भारत में लोकतांत्रिक राजनीति देश की शासन व्यवस्था का वह स्वरूप है जिसमें जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव कर सरकार बनाती है और नीतियों का निर्धारण करती है। यह प्रणाली समानता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे मूल लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय के अंतर्गत भारत में लोकतांत्रिक राजनीति का अध्ययन नागरिक अधिकारों और प्रशासनिक संरचना को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत में लोकतंत्र का विकास
प्राचीन लोकतंत्र का दृष्टिकोण
भारतीय लोकतंत्र का प्राचीन आधार
- लोकतांत्रिक विचार भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन समय से मौजूद।
- शासक और शासित का संबंध पिता और संतान के समान।
- धर्म (कर्त्तव्य) आधारित शासन:
- राज धर्म – शासक के दायित्व
- प्रजा धर्म – नागरिक के दायित्व
बुनियादी मूल्य
- समरसता, स्वतंत्रता, समानता, समावेशिता
- नागरिकों के गरिमापूर्ण जीवन और सामाजिक कल्याण को सुनिश्चित
- समावेशी निर्णय प्रक्रिया, महिलाओं की भागीदारी
- सहभागिता: शासक का चयन जनता की सहमति से
दार्शनिक आधार
- ऋग्वेद: “एकम् सद विप्रा बहुधा वदन्ति” – सत्य एक, दृष्टिकोण विभिन्न
- संत, कवि और दार्शनिकों ने लोकतांत्रिक मूल्य प्रचारित
प्राचीन लोकतांत्रिक संस्थाएँ
वैदिक युग (6000–1100 ईसा पूर्व)
- सभा, समिति, प्रतिनिधि निकाय
महाकाव्य
- रामायण: सर्वसम्मति से राजा का चयन
- महाभारत: धर्म, नैतिकता और युद्ध के दौरान मार्गदर्शन
महाजनपद और गणराज्य (7वीं–8वीं शताब्दी ईसा पूर्व)
- सामूहिक शासन, 15 राजत्व, 10 गणराज्य
धर्म और लोकतंत्र
- जैन धर्म: अनेकांतवाद, अहिंसा, सह-अस्तित्व
- बौद्ध धर्म: संघ में खुली चर्चा और चुनाव
जन नेता और सहभागी शासन
- कौटिल्य: शासक का कल्याण नागरिकों पर निर्भर
- अशोक: कलिंग युद्ध के बाद शांति, कल्याण, पांच वर्षीय मंत्रिस्तरीय चुनाव
- शिलालेख और ताम्रपत्र: स्थानीय स्वशासन और चुनाव
मध्यकालीन भारत
- विजयनगर साम्राज्य: सर्वसम्मति, ग्रामीण स्वशासन
- अकबर (1556–1605): सुलह-ए-कुल, समावेशी शासन
- शिवाजी (1630–1680): अष्टप्रधान परिषद, समान अधिकार
आधुनिक भारत और संविधान
- स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा द्वारा आधुनिक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना
- विशेषताएँ:
- समानता और सार्वभौमिक मताधिकार
- त्रिस्तरीय शासन: संघ, राज्य, स्थानीय स्वशासन
- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की स्पष्ट शक्तियाँ
भारत की चुनाव प्रणाली
विकास का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
- स्वतंत्रता-पूर्व: भारत शासन अधिनियम 1858–1935 (प्रतिनिधित्व और प्रांतीय स्वायत्तता)
- स्वतंत्रता के बाद: सार्वभौमिक मताधिकार, निष्पक्ष चुनाव
संविधान द्वारा स्थापित व्यवस्था
- अनुच्छेद 324 – स्वतंत्र निर्वाचन आयोग
- अनुच्छेद 325–329 – निर्वाचन क्षेत्रों, परिसीमन, भेदभाव निषेध
मुख्य सुधार और तकनीकी नवाचार
- बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग (1989), मतदान आयु घटाई 18 वर्ष (61वां संशोधन)
- EVM (1989) और VVPAT (2013)
- NOTA (2013), EPIC (1993), आदर्श आचार संहिता (MCC)
चुनौतियाँ
| मुद्दा | विवरण |
| धन-बल का प्रभाव | अनियंत्रित चुनावी खर्च, राजनीतिक धन का स्रोत अस्पष्ट |
| राजनीति का अपराधीकरण | 543 में 251 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले |
| कम मतदान | शहरी क्षेत्रों में उदासीनता, उदाहरण: बंगलूरू 54% |
| चुनावी हिंसा | ग्रामीण और संघर्ष क्षेत्र, जैसे पश्चिम बंगाल (2024) |
| मीडिया का दुरुपयोग | फेक न्यूज और सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल |
| लिंग प्रतिनिधित्व | लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल 13.6% |
| बार-बार चुनाव | संसाधनों पर दबाव, नीति में बाधा |
सुधार एवं समाधान
- अपराधीकरण नियंत्रण, गंभीर अपराधियों पर प्रतिबंध
- एक साथ चुनाव, RVM, ऑनलाइन पंजीकरण
- स्वतंत्र और वित्तीय स्वायत्त निर्वाचन आयोग
- आंतरिक पार्टी लोकतंत्र और पारदर्शी उम्मीदवार चयन
- डिजिटल प्रचार पर नियंत्रण, VVPAT कवरेज विस्तार
- पर्यावरणीय स्थिरता और मुफ्त उपहार संस्कृति का मुकाबला
लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण और स्थानीय निकाय
परिभाषा और उद्देश्य
- राज्य के संसाधनों और कार्यों का केंद्र से स्थानीय निर्वाचित अधिकारियों को हस्तांतरण
- उद्देश्य: प्रत्यक्ष नागरिक भागीदारी, उत्तरदायित्व, जवाबदेही
संवैधानिक प्रावधान
- 73वां संशोधन (1992): पंचायत – भाग IX
- 74वां संशोधन (1992): नगरपालिका – भाग IXA
- 11वीं अनुसूची: पंचायत की शक्तियाँ
- 12वीं अनुसूची: नगरपालिकाओं की शक्तियाँ
- अनुच्छेद 40: ग्राम पंचायत का गठन
स्थानीय निकायों की प्रमुख उपलब्धियाँ
- महिला प्रतिनिधित्व: 1.3 मिलियन महिलाएँ, लगभग 49% प्रतिनिधित्व
- राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा: 3Fs (Funds, Functions, Functionaries) हस्तांतरण
सामान्य समस्याएँ
- अपर्याप्त निधि, अवसंरचना की कमी, कर्मचारी संकट
- असामयिक चुनाव, सीमित नीति भूमिका, भ्रष्टाचार
सुधार और सुदृढ़ीकरण
- ग्राम सभाओं और वार्ड समितियों का पुनरुद्धार
- संगठनात्मक ढाँचा सुदृढ़ करना, तकनीकी सहायता
- कराधान तंत्र विकसित करना
- वित्तपोषण सुनिश्चित करना और नियमित लेखापरीक्षा
लोकतंत्र का बदलता स्वरूप
- डिजिटल क्रांति: ऑनलाइन प्लेटफार्म, सोशल मीडिया, डेटा एनालिटिक्स
- चुनौतियाँ: फेक न्यूज, हेट स्पीच, ध्रुवीकरण, ट्रोलिंग
- लोकलुभावनवाद और उदार लोकतंत्र: नेता जनस्नेह जुटाते हैं, लेकिन संस्थाओं पर दबाव डालते हैं
- वैश्विक और क्षेत्रीय लोकतंत्र पतन: संस्थागत क्षय, इंटरनेट शटडाउन, कार्यकारी केंद्रीकरण
- नवाचार और लचीलापन: न्यायपालिका, नागरिक सक्रियता, युवा आंदोलन
निष्कर्ष
- लोकतंत्र जीवंत, संघर्षपूर्ण और लचीला है
- पतन और उत्थान के बीच संतुलन, नवाचार और नागरिक भागीदारी लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं
- भारत की प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक परंपरा लोकतांत्रिक मूल्यों, समावेशिता और न्याय सुनिश्चित करती है
