भारतीय संविधान में वर्णित मूल कर्तव्य नागरिकों के उन नैतिक एवं नागरिक दायित्वों को दर्शाते हैं, जिनका पालन प्रत्येक भारतीय से अपेक्षित है। ये कर्तव्य संविधान के अनुच्छेद 51(A) में निहित हैं और अधिकारों के संतुलित प्रयोग हेतु मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय के अंतर्गत मूल कर्तव्य एक उत्तरदायी नागरिकता और सुदृढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- संविधान निर्माण के समय संविधान सभा ने मूल अधिकारों को तो शामिल किया, लेकिन मूल कर्तव्यों को आवश्यक नहीं समझा।
- नागरिकों से अपेक्षा की गई थी कि वे अपने कर्तव्यों का स्वतः पालन करेंगे।
- अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देशों के संविधान में नागरिकों के कर्तव्यों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इन देशों में नागरिकों के कर्तव्यों को नैतिक जिम्मेदारी माना गया है, न कि संवैधानिक दायित्व।
- जापान ऐसा एकमात्र प्रमुख लोकतांत्रिक देश है जिसके संविधान में नागरिकों के कर्तव्यों को स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है।

मूल कर्तव्य : परिचय
- भारतीय संविधान में वर्णित मूल कर्तव्य सोवियत संघ के संविधान से प्रेरित है।
- सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर संविधान में 42 वे संविधान संसोधन अधिनियम 1976 द्वारा संविधान में भाग 4 (A) व अनुच्छेद 51 (A) जोडा गया। जिसके द्वारा पहली बार संविधान में 10 मूल कर्तव्यों को जोड़ा गया था।
- 86 वें संविधान संशोधन 2002 के द्वारा अनुच्छेद 51(A) को संशोधित करते हुए 11वाँ मूल कर्तव्य जोड़ा गया।
- जो माता – पिता या संरक्षक हो वह छ; से चौदह वर्ष के नीचे की आयु के यथास्थिति अपने बच्चे अथवा प्रतिपालय को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करेगा।
- वर्तमान में 11 मूल कर्तव्य है।
- मूल कर्तव्यों के क्रियान्वयन के लिये संसद विधि बना सकती है। संविधान में सीधा यह नहीं लिखा कि “पालन न करने पर दंड मिलेगा”, लेकिन अनुच्छेद 245 और 246 के अंतर्गत संसद को ऐसे कानून बनाने की शक्ति है, जिनसे नागरिक अपने मूल कर्तव्यों का पालन करने के लिए बाध्य हों।
- संविधान सभा सदस्य के टी शाह संविधान में मूल कर्तव्यों को सम्मिलित करने के प्रबल पक्षधर थे।
- मूल कर्तव्य संविधान में नैतिक अनुशासन और राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए जोड़े गए हैं। ये भारतीय समाज को एकजुट करने का सांस्कृतिक व वैधानिक सेतु हैं।
सरदार स्वर्ण सिंह समिति व मूल कर्तव्य –
- स्वर्ण सिंह समिति ने संविधान में आठ मूल कर्तव्यों को जोड़े जाने का सुझाव दिया था, लेकिन 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा 10 मूल कर्तव्यों को जोड़ा गया।
- इस समिति की नियुक्ति कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष देवकान्त बरुआ द्वारा 26 फरवरी 1976 को की गई थी। इसमें 12 सदस्य थे-
- सरदार स्वर्ण सिंह (सभापति)
- ए. आर. अन्तुले (सदस्य सचिव)
- एस. एस. रे.
- रजनी पटेल
- एच आर गोखले
- वी ए सैयद मुहम्मद
- वी एन गाडगिल
- सी एम स्टीफ़न
- डी पी सिंह
- डी सी गोस्वामी
- वी वी साठे
- वी एन मुखर्जी
- रिपोर्ट – अगस्त 1976
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- नाम – “भारत के संविधान में प्रस्तावित संशोधन पर कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा नियुक्ति समिति की रिपोर्ट”
- इस समिति ने आठ मूल कर्तव्यों का उल्लेख किया था।
- समिति द्वारा दी गई कुछ सिफारिशों को कांग्रेस पार्टी द्वारा स्वीकार नहीं किया गया और इन्हें संविधान में शामिल नहीं किया गया। इनमें शामिल हैं: –
- यदि कोई नागरिक संविधान द्वारा निर्धारित किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता, तो संसद को यह अधिकार होना चाहिए कि वह आर्थिक दंड या अन्य सजा का प्रावधान करे।
- यदि कोई कानून मूल अधिकारों को लागू करने या मूल कर्तव्यों के पालन हेतु दंड देने के उद्देश्य से बनाया जाए, तो अदालत उसकी वैधता की समीक्षा न कर सके।
- कर देना (Tax Payment) नागरिकों का एक मूल कर्तव्य होना चाहिए।
सरदार स्वर्ण सिंह समिति के 8 मूल कर्तव्य
- संविधान तथा विधियों का पालन व आदर करना।
- देश की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता बनाये रखना।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करना।
- देश की रक्षा करना।
- साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संकल्प लेना।
- नीति निदेशक तत्वों का कार्यान्वयन में सहायता करना व लोगो के सामान्य हित में अभिवृद्धि करना , जिसमे सामाजिक आर्थिक न्याय के हितो में सहायक हो सके।
- हिंसा को दूर करना व सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा व रक्षा करना
- देश की विधि द्वारा जरूरी करो का भुगतान करना।
मूल कर्तव्य की विशेषतायें:
- कुछ मूल कर्तव्य नैतिक कर्तव्य हैं तो कुछ नागरिक कर्तव्य हैं।
- नैतिक कर्तव्य (जैसे: स्वतंत्रता संग्राम के उच्च आदर्शों का सम्मान)
- नागरिक कर्तव्य (जैसे: राष्ट्रीय ध्वज और गान का सम्मान करना)।
- मूल कर्तव्य केवल नागरिकों के लिए हैं न कि विदेशियों के लिए।
- निदेशक तत्वों की तरह मूल कर्तव्य गैर-न्यायोचित हैं। संविधान में सीधे न्यायालय के जरिए उनके क्रियान्वयन की व्यवस्था नहीं है।
- मूल कर्तव्य न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है इसी कारण से पूर्व मुख्य न्यायाधीश लाहोटी ने इन्हे शो पीस ‘ (Show Peace) एवं ‘मृत अक्षर’ (Dead Latters) कहा है।
- कर्तव्य भारतीय संस्कृति, परंपरा, पौराणिक मान्यताओं, और धार्मिक मूल्यों से जुड़े हैं।
वर्तमान में 11 मूल कर्तव्य है। (अनुच्छेद 51 (A)(a) से अनुच्छेद 51 (A)(k) तक)
- संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें।
- स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोये रखे और उनका पालन करें।
- भारत की प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करें और उसे अक्षुण्ण रखें।
- देश की रक्षा करें और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।
- भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करें जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो। ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरूद्ध है।
- हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्व समझें और उसका परीक्षण करें।
- प्राकृतिक पर्यावरण वन, झील, नदी और वन्य जीव की रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दयाभाव रखें।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।
- सार्वजनिक सम्पति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें।
- व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्षता की और बढ़ने का सतत् प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरन्तर प्रगति और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले।
- जो माता – पिता या संरक्षक हो वह छ: से चौदह वर्ष के नीचे की आयु के यथास्थिति अपने बच्चे अथवा प्रतिपालय को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करेगा। (यह कर्तव्य 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के द्वारा जोड़ा गया।)
नोट: राज्य के नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 51) :- अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि करना तथा राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखना
मूल कर्तव्यों की आलोचना
- CJI लाहोटी – शो पीस / मृत अक्षर
- दुर्गादास बसु – ये कर्तव्य प्रवर्तनीय नहीं है किंतु इस बात बात की अनदेखी नहीं की जा सकती।
- संविधान के भाग IV-क में उल्लिखित मूल कर्तव्यों की आलोचना निम्न आधारों पर की गई है:
कर्तव्यों की सूची अपूर्ण
- वर्तमान सूची में मतदान, कर अदायगी, परिवार नियोजन जैसे महत्वपूर्ण नागरिक कर्तव्य नहीं हैं। जबकि स्वर्ण सिंह समिति ने कर अदायगी को मूल कर्तव्य बनाने की सिफारिश की थी।
कई कर्तव्य अस्पष्ट और बहुअर्थी
- कुछ कर्तव्यों के शब्द जैसे:
- “उच्च आदर्श”,
- “सामासिक संस्कृति”
- “वैज्ञानिक दृष्टिकोण”
- आम नागरिक के लिए अस्पष्ट और समझने में कठिन हैं। इनकी विभिन्न व्याख्याएं हो सकती हैं।
गैर-न्यायोचित (Non-Justiciable) होने की आलोचना
- इन कर्तव्यों का न्यायालय में प्रवर्तन संभव नहीं है।
- इस कारण से इन्हें केवल नैतिक आदेश या सिर्फ़ उपदेशात्मक माना जाता है।
- स्वर्ण सिंह समिति ने इन्हें न निभाने पर अर्थदंड व सजा की सिफारिश की थी, जिसे लागू नहीं किया गया।
संविधान में अतिरेक (Redundancy)
- आलोचकों के अनुसार, संविधान में इनका समावेश अतिरेकपूर्ण (superfluous) है।
- ऐसा इसलिए कहा गया क्योंकि ये कर्तव्य उन नागरिकों पर भी लागू होते हैं जो संविधान की बारीकियों से परिचित नहीं हैं।
ग़लत स्थान पर सम्मिलित करना
- मूल कर्तव्यों को संविधान के भाग IV-क में जोड़ा गया,
- आलोचकों का मत था कि इन्हें भाग III (मूल अधिकारों) के बाद रखा जाना चाहिए था, जिससे वे अधिकारों के समकक्ष स्तर पर होते।
मूल कर्तव्यों का महत्व
हालाँकि मूल कर्तव्यों की आलोचना की गई है, फिर भी उनके अनेक सकारात्मक पक्ष हैं जो उन्हें भारतीय संविधान का एक अहम हिस्सा बनाते हैं। उनके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
अधिकारों के प्रयोग में चेतावनी का कार्य
- जब नागरिक अपने अधिकारों का प्रयोग करते हैं, तब मूल कर्तव्य उन्हें याद दिलाते हैं कि कर्तव्यों की भी समान रूप से महत्ता है।
- यह संतुलन लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर नियंत्रण
- ये कर्तव्य नागरिकों को राष्ट्रध्वज का अपमान, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, समाज विरोधी गतिविधियों जैसे कृत्यों से रोकते हैं।
- ये चेतावनी का कार्य करते हैं।
प्रेरणा और अनुशासन का स्रोत
- मूल कर्तव्य नागरिकों में अनुशासन, कर्तव्यबोध, और राष्ट्र निर्माण में भागीदारी की भावना विकसित करते हैं।
- इससे नागरिक केवल दर्शक नहीं, बल्कि भागीदार बनते हैं।
संवैधानिक व्याख्या में सहायक
- 1992 में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि यदि कोई कानून मूल कर्तव्यों से प्रेरित है, तो उसे अनुच्छेद 14 या 19 के अंतर्गत तर्कसंगत मानकर असंवैधानिकता से बचाया जा सकता है।
- इससे संवैधानिक व्याख्या में न्यायालय को दिशा मिलती है।
विधिक प्रवर्तन की संभावना
- यद्यपि मूल कर्तव्य गैर-न्यायोचित हैं, फिर भी संसद इनमें से किसी कर्तव्य के उल्लंघन पर कानून बना सकती है।
- जैसे: राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम, 1971 – राष्ट्रध्वज या राष्ट्रगान के अपमान पर दंड का प्रावधान।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विचार
- एच. आर. गोखले (तत्कालीन विधि मंत्री): – “आपातकाल की पूर्व संध्या पर लोगों ने विधिक व्यवस्था का सम्मान नहीं किया। मूल कर्तव्य विद्रोही प्रवृत्तियों को संयमित करने में सहायक होंगे।”
- इंदिरा गांधी (प्रधानमंत्री): “मूल कर्तव्य लोकतांत्रिक संतुलन बनाएंगे। ये केवल नैतिक आदेश नहीं बल्कि नागरिकों को कर्तव्य के प्रति सजग बनाएंगे।”
निष्कर्ष:
- मूल कर्तव्य भारतीय नागरिकों में कर्तव्य-बोध, राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक आदर्शों के प्रति सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने का कार्य करते हैं।
- वे अधिकारों के साथ संतुलन बनाकर लोकतंत्र को सशक्त बनाते हैं।
मूल कर्तव्य से संबंधित न्यायिक निर्णय
- नवीन जिंदल बनाम भारत संघ – राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान व गरिमा के साथ फहराने का अधिकार।
- एस. सी. मेहता बनाम भारत संघ – 1988 – न्यायालय ने निर्णय दिया की अनुच्छेद 51 क (G) के तहत केंद्र सरकार का यह कर्तव्य है कि वह देश के शिक्षण संस्थानों को सप्ताह में एक घंटा पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा देने का निर्देश दे।
- मूल अधिकार, नीति निदेशक तत्व व मूल कर्तव्य में अंतर्सम्बन्ध – यह तीनों आपस में अंतर्सबधित है तथा एक-दूसरे के पूरक है।
मूल कर्तव्यों के संबंध में विचार व्यक्त किये
नारायण अग्रवाल – गांधीयान कॉन्स्टिट्यूशन फॉर फ्री इंडिया (1946) में
राष्ट्रीय समीक्षा आयोग (2002) – दो मूल कर्त्तव add करने की सिफारिश की।
- मातृत्व-पितृत्व की भावना एवं पारिवारिक मूल्यों को प्रोत्साहित करना
- औधोगिक संघटनों का कर्तव्य – अपने कर्मचारियों के बच्चो को शिक्षा प्रदान करना।
- वर्मा समिति (1999) और मौलिक कर्तव्य
- इस समिति का गठन मौलिक कर्तव्यों को प्रभावी बनाने के तरीक़े सुझाने के लिए किया गया था।
- इसने पाया कि मौलिक कर्तव्यों का पालन तभी होगा, जब लोग उनके महत्व को समझेंगे और उन्हें रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपनाएँगे
- सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति जागरूकता के लिए शिक्षा के पाठ्यक्रम में सह शैक्षणिक गतिविधियां में संवैधानिक मूल्यों को आवश्यक रूप से सम्मिलित करना चाहिए।
- पुस्तकों में प्रस्तावना व मूल कर्तव्य हो ।
- पर्यावरण संरक्षण से संबंधित मूल कर्तव्यों को लागू करने हेतु अधिकारों पर सेवाएं आरोपती की जा सकती है।
- इस संदर्भ में समिति ने पहले से मौजूद कुछ कानूनों की पहचान की जो मूल कर्तव्यों को प्रभावी बनाने में सहायक हैं।
- राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 – यह कानून राष्ट्रीय प्रतीकों — संविधान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान — के अनादर को दंडनीय अपराध बनाता है।
- सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 – यह अधिनियम जाति और धर्म पर आधारित भेदभाव और अपराधों को रोकता है।
- भारतीय दंड संहिता (IPC) – यह प्रावधान करता है कि राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध पूर्वग्रह या घृणा फैलाने वाली बातें दंडनीय अपराध हैं।
- विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1976 – यह कानून सांप्रदायिक, विघटनकारी संगठनों को गैर-कानूनी घोषित करने की व्यवस्था करता है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 – यह अधिनियम उन प्रतिनिधियों को अयोग्य घोषित करता है जो:
- धर्म के आधार पर वोट मांगते हैं।
- जाति, भाषा, धर्म आदि के नाम पर भेदभाव फैलाते हैं।
- भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं।
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 – यह कानून दुर्लभ और संकटग्रस्त जीवों की सुरक्षा करता है, उनके व्यापार पर रोक लगाता है।
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 – यह अधिनियम वनों की अंधाधुंध कटाई और वनभूमि के गैर-वन उपयोग को रोकता है।
- वर्मा समिति (1999) और मौलिक कर्तव्य
निष्कर्ष:
- वर्मा समिति की इन टिप्पणियों से यह स्पष्ट होता है कि कई मौजूदा कानून पहले से ही मूल कर्तव्यों को लागू करने में सहायक हैं। आवश्यकता इस बात की है कि:
- इन कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
- नागरिकों को उनके कर्तव्यों की जानकारी दी जाए।
मूल कर्तव्य से संबंधित कानूनी प्रावधान
- सप्रतीक एवं नाम अधिनियम-1950- इसमें भारत के राजचिहन, राष्ट्रध्वज, मुद्रा के अनुचित प्रयोग का प्रतिषेध है।
- राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम- 1971
- भारतीय ध्वज संहिता 2002
