भारत का संविधान : निर्माण भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है, जिसकी नींव संविधान की अवधारणा, संविधानवाद तथा भारत के दीर्घ संवैधानिक विकास में निहित है। अंग्रेजी शासन के दौरान हुए संवैधानिक प्रयोग, राष्ट्रीय आंदोलन और संवैधानिक मांगें, निर्णायक घटनाएँ, गोलमेज सम्मेलन एवं श्वेतपत्र (1930–1935), भारत शासन अधिनियम, 1935 तथा 1940 के बाद की घटनाएँ मिलकर संविधान निर्माण की प्रक्रिया को स्पष्ट करती हैं। यह विषय राजनीतिक व्यवस्था और शासन के अंतर्गत भारत की संवैधानिक यात्रा को समझने में महत्वपूर्ण है।
किसी देश का संविधान उसके अतीत की नींव पर निर्मित होता है। प्राचीन भारत में भी लोकतंत्र, प्रतिनिधि संस्थान, शासकों की सीमित शक्तियाँ और विधि का शासन मौजूद था।
संविधान की अवधारणा
संविधान क्या है?
- संविधान किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था की बुनियादी संरचना निर्धारित करता है।
- यह राज्य के तीन प्रमुख अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—की स्थापना, उनके अधिकार, दायित्व और आपसी संबंधों को परिभाषित करता है।
- संविधान राज्य की प्रशासनिक, कानूनी और नीतिगत प्रक्रियाओं के लिए एक मार्गदर्शक दस्तावेज होता है।
संविधानवाद क्या है?
- संविधानवाद का अर्थ संविधान के अनुरूप शासन की संकल्पना से है, जिसमें सरकार के अधिकार सीमित होते हैं और वे विधि के अधीन रहते हैं।
- यह स्वेच्छाचारी, सत्तावादी या सर्वाधिकारवादी शासन के विपरीत होता है।
- कुछ देशों में संविधान तो मौजूद होता है, लेकिन वहां संविधानवाद नहीं होता, यानी शासन अलोकतांत्रिक रहता है, जैसे—उत्तर कोरिया, चीन और रूस।

भारत का संवैधानिक विकास
अंग्रेजी शासन के दौरान भारत का संवैधानिक विकास
- ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन
- 31 दिसंबर, 1600 – लंदन के व्यापारियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी का गठन किया।
- चार्टर एक्ट 1600 ई. के तहत
- महारानी एलिजाबेथ प्रथम से शाही चार्टर प्राप्त हुआ, जिससे कंपनी को –
- 15 वर्षों के लिए भारत में व्यापार करने का एकाधिकार मिला।
- कंपनी का संविधान, शक्तियाँ और विशेषाधिकार तय किए गए।
- अध्यक्ष – लार्ड मेयो / मेयर
- आंग्ल भारतीयों की शुरुवात
- ईस्ट इंडिया कंपनी का विस्तार
- औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद, मुगल साम्राज्य कमजोर हुआ।
- राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर कंपनी ने शक्ति प्राप्त की।
- प्लासी की लड़ाई (1757)
- बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराकर कंपनी भारत में वास्तविक शासक बन गई।
- यही से भारत में अंग्रेजी शासन की नींव पड़ी।
1726 ई. का चार्टर एक्ट –गवर्नर व उसकी परिषद को विधि बनाने की शक्ति
कंपनी का शासन [1773 ई. से 1858ई.]
1773 ई. का रेगुलेटिंग एक्ट –
ब्रिटिश pm लार्ड नॉर्थ ब्रुक द्वारा गठित गुप्त समिति की सिफारिश पर
- एक्ट 1774 में लागू हुआ।
- भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियंत्रित और नियमित करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा उठाया गया पहला कदम।
- इसके द्वारा पहली बार कंपनी के प्रशासनिक और राजनैतिक कार्यों को मान्यता मिली।
- इसके द्वारा भारत में केंद्रीय प्रशासन की नींव रखी गयी।
- बंबई, मद्रास व बंगाल के गवर्नर – बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन हो गए।
- बंगाल के गवर्नर को “बंगाल का गवर्नर जनरल’ पद नाम दिया गया। ऐसे पहले गवर्नर जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स थे।
- शासन शक्ति – गवर्नर जनरल + 4 सदस्यीय परिषद
- गवर्नर जनरल – निर्णायक मत का अधिकार
- भारतीय लोगों से उपहार व रिश्वत लेना प्रतिबंधित कर दिया गया।
- कंपनी के व्यापारियो को बिना लाइसेंस के निजी व्यापार पर प्रतिबंधित
- ब्रिटिश सरकार का ‘कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स’ (कंपनी की गवर्निंग बॉडी) के माध्यम से कंपनी पर नियंत्रण सशक्त हो गया।
- राजस्व, सैनिक व नागरिक मामलो की सूचना ब्रिटिश सरकार को देना
- प्रेसीडेन्सी नगरों में ‘जस्टिस ऑफ पीस’ की नियुक्ति की गई, जिनका कार्य अपने नगरों की सफाई एवं स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का निरीक्षण करना था।
- कलकत्ता में 1774 में एक उच्चतम न्ययालय की स्थापना की गई।
- दीवानी, आपराधिक, सैनिक व धार्मिक क्षेत्राधिकार
- इसकी अपील प्रिवी कौंसिल में
- अभिलेख न्यायालय के रूप में
- प्रथम मुख्य न्यायाधीश – सर इलिज़ा इम्पे + 03 अन्य न्यायाधीश
1781 ई.का एक्ट ऑफ सैटलमेंट –
- रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 की कमियों को दूर करने के लिए ब्रिटिश संसद ने एक संशोधित अधिनियम 1781 में पारित किया, जिसे ‘एक्ट ऑफ सैटलमेंट’ के नाम से भी जाना जाता है।
- संशोधनात्मक अधिनियम / बंगाल का जुड़ीकेचर एक्ट
- सुझाव – एडमंड बर्क
- गवर्नर जनरल इन कॉन्सिल को सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता से मुक्त
- भारतीय के रीति रिवाजों को ध्यान में रखने के आदेश (आदेशों व विधियों में)
- राजस्व अधिकारिता को समाप्त (सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति सीमित)
- राजस्व मंडलों की स्थापना
1783 ई. में
- डन्दाज़ अधिनियम / फॉक्स का भारतीय विधेयक
- रेगुलेटिंग एक्ट में व्याप्त दोषों को दूर करने का उद्देश्य
- विधेयक पारित नहीं – लार्ड नार्थ व फ़ॉक्स गठबंधन सरकार का त्यागपत्र
1784 ई. का पिट्स इंडिया एक्ट –
- ब्रिटिश ताज स्वामित्व का पहला वैधानिक दस्तावेज – ब्रिटिश अधिकाराधीन क्षेत्र
- कंपनी के राजनैतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक्- पृथक् कर दिया।
- द्वैध शासन की व्यवस्था का शुभारंभ किया गया।
- कंपनी के
- व्यापारिक मामलों के लिए – निदेशक मंडल (6 सदस्यीय ) – ब्रिटिश मंत्रिमंडल सदस्य
- राजनैतिक मामलों के लिए – नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) नाम से एक नए निकाय का गठन कर दिया।
- कंपनी के
- गवर्नर जनरल परिषद सदस्य संख्या 04 से 03
- गवर्नर जनरल को प्रांतीय सरकारों को बर्खास्त करने का अधिकार
- गवर्नर जनरल को देशी राजाओ से युद्ध व संधि से पूर्व कंपनी के बोर्ड ऑफ कंट्रोल से अनुमति लेनी जरूरी ।
- बोर्ड ऑफ कंट्रोल के सदस्यों और कर्मचारियों के वेतन भारतीय राजस्व से दिये जाने की व्यवस्था की गई ।
1786 ई. का अधिनियम –
- गवर्नर जनरल को परिषद के निर्णयों को निरस्त करने का अधिकार
- गवर्नर जनरल को प्रधान सेनापति की शक्तियाँ दी ।
- गवर्नर जनरल सर्वप्रथम – लॉर्ड कार्नवालिस
1793 ई. का चार्टर अधिनियम –
- लिखित विधियों द्वारा प्रशासन की नींव
- Board of control को भारतीय राजस्व से वेतन
1813 ई. का चार्टर अधिनियम –
- कंपनी का एकाधिकार समाप्त (चीन के साथ व्यापार + चाय का व्यापार को छोड़कर)
- पवित्र खंड नीति – ईसाई धर्म प्रचार की आज्ञा
- कंपनी भारत में शिक्षा साहित्य पर 01 लाख रुपये व्यय – जनरल कमेटी ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन – लार्ड मैकाले
- स्थानीय स्वायत्तीयशासि संस्थाओ को करारोपण का अधिकार
- विधियों का ब्रिटिश संसद द्वारा अनुमोदन अनिवार्य
1833 ई. का चार्टर अधिनियम –
- ब्रिटिश भारत के केंद्रीयकरण की दिशा में यह अधिनियम निर्णायक कदम था।
- बंगाल के गवर्नर जनरल को ‘भारत का गवर्नर जनरल’ बना दिया। लॉर्ड विलियम बैंटिक भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे।
- कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार पूर्णत: समाप्त । कंपनी को प्रशासनिक व राजनैतिक दायित्व सौंपा
- गवर्नर जनरल परिषद में विधि सदस्य के रूप में चोथा सदस्य शामिल (केवल बैठक में भाग, मतदान नहीं)
- 1843 में दास प्रथा प्रतिबंधित
- इस चार्टर के तहत भारत में पहली बार कानूनों को Codified किया गया ।
- भारत के गवर्नर जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत में विधायिका के असीमित अधिकार प्रदान कर दिये गये। इसके अंतर्गत पहले बनाए गए कानूनों को नियामक कानून कहा गया और नए कानून के तहत बने कानूनों को एक्ट या अधिनियम कहा गया।
- भारतीयो को रंग,धर्म,जन्म,वंश के आधार पर रोजगार से वंचित नहीं किया जाएगा
- गवर्नर जनरल को आयोग गठित करने का अधिकार
- प्रथम – 1834 में लार्ड मैकाले (04 सदस्य प्रथम विधि आयोग)
- सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता का आयोजन शुरू करने का प्रथम प्रयास किया।
- सयुंक्त प्रांत (वर्तमान U.P.) का लगभग सम्पूर्ण क्षेत्र बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग करके आगरा प्रेसिडेंसी के अधीन कर दिया।
- इस अधियम को सुभाष कश्यप ने भारतीय केंद्रीय विधानमंडल की गंगोत्री कहा।
- बिना लाइसेंस भारत आने -जाने, बसने तथा व्यापार करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई।
1853 ई. का चार्टर अधिनियम –
- ब्रिटिश भारत में शासन के लिए अंतिम चार्टर एक्ट था।
- भारतीयों द्वारा कंपनी के प्रतिक्रियावादी शासन की समाप्ति की माँग के संदर्भ में पारित
- गवर्नर जनरल की परिषद को पूरे ब्रिटिश भारत के लिए कानून बनाने की शक्ति जारी रखी गई।
- गवर्नर जनरल परिषद के विधायी और प्रशासनिक कार्यों का विभाजन
- विधायी कार्यों के लिए परिषद में छह विशेष सदस्य जोड़े गए। इन्हें ‘विधायी पार्षद’ कहा जाता था।
- परिषद में कुल 12 सदस्य हो गए, जिनमें शामिल थे:
- गवर्नर जनरल
- कमांडर-इन-चीफ
- मद्रास, बंबई, कलकत्ता और आगरा के स्थानीय शासनों (प्रांतों) के चार प्रतिनिधि – सर्वप्रथम स्थानीय प्रतिनिधत्व की शुरुवात
- छह विशेष विधायी पार्षद
- ‘विधायी कार्यों के act पर गवर्नर जनरल की वीटो पॉवर
- परिषद में कुल 12 सदस्य हो गए, जिनमें शामिल थे:
- खुली प्रतियोगिता परीक्षा प्रारंभ
- इस एक्ट के तहत पहली बार भारत के लिए विधायिका का गठन किया गया। जिसकी प्रथम बैठक 02 मई 1854 को हुई थी।
- इस एक्ट ने भारत में विधायी और कार्यपालक शक्तियों को अलग कर एक अधिक संगठित प्रशासनिक प्रणाली की नींव रखी।
- ब्रिटिश सरकार को किसी भी समय कंपनी के शासन को समाप्त करने का अधिकार – (01 जनवरी 1884 को समाप्त)
ब्रिटिश शासन के अंतर्गत भारत [1858 ई. से]
1858 ई. का भारत शासन अधिनियम –
- भारतीय स्वतंत्रता का मैग्नाकार्टा
- भारत के शिक्षित वर्ग द्वारा अपने अधिकारों का मैग्नाकार्टा कहा – महारानी विक्टोरिया की 01 नवंबर की घोषणा को
- यह कानून Act for the better government of India नाम से पारित
- 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश संसद ने विस्तारपूर्वक विचार विमर्श के बाद यह अधिनियम पारित किया ।
- इस अधिनियम में प्रावधान था कि भारत को सीधे और क्राउन के नाम पर शासित किया जाएगा।
- ईस्ट इंडिया कंपनी को समाप्त कर दिया और गवर्नर क्षेत्रों और राजस्व संबंधी शक्तियां ब्रिटिश राजशाही को हस्तांतरित कर दीं।
- प्रमुख उद्देश्य- प्रशासनिक मशीनरी में सुधार था, जिसके माध्यम से इंग्लैंड में भारतीय सरकार का अधीक्षण और उसका नियंत्रण हो सकता था।
- गवर्नर जनरल का पदनाम बदलकर ‘भारत का वायसराय’ कर दिया गया। लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।
- द्वैध प्रणाली समाप्त – नियंत्रण बोर्ड और निदेशक मंडल समाप्त
- एक नए पद, भारत के राज्य सचिव, का सृजन किया गया।
- जिसमें भारतीय प्रशासन पर संपूर्ण नियंत्रण की शक्ति निहित थी।
- यह सचिव ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य था और अंततः ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था।
- प्रथम – चार्ल्स वुड
- सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक भारत परिषद
- 08 सम्राट द्वारा + 07 निदेशक मंडल द्वारा
- केवल ब्रिटिश संसद ही हटा सकती है।
- सामान्य मत का अधिकार
- निर्णायक मत का भी अधिकार
- अर्थव्यवस्था + अखिल भारतीय सेवाओ के विषय में परिषद की राय मानने के लिए बाध्य
- अन्य विषयों में बाध्य नहीं
नोट: 1857 के महान विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार को अपने देश की शासन व्यवस्था में भारतीयों का सहयोग लेने की आवश्यकता महसूस हुई। एसोसिएशन की इस नीति के अनुसरण में ब्रिटिश संसद द्वारा 1861, 1892 और 1909 में तीन अधिनियम बनाए गए।
1861 ई. का भारत परिषद अधिनियम –
- संवैधानिक विकास का सूत्रपात / सहयोग की नीति / उदार निरंकुशता
- गवर्नर जनरल कानून निर्माण हेतु न्यूनतम 06 व अधिकतम 12 सदस्यों को विधान परिषद में मनोनीत कर सकता है ।
- 02 वर्ष हेतु
- आधे गेर सरकारी सदस्य अनिवार्य
- कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने की शुरुआत हुई। प्रतिनिधि सरकार की नींव
- 1862 में, लार्ड कैनिंग ने नवगठित विधान परिषद में तीन भारतीयों को नियुक्त किया (प्रथम बार):
- पटियाला के महाराजा
- बनारस के राजा
- सर दिनकर राव
- 1862 में, लार्ड कैनिंग ने नवगठित विधान परिषद में तीन भारतीयों को नियुक्त किया (प्रथम बार):
- मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसियों को विधायी शक्तियां पुन: देकर विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत की।
- रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 द्वारा शुरू हुई केंद्रीयकरण की प्रवृत्ति को उलट दिया।
- लॉर्ड कैनिंग द्वारा 1859 में प्रारंभ की गई पोर्टफोलियो प्रणाली को भी मान्यता दी। तथा मंत्रिमंडलीय व्यवस्था की शुरुवात ।(जनक – लॉर्ड कैनिंग)
- वायसराय को अध्यादेश जारी करने के लिए अधिकृत किया। (धारा – 22) ऐसे अध्यादेश की अवधि मात्र छह माह होती थी।
- {नोट : – भारतीय संविधान की अध्यादेश शक्ति अधिनियम 1935 की धारा -42 से प्रभावित था।}
- गवर्नर जनरल को Veeto Power
- केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य 04 से 05 (5वाँ विधिवेत्ता)
- केंद्रीय सरकार को प्रांतीय सरकारों से अधिक अधिकार
- कलकत्ता,मुंबई व मद्रास में उच्च न्यायालयो की स्थापना का प्रावधान
नेटिव मैरिज एक्ट (1872) –
- केशव चंद्र सेन के प्रयासों से
- गवर्नर जनरल – लार्ड नॉर्थब्रुक
- अंतर्जातिये विवाह को मान्यता
- बहुपत्नी प्रथा प्रतिबंधित
- लड़की – 14 वर्ष , लड़का – 18 वर्ष
शाही उपाधि अधिनियम (1876) –
- केंद्रीय कार्यकारिणी में 6 ठा सदस्य (लोक निर्माण विभाग कार्य)
- 28 अप्रैल 1876 को एक घोसणा – महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी घोषित
इल्बर्ट विधेयक (Ilbert Bill) – 1883
- इल्बर्ट विधेयक 1883 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रिपन के कार्यकाल में सर कोर्टनी इल्बर्ट (भारतीय विधान परिषद के विधि सदस्य) द्वारा पेश किया गया था।
- इसका उद्देश्य भारतीय न्यायाधीशों को उन मामलों की सुनवाई का अधिकार देना था जिनमें भारत में बसे यूरोपीय नागरिक आरोपी होते थे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म (1885)
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई।
- इसके संस्थापक (प्रणेता) ए.ओ. ह्यूम थे, जो एक अंग्रेज थे।
- डब्ल्यू.सी. बनर्जी कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष बने।
- 28 से 30 दिसंबर, 1885 को बबई में श्री डब्ल्यू.सी. बनर्जी की अध्यक्षता में हुए इसके पहले अधिवेशन में ही काग्रेस ने विधान परिषदों में सुधार तथा इनके विस्तार की माँग की।
- 1889 का अधिवेशन (पांचवां अधिवेशन):
- सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का भाषण उल्लेखनीय था। उन्होंने कहा:
“यदि आपकी यह मांग पूरी हो जाती है, तो आपकी
अन्य सभी मांगें पूरी हो जाएंगी।
इस पर देश का समूचा भविष्य तथा प्रशासन व्यवस्था
का भविष्य निर्भर करता है।”
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892
- भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 मुख्यतः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1889 से 1891 तक के अधिवेशनों में पारित प्रस्तावों से प्रभावित होकर लाया गया था।
- कांग्रेस ने 1891 में अपने दृढ़ निश्चय को दोहराया कि जब तक भारत की जनता को उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से विधानमंडलों में अपनी आवाज उठाने की अनुमति नहीं मिलती, तब तक भारत पर अच्छी तरह शासन संभव नहीं होगा।
- पहली बार परिषद में निर्वाचित प्रतिनिधियों को शामिल किया गया। (अप्रत्यक्ष प्रकार)
- केंद्रीय व प्रांतीय विधानपरिषद में ग़ैर सरकारी सदस्यों की नियुक्ति
- अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर “कम-से-कम 10 तथा अधिक-से-अधिक 16” कर दी गई। पहले यह संख्या 6 से 12 थी।
- परिषद के अधिकारों में वृद्धि –
- भारतीय सदस्यों को अब वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) पर विचार-विमर्श की अनुमति दी गई। हालांकि, सदस्यों को बजट में संशोधन का अधिकार नहीं दिया गया।
- (मतदान + अनुपूरक प्रश्न) अनुमति नहीं
- परिषद के सदस्यों को लोकहित के मामलों में प्रश्न पूछने की अनुमति दी गई, लेकिन यह कुछ शर्तों और प्रतिबंधों के अधीन था। (06 दिन पूर्व नोटिस पर)
- प्रतिनिधि शासन प्रारंभ – फ़िरोज़शाह मेहता पहले निर्वाचित भारतीय सदस्य
राष्ट्रीय आंदोलन और संवैधानिक मांगें
स्वराज ही लक्ष्य (1906 का कांग्रेस अधिवेशन)
- कांग्रेस ने पहली बार स्पष्ट रूप से घोषणा की कि उसका अंतिम लक्ष्य स्वराज (Self Rule) है।
- स्वराज का अर्थ:
- नरमपंथियों (Moderates):
- अंग्रेजी साम्राज्य के अधीन संसदीय स्व-शासन।
- गरमपंथियों (Extremists):
- पूर्णतः स्वाधीनता।
- नरमपंथियों (Moderates):
1909 ई. का भारत परिषद अधिनियम (मॉर्ले-मिंटो सुधार)-
- यह अधिनियम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मांगों और बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन के दबाव में लाया गया था। इसका उद्देश्य भारतीयों को प्रशासन में अधिक प्रतिनिधित्व देना था
- अरुंडेल समिति की सिफारिश पर
- पारित – फ़रवरी 1909
- 02 अनुसूची + 08 अनुच्छेद
- इस अधिनियम को मॉर्ले-मिंटो सुधार के सुधार के नाम से भी जाना जाता है (उस समय लॉर्ड मॉर्ले इंग्लैंड में भारत के राज्य सचिव थे और लॉर्ड मिंटो भारत में वायसराय थे)।
- पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया।
- केवल मुस्लिम समुदाय पर
- सांप्रदायिकता को वैधानिकता प्रदान की और लॉर्ड मिंटो को सांप्रदायिक निर्वाचन के जनक के रूप में जाना गया।
- केंद्रीय विधान परिषद (गवर्नर जनरल की परिषद) में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी गई। प्रांतीय परिषद में 30 से बढ़ाकर 50 कर दी गई।
- (बजट पर विवेचना + लोक हित विषय पर चर्चा + अनुपूरक प्रश्न) अनुमति, (बजट पर मतदान) अनुमति नहीं
- भारतीयो को प्रशासन तथा विधि निर्माण दोनों कार्यों में प्रतिनिधित्व दिया गया।
- पहली बार प्रशासी परिषदों में भारतीयों को शामिल किया गया। सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा को वायसराय की कार्यकारी परिषद में पहले भारतीय सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया।
- 02 भारतीयो को भारत सचिव परिषद का सदस्य
- k.c. गुप्ता (प्रथम)
- सैयद विलग्रामी
- प्रांतों में शासकीय बहुमत समाप्त
- स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को अधिक स्वायत्तता दी गई।
- अलग प्रतिनिधित्व का प्रावधान –
- प्रेसीडेंसी कॉर्पोरेशन
- चैम्बर्श और कॉरपोरेशन
- विश्वविद्यालय
- जमीदारों
- पहली बार सार्वजनिक हित पर प्रस्ताव – गोपाल कृष्ण गोखले (25 फ़रवरी 1910)
- मजूमदार – अधिनियम को चंद्रमा की चाँदनी की संज्ञा दी ।
- विधानपरिषद के सदस्य – 04 श्रेणी
- पदेन सदस्य
- नामांकित सरकारी सदस्य
- नामांकित गेर – सरकारी सदस्य
- निर्वाचित सदस्य
भारत शासन अधिनियम, 1919 (माँटेंग-चेम्सफोर्ड सुधार)-
- ब्रिटिश सरकार ने 1919 में भारत शासन अधिनियम बनाया गया, जो 1921 से लागू हुआ ।
- 47 खंड + 2 अनुसूची + उद्देशिका
- यह अधिनियम मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार पर आधारित था, जिसे ब्रिटिश सरकार ने भारत में स्वशासी संस्थानों के क्रमिक विकास के लिए पेश किया था। इसका उद्देश्य धीरे-धीरे जिम्मेदार सरकार की स्थापना करना था, लेकिन इसकी गति और दिशा पूरी तरह से ब्रिटिश संसद के नियंत्रण में थी।
- भारतीय संविधान निर्माण का उत्तरदायित्व ब्रिटिश संसद का था।
- इस कानून को माँटेंग-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है (माँटेंग भारत के राज्य सचिव थे, जबकि चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय थे)।
- नोट : मेसोपोटेमिया आयोग की रिपोर्ट (1916-17) – ब्रिटिश शासन अक्षम
- माँटेंग ने उत्तरदायी शासन की घोषणा की ।
- प्रांतों में द्वैधशासन (Dyarchy) की व्यवस्था की शुरुआत:
- प्रशासनिक विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया:
- आरक्षित विषय (Reserved Subjects):
- पुलिस, न्यायपालिका, वित्त, उद्योग, न्याय, सिंचाई, खनिज और भूमि राजस्व — ये गवर्नर एवं उनके कार्यकारी परिषद के नियंत्रण में थे।
- इन विषयों पर गवर्नर कार्यपालिका परिषद की सहायता से शासन करेगा, जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी नहीं ।
- हस्तांतरित विषय (Transferred Subjects):
- शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सार्वजनिक निर्माण — इनका नियंत्रण प्रांतीय मंत्रियों के अधीन था।
- इन विषयों पर गवर्नर का शासन, जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी।
- आरक्षित विषय (Reserved Subjects):
- इस प्रकार आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन की स्थापना की गई।
- इस अधिनियम से केन्द्रीय और प्रांतीय विषयों को विभाजित किया गया (Dyarchy प्रणाली की शुरुआत हुई)
- प्रांतों में द्वैधशासन
- प्रारंभ – 01 अप्रैल 1921
- अंत 01 अप्रैल 1937
- जन्मदाता – लियोनेल कार्टिस
- विदेश मामले, रक्षा, राजनीतिक संबंध, बैंकिग, सार्वजनिक ऋण, नागरिक और आपराधिक कानून, संचार सेवाएंँ आदि जैसे विषय संघ सूची में शामिल किये गये।
- पहली बार देश में केंद्रीय विधान परिषद को समाप्त करके द्विसदनीय व्यवस्था और प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था प्रारंभ की।
- राज्य परिषद (Council of States)
- उच्च सदन
- निर्वाचित + मनोनीत
- सदस्य – 60
- अवधि – 05 वर्ष
- 04 बार राज्य परिषद का गठन – 1921, 1926, 1930, 1936
- विधान सभा (Legislative Assembly)
- निम्न सदन
- निर्वाचित + मनोनीत + सरकारी + ग़ैर सरकारी
- सदस्य – 145
- अवधि – 03 वर्ष
- 06 बार विधान सभा का गठन – 1920, 1923, 1926, 1930, 1934, 1945
- राज्य परिषद (Council of States)
- शक्तियाँ समान लेकिन बजट केवल विधानसभा को पॉवर
- 09 फ़रवरी 1921 को ड्यूक ऑफ़ कनॉट ने नई विधायिका (केंद्रीय विधानसभा) का उद्घाटन किया
- अध्यक्ष – फ्रेडरिक वहाइट
- उपाध्यक्ष – सच्चिदानंद सिंह
- प्रथान भारतीय अध्यक्ष – विट्ठल भाई पटेल
- अंतिम भारतीय अध्यक्ष – g.v. मावलंकर
- पहली बार प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था
- संपत्ति, कर या शिक्षा के आधार पर सीमित संख्या में लोगों को मताधिकार प्रदान किया।
- महिला मताधिकार नहीं
- इससे एक लोक सेवा आयोग का गठन किया गया। अतः 1926 में सिविल सेवकों की भर्ती के लिए केंद्रीय लोक सेवा आयोग का गठन किया गया। (1923 ली आयोग की सिफारिश)
- केंद्रीय बजट को राज्यों के बजट से अलग कर दिया और राज्य विधानसभाओं को अपना बजट स्वयं बनाने के लिए अधिकृत कर दिया।
- सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार – सिक्खो, ईसाईयो, आंग्ल भारतीय, यूरोपियो
- भारत सचिव का खर्च ब्रिटिश राजस्व से (पहले भारत से था)
- भारत सचिव की सहायता के लिए एक उच्चायुक्त की नियुक्ति (लंदन में )
- वायसराय की कार्यकारी परिषद में 03 भारतीय आवश्यक
- नोट :- प्रांतों में द्वैध शासन की असफलता – समिति अध्यक्ष (अलेक्जेंडर यूडीमेन)
- अधिनियम की आलोचना –
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस – निराशाजनक व असंतोषप्रद
- लोकमान्य तिलक – बिना सूरज का सवेरा
- सुभाष चंद्र बॉस – जनता के लिए नवीन बंधन गढ़ दिए
- एनिबिसेंट – इंग्लैंड को शोभा नहीं, भारत को स्वीकार्य नहीं
संवैधानिक विकास की निर्णायक घटनाएँ
साइमन कमीशन-
- ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1927 में नए संविधान में भारत की स्थिति का पता लगाने/अधिनियम की समीक्षा के लिए सर जॉन के नेतृत्व में सात सदस्यीय वैधानिक आयोग के गठन की घोषणा की । 1928 में गठन किया गया ।
- सर जॉन साइमन (अध्यक्ष)
- लॉर्ड बर्न
- एडवर्ड के डागान
- हार्मशान
- सी.आर.एटली
- लैन फॉक्स
- अर्ल कोना
- आयोग के सभी सदस्य ब्रिटिश थे। – विरोध हुआ
- पूर्ण बहिष्कार किया – कांग्रेस का मद्रास अधिवेशन (1927, अध्यक्ष – जी वी मावलंकर )
- 1930 में अपनी रिपोर्ट पेश की।
- सिफारिशें-
- प्रांतों में द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त करना। प्रांतों को पूर्ण उत्तरदायी सरकार प्रदान करने की अनुशंसा की गई।
- राज्यों में सरकारों का विस्तार करना।
- ब्रिटिश भारत के संघ की स्थापना एवं सांप्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था को जारी रखना।
10 सदस्यीय नेहरू समिति – (रिपोर्ट – 1928)
- साइमन कमीशन विरोध पर भारत सचिव लॉर्ड बर्कनहेड की चुनौती पर गठित
| क्रम संख्या | सदस्य का नाम | पद / भूमिका | संगठन / दल |
| 1 | मोतीलाल नेहरू | अध्यक्ष | कांग्रेस |
| 2 | पंडित जवाहर लाल नेहरू | सचिव | कांग्रेस |
| 3 | सुभाष चंद्र बोस | सदस्य | कांग्रेस |
| 4 | अली इमाम | सदस्य | मुस्लिम लीग |
| 5 | सुवाब कुरैशी | सदस्य | मुस्लिम लीग |
| 6 | एम. एस. अणे | सदस्य | हिंदू महासभा |
| 7 | एम. आर. जयकर | सदस्य | हिंदू महासभा |
| 8 | जी. आर. प्रधान | सदस्य | हरिजन |
| 9 | सरदार मंगल सिंह | सदस्य | सिख |
| 10 | तेज बहादुर सप्रू | सदस्य | उदारवादी |
| 11 | एम. एन. जोशी | सदस्य | श्रमिक संघ |
- नेहरू रिपोर्ट के विरोध में – जिन्ना द्वारा 14 सूत्रिय माँग (मार्च 1929 में )
पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव (1929):
- कलकत्ता अधिवेशन (1928) में यह निर्णय लिया गया कि अंग्रेजों को डोमिनियन स्टेटस (स्वशासी शासन) स्वीकार करने के लिए एक वर्ष का समय दिया जाएगा।
- जब ब्रिटिश सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया, तो कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन (1929) में एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा की गई।
- कांग्रेस ने डोमिनियन स्टेटस की मांग छोड़कर अब पूर्ण स्वराज (पूर्ण स्वतंत्रता) को अपना अंतिम लक्ष्य घोषित किया।
- 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय लिया गया।
- नमक कानून को तोड़ने के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की गई।
- महात्मा गांधी ने डांडी यात्रा (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930) के माध्यम से नमक कानून को तोड़कर ब्रिटिश शासन को चुनौती दी।
गोलमेज सम्मेलन एवं श्वेतपत्र (1930-1935):
- 1929 में लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की घोषणा के बाद, भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन तेज हो गया।
- ब्रिटिश सरकार ने भारत में बढ़ते जन आंदोलन को शांत करने और संवैधानिक सुधारों पर विचार के लिए गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930 – जनवरी 1931):
- कांग्रेस ने इसमें भाग नहीं लिया क्योंकि वे सविनय अवज्ञा आंदोलन में व्यस्त थे।
- इसमें केवल देसी रियासतों, मुस्लिम लीग और अन्य दलों ने भाग लिया।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (सितंबर – दिसंबर 1931):
- गांधी-इरविन समझौते के बाद, महात्मा गांधी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए।
- गांधी जी ने अछूतों को हिंदू समाज का हिस्सा माना लेकिन डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने इसका विरोध किया।
- सांप्रदायिक मुद्दों के कारण कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका।
तृतीय गोलमेज सम्मेलन (नवंबर – दिसंबर 1932):
- कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया।
- केवल कुछ सांप्रदायिक प्रतिनिधियों और देसी रियासतों ने भाग लिया।
श्वेतपत्र (White Paper) – (मार्च 1933):
- तीन गोलमेज सम्मेलनों के बाद, ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1933 में एक श्वेतपत्र प्रकाशित किया।
- इसमें एक नए संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत की गई।
- संघीय ढांचे और प्रांतीय स्वायत्तता का प्रावधान था।
- केंद्र में द्वैधशासन और प्रांतों में जिम्मेदार सरकारों की स्थापना का प्रस्ताव किया गया।
- ब्रिटिश संसद ने श्वेतपत्र में उल्लिखित योजना पर विचार करने के लिए लॉर्ड लिनलिथगो की अध्यक्षता में संयुक्त समिति का गठन किया। समिति ने नवंबर 1934 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में कहा गया कि संघीय शासन तभी लागू होगा जब कम से कम 50% देसी रियासतें इसमें शामिल होने को तैयार हों।
कम्युनल अवार्ड या सांप्रदायिक अवार्ड (अगस्त 1932) –
- रैमजे मैकडोनाल्ड ने अगस्त 1932 में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर एक योजना की घोषणा की। इसे कम्युनल अवार्ड सांप्रदायिक अवार्ड के नाम से जाना गया।
- अगस्त 1932 में ब्रिटिश पी.एम. की घोषणा – न सिर्फ मुस्लिमों, सिख, ईसाई, यूरोपियनों और आंग्ल भारतीयों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था का विस्तार किया बल्कि इसे दलितों के लिए भी विस्तारित कर दिया गया।
पूना समझौता (24 सितंबर 1932) –
- साम्प्रदायिक अवार्ड के कारण गांधीजी के अनशन से कांग्रेस नेताओं और दलित नेताओं के बीच एक समझौता हुआ, जिसे पूना समझौते के नाम से जाना गया।
- इसमें संयुक्त हिंदू निर्वाचन व्यवस्था को बनाए रखा गया और दलितों के लिए स्थान भी आरक्षित कर दिए गए।
भारत शासन अधिनियम, 1935 और उसके परिणाम
भारत शासन अधिनियम, 1935 –
- 1930, 1931, 1932 के गोलमेज सम्मेलन की रिपोर्ट के आधार पर
- 19 दिसंबर 1934 को ब्रिटिश संसद में विधेयक पेश किया गया।
- दोनों सदनों द्वारा पास होने और 4 अगस्त 1935 को सम्राट की अनुमति मिलने के बाद यह अधिनियम लागू हुआ।
- यह अधिनियम भारत में पूर्ण उत्तरदायी सरकार के गठन में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
- इसमे 14 भाग + 321 धारायें + 10 अनुसूची
- धारा – 5 – अखिल भारतीय फेडरेशन / भारत संघ की स्थापना की परिकल्पना:
- The federation of India (All india federation नहीं )
- यह फेडरेशन
- ब्रिटिश भारत के प्रांतों (11) – अनिवार्य
- चीफ कमिश्नरी प्रांतों (6) – अनिवार्य
- भारतीय रियासतों (562) – स्वैच्छिक (शामिल नहीं हुई ) को मिलाकर बनाया जाना था। इससे पहले भारत एक एकात्मक राज्य था, जहां प्रांत केवल केंद्र के अधीन थे।
- फेडरेशन में शामिल होने के लिए कम से कम 50% देसी रियासतों की आवश्यकता थी। रियासतों ने इसे स्वीकार नहीं किया, जिससे संघीय ढांचा कभी अस्तित्व में नहीं आ पाया।
- केंद्र और इकाइयों के बीच तीन सूचियों के आधार पर शक्तियों का बंटवारा कर दिया। (7 वीं अनुसूची)
- संघीय सूची – 59 विषय
- प्रांतीय सूची – 54 विषय
- समवर्ती सूची – 36 विषय (अवशिष्ठ शक्तियाँ वायसराय को दे दी गई – धारा 104)
- प्रांतों में द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त कर दी तथा प्रांतीय स्वायत्तता का शुभारंभ किया (01 अप्रैल 1937 को)। मंत्रिमंडल को विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी बनाया गया।
- केंद्र में द्वैध शासन प्रणाली का शुभारंभ किया। परिणामत: संघीय विषयों को स्थानांतरित और आरक्षित विषयों में विभक्त करना पड़ा। हालांकि यह प्रावधान कभी लागू नहीं हो सका।
- आरक्षित विषय (Reserved Subjects):
- प्रतिरक्षा, विदेशी मामलो , धार्मिक विषय, जनजाति क्षेत्र
- ये गवर्नर एवं उनके कार्यकारी परिषद के नियंत्रण में थे।
- इन विषयों पर गवर्नर कार्यपालिका परिषद की सहायता से शासन करेगा, जो ब्रिटिश सरकार के प्रति उत्तरदायी ।
- हस्तांतरित विषय (Transferred Subjects):
- शिक्षा, स्वास्थ्य
- ये गवर्नर एवं उनके मंत्रिपरिषद के नियंत्रण में थे।
- इन विषयों पर गवर्नर का शासन, जो विधान सभा के प्रति उत्तरदायी।
- आरक्षित विषय (Reserved Subjects):
- केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया।
- इस अधिनियम के तहत दो नए प्रांत बनाए गए:
- उड़ीसा
- सिंध
- बर्मा (म्यांमार) को भारत से अलग कर दिया गया। (धारा – 46(2)
- इस अधिनियम के तहत 1 अप्रैल 1937 से बर्मा का प्रशासन भारत से पूर्ण रूप से अलग कर दिया गया।
- इसने न केवल संघीय लोक सेवा आयोग की स्थापना की बल्कि प्रांतीय सेवा आयोग और दो या अधिक राज्यों के लिए संयुक्त सेवा आयोग की स्थापना भी की।
- इसके तहत 1937 में संघीय न्यायालय की स्थापना भी की।
- 01 अक्टूबर 1937 को अस्तित्व में आया
- 27 जनवरी 1950 को समाप्त
- इसके ऊपर प्रिवी कौंसिल की अपीली अधिकारिता
- सितंबर 1949 में संविधान सभा ने समाप्त की।
- 01 मुख्य न्यायाधीश + 06 अन्य न्यायाधीश – नियुक्ति सम्राट
- प्रथम मुख्य न्यायाधीश – सर मॉरिस ग्वेयर
- 02 भारतीय अन्य न्यायाधीश –
- (i) M.R. जैकब
- (ii)M.S. सुल्तान
- स्वतंत्र भारत के प्रथम C.J. – H.J.कानिया
- इसी अधिनियम के तहत फरवरी 1937 में 11 प्रांतीय विधानमंडलो के लिए निर्वाचन –
- कुल सीटे – 1585
- चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। कुल 836 सामान्य सीटों में से 715 सीटें कांग्रेस (चुनाव चिह्न – पीला बक्सा) ने जीतीं। मुस्लिम लीग को भारी हार मिली, केवल 51 सीटें (कुल 482 सीटों में) जीत पाई।
- 05 प्रांतों में कांग्रेस को बहुमत –
- सयुंक्त प्रांत – गोविंद वल्लभ पंत
- बिहार – श्री कृष्ण सिंह
- उड़ीसा – बी.एन.दस
- मध्य प्रांत व बरार – बी.जी.खरे – रविशं
- मद्रास – सी. राजगोपालाचारी
- 03 प्रांतों में कांग्रेस बड़ा दल –
- असम – सादुल्लाह
- बंबई – बी.जी.खरे
- उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत – डॉ.ख़ान साहब
- 03 में कांग्रेस बुरी हर –
- बंगाल –
- फुजुलक हक
- मुस्लिम लीग + कृषक प्रजा पार्टी (संस्थापक -फुजुलक हक )
- पंजाब
- हयात ख़ान
- यूनियनिस्ट पार्टी (संस्थापक – अप्सर हुसैन)
- सिंध
- उल्लाह, सुमरो, अली ख़ान (मिश्रित)
- अक्टूबर 1939 में 8 प्रांतों में कांग्रेस का त्यागपत्र
- मुस्लिम लीग ने मुक्ति दिवस मनाया – 22 दिसंबर 1939 (अंबेडकर ने साथ दिया)
- नोट :- 06 प्रांतों में द्विसदानीय विधायिका – (विधानपरिषद – उच्च विधानसभा – निम्न )
- सयुंक्त प्रांत
- बिहार
- मद्रास
- असम
- बंबई
- बंगाल
- नोट :- 06 प्रांतों में द्विसदानीय विधायिका – (विधानपरिषद – उच्च विधानसभा – निम्न )
- मुस्लिम लीग ने मुक्ति दिवस मनाया – 22 दिसंबर 1939 (अंबेडकर ने साथ दिया)
- केंद्रीय विधानसभा सदस्य संख्या बढ़ाकर – 375 एवम राज्यसभा सदस्य संख्या – 260 की गई ।
- पहली बार प्रशासन में प्रधानमंत्री (Premier) और मंत्री (Minister) जैसे पदनामों का प्रयोग किया गया।
- मताधिकार का विस्तार किया गया। (लगभग – 10 प्रतिशत)
- गवर्नर जनरल को वीटो पॉवर (संविधान में art. 123 power यही से)
- उद्देशिका का उल्लेख नहीं
- सयुंक्त बैठक का प्रावधान
- ब्रिटिश शासन भारत को डोमिनियन दर्जा देगा ना की पूर्ण स्वतंत्रता
- दलित जातियों, महिलाओं और मजदूर वर्ग के लिए अलग निर्वाचन
- भारत परिषद अधिनियम, 1858 को समाप्त
- नोट : (संवैधानिक निरंकुशता का अनुमोदन किया) इसके अंतर्गत भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की गई।
भारतीय रिजर्व बैंक
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की स्थापना 1 अप्रैल, 1935 को हुई।
- भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत स्थापित।
- हिल्टन यंग कमीशन की सिफ़ारिश पर गठन हुआ।
- मुख्यालय मुंबई में स्थित है।
- 1 जनवरी, 1949 को राष्ट्रीयकरण किया गया।
- RBI को ‘बैंकर बैंक’ कहा जाता है।
- ₹1 से अधिक मूल्यवर्ग के करेंसी नोट जारी करता है।
- भारत में क्रेडिट और मुद्रा प्रणाली को नियंत्रित करता है।
- बैंक नोटों के निर्गमन और आरक्षित निधियों का प्रबंधन करता है।
- देश की ऋण और मौद्रिक नीतियों को संचालित करता है।
- पहले गवर्नर सर ओसबोर्न स्मिथ थे।
- पहले भारतीय गवर्नर सर सी. डी. देशमुख थे।
- आलोचना :-
- जवाहर लाल नेहरू :-
- दासता का नया अधिकार – पत्र
- अनेक ब्रेको वाली इंजन रहित गाड़ी
- जिन्ना – पूर्णतया सदा व मूल रूप से बुरा
- एटली – अविश्वास का प्रतीक
- राजगोपालाचारी – द्वैध शासन प्रणाली से बुरा
- कूपलैंड – राजनीतिक विचार की महान सफलता
- मदन मोहन मालवीय – भीतर से खोखला
- जवाहर लाल नेहरू :-
1940 के बाद की घटनाएँ
अगस्त प्रस्ताव (1940 ई.)
- कांग्रेस मंत्रिमंडल के त्यागपत्र से उत्पन्न संवैधानिक संकट के करण आया ।
- 1940 ई. में भारत के तत्कालीन वायसरॉय लार्ड लिनलिथगो ने अगस्त प्रस्ताव पारित (08 अगस्त)किया।
- जिसमें ब्रिटिश सरकार द्वारा पहली बार यह स्वीकार किया गया कि भारत के संविधान के निर्माण का कार्य भारतीयों द्वारा ही किया जाएगा। (संविधान सभा का उल्लेख नहीं )
- युद्ध पश्चात ओपनिवेशक स्वराज स्थापित होगा।
- ध्यान रहे कि अगस्त प्रस्ताव का उद्देश्य द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत का सहयोग प्राप्त करना था।
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने असंतोष
- कांग्रेस – पूर्ण स्वतंत्रता
- मुस्लिम लीग – विभाजन
व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940)
- दिल्ली चलो आंदोलन भी
- आरम्भ – 17 अक्टूबर 1940 (पवनार आश्रम, महाराष्ट्र)
- पोषक – गांधी जी
- प्रथम सत्याग्रही – विनोबा भावे
- दूसरे – पंडित नेहरू
- इससे अगस्त प्रस्ताव असफल रहा
