संविधान संशोधन भारतीय संविधान को समय, समाज और बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप लचीला बनाए रखने की प्रक्रिया है, जिसे अनुच्छेद 368 के अंतर्गत निर्धारित किया गया है। इसके माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते हुए शासन व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन किए जाते हैं, जिन्हें राजनीतिक व्यवस्था और शासन के विषय के अंतर्गत समझना अत्यंत आवश्यक है।
भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया
भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया (Article 368)
- भारतीय संविधान संशोधन की प्रक्रिया न तो बहुत कठिन (जैसे अमेरिका में) और न ही बहुत आसान (जैसे ब्रिटेन में) है।
- यह प्रक्रिया लचीलेपन और कठोरता का संतुलन है।
संशोधन की संवैधानिक व्यवस्था:
- अनुच्छेद 368 संविधान के भाग XX में है।
- संसद को संविधान के किसी उपबंध को परिवर्धन, परिवर्तन या निरसन करने की शक्ति प्रदान करता है।
- “मूल ढांचे” (Basic Structure) को नहीं बदला जा सकता (केशवानंद भारती मामला, 1973)।
संविधान संशोधन की प्रक्रिया
- संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है, राज्य विधानमण्डल में नहीं।
- अपवाद – अनुच्छेद 169 के तहत विधान परिषद् की स्थापना या समाप्ति का विधेयक राज्य विधानमण्डल में पेश किया जा सकता है।
- संशोधन विधेयक सरकारी या गैर-सरकारी (Private Member Bill) हो सकता है।
- पेश करने से पूर्व राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक नहीं है।
- विधेयक पारित करने के लिए विशेष बहुमत चाहिए –
- सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत + उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत।
- प्रत्येक सदन द्वारा अलग-अलग और प्रत्येक वाचन (Reading) पर विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक।
- दोनों सदनों से पारित होना अनिवार्य है।
- दोनों सदनों में असहमति होने पर विधेयक समाप्त हो जाता है क्योंकि संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
- संघीय ढाँचे से संबंधित संशोधन विधेयक को आधे राज्यों के विधानमण्डलों से सामान्य बहुमत से पारित कराना आवश्यक।
- राज्यों के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है।
- विधेयक पारित होने के बाद राष्ट्रपति की अनुमति अनिवार्य है।
- राष्ट्रपति न तो मना कर सकते हैं, न रोक सकते हैं और न ही पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं।
- यह बाध्यता 24वें संविधान संशोधन अधिनियम (1971) द्वारा जोड़ी गई।
- पहला संविधान संशोधन अधिनियम 1951 में पारित हुआ, जब संसद (अंतरिम) एक सदनीय थी।
संसद की शक्ति और न्यायालय की भूमिका
- 24वें संविधान संशोधन अधिनियम (1971) के बाद राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक पर मंजूरी देने को बाध्य हैं।
- संसद की शक्ति संविधान के आधारभूत ढाँचे पर निर्भर है।
- एम. नागराज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2007, AIR) – आधारभूत ढाँचे का सिद्धांत केवल वैधता परखने का मापदंड है।
- उच्चतम न्यायालय ऐसे किसी भी संशोधन को निरस्त कर सकता है जो संविधान के मूल ढाँचे से असंगत हो।
संविधान संशोधनों के प्रकार:
भारतीय संविधान में तीन प्रकार की संशोधन विधियाँ हैं:
साधारण बहुमत द्वारा: (अनुच्छेद 368 के बाहर की व्यवस्थाएँ)
- अनुच्छेद 368 के बाहर
- अनुच्छेद 2 और 3 – राज्यों का प्रवेश, गठन, क्षेत्र, सीमा और नाम परिवर्तन।
- अनुच्छेद 169 – विधान परिषद् का निर्माण और समाप्ति।
- भाग 2 – नागरिकता से संबंधित प्रावधान।
- निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण।
- द्वितीय अनुसूची (वेतन/भत्ते)
- संसद की गणपूर्ति
- नागरिकता, भाषा, अनुसूचियाँ (5वीं व 6ठीं)
- केंद्रशासित प्रदेशों से संबंधित प्रावधान (अनुच्छेद 368 के अंतर्गत केवल 02 प्रकार)
विशेष बहुमत द्वारा- अनुच्छेद 368(2)
- मौलिक अधिकार
- नीति निर्देशक तत्व
- मूल अधिकार।
- अधिकांश संवैधानिक उपबंध।
- (साधारण बहुमत और विशेष बहुमत + राज्यों की संस्तुति की श्रेणी छोड़कर शेष सभी इसी में आते हैं।)
संसद के विशेष बहुमत + आधे राज्यों की संस्तुति द्वारा: (संघीय ढांचे से संबंधित) – अनुच्छेद 368(2)
- राष्ट्रपति का निर्वाचन मंडल और प्रक्रिया (अनुच्छेद 54, 55)।
- उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय।
- सातवीं अनुसूची के प्रावधान।
- केन्द्र व राज्यों के बीच विधायी और कार्यकारी शक्तियों का विभाजन। (7वीं अनुसूची)
- अनुच्छेद 73, 162, 241, 279(क)।
- संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व।
- स्वयं अनुच्छेद 368।
विशेष तथ्य
- के.सी. व्हीयर – भारतीय संविधान लचीलेपन और जटिलता के बीच बेहतर संतुलन पर आधारित है।
- यदि दोनों सदनों में असहमति हो तो संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं।
- अब तक 3 बार दोनों सदनों में मतभेद की स्थिति हुई –
- 1970 – राजाओं के प्रिवीपर्स समाप्ति का विधेयक (लोकसभा पास, राज्यसभा अस्वीकृत) → बाद में 26वां संशोधन (1971) से प्रिवीपर्स समाप्त।
- 1978 – 44वां संशोधन (लोकसभा ने पारित, राज्यसभा ने 5 संशोधन जोड़े, लोकसभा ने मान लिए)।
- 1989 – 64वां व 65वां संशोधन लोकसभा से पास पर राज्यसभा ने समर्थन नहीं दिया।
संविधान संशोधन पर दृष्टिकोण
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आलोचनाएँ: 154916_a7a01d-f9> |
सराहनाएँ: 154916_0d11ad-39> |
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कुछ महत्वपूर्ण संशोधन
प्रथम संशोधन अधिनियम, 1951:
- यह संशोधन उस समय एकसदनीय संसद (Unicameral Legislature) द्वारा पारित किया गया था, क्योंकि:
- 1951 में भारत की संसद में केवल लोकसभा अस्तित्व में थी।
- राज्यसभा (उच्च सदन) का गठन 1952 में हुआ था।
- कानून की रक्षा के लिये संपत्ति अधिग्रहण आदि की व्यवस्था।
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 के खंड (2) में “युक्तियुक्त निर्बन्धन” शब्द स्थापित किये गए।
- अनुच्छेद 19 का मूल खंड (2) अनुच्छेद 19 (1) (a) के तहत गारंटीकृत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंधों से संबंधित था।
- भमि सुधार तथा न्यायिक समीक्षा से जुड़े अन्य कानूनों को नौंवी अनुसूची में स्थान दिया गया।
- अनुच्छेद 31 में दो उपखंड 31(क) और 31 (ख) जोड़े गये।
- वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के तीन आधार जोड़े गये, ये थे- लोक आदेश, अपराध करने के लिये उकसाना तथा विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने के लिये। प्रतिबंधों को और तर्क सांगत बनाया और इस प्रकार ये न्याययोज्य बना दिये गए।
4वाँ संशोधन अधिनियम, 1955:
- निजी संपत्ति के अनविार्य अधिग्रहण के स्थान पर दिये जाने वाले भत्ते क्षतिपूर्ति की मात्रा को न्यायालयों की जाँच के दायरे से बाहर किया गया।
7वाँ संशोधन 1956:
- कारण : यह संशोधन राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट को तथा राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 को लागू करने के लिये किया गया था।
- संविधान के प्रारंभ में लोकसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 500 निर्धारित थी। वर्ष 1952 में गठित पहले सदन में 497 लोकसभा सदस्य थे। राज्य पुनर्गठन के बाद मौजूदा राज्यों की सीमाओं में हुए बड़े बदलावों के साथ-साथ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सीटों के आवंटन में भी बदलाव हुआ। इसलिये पुनर्गठन के साथ सरकार ने संविधान में भी 7वाँ संशोधन किया जिसके द्वारा राज्यों को आवंटित सीटों की अधिकतम संख्या 500 हो गई, लेकिन छह केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करने के लिये अतिरिक्त 20 सीटें (अधिकतम सीमा) भी जोड़ी गईं। इसलिये वर्ष 1957 में चुनी गई दूसरी लोकसभा में 503 सदस्य थे।
- राज्यों के चार वर्गों की समाप्ति (भाग-क, भाग-ख, भाग-ग और भाग-घ) की गई और इनके स्थान पर 14 राज्यों एवं 6 संघ शासित प्रदेशों को स्वीकृति दी गई।
- उच्च न्यायालयों के न्यायक्षेत्र का विस्तार संघशासित प्रदेशों तक किया गया।
- दो या दो से अधिक राज्यों के लिये एक कॉमन (उभय) उच्च न्यायालय की स्थापना की व्यवस्था (प्रावधान) की गई।
9वाँ संशोधन अधिनियम, 1960:
- भारत और पाकिस्तान की सरकारों के बीच हुए समझौतों के अनुसरण में पाकिस्तान को कतिपय राज्य क्षेत्रों का हस्तांतरण करने की दृष्टि से यह संशोधन किया गया।
- इस समझौते के पश्चात् संघ ने इस मामले को उच्चतम न्यायालय के पास भेजा। न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि अनुच्छेद 3 के तहत किसी राज्य के भू-क्षेत्र को घटाने की संसद की शक्ति भारत के किसी भू-भाग को किसी दूसरे देश को सौंपने के मामले पर लागू नहीं होती।
- अतः किसी भारतीय भू-भाग को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करके ही किसी विदेशी राज्य को सौपा जा सकता है।
- संशोधनः पश्चिम बंगाल में स्थित बेरूबारी संघराज्य क्षेत्र को भारत-पाक समझौते (1958) के तहत पाकिस्तान को सौंप दिया गया।
10वाँ संशोधन अधिनियम, 1961:
- दादरा और नागर-हवेली को भारतीय संघ में जोड़ा गया।
11वाँ संशोधन अधिनियम, 1961:
- उपराष्ट्रपति के निर्वाचन प्रक्रिया में बदलाव किए गए- इसमें संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की बजाय निर्वाचक मंडल की व्यवस्था की गई।
- राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को उपयुक्त निर्वाचक मंडल में रिक्तता के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।
12वाँ संशोधन अधिनियमः
- गोवा, दमन और दीव को भारतीय संघ में शामिल किया गया।
13वाँ संशोधन अधिनियम, 1962:
- नागालैंड को राज्य का दर्जा दिया गया तथा इसके लिये विशेष उपबंध किये गये।
14वाँ संशोधन अधिनियम, 1962:
- पुदुचेरी को भारतीय संघ में शामिल किया गया।
15वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1963:
- अनुच्छेद 217 में संशोधन कर यह जोड़ा गया कि न्यायाधीश की आयु ऐसे प्राधिकारी द्वारा और ऐसी विधि से निर्धारित की जाएगी जो संसद विधि द्वारा उपबंध करे।
16वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1963:
- अनुच्छेद 19, 84 और 173 में संशोधन।
- संवैधानिक पदों (राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मंत्री, सांसद, विधायक आदि) की शपथ में “भारत की संप्रभुता और अखंडता बनाए रखने” की शर्त जोड़ी गई।
17वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1964
- भूमि सुधार कानूनों को संविधान की नवीं अनुसूची में डालकर न्यायिक समीक्षा से संरक्षण देना।
18वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1966
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 और उससे जुड़े कुछ संशोधनों की व्याख्या को स्पष्ट रूप से संविधान के अंतर्गत मान्यता दी गई।
21वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1967:
- सिंधी भाषा को आठवीं अनुसूची में 15वीं भाषा के रूप में शामिल किया गया।
24वां संशोधन अधिनियम, 1971:
- इस संशोधन के माध्यम से यह स्पष्ट हो गया की संसद अनुच्छेद 368 का उपयोग करके अनुच्छेद 13 सहित संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, अर्थात् संसद को मौलिक अधिकार में संशोधन करने की शक्ति दी गई।
- इन संवैधानिक संशोधनों पर राष्ट्रपति की सहमती देना अनिवार्य कर दिया गया।
- यह संशोधन अधिनियम गोलकनाथ मामले (1967) के बाद लाया गया था।
- यह संशोधन गोलकनाथ वाद (1967) को फेल कर दिया। संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी अनुच्छेद में परिर्वतन कर सकती है।
25वां संशोधन अधिनियम, 1971:
- राज्य के नीति निदेशक तत्वों और मौलिक अधिकारों के बीच संबंध से संबंधित अनुच्छेद 31C संविधान में जोड़ा गया।
- इस संविधान संशोधन ने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 39 (बी) या (सी) के के अंतर्गत आने वाले राज्य के नीति निदेशक तत्वों के प्रावधानों को पूरा करने के लिए बनाए गए कानून को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है कि यह अनुच्छेद 14, 19 और 31 में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
- संपत्ति के मौलिक अधिकार को कम कर दिया गया।
26वां संशोधन अधिनियम, 1971:
- रियासतों के शासकों को दिए जाने वाले प्रिवी पर्स और विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया।
31वाँ संशोधन अधिनियम, 1972:
- लोकसभा की सीटों की संख्या को 525 से बढ़ाकर 545 कर दिया गया।
35वां संशोधन अधिनियम, 1974:
- सिक्किम का संरक्षित राज्य का दर्जा समाप्त कर दिया गया और सिक्किम को भारत के ‘सहयोगी राज्य’ का दर्जा दिया गया
36वाँ संशोधन अधिनियम, 1975:
- सिक्किम को भारतीय संघ का पूर्ण राज्य बनाकर दसवीं अनुसूची को समाप्त कर दिया गया।
41वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976:
- इसने राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की सेवानिवृत्ति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी।
42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976
- इसे “लघु संविधान (Mini Constitution)” कहा जाता है।
- यह संशोधन स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों पर आधारित था।
- आपातकाल (1975-77) के दौरान इंदिरा गांधी सरकार द्वारा पारित किया गया।
- प्रस्तावना में संशोधन: तीन नए शब्द जोड़े गए: समाजवादी (Socialist), पंथनिरपेक्ष (Secular), राष्ट्रीय अखंडता (Integrity)
- नागरिकों के मौलिक कर्तव्य: भाग IV (क) जोड़ा गया। 10 मौलिक कर्तव्यों को संविधान में शामिल किया गया (अनुच्छेद 51A)।
- राष्ट्रपति की भूमिका:
- 42वें संशोधन से पहले अनुच्छेद 74 (1) में कहा गया है कि “प्रधान मंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद अपने कर्तव्यों के पालन में राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देगी”।
- भारत के संविधान (1976) के 42वें संशोधन ने सलाह को बाध्यकारी बना दिया था।
- 44वें संशोधन (1978) में हालांकि जोड़ा गया कि राष्ट्रपति पहले सलाह को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते हैं। लेकिन यदि मंत्री परिषद राष्ट्रपति को दोबारा वही सलाह भेजता है तो उसे स्वीकार करना होगा।
- प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunals): भाग XIV (क) जोड़ा गया। केंद्र और राज्य स्तर पर प्रशासनिक अधिकरणों की स्थापना की गई।
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटें: 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों को 2001 तक स्थिर किया गया।
- संवैधानिक संशोधन और न्यायिक समीक्षा: संविधान संशोधनों को न्यायिक समीक्षा से बाहर किया गया (अनुच्छेद 368 में संशोधन)।
- SC और HC की शक्तियों में कटौती: न्यायिक समीक्षा और रिट जारी करने की शक्तियों में कटौती की गई।
- लोकसभा/विधानसभा कार्यकाल: कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया (बाद में 44वें संशोधन द्वारा वापस 5 वर्ष किया गया)।
- DPSP की श्रेष्ठता: यह व्यवस्था की गई कि नीति-निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) को लागू करने के लिए बनाए गए कानूनों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकेगा। अर्थात् राज्य के नीति निदेशक तत्व की प्राथमिकता एवं सर्वोच्चता को मूल अधिकारों पर प्रभावी बनाया गया
- तीन नए नीति-निर्देशक सिद्धांत: 1. समान न्याय एवं निःशुल्क विधिक सहायता 2. कर्मकारों की उद्योग प्रबंधन में सहभागिता 3. पर्यावरण, वन, वन्यजीवों का संरक्षण
- राष्ट्रीय आपात (National Emergency): भारत के किसी भी भाग में राष्ट्रीय आपात घोषित करने की व्यवस्था की गई।
- राष्ट्रपति शासन (Article 356): राज्य में राष्ट्रपति शासन की अवधि को 6 माह से बढ़ाकर 1 वर्ष कर दिया गया।
- राज्य सूची से समवर्ती सूची में विषय: पाँच विषय स्थानांतरित किए गए:
- शिक्षा
- (शिक्षा में तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा और विश्वविद्यालयों के साथ-साथ व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण शामिल हैं।)
- वन
- वन्य जीव और पक्षियों का संरक्षण
- माप और तोल
- अधीनस्थ न्यायालयों का गठन और न्याय प्रशासन (SC/HC को छोड़कर)
- शिक्षा
- कोरम की समाप्ति: संसद और राज्य विधानसभाओं में कोरम की आवश्यकता समाप्त की गई।
- 44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978
- कुछ अलोकतांत्रिक बदलावों को निरस्त करना व लोकतंत्र की पुनर्स्थापना
- यह संशोधन आपातकाल (1975–77) के बाद जनता पार्टी सरकार (प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई) द्वारा लाया गया था।
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल: कार्यकाल को पुनः 5 वर्ष किया गया (पूर्व में 42वें संशोधन द्वारा 6 वर्ष किया गया था)।
- कोरम की व्यवस्था बहाल: संसद और राज्य विधानमंडलों के लिए कोरम की अनिवार्यता को फिर से लागू किया गया।
- संसदीय कार्यवाही का समाचार पत्रों में प्रकाशन: प्रेस को संवैधानिक संरक्षण दिया गया — कार्यवाही की रिपोर्टिंग अब संवैधानिक रूप से सुरक्षित।
- राष्ट्रपति की भूमिका: राष्ट्रपति को कैबिनेट की सलाह पर पुनर्विचार के लिए एक बार लौटाने का अधिकार दिया गया। यदि मंत्रिपरिषद पुनः वही सलाह दे, तो राष्ट्रपति को उसे मानना अनिवार्य होगा।
- अनुच्छेद 352 में संशोधन किया गया।
- पहले आपातकाल सम्पूर्ण भारत पर लागू होता था, लेकिन 44वें संशोधन के बाद राष्ट्रपति यदि चाहे तो राष्ट्रीय आपातकाल को “केवल किसी एक राज्य या क्षेत्र” तक सीमित कर सकता है।
- अध्यादेश जारी करने की प्रक्रिया में बदलाव: राष्ट्रपति, राज्यपाल या प्रशासकों की “व्यक्तिगत संतुष्टि” का प्रावधान हटाया गया।
- न्यायालयों की शक्तियाँ बहाल: SC और HC की कुछ न्यायिक समीक्षा और रिट जारी करने की शक्तियाँ पुनः बहाल की गईं।
- राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा: “आंतरिक अशांति (Internal Disturbance)” शब्द हटाकर “सशस्त्र विद्रोह (Armed Rebellion)” शब्द जोड़ा गया। आपातकाल अब केवल कैबिनेट की लिखित सिफारिश के आधार पर घोषित किया जा सकता है।
- संपत्ति का अधिकार: संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार से हटाकर केवल वैधानिक अधिकार बनाया गया। (अनुच्छेद 300 क)
- अनुच्छेद 20 और 21 की रक्षा: राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 (दण्ड से संरक्षण) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) को निलंबित नहीं किया जा सकेगा।
- चुनाव संबंधी न्यायिक अधिकार बहाल: न्यायपालिका को राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं अध्यक्ष के चुनाव विवादों पर निर्णय लेने की शक्ति फिर से प्रदान की गई।
52वाँ संशोधन अधिनियम, 1985:
- कारणः ‘दल-बदल’ तथा आया राम और गया राम’ राजनीति को रोकने के लिये।
- संसद तथा विधानमंडलों के सदस्यों को दल-बदल के आधार पर अयोग्य ठहराने की व्यवस्था की गई तथा इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी के लिये एक नई अनुसूची (दसवीं अनुसूची) जोड़ी गई।
- यदि किसी दल के एक तिहाई सदस्य (1/3) सामूहिक रूप से दल छोड़कर अन्य दल में शामिल हो जाते हैं या नया दल बनाते हैं, तो उन्हें “विभाजन (Split)” के आधार पर संरक्षण प्राप्त होगा और अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
58वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1987
- भारतीय संविधान के हिंदी भाषा में प्राधिकृत पाठ को वैधानिक रूप से मान्यता देना।
- अनुच्छेद 394A जोड़ा गया।
- जिसके तहत भारत के संविधान का हिंदी अनुवाद तैयार कर अधिकारिक पाठ घोषित किया गया।
- यह पाठ राष्ट्रपति द्वारा प्रमाणित होता है।
61वां संशोधन अधिनियम, 1989:
- लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए मतदान की उम्र 21 साल से घटाकर 18 साल की गई।
65वें संविधान संशोधन अधिनियम:
- संविधान के अनुच्छेद 338 में संशोधन के अनुसार, अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग (अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग) की स्थापना की गई।
- इसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष तथा सम्मन द्वारा नियुक्त पांच अतिरिक्त सदस्य होते हैं।
नोट : पहले केवल एक विशेष अधिकारी होता था, जिसे अनुसूचित जातियों और जनजातियों के हितों की निगरानी के लिए नियुक्त किया जाता था।
69वाँ संशोधन अधिनियम, 1991:
- केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली को विशेष दर्जा देते हुए उसे ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली’ बनाया गया।
- दिल्ली के लिये 70 सदस्यीय विधानसभा तथा 7 सदस्यीय मंत्रिपरिषद की व्यवस्था भी की गई।
- यह दिल्ली के लिये एक मंत्रिपरिषद का भी प्रावधान करता है, जिसमें मंत्रियों की कुल संख्या विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के 10% से अधिक नहीं होगी। (7 सदस्यीय)
- इस संशोधन के द्वारा संविधान में दो नए अनुच्छेद 239AA और 239AB जोड़े गए, जिसके अंतर्गत केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली को विशेष दर्जा दिया गया।
- अनुच्छेद 239AA – केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली को ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली’ बनाया गया और इसके प्रशासक को उपराज्यपाल (Lt. Governor) नाम दिया गया।
- अनुच्छेद 239AB – राष्ट्रपति अनुच्छेद 239AA के किसी भी प्रावधान या इसके अनुसरण में बनाए गए किसी भी कानून के किसी भी प्रावधान के संचालन को निलंबित कर सकता है। यह प्रावधान अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) जैसा है।
73वाँ संशोधन अधिनियम 1992:
- पंचायती राज संस्थानों को संवैधानिक दर्जा तथा संरक्षण प्रदान किया गया।
- इसके लिये ‘पंचायत’ नाम से नया भाग-IX जोड़ा गया तथा 11वीं अनुसूची भी जोड़ी गई जिसमें 29 विषय थे।
74वाँ संशोधन अधिनियम 1992:
- शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा तथा संरक्षण दिया गया।
- इसके तहत भाग-IX (क) के नाम से एक नया भाग जोड़ा गया। इसे नगरपालिका कहा गया तथा एक नई अनुसूची-12वीं अनुसूची जोड़ी गई और उसके तहत 18 विषय रखे गए।
77वाँ संशोधन अधिनियम 1995:
- इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि प्रोन्नति में आरक्षण की अनुमति नहीं है।
- इस निर्णय के प्रभाव को निष्प्रभावी (nullify) करने और अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को प्रोन्नति में आरक्षण प्रदान करने के लिए 77वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1995 को पारित किया गया।
- इस संशोधन के तहत अनुच्छेद 16(4A) जोड़ा गया, जो राज्य को यह अधिकार देता है कि वह SC/ST कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण प्रदान कर सके।
80वां संशोधन 2000:
- 10वें वित्त आयोग की सिफारिशों को प्रभावी करने के लिए लागू किया गया था। आयोग ने सिफारिश की थी कि कुछ केंद्रीय करों एवं कराधानों से प्राप्त कुल आय का 29 प्रतिशत राज्यों को मिलना चाहिए। इसे ‘ अवमूल्यन की वैकल्पिक योजना’ के रूप में जाना गया तथा यह पूर्वव्यापी 01 अप्रैल, 1996 से अस्तित्व में आया।
81वाँ संशोधन अधिनियम 2000:
- इस तरह इस संशोधन में बैकलॉग पदों (Vacancies) में आरक्षण की 50% की सीमा को समाप्त कर दिया गया।
82वाँ संशोधन अधिनियम 2000:
- अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिये केंद्र एवं राज्यों की लोक सेवाओं में पदोन्नति में आरक्षण के संदर्भ में परीक्षा में अर्हता के अंकों में छूट देने या मूल्यांकन के मानकों में ढील देने की व्यवस्था की गयी।
84वाँ संशोधन अधिनियम 2001:
- लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में सीटों के पुनर्निर्धारण पर अगले 25 वर्षो (वर्ष 2026 तक) तक के लिये प्रतिबंध बढ़ा दिया गया।
86वाँ संशोधन अधिनियम 2002:
- अनुच्छेद 21A – नया मौलिक अधिकार जोड़ा गया:
- प्रत्येक 6 से 14 वर्ष के बच्चे को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना राज्य का कर्तव्य होगा।
- अनुच्छेद 45 – नीति-निदेशक तत्वों में संशोधन:
- पहले अनुच्छेद 45 में 0–14 वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा की बात थी।
- नीति-निदेशक तत्वों के अनुच्छेद 45 की विषय वस्तु को बदल दिया गया।
- अब इसमें संशोधन कर यह प्रावधान किया गया कि:
- “6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा” राज्य द्वारा प्रदान की जाएगी।
88वें संविधान संशोधन:
- संविधान में एक नया अनुच्छेद 268-क जोड़ा गया, जो सेवा कर से संबंधित है ।
89वाँ संशोधन अधिनियम 2003:
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के लिये राष्ट्रीय आयेाग को दो भागों में विभाजित कर दिया गया-
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (अनुच्छेद 338)
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग [अनुच्छेद 338 (A)]
- दोनों आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष तथा तीन अतिरिक्त सदस्य होते हैं।
91वां संशोधन अधिनियम, 2003:
- प्रावधान किया गया कि केंद्रीय मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए और किसी राज्य में मंत्रियों की कुल संख्या मुख्यमंत्री सहित उस राज्य की विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।
- यद्यपि इस शर्त के साथ यह भी प्रावधान किया गया की किसी राज्य में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की न्यूनतम संख्या 12 से कम भी नहीं होनी चाहिए।
- लाभ का पद परिभाषित किया गया ।
- 1/3 सदस्य विभाजन पर अयोग्यता न लगे” वाला प्रावधान 52वें संविधान संशोधन 1985 के तहत लाया गया था, जिसे 91वें संशोधन 2003 में हटा दिया गया। अब सिर्फ 2/3 सदस्य यदि किसी अन्य दल में विलय करें, तो ही वे अयोग्यता से बच सकते हैं।
92वाँ संशोधन अधिनियम 2003:
- आठवीं अनुसूची में चार नई भाषाएँ जोड़ी गई। वे है- बोडो, डोगरी, मैथिली, और संथाली। इनके साथ ही संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त भाषाओं की कुल संख्या बढ़कर 22 हो गई।
93वां संशोधन अधिनियम, 2005:
- संविधान के अनुच्छेद-15 (5) के तहत निजी गैर सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण।
नोट: इसमें अल्पसंख्यकों के शिक्षण संस्थान शामिल नहीं हैं।
97वां संशोधन अधिनियम, 2011:
- सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा तथा संरक्षण दिया गया। संविधान में तीन निम्नलिखित बदलाव किये गए।
- सहकारी समिति बनाने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया गया (अनुच्छेद-19)।
- सहकारी समितियों को बढ़ावा देने के लिये उन्हें नीति-निदेशक तत्त्वों में शामिल किया गया
- संविधान में सहकारी समिति के नाम से एक नया भाग IX-B (Part IX-B) जोड़ा गया।
99वां संशोधन अधिनियम, 2014:
- उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में न्यायधीशों की नियुक्ति के लिये कॉलेजियम प्रणाली के स्थान पर एक नए निकाय “राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग” (National Judicial Appointment Commission-NJAC) की स्थापना की गई।
- हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2015 में इस संशोधन को असंवैधानिक एवं शून्य घोषित करते हुए कॉलेजियम प्रणाली को फिर से बहाल कर दिया।
100वाँ संशोधन अधिनियम 2014:
- भारत और बांग्लादेश के बीच वर्ष 1974 का भूमि सीमा समझौता तथा इसके प्रोटोकॉल वर्ष 2011 के अनुपालन में भारत द्वारा कुछ भू-भागों का अधिग्रहण एवं कुछ अन्य भू-भागों को बांग्लादेश को हस्तांतरण किया गया। (भूखंडों का आदान- प्रदान तथा अवैध अधिग्रहण को हस्तांतरित कर)।
- इस उद्देश्य के लिये, संविधान की प्रथम अनुसूची में चार राज्यों के क्षेत्र (असम, पश्चिम बंगाल, मेघालय एवं त्रिपुरा) से संबंधित प्रावधानों में संशोधन किया गया।
- नोट: 100वां संविधान संशोधन अधिनियम 2015, को इसलिए अधिनियमित किया गया कि भारत द्वारा कुछ भूभाग का अधिग्रहण किया जाए जबकि कुछ अन्य भूभाग को बांग्लादेश को हस्तांतरित कर दिया जाए। उस समझौते के तहत जो भारत और बांग्लादेश की सरकारों के बीच हुआ। इस लेन-देन में भारत ने 111 विदेशी अंतःक्षेत्रों (enclaves) को बांग्लादेश को हस्तांतरित कर दिया जबकि बांग्लादेश ने 51 अंतःक्षेत्रों को भारत को हस्तांतरित किया।
101वां संशोधन अधिनियम, 2017:
- वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत की गयी।
- संविधान के अनुच्छेद 246A, 269A, 279A आदि जोड़े गए।
- अनुच्छेद 246A – वस्तु एवं सेवा कर के संबंध में विशेष प्रावधान
- अनुच्छेद 269A – अंतर-राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान माल और सेवा कर का आरोपण और संग्रहण
- अनुच्छेद 279A – जीएसटी परिषद का गठन
- अनुच्छेद 279ए के लागू होने के 60 दिनों के भीतर राष्ट्रपति द्वारा किया जाना है।
- जीएसटी परिषद – यह केंद्र और राज्यों का एक संयुक्त मंच होगा , जिसमें निम्नलिखित सदस्य शामिल होंगे
- अध्यक्ष – केंद्रीय वित्त मंत्री
- सदस्य – केंद्रीय राज्य मंत्री, राजस्व या वित्त के प्रभारी
- अन्य सदस्य – वित्त या कराधान के प्रभारी मंत्री या प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा नामित कोई अन्य मंत्री
- सातवीं अनुसूची में बदलाव किए गए, विशेषकर संघ सूची (Union List) में से कुछ प्रविष्टियाँ हटाई गईं जो अब जीएसटी के अंतर्गत आती हैं।
- संघ सूची से हटाई गई प्रविष्टियाँ:
- प्रविष्टि 92 – “विक्रय या खरीद कर (Sale or purchase tax) (सम्पत्ति पर कर को छोड़कर)”
- प्रविष्टि 92ग (92C) – “सेवाओं पर कर लगाने का अधिकार
- संघ सूची की प्रविष्ठि संख्या 84 में संशोधन –
- भारत में निम्न विनिर्मित या उत्पादित अधोलिखित माल पर उत्पाद शुल्क केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाएगा –
- अपरिष्कृत पेट्रोलियम उच्च गति डीजल
- मोटर स्पिरिट
- प्राकृतिक गैस
- विमानन टरबाईन ईंधन
- तंबाकू और तंबाकू उत्पाद
- ये माल पहले राज्य सूची के प्रविष्टि संख्या 64 में थे । लोप हो गया।
- Note: 101वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2016, जो वस्तु एवं सेवा कर (GST) से संबंधित था, अनुच्छेद 368 की प्रक्रिया के तहत पारित किया गया था — लेकिन उसने अनुच्छेद 368 को स्वयं संशोधित नहीं किया।
- भारत में निम्न विनिर्मित या उत्पादित अधोलिखित माल पर उत्पाद शुल्क केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाएगा –
102वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2018
- इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा प्रदान करना था, जिससे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) के अधिकारों की रक्षा और उनके कल्याण के उपायों की निगरानी सुनिश्चित की जा सके।
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा:
- NCBC की स्थापना 1993 में एक वैधानिक निकाय के रूप में की गई थी।
- अनुच्छेद 338B जोड़कर इसे संवैधानिक निकाय बना दिया गया।
- यह आयोग SEBC से संबंधित शिकायतों की जाँच करता है, उनके लिए कल्याणकारी योजनाओं की निगरानी करता है और सरकार को सुझाव देता है।
- अनुच्छेद 342A का समावेश:
- राष्ट्रपति को अधिकार दिया गया कि वह विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SEBC की सूची अधिसूचित कर सके।
- राष्ट्रपति यह कार्य संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श के बाद करता है।
- यदि इस सूची में कोई संशोधन या परिवर्तन करना हो, तो संसद द्वारा कानून बनाया जाना आवश्यक होगा। राज्यों को अब अपनी स्वतंत्र SEBC सूची बनाने का अधिकार नहीं है।
- अनुच्छेद 366 में संशोधन:
- SEBC (Socially and Educationally Backward Classes) की नई परिभाषा जोड़ी गई, जिससे संविधान में इसका स्पष्ट उल्लेख हो सके।
103वाँ संशोधन अधिनियम 2019:
- स्वतंत्र भारत में पहली बार आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिये आरक्षण की व्यवस्था की गई।
- इसके द्वारा अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में संशोधन किया गया था।
- यह संशोधन आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए लाया गया।
- अनुच्छेद 15 (6):
- इस खंड के अनुसार, राज्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए (जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, और अन्य पिछड़ा वर्ग में नहीं आते) शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए विशेष प्रावधान बना सकता है।
- इसमें निजी शैक्षणिक संस्थान (सरकारी सहायता प्राप्त या बिना सहायता वाले) भी शामिल हैं।
- अनुच्छेद 16 (6):
- इसके अनुसार, राज्य EWS वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में 10% आरक्षण प्रदान कर सकता है।
104वां संशोधन अधिनियम, 2020:
- लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में एससी और एसटी के लिए सीटों की समाप्ति की समय सीमा 70 साल से बढ़ाकर 80 साल कर दी गई है।
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए आरक्षित सीटों के प्रावधान को हटा दिया गया है।
105वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2021
- इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य राज्यों को अपने स्तर पर सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) की पहचान करने का अधिकार बहाल करना था।
- यह 102वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 में किए गए परिवर्तनों की कुछ सीमाओं को दूर करने के लिए लाया गया। 102वें संशोधन के बाद SEBC की सूची बनाने का अधिकार केवल राष्ट्रपति और संसद के पास था, जिसे अब 105वें संशोधन द्वारा राज्यों को पुनः दिया गया।
- अनुच्छेद 338B → इसमें संशोधन कर स्पष्ट किया गया कि NCBC केवल केंद्र सरकार की पिछड़ा वर्ग सूची से संबंधित मामलों की देखरेख करेगा।
- अनुच्छेद 342A → इसमें बदलाव कर यह स्पष्ट किया गया कि राज्य सरकारें अपनी पिछड़ा वर्ग सूची स्वयं बना सकती हैं।
- अनुच्छेद 366(26C) → इसमें संशोधन कर SEBC की परिभाषा को और स्पष्ट किया गया।
106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 (महिला आरक्षण अधिनियम, 2023)
- लोकसभा से पारित – 20 सितंबर 2023
- राज्यसभा से पारित – 21 सितम्बर 2023
- राष्ट्रपति की मंज़ूरी – 28 सितंबर 2023
- लागू होने की तिथि – आगामी जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होगा
- उद्देश्य: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये एक-तिहाई (33%) सीटों का आरक्षण।
- पृष्ठभूमि:
- यह विधेयक पहले भी कई बार संसद में लाया जा चुका है:
- 1996: पहली बार पेश (गीता मुखर्जी समिति)
- फिर क्रमशः 1998, 2009, 2010, 2014 में
- यह विधेयक पहले भी कई बार संसद में लाया जा चुका है:
- संबंधित समितियाँ:
- भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति (1971)
- मार्गरेट अल्वा समिति (1987)
- गीता मुखर्जी समिति (1996)
- दूसरी महिलाओं की स्थिति पर समिति (2013)
- जोड़े गए अनुच्छेद:
- अनुच्छेद 330A – लोकसभा में महिलाओं को 1/3 आरक्षण।
- अनुच्छेद 332A – प्रत्येक राज्य विधानसभा में महिलाओं को 1/3 आरक्षण।
- अनुच्छेद 239AA (संशोधित) – दिल्ली विधानसभा में महिलाओं को 1/3 आरक्षण।
- अनुच्छेद 334A (नया) – यह आरक्षण अगली जनगणना और परिसीमन के बाद प्रभावी होगा।
- समयावधि: आरक्षण 15 वर्षों के लिए होगा (आवश्यकता अनुसार बढ़ाया जा सकता है)।
- रोटेशन प्रणाली:
- प्रत्येक परिसीमन के बाद आरक्षित सीटों का पुनः निर्धारण।
महिला आरक्षण का इतिहास
- 1996 – एच.डी. देवगौड़ा सरकार ने 81वां संशोधन प्रस्तुत किया, पर पारित नहीं हुआ।
- अटल बिहारी वाजपेयी सरकार – 1998, 1999, 2002, 2004 में प्रयास किया, सफल नहीं हुए।
- 2008 – मनमोहन सिंह सरकार ने विधेयक पेश किया।
- 2010 – राज्यसभा ने इसे पारित किया पर लोकसभा में प्रस्तुत नहीं किया गया।
- 2023 – नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा 106वां संशोधन पारित करवाया गया।
संविधान संशोधन : तर्क एवं प्रभाव:
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पक्ष में: 154916_0af83a-31> |
विरुद्ध में: 154916_ccbc72-fd> |
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129 वां संविधान संशोधन बिल (एक देश, एक चुनाव के लिए)
- क्या है एक देश, एक चुनाव की व्यवस्था
- भारत में एक देश-एक चुनाव का मतलब है कि संसद के निचले सदन यानी लोकसभा चुनाव के साथ ही सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव भी कराए जाएं।
- इसके साथ ही स्थानीय निकायों यानी नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत और ग्राम पंचायतों के चुनाव भी हों। इसके पीछे विचार है कि ये चुनाव एक ही दिन या फिर एक निश्चित समय सीमा में कराए जा सकते हैं।
- उच्च स्तरीय समिति गठित
- 2 सितंबर 2023 को भारत सरकार ने एक साथ चुनाव कराने के मुद्दे की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने की अधिसूचना जारी की।
- यह समिति भारत के पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित की गई है । इस समिति के अन्य सदस्य हैं:
- अमित शाह , केंद्रीय गृह मंत्री
- गुलाम नबी आज़ाद , राज्यसभा में विपक्ष के पूर्व नेता
- एन.के. सिंह, 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष
- डॉ. सुभाष सी. कश्यप , पूर्व महासचिव, लोकसभा
- हरीश साल्वे , सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता
- संजय कोठारी, पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त
- अर्जुन राम मेघवाल , केंद्रीय कानून मंत्री (विशेष आमंत्रित सदस्य)
- 14 मार्च 2024 को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने समिति द्वारा तैयार 18,000 पन्नों की अंतिम रिपोर्ट भारत की मौजूदा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी ।
- 1967 तक एक साथ होते रहे सभी चुनाव
- आजादी के बाद वर्ष 1950 में देश गणतंत्र बना। वर्ष 1951-52 से 1967 के बीच लोकसभा के साथ ही राज्यों के विधानसभा चुनाव पांच वर्ष में होते रहे। वर्ष 1952, 1957,1962 और 1967 में ये चुनाव हुए। इसके बाद कुछ राज्यों का पुनर्गठन हुआ और कुछ नए राज्य बनाए गए। इसके अलावा लोकसभा को भी समय से पहले भंग किया गया। इसके कारण एक साथ चुनाव का चक्र टूट गया और तब से अलग-अलग चुनाव होने लगे।
- चुनाव साथ कराने के लिए राज्यों की मंजूरी अनिवार्य नहीं….
- लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए राज्यों की मंजूरी अनिवार्य नहीं है।
- रामनाथ कोविंद कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया कि अनुच्छेद 83 (संसद के सदनों की अवधि). अनुच्छेद 172 (राज्य विधानमंडलों की अवधि) में संशोधन करते हुए अनुच्छेद 82क को अंतः स्थापित किए जाने के लिए संविधान संशोधन बिल लाया जाएगा। इसके लिए राज्यों के समर्थन की आवश्यकता नहीं है।
- केंद्रीय मंत्री मेघवाल ने ‘एक देश, एक चुनाव’ से जुड़े 2 बिल 17 दिसंबर को लोकसभा में पेश किए।
- एक देश, एक चुनाव के लिए संविधान (129 वां संशोधन) बिल
- केंद्र शासित कानून (संशोधन) बिल 2024 पेश किया। इसके तहत पुड्डुचेरी, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराए जा सकेंगे।
- सदन में इस बिल पर चर्चा में लेने के लिए वोटिंग कराई गई। संसद के नए भवन में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग हुई। बिल के पक्ष में 263 वोट और विपक्ष में 198 वोट पड़े।
- ‘एक देश, एक चुनाव’ पर बनी रामनाथ कोविंद समिति को 47 राजनीतिक दलों ने अपनी राय दी थी। इनमें 32 दलों ने समर्थन किया था और 15 दलों ने इसका विरोध किया था।
- इस संशोधन बिल के जरिए इन तीन एक्ट में बदलाव किया जाना है –
- द गवर्नमेंट ऑफ यूनियन टेरिटरीज एक्ट- 1963
- द गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली- 1991
- द जम्मू एंड कश्मीर रीऑर्गनाइजेशन एक्ट- 2019 शामिल हैं।
- संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी)
- विधेयक पर विस्तृत विचार विमर्श के लिए संसद की संयुक्त कमेटी (जेपीसी) का गठन किया गया है।
- सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सदस्यों की संख्या 31 से बढ़ाकर 39 करने का फैसला किया है। इस समिति में 27 सदस्य लोकसभा के सदस्य हैं जबकि 12 सदस्य राज्यसभा से हैं।
- समिति के अध्यक्ष राजस्थान से भाजपा सांसद सदस्य पीपी चौधरी को नियुक्त किया गया है।
- इस संयुक्त समिति के कुल 39 सदस्यों में भाजपा के 16, कांग्रेस से पांच सदस्य शामिल हैं। सत्तापक्ष के 22, विपक्ष के 15 और दो ऐसे दलों से सदस्य हैं जो किसी पक्ष में नहीं हैं।
- ऐसे होगा क्रियान्वयन
- एक साथ चुनाव की व्यवस्था दो चरणों में लागू करने की सिफारिश।
- पहला चरण: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना।
- दूसरा चरणः लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के 100 दिनों के भीतर नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुनाव एक साथ कराना।
- सरकार के सभी तीन स्तरों के लिए एकल मतदाता सूची बनाने की सिफारिश।
- सदन में त्रिशंकु स्थिति या अविश्वास प्रस्ताव या ऐसी किसी भी स्थिति में नई लोकसभा के गठन के लिए नए चुनाव कराए जा सकते हैं, जो शेष कार्यकाल के लिए होगा।
- यदि विधानसभाओं के लिए नए चुनाव होते हैं तो ऐसी नई विधानसभाएं लोकसभा कार्यकाल के अंत तक बनी रहेंगी, बशर्ते उन्हें भंग न किया जाए।
- एक साथ चुनाव की व्यवस्था दो चरणों में लागू करने की सिफारिश।
नोट :
- विधेयक पारित हुआ तो लोकसभा के साथ सभी विधानसभाओं के चुनाव 2034 में हो सकते हैं। इसके लिए 2029 के लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभाओं के चुनाव को 2034 के लोकसभा चुनाव तक की बाकी अवधि के लिए कराया जा सकता है। ताकि सभी विधानसभाओं का कार्यकाल 2034 में लोकसभा के कार्यकाल के साथ समाप्त होकर एक देश, एक चुनाव को मूर्त रूप दिया जा सके।
संवैधानिक एवं गैर-संवैधानिक निकाय
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संवैधानिक निकाय 154916_ed1416-4e> |
गैर-संवैधानिक निकाय 154916_94b4b7-49> |
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ये वे संस्था हैं जिनका उल्लेख भारत के संविधान में किया गया है और इसलिए इन्हें स्वतंत्र और अधिक शक्तिशाली माना जाता है।
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ये संस्थायें देश के संविधान में लिखित नहीं हैं. अर्थात इनके गठन के लिए केंद्र सरकार को संसद में बिल पास करना पड़ता है. अतः ऐसे निकाय गैर-संवैधानिक निकाय होते हैं जो कि किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ती के लिए गठित किये जाते हैं।
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संवैधानिक निकाय
- ये वे संस्था हैं जिनका उल्लेख भारत के संविधान में किया गया है और इसलिए इन्हें स्वतंत्र और अधिक शक्तिशाली माना जाता है।
- भारत निर्वाचन आयोग
- वित्त आयोग
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
- भारत का नियंत्रक और महालेखापरीक्षक
- भारत का महान्यायवादी
- अधिकरण
- भारत का सर्वोच्च न्यायालय
- भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई)
- संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी)
- राज्य लोक सेवा आयोग (एसपीएससी)
- भारतीय वित्त आयोग (एफसीआई)
- वस्तु एवं सेवा कर परिषद (जीएसटी परिषद)
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी)
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी)
- भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी (सीएलएम)
- राज्य के महाधिवक्ता (एजीएस)
गैर-संवैधानिक निकाय
- ये संस्थायें देश के संविधान में लिखित नहीं हैं. अर्थात इनके गठन के लिए केंद्र सरकार को संसद में बिल पास करना पड़ता है. अतः ऐसे निकाय गैर-संवैधानिक निकाय होते हैं जो कि किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ती के लिए गठित किये जाते हैं।
- वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद
- राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण
- भारतीय खाद्य निगम
- भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग
- भारत का विधि आयोग
- केंद्रीय सतर्कता आयोग
- भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड
- राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग
- रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन
- लोकपाल और लोकायुक्त
- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन
- नीति आयोग
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण
- केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो
- भारतीय रिज़र्व बैंक
- वित्तीय स्थिरता और विकास परिषद
- सेंट्रल ज़ू अथॉरिटी
- भारतीय भूमि पत्तन प्राधिकरण
