राज्य की नीति के निदेशक तत्व भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित वे मूल सिद्धांत हैं, जो राज्य को नीति निर्माण और शासन संचालन की दिशा प्रदान करते हैं। इनका उद्देश्य भारत में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय के अंतर्गत राज्य की नीति के निदेशक तत्व शासन की वैचारिक आधारशिला और नीतिगत मार्गदर्शन को स्पष्ट करते हैं।
राज्य की नीति के निदेशक तत्व : परिचय एवं प्रकृति
- राज्य नीति के निदेशक तत्वों का उल्लेख संविधान के भाग चार के अनुच्छेद 36 से 51 (कुल -17) तक में किया गया है।
- संविधान निर्माताओं ने राज्य के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) को संविधान में सम्मिलित करने की प्रेरणा 1937 में निर्मित आयरलैंड के संविधान से ली।
- इनकी प्रकृति अप्रवर्तनीय (non-justiciable) है, अर्थात् इन्हें न्यायालय में बलपूर्वक लागू नहीं कराया जा सकता; ये केवल नीति-निर्देशक सिद्धांत हैं।
- अन्य देश से लिए –
- अनुच्छेद 39(d) – सोवियत संघ
- अनुच्छेद 40 – के. संथानम द्वारा प्रस्तुत संशोधन प्रस्ताव
- अनुच्छेद -44 – कनाडा का संविधान
- अनुच्छेद -51 – हवाना घोषणा (1939)
- संविधान सभा के सदस्य के.एम.मुंशी गैर वाद योग्य बातों को संविधान में शामिल करने के पक्षधर नहीं थे।
- संविधान सभा में नीति निदेशक तत्व के लिए अलग समिति नहीं थी बल्कि मूल अधिकारों की उपसमिति। (अध्यक्ष – J.B. कृपलानी) द्वारा इनका निर्माण हुआ।
- संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार सर बी. एन. राव ने सुझाव दिया कि वैयक्तिक अधिकारों को दो श्रेणियों में बाँटा जाए:
- न्यायोचित अधिकार (Justiciable) – जिन्हें न्यायालय में लागू किया जा सके।
- गैर-न्यायोचित अधिकार (Non-Justiciable) – जिन्हें लागू करने का अधिकार न्यायालय के पास न हो।
- प्रारूप समिति ने इस सिफारिश को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार:
- भाग-3 में न्यायोचित मूल अधिकार।
- भाग-4 में गैर-न्यायोचित निदेशक सिद्धांत रखे गए।
- निदेशक तत्वों को ‘ राज्य प्राधिकारियों के लिए नैतिक आवश्यकता एवं शैक्षिक मूल्य वाला ‘ बताया है ।
- प्रारूप समिति ने इस सिफारिश को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार:
- अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर: “कोई भी जनप्रतिनिधि सरकार जो जनता के प्रति उत्तरदायी है, वह भाग-4 की उपेक्षा नहीं कर सकती।”
- डॉ. भीमराव अंबेडकर:
- “जनता की अपेक्षाओं पर आधारित कोई भी सरकार, निदेशक सिद्धांतों की अनदेखी नहीं कर सकती। यदि करती है, तो चुनावों में जनमत उसका उत्तरदायित्व तय करेगा।”
- भारत शासन अधिनियम 1935 में वर्णित अनुदेशों (हिदायतों) या निर्देशों के उपकरण के समान है।
- भारत का सामाजिक व आर्थिक घोषणा पत्र कहा।
- एक कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य निहित है।
- तेज बहादुर सप्रू समिति (1945)
- अधिकार – 1. वाद योग्य 2. ग़ैर वाद योग्य
- वेंकटचलैया आयोग (संविधान समीक्षा आयोग) –
- शीर्षक → राज्य के नीति के निदेशक तत्व एवम् अनुयोजन (action) की अनुशंसा की ।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद – उद्देश्य – सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना (कल्याण)
- ग्रेनविल ऑस्टिन →
भाग 3 (मूल अधिकार) + भाग 4 (राज्य के नीति निर्देशक तत्व)
↓
संविधान की मूल आत्मा
व
सामाजिक क्रांति का वाहक
- उद्देश्य – भारतीय जनता को सकारात्मक अर्थों में स्वतंत्र बनाना है।
- DPSP की विषयवस्तु एक सीमा तक उपनिवेशवाद विरोशी क्रांति की देन भी थी।
- न्यायमूर्ति M.C. छागला – ‘यदि इन सभी DPSP का पूरी तरह से पालन किया जाए तो हमारा देश, पृथ्वी पर स्वर्ग कि भांति हो जायेगा।’
- प. ठाकुरदास भार्गव के अनुसार- “निदेशक तत्त्व संविधान के प्राण या सारतत्व है।’ (Essence of the Constitiution)
- K.M. पाणिक्कर ने DPSP को – “आर्थिक क्षेत्र में समाजवाद’ की संज्ञा दी।
- एल.एम. सिंघवी के अनुसार, निदेशक तत्व, संविधान को जीवनदान देने वाली व्यवस्थाएं हैं।
नीति के निदेशक तत्वों की आलोचना
- के. टी. शाह ने राज्य के नीति निदेशक तत्व को ‘अतिरेक कर्मकांडी’ बताया और इसकी तुलना ‘एक चेक जो बैंक में है, उसका भुगतान बैंक संसाधनों की अनुमति पर ही संभव ‘ से की।
- बाह्य अलंकरण से युक्त ख़ूबसूरत परिधान
- के.सी. व्हीयर – ये ‘ धार्मिक उपदेश है।’
- के.संथानम के अनुसार
- केंद्र इन तत्वों को लागू करने के लिए राज्यों को निर्देश दे सकता है और इनके लागू न होने पर वह राज्य सरकार को बर्खास्त कर सकता है।
- डीपीएस ने विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका के मध्य टकराव को जन्म दिया है।
- सर आइवर जैनिंग्स – (Book – Some Characterstics of the India Constitution 1953)
- ये “पुण्यात्मा लोगों की ‘महत्वाकांक्षा मात्र है।
- इंग्लैंड के राजनीतिक दर्शन के समान है।
- ब्रिटिश वेब व सिडनी वेब के भूत प्रवेश कर गए।
- “फ़ेबियन समाजवाद” की स्थापना करते है।
- नसीरुद्दीन – “नव वर्ष के उन वादों की तरह हैं, जो जनवरी बीतते-बीतते ही टूट जाते हैं।”
- टी.टी. कृष्णामचारी – “प्रमाणित करने योग्य भावना का कूड़ा घर”
- राजेंद्र प्रसाद के अनुसार, “राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों का उद्देश्य जनता के कल्याण को प्रोत्साहित करने वाली सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना है।’!
- ग्रैनविले ऑस्टिन (Book – The Indian Constitution – Cornerstone of a nation – 1966) – ने भाग- 3 (मूल अधिकार) व भाग- 4 (DPSP) को “संविधान की मूल आत्मा’ तथा ‘सामाजिक क्रांति के वाहक ‘कहा है।
नीति के निदेशक तत्वों की विशेषतायें:
संविधान की आत्मा :
- संविधान के अनुच्छेद 37 में इन्हें “राष्ट्र के शासन में मूलभूत” बताया गया है।
- एल.एम. सिंघवी: “निदेशक तत्व संविधान को जीवनदान देने वाली व्यवस्थाएं हैं।”
राज्य को दिशा देने वाले सिद्धांत:
- नीति निर्देशक तत्व (Directive Principles of State Policy – DPSPs) नागरिकों के लिए प्रत्यक्ष रूप से नहीं हैं।
- ये राज्य (State) के लिए हैं, ताकि राज्य अपनी नीतियाँ इस प्रकार बनाए जिससे एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की स्थापना हो सके।
- “राज्य की नीति के निदेशक तत्व” नाम से ही स्पष्ट है कि ये राज्य के नीति निर्धारण में मार्गदर्शक हैं।
- ये विधायिका, कार्यपालिका और प्रशासन के लिए सिफारिशात्मक दिशा-निर्देश हैं।
- अनुच्छेद 36 के अनुसार “राज्य” का वही अर्थ है जो भाग III (मूल अधिकार) में है — इसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार, संसद, विधानसभाएँ, स्थानीय निकाय आदि सभी शामिल हैं।
भारत शासन अधिनियम, 1935 से समानता:
- डॉ. भीमराव अंबेडकर के अनुसार ये तत्व उसी प्रकार के अनुदेश (instructions) हैं जैसे ब्रिटिश काल में गवर्नर जनरल को भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत दिए जाते थे।
- अंतर सिर्फ इतना है कि अब ये स्वतंत्र भारत की विधायिका और कार्यपालिका के लिए दिशा-निर्देशक हैं।
लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की भावना:
- इनका उद्देश्य है भारत को पुलिस राज्य से हटाकर “लोक कल्याणकारी राज्य” (Welfare State) बनाना।
- ये आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय, स्वतंत्रता, और समानता जैसे आदर्शों को साकार करने की दिशा में कार्य करते हैं।
- इनका अंतिम लक्ष्य है — आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना।
गैर-न्यायोचित प्रकृति (Non-Justiciable Nature)
- निदेशक तत्वों का न्यायालय में उल्लंघन पर कोई उपचार नहीं मिलता।
- अनुच्छेद 37 कहता है:
- “यद्यपि इन सिद्धांतों को न्यायालय द्वारा लागू नहीं किया जा सकता, ये राष्ट्र के शासन में मूलभूत हैं और विधि निर्माण में राज्य का कर्तव्य है कि वह इन्हें लागू करे।”
गैर-न्यायोचित बनाए जाने के कारण (Reasons for Non-Justiciability):
- आर्थिक संसाधनों की कमी: स्वतंत्रता के समय भारत के पास आवश्यक वित्तीय संसाधन नहीं थे।
- विविधता और पिछड़ापन: भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक और क्षेत्रीय विविधता इनके त्वरित और सार्वभौमिक क्रियान्वयन में बाधक थी।
- व्यावहारिक दृष्टिकोण की आवश्यकता: नवगठित राष्ट्र को लचीलापन दिया जाना आवश्यक था ताकि वह समय, स्थान और प्राथमिकता के आधार पर निर्णय ले सके।
सकारात्मक दिशा-निर्देश:
- निदेशक तत्व नकारात्मक नहीं, बल्कि सकारात्मक आदेश हैं — ये राज्य को कुछ सकारात्मक कर्तव्यों के निर्वहन के लिए प्रेरित करते हैं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रमिक कल्याण, पर्यावरण संरक्षण आदि।
विधायिका की सहायता से लागू:
- ये स्वतः लागू नहीं होते; इन्हें प्रभावी करने के लिए विधायिका द्वारा कानून बनाना आवश्यक होता है।
नैतिक एवं राजनीतिक महत्व:
- भले ही ये न्यायालय में लागू नहीं होते, फिर भी इन्हें राजनीतिक और नैतिक दृष्टि से अत्यधिक मान्यता प्राप्त है।
- सरकार यदि इनका पालन न करे, तो उसे जनता की आलोचना और राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
नैतिक एवं शैक्षिक मार्गदर्शन :
- सर बी.एन. राव: “यह राज्य के लिए नैतिक आवश्यकता एवं शैक्षिक मूल्य के समान हैं।”
सामाजिक क्रांति का मार्ग
- ग्रेनविल ऑस्टिन: “निदेशक तत्वों का उद्देश्य है—सामाजिक क्रांति को आगे बढ़ाना और आवश्यक शर्तें स्थापित करना।”
न्यायपालिका एवं नीति निदेशक तत्व
न्यायालय द्वारा स्वीकार्यता:
- यद्यपि निदेशक तत्व गैर-न्यायोचित हैं, संवैधानिक व्याख्या करते समय न्यायालय इनका उपयोग करता है।
- उच्चतम न्यायालय ने माना है कि यदि कोई विधि निदेशक तत्वों को लागू करने की मंशा से बनाई गई है, तो उसे अनुच्छेद 14 या 19 के कुछ प्रावधानों से टकराव के बावजूद तर्कसंगत मानकर वैध ठहराया जा सकता है।
विधि असंवैधानिक नहीं ठहराई जा सकती:
- निदेशक तत्वों का उल्लंघन करने वाली किसी विधि को केवल इस आधार पर अवैध या असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता।
- परंतु यदि कोई विधि इन्हें लागू करने के उद्देश्य से बनाई गई है, तो संवैधानिकता को मजबूत आधार मिल सकता है।
- ये विधायिका या कार्यपालिका के कार्यों पर प्रत्यक्ष निर्बंधन (restrictions) नहीं लगाते, बल्कि उन्हें मार्गदर्शन (guidelines) प्रदान करते हैं।
निष्कर्ष:
- निदेशक तत्व संविधान के नैतिक पथप्रदर्शक हैं जो भारत को आर्थिक और सामाजिक न्याय की दिशा में ले जाते हैं। ये गैर-न्यायोचित होते हुए भी राष्ट्र के शासन में मूलभूत भूमिका निभाते हैं और लोक कल्याणकारी राज्य की नींव रखते हैं।
नीति निदेशक सिद्धांतों से संबंधित अनुच्छेद
| अनुच्छेद संख्या | विषय-वस्तु |
| 36. | राज्य की परिभाषा |
| 37. | इस भाग में समाहित सिद्धांतों को लागू करना। |
| 38. | राज्य द्वारा जन-कल्याण के लिए सामाजिक व्यवस्था को बढ़ावा देना |
| 39. | राज्य द्वारा अनुसरण किये जाने वाले कुछ नीति-सिद्धांत |
| 39.A | समान न्याय एवं निःशुल्क कानूनी सहायता |
| 40. | ग्राम पंचायतों का संगठन |
| 41. | कुछ मामलों में काम का अधिकार, शिक्षा का अधिकार तथा सार्वजनिक सहायता |
| 42. | न्यायोचित एवं मानवीय कार्य दशाओं तथा मातृत्व सहायता के लिए प्रावधान। |
| 43. | कर्मचारियों को निर्वाह वेतन आदि |
| 43.A | उद्योगों के प्रबंधन में कर्मचारियों को सहभागिता |
| 43.Β. | सहकारी समितियों को प्रोत्साहन |
| 44. | नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता |
| 45. | बालपन-पूर्व देखभाल तथा 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की शिक्षा |
| 46. | अनु. जाति, अनु. जनजाति का कमजोर वर्गों के शैक्षिक, तथा आर्थिक हितों को बढ़ावा देना |
| 47. | पोषाहार का स्तर बढ़ाने, जीवन स्तर सुधारने तथा जन-स्वास्थ्य की स्थिति बेहतर करने सम्बन्धी सरकार का कर्त्तव्य। |
| 48. | कृषि एवं पशुपालन का संगठन |
| 48.A | पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्द्धन तथा वन एवं वन्य जीवों की सुरक्षा |
| 49. | स्मारकों, तथा राष्ट्रीय महत्व के स्थानों एवं वस्तुओं का संरक्षण |
| 50. | न्यायपालिका का कार्यपालिका से अलगाव |
| 51. | अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को प्रोत्साहन |
अनुच्छेद 36 – के अनुसार भाग 4 में “राज्य ”शब्द का वही अर्थ है, जो मूल अधिकारों से संबंधित भाग 3 में है।
अनुच्छेद – 37- इस भाग में अंतर्विष्ट तत्वों का लागू होना –
- इस भाग में अंतर्विष्ट उपबंध किसी न्यायालय द्वारा (serial से याद करे)
- प्रवर्तनीय (Enforced) नहीं होंगे
- किन्तु फिर भी इनमें वर्णित तत्त्व देश के शासन में मूलभूत (Fundamental) हैं और
- विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना, राज्य का कर्तव्य (Duty) होगा।
- नीति-निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत (Fundamental) हैं, न कि केवल साधारण (Basic) या अनिवार्य (Compulsory)।
इस प्रकार अनुच्छेद 37 मे तीन बाते है –
- इनकों न्यायालय द्वारा लागू नहीं करवाया जा सकता। अर्थात् ये गैर-न्यायोचित, अवादयोग्य है। इन्हें वैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है, जैसी की मूल अधिकारों को प्राप्त है।
- संविधान के अनुच्छेद 37 में उपबंध है कि नीति निदेशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (Enforceable) नहीं होंगे। इसे ही प्रायः ‘वादयोग्य नहीं’ (Not Justiciable) कहा जाता है।
- DPSP देश की शासन व्यवस्था में मूलभूत स्थान रखते है।
- विधि/कानून बनाते समय राज्य का कर्तव्य होगा कि इनका ध्यान रखे।
अनुच्छेद – 38- राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा –
- 38 (1) राज्य → सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय की स्थापना करेगा
- 38 (2) राज्य → आय, प्रस्थिति, सुविधाओं व अवसरों की असमानताओ को कम करेगा। [ अनु.-38 ( 2 ) 44वां संशोधन 1978 द्वारा जोड़ा गया।] ( नोट- अवसर की समानता का उल्लेख प्रस्तावना तथा अनुच्छेद 16 में भी है।)
अनु. – 39 – राज्य द्वारा अनुसरण किये जाने वाले कुछ नीति-सिद्धांत
- अनुच्छेद 39 (a) – पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से आजीविका (Livelihood) के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो।
- अनुच्छेद 39 (b) – समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से हित साधन हो।
- अनुच्छेद 39 (c) – आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण न हो। (राज्य सम्पति व उत्पादन के साधनों (पूंजी) का संकेंद्रण रोकेगा।
- अनुच्छेद 39 (d) – पुरुषों और स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिए समान वेतन हो ।
- राजेश कुमार गोंड वाद – 2014 समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत मौलिक अधिकार नहीं –
- “समान कार्य के लिए समान वेतन ‘ के सिद्धांत को हमारे संविधान के द्वारा नागरिकों का मौलिक अधिकार होना अभिव्यक्त रूप से घोषित नहीं किया गया है, परन्तु निश्चित रूप से यह संवैधानिक अधिकार है।
- [समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976]
- अनुच्छेद 39(e) – पुरूष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोजगारों में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हों ।
- अनुच्छेद 39 (f) – बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएं दी जाएं और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए। [39 (f) 42वें संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा गया।]
- अनुच्छेद 39A – राज्य सभी लोगों को निःशुल्क न्याय व विधिक सहायता उपलब्ध करायेगा। [39 (A) 42वें संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा गया।]
- राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण(NALSA) की स्थापना 1995 में विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत की गई है, ताकि गरीबों को नि:शुल्क एवं उचित कानूनी सहायता प्राप्त हो सके । इसके अलावा समान न्याय को बढ़ावा देने के लिए लोक अदालतों का गठन किया गया । लोक अदालत सांविधानिक फोरम हैं, जो कानूनी विवाद का निपटारा करते हैं, इन्हें जन अधिकार अदालतों के समान स्तर दिया गया। इनके निर्णय मानने की बाध्यता होती है और इनके फैसले के विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई अपील नहीं है।
अनुच्छेद 40 – ग्राम पंचायतों का संगठन
- राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों।
- यह गांधी के ग्राम स्वराज्य की अवधारणा से संबंधित है।
- 73 वें संविधान संशोधन – 1992 द्वारा पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया गया है।
अनुच्छेद 41 – लोक सहायता (Public Assistance)
- राज्य अपने आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर काम तथा शिक्षा पाने तथा बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी व निःशक्तता की स्थिति में लोक सहायता (Public Assistance) (भत्ते-पैंशन स्कॉलरशिप) देगा।
- [राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम – 15 अगस्त, 1995]
अनुच्छेद 42 – राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबन्ध करेगा।
- जननी सुरक्षा योजना, मातृत्व अवकाश इसी की परिणीति है।
अनुच्छेद 43: कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि
- कर्मकारों को काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवन स्तर और अवकाश का सम्पूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएं, विशिष्टतया ग्रामों में कुटीर उद्योगों को वैयक्तिक या सहकारी आधार पर बढ़ाने का प्रयास करेगा।
- अनुच्छेद 43 (A) – ‘श्रमिकों की औद्योगिक प्रबंधन में भागीदारी’ (42वें सशोधन – 1976 द्वारा जोड़ा गया।)
- अनुच्छेद 43 (B) – राज्य सहकारी समितियों के निर्माण, संचालन व प्रबन्धन में सहायता देगा। (97वें संविधान संशोधन – 2011 द्वारा जोड़ा गया।)
- 97वें संशोधन द्वारा सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा दिया गया है। इस संशोधन द्वारा – भाग- 9(B) अनुच्छेद 243 ZH – ZT तथा अनुच्छेद 43(B) जोड़े गये है। 19(1) (C) में सहकारी समिति गठन को मूल अधिकार बना दिया गया है।
अनुच्छेद 44 – राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (Common Civil Code) लागू करेगा।
- समान नागरिक सहिता सिर्फ एक राज्य ‘गोवा’ में लागू है।
- वाद –
- मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो ( 1985) के मामले में यह निर्णय दिया गया कि मुस्लिम महिलाओं को भी तलाक लेने का अधिकार है तथा तलाक के बाद उन्हें भरण-पोषण भत्ता प्राप्त करने का अधिकार है। इसे शाहबानो वाद भी कहा जाता है।
- ↓ निर्णय के प्रभाव को समाप्त करने हेतु
- शाहबानो वाद में दिये गये निर्णय के प्रभाव को समाप्त करने हेतु मुस्लिम महिला ( तलाक से संरक्षण ) अधिनियम1986 बनाया गया है।
- डेनियल लतीफी बनाम भारत संघ ( 2002) के मामले में इस अधिनियम को चुनौती दी गई तथा न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि तलाक शुदा मुस्लिम महिला को पुनर्विवाह तक भरण पोषण भत्ता दिया जाएगा।
- शायराबानो बनाम भारत संघ ( 2017) के मामले में तीन तलाक (तलाक ए बिद्दत) पर रोक लगाई गई है। तीन तलाक कानून – मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम
- अधिनियम लागू – 19 सितंबर 2018 से
- सरला मुद्गल बनाम भारत संघ – अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं।
- ग्रेनविल ऑस्टिन – समान नागरिक संहिता का प्रावधान मौलिक अधिकारो में होता तो न्याय योग्य होता।
अनुच्छेद 45 – प्रारम्भिक शैशवावस्था की देखरेख व छः वर्ष से कम आयु के बालकों की शिक्षा का प्रावधान।
- 1928 की नेहरू रिपोर्ट में भी प्रारम्भिक शिक्षा का अधिकार था।
86वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2002
इसके तीन मुख्य प्रावधान
- अनुच्छेद 21(क) (नया जोड़ा गया)
- 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया।
- प्राथमिक शिक्षा को अनुच्छेद 21 ‘क’ के तहत मूल अधिकार बनाया गया ।
- अनुच्छेद 45 (संशोधित)
- अनुच्छेद 45 की विषयवस्तु को बदला गया।
- पहले अनुच्छेद 45 में लिखा था कि “राज्य 14 वर्ष की आयु तक सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेगा।”
- 86वें संशोधन के बाद इसे बदलकर यह किया गया कि “राज्य 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यकाल की देखभाल और शिक्षा का प्रावधान करेगा।”
- अनुच्छेद 51(क) (K) (मौलिक कर्तव्य नया जोड़ा गया
- प्रत्येक अभिभावक/अभिरक्षक का कर्तव्य होगा कि वह 6 से 14 वर्ष के अपने बच्चे को शिक्षा दिलवाए।
अनुच्छेद 46 – अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि के लिए विशेष प्रयत्न करेगा।
- केवल अनुच्छेद 46 में ही समाज के दुर्बल वर्ग का उल्लेख है। इसमें OBC का शब्दश: वर्णन नहीं है।
अनुच्छेद 47 – पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा उठाने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य का प्राथमिक कर्तव्य।
- स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक नशीली दवाओं, मदिरा, ड्रग के औषधीय प्रयोजनों से भिन्न उपभोग पर प्रतिबंध
अनुच्छेद 48 – राज्य, कृषि व पशुपालन का आधुनिकीकरण व वैज्ञानिकीरण करेगा, गाय, बछड़ा व अन्य दुधारू व वाहक पशुओं का वध रोकेगा तथा इनका नस्ल सुधार करेगा।
- अनुच्छेद 48 (A) – पर्यावरण संरक्षण व संवर्धन तथा वन व वन्य जीवों की रक्षा ( 42वां संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा गया। ) (उदार बौद्धिक सिद्धांत )
- पर्यावरण व वन्य जीव संरक्षण अधिनियम – 1972
- वन संरक्षण अधिनियम – 1980
- जैव विविधता संरक्षण अधिनियम – 2002
अनुच्छेद 49 – राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण करना राज्य की बाध्यता
- संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन
अनुच्छेद 50 – राज्य की लोक सेवाओ में कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण हेतु राज्य कदम उठाएगा।
- अनुच्छेद 50 को शक्तियों के पृथक्करण का आधार कहा जाता है।
अनुच्छेद 51 – अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि- राज्य,-
- (क) राज्य अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा में वृद्धि करेगा
- (ख) राष्ट्रों के मध्य समान एवं सम्मानपूर्ण संबंध स्थापित करेगा
- (ग) अंतरराष्ट्रीय कानून व संधियों का आदर करेगा
- (घ) अंतरराष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा सुलझाने का प्रयास करेगा ।[क्रमानुसार याद करे]
- नोट : शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, गुटनिरपेक्ष नीति, पंचशील नीति → विदेश नीति का आधार है लेकिन अनुच्छेद 51 में नहीं है।
विभिन्न संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़े गये राज्य के नीति निदेशक तत्व, जिनकी राज्य से अपेक्षा रहती है-
42वें संशोधन अधिनियम 1976: निदेशक तत्व की मूल सूची में 4 तत्व और जोड़े गए।
- (अनुच्छेद 39A) – समान न्याय को बढ़ावा देने के लिए और गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करना।
- राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की स्थापना 1995 में विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत की गई है, ताकि गरीबों को नि:शुल्क एवं उचित कानूनी सहायता प्राप्त हो सके । इसके अलावा समान न्याय को बढ़ावा देने के लिए लोक अदालतों का गठन किया गया । लोक अदालत सांविधानिक फोरम हैं, जो कानूनी विवाद का निपटारा करते हैं, इन्हें जन अधिकार अदालतों के समान स्तर दिया गया। इनके निर्णय मानने की बाध्यता होती है और इनके फैसले के विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई अपील नहीं है।
- अनुच्छेद 39 (f) – बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएं दी जाएं और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।
- (अनुच्छेद 43A) – उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी को सुरक्षित करने के लिए कदम उठाना।
- (अनुच्छेद 48A) – रक्षा और पर्यावरण को बेहतर बनाने और जंगलों और वन्य जीवन की रक्षा करना।
44वें संशोधन अधिनियम 1978 : एक और निदेशक तत्व को जोड़ता है –
- 38 (2) राज्य → आय, प्रस्थिति, सुविधाओं व अवसरों की असमानताओ को कम करेगा।
86वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2002
इसके तीन मुख्य प्रावधान
अनुच्छेद 21(क) (नया जोड़ा गया)
- 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया।
- प्राथमिक शिक्षा को अनुच्छेद 21 ‘क’ के तहत मूल अधिकार बनाया गया ।
अनुच्छेद 45 (संशोधित)
- अनुच्छेद 45 की विषयवस्तु को बदला गया।
- पहले अनुच्छेद 45 में लिखा था कि “राज्य 14 वर्ष की आयु तक सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेगा।”
- 86वें संशोधन के बाद इसे बदलकर यह किया गया कि “राज्य 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यकाल की देखभाल और शिक्षा का प्रावधान करेगा।”
अनुच्छेद 51(क) (K) (मौलिक कर्तव्य नया जोड़ा गया
- प्रत्येक अभिभावक/अभिरक्षक का कर्तव्य होगा कि वह 6 से 14 वर्ष के अपने बच्चे को शिक्षा दिलवाए।
97वाँ संशोधन अधिनियम 2011: एक और निदेशक तत्व को जोड़ता है-
- (अनुच्छेद 43B) – जो राज्य से अपेक्षा रखता है कि वह सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त संचालन, लोकतांत्रिक नियंत्रण तथा व्यावसायिक प्रबंधन को बढ़ावा देना।विभिन्न संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़े गये राज्य के नीति निदेशक तत्व, जिनकी राज्य से अपेक्षा रहती है-
निदेशक तत्वों का वर्गीकरण (Classification of DPSPs)
समाजवादी सिद्धांत (Socialistic Principles)
- ये समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित हैं और लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की दिशा में कार्य करते हैं। इनका उद्देश्य है — सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय।
- राज्य को निर्देश दिया गया है कि वह:
- (अनुच्छेद 38) : सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित करे जिसमें न्याय और समानता हो तथा असमानताओं का उन्मूलन हो ।
- (अनुच्छेद 39-A) : गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता ।
- (अनुच्छेद 41) : काम, शिक्षा, और सार्वजनिक सहायता का अधिकार ।
- (अनुच्छेद 42) : न्यायसंगत श्रम दशाएँ और मातृत्व सहायता ।
- (अनुच्छेद 43) : निर्वाह मजदूरी, गरिमापूर्ण जीवन और सांस्कृतिक अवसर ।
- (अनुच्छेद 43A) : उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिक भागीदारी ।
- (अनुच्छेद 47) : पोषण, जीवन स्तर और लोक स्वास्थ्य का सुधार ।
गांधीवादी सिद्धांत (Gandhian Principles)
- ये सिद्धांत महात्मा गांधी की विचारधारा से प्रेरित हैं और ग्रामीण पुनर्रचना, नैतिक मूल्यों, वंचितों के कल्याण आदि पर केंद्रित हैं।
- राज्य को निर्देशित किया गया है कि वह:
- (अनुच्छेद 40) : ग्राम पंचायतों का गठन करे और उन्हें स्वशासन की शक्तियाँ दे ।
- (अनुच्छेद 43) : ग्रामीण कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन दे ।
- (अनुच्छेद 43B) : सहकारी समितियों को स्वतंत्र और लोकतांत्रिक ढंग से प्रोत्साहित करे।
- (अनुच्छेद 46) : दलितों, जनजातियों और कमजोर वर्गों के शैक्षणिक व आर्थिक हितों की रक्षा करे ।
- (अनुच्छेद 47) : नशीली दवाओं और मद्यपान पर रोक लगाए ।
- (अनुच्छेद 48) : गाय, बछड़ा व अन्य दुधारू पशुओं की हत्या पर रोक और उनकी नस्लों का संरक्षण करे ।
उदार बुद्धिजीवी सिद्धांत (Liberal-Intellectual Principles)
- ये आधुनिक, वैज्ञानिक, और उदारवादी दृष्टिकोण से प्रेरित हैं और प्रशासन, विज्ञान, पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों जैसे क्षेत्रों से संबंधित हैं।
- राज्य को निर्देशित किया गया है कि वह:
- (अनुच्छेद 44) : सभी नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता बनाए ।
- (अनुच्छेद 45) : सभी बच्चों को 14 वर्ष तक नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा दे ।
- (अनुच्छेद 48) : कृषि और पशुपालन में वैज्ञानिक पद्धति को अपनाए ।
- (अनुच्छेद 48A) : पर्यावरण, वन और वन्यजीवों का संरक्षण करे ।
- (अनुच्छेद 49) : राष्ट्रीय महत्व की धरोहरों और स्मारकों का संरक्षण करे ।
- (अनुच्छेद 50) : न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् करे ।
- (अनुच्छेद 51) : अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा दे और विवादों का समाधान मध्यस्थता से करे ।
आर्थिक न्याय संबंधी सिद्धांत-
- अनुच्छेद – 38 , 39, 38, 39, 41, 42, 43, 43A, 46
सामाजिक सुरक्षा संबंधी सिद्धांत:
- अनुच्छेद 39(क), 41, 42, 43, 43(क), 43(ख), 45, 46, 47,
निष्कर्ष (Conclusion):
- निदेशक तत्व भारत के संविधान की आत्मा के नैतिक और वैचारिक आयाम हैं। इनका वर्गीकरण इन्हें समझने और लागू करने में सहायक होता है। ये तीनों श्रेणियाँ मिलकर भारत को एक सशक्त, समावेशी और न्यायपूर्ण राष्ट्र बनाने की दिशा में कार्य करती हैं।
शिक्षा का वर्णन से सम्बन्धित राज्य के नीति निदेशक तत्व:
- अनुच्छेद 41 – कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार।
- अनुच्छेद 45 – प्रारंभिक शैशवावस्था की देखरेख, छ: वर्ष से कम आयु के बालकों की शिक्षा का प्रावधान।
- अनुच्छेद 46 – अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि।
भाग -4 के अलावा संविधान में वर्णित निदेशक तत्व
- अनुच्छेद 335 – एससी व एस टी को संघ व राज्य सेवाओं में आरक्षण देते समय प्रशासनिक दक्षता का ध्यान रखा जाये।
- अनुच्छेद 350 (A) – भाषायी अल्पसंख्यक वर्ग के बच्चों को उनकी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध करवाना।
- अनुच्छेद 351 – हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार करना।
मूल अधिकारों व नीति – निदेशक तत्वों के मध्य विवाद
- श्रीमती चम्पकम दोईराजन V/s मद्रास राज्य – 1951 :-
- मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक सिद्धांतों के मध्य संबंधों पर समय एवं परिस्थितियों के अनुसार न्यायपालिका का दृष्टिकोण परिवर्तित होता रहा है । यह मूल अधिकार व DPS के मध्य टकराव से सम्बन्धित प्रथम वाद था।
- उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि मूल अधिकार व नीति-निदेशक सिद्धांतों के विरोध की स्थिति में मूल अधिकार नीति निदेशक सिद्धांतों पर अभिभावी होंगे।
- इस वाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि – “निदेशक तत्वों को मूल अधिकार के अध्याय के अनुरूप और उनके सहायक के रूप में कार्य करना होगा।’
- कामेश्वर सिंह V/s बिहार राज्य – 1951 :- यह केस भूमि सुधार व जागीदार प्रथा के उन्मूलन से संबंधित था। कामेश्वर सिंह ने सम्पति के अधिकार के तहत केस किया। S.C. ने कामेश्वर सिंह का पक्ष लिया तथा मूल अधिकारों को प्रभावी माना।
- बेला बनर्जी वाद -1954 :- सम्पत्ति अधिग्रहण की उचित क्षतिपूर्ति व मुआवजे से संबधित इस केस में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल अधिकार को प्रभावी माना।
- गोलकनाथ V/s पंजाब :- 1967 – मूल अधिकार प्रभावी। इनमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता।
- गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य ( 1967 ) मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि नीति निदेशक तत्त्वों को लागू करने के लिए मूल अधिकारों में संशोधन नहीं किया जा सकता।
- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) – उच्चतम न्यायालय ने कहा कि “मूल अधिकारों तथा नीति-निदेशक सिद्धांतों के बीच कोई विरोध नहीं है। वे एक-दूसरे के पूरक है”
संसद ने सुप्रीम कोर्ट के इन निर्णयों को फेल करने के लिए कुछ संशोधन किये-
- प्रथम संविधान संशोधन – 1951 :- भूमि सुधारों से सम्बन्धित नौवीं अनुसूचि जोड़ दी तथा अनुच्छेद 31 सम्पति के अधिकार पर प्रतिबंध हेतु- 31 (A) व (B) जोड़ दिया।
- चौथा संविधान संशोधन – 1955 :- बेला बनर्जी वाद को फेल करने के लिए किया।
- संशोधन में कहा गया – राज्य लोकहित (Public Interest) में व्यक्तिगत सम्पत्ति को हस्तगत कर सकता है।
- न्यायपालिका इसकी क्षतिपूर्ति का पुनगावलोकन नहीं कर सकती।
- 17वां सविधन संशोधन – 1965 :- नौवी अनुसूचि में कुछ भूमि सुधार जोडे गये।
- 24वां संविधान संशोधन – 1971 :- गोलकनाथ वाद (1967) को फेल कर दिया। संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी अनुच्छेद में परिर्वतन कर सकती है।
- 25वां संविधान संशोधन – 1971 :- यह मूल अधिकार व DPS के आपसी संबधों के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण संशोधन है । 25वे संशोधन में दो बातें महत्वपूर्ण है तथा बेला बनर्जी वाद तथा बैकों के राष्ट्रीयकरण में मुआवजे वाले प्रावधान के कारण 31 (C) जोड़ा गया ।
- 39(b) व 39(c) को लागू करते समय अनुच्छेद 14-19 व 31 का अतिक्रमण किया जा सकता है।
- इस अतिक्रमण का न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) भी नहीं होगा।
- इन दोनों प्रावधानों को संविधान में स्थान देने के लिए अनुच्छेद 31(C) जोड़ा गया।
↓चुनौति
- केशवानन्द वाद – 1973 – 25वें संशोधन (1971) को केशवानन्द वाद – 1973 में चुनौती दी गयी। केशवानन्द बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 25वें संशोधन के प्रथम प्रावधान को तो मान लिया पर द्वितीय को अवैध घोषित कर दिया।
- (अनुच्छेद 39(b) -समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार वितरित किया जाए कि आम हित की पूर्ति हो सके)
- (अनुच्छेद 39(c) – राज्य को धन को कुछ हाथों में केंद्रित करने से बचाना होगा।)
6. 42वां संविधान संशोधन – 1976
- इस संशोधन के भी दो प्रावधान महत्वपूर्ण है-
- प्रथम – समस्त नीति-निदेशक तत्व – मूल अधिकारों पर प्रभावी होगें।
- द्वितीय – ऐसे प्रावधानों की न्यायिक समीक्षा भी नहीं होगी।
↓चुनौति
- मिनर्वा मिल्स वाद – 1980 में चुनौती दी गयी। सुप्रीम कोर्ट ने 42वें संशोधन के इन दोनों प्रावधानों को अवैध घोषित कर दिया पर केशवानन्द भारती वाद वाले 25वें संशोधन के प्रथम प्रावधान को फिर स्वीकार कर लिया।
7. मिनर्वा मिल्स वाद – 1980 – मूल अधिकार व नीति – निदेशक तत्व एक दूसरे के पूरक है।
- इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने इस विस्तार को शून्य कर दिया।
- इस वाद में उच्चतम न््यायलय ने कहा – भाग-3 व भाग-4 के मध्य संतुलन व सांमजस्य संविधान का मूलभूत ढांचा है।
- इसे ‘समन्वयकारी अर्थान्वयन का सिद्धांत” कहा जा सकता है।
- के. संथानाम – DPSP ने विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका के मध्य टकराव को जन्म दिया है।
वर्तमान स्थिति –
- केवल 39(B) व (C) में वर्णित DPS ही मूल अधिकारों पर प्रभावी है। इन्हे लागू करने के लिए मूल अधिकारों में संशोधन किया जा सकता हैं।
- इसलिए कहा जाता है 39(B) व (C) के आने पर अनुच्छेद 14 व 19 चले जाते है बाकी स्थितियों में मूल – अधिकार ही प्रभावी रहते हैं।
उन्नीकृष्णन बनाम आंध्रप्रदेश वाद –
- भाग –3 भाग – 4 एक दूसरे के सहायक व पूरक है तथा मूल अधिकार भाग -4 में दिए गए लक्ष्यों को प्राप्त करने का साधन है ।
वेंकटचलैया आयोग (2002)-
- सामरिक कार्य योजना
- हर पाँचवे वर्ष शिक्षा आयोग गठित
- सभ्य समाज द्वारा पहल सद्भाव
- OPS लागू हेतु उच्चस्तरीय निकाय गठित
के.संथानम –
- DPS से केंद्र व राज्य, राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री और राज्यपाल व मुख्यमंत्री के बीच संवैधानिक टकराव होगा।
निम्नलिखित मामलों में उल्लेखनीय एवं लाभदायक हैः-
- ये ‘अनुदेशों’ की तरह हैं या ये भारतीय संघ के अधिकृतों को संबोधित सामान्य संस्तुतियां हैं ।
- ये न्यायालयों के लिए उपयोगी मार्गदर्शक हैं |
- ये प्रस्तावना को विस्तृत रूप देते हैं, जिनसे भारत के नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व के प्रति बल मिलता है।
- ये नागरिकों के मूल अधिकारों के पूरक होते हैं
- ये विपक्ष द्वारा सरकार पर नियंत्रण को संभव बनाते हैं।
- ये सरकार के प्रदर्शन की कड़ी परीक्षा करते हैं।
निदेशक तत्वों की आलोचना
- संविधान सभा के कुछ सदस्यों एवं विशेषज्ञों ने निम्न आधारों पर इनकी आलोचना की —
- कानूनी शक्ति का अभाव (Lack of Legal Force)
- ये गैर-न्यायोचित (non-justiciable) हैं, अर्थात् इनका उल्लंघन होने पर न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती।
- के. टी. शाह: “यह एक ऐसा चेक है, जिसका भुगतान बैंक के पास संसाधन होने पर ही संभव है।”
- नसीरुद्दीन: नव वर्ष के उन वादों की तरह हैं, जो जनवरी बीतते-बीतते ही टूट जाते हैं।”
- टी.टी. कृष्णमचारी: “भावनाओं का स्थायी कूड़ाघर।”
- के.सी. व्हेयर: “लक्ष्य और आकांक्षाओं का घोषणापत्र”।
- सर आइवर जेनिंग्स: “कर्मकांडी आकांक्षाएं”।
- तर्कहीन संगठन (Irrational Arrangement)
- इन तत्वों को तार्किक, वर्गीकृत एवं वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित नहीं किया गया है।
- एन. श्रीनिवासन:
- “ये आधुनिक और प्राचीन तत्वों का मिश्रण हैं।”
- “महत्वपूर्ण मुद्दे कम महत्वपूर्ण मुद्दों से मिश्रित कर दिए गए हैं।”
- रूढ़िवादी प्रकृति (Conservative Nature)
- सर आइवर जेनिंग्स:
- “यह 19वीं सदी के इंग्लैंड के राजनीतिक दर्शन पर आधारित हैं।”
- “यह फेबियन समाजवाद जैसा है, परन्तु बिना समाजवाद के।”
- “ये 21वीं सदी में अप्रचलित सिद्ध होंगे।”
- सर आइवर जेनिंग्स:
- संवैधानिक टकराव (Constitutional Conflict)
- के. संथानम के अनुसार:
- केंद्र और राज्य के बीच,
- प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच,
- मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच
- टकराव की संभावना उत्पन्न हो सकती है।
- उदाहरण: राष्ट्रपति संसद द्वारा पारित ऐसे विधेयक को अस्वीकार कर सकता है जो निदेशक तत्वों का उल्लंघन करता हो।
- के. संथानम के अनुसार:
मूल अधिकारों एवं निदेशक तत्वों के मध्य विभेद
| क्र. सं. | मूल अधिकार | निदेशक तत्व |
| 1 | ये नकारात्मक हैं जैसा कि ये राज्य को कुछ मसलों पर कार्य करने से प्रतिबंधित करते हैं। | ये सकारात्मक हैं, राज्य को कुछ मसलों पर इनकी आवश्यकता होती है। |
| 2 | ये न्यायोचित होते हैं, इनके हनन पर न्यायालय द्वारा इन्हें लागू कराया जा सकता है। | ये गैर-न्यायोचित होते हैं। इन्हें कानूनी रूप से न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता। |
| 3 | इनका उद्देश्य देश में लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना है। | इनका उद्देश्य देश में सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना है। |
| 4 | ये कानूनी रूप से मान्य हैं। | इन्हें नैतिक एवं राजनीतिक मान्यता प्राप्त है। |
| 5 | ये व्यक्तिगत कल्याण को प्रोत्साहन देते हैं, इस प्रकार ये वैयक्तिक हैं। | ये समुदाय के कल्याण को प्रोत्साहित करते हैं, इस तरह ये समाजवादी हैं। |
| 6 | इनको लागू करने के लिए विधान की आवश्यकता नहीं, ये स्वतः लागू हैं। | इन्हें लागू रखने विधान की आवश्यकता होती है, ये स्वतः लागू नहीं होते। |
| 7 | न्यायलय इस बात के लिए बाध्य है कि किसी भी मूल अधिकार के हनन की विधि को वह गैर-संवैधानिक एवं अवैध घोषित करे। | निदेशक तत्वों का उल्लंघन करने वाली किसी विधि को न्यायालय असंवैधानिक और अवैध घोषित नहीं कर सकता। यद्यपि विधि की वैधता को इस आधार पर सही ठहराया जा सकता है कि इन्हें निदेशक तत्वों को प्रभावी करने के लिए लागू किया गया था। |
निदेशक तत्वों का क्रियान्वयन
नियोजित आर्थिक विकास हेतु प्रयास
- योजना आयोग की स्थापना (1950) — नियोजित समाजवादी विकास हेतु।
- नीति आयोग की स्थापना (2015) — योजना आयोग का स्थान लिया।
- पंचवर्षीय योजनाएँ — समाजिक व आर्थिक न्याय, अवसरों में समानता।
कृषि और भूमि सुधार
- जमींदारी, जागीरदारी, ईनामदारी का उन्मूलन।
- किरायेदारी सुधार (किराएदारों की सुरक्षा, उचित किराया आदि)।
- भूमि सीमांकन व्यवस्था।
- अतिरिक्त भूमि का भूमिहीनों में वितरण।
- सहकारी कृषि का विकास।
श्रमिकों के लिए कल्याणकारी कानून
- न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (1948)
- मजदूरी भुगतान अधिनियम (1936)
- बोनस अधिनियम (1965)
- ठेका श्रम अधिनियम (1970)
- बंधुआ श्रम उन्मूलन अधिनियम (1976)
- बाल श्रम निषेध अधिनियम (1986) संशोधित 2016 में, का नाम बदलकर बाल एवं किशोर श्रम निषेध एवं विनियमन अधिनियम, 1980 कर दिया गया।
- वर्ष 2006 में सरकार ने बाल श्रम पर प्रतिबंध लगाया।
- औद्योगिक विवाद अधिनियम (1947)
- कारखाना अधिनियम (1948)
- खान अधिनियम (1952)
- कर्मकार प्रतिकार अधिनियम (1923)
- व्यवसाय संघ अधिनियम (1926)
महिलाओं के हित में कानून
- प्रसूति लाभ अधिनियम (1961)
- समान पारिश्रमिक अधिनियम (1976)
वित्तीय संस्थानों का सार्वजनिककरण
- जीवन बीमा राष्ट्रीयकरण (1956)
- 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण (1969)
- सामान्य बीमा का राष्ट्रीयकरण (1971)
- शाही खर्च समाप्ति (1971)
विधिक सहायता और न्याय प्रणाली
- विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम (1987) — गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता।
- लोक अदालतों की स्थापना — वैकल्पिक न्याय मंच, जिनके निर्णय बाध्यकारी हैं।
कुटीर एवं लघु उद्योग का प्रोत्साहन
- खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग
- लघु उद्योग बोर्ड
- राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम
- हथकरघा बोर्ड, कॉयर बोर्ड, सिल्क बोर्ड आदि
ग्रामीण एवं कमजोर क्षेत्रों का विकास
- सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952)
- पर्वतीय क्षेत्र विकास (1960)
- सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (1973)
- न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम (1974)
- एकीकृत ग्रामीण विकास योजना (1978)
- जवाहर रोजगार योजना (1989)
- स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (1999)
- संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (2001)
- मनरेगा – राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना (2006)
पर्यावरण संरक्षण हेतु कानून
- वन्य जीव संरक्षण अधिनियम (1972)
- वन संरक्षण अधिनियम (1980)
- जल अधिनियम वायु अधिनियम — प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्थापना।
- राष्ट्रीय वन नीति (1988) — वनों का संरक्षण और विकास।
कृषि एवं पशुपालन का आधुनिकीकरण
- उच्च गुणवत्ता बीज, खाद, सिंचाई सुविधा।
- आधुनिक पशु चिकित्सा सेवाओं की व्यवस्था।
पंचायती राज का संवैधानिक दर्जा
- 73वां संविधान संशोधन अधिनियम (1992)
- ग्राम, ताल्लुक एवं जिला स्तर पर पंचायती राज संस्थाएं।
सामाजिक न्याय एवं आरक्षण
- अनुसूचित जाति/जनजाति/पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण।
- अस्पृश्यता अधिनियम (1955) → सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम (1976)
- अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989
- 65वां संशोधन (1990) — SC/ST आयोग की स्थापना
- 89वां संशोधन (2003) — SC और ST के लिए अलग आयोग
- राष्ट्रीय आयोगों की स्थापना
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (1993)
- राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (1993)
- राष्ट्रीय महिला आयोग (1992)
- राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (2004)
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (2004)
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग
- वर्ष 1978 में गृह मंत्रालय द्वारा पारित एक संकल्प में अल्पसंख्यक आयोग (Minorities Commission- MC) की स्थापना की परिकल्पना की गई थी।
- वर्ष 1984 में, अल्पसंख्यक आयोग को गृह मंत्रालय से अलग कर दिया गया और इसे नव-निर्मित कल्याण मंत्रालय (Ministry of Welfare) के अधीन रखा गया, जिसने वर्ष 1988 में भाषाई अल्पसंख्यकों को आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया।
- वर्ष 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के अधिनियमन के साथ ही अल्पसंख्यक आयोग एक सांविधिक/वैधानिक (Statutory) निकाय बन गया और इसका नाम बदलकर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) कर दिया गया।
- वर्ष 2014 में जैन धर्म मानने वालों को भी अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में अधिसूचित किया गया था।
पिछड़े वर्गों के लिए राष्ट्रीय आयोग (1993)
- 102वें संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 338बी जोड़ा गया।
- यह अनुच्छेद सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए एक आयोग की स्थापना का प्रावधान करता है जिसे राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के नाम से जाना जाएगा।
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989
- यह अन्य बातों के साथ-साथ अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के प्रति होने वाले अपराधों को रोकने, ऐसे अपराधों के अभियोजन के लिये विशेष न्यायालय बनाने तथा राहत देने और ऐसे अपराधों के शिकार लोगों के पुनर्वास के लिये प्रावधान करने वाला एक अधिनियम है। इस कानून को और प्रभावी बनाने के लिये वर्ष 2015 में इसमें संशोधन किये गए तथा यह 26 जनवरी, 2016 से लागू हुआ।
कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का पृथक्करण
- दंड प्रक्रिया संहिता (1973) — कार्यपालक (कलेक्टर) से न्यायिक शक्तियाँ हटाकर न्यायिक मजिस्ट्रेट को दी गईं।
सांस्कृतिक संरक्षण
- प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्मारक अधिनियम (1951) — राष्ट्रीय महत्व के पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा।
स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और अस्पतालों की स्थापना।
- मलेरिया, टीबी, कुष्ठ, एड्स, कैंसर आदि के उन्मूलन हेतु योजनाएं।
गोसंवर्धन के प्रयास
- कई राज्यों में गाय, बछड़े, बैलों की हत्या पर प्रतिबंध।
वृद्धावस्था पेंशन
- कई राज्यों में 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को वृद्धावस्था पेंशन।
अंतर्राष्ट्रीय शांति की नीति
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM)
- पंचशील नीति को अपनाना।
कमी व चुनौतियाँ (Limitations)
- अपर्याप्त वित्तीय संसाधन
- प्रतिकूल सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ
- जनसंख्या विस्फोट
- केंद्र-राज्य तनावपूर्ण संबंध
भाग IV से बाहर के निदेश
- भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्व मुख्यतः भाग IV (अनुच्छेद 36 से 51) में समाहित हैं, परंतु कुछ अन्य निदेश संविधान के अन्य भागों में भी प्रदान किए गए हैं। ये भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
अनुसूचित जातियों और जनजातियों के दावे
- अनुच्छेद: 335 (भाग XVI)
- संघ और राज्य के कार्यकलाप से संबंधित सेवाओं और पदों में नियुक्तियों के संदर्भ में, अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के दावों पर ध्यान दिया जाएगा।
- शर्त: यह कार्य प्रशासनिक दक्षता बनाए रखते हुए किया जाएगा।
मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था
- अनुच्छेद: 350A (भाग XVII)
- प्रत्येक राज्य और उसके भीतर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी यह प्रयास करेगा कि भाषाई अल्पसंख्यकों के बच्चों को प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त हो।
हिंदी भाषा का प्रचार और विकास
- अनुच्छेद: 351 (भाग XVII)
- केंद्र सरकार का कर्तव्य है कि वह हिंदी भाषा का प्रचार, प्रसार और विकास करे ताकि वह भारत की सामायिक संस्कृति की प्रमुख अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।
- उपर्युक्त सभी निदेश न्यायालयों में प्रवर्तनीय (Justiciable) नहीं हैं।
- लेकिन इन्हें संविधान का अभिन्न अंग माना गया है और इनका नैतिक, प्रशासनिक तथा नीतिगत महत्व अत्यधिक है।
- न्यायालयों द्वारा भी इन निदेशों को समय-समय पर महत्वपूर्ण संवैधानिक मार्गदर्शक माना गया है।
निष्कर्ष
- यद्यपि ये निदेश भाग IV में नहीं आते, फिर भी इनका उद्देश्य संविधान की मूल भावना — समानता, सामाजिक न्याय और समावेशन — को साकार करना है।
महत्वपूर्ण क़ानून एवं अधिनियम :-
बालश्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986
- यह अधिनियम बालकों को खतरनाक व अनुपयुक्त कार्यों से बचाने तथा उनके अधिकारों की रक्षा करने हेतु बनाया गया।
- इस अधिनियम के अंतर्गत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे को “बालक” माना गया।
- बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 के अंतर्गत:
- 14 वर्ष से कम बच्चों का किसी भी प्रकार के कार्य में रोजगार पूर्णतः निषिद्ध।
- 14 से 18 वर्ष की आयु के किशोरों को खतरनाक व्यवसायों और प्रक्रियाओं में काम करने से मना किया गया।
- बच्चों को परिवार आधारित कार्य व मनोरंजन उद्योग (जैसे फिल्मों में अभिनय, खेल, विज्ञापन) में माता-पिता की देखरेख में कार्य करने की अनुमति।
- दंड बढ़ाए गए – न्यूनतम 6 माह से 2 वर्ष तक की सजा और ₹20,000 से ₹50,000 तक का जुर्माना।
PNDT Act, 1994:
- कन्या भ्रूण हत्या (Female Foeticide) को रोकने के लिए भारत सरकार ने 1994 में “गर्भाधान पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन पर प्रतिबंध) अधिनियम” [Pre-Natal Diagnostic Techniques (Regulation and Prevention of Misuse) Act – PNDT Act, 1994] बनाया। इसके द्वारा अल्ट्रासाउण्ड सोनाग्राफी द्वारा भ्रण के लिंग परीक्षण को रोका गया है तथा इसे अपराध घोषित किया गया है। वर्ष 2003 में इसका संशोधन किया गया और इसका नाम बदलकर “गर्भाधान पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (प्रतिषेध अधिनियम), 2003 [PCPNDT Act, 2003]” कर दिया गया।
राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग का गठन फरवरी 2010 में किया गया।
किशोर न्याय अधिनियम (देखभाल एवं संरक्षण) 2000 के अनुसार 18 वर्ष की आयु तक के बालकों के साथ अपराधियों के समान व्यवहार नहीं किया जा सकता ।”
“निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009
- निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, राज्य में 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ।
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012
- यह अधिनियम 2012 में लागू किया गया था।
- उद्देश्य: बच्चों (18 वर्ष से कम आयु) को यौन उत्पीड़न, यौन शोषण और अश्लील कृत्यों से सुरक्षा प्रदान करना।
- यह कानून बालकों एवं बालिकाओं दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
- बाल अधिकार संरक्षण आयोग कानून, 2005
- 20 नवंबर, 1989 को संयुक्त राष्ट्र संघ के बाल अधिकार अधिवेशन द्वारा स्वीकार किए गए थे तथा जिन पर भारत सरकार ने 11 दिसंबर 1992 में सहमति प्रदान की थी
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006
- भारत में बाल विवाह की समस्या को रोकने और समाप्त करने के लिए यह अधिनियम 1 नवम्बर, 2007 से लागू किया गया। इसने बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929 (Child Marriage Restraint Act, 1929) को प्रतिस्थापित किया।
- बाल विवाह को शून्य (Voidable) माना गया है।
- 18 वर्ष की आयु पूरी होने के 2 वर्ष के भीतर बाल विवाह को निरस्त (Annul) करने का अधिकार।
चाइल्ड हेल्पलाइन सेवा (1098)
- बच्चों की आपातकालीन सहायता हेतु ‘1098’ टोल-फ्री नंबर उपलब्ध है।
- यह सेवा 24 घंटे और निःशुल्क है।
- वर्तमान में यह सेवा राज्य के 20 जिलों में संचालित है।
