संघवाद एवं भारतीय संघीय व्यवस्था भारतीय संविधान की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जो केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन तथा संतुलन को सुनिश्चित करती है। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय के अंतर्गत यह समझना आवश्यक है कि भारतीय संघीय ढांचा एकात्मक झुकाव के साथ संघात्मक प्रणाली का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह व्यवस्था देश की विविधता में एकता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
संघवाद एवं भारतीय संघीय व्यवस्था Federalism

भारतीय संघीय शासन व्यवस्था :
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- भारत शासन अधिनियम, 1935 – इसमें संघीय शासन व्यवस्था की परिकल्पना की गई थी, परंतु रियासती राजाओं के सम्मिलित न होने से यह व्यवस्था लागू नहीं हो पाई।
- साइमन कमीशन (1927–28) और बटलर समिति (1927–30) – दोनों ने पूरे भारत के लिए संघीय संघ का समर्थन किया।
- केबिनेट मिशन योजना (1946) – इसमें एक ढीले-ढाले संघ का प्रस्ताव था, जिसमें अधिक शक्तियाँ राज्यों के पास होतीं।
- संविधान सभा – देश की तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए संविधान में एक ऐसी संघीय व्यवस्था बनाई गई जिसमें शक्तियों का पलड़ा राज्यों की अपेक्षा केंद्र की ओर झुका रहा।
- उद्देश्य प्रस्तावना एवं स्वतंत्रता अधिनियम, 1947
- पंडित नेहरू ने संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्तावना (Objective Resolution) प्रस्तुत की, जिसका लक्ष्य था –
- ऐसा संघ बनाना जिसमें घटक राज्य स्वायत्त इकाइयों के रूप में अवशिष्ट शक्तियों के साथ बने रहें।
- पंडित नेहरू ने संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्तावना (Objective Resolution) प्रस्तुत की, जिसका लक्ष्य था –
- न्यायिक व्याख्या
- एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा – भारतीय संविधान संघीय है और यह इसकी मूल विशेषता (Basic Structure) है।
- राज्यों का अपना संवैधानिक अस्तित्व है, वे केवल केंद्र के एजेंट या उपग्रह नहीं हैं।
- राज्यों के क्षेत्राधिकार में वे सर्वोच्च हैं।
- एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)
विभिन्न विद्वानों एवं विचारकों की राय
| विद्वान | भारतीय संघ की प्रकृति पर विचार |
| के.सी. व्हीयर | भारत अर्द्ध-संघात्मक (Quasi-Federal) है।”भारत मूलतः एकात्मक है जिसमें संघीय विशेषताएँ गौण हैं।” |
| डगलस वर्नी | गठबंधन सरकारों के दौर में भारतीय शासन अर्ध-परिसंघीय (Quasi-Confederal) प्रतीत होता है। |
| नॉर्मन डी. पामर | भारत “प्रशासनिक संघ” है क्योंकि संकटकाल में केंद्र राज्यों पर प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित कर लेता है। |
| सर आइवर जेनिंग्स | भारतीय संघ में “केन्द्रीयकरण की तीव्र प्रवृत्ति” पाई जाती है। |
| मोरिस जोन्स | भारत में “सौदेबाजी संघवाद” (Bargaining Federalism)। |
| पॉल एच. एपलबी | भारत “अत्यन्त संघीय” (Extremely Federal) है। |
| के. सन्थानम | भारत “परमोच्च संघवाद” (Paramount Federation) है। |
| चार्ल्स टार्लटन | भारतीय संघवाद “विषम संघवाद” (Asymmetric Federation) है। |
| ग्रेनविल ऑस्टिन | भारत में “सहकारी संघवाद” (Cooperative Federalism) है।संविधान सभा ने सर्वसम्मति से “सुखद संघ” (Amicable Union) का निर्माण किया।केंद्र और राज्य दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। |
| एम.वी. पायली | “भारत का संविधान संघात्मक ढाँचा रखता है, किंतु आत्मा एकात्मक है।” |
| डॉ. भीमराव आंबेडकर | शांतिकाल में संविधान संघीय है।आपातकाल में यह एकात्मक (Unitary) हो जाता है। |
| डॉ. राजेंद्र प्रसाद | इसे संघीय या एकात्मक जो भी कहें, जब तक संविधान उद्देश्यों की पूर्ति करता है नाम का कोई महत्व नहीं। |
| एस. के. चौबे | भारतीय संघ के बारे में दो भ्रांतियाँ दूर करना आवश्यक है :भारतीय संघ का गठन राज्यों के समझौते से नहीं हुआ, बल्कि केंद्रीकृत ब्रिटिश शासन से विकसित हुआ।अमेरिकी संघ भी समझौते से नहीं बल्कि 1787 के फिलाडेल्फिया संविधान सम्मेलन द्वारा विकसित हुआ। |
| पीटर रोनाल्ड डिसूजा | 73वाँ संविधान संशोधन लोकतंत्र की “दूसरी हवा” है।स्थानीय शासन संघवाद के विकास में नया प्रयोग है। |
- भारतीय संविधान में संघात्मक और एकात्मक दोनों तत्व मौजूद हैं।
- इसकी विशेषता है – संघात्मक ढाँचा, एकात्मक प्रवृत्ति।
- भारतीय संघ न तो पूर्णतः अमेरिकी संघीय मॉडल जैसा है और न ही पूर्णतः एकात्मक।
- यह एक विशिष्ट भारतीय संघवाद है, जो सहकारी, विषम, अर्द्ध-संघात्मक और कभी-कभी अर्ध-परिसंघीय रूप में दिखाई देता है।
भारत में संघवाद के प्रकार
केन्द्रीकृत संघवाद – 1952 से 1967
- यह काल कांग्रेस के प्रभुत्व का था – केंद्र और राज्यों में एक ही पार्टी की सरकारें थीं।
- केंद्र ने नीति निर्माण व योजना आयोग के माध्यम से राज्यों पर प्रभुत्व बनाए रखा।
- राज्यों के अधिकार सीमित और केंद्र के निर्णय सर्वोपरि थे।
- केंद्र व राज्यों में सत्ता का संतुलन अपेक्षाकृत सामंजस्यपूर्ण रहा, विवाद कम हुए।
- विशेषता – एकदलीय प्रभुत्व के कारण शक्ति का केंद्रीकरण।
सहयोगात्मक संघवाद – 1967 से 1971
- 1967 के चुनावों के बाद 8 राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ।
- केंद्र और राज्यों दोनों में अस्थिरता रही – न तो केंद्र सशक्त था, न ही राज्य।
- केंद्र की कांग्रेस सरकार गुटबाजी से कमजोर थी और राज्यों की साझा सरकारें भी स्थायित्व पाने के लिए संघर्षरत थीं।
- केंद्र और राज्यों में क्षैतिज (horizontal) सहयोग का प्रयास हुआ।
- राज्यों ने अधिक स्वायत्तता की मांग उठाई।
- बंगाल व तमिलनाडु जैसे राज्यों ने अधिक स्वायत्तता की माँग उठाई।
- यह संघवाद सहमति और आपसी मदद पर आधारित था।
- विशेषता – केंद्र और राज्य क्षैतिज संबंध रखते हुए एक-दूसरे की मदद करते हैं।
एकात्मक संघवाद – 1971 से 1977
- इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का पुनः केंद्रीयकरण।
- 42वाँ संविधान संशोधन (1976) – ‘लघु संविधान’, जिसने केंद्र की शक्तियाँ बढ़ाईं।
- राज्यों के मुख्यमंत्री ‘कठपुतली’ बन गए।
- संसदीय शासन प्रधानमंत्रीय शासन में परिवर्तित हो गया।
- न्यायपालिका और विपक्ष को भी कमजोर किया गया।
- विशेषता – संघीय ढाँचा वास्तविक रूप से एकात्मक बन गया।
सौदेबाजी का संघवाद (Bargaining Federalism) – 1990 से 2014
- 1990 के दशक में गठबंधन राजनीति और उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण का दौर शुरू हुआ, केंद्र का प्रभुत्व घटा।
- क्षेत्रीय दलों और राज्यों की सौदेबाजी की शक्ति बढ़ी।
- राज्य सरकारें विशेष दर्जा, अधिक संसाधन, बजट आवंटन, केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व आदि की मांग करती थीं।
- केंद्र के निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ा।
- उदाहरण –
- 1998 की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर ममता बनर्जी और जयललिता का दबाव।
- 2004–09 में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार पर वामदलों व लालू यादव का प्रभाव।
- विशेषता – समझौते और सौदेबाजी के माध्यम से केंद्र–राज्य संबंध।
प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद (Competitive Federalism) – 2014 के बाद
- 2014 में मोदी सरकार ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभाली।
- नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा ‘सहकारी और प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद’ की अवधारणा को बल।
- नीति आयोग का गठन हुआ – योजना आयोग समाप्त।
- राज्य आपस में और केंद्र के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में लगे हैं।
- कार्यक्रमों जैसे – स्वच्छ भारत, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया आदि के माध्यम से राज्य प्रदर्शन के आधार पर रैंकिंग प्राप्त करते हैं।
- उद्देश्य: बेहतर सेवा वितरण और विकास के लिए प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना।
राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism)
- इसे वित्तीय संघवाद भी कहा जाता है।
- इसका संबंध केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व और व्यय के वितरण से है।
- कराधान, अनुदान, निधियाँ आदि इसके अंतर्गत आते हैं।
- 2016 में 101वाँ संविधान संशोधन – GST और GST परिषद का गठन – केंद्र और राज्य दोनों की साझेदारी।
- यह संघवाद के आर्थिक पक्ष को मजबूत करता है।
- विशेषता – केंद्र और राज्यों दोनों को वित्तीय निर्णयों में साझेदारी।
विषम या असममित संघवाद
- यह संघवाद की ऐसी व्यवस्था है जहाँ कुछ राज्यों को विशेष दर्जा दिया गया है।
- भाग XXI (21) – विशेष प्रावधान
- अनुच्छेद 371 से 371J तक – जैसे नागालैंड, मणिपुर, सिक्किम, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक आदि को विशेष प्रावधान।
- संविधान की 5वीं और 6वीं अनुसूचियाँ – अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय इलाकों में विशेष स्वायत्तता।
- विशेषता – भारत की नृजातीय, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को संवैधानिक संरक्षण देना।
निष्कर्ष
- भारतीय संघवाद समय और परिस्थितियों के अनुसार रूप बदलता रहा है –
- प्रारंभ में केंद्रीकृत और एकात्मक झुकाव वाला।
- 1967 के बाद सहयोगात्मक और सौदेबाजी प्रवृत्ति वाला।
- 2014 के बाद प्रतिस्पर्धी व सहकारी संघवाद की दिशा में।
- वित्तीय व विषम संघवाद इसकी लचीली और विशिष्ट भारतीय विशेषताएँ हैं।
- इस प्रकार, भारतीय संघवाद गतिशील (Dynamic), लचीला (Flexible) और बहुआयामी (Multi-dimensional) स्वरूप का है।
सरकार के स्वरूप का वर्गीकरण
- राजनीति शास्त्रियों ने राष्ट्रीय सरकार और क्षेत्रीय सरकार के आपसी संबंधों के आधार पर सरकार को दो भागों में विभाजित किया है:
- एकात्मक सरकार (Unitary Government)
- संघात्मक सरकार (Federal Government)
एकात्मक सरकार
- वह व्यवस्था जिसमें सभी शक्तियाँ एक ही केंद्रीय सरकार में निहित होती हैं।
- उदाहरण: ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, चीन, इटली, बेल्जियम, नॉर्वे, स्वीडन, स्पेन आदि।
संघात्मक सरकार
- वह शासन व्यवस्था जिसमें शक्तियाँ संविधान द्वारा केंद्र और राज्यों के बीच विभाजित होती हैं।
- दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने क्षेत्राधिकार में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।
- उदाहरण: अमेरिका, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, ब्राज़ील, अर्जेंटीना आदि।
भारत में संघीय शासन व्यवस्था
- भारत ने संविधान में संघीय सरकार की व्यवस्था को दो कारणों से अपनाया:
- देश का बड़ा भौगोलिक आकार
- सांस्कृतिक एवं सामाजिक विविधता
- इससे केंद्र मजबूत होता है, परंतु राज्यों को स्वायत्तता भी मिलती है।
- संविधान में कहीं भी ‘संघीय’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। अनुच्छेद 1 में भारत का उल्लेख ‘ राज्यों के संघ’ के रूप में किया गया है।
- इसके दो अभिप्राय हैं –
- भारतीय संघ राज्यों के बीच हुए किसी समझौते का निष्कर्ष नहीं है।
- किसी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है। अर्थात् भारतीय संघ विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ है। (राज्यो का अस्तित्व संघ पर निर्भर है, संघ को नष्ट नहीं किया जा सकता है।
- इसके दो अभिप्राय हैं –
भारत में संघवाद का विकास
- संघवाद के विकास के कारण:
- क्षेत्रीय दलों का उदय (1967): राज्यों के विशेष मुद्दों पर ध्यान देने वाले क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ा।
- जनता पार्टी का गठन (1977): इसमें क्षेत्रीय नेताओं की भूमिका अधिक प्रभावशाली रही।
- गठबंधन की राजनीति: केंद्र में बहुमत न होने पर राज्यों को अधिक अधिकार व महत्व मिला।
- 1991 के आर्थिक सुधार:
- राज्यों की केंद्र पर निर्भरता कम हुई।
- राज्यों के वित्तीय संसाधन बढ़े।
भारतीय संघ में संघात्मकता के लक्षण
द्वैध शासन प्रणाली (Dual Polity)
- भारत में दो स्तरों की सरकार है – केंद्र और राज्य।
- दोनों को अपने-अपने कार्यक्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अधिकार है।
- केंद्र सरकार: राष्ट्रीय महत्व के विषय (जैसे रक्षा, विदेश नीति, संचार आदि)।
- राज्य सरकार: क्षेत्रीय महत्व के विषय (जैसे कृषि, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था आदि)।
लिखित संविधान (Written Constitution)
- भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है।
- इसमें केंद्र और राज्यों की शक्तियों तथा कार्यक्षेत्रों का स्पष्ट उल्लेख है।
- तीनों अंगों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) की सीमाएँ परिभाषित हैं।
शक्तियों का विभाजन (Division of Powers)
- संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत तीन सूचियाँ:
- केंद्र सूची (Union List) – 100 विषय (जैसे रक्षा, मुद्रा, विदेशी संबंध)।
- राज्य सूची (State List) – 61 विषय (जैसे पुलिस, कृषि, स्वास्थ्य)।
- समवर्ती सूची (Concurrent List) – 52 विषय (जैसे शिक्षा, वन, विवाह)।
- समवर्ती सूची में टकराव की स्थिति में केंद्र के कानून को वरीयता दी जाती है।
- अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) भी केवल केंद्र को प्राप्त हैं।
संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution)
- संविधान ही भारत का सर्वोच्च कानून है।
- केंद्र या राज्य कोई भी कानून यदि संविधान के विरुद्ध है, तो उसे न्यायपालिका असंवैधानिक घोषित कर सकती है।
कठोर संविधान (Rigid Constitution)
- संघीय ढाँचे की सुरक्षा हेतु संशोधन प्रक्रिया कठोर है।
- कुछ संशोधनों के लिए संसद में विशेष बहुमत और अधिकांश राज्यों की सहमति आवश्यक होती है।
स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary)
- भारत में एकीकृत व स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था है।
- सर्वोच्च न्यायालय संविधान की व्याख्या करता है, केंद्र व राज्यों के बीच विवादों को सुलझाता है, न्यायिक समीक्षा करता है।
- न्यायाधीशों की नियुक्ति, कार्यकाल व वेतन की स्वतंत्र व्यवस्था है।
द्विसदनीय संसद (Bicameral Legislature)
- भारतीय संसद में दो सदन हैं:
- लोकसभा – जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
- राज्यसभा – राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है, जो संघीय भावना को दर्शाती है।
- राज्यसभा विशेष रूप से राज्यों के हितों की रक्षा का कार्य करती है।
भारतीय संविधान की एकात्मक विशेषताएँ
एकात्मक संघवाद को बढ़ाने वाली संरचनाएँ
- राज्यपाल
- अखिल भारतीय सेवाएँ
- योजना आयोग (अशोक चन्द्रा के अनुसार – “योजना आयोग ने संघवाद को निरस्त कर दिया था।” )
- चुनाव आयोग
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG)
सशक्त केंद्र (Strong Centre)
- शक्तियों का असंतुलित वितरण:
- केंद्र सूची में 98 विषय, राज्य सूची में मात्र 59।
- अवशिष्ट शक्तियाँ:
- अनुच्छेद 248 के तहत केवल केंद्र को।
- समवर्ती सूची में प्राथमिकता:
- विवाद की स्थिति में केंद्र के कानून को वरीयता।
एकल संविधान (Single Constitution)
- केंद्र और राज्यों के लिए एक ही संविधान लागू होता है।
- केवल जम्मू-कश्मीर (पूर्व अनुच्छेद 370) को अपवादस्वरूप विशेष संविधान की अनुमति थी।
संविधान संशोधन में राज्यों की सीमित भूमिका
- अधिकांश संशोधनों के लिए राज्यों की सहमति आवश्यक नहीं होती।
- इससे केंद्र को अधिक प्रभावशाली भूमिका मिलती है।
राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व
- राज्यों को उनकी जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व मिलता है।
- इससे बड़े राज्यों का प्रभाव अधिक होता है।
- अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्ज़रलैंड में समान प्रतिनिधित्व।
आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions)
- राष्ट्रीय, राज्यीय या वित्तीय आपातकाल में केंद्र को असीमित शक्तियाँ मिलती हैं।
- संघात्मक ढांचा एकात्मक में परिवर्तित हो जाता है।
एकल नागरिकता (Single Citizenship)
- भारत में केवल भारतीय नागरिकता मान्य है।
- अमेरिका जैसे देशों में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था है।
एकीकृत न्यायपालिका (Integrated Judiciary)
- सर्वोच्च न्यायालय के नेतृत्व में एकल न्यायिक व्यवस्था।
- केंद्र और राज्यों के कानूनों की व्याख्या एक ही प्रणाली करती है।
- अमेरिका में संघीय और राज्यीय न्यायपालिका पृथक होती है।
अखिल भारतीय सेवाएं (All India Services)
- IAS, IPS, IFS आदि की नियुक्ति केंद्र द्वारा होती है।
- ये सेवाएं राज्यों में कार्यरत होती हैं लेकिन नियंत्रण केंद्र के अधीन होता है।
एकल लेखा परीक्षण प्रणाली (Unified Audit Machinery)
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) केंद्र और राज्यों – दोनों के खातों की जांच करता है।
- इसकी नियुक्ति व बर्खास्तगी राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
राज्य विधेयकों पर राष्ट्रपति का वीटो अधिकार
- राज्यपाल राज्य विधेयकों को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं।
- राष्ट्रपति अनिश्चितकाल तक निर्णय टाल सकते हैं या अस्वीकार कर सकते हैं।
एकीकृत निर्वाचन आयोग (Unified Election Commission)
- भारत में एक ही निर्वाचन आयोग केंद्र और राज्य – दोनों के चुनाव कराता है।
- इसकी नियुक्ति केंद्र सरकार (राष्ट्रपति) द्वारा की जाती है।
राज्यों की अनश्वरता का अभाव
- संसद को अधिकार है कि वह किसी राज्य की सीमाओं, नाम या क्षेत्र को बिना उसकी सहमति के बदल सकती है।
- इसके लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त है।
राज्य सूची पर संसद का विशेष अधिकार
- राज्यसभा में विशेष प्रस्ताव पारित होने पर संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने की अनुमति मिलती है, बिना आपातकाल के।
राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा
- राष्ट्रपति राज्यपाल की नियुक्ति करता है, जो केंद्र का प्रतिनिधि होता है।
- राज्यपाल के माध्यम से केंद्र राज्यों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण रखता है।
योजना आयोग द्वारा वित्तीय केंद्रीकरण (पूर्व में)
- योजना आयोग ने योजना निर्माण व वित्तीय संसाधनों का नियंत्रण केंद्र में रखा।
- अशोक चंद्रा: “योजना आयोग ने संघवाद को निरस्त कर दिया है।”
GST – कराधान की एकीकृत प्रणाली
- GST ने राज्य व केंद्र के कराधान ढांचे को एकीकृत किया।
- यह एक राष्ट्र, एक कर की नीति को दर्शाता है।
प्रधानमंत्री का करिश्माई नेतृत्व व एकदलीय प्रभुत्व
- 1950 से 1989 तक केंद्र में एकदलीय सरकार का प्रभाव रहा, जिससे केंद्र की शक्ति सुदृढ़ रही।
- प्रधानमंत्री का नेतृत्व संघात्मक निर्णयों में प्रभावी रहा।
सहयोगी व सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने वाली संस्थाएँ
- अंतर्राज्यीय परिषद् (अनुच्छेद 263)
- केंद्र व राज्यों के बीच समन्वय हेतु।
- क्षेत्रीय परिषदें
- विशेष मुद्दों व क्षेत्रीय मामलों के समाधान के लिए।
- राष्ट्रीय एकता परिषद्
- स्थापना: 1961 (नेहरू सरकार)
- प्रथम बैठक: 1962
- स्वरूप: गैर-संवैधानिक एवं गैर-सांविधिक निकाय
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री
- संरचना: केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री, संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासक/मुख्यमंत्री, आयोगों के अध्यक्ष, मीडिया, व्यापार, श्रमिक एवं महिला प्रतिनिधि।
- उद्देश्य: भाषावाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद जैसी चुनौतियों का समाधान व राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा।
- नीति आयोग (NITI Aayog)
- स्थापना: 1 जनवरी 2015
- घोषणा: 15 अगस्त 2014 (प्रधानमंत्री मोदी)
- स्वरूप: संविधानेत्तर एवं गैर-सांविधिक निकाय (कार्यपालिका के प्रस्ताव से स्थापित)
- योजना आयोग (65 वर्ष पुराना) का स्थान लिया।
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री
- उपाध्यक्ष: डॉ. सुमन के. बैरी
- CEO: बी. वी. आर. सुब्रह्मण्यम
- संरचना:
- शासी परिषद – सभी राज्यों व संघ राज्य क्षेत्रों के मुख्यमंत्री व उपराज्यपाल।
- क्षेत्रीय परिषदें – विशेष मुद्दों हेतु।
- विशेष आमंत्रित सदस्य – विशेषज्ञ व्यक्ति (प्रधानमंत्री द्वारा नामित)।
- उपाध्यक्ष, पूर्णकालिक सदस्य, अंशकालिक सदस्य, पदेन सदस्य, CEO।
- मुख्य उद्देश्य:
- सहकारी संघवाद को बढ़ावा।
- नीति-निर्माण हेतु “पॉलिसी थिंक टैंक” की भूमिका।
- केंद्र व राज्यों को सामाजिक-आर्थिक नीतियों पर परामर्श।
- Bottom to Top दृष्टिकोण (योजना आयोग के Top to Bottom दृष्टिकोण के विपरीत)।
- राज्यों को योजना निर्माण की स्वायत्तता।
- धन आवंटन अब वित्त मंत्रालय द्वारा।
- राजकोषीय संघवाद को प्रोत्साहन।
भारतीय संघीय व्यवस्था का आलोचनात्मक मूल्यांकन
- एकात्मक विशेषताओं के कारण आलोचना:
- केंद्र के पक्ष में शक्ति का संतुलन – केंद्र को ज्यादा अधिकार और शक्तियां दी गई हैं, जिससे संघीय स्वरूप कमजोर प्रतीत होता है।
- K.C. Wheare के अनुसार – भारत का संविधान “अल्प संघीय” (Quasi-federal) है।
- K. Santhanam के अनुसार – भारतीय संविधान के एकात्मक होने के दो मुख्य कारण हैं:
- वित्तीय क्षेत्र में केंद्र का प्रभुत्व और राज्यों की केंद्र पर आर्थिक निर्भरता।
- योजना आयोग जैसी संस्थाओं द्वारा राज्यों की विकास योजनाओं पर नियंत्रण।
- संविधान विशेषज्ञों के विविध दृष्टिकोण:
- Granville Austin – “यह सहकारी संघवाद (Cooperative federalism) का उदाहरण है।”
- सर आइवर जेनिंग्स भारत में ‘केन्द्रीयकरण की तीव्र प्रवृत्ति’ पाई जाती है।
- मोरिस जोन्स भारत में सौदेबाजी संघवाद (Bargaining Federalism) है।
- पॉल एच. एपलबी भारतीय संघ अत्यंत संघीय (Extremely Federal) है।
- के. संथानम भारत परमोच्च संघवाद (Paramount Federation) का उदाहरण है।
- चार्ल्स टार्लटन भारत में विषम संघवाद (Asymmetric Federation) है।
- केंद्र को मजबूत बनाया गया है परंतु राज्यों को भी पर्याप्त शक्ति दी गई है।
- डॉ. भीमराव अंबेडकर का दृष्टिकोण:
- “संविधान पूरी तरह संघीय है और यह दोहरी शासन प्रणाली के सिद्धांत पर आधारित है।”
- “राज्य, केंद्र के अधीन एजेंसियाँ नहीं हैं – बल्कि दोनों की सत्ता संविधान से प्राप्त है।”
- “केंद्र व राज्य दोनों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने की शक्ति दी गई है।”
- “संविधान की संघीय व्यवस्था समय व परिस्थितियों के अनुसार लचीली है – आवश्यकता अनुसार एकात्मक या संघीय हो सकती है।”
- “आपातकाल जैसी स्थितियाँ अपवाद हैं, नियम नहीं।”
- सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण (बोम्मई मामला, 1994):
- संविधान संघीय है और यह इसकी ‘मूल विशेषता’ (Basic Structure) है।
- यद्यपि केंद्र के पास अधिक शक्तियाँ हैं, इसका मतलब यह नहीं कि राज्य उसकी अधीनस्थ इकाइयाँ हैं।
- राज्यों का स्वतंत्र संवैधानिक अस्तित्व है और वे अपने अधिकार क्षेत्र में सर्वोच्च हैं।
- भारतीय संघीयता की वास्तविक प्रकृति:
- भारतीय संघीय व्यवस्था दो संघर्षों के बीच संतुलन बनाती है:
- राज्यों की स्वायत्तता बनाये रखने की आवश्यकता।
- राष्ट्रीय एकता एवं आपातकालीन स्थितियों में शक्तिशाली केंद्र की आवश्यकता।
- भारतीय संघीय व्यवस्था दो संघर्षों के बीच संतुलन बनाती है:
संघ एवं इसके क्षेत्रों से संबंधित अनुच्छेद
अनुच्छेद 1: संघ का नाम और राज्यक्षेत्र
- खंड (1) – भारत अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ होगा।
- खंड (2) – भारत का राज्य क्षेत्र वह होगा जो प्रथम अनुसूची में वर्णित है।
- खंड (3) – भारत का राज्य क्षेत्र तीन प्रकार से बनेगा:
- (a) राज्यों का राज्य क्षेत्र
- (b) संघ राज्य क्षेत्र (Union Territories)
- (c) अर्जित क्षेत्र (Acquired Territories)
प्रमुख अर्जित क्षेत्रों के उदाहरण
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क्षेत्र |
मूल देश |
भारत में विलय / अधिग्रहण की तिथि |
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पांडिचेरी |
फ्रांसीसी बस्तियाँ (पांडिचेरी, करैकल, माहे, यनम)। |
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दादर नगर हवेली |
पुर्तगाल |
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गोवा, दमन और दीव |
पुर्तगाल |
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प्रथम अनुसूची
- संघ के राज्य क्षेत्रों का विवरण देती है।
- वर्तमान में:
- 28 राज्य
- 8 संघ राज्य क्षेत्र
- संविधान लागू होने (26 जनवरी 1950) के समय लगातार सीमाओं में परिवर्तन हो रहे थे।
- अनुच्छेद 391 द्वारा राष्ट्रपति को प्रारंभिक समय में प्रथम व चतुर्थ अनुसूची में संशोधन का अधिकार दिया गया।
अनुच्छेद 1 की मुख्य बातें
भारत का नाम
- “भारत अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ होगा।”
- संविधान में India, that is Bharat लिखा गया है।
- संघीय संविधान समिति (1947) व प्रारूप समिति (1948) के प्रारूप में केवल India शब्द प्रयुक्त था।
- डॉ. अम्बेडकर द्वारा संशोधन लाकर “India, that is Bharat” को अपनाया गया (18 सितम्बर 1948)।
राज्यों का संघ (Union of States)
- संविधान में Federation शब्द का प्रयोग नहीं है।
- Union of States कहने के पीछे दो कारण (अम्बेडकर के अनुसार):
- भारतीय संघ राज्यों के समझौते का परिणाम नहीं है।
- किसी भी राज्य को संघ से पृथक होने का अधिकार नहीं है।
- भारत शासन अधिनियम, 1935 में “Federation of India” शब्द था, परंतु केबिनेट मिशन (1946) ने “Union” शब्द अपनाया।
- 13 दिसम्बर 1946 को पं. नेहरू ने भी उद्देश्य प्रस्ताव में “Union” शब्द का प्रयोग किया।
- प्रारूप समिति ने British North America Act, 1867 से “Union” शब्द लिया।
अनुच्छेद 391: संविधान लागू होने के संक्रमण काल में राष्ट्रपति को अधिकार था कि वह भारत शासन अधिनियम 1935 के प्रावधानों के अंतर्गत पहली व चौथी अनुसूची में आवश्यक संशोधन आदेश द्वारा कर सके।नोट : अनुच्छेद 379, 391 – निरसित (01 नवंबर 1956)
भारतीय राज्य क्षेत्र (Territory of India)
- भारतीय राज्य क्षेत्र तीन भागों से मिलकर बना है –
- राज्य (States) – 28
- संघ राज्य क्षेत्र (Union Territories) – 8
- अर्जित क्षेत्र (Acquired Territories)
अर्जित क्षेत्र (Acquired Territories)
- भारतीय संविधान अनुच्छेद 1(3)(c) में ऐसे क्षेत्रों का उल्लेख करता है जो भारत द्वारा –
- विधिक न्याय-गमन (cession by legal process)
- संधि (treaty)
- अध्यर्पण (cession by foreign power)
- युद्ध में विजय (conquest)
- स्वामीत्व विहीन भूमि पर कब्जा (occupation of terra nullius) के माध्यम से अर्जित किए जाएँ।
भारतीय संघ और भारतीय राज्य क्षेत्र का अंतर
- भारतीय संघ (Union of India) – इसमें केवल वे राज्य आते हैं जो शक्ति-वितरण में भागीदार हैं।
- भारतीय राज्य क्षेत्र (Territory of India) – इसमें वे सभी क्षेत्र आते हैं जहाँ तक भारत की संप्रभुता फैली है (राज्य + संघ राज्य क्षेत्र + अर्जित क्षेत्र)।
अनुच्छेद 2 – नये राज्यों का प्रवेश या स्थापना
- अनुच्छेद 2 संसद को दो प्रकार की शक्तियाँ प्रदान करता है –
- Admission – नये राज्यों को संघ में शामिल करने की शक्ति।
- इसका संबंध उन राज्यों से है जो पहले से अस्तित्व में हैं, परंतु अभी भारतीय संघ का हिस्सा नहीं हैं।
- Establishment – नये राज्यों की स्थापना करने की शक्ति।
- इसका संबंध भविष्य में स्थापित या अर्जित किए जाने वाले राज्यों से है।
- Admission – नये राज्यों को संघ में शामिल करने की शक्ति।
सिक्किम का मामला – अनुच्छेद 2 के अंतर्गत
- 35वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1974
- सिक्किम को भारतीय संघ के साथ “सह-संयुक्त (Associated)” राज्य का दर्जा दिया गया।
- इसके लिए संविधान में नया अनुच्छेद 2(A) जोड़ा गया।
- 36वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1975
- सिक्किम को पूर्ण रूप से भारतीय संघ का 22वाँ राज्य बनाया गया।
अनुच्छेद 3 – राज्यों की सीमाओं और संरचना में परिवर्तन
- अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद को निम्नलिखित कार्य करने की शक्ति है:
- संसद विधि द्वारा –
- नए राज्य का गठन कर सकती है (मौजूदा राज्यों को अलग करके या मिलाकर)।
- किसी राज्य के क्षेत्र में वृद्धि कर सकती है।
- किसी राज्य का क्षेत्र घटा सकती है।
- किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है।
- किसी राज्य के नाम में परिवर्तन कर सकती है।
- संसद विधि द्वारा –
- प्रक्रिया :
- ऐसा विधेयक केवल राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही संसद में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- राष्ट्रपति, सिफारिश करने से पहले विधेयक को संबंधित राज्य विधानमंडल के पास विचार हेतु भेजता है।
- राज्य विधानमंडल को राय देने के लिए निर्धारित अवधि दी जाती है (जिसे बढ़ाया भी जा सकता है)।
- यदि राज्य विधानमंडल –
- राय नहीं देता है, या
- विरोधी राय देता है,
- तो भी राष्ट्रपति उसे मानने को बाध्य नहीं है।
- अर्थात राज्य की सहमति या असहमति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, केवल उसकी राय जानना आवश्यक है।
- संसद द्वारा मूल विधेयक में संशोधन करने की स्थिति में उसे राज्य विधानमंडल के पास पुनः भेजना आवश्यक नहीं है।
- यह विधेयक संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है तथा इसे साधारण बहुमत से पारित किया जाता है।
- राष्ट्रपति इस विधेयक को पुनर्विचार हेतु वापस नहीं भेज सकता।
- संघ राज्य क्षेत्र (Union Territory) से विचार लेना आवश्यक नहीं है।
- विशेष बिंदु :
- अनुच्छेद 3 यह प्रदर्शित करता है कि –
- इस मामले में संसद सर्वोच्च है।
- भारत “विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ” है।
- अनुच्छेद 3 यह प्रदर्शित करता है कि –
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था : “भारत भंजनीय राज्यों का अभंजनीय संघ है।”
- इसके विपरीत अमेरिका को “अविनाशी राज्यों का अविनाशी संघ” कहा जाता है।
- 18वाँ संविधान संशोधन (1966) → स्पष्ट किया गया कि अनुच्छेद 3 के खंड (a) से (e) में प्रयुक्त “राज्य” शब्द में संघ राज्य क्षेत्र भी शामिल है।
- लेकिन अनुच्छेद 3 के परन्तुक (Proviso) में प्रयुक्त “राज्य” शब्द में संघ राज्य क्षेत्र शामिल नहीं है।
- राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं है।
- लेकिन यदि किसी क्षेत्र को विदेशी राज्य को सौंपना हो तो संविधान संशोधन आवश्यक है (जैसे – बेरुबारी वाद, 1960)।
- बेरुबारी वाद (1960) : सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी राज्य का क्षेत्र विदेशी राज्य को सौंपने के लिए अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन आवश्यक होगा।
- परिणामस्वरूप 9वाँ संविधान संशोधन (1960) कर पश्चिम बंगाल का बेरुबारी इलाका पाकिस्तान को सौंपा गया।
- इसी प्रकार 100वाँ संविधान संशोधन (2015) के द्वारा भारत-बांग्लादेश भूमि समझौते के तहत पश्चिम बंगाल, असम,त्रिपुरा व मेघालय के सीमावर्ती क्षेत्रों का आदान-प्रदान किया गया।
अनुच्छेद – 2 और 3 का अंतर :
- अनुच्छेद 2 → संघ में नए राज्यों का प्रवेश (Admission) और स्थापना (Establishment) करता है, जो भारतीय संघ का हिस्सा नहीं थे (जैसे – सिक्किम)।
- अनुच्छेद 3 → मौजूदा राज्यों का पुनर्गठन करता है (सीमा बदलना, नाम बदलना, मिलाना, विभाजित करना)।
अनुच्छेद 4 – अनुच्छेद 2 और 3 के अंतर्गत बनाई गई विधियों की प्रकृति
- मुख्य प्रावधान :
- अनुच्छेद 2 और 3 के तहत संसद द्वारा बनाई गई कोई भी विधि साधारण विधि होगी।
- इसे अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा।
- इसलिए संसद इन कार्यों को साधारण बहुमत से कर सकती है।
- संसद अनुच्छेद 3 के तहत साधारण बहुमत से –
- राज्यों की सीमा,
- क्षेत्र या
- नाम में परिवर्तन कर सकती है।
- लेकिन अनुच्छेद 3 के तहत संसद किसी राज्य या उसके किसी भू-भाग को विदेशी राज्य को नहीं सौंप सकती।
बेरुबारी वाद (1960) :
- सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि भारत का कोई भू-भाग विदेशी राज्य को सौंपना हो तो यह अनुच्छेद 3 के तहत संभव नहीं है।
- इसके लिए संविधान संशोधन आवश्यक है, जो अनुच्छेद 368 के तहत विशेष बहुमत से किया जाएगा।
संविधान संशोधन और भूमि आदान-प्रदान :
9वाँ संविधान संशोधन (1960) :
- पश्चिम बंगाल का बेरुबारी इलाका पाकिस्तान को सौंपने के लिए किया गया।
100वाँ संविधान संशोधन (2015) :
- भारत-बांग्लादेश भूमि समझौते के तहत
- पश्चिम बंगाल,
- असम,
- त्रिपुरा और
- मेघालय के सीमावर्ती क्षेत्रों का आदान-प्रदान किया गया।
- अनुच्छेद 4 यह स्पष्ट करता है कि –
- अनुच्छेद 2 और 3 के तहत संसद के पास नए राज्यों के गठन व मौजूदा राज्यों की सीमाओं/नाम में परिवर्तन करने की विशेष शक्ति है,
- लेकिन विदेशी राज्य को भू-भाग सौंपने के लिए यह शक्ति पर्याप्त नहीं है, और इसके लिए संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन करना होगा।
नवीन राज्यो का निर्माण
- 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के समय देश में 562 देशी रियासतें (Princely States) थीं।
- इनमें से 559 देसी रियासते 15.08.1947 तक स्वेच्छा से भारत में विलय हो गईं।
- शेष 03 रियासतों का भारत में विलय इस प्रकार हुआ –
- जूनागढ़ (गुजरात) → जनमत संग्रह द्वारा भारत में शामिल।
- हैदराबाद → 1948 में पुलिस कार्रवाई (ऑपरेशन पोलो) द्वारा विलय।
- जम्मू-कश्मीर → महाराजा हरी सिंह की लिखित अनुमति (Instrument of Accession, 1948) द्वारा भारत में विलय।
- मूल संविधान के अंतर्गत राज्यों का वर्गीकरण (Schedule – 1 के अनुसार, 1956 से पूर्व)
- 1956 से पूर्व भारत में राज्यों की कुल संख्या थी : 29 राज्य
- स्वतंत्रता के बाद संविधान में राज्यों को चार श्रेणियों में बाँटा गया था
राज्यों की 04 श्रेणी
| क्रम | A श्रेणी | B श्रेणी | C श्रेणी | D श्रेणी |
| – | भाग-6 | भाग-7 | भाग-8 | भाग-9 |
| – | इनमें पूर्व ब्रिटिश प्रान्त शामिल थे। | बड़ी देशी रियासतों के विलय से बने राज्य। | इनमें चीफ कमीश्नरी क्षेत्र और कुछ रियासती राज्य शामिल थे। | केवल एक क्षेत्र इस श्रेणी में था |
| – | कुल 9 राज्य | कुल 9 राज्य | कुल 10 राज्य | 01 |
| 1 | पश्चिम बंगाल | राजस्थान | अजमेर | अंडमान व निकोबार द्वीप समूह |
| 2 | बिहार | पेप्सू (पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ) | कुर्ग (कोड़गू) | |
| 3 | उड़ीसा | हैदराबाद | दिल्ली (चीफ कमीश्नरीज क्षेत्र) | |
| 4 | असम | मैसूर | कच्छ | |
| 5 | उत्तर प्रदेश (संयुक्त प्रांत) | सौराष्ट्र | हिमाचल प्रदेश | |
| 6 | मद्रास | त्रावणकोर-कोचीन | मणिपुर | |
| 7 | बॉम्बे | मध्य भारत | त्रिपुरा | |
| 8 | पंजाब | जम्मू-कश्मीर | भोपाल | |
| 9 | मध्य प्रदेश (मध्य प्रांत और बरार) | विन्ध्य प्रदेश | कूच बिहार | |
| 10 | – | – | बिलासपुर | – |
भाषायी राज्य और राज्यों का पुनर्गठन
भाषायी आधार पर पुनर्गठन का ऐतिहासिक संदर्भ
- 1903 – सर हर्बर्ट रिसले ने भाषायी आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन का विचार रखा।
- 1936 – उड़ीसा, स्वतंत्रता से पूर्व भाषायी आधार पर बना पहला प्रांत।
- 1928 – नेहरू समिति (मोतीलाल नेहरू) ने भी भाषा को प्रांत पुनर्गठन का आधार माना।
- संविधान सभा की संघ और प्रांतीय समितियों ने 12 सदस्यीय उपसमिति गठित की (अध्यक्ष – पट्टाभि सीतारमैया)।
- वर्तमान में भारत में 28 राज्य और 8 केन्द्र शासित प्रदेश हैं ।
प्रारंभिक पहल
- फरवरी 1948 में प्रारूप समिति ने प्रथम अनुसूची की पाद-टिप्पणी (Footnote) में भाषायी प्रांतों की माँग की जाँच हेतु आयोग बनाने की अनुशंसा की।
- 17 जून 1948 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने एस.के. धर आयोग का गठन किया।
प्रमुख समितियाँ और आयोग
धर आयोग (1947) – भाषायी प्रांत आयोग
- गठन : 1947
- रिपोर्ट : 1948
- अध्यक्ष – न्यायमूर्ति एस.के. धर
- सिफारिश – भाषा के बजाय प्रशासनिक, भौगोलिक, वित्तीय और विकास की सुविधा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन होना चाहिए।
- निष्कर्ष – भाषायी आधार पर राज्यों का गठन अस्वीकार।
जे.वी.पी. समिति (1948) – भाषायी प्रांत समिति
- गठन : 1948
- रिपोर्ट : 1949
- सदस्य – जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, पट्टाभि सीतारमैया
- सिफारिश – तत्काल भाषायी आधार पर राज्यों का गठन उचित नहीं, परंतु आंध्र राज्य की मांग उचित।
- रॉबर्ट किंग ने इसे “कोल्ड वाटर थैरेपी” कहा।
फजल अली आयोग (1953)
- गठन : 1953
- रिपोर्ट : 1955
- पृष्ठभूमि – 1952 में पोट्टी श्रीरामुलु की भूख हड़ताल और मृत्यु के कारण आंध्र के अलग राज्य की मांग तेज़ हुई।
- परिणाम – 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र राज्य का गठन (भाषायी आधार पर पहला राज्य)।
- अध्यक्ष – फजल अली
- सदस्य – के.एम. पणिकर, हृदय नाथ कुंजरू
- रिपोर्ट (1955) :
- भाषा राज्य निर्माण का आधार हो सकती है, परंतु “एक भाषा-एक राज्य” सिद्धांत अस्वीकार।
- राज्यों के पुनर्गठन हेतु चार सिद्धांत सुझाए –
- राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा
- भाषायी और सांस्कृतिक समानता
- आर्थिक-प्रशासनिक सुविधा
- राष्ट्रीय योजनाओं का सफल संचालन
- क्षेत्रीय परिषदों की स्थापना का सुझाव
- 1 नवंबर 1956 → राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 और सातवाँ संविधान संशोधन लागू → 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश बने।
| क्र सं. | राज्य (14) | केंद्र शासित प्रदेश (6) |
| 1 | आंध्र प्रदेश | दिल्ली |
| 2 | असम | हिमाचल प्रदेश |
| 3 | बिहार | मणिपुर |
| 4 | बॉम्बे | अंडमान व निकोबार |
| 5 | जम्मू-कश्मीर | लक्षद्वीप, मिनीकॉय द्वीप व अमिनिद्वीपी |
| 6 | केरल | त्रिपुरा |
| 7 | मध्य प्रदेश | |
| 8 | मद्रास | |
| 9 | मैसूर | |
| 10 | उड़ीसा | |
| 11 | पंजाब | |
| 12 | राजस्थान | |
| 13 | उत्तर प्रदेश | |
| 14 | पश्चिम बंगाल |
नवीन राज्यों का गठन
|
आंध्र |
1953 (पहला भाषायी राज्य) |
|
|
गुजरात और महाराष्ट्र |
1960 |
|
|
नागालैंड |
1963 |
|
|
हरियाणा |
1966 |
|
|
हिमाचल प्रदेश |
1971 |
|
|
मेघालय |
1972 |
|
|
मणिपुर, त्रिपुरा |
1972 |
|
|
सिक्किम |
1975 |
|
|
मिजोरम |
1987 |
|
|
अरुणाचल प्रदेश |
1987 |
|
|
गोवा |
1987 |
|
|
छत्तीसगढ़ |
2000 |
|
|
उत्तराखण्ड |
2000 |
|
|
झारखण्ड |
2000 |
|
|
तेलंगाना |
2014 |
|
|
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख |
2019 |
|
|
दादर और नगर हवेली तथा दमन और दीव |
2020 |
|
राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के नाम परिवर्तन
| 1969 | मद्रास → | तमिलनाडु |
| 1973 | मैसूर → | कर्नाटक |
| 1992 | दिल्ली → | राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली |
| 1995 | बॉम्बे → | मुंबई |
| 1996 | मद्रास (नगर) → | चेन्नई |
| 2001 | कलकत्ता → | कोलकाता |
| 2006 | पांडिचेरी → | पुड्डुचेरी |
| 2007 | उत्तरांचल → | उत्तराखंड |
| 2011 | उड़ीसा → | ओडिशा |
भारत के केन्द्र शासित प्रदेश (Union Territories)
दिल्ली
- 69वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1991 द्वारा अनुच्छेद 239AA व 239AB जोड़े गए।
- इससे दिल्ली संघ राज्य क्षेत्र को राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली (National Capital Territory of Delhi) का नाम दिया गया।
- अनुच्छेद 239AA
- दिल्ली को विशेष अधिकार
- दिल्ली भूमि, पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था के अलावा बाक़ी राज्य व समवर्ती सूची पर कानून बना सकती सकती है ।
- अनुच्छेद 239AB
- सांविधिक तंत्र विफल (239AA के अनुसार न हो तो राष्ट्रपति संचालन निलंबित कर सकता है।
- 1992 में “राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश” के रूप में पुनः परिभाषित।
- अनुच्छेद 54 के अनुसार राष्ट्रपति चुनाव में ‘राज्य’ की परिभाषा में दिल्ली भी सम्मिलित की गई।
- किंतु, प्रथम अनुसूची में दिल्ली अब भी संघ राज्य क्षेत्र (Union Territory) के रूप में ही दर्ज है।
- अपनी विधानसभा और कार्यपालिका, लेकिन सीमित शक्तियां।
- कानून राष्ट्रपति की “स्वीकृति” मिलने पर लागू होते हैं।
- अनुच्छेद 239 – राष्ट्रपति U.T. के शीर्ष प्रशासक के रूप में कार्य करता है।
- अनुच्छेद 239 A – केन्द्रशासित प्रदेश को राष्ट्रपति द्वारा उस तरीक़े से प्रशासित किया जाएगा जैसा वहाँ उचित समझे। (14 वाँ संशोधन,1962 )
- प्रथम अनुसूची में – दिल्ली को संघ राज्य क्षेत्र माना गया है।
अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह
- 1956: अंडमान और निकोबार को केंद्रशासित प्रदेश घोषित किया गया।
- यहाँ एक उप-राज्यपाल (Lieutenant Governor) होता है, जो केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।
- राजधानी: पोर्ट ब्लेयर
चण्डीगढ़
- 1966 में हरियाणा राज्य के निर्माण के बाद इसे दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी घोषित किया गया।
- यहाँ एक प्रशासक (Administrator) होता है, जिसे भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है।
दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
- 1954 में इसके स्वतंत्र होने से पूर्व यहां पुर्तगाल का शासन था। 1961 तक यहां लोगों द्वारा स्वयं चुना गया प्रशासन चलता रहा।
- दादरा और नागर हवेली की वरिष्ठ पंचायत ने 12 जून 1961 को भारत संघ में विलय का प्रस्ताव पारित किया।
- भारत सरकार ने इसे स्वीकार कर 11 अगस्त 1961 से विशेष संघ राज्य क्षेत्र घोषित किया।
- संविधान (10वाँ संशोधन) अधिनियम, 1961 द्वारा इसे संघ राज्य क्षेत्र बनाया गया। यह अधिनियम भूतलक्ष्यी प्रभाव से (11 अगस्त 1961) लागू हुआ।
- नवंबर 2019 में भारत सरकार ने दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव को एकीकृत करने का प्रस्ताव संसद में पेश किया।
- 26 नवंबर 2019 को दोनों केंद्र शासित प्रदेशों के विलय की घोषणा की गई।
- नया केंद्र शासित प्रदेश: “दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव”।
- 26 जनवरी 2020 को यह प्रावधान प्रभावी हुआ।
लक्षद्वीप
- 1 नवंबर 1956: लक्षद्वीप को आधिकारिक रूप से केंद्रशासित क्षेत्र घोषित किया गया।
- पहले इसका नाम था: लक्षद्वीप, मिनिकॉय और अंड्रोट द्वीप समूह।
- 1973: इसका नाम बदलकर “लक्षद्वीप” कर दिया गया।
- राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रशासक (Administrator) होता है।
पुडुचेरी
- पुदुचेरी क्षेत्र पूर्व फ्रांसीसी गठन का स्वरूप था, जिसे भारत में पुडुचेरी, कराइकल, माहे और यनम के रूप में जाना गया।
- 1954 में फ्रांस ने इसे भारत के सुपुर्द कर दिया। इस तरह 1962 तक इसका प्रशासन ‘ अधिगृहीत क्षेत्र ‘ की तरह चलता रहा।
- 10 अगस्त 1962 को भारत-फ्रांस के बीच सत्तांतरण संधि से ये भारत में सम्मिलित हुए।
- संविधान (14वाँ संशोधन) अधिनियम, 1962 द्वारा –
- पुडुचेरी को प्रथम अनुसूची में संघ राज्य क्षेत्र बनाया गया।
- अनुच्छेद 240(1) में संशोधन कर राष्ट्रपति को यहाँ शांति, प्रगति और सुशासन हेतु विनियम बनाने की शक्ति दी गई।
- यह अधिनियम भूतलक्ष्यी प्रभाव से 16 अगस्त 1962 से लागू हुआ।
- अपनी विधानसभा और कार्यपालिका।
- आंशिक राज्य का दर्जा।
- कानून राष्ट्रपति की “स्वीकृति” पर निर्भर।
- पुडुचेरी भारत में एक विधान सभा बनाने वाला पहला केंद्र शासित प्रदेश है।
जम्मू और कश्मीर
- 5 अगस्त 2019 को जम्मू और कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया।
- अगस्त 2019 में भारत की संसद ने जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम पारित किया।
- 31 अक्टूबर 2019 को यह अधिनियम प्रभावी हुआ।
- जम्मू और कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया:
- जम्मू और कश्मीर: विधानमंडल और कार्यपालिका के साथ।
- ST/SC आरक्षित (जनसंख्या के आधार पर)
- उपराज्यपाल 02 महिला नामित कर सकता है।
- लद्दाख: बिना विधानमंडल।
- जम्मू और कश्मीर: विधानमंडल और कार्यपालिका के साथ।
लद्दाख
- 5 अगस्त 2019 को केन्द्र शासित प्रदेश घोषित।
- 31 अक्टूबर 2019 से प्रभावी।
- बिना विधानसभा।
विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेश-
- दिल्ली
- जम्मू-कश्मीर
- पुडुचेरी.
विधानमंडल के बिना केंद्र शासित प्रदेश –
- अंडमान और निकोबार
- चंडीगढ़
- दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
- लद्दाख
- लक्षद्वीप
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पुनर्गठन (2019)
- अनुच्छेद 370 (1) के तहत :
- राष्ट्रपति ने संविधान (जम्मू-कश्मीर पर लागू) आदेश, 2019 जारी किया।
- यह आदेश जम्मू और कश्मीर राज्य सरकार की सहमति से लागू हुआ।
- आदेश के बाद भारतीय संविधान के सभी प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू हो गए।
- इस प्रकार अनुच्छेद 370 के अंतर्गत प्रदत्त विशिष्ट दर्जा समाप्त हो गया।
- अनुच्छेद 370 (3) में बदलाव :
- ‘राज्य की संविधान सभा’ को ‘राज्य की विधानसभा’ पढ़ा जाएगा।
- जम्मू-कश्मीर (पुनर्गठन) अधिनियम, 2019 :
- जम्मू-कश्मीर राज्य को दो संघ शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया –
- जम्मू और कश्मीर (विधानसभा सहित)
- लद्दाख (बिना विधानसभा)
- अधिनियम 31 अक्टूबर, 2019 से लागू हुआ।
- जम्मू-कश्मीर राज्य को दो संघ शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया –
- जम्मू-कश्मीर विधानसभा की विशेषताएँ :
- अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए सीटें उनकी जनसंख्या के आधार पर आरक्षित की गईं।
- यदि महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो लेफ्टिनेंट गवर्नर दो महिलाओं को नामित कर सकता है।
- सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (11 दिसम्बर 2023) :
- 5-न्यायाधीशों की पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
- अनुच्छेद 370 और 35A हटाने के केंद्र सरकार के निर्णय को बरकरार रखा।
- जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करने की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया।
- अन्य पुनर्गठन (2019–2020)
- दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव विलय अधिनियम, 2019 :
- संसद ने यह अधिनियम नवंबर–दिसंबर 2019 में पारित किया।
- 26 जनवरी 2020 से लागू हुआ।
- इसके द्वारा दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव को मिलाकर एक ही केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।
- दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव विलय अधिनियम, 2019 :
क्षेत्रीय परिषदें (Regional Councils)
स्थापना
- उद्देश्य: राज्यों के मध्य सहयोग एवं समन्वय बढ़ाना।
- आधार:
- प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का सुझाव।
- फज़ल अली आयोग की सिफारिश।
- विधिक प्रावधान: राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत
- प्रकृति: सांविधिक निकाय (Statutory Body), संवैधानिक नहीं।
- गठन: राष्ट्रपति द्वारा।
- अध्यक्ष: भारत के गृहमंत्री (पदेन)।
- उद्देश्य:
- राज्यों के बीच क्षेत्रीय सहयोग।
- एकता एवं राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत करना।
- आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक सहयोग व विकास योजनाओं में समन्वय।
- सीमा एवं अन्य अंतर्राज्यीय विवादों का समाधान।
सदस्यता संरचना
- अध्यक्ष – भारत के गृहमंत्री (पदेन)।
- उपाध्यक्ष – संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री (प्रतिवर्ष बारी-बारी से)।
- अन्य सदस्य – संबंधित राज्यों के 2 मंत्री। (राज्यपाल द्वारा नामित)
- केन्द्र शासित प्रदेश – संबंधित प्रशासक।
सलाहकार सदस्य (मताधिकार नहीं) – प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद के लिए
- नीति आयोग (पूर्व योजना आयोग) का एक मनोनीत सदस्य।
- राज्यों के मुख्य सचिव।
- राज्यों के विकास आयुक्त।
क्षेत्रीय परिषदों की सूची (1956)
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत 5 क्षेत्रीय परिषदें:
- उत्तर क्षेत्रीय परिषद – मुख्यालय: नई दिल्ली
- राज्य: राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, चंडीगढ़।
- मध्य क्षेत्रीय परिषद – मुख्यालय: इलाहाबाद
- राज्य: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड।
- पूर्वी क्षेत्रीय परिषद – मुख्यालय: कोलकाता
- राज्य: बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल।
- पश्चिम क्षेत्रीय परिषद – मुख्यालय: मुंबई
- राज्य: महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, दादरा और नगर हवेली व दमन और दीव (UT)।
- दक्षिण क्षेत्रीय परिषद – मुख्यालय: चेन्नई
- राज्य: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, पुडुचेरी (UT)।
- वर्तमान में 06 है –
- पूर्वोत्तर क्षेत्रीय परिषद – मुख्यालय: शिलांग (मेघालय)।
- गठन: पूर्वोत्तर परिषद अधिनियम, 1971।
- सदस्य: 7 पूर्वोत्तर राज्य (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा) + सिक्किम।
- हिमालयी राज्य क्षेत्रीय परिषद का गठन –
- 15 नवंबर 2018
- नीति आयोग द्वारा
- अध्यक्ष – डॉ.वी.के. सारस्वत
- उत्तर क्षेत्रीय परिषद – मुख्यालय: नई दिल्ली
विशेषताएँ
- केवल परामर्शदात्री निकाय।
- इनकी सिफारिशें बाध्यकारी (Binding) नहीं होतीं।
- उद्देश्य:
- राज्यों, केन्द्र शासित प्रदेशों व संघ के बीच सहयोग।
- क्षेत्रवाद, भाषावाद जैसी संकीर्ण प्रवृत्तियों को समाप्त करना।
- राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत करना।
- विकास योजनाओं में समन्वय व तेजी लाना।
