भारतीय संविधान की विशेषताएँ

भारतीय संविधान की विशेषताएँ भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे को सुदृढ़ आधार प्रदान करती हैं और राज्य तथा नागरिकों के बीच संबंधों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती हैं। इसके अंतर्गत शासन प्रणाली, अधिकार–कर्तव्य, संघीय संरचना और न्यायिक व्यवस्था का समावेश है, जिन्हें राजनीतिक व्यवस्था और शासन के विषय के अंतर्गत समग्र रूप से समझा जाता है।

  • भारत ने लगभग 200 वर्षों तक ब्रिटिश शासन सहा, जिसने शासन प्रणाली की खामियों और जनता के अधिकारों की कमी को उजागर किया। इसी अनुभव ने एक ऐसे संविधान की आवश्यकता को जन्म दिया जो लोकतंत्र, अधिकारों और न्याय की रक्षा करे।
  • भारतीय संविधान विश्व के अनेक संविधानों से तत्व लेकर बना है, फिर भी इसकी एक अलग पहचान है।
  • संविधान में कहीं भी ‘संघीय’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है।  अनुच्छेद 1 में भारत का उल्लेख ‘राज्यों के संघ’ के रूप में किया गया है। 
  • इसके दो अभिप्राय हैं – 
    1. भारतीय संघ राज्यों के बीच हुए किसी समझौते का निष्कर्ष नहीं है। 
    2. किसी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है। अर्थात् भारतीय संघ विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ है। (राज्यो का अस्तित्व संघ पर निर्भर है, संघ को नष्ट नहीं किया जा सकता है।

संविधान की आधारभूत विशेषताएँ

लोकप्रिय प्रभुसत्ता पर आधारित संविधान 

  • संविधान जनता की इच्छाओं का प्रतीक है और उसकी वैधता जनता से प्राप्त होती है।

निर्मित, लिखित व सर्वाधिक व्यापक संविधान 

  • भारत का संविधान एक संविधान सभा द्वारा बनाया गया था, न कि धीरे-धीरे विकसित हुआ जैसे ब्रिटेन का संविधान।
  • भारत का संविधान एक लिखित दस्तावेज है जिसमें सभी संवैधानिक प्रावधान स्पष्ट रूप से अंकित हैं।
  • मूल संविधान में 395 अनुच्छेद 22 भाग व 8 अनुसूचियां, 05 परिशिष्ट है। 
  • वर्तमान में लगभग 470 अनुच्छेद, 25 भाग और 12 अनुसूचियाँ हैं। 
    • 9वीं अनुसूची – प्रथम संविधान संशोधन (1951) 
    • 10वीं अनु. – 52 वे संशोधन (1985) दल बदल 
    • 11वीं व 12वीं अनुसूची क्रमश; 73 व 74 वें संविधान संशोधन (1992) से जोड़ी गयी। 
  • आइवर जेनिग्स – ‘भारतीय संविधान विश्व का सर्वाधिक व्यापक संविधान है।’
    • U.S.A. – 07 अनुच्छेद
    • आस्ट्रेलिया – 128 अनुच्छेद
    • कनाडा –  147 अनुच्छेद
    • द.अफ़्रीका  – 253 अनुच्छेद

कठोरता व लचीलेपन का समन्वय

  • संविधान में तीन प्रकार की संशोधन प्रक्रियाएं हैं:
    • साधारण बहुमत से संशोधन (जैसे सामान्य कानून) – लचीला
    • विशेष बहुमत से संशोधन (2/3 सदस्य, उपस्थित व मतदान करने वाले) – कुछ कठोरता
    • विशेष बहुमत + राज्यों की सहमति – अत्यधिक कठोर
  • अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन प्रक्रिया में विशेष बहुमत की प्रक्रिया है।
  • कठोरता – 368
  • लचीलापन – 2,3,169

शासन प्रणाली की प्रकृति

संसदात्मक शासन प्रणाली

  • इसे ‘वेस्टमिनस्टर सरकार ‘, उत्तरदायी सरकार, ‘मंत्रीमण्डलीय सरकार’, या ‘ प्रधानमंत्री सरकार” भी कहा जाता है।
  • ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को अपनाया गया।
  • राष्ट्रपति नाममात्र का प्रमुख, वास्तविक सत्ता प्रधानमंत्री के पास।
  • कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी।
  • प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री का नेतृत्व, निचले सदन के विघटन की शक्ति।
  • लोकसभा/विधानसभा का विघटन संभव।

परिवर्तनकारी संविधानवाद –

  • उपेंद्र बख्शी – परिवर्तनकारी संविधानवाद की अवधारणा दी ।
    • मूल पाठ 
    • व्याख्या
    • परिवर्तन 
  • जेनिंग्स – दुनिया के सारे संविधान अतीत का वारिस एवम् भविष्य का वसीयतनामा होते है। 
विभिन्न स्रोतों से प्रभावित
    • संविधान के कई प्रावधान अन्य देशों के संविधानों से लिए गए हैं।
    • भारत सरकार अधिनियम, 1935 का सबसे बड़ा प्रभाव।
    • मौलिक अधिकार (अमेरिका), नीति-निदेशक तत्व (आयरलैंड), संसदीय प्रणाली (ब्रिटेन) से प्रेरित।

    एकात्मक लक्षणों सहित संघात्मक व्यवस्था

    • हालांकि भारत में संघीय सरकार है पर संविधान में ‘संघीय (Federation) शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। 
    • अनु. 1 में वर्णित है “इण्डिया अर्थात भारत राज्यों का एक संघ होगा ’ (Union of States) Union of States के अम्बेडकर ने दो तात्पर्य बताएँ।
      • भारतीय संघ राज्यों अर्थात इकाईयों के समझौते का परिणाम नहीं है।
      • किसी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है। 
    • 1935 के अधिनियम में पहली बार एक संघीय शासन (Federation of India) की स्थापना का प्रावधान रखा गया। यद्यपि व्यावहारिक कठिनाइयों के चलते यह संघीय योजना लागू नहीं हो सकी। 
      एकात्मक लक्षण –
      1. एक संविधान                         
      2. एकल नागरिकता
      3. एकल न्यायपालिका             
      4. आपात उपबंध
      5. राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति  
      6. सशक्त केंद्र 
      7. अखिल भारती सेवाएँ                     
      8. शक्तियों का विभाजन केंद्र की ओर झुका होना
      9. केंद्र के पास आर्थिक एवं राजस्व के अधिक संसाधन
      10. नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्यों के नाम, क्षेत्र  सीमा में परिवर्तन करने की केंद्र के पास शक्ति। विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ।
      11. एकीकृत लेखा परीक्षण की व्यवस्था (CAG)
      12. संविधान संशोधन के संबंध में केंद्र को अधिक शक्तियाँ
      संघात्मक विशषताएँ –
      1. दो सरकारें                       
      2. शक्तियों का विभाजन
      3. लिखित संविधान               
      4. संविधान की सर्वोच्चता
      5. संविधान की कठोरता        
      6. स्वतंत्र न्यायपालिका
      7. संसद के दो सदन (उच्च सदन “राज्य सभा ‘ राज्यों का सदन’।) 

      संविधान की सर्वोच्चता

      • संसद, राज्य विधानसभाएं, कार्यपालिका और अन्य सभी संस्थाएं संविधान की सीमाओं के भीतर ही कार्य कर सकती हैं।
      • संविधान ही लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्यों की गारंटी देता है।
      • न्यायपालिका को अनुच्छेद 13 के तहत असंवैधानिक कानूनों को रद्द करने का अधिकार। 

      आपातकालीन प्रावधान (अनुच्छेद 352-360)

      • आपातकालीन स्थिति में देश की संप्रभुता, अखंडता और लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान।
      • आपातकाल के दौरान केंद्र सरकार की शक्तियाँ बढ़ जाती हैं, जिससे भारत का संघीय ढांचा अस्थायी रूप से एकात्मक बन जाता है।
      • आपातकाल के प्रकार:
        • राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352)
          • स्थिति: युद्ध, बाहरी आक्रमण, या सशस्त्र विद्रोह।
          • प्रभाव: केंद्र सरकार को राज्यों पर पूर्ण नियंत्रण मिल जाता है, और मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लग सकता है।
          • अब तक 3 बार लगाया गया – 1962, 1971, 1975।
        • राज्य में आपातकाल / राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356, 365)
          • स्थिति: राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता या केंद्र के निर्देशों की अवहेलना।
          • प्रभाव: राज्य सरकार भंग हो सकती है, और राज्य का प्रशासन राष्ट्रपति के अधीन आ जाता है।
          • सबसे अधिक इस्तेमाल किया गया आपातकालीन प्रावधान।
        • वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360)
          • स्थिति: देश की वित्तीय स्थिरता को खतरा।
          • प्रभाव: केंद्र सरकार वित्तीय मामलों में राज्यों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर सकती है।
          • अब तक कभी लागू नहीं किया गया।

      सार्वजनिक व्यस्क मताधिकार – 

      • अनुच्छेद 326: संविधान का यह अनुच्छेद सार्वजनिक वयस्क मताधिकार को मान्यता देता है।
      • 1950 में संविधान लागू होने के समय भारत ने बिना किसी शिक्षा या संपत्ति योग्यता के सार्वभौमिक मताधिकार को अपनाया।
      • 61वें संशोधन (1988) से मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष।
      • जाति, धर्म, लिंग, संपत्ति के आधार पर भेदभाव रहित मतदान अधिकार।

      नागरिकता

      • भारतीय संविधान में नागरिकता की व्यवस्था एकीकृत राष्ट्र और समतावादी समाज की भावना को सुदृढ़ करती है।
      • अनुच्छेद 5 से 11 (भाग II) संविधान में नागरिकता से संबंधित मूल प्रावधान है । 
      • एकल नागरिकता : भारत में केवल एक ही स्तर की नागरिकता है – राष्ट्रीय नागरिकता।
      • नागरिकता अधिनियम, 1955 : नागरिकता प्राप्त करने, बनाए रखने और समाप्त करने के लिए यह प्रमुख विधिक आधार है। इसमें 5 प्रमुख आधार दिए गए हैं:
        1. जन्म
        2. वंशानुक्रम
        3. पंजीकरण
        4. प्राकृतिककरण
        5. क्षेत्र के अधिग्रहण द्वारा
      • नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), 2019 : पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्मों के शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान।
      • नागरिकता और मौलिक अधिकारों का संबंध : केवल भारतीय नागरिकों को ही कुछ मौलिक अधिकार जैसे – अनुच्छेद 15, 16, 19 और 29 मिलते हैं।

      मौलिक कर्तव्य

      • 42वें संशोधन (1976) में अनुच्छेद 51A के तहत 10 मौलिक कर्तव्य जोड़े गए।
      • 11 वाँ मौलिक कर्तव्य (86वें संशोधन, 2002 में शिक्षा से संबंधित कर्तव्य जोड़ा गया)।
      • भारतीय संविधान सामाजिक-न्यायपूर्ण और उत्तरदायी नागरिकों को तैयार करने की सोच रखता है
      • यह केवल अधिकारों की नहीं बल्कि कर्तव्यों की भी संस्कृति को बढ़ावा देता है

      धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद

      • 42वें संशोधन में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए।
      • कोई आधिकारिक धर्म नहीं, सभी धर्मों को समान सम्मान।
      • राज्य धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता।
        • धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा (अनुच्छेद 25-28)।
          • धर्म के आधार पर भेदभाव व कर लगाने पर रोक (अनुच्छेद 27)।
          • सार्वजनिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा प्रतिबंधित (अनुच्छेद 28)।
      • सामाजिक और आर्थिक समानता की स्थापना, जिससे सभी नागरिकों को समान अवसर मिलें और शोषण से मुक्ति मिले।
        • भाग IV (अनुच्छेद 38, 39, 41, 43) नीति निदेशक तत्वों में समाजिक न्याय और समानता को बढ़ावा देने की व्यवस्था।

      समाज कल्याण और आरक्षण नीति –

      • अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण।
      • सामाजिक और आर्थिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रावधान।
      • भाग IV – नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 38, 39, 41, 46 आदि) राज्य को सामाजिक कल्याणकारी राज्य बनाने का निर्देश।
      • अनुच्छेद 15(4) शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था।
      • अनुच्छेद 16(4) सरकारी नौकरियों में आरक्षण।
      • अनुच्छेद 330-342 संसद और विधानसभा में अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए आरक्षण।
      • 103वां संशोधन (2019) आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10% आरक्षण।

      मौलिक अधिकार

      • मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 12-35) – नागरिकों को दिए गए संरक्षण और स्वतंत्रता।
        • समानता का अधिकार (14-18) – जाति, धर्म, लिंग आधारित भेदभाव निषेध।
        • स्वतंत्रता का अधिकार (19-22) – अभिव्यक्ति, आंदोलन, जीवन व स्वतंत्रता का अधिकार।
        • शोषण के विरुद्ध अधिकार (23-24) – जबरन श्रम व बाल श्रम पर रोक।
        • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (25-28) – धर्म अपनाने व प्रचार की स्वतंत्रता।
        • संस्कृतिक एवं शिक्षा का अधिकार (29-30) – अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा व संस्कृति संरक्षण का अधिकार।
        • संवैधानिक उपचारों का अधिकार (32) – सर्वोच्च न्यायालय से रिट जारी कराने का अधिकार।
      • 44वां संशोधन (1978): संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार की सूची से हटाकर एक वैधानिक अधिकार बना दिया गया।
      • 86वां संशोधन (2002): अनुच्छेद 21क जोड़ा गया, जिसमें 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया।

      नीति-निर्देशक तत्व

      • नीति-निर्देशक तत्व वे सिद्धांत हैं जो राज्य को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। ये न्यायोचित नहीं (non-justiciable) होते हैं, यानी इन्हें अदालत में लागू नहीं किया जा सकता, परंतु इनका पालन सरकार का नैतिक कर्तव्य है।
      • नीति-निदेशक तत्व – भाग IV (अनुच्छेद 36-51) – राज्य को सामाजिक और आर्थिक कल्याण सुनिश्चित करने हेतु निर्देश।
      • सामाजिक, गांधीवादी, उदार-बौद्धिक सिद्धांतों का समावेश।
      • कल्याणकारी राज्य की स्थापना का प्रयास
      • न्यायपालिका द्वारा इन्हें मौलिक अधिकारों के समान महत्व देने की प्रवृत्ति (मिनर्वा मिल्स मामला, 1980)।
      • मिनर्वा मिल्स मामले (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि, “भारतीय संविधान की नींव मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक सिद्धांतों के संतुलन पर रखी गई है।”
      • ग्रेनविल ऑस्टिन – “मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्त्व भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों को एक सूत्र में पिरो कर सामाजिक क्रांति की जमीन को मजबूत करते हैं ।’
      • ग्रेनविल ऑस्टिन ने मौलिक अधिकार व नीति-निर्देशक तत्व दोनों को ‘राज्य की आत्मा’ कहा है।
      • इन सिद्धांतों के आधार पर कई कानून बनाए गए हैं जैसे—
        • मनरेगा अधिनियम (2005)
        • शिक्षा का अधिकार अधिनियम (2009)
        • खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013)
        • पंचायती राज व्यवस्था (73वां संविधान संशोधन)

      संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता का समन्वय

      • संसद की शक्तियाँ:
        • संसद को कानून बनाने का अधिकार – (अनुच्छेद 245-248)
        • संविधान संशोधन की शक्ति – (अनुच्छेद 368)
        • राज्य सूची के विषयों पर भी कुछ परिस्थितियों में संसद कानून बना सकती है – (अनुच्छेद 249, 252)
      • न्यायपालिका की शक्तियाँ:
        • संविधान के संरक्षक (Guardian of Constitution)
        • कानूनों की वैधता की समीक्षा – न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)
        • संसद द्वारा बनाए गए असंवैधानिक कानून को अमान्य कर सकती है – (अनुच्छेद 13)
      • केशवानंद भारती केस (1973): संसद संविधान संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) को नहीं बदल सकती। यह निर्णय न्यायिक सर्वोच्चता और संसदीय संप्रभुता के बीच संतुलन की मिसाल है।

      त्रिस्तरीय सरकार

      • त्रिस्तरीय सरकार का अर्थ है – भारत में शासन व्यवस्था को तीन स्तरों में विभाजित किया गया है:
        • केंद्रीय सरकार
        • राज्य सरकारें
        • स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज और नगरपालिकाएं)
      • यह व्यवस्था शक्ति के विकेन्द्रीकरण को दर्शाती है।
      • त्रिस्तरीय सरकार (73वां और 74वां संविधान संशोधन, 1992)
      • पहले संविधान में केवल द्विस्तरीय व्यवस्था (केंद्र और राज्य) थी।
      • 1992 में 73वें और 74वें संशोधन द्वारा स्थानीय सरकार (ग्राम पंचायतें व नगरपालिकाएं) को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
      • 73वां संविधान संशोधन (1992) – पंचायत राज (ग्रामीण स्थानीय सरकार)
        • नया भाग: 9वां भाग जोड़ा गया।
        • नई अनुसूची: 11वीं अनुसूची (29 विषय)।
        • तीन स्तरीय ढांचा: ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद।
        • आरक्षण: SC/ST और महिलाओं (33%) के लिए।
        • पंचायतों का 5 वर्ष का कार्यकाल अनिवार्य।
      • 74वां संविधान संशोधन (1992) – नगरपालिका (शहरी स्थानीय सरकार)
        • नया भाग: 9A जोड़ा गया।
        • नई अनुसूची: 12वीं अनुसूची (18 विषय)।
        • तीन स्तरीय ढांचा: नगर पंचायत, नगरपालिका, नगर निगम।
        • महिलाओं और अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण।
        • शहरी प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास।

      एकीकृत, श्रेणीबद्ध, स्वतंत्र व सन्तुलनकारी न्यायपालिका तथा न्यायिक पुनरावलोकन 

      • केन्द्र और राज्य  के लिए एक ही न्यायपालिका की व्यवस्था है।  
      • तीन स्तरीय न्यायालय प्रणाली – सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, अधीनस्थ न्यायालय।
        • शीर्ष स्तर – सुप्रीम कोर्ट (SC) – अनुच्छेद 124
        • मध्य स्तर – उच्च न्यायालय (HC) – अनुच्छेद 214
        • निम्न स्तर – जिला और अधीनस्थ न्यायालय – राज्य कानूनों के अनुसार
      • संविधान संरक्षक – मौलिक अधिकारों की रक्षा।
      • न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के उपाय –
        • न्यायाधीशों का सुरक्षित कार्यकाल
        • सेवा शर्तें निर्धारित
        • न्यायालय के खर्च भारत की संचित निधि से
        • न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका से स्वतंत्र।
      • प्रमुख अनुच्छेद:
        • अनुच्छेद 124 – सुप्रीम कोर्ट की स्थापना
        • अनुच्छेद 214 – उच्च न्यायालय की स्थापना
        • अनुच्छेद 32 – मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए रिट जारी करने की शक्ति
        • अनुच्छेद 226 – उच्च न्यायालय की रिट जारी करने की शक्ति
        • अनुच्छेद 50 – कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण (नीति निदेशक तत्व)
        • अनुच्छेद 13 – संविधान के विरुद्ध कोई विधि अमान्य होगी (न्यायिक पुनरावलोकन की नींव)

      जीवन्त संविधान 

      • भारतीय संविधान जो कि एक गतिशील और जीवंत दस्तावेज के रूप में जाना जाता है। जो समय के साथ बदलते समाज और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने में सक्षम है।
      • यह भारतीय संविधान को केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं रहने देता, बल्कि इसे सामाजिक क्रांति का साधन बना देता है – जिससे भारत एक न्यायपूर्ण, समतामूलक, और मानव गरिमा आधारित राष्ट्र बन सके।
        • संशोधन की प्रक्रिया का लचीलापन
        • न्यायपालिका की सक्रिय व्याख्या
        • नवीन अवधारणाओं को समाहित करना
        • समाज और समय के साथ सामंजस्य
        • नवीन अधिकारों और कर्तव्यों का समावेश
        • संविधान का संरक्षण करने वाले संस्थान
      • डॉ. राजेंद्र प्रसाद – योग्य चरित्रवान लोग बुरे संविधान को भी उत्तम बना सकते है। गुणों का अभाव होगा तो संविधान देश की रक्षा नहीं कर पायेगा।   
      • पिछले 230 सालों में अमेरीकन संविधान में केवल – 27 संशोधन हुए है । जबकि पिछले 71 साल में भारतीय संविधान में 106 संशोधन हो चुके हैं।
        • संविधान संशोधन – 101वां (2016) – वस्तु व सेवाकर (GST) से संबंधित है। (अनुच्छेद -246(A) जोड़ा गया है 1)
        • 102 वां संशोधन (2018) – राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा ( अनुच्छेद – 338(B) जोड़ा गया है 1)
        • 103 वां संशोधन (2019) – आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को शैक्षणिक संस्थाओं व सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण (अनुच्छेद – 15(6) व 16(6) जोड़ा गया है ।)
        • 104 वां संशोधन (2019) – लोकसभा व राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति व जनजाति का आरक्षण 2030 तक (2020 से 2030) तक बढ़ाया। लोकसभा व राज्य विधानसभा में एंग्लो इण्डियन का अब मनोनयन नहीं (अनुच्छेद – 331,332,333 व 334 में संशोधन)
        • 105 वां संशोधन (2021) – सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े (SEBC) की पहचान की राज्यों व व केंद्र शासित प्रदेशों की शक्ति का सरंक्षण ( अनुच्छेद – 338(B), 342 व 366 में संशोधन)
        • 106वाँ संविधान संशोधन – 33% आरक्षण (एक-तिहाई) महिलाओं को
          • लोकसभा,
          • राज्य विधानसभाओं, और
          • दिल्ली की विधानसभा में।
          • अनु.239AA, 330A, 332A, 334A  में संशोधन

          स्वतंत्र निकाय

          • निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324) – स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करता है।
          • नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (अनुच्छेद 148) – सरकारी खातों का लेखा परीक्षण।
          • संघ और राज्य लोक सेवा आयोग (अनुच्छेद 315 से 323) – सिविल सेवाओं में भर्ती।
          • वित्त आयोग (अनुच्छेद 280) – केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व वितरण की सिफारिश करता है।
          • ये संस्थाएं लोकतंत्र की गुणवत्ता बनाए रखने में सहायक हैं।
          • ये कार्यपालिका और विधायिका की शक्तियों पर नियंत्रण बनाए रखती हैं।
          • नागरिकों के अधिकारों और शासन की जवाबदेही को सुनिश्चित करती हैं।

          सहकारी समितियां

          • 2011 के 97वें संविधान संशोधन अधिनियम ने सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा और संरक्षण प्रदान किया।
          • तीन प्रमुख संशोधन:
            • अनुच्छेद 19 में संशोधन: सहकारी समिति बनाने का अधिकार मौलिक अधिकार बना।
            • अनुच्छेद 43-B: सहकारी समितियों के संवर्धन को राज्य के नीति निदेशक तत्व में जोड़ा गया।
            • भाग IX-B (अनुच्छेद 243-ZH से 243-ZT): सहकारी समितियों के लोकतांत्रिक और स्वायत्त संचालन हेतु विस्तृत प्रावधान।
          • उद्देश्य:
            • सहकारी समितियों को अधिक लोकतांत्रिक, स्वायत्त और आर्थिक रूप से सक्षम बनाना।
            • अंतर-राज्य सहकारी समितियों के लिए संसद और अन्य के लिए राज्य सरकार को कानून बनाने की शक्ति देना।

          संविधान के स्रोत और ली गई विशेषताएँ

          • भारतीय संविधान के 395 अनुच्छेदों में से अधिकतर अनुच्छेद 1935 के भारत शासन अधिनियम (Government of India Act, 1935) से शब्दशः या मामूली परिवर्तन के साथ लिए गए हैं – रॉबर्ट हाइग्रेव
          • मूल रूप से (1949) में – 395 अनुच्छेद, 08 अनुसूचियाँ, 22 भाग   
          • वर्तमान में –  465 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियाँ, 25 भाग

          संविधान के स्रोत और ली गई विशेषताएँ

          क्र.सं.

          स्रोत

          ली गई विशेषताएँ

          1

          भारत शासन अधिनियम, 1935

          • संघीय तंत्र 
          • राज्यपाल का कार्यालय
          • न्यायपालिका
          • लोक सेवा आयोग
          • आपातकालीन उपबंध व प्रशासनिक विवरण।

          2

          ब्रिटेन का संविधान

          • संसदीय शासन
          • विधि का शासन
          • विधायी प्रक्रिया
          • एकल नागरिकता
          • एकल न्यायपालिका 
          • महान्यायवादी 
          • CAG 
          • First past the post
          • राज्यपाल की स्वविवेकीय शक्तियाँ  
          • मंत्रिमंडल प्रणाली
          • परमाधिकार लेख
          • संसदीय विशेषाधिकार और द्विसदनवाद।

          3

          ऑस्ट्रेलिया का संविधान

          • समवर्ती सूची
          • व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता 
          • संसद  के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक
          • प्रस्तावना की भाषा

          4

          आयरलैंड का संविधान

          • राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत
          • राष्ट्रपति की निर्वाचक मंडल 
          • राज्य सभा के लिए सदस्यों का नामांकन।
          • राष्ट्रपति पर महाभियोग व उसकी प्रक्रिया 
          • उद्देशिका के प्रारंभिक व अंतिम शब्द

          5

          संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान

          • मूल अधिकार
          • न्यायापालिका की स्वतंत्रता
          • न्यायिक पुनरावलोकन का सिद्धांत
          • उप-राष्ट्रपति का पद
          • उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का पद से हटाया जाना 
          • राष्ट्रपति पर महाभियोग।
          • उद्देशिका का विचार 
          • राष्ट्रपति का निर्वाचन

          6

          कनाडा का संविधान

          • सशक्त केन्द्र के साथ संघीय व्यवस्था
          • अवशिष्ट शक्तियों का केन्द्र में निहित होना
          • केन्द्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति 
          • उच्चतम  न्यायालय का परामर्शी न्याय निर्णयन।

          7

          दक्षिणी अफ्रीका का संविधान

          • संविधान में संशोधन की प्रक्रिया 
          • राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन।

          8

          फ्रांस का संविधान

          • गणतंत्रात्मक और प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श(चौथे गणतंत्र 1949 से)

          9

          जापान का संविधान

          • विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।
          • 1935 अधिनियम से आपात उपबंध 

          10

          जर्मनी का वाइमर संविधान

          • आपातकाल के समय मूल अधिकारों का स्थगन।(वाइमर संविधान 1919 से 1933)

          11

          सोवियत संघ (पूर्व) का संविधान

          • मूल कर्तव्य और प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक) का आदर्श

          12 

          पोलैंड 

          • धर्म की स्वतंत्रता 

          13

          युगोस्लाविया 

          • शोषण के विरुद्ध अधिकार 

          भारतीय संविधान के भाग, विषय एवं संबंधित अनुच्छेद

          क्र.सं. भागविषयसंबद्ध अनुच्छेद
          1भाग – I संघ और उसका राज्य क्षेत्र1 से 4
          2भाग – II नागरिकता5 से 11
          3भाग – III मौलिक अधिकार12 से 35
          4भाग – IV राज्य की नीति के निदेशक तत्व36 से 51
          5भाग – IV A  मौलिक कर्तव्य51-क
          6भाग – V                   संघ सरकार52 से 151
          अध्याय -I      कार्यपालिका52 से 78
          अध्याय -II     संसद79 से 122
          अध्याय -III    राष्ट्रपति की विधायी                     शक्तियां123
          अध्याय -IV    संघ की न्यायपालिका124 से 147
          अध्याय -V     भारत का नियंत्रक एवं                    महालेखा परीक्षक148 से 151
          7भाग – VI                  राज्य सरकारें152 से 237
          अध्याय -I      साधारण152
          अध्याय -II     कार्यपालिका153 से 167
          अध्याय -III    राज्य का विधानमंडल168 से 212
          अध्याय -IV    राज्यपाल की विधायी शक्तियां213
          अध्याय -V     राज्यों के उच्च                    न्यायालय214 से 232
          अध्याय -VI     अधीनस्थ न्यायालय233 से 237
          8भाग – VII राज्यों से संबंधित (पहली अनुसूची का खंड-ख निरस्त)238 (निरस्त)
          9VIII  संघ राज्य क्षेत्र239 से 242
          10IX पंचायतें243 से 243-ण
          11IX (A)नगरपालिकाएं243-त से 243-छ
          12IX (B)सहकारी समितियां243-ZH से 243-ZT
          13अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्र244 से 244-क
          14XI संघ और राज्यों के बीच संबंध245 से 263
          अध्याय -I          विधायी संबंध245 से 255
          अध्याय -II         प्रशासनिक संबंध256 से 263
          15XIIवित्त, संपत्ति, संविदायें और वाद264 से 300-ए
          अध्याय -I          वित्त264 से 291
          अध्याय -II         ऋण लेना292 से 293
          अध्याय -III       संपत्ति, संविदायें, अधिकार, बाध्यताएं और वाद294 से 300
          अध्याय -IV        संपत्ति का अधिकार300-क
          16XIIIभारत के राज्यक्षेत्र के भीतर व्यापार, वाणिज्य एवं समागम301 से 307
          17XIVसंघ और राज्यों के अधीन सेवाएं308 से 323
          अध्याय -I         सेवायें308 से 314
          अध्याय -II        लोक सेवा आयोग315 से 323
          18XIV(A)अधिकरण323-क से 323-ख
          19XVनिर्वाचन324 से 329-क
          20XVIकुछ वर्गों से संबंधित विशेष प्रावधान330 से 342
          21XVIIराजभाषा343 से 351
          अध्याय -I          संघ की भाषा343 से 344
          अध्याय -II         प्रादेशिक भाषाएं345 से 347
          अध्याय -III        सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय आदि की भाषा348 से 349
          अध्याय -IV        विशेष निदेश350 से 351
          22XVIIIआपात उपबंध352 से 360
          23XIXविविध प्रावधान361 से 367
          24XXसंविधान का संशोधन368
          25XXIअस्थायी, संक्रमणशील और विशेष उपबंध369 से 392
          26XXIIसंक्षिप्त नाम, प्रारंभ, हिंदी में प्राधिकृत पाठ और निरसन393 से 395

          भारतीय संविधान की अनुसूचियां एवं संबंधित अनुच्छेद

          क्र. सं.

          अनुसूची

          विषय

          संबंधित अनुच्छेद

          1

          प्रथम अनुसूची

          1. राज्यों के नाम एवं उनके न्यायिक क्षेत्र
          2. संघ राज्य क्षेत्रों के नाम और उनकी सीमाएं

          1 एवं 4

          2

          दूसरी अनुसूची

          परिलब्धियां व भत्ते, विशेषाधिकार और इससे संबंधित प्रावधान 

          1. भारत के राष्ट्रपति 
          2. राज्यों के राज्यपाल 
          3. लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष 
          4. राज्यसभा के सभापति और उप-सभापति 
          5. राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष 
          6. राज्य विधान परिषदों के सभापति और उप-सभापति 
          7. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 
          8. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश 
          9. भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक

          59, 65, 75, 97, 125, 148, 158, 164, 186 एवं 221

          3

          तीसरी अनुसूची

          इसमें विभिन्न उम्मीदवारों द्वारा ली जाने वाली शपथ या प्रतिज्ञान के प्रारूप दिए गए हैं ये उम्मीदवार हैं: 

          1. संघ के मंत्री 
          2. संसद के लिए निर्वाचन हेतु अभ्यर्थी 
          3. संसद के सदस्य 
          4. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 
          5. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक 
          6. राज्य मंत्री 
          7. राज्य विधानमण्डल के लिए निर्वाचन के लिए अभ्यर्थी 
          8. राज्य विधानमण्डल के सदस्य 
          9. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश

          75, 84, 99, 124, 146, 173, 188 एवं 219

          4

          चौथी अनुसूची

          • राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए राज्यसभा में सीटों का आवंटन

          4 एवं 80

          5

          पांचवीं अनुसूची

          • अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन तथा नियंत्रण के बारे में उपबंध

          244

          6

            छठी अनुसूची

          • असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उपबंध

          244 एवं 275

          7

          सातवीं अनुसूची

          • संघ सूची (मूल रूप से 97 विषय, वर्तमान में 100 विषय)
          • राज्य सूची (मूल रूप से 66 विषय, वर्तमान में 61 विषय)
          • समवर्ती सूची (मूल रूप से 47 विषय, वर्तमान में 52 विषय) के संदर्भ में राज्य और केंद्र के मध्य शक्तियों का विभाजन

          246

          8

          आठवीं अनुसूची

          • संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाएं (मूल रूप से 14 मगर फिलहाल 22)। ये भाषाएं हैं-
            • 14 भाषाएं- असमिया, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगू तथा उर्दू 
            • सिंधी भाषा को 1967 के 21वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था। 
            • कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को 1992 के 71वें संशोधन अधिनियम द्वारा और 
            • बोड़ो, डोगरी, मैथिली और संथाली को 2003 के 92वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था। 
            • ‘उड़िया’ का नाम बदलकर 2011 में ‘ओडिया’ कर दिया।

          344 एवं 351

          9

          नवीं अनुसूची

          • इस अनुसूची में केंद्रीय और राज्य कानूनों की एक सूची है जिसे न्यायालयों में चुनौती नहीं दी जा सकती है जिसे संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था।
          • यह नए अनुच्छेद 31B के तहत बनाया गया था, जिसे अनुच्छेद 31A के साथ सरकार द्वारा कृषि सुधार से संबंधित कानूनों की रक्षा करने और ज़मींदारी प्रथा को समाप्त करने हेतु लाया गया था।
          • भू-सुधारों और जमींदारी प्रणाली के उन्मूलन से संबंधित राज्य विधानमण्डलों और अन्य मामलों से संबंधित संसद के अधिनियम और विनियम (मूलतः 13 परन्तु वर्तमान में 282)। 
          • आई.आर. कोएल्हो केस 2007 में दिए महत्त्वपूर्ण निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं माना जा सकता है। न्यायालय का कहना है कि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूलभूत विशेषता है और इसे नवीं अनुसूची में शामिल किसी कानून के लिए वापस नहीं लिया जा सकता। न्यायालय की व्याख्या के अनुसार 24 अप्रैल, 1973 (केशवानंद भारती निर्णय की तिथि) के बाद नौवीं अनुसूची में रखे गए कानूनों को चुनौती दी जा सकती है, अगर उनसे अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के अन्तर्गत प्रदत्त मौलिक अधिकारों अथवा ‘ संविधान की मूलभूत विशेषता का हनन होता है।

          31-ख

          10

          दसवीं अनुसूची

          • दल-बदल के आधार पर संसद और विधानसभा के सदस्यों की निरर्हता के बारे में उपबंध, इस अनुसूची को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया। 
          • इसे दल-परिवर्तन रोधी कानून भी कहा जाता है।
          • दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का प्रश्न राज्यसभा के मामले में सभापति और लोकसभा के मामले में अध्यक्ष द्वारा तय किया जाता है (न कि भारत के राष्ट्रपति द्वारा)।
          • 1992 में, सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि इस संबंध में अध्यक्ष/अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है। (किहोता होलोहान बनाम ज़ाचिल्हु)

          102 एवं 191

          11

          ग्यारहवीं अनुसूची

          • पंचायत की शक्तियां, प्राधिकार व जिम्मेदारियां। 
          • इसमें 29 विषय हैं। 
          • इस अनुसूची को 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया।

          243-छ

          12

          बारहवीं अनुसूची

          • नगरपालिकाओं की शक्तियां, प्राधिकार व जिम्मेदारियां। 
          • इसमें 18 विषय हैं। 
          • इस अनुसूची को 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया।

          243-ब

          भारतीय संविधान के प्रमुख अनुच्छेद एवं उनके विषय

          अनुच्छेदविषय
          1संघ का नाम और राज्यक्षेत्र
          3नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन
          13मूल अधिकारों को असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियां
              14विधि के समक्ष समानता
          16लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता
          17अस्पृश्यता का अंत
          19वाक् स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण
          21प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
          21(क)प्राथमिक शिक्षा का अधिकार
          25अंतःकरण की और धर्म अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता
          30शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों को अधिकार
          31(ग)कुछ निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति
          32मौलिक अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए रिट (Writs) सहित उपचार
          38राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा
          40ग्राम पंचायतों का संगठन
          44नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता
          456 वर्ष से कम आयु वाले बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का उपबंध
          46अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य कमजोर वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि
          50कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण
          51अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि
          51(क)मौलिक कर्तव्य
          72क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राष्ट्रपति की शक्ति
          74राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद
          78राष्ट्रपति को जानकारी देने आदि के संबंध में प्रधानमंत्री के कर्तव्य
          110धन विधेयक की परिभाषा
              112वार्षिक वित्तीय विवरण
          123संसद के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति
          143उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति
          155राज्यपाल की नियुक्ति
          161क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राज्यपाल की शक्ति
          163राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद
          167राज्यपाल को जानकारी देने आदि के संबंध में मुख्यमंत्री के कर्तव्य
          169राज्यों में विधानपरिषदों का उत्सादन या सृजन
          200विधेयकों पर अनुमति
          213विधानमंडल के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राज्यपाल की शक्ति
          226कुछ रिटे निकालने की उच्च न्यायालय की शक्ति
          239 (कक)दिल्ली के संबंध में विशेष उपबंध
          249राज्य सूची के विषय के संबंध में राष्ट्रीय हित में कानून बनाने की संसद की शक्ति
          262अंतरराज्यीय नदियों या नदी-घाटियों के जल संबंधी विवादों का न्याय-निर्णयन
          263अंतरराज्यीय परिषद के संबंध में उपबंध
          265विधि के प्राधिकार के बिना करों का अधिरोपण न किया जाना
          275कुछ राज्यों को संघ से अनुदान
          280वित्त आयोग
          300वाद और कार्यवाहियां
          300(क)विधि के प्राधिकार के बिना व्यक्तियों को संपत्ति से वंचित न किया जाना (संपत्ति का अधिकार)
          311संघ या राज्य के अधीन सिविल हैसियत में नियोजित व्यक्तियों का पदच्युत किया जाना, पद से हटाया जाना या पदावनत किया जाना
          312अखिल भारतीय सेवाएं
          315संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग
          320लोक सेवा आयोगों के कृत्य
          323(क)प्रशासनिक अधिकरण
          324निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का निर्वाचन आयोग में निहित होना
          330लोकसभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण
          335सेवाओं और पदों के लिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों के दावे
          352आपात की घोषणा (राष्ट्रीय आपातकाल)
          356राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध
          360वित्तीय आपात के बारे में उपबंध
          365संघ द्वारा दिए गए निदेशों का अनुपालन करने में या उनको प्रभावी करने में असफलता का प्रभाव
          368संविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति और उसके लिए प्रक्रिया
          370जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध

          संविधान की आलोचना

          भारतीय संविधान अपनी व्यापकता, विविधता और विस्तार के कारण विभिन्न आलोचनाओं का विषय बना है। आलोचकों ने इसे विभिन्न आधारों पर आंका, जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं:

          “उधार का संविधान”

          • कुछ आलोचकों का मानना था कि भारतीय संविधान में मौलिकता की कमी है।
          • इसे ‘उधारी की बोरी’, ‘हॉज-पॉज संविधान’ और ‘पैबंद-गिरी दस्तावेज’ कहा गया।

          1935 के अधिनियम की “कार्बन कॉपी”

          • आलोचकों ने दावा किया कि भारतीय संविधान, भारत सरकार अधिनियम 1935 की संशोधित प्रति मात्र है।
          • एन. श्रीनिवासन और सर आइवर जेनिंग्स जैसे विशेषज्ञों ने कहा कि इसमें 1935 के अधिनियम से अधिकांश प्रावधान लिए गए हैं।
          • संविधान सभा सदस्य पी.आर. देशमुख ने इसे ‘केवल वयस्क मताधिकार जोड़कर नया रूप दिया गया अधिनियम’ कहा।

          अभारतीय” या “भारतीयता-विरोधी” संविधान

          • आलोचकों का मानना था कि संविधान भारत की राजनीतिक परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान का प्रतिनिधित्व नहीं करता।
          • संविधान सभा के सदस्य के. हनुमंथैय्या ने कहा, “हम वीणा या सितार का संगीत चाहते थे, लेकिन हमें इंग्लिश बैंड की धुन मिली।”
          • लोकनाथ मिश्रा ने इसे “पश्चिमी संस्कृति की नकल” कहा।
          • लक्ष्मीनारायण साहू ने भविष्यवाणी की थी कि संविधान जल्द ही टूट जाएगा।

          गांधीवादी विचारों से दूरी

          • आलोचकों ने तर्क दिया कि भारतीय संविधान गांधीवादी विचारधारा को प्रतिबिंबित नहीं करता।
          • गांधीजी का ग्राम स्वराज्य मॉडल संविधान में प्रमुखता से नहीं अपनाया गया।
          • संविधान सभा सदस्य टी. प्रकाशम ने कहा कि अंबेडकर के गांधीवाद से मतभेद के कारण संविधान गांधीवादी सिद्धांतों से दूर हो गया।

          महाकाय और जटिल संविधान

          • आलोचकों के अनुसार भारतीय संविधान दुनिया का सबसे विस्तृत और भारी-भरकम संविधान है।
          • एच.वी. कामथ ने इसे “हाथीनुमा संविधान” कहा।
          • इसमें कई अनावश्यक प्रावधान जोड़े गए, जिससे यह अत्यधिक जटिल हो गया।

          “वकीलों का स्वर्ग” (Lawyers’ Paradise)

          • आलोचकों के अनुसार संविधान अत्यधिक विधिवादी (Legalistic) और जटिल भाषा में लिखा गया है।
          • सर आइवर जेनिंग्स ने इसे “वकीलों का स्वर्ग” कहा।
          • एच.के. माहेश्वरी ने कहा कि यह अधिक मुकदमों को बढ़ावा देगा और लोग अदालतों पर अधिक निर्भर होंगे।
          • पी.आर. देशमुख ने इसे “कानूनी भाषा का बोझ” कहा, जिससे यह एक सामाजिक-राजनीतिक दस्तावेज के बजाय कानूनी ग्रंथ जैसा लगने लगा।

          निष्कर्ष

          • भारतीय संविधान आलोचनाओं के बावजूद दुनिया के सबसे सफल संविधानों में से एक है।
          • इसकी विस्तृत प्रकृति ने भारत जैसे बहुलवादी समाज को समायोजित करने में मदद की।
          • यह लचीला (Flexible) भी है और समय-समय पर संशोधनों के माध्यम से आवश्यक सुधारों को समाहित करता है।
          • संविधान निर्माताओं ने भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विदेशी संविधानों के उपयोगी तत्वों को अपनाया।

          आलोचनाओं के बावजूद, भारतीय संविधान लोकतंत्र, समानता, धर्मनिरपेक्षता, और समाजवाद के मूल सिद्धांतों को सफलतापूर्वक संरक्षित करने में सक्षम रहा है।

          विभिन्न विद्वानों के विचार

          विद्वानविचार
          के.सी. व्हीयरभारत अर्द्ध – संघ
          मोरिस जॉन्स‘सौदेबाजी संघ’
          ग्रेनविल ऑस्टिन‘सहकारी संघवाद
          आइवर जेनिग्सं‘अत्यन्त केन्द्रीकरण प्रवृति वाला संघ’
          अम्बेडकर‘संविधान को संघात्मक के तंग ढांचे में नहीं ढाल गया है ।’
          डी.डी. बसु‘भारतीय संविधान संघात्मक व एकात्मक का मिश्रण है।’
          ग्रेनविल ऑस्टिन‘सौहार्दपूर्ण संघवाद’
          चार्ल्स टार्लटन‘विषम संघवाद’
          के. संथानमपरमउच्चता संघ
          पॉल एच. एपल्बी‘अत्यन्त संघीय ‘ 
          अल्फ्रेड स्टीपन‘होल्डिंग टुगेदर फेडरेशन’
          अल्फ्रेड स्टीपन ने अमेरिका के कमिंग टुगेदर फेडरेशन के स्थान पर भारत के संघ को ‘होल्डिंग टुगेदर फेडरेशन ‘ नाम दिया है।
          भारत में संघवाद निरंतर गतिशील रहा है और समय-समय पर इसके कई प्रतिमान (Model) – सहकारी, सौदेबाजी, असममित, राजकोषीय, प्रतिस्पर्धात्मक देखे गए हैं।

          राष्ट्र के प्रतीक

          राष्ट्रीय ध्वज – 
          • 22 जुलाई 1947 को स्वीकार 
          • लंबाई व चौड़ाई – 3:2
          राष्ट्रीय चिह्न –
          • सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ 
          • दाईं और सांड – अर्थव्यवस्था 
          • बाईं और घोड़ा – शक्ति, मेहनती 
          • 26 जनवरी 1950 को अपनाया 
          • 24 तिल्लियाँ  
          राष्ट्रगान –
          • 24 जनवरी 1950 को स्वीकार 
          • सर्वप्रथम 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, कोलकाता का 26 वाँ अधिवेशन में गाया गया था।
          • 5 पद 
          • समय 52 सेकंड, अंतिम 20 सेकंड  
           राष्ट्रीय गीत – 
          • 24 जनवरी 1950 को स्वीकार
          • 12 वे अधिवेशन कोलकाता (1896) में गया।
          • आनंदमय उपन्यास से लिया गया।
            राष्ट्रीय पंचाग –
          • शक संवत् आधारित 
          • ग्रेगोरियन कैलेंडर 
          • 22 मार्च 1957 को अपनाया। 
          राष्ट्रीय पशु 
          • 1973 बंगाल टाइगर प्रोजेक्ट
           राष्ट्रीय पक्षी 
          • 26 जनवरी 1963 को घोषित 
          राष्ट्रीय विरासत पशु 
          • एशियाई हाथी 
          • अक्टूबर 2010 में घोषित 
          राष्ट्रीय मुद्रा : प्रतीक चिह्न 
          • जुलाई 2010 
          • डी उदय कुमार 
          राष्ट्रीय जलीय जीव 
          • गंगा डॉल्फिन 
          • मई 2010

          मूल ढाँचा

          परिचय

          • मूल संरचना भारतीय संविधान में कहीं भी वर्णित नहीं है।
          • यह भी न्यायिक सक्रियता की तरह ही विकसित सिद्धांत है।
          • मूल ढाँचा सिद्धांत भारतीय संविधान के उन मूलभूत सिद्धांतों की रक्षा के लिए विकसित किया गया है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखते हैं तथा जिन्हें संसद संशोधन द्वारा नहीं बदल सकती।
          • यह सिद्धांत संविधान की मूल संरचना को मनमाने संशोधनों से बचाने हेतु न्यायिक नवाचार है।
          • सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अप्रैल 1973 को ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ मामले में संविधान की आधारभूत संरचना (Basic Structure) सिद्धांत की स्थापना की।

          मूल संरचना का महत्व

          • भारतीय संविधान के मौलिक सिद्धांतों से संबंधित।
          • इन्हें संसद अनुच्छेद 368 के तहत भी संशोधित नहीं कर सकती।
          • इसे पूर्णतः परिभाषित नहीं किया गया है, परन्तु समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्या दी है।
          • मूल ढाँचा सिद्धांत का विकास मुख्यतः संपत्ति के अधिकार को लेकर संसद और न्यायपालिका के बीच टकराव का परिणाम है।

          मूल ढाँचा सिद्धांत का विकास

          • भारतीय संविधान में मूल संरचना का सिद्धांत न्यायिक निर्णयों के माध्यम से विकसित हुआ है।
          1. शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951): 
            • संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी गई।
            • अनु. 31 व 19(1)(f) के तहत संपत्ति के अधिकार पर 1st संविधान संशोधन और 9वीं अनुसूची को चुनौती।
            • न्यायालय ने कहा – संविधान संशोधन, अनु. 13(2) के तहत विधि नहीं है।
          2. सज्जन सिंह वाद (1965) – शंकरी प्रसाद वाद को वैध ठहराया।
          3. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967): 
            • संसद मौलिक अधिकारों को संशोधन के माध्यम से समाप्त नहीं कर सकती।
            • CJI सुब्बा राव, 6:5 बहुमत।
            • भावी प्रत्यादेश (Prospective Overruling) सिद्धांत।
            • 17वाँ संशोधन निरस्त।
            • अनु. 368 केवल प्रक्रिया बताता है, संशोधन की शक्ति नहीं देता।
            • संविधान को भी अनु. 13(2) के तहत विधि माना गया।
            • असर: बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्त करने जैसी योजनाएँ बाधित हुईं।
          4. 24वाँ संविधान संशोधन (1971): संसद ने अनुच्छेद 368 में संशोधन कर अपनी संशोधन शक्ति को स्पष्ट किया, जिससे मौलिक अधिकारों में भी संशोधन संभव हुआ।
          5. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973): 
            • सर्वोच्च न्यायालय ने 7:6 के बहुमत से निर्णय दिया कि संसद को मौलिक अधिकारों में संविधान संशोधन का अधिकार है अर्थात् संविधान संशोधन किया जा सकता है, लेकिन इसका मूल ढाँचा बदला नहीं जा सकता। 
            • मुख्य न्यायाधीश एस. एम. सीकरी ने कहा कि संविधान की सर्वोच्चता बनी रहनी चाहिए।
            • मूल ढाँचा – संविधान की सर्वोच्चता, शक्तियों का बँटवारा, गणराज्य, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, संसदीय शासन, सम्प्रभुता, एकता, व्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा, कल्याणकारी राज्य।
          6. इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975) – लोकतंत्र को मूल ढाँचे का हिस्सा माना गया।
          7. 42वाँ संविधान संशोधन (1976): संसद ने घोषणा की कि उसकी संशोधन शक्ति पर कोई न्यायिक सीमा नहीं होगी।
          8. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980): 
            • न्यायालय ने 42वें संशोधन के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराया और न्यायिक समीक्षा को मूल संरचना का हिस्सा माना।
            • संसद की संशोधन शक्ति सीमित बताई गई।
          9. वामन राव बनाम भारत संघ (1981): 
            • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केशवानंद भारती मामले के फैसले (24 अप्रैल 1973) के बाद किए गए संशोधनों पर मूल संरचना सिद्धांत लागू होगा। 
            • मूल ढाँचा सिद्धांत की पुष्टि की गई
          10. एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) – 
            • धर्मनिरपेक्षता को संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा माना गया।
            • अनु. 356 के तहत चार राज्यों (राजस्थान, यूपी, हिमाचल, एमपी) में राष्ट्रपति शासन को सही ठहराया।
            • संघवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र मूल संरचना का भाग।
          11. किहोतो होलोहान वाद (1993) – स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव मूल संरचना का अंग।
          12. आई.आर. कोएल्हो वाद (2007) – 9वीं अनुसूची में भी संशोधन न्यायिक समीक्षा के अधीन; Rule of Law, शक्तियों का बँटवारा, मौलिक अधिकारों के सिद्धांत मूल संरचना का हिस्सा।
          13. एस. सी. एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015) – न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए NJAC अधिनियम, 2014 को असंवैधानिक घोषित किया गया।
          वर्तमान स्थिति
          • यह है कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी भाग, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हैं, में संशोधन कर सकती है, लेकिन यह संशोधन संविधान के मूल ढाँचे को प्रभावित नहीं कर सकता।

          विद्वानों की राय

          • उपेन्द्र बख्शी
            • मूल संरचना, संसद की अनियंत्रित शक्ति पर अंकुश है।
            • आलोचकों को “पढ़े-लिखे मूर्ख” कहा।
          • ग्रेनविल ऑस्टिन
            • सुप्रीम कोर्ट ने मूल ढाँचे को संरक्षित कर संविधान के संरक्षक होने का दावा किया।

          संविधान समीक्षा आयोग (2000) की रिपोर्ट

          • NDA सरकार द्वारा गठित।
          • गठन : फ़रवरी 2000
          • रिपोर्ट : 31 मार्च 2000
          • अध्यक्ष: जस्टिस वेंकटचलैया।
          • निष्कर्ष: मूल ढाँचे का सिद्धांत संविधान की परिपक्वता के लिए बेहतर।
          • राज्यपाल की नियुक्ति एक समिति के द्वारा 
          प्रभाव
          • सकारात्मक: जनहित याचिका जैसे नवाचार, न्यायिक समीक्षा का विस्तार।
          • नकारात्मक: न्यायपालिका की अति-सक्रियता से विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप।

          मूल ढाँचे के घटक

          • न्यायपालिका ने संविधान के निम्नलिखित तत्वों को मूल ढाँचा सिद्धांत के अंतर्गत रखा है:
            1. संविधान की सर्वोच्चता
            2. विधि का शासन
            3. संसदीय प्रणाली
            4. स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव
            5. मूल अधिकारों का संरक्षण
            6. संप्रभु, लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक स्वरूप
            7. संविधान की धर्मनिरपेक्षता
            8. संविधान का संघीय चरित्र
            9. शक्तियों का पृथक्करण
            10. न्यायिक समीक्षा की शक्ति
            11. व्यक्तिगत स्वतंत्रता
            12. भारत की एकता और संप्रभुता
            13. संसद की सीमित संशोधन शक्ति
            14. मूल अधिकारों एवं नीति निदेशक तत्वों में संतुलन
            15. सामाजिक और आर्थिक न्याय
            16. राज्य का लोक कल्याणकारी स्वरूप
            17. व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा
            18. समानता का सिद्धांत
            19. न्याय तक प्रभावी पहुँच
          मूल ढाँचे की सुरक्षा के लिए संवैधानिक अनुच्छेद
          • न्यायपालिका ने निम्नलिखित अनुच्छेदों का उपयोग करते हुए मूल ढाँचे की व्याख्या की है:
            • अनुच्छेद 13 – संसद कोई ऐसा कानून नहीं बना सकती जो मूल अधिकारों का उल्लंघन करे।
            • अनुच्छेद 32 – नागरिकों को मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए न्यायालय में जाने का अधिकार।
            • अनुच्छेद 132 – उच्चतम न्यायालय को संविधानिक मामलों की अपील सुनने का अधिकार।
            • अनुच्छेद 136 – न्यायालय विशेष अनुमति से किसी भी मामले की सुनवाई कर सकता है।
            • अनुच्छेद 142 – यह उच्चतम न्यायालय को यह शक्ति देता है कि वह ऐसा कोई भी आदेश या निर्णय दे सकता है, जो पूर्ण न्याय (complete justice) के लिए आवश्यक हो।
          मूल ढाँचा सिद्धांत का प्रभाव
          1. संसद की शक्ति सीमित हुई, जिससे वह संविधान के मूल ढाँचे को नहीं बदल सकती।
          2. संविधान की स्थिरता और लचीलापन दोनों सुनिश्चित किए गए।
          3. न्यायपालिका संविधान की रक्षा करने में अधिक सशक्त बनी।
          • सुप्रीम कोर्ट ने ‘आर.सी. कूपर बनाम भारत सरकार (1970)’ में बैंकों के राष्ट्रीयकरण को अवैध ठहराया।
          • ‘माधवराव सिंधिया बनाम भारत संघ (1970)’ में पूर्व राजाओं के प्रिवी पर्स समाप्ति को अवैध घोषित किया।
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