में ही लागू किया जा सकता है। 
  • इसके लिए संविधान में कोई विशेष व्यवस्था नहीं है। यह अव्यक्त है। 
  • कोर्ट का निर्णय – बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट निलंबित नहीं हो सकती
  • अनुच्छेद 34 (मार्शल लॉ) अनुच्छेद 352 (आपातकाल) से अलग है।
क्र.सं.अनुच्छेद 34 (मार्शल लॉ)अनुच्छेद 352 (आपातकाल)
1यह सिर्फ़ मूल अधिकारो को प्रभावित करता है । मूल अधिकार + केंद्र राज्य संबंधों को भी प्रभावित करता है । 
2कानून व्यवस्था भंग होने पर लगता है।  इसके तीन आधार है – 1. युद्ध   2.  बाह्य आक्रमण   3. सशस्त्र विद्रोह 
3देश के कुछ विशेष क्षेत्रो  में ही लागू होता है।  यह पूरे देश या उसके किसी हिस्से में लागू होता है।
4संविधान में इसकी स्पष्ट व्याख्या नहीं है ।इसकी है ।

अफस्पा (AFSPA) –

  • Armed forces special powers act -1958
  • केंद्र सरकार देश के सभी अशांत क्षेत्र में शांति स्थापना हेतु 
  • अशांत क्षेत्र घोषित → केंद्र / राज्य ✔
  • असम (1985) में। मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल, जम्मू और कश्मीर 
  • त्रिपुरा – 2015, मेघालय – 2018  → हटा लिया।

निवारक निरोध: 

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 के खंड- 3, 4 ,5 तथा 6 में तत्संबंधी प्रावधानों का उल्लेख है. निवारक निरोध कानून के अन्तर्गत किसी व्यक्ति को अपराध करने के पूर्व ही गिरफ्तार किया जाता है। निवारक निरोध का उद्देश्य व्यक्ति को अपराध के लिए दंड देना नहीं बल्कि उसे अपराध करने से रोकना है।

(अनुच्छेद- 35): कुछ मूल अधिकारों का प्रभाव 

  • (अनुच्छेद – 35): संसद को कुछ विशष मूल अधिकरों की प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है।
विषयविवरण
उद्देश्यमूल अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु केवल संसद को विशेष विधायी शक्तियाँ देना, ताकि देश में एक समानता सुनिश्चित की जा सके।
राज्य विधानमंडल को अधिकार नहींजिन विषयों पर अनुच्छेद 35 लागू होता है, उनमें राज्य विधानमंडल को कानून बनाने का अधिकार नहीं होता।
  1. संसद के पास (विधानमंडल के पास नहीं) निम्नलिखित मामलों में कानून बनाने का अधिकार होगाः
    • नियुक्ति में निवास संबंधी प्रतिबंध (अनुच्छेद 16(3))
      • किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश या स्थानीय निकायों में रोजगार हेतु निवास की योग्यता तय करने का अधिकार केवल संसद के पास।
    • अन्य न्यायालयों को रिट अधिकार से सशक्त करना (अनुच्छेद 32(3))
      • उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों को छोड़कर अन्य अदालतों को रिट जारी करने के अधिकार देने के लिए संसद ही कानून बना सकती है।
    • सशस्त्र बलों आदि के अधिकारों पर प्रतिबंध (अनुच्छेद 33)
      • संसद को शक्ति है कि वह सशस्त्र बल, अर्धसैनिक बल, पुलिस, खुफिया एजेंसियों आदि के मूल अधिकारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सके।
    • मार्शल लॉ के समय क्षतिपूर्ति कानून (अनुच्छेद 34)
      • मार्शल लॉ के अंतर्गत किए गए कृत्यों के लिए सरकारी अधिकारियों या अन्य व्यक्तियों को कानूनी संरक्षण या क्षतिपूर्ति देने का कानून केवल संसद बना सकती है।

नोट : 

  • संसद पर यह बाध्यता है कि वह इन विषयों पर कानून बनाए।
  • संविधान लागू होने के समय जो भी कानून इन विषयों से संबंधित प्रभावी थे, वे तब तक लागू रहेंगे जब तक संसद उन्हें संशोधित, निरस्त या प्रतिस्थापित नहीं कर देती।
  • अनुच्छेद 35 का उद्देश्य मूल अधिकारों की एकरूपता और प्रभावशीलता बनाए रखना है।

मूल अधिकारों के अपवाद – अनुच्छेद 31A, 31B, 31C

अनुच्छेद 31A – संपत्ति अर्जन से संबंधित विधियों की रक्षा
  • उद्देश्य – राज्य द्वारा भूमि सुधार और औद्योगिक पुनर्गठन जैसी नीतियों को लागू करना।
  • किस अधिकार से छूट – अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता के अधिकार) से छूट।
  • कवर की गई विधियों की श्रेणियाँ –
    • (अ) संपत्ति का अर्जन या अधिग्रहण।
    • (ब) संपत्ति का प्रबंधन लेना।
    • (स) औद्योगिक/व्यावसायिक निगमों का पुनर्गठन या विलय।
    • (द) निगमों के शेयरधारकों के अधिकारों की समाप्ति।
    • (इ) खनन पट्टों का संशोधन या समाप्ति।
  • विशेष स्थिति –
    • यदि कोई कानून राष्ट्रपति की सहमति से पारित हो, तो न्यायिक समीक्षा से भी छूट मिल सकती है।
    • किसान द्वारा सीमित सीमा के अंतर्गत प्रयोग की जा रही भूमि के अधिग्रहण पर बाजार मूल्य के अनुसार मुआवजा देना होगा।
अनुच्छेद 31B – नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों की वैधता की रक्षा
  • उद्देश्य – भूमि सुधार कानूनों को न्यायिक चुनौती से बचाना।
  • विस्तार – यह अनुच्छेद कहता है कि नौवीं अनुसूची में डाले गए कानून किसी भी मूल अधिकार का उल्लंघन करते हों, तो भी वे वैध माने जाएंगे।
  • विशेष बातें –
    • यह अनुच्छेद अनुच्छेद 13(2) के विपरीत है।
    • शुरू में केवल 13 कानून डाले गए थे, अब (2016 तक) 282 से अधिक हो चुके हैं।
  • महत्वपूर्ण निर्णयI.R. Coelho केस (2007)
    • 24 अप्रैल 1973 (केशवानंद भारती केस की तिथि) के बाद डाले गए कानूनों की न्यायिक समीक्षा संभव है।
    • यदि कोई कानून संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है, तो वह अवैध हो सकता है।
अनुच्छेद 31C – निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की रक्षा
  • उद्देश्य – समाजवाद से जुड़े निदेशक सिद्धांतों को लागू करने में मदद देना।
  • संरक्षित अधिकार – अनुच्छेद 14 और 19 से छूट दी जाती है।
  • कवर किए गए नीति-तत्व –
    • मूलतः अनुच्छेद 39 (ख) – भौतिक संसाधनों का सभी के लिए समान वितरण।
    • अनुच्छेद 39 (ग) – पूंजी का एकत्रीकरण रोकना।
  • महत्वपूर्ण निर्णय –
    • केशवानंद भारती केस (1973) – न्यायिक समीक्षा का अधिकार बना रहेगा।
    • 42वाँ संशोधन (1976) ने अनुच्छेद 31C का विस्तार कर संपूर्ण भाग IV को कवर करने की कोशिश की, लेकिन
    • मिनर्वा मिल्स केस (1980) – इस विस्तार को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया।

भाग 3 के बाहर अधिकार (Rights Outside Part III of the Constitution)

  • अनुच्छेद 265 (भाग 12)- कोई कर तब तक नहीं लगाया या वसूल किया जा सकता, जब तक कि उसके लिए कोई विधि न हो।
  • अनुच्छेद 300क (भाग 13)- व्यक्ति की संपत्ति केवल विधि द्वारा ही छीनी जा सकती है, अन्यथा नहीं।
  • अनुच्छेद 301 (भाग 13)- भारत के संपूर्ण क्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य और समागम (आवागमन) पर कोई अवरोध नहीं होगा।
  • अनुच्छेद 326 (भाग 15)- लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनाव 18 वर्ष से ऊपर के सभी नागरिकों द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे।

हालांकि अनु. 368 में वर्णित संविधान संशोधन विधि के तहत मूल अधिकारों में संसद द्वारा संशोधन हो सकता है। पर S.C. न्यायालय व संसद के मध्य वैचारिक भेद के कारण यह प्रक्रिया गैर विवादित नहीं रह सकी है।

क्या संसद मौलिक अधिकारों में परिवर्तन कर सकती है? इस संबंध में निम्नलिखित वाद (Case) प्रसिद्ध है –

  • शंकरीप्रसाद वाद -1951 – संसद मौलिक अधिकारों में परिवर्तन कर सकती है
    • ↓same decision
  • सज्जन सिंह वाद – 1965 – शंकरी प्रसाद वाद निर्णय ही दोहराया।
  • गोलखनाथ वाद – 1967 – 
    • संसद मूल अधिकारों में परिवर्तन नहीं कर सकती।  
    • संविधान संशोधन एक विधि and राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बना सकता। 
    • 11 सदस्यीय पीठ 
    • मुख्य न्यायाधीश – जे. सुब्बाराव।
      • ↓निर्णय पलट दिया
  • केशवानन्द भारती वाद – 1973
    • आज तक सबसे बड़ी संविधान पीठ (13 सदस्यीय) ने बहुमत से गोलखनाथ वाले निर्णय को पलट दिया 
    • संसद मूल अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में परिवर्तन कर सकती है। पर साथ ही मूल ढाँचे (Basic structure) का सिद्धांत दे दिया। 
    • मुख्य न्यायधीश – सर्व मित्र सीकरी
      • ↓निर्णय दोहराया
  • मिनर्वा मिल्सवाद – 1980 – केशवानन्द भारती वाद वाले निर्णय को दोहराया गया ।
    • अंबेडकर – भाग – 3 “सर्वाधिक विवादास्पद व आलोचित भाग”
    • करीम मो. छागला (J) – मौलिक अधिकार → सिपाही 
  • अनुच्छेद 352 के तहत जब राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो तो अनुच्छेद 358 व 359 राष्ट्रपति को यह अधिकार देते हैं कि वह मौलिक अधिकारों का निलम्बन कर दे।
  • अनुच्छेद 358  – राष्ट्रीय आपातकाल (युद्ध, बाहरी आक्रमण) की दशा में अनुच्छेद 358 के अनुसार अनुच्छेद 19 में दिये गये अधिकार स्वत: निलंबित हो जाते हैं । इस कारण राष्ट्रपति को पृथक्‌ से आदेश देने की आवश्यकता नहीं है।
  • अनुच्छेद 359 में उपबंध है कि जब राष्ट्रीय आपातकाल किसी भी कारण से लागू हो तो राष्ट्रपति एक पृथक्‌ घोषणा के माध्यम से एक या अधिक मौलिक अधिकारों को निलंबित कर सकता है। परन्तु अनुच्छेद 20 व 21 में दिये अधिकार किसी भी दशा में वापिस नहीं लिये जा सकते हैं।
    •  अनुच्छेद 20 व 21 किसी भी दशा में वापस नहीं (44 वाँ सशोधन)

संविधान के मूल ढांचे से संबंधित महत्वपूर्ण वाद एवम् तत्व

महत्वपूर्ण वाद 

मूल ढांचे के तत्व 

केशवानंद भारती v/s केरल राज्य (1973)

  1. संविधान की सर्वोच्चता
  2. विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच संबंध
  3. गणराज्य व लोकतांत्रिक स्वरूप
  4. धर्मनिरपेक्षता
  5. संघीय स्वरूप
  6. संप्रभुता व एकता 
  7. व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा
  8. कल्याणकारी राज्य
  9. संसद की संरचना प्रणाली

इंदिरा गांधी v/s      राजनारायण वाद (1975)

चुनावी मामला से विख्यात 

  1. कानून का शासन
  2. न्यायिक पुनरावलोकन
  3. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव

मिनर्वा मिल्स v/s भारत     संघ (1980)

  1. संसद की संविधान संशोधन की सीमित शक्तियाँ
  2. F.R. व D.P.S.P. के बीच सामंजस्य एवं संतुलन

भूमि सिंह v/s भारत संघ     (1981)

  • कल्याणकारी राज्य (सामाजिक – आर्थिक न्याय)

S.R. बोम्मई v/s भारत      संघ (1994)

  1. संघवाद
  2. धर्मनिरपेक्षता
  3. लोकतंत्र
  4. राष्ट्र की एकता एवम् अखंडता 
  5. सामाजिक न्याय
  6. न्यायिक पुनरावलोकन

आई.आर.कोएल्हो बनाम     तमिलनाडु राज्य वाद      (2007)

  • नवीं अनुसूची मामले में चर्चित
  • भाग -3 व भाग – 4 के मध्य उपबंधित संतुलन 

व्यापक सीमाएँ

  • मूल अधिकारों पर कई अपवाद, प्रतिबंध और शर्तें लागू हैं।
  • इस तरह आलोचकों ने इस बात का उल्लेख किया है कि एक तरफ तो संविधान मूल अधिकार प्रदान करता है और दूसरी तरफ उन्हें छीन लेता है
  • जसपत राय कपूर ने कहा: “इसे ‘मूल अधिकारों की सीमाएँ’ कहा जाना चाहिए।”
  • डॉ. अम्बेडकर ने भाग-3 को ‘ सर्वाधिक विवादास्पद व आलोचित’ भाग कहा।
  • न्यायधीश करीम मोहम्मद छागला – “हमारे संविधान में मौलिक अधिकारों की व्यवस्था सिपाही ‘ के दृष्टिकोण से की गयी है।’

सामाजिक और आर्थिक अधिकारों का अभाव

  • केवल राजनीतिक अधिकार प्रमुख हैं।
  • काम, सामाजिक सुरक्षा, आराम जैसे अधिकार नहीं हैं, जो रूस, चीन जैसे देशों में हैं।

स्पष्टता का अभाव

  • “लोक व्यवस्था”, “उचित प्रतिबंध”, “सार्वजनिक हित” जैसे शब्द अस्पष्ट हैं।
  • भाषा जटिल – आम व्यक्ति के लिए समझना कठिन।
  • आइवर जेनिंग्स: “यह वकीलों के लिए स्वर्ग है।”

स्थायित्व का अभाव

  • संसद इन्हें संशोधित या हटाने में सक्षम है (जैसे – संपत्ति का अधिकार हटाया गया)।
  • ‘मूल ढांचे का सिद्धांत’ न्यायपालिका द्वारा इसकी रक्षा करता है।

आपातकाल में स्थगन

  • राष्ट्रीय आपातकाल में अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़ अन्य अधिकार निलंबित किए जा सकते हैं।
  • लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को नुकसान।

महंगा न्यायिक उपचार

  • आम आदमी के लिए न्यायालय जाना महंगा।
  • मूल अधिकार अमीरों के लिए ज्यादा उपयोगी।

निवारक निरोध (Preventive Detention)

  • अनुच्छेद 22 राज्य को मनमानी शक्तियाँ देता है।
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित।
  • यह लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत।

दर्शन का अभाव

  • अधिकार किसी विशेष वैचारिक या दार्शनिक सिद्धांत पर आधारित नहीं हैं।
  • न्यायालयों को व्याख्या में कठिनाई।\
  1. लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला।
  2. व्यक्ति की भौतिक और नैतिक सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
  3. व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रक्षक हैं।
  4. विधि के शासन की स्थापना करते हैं।
  5. अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों की रक्षा करते हैं।
  6. धर्मनिरपेक्षता को मजबूती प्रदान करते हैं।
  7. सरकार पर नियंत्रण रखते हैं (चेक एंड बैलेंस)।
  8. सामाजिक समानता और न्याय की नींव रखते हैं।
  9. व्यक्तिगत गरिमा बनाए रखते हैं।
  10. राजनीतिक भागीदारी का अवसर देते हैं।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • केवल नागरिकों को प्राप्त मूल अधिकार, विदेशियों को नहीं:  –
    • अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30  
  • कुछ मूल अधिकार राज्य के अलावा व्यक्तियों के विरूद्ध भी है –
    • अनु. 15(2), 17, 23 व 24 
  • निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी उपलब्ध हैं – 
  • अनुच्छेद 15, 17, 18, 23, 24
  • भारतीय भूमि पर किसी भी राष्ट्रीयता वाले व्यक्ति पर लागू होते हैं- 
    • अनुच्छेद 14, 20, 21, 25 में हैं
  • ये नकारात्मक व सकारात्मक अभिव्यक्ति वाले दोनों है –
    • नकारात्मक – यानि राज्य की शक्ति पर निर्बन्ध/प्रतिबंध लगाते है उदा. अनु. 14/15/16/20/22
    • सकारात्मक – व्यक्तियों के लिए विशेष सुविधाओं की व्यवस्था। उदा.अनु. 21(A), 25, 29(1), 30(1)
  • एस. राधाकृष्णन – मूल अधिकारों के संबंध में
    • यह हमारे लोगो के लिए एक प्रतिज्ञा तथा सभ्य विश्व के साथ किया गया समझौता है।
  • जावेद बनाम हरियाणा राज्य 
    • दो या दो से अधिक संतान वाले लोगों को पाँच या सरपंच पद के लिये अयोग्य घोषित करने वाली विधि “विधि के समक्ष समता” (अनुच्छेद 14) के अधिकार का उल्लंघन नहीं करती है और एक विधि मान्य विधि है।
    • विवाहित / अविवाहित महिला को गर्भपात अधिकार – S.C. निर्णय सितंबर 2022 → गर्भधारण 20 से 24 सत्याग्रह 
    • (पहले only विवाहित के लिए ही था)  
  • बालाजी बनाम मैसूर राज्य – पिछले वर्ग के निर्धारण के लिए केवल जाति सुसंगत नहीं है । इसके लिए ग़रीबी, शिक्षा का स्तर, पेशा आदि भी महत्वपूर्ण 
  • वालसम्मा पाल बनाम कोचीन विश्वविद्यालय – किसी अनारक्षित वर्ग का व्यक्ति आरक्षित में परिवार में दत्तक, विवाह या अन्य किसी आधार पर प्रवेश पाने पर अनुच्छेद 15(4) व 16(4) के अंतर्गत आरक्षण का लाभ नहीं प्राप्त कर सकता है । 
  • देवासन बनाम भारत संघवाद – सरकार द्वारा बनाये गए carry forward के नियम को S.C. ने असंवैधानिक घोषित किया था। 
  • “नेमो डिवेट विस वेक्सारी” सिद्धांत – दोहरे संकेत के सिद्धांत से संबंधित है।    
  • ओमप्रकाश बनाम U.P. राज्य – ऋषिकेश महापालिका क्षेत्र में अंडे बेचने पर राज्य द्वारा लगाया गया प्रतिबंध साधारण जानता के हिट में युक्ति संगत माना। 
  • M.M. हासकाट बनाम महाराष्ट्र – निः शुल्क विधिक सहायता 
  • चमेली सिंह बनाम U.P. – आश्रय का अधिकार 
  • श्रीमती इबल बनाम महाराष्ट्र – जीने के अधिकार में मरने का अधिकार शामिल [धारा -309 आत्महत्या का अधिकार असंवैधानिक है ]
    • ↓same
  • पी.रतिराम बनाम भारत संघ –
    • ↓उल्टा
  • ज्ञानकौर बनाम पंजाब – जीवन का अधिकार में मरने का अधिकार शामिल नहीं 
  • गंगा व यमुना नदी को जीवित मानव का दर्जा – उत्तराखंड H.C. निर्णय 20 मार्च 2017 को 
  • निः शक्त व्यक्ति अधिकार विधेयक – 2016
    • श्रेणी 7 से 16 
    • आरक्षण – 3% से 4%
    • total – 2.2 % आबादी 
    • तेजाब पीड़ित भी श्रेणी में
  • आई.आर.कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य वाद (2007) – केशवानंद भारती के निर्णय के बाद (1973) अनुसूची 09 में शामिल अधिनियमों का न्यायिक पुनरावलोकन किया जा सकता है।  
  • प्रस्तावना में प्रयुक्त “समाजवाद” शब्द किन अनुच्छेद के आधार पर S.C. को समान कार्य के लिए समान वेतन को मौलिक अधिकार परिभाषित करने की शक्ति 
  • अनुच्छेद 19(1)(d) + 21 →  एकान्तता का अधिकार 
  • मजदूरी संहिता, 2019 में सम्मिलित 
    • न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 
    • बोनस भुगतान अधिनियम 
    • समान पारिश्रमिक अधिनियम
  • “क्या आप मुझे एक भी स्वतंत्र देश दिखा सकते हो जहाँ पृथक मताधिकार हो ?…….अंग्रेज़ जा चुके हो, परंतु वे शरारत छोड़ गए है।”
  • पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ – 1982
  • एशियाई खेल मामले, 1982 भी कहा जाता है ।
    • S.C.ने ‘बल’ को शारीरिक बल या विधिक बाल के साथ-साथ आर्थिक परिस्थितियाँ के करण उत्पन्न बल को भी शामिल किया है।
  • स्त्री तथा बालिका अनैतिक व्यापार दमन (संशोधन) अधिनियम (1956) → मूलतः है ।
    • अनैतिक दुर्व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956
  • मत देने का धिकार संवैधानिक एवम् वैधानिक है, मूल अधिकार नहीं ।  
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