केन्द्र-राज्य संबंध भारत की संघीय शासन व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार है, जिसके अंतर्गत केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों, अधिकारों तथा दायित्वों का विभाजन निर्धारित किया जाता है। राजनीतिक व्यवस्था और शासन विषय में यह अध्याय संविधान द्वारा स्थापित संतुलन, सहयोग तथा समन्वय की अवधारणा को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह संबंध देश की एकता, अखंडता और सुचारु प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

केंद्र-राज्य संबंध

- भारतीय संविधान का स्वरूप संघीय है, जिसमें विधायी, कार्यपालिका और वित्तीय शक्तियाँ केंद्र और राज्यों के बीच विभाजित हैं।
- हालाँकि, न्यायिक व्यवस्था एकल है – यह केंद्र और राज्य दोनों के कानूनों को लागू करती है।
- संविधान केंद्र-राज्य संबंधों को तीन दृष्टिकोणों से देखता है:
- विधायी संबंध
- प्रशासनिक संबंध
- वित्तीय संबंध
केंद्र-राज्य संबंधों से संबंधित अनुच्छेद
| अनुच्छेद | विषय-वस्तु |
| विधायी संबंध(भाग 11 – अध्याय 1)(अनुच्छेद 245 से 255) | |
| 245 | संसद और राज्य विधायिकाओं द्वारा बनाए गए कानूनों का विस्तार |
| 246 | संसद और राज्य विधायिकाओं द्वारा कानून बनाने की विषय-वस्तु |
| 247 | कतिपय अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना का संसद का अधिकार |
| 248 | विधायन की अवशेष शक्तियाँ |
| 249 | राष्ट्रहित में राज्य सूची से संबंधित विषयों पर संसद की विधायन शक्ति |
| 250 | आपातकाल में राज्य सूची के विषयों पर संसद की विधायन शक्ति |
| 251 | अनुच्छेद 249 व 250 के अंतर्गत बने कानूनों और राज्य विधायिका के कानूनों में असंगति |
| 252 | दो या अधिक राज्यों की सहमति से संसद द्वारा कानून बनाना |
| 253 | अंतर्राष्ट्रीय समझौतों पर अमल हेतु विधायन |
| 254 | संसद और राज्य विधायिका के कानूनों के बीच असंगति |
| 255 | प्रक्रिया संबंधी अनुशंसाओं और अनुमोदनों का पालन |
| प्रशासनिक संबंध(भाग 11 – अध्याय 1)(अनुच्छेद 256 से 263) | |
| 256 | राज्यों और संघ की जिम्मेदारियाँ |
| 257 | कतिपय मामलों में संघ का राज्यों पर नियंत्रण |
| 257-A | राज्यों में संघ बलों की तैनाती (निरस्त) |
| 258 | राज्यों को कार्य सौंपने की संघ की शक्ति |
| 258-A | संघ को कार्य सौंपने की राज्यों की शक्ति |
| 259 | प्रथम अनुसूची भाग-बी के राज्यों में सशस्त्र बल (निरस्त) |
| 260 | भारत के बाहर संघ का अधिकार क्षेत्र |
| 261 | सार्वजनिक क्रियाकलाप, अभिलेख व न्यायिक प्रक्रिया |
| 262 | अंतर्राज्यीय नदियों या घाटियों के जल विवादों का न्याय निर्णय |
| 263 | अंतर्राज्यीय परिषद संबंधी प्रावधान |
| वित्तीय संबंध (भाग 12)(अनुच्छेद 264 से 293) | |
| 268 | संघ द्वारा लगाए गए, राज्यों द्वारा संगृहित कर |
| 268-A | सेवा कर: संघ द्वारा आरोपित, राज्य द्वारा संगृहित |
| 269 | संघ द्वारा लगाए गए कर जो राज्यों को सौंपे जाते हैं |
| 270 | संघ और राज्य द्वारा लगाए गए करों का वितरण |
| 271 | संघ के लिए अतिरिक्त कर (सरचार्ज) |
| 272 | करों का वितरण (निरस्त) |
| 273 | जूट उत्पादों पर निर्यात कर हेतु अनुदान |
| 274 | कर विधेयकों पर सर्वोच्च न्यायालय की संस्तुति |
| 275 | कतिपय राज्यों को अनुदान |
| 276 | व्यवसाय, व्यापार, कॉलिंग व रोजगार पर कर 277 पूर्ववर्ती करों की सुरक्षा |
| 278 | प्रथम अनुसूची भाग-बी से संबंधित वित्तीय समझौते (निरस्त) |
| 279 | “कुल प्राप्तियों” की गणना |
| 280 | वित्त आयोग |
| 281 | वित्त आयोग की अनुशंसाएँ |
| 282 | संघ/राज्य द्वारा खर्च की स्वीकृति |
| 283 | संचित निधियाँ, आकस्मिक निधियाँ व लोक लेखा |
| 284 | लोक सेवकों द्वारा प्राप्त धन की सुरक्षा |
| 285 | संघीय संपत्तियों पर राज्य करों से छूट |
| 286 | वस्तुओं की बिक्री/खरीद पर करारोपण प्रतिबंध |
| 287 | बिजली पर कर से छूट |
| 288 | बिजली और पानी पर राज्यों द्वारा कर की छूट |
| 289 | राज्यों की आय/संपत्ति पर संघीय करों से छूट |
| 290 | खर्चों व पेंशन की समायोजना |
| 291 | शासकों के प्रिवीपर्स (निरस्त) |
| 292 | भारत सरकार द्वारा उधार लेना |
| 293 | राज्य सरकारों द्वारा उधार लेना |
विधायी संबंध(भाग 11 – अध्याय 1)(अनुच्छेद 245 से 255)
संविधान विधायी शक्तियों को दो आधारों पर विभाजित करता है –
- विधान : विस्तार की दृष्टि से (अनुच्छेद 245)
- विधान : विषय-वस्तु की दृष्टि से (अनुच्छेद 246)
विधान : विस्तार की दृष्टि से (अनुच्छेद 245)
अनुच्छेद 245 संसद और राज्य विधानमण्डल की कानून निर्माण शक्ति की सीमा का उल्लेख करता है।
अनुच्छेद 245(1):
- संसद भारत के सम्पूर्ण क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकती है।
- राज्य विधानमण्डल अपने सम्पूर्ण क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकता है।
अनुच्छेद 245(2):
- संसद द्वारा बनाई गई विधि का राज्यक्षेत्रातीत प्रवर्तन (Extra Territorial Operation) भी संभव है।
राज्यक्षेत्रातीत प्रवर्तन का सिद्धांत (Doctrine of Extra-Territorial Operation)
- संघ की संसद को असीमित राज्य क्षेत्रीय अधिकारिता
- कोई कानून केवल इस आधार पर अवैध नहीं होगा कि वह भारत के बाहर भी लागू होता है।
- संसद द्वारा बनाए गए कानून भारत के भीतर स्थित व्यक्तियों और संपत्ति पर लागू होंगे, साथ ही विदेशों में बसे भारतीय नागरिकों और उनकी संपत्ति पर भी लागू हो सकते हैं।
राज्य क्षेत्रीय संबंध (Doctrine of Territorial Nexus)
- राज्य विधानमण्डल केवल अपने राज्य की सीमाओं में ही कानून बना सकता है, बाहर नहीं।
- परंतु यदि कानून का राज्य से वास्तविक और पर्याप्त संबंध (Real & Substantial Nexus) हो, तो वह वैध माना जाएगा।
- राज्य और विधि की विषयवस्तु के बीच संबंध वास्तविक हो , काल्पनिक नहीं।
- उदाहरण :
- धार्मिक न्यास अधिनियम –
- न्यास की कुछ संपत्ति राज्य के बाहर थी।
- SC ने निर्णय दिया कि चूँकि न्यास और न्यासी राज्य में हैं, इसलिए पर्याप्त संबंध है और अधिनियम वैध है।
- गुजरात भूमि अधिनियम (Ceiling Law):
- गुजरात में भूमि सीमा निर्धारित करने के लिए अन्य राज्यों में धारित भूमि भी गिनी जाती थी।
- SC ने इसे वैध माना क्योंकि भूमि सुधार के उद्देश्य और राज्य के बीच पर्याप्त संबंध था।
- मुंबई प्रतियोगिता अधिनियम:
- कंपनी राज्य के बाहर निगमित थी पर मुंबई में प्रतियोगिता और पैसा संग्रह होता था।
- SC ने कहा कि पर्याप्त संबंध है, इसलिए राज्य का कर वैध है।
- धार्मिक न्यास अधिनियम –
अपवाद (Exception):
कुछ परिस्थितियों में संसद या राज्य विधानमण्डल की शक्ति सीमित हो जाती है –
- अनुच्छेद 240: संघ राज्यक्षेत्रों (जैसे अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव, पुडुचेरी) के लिए राष्ट्रपति विनियम बना सकता है।
- अनुसूचित क्षेत्र (5वीं अनुसूची): राज्यपाल संसद की विधि को अनुसूचित क्षेत्रों में लागू न करने का निर्देश दे सकता है।
- असम के स्वायत्त जिले: राज्यपाल संसद की विधि को लागू न करने का आदेश दे सकता है।
- संसद की विधियाँ भारत से बाहर रहने वाले भारतीय नागरिकों पर भी लागू हो सकती हैं।
- कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्य विधानमण्डल की विधि राज्य से बाहर भी लागू हो सकती है।
- यदि संघ सूची और राज्य सूची में टकराव (Overlapping) हो, तो संघ सूची को प्रधानता दी जाएगी (सर्वोच्चता का सिद्धांत)।
विषय-वस्तु की दृष्टि से (अनुच्छेद 246)
- संविधान की सातवीं अनुसूची में विधायी विषयों का विभाजन किया गया है। इसमें तीन सूचियाँ हैं –
- संघ सूची (Union List) – संसद को विशेषाधिकार (Exclusive Power)।
- राज्य सूची (State List) – राज्य विधानमण्डल को विशेषाधिकार।
- समवर्ती सूची (Concurrent List) – संसद और राज्य दोनों को अधिकार।
अनुच्छेद 246(1):
- संसद को संघ सूची पर कानून बनाने की अनन्य शक्ति।
अनुच्छेद 246(2):
- संसद और राज्य दोनों को समवर्ती सूची पर शक्ति।
अनुच्छेद 246(3):
- राज्य विधानमण्डल को राज्य सूची पर शक्ति।
अनुच्छेद 246(4):
- संसद उन क्षेत्रों पर भी कानून बना सकती है जो किसी राज्य के अंतर्गत नहीं हैं, चाहे विषय राज्य सूची का ही क्यों न हो।
अनुच्छेद 246A –
- जी.एस.टी. (101वाँ संशोधन, 2016)
अनुच्छेद 246A(1):
- संसद और राज्य विधानमण्डल दोनों को जीएसटी पर कानून बनाने की शक्ति।
अनुच्छेद 246A(2):
- अंतर्राज्यीय व्यापार व वाणिज्य के दौरान केवल संसद को जीएसटी कानून बनाने की अनन्य शक्ति।
अनुच्छेद 247
- संसद को यह अधिकार देता है कि संघ सूची के विषयों पर बने कानूनों के बेहतर प्रशासन के लिए वह अतिरिक्त न्यायालय स्थापित कर सकती है।
- यह प्रावधान केवल संसद से संबंधित है, न कि राज्य विधानमण्डल से।
अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) – अनुच्छेद 248
- संसद को उन विषयों पर कानून बनाने की शक्ति है जो न तो राज्य सूची में हैं और न ही समवर्ती सूची में।
- यह प्रावधान कनाडा से लिया गया है (जहाँ अवशिष्ट शक्तियाँ केन्द्र के पास हैं)।
- अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और स्विट्ज़रलैंड में अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों के पास होती हैं।
- भारत शासन अधिनियम 1935 में यह शक्ति गवर्नर-जनरल के पास थी।
- यह तय करना कि कोई विषय अवशिष्ट है या नहीं, न्यायपालिका का कार्य है।
- साइबर क्राइम अवशिष्ट विषय का उदाहरण है।
- अवशिष्ट विषय का उल्लेख अनुसूची 7, संघ सूची, प्रविष्टि 97 में किया गया है – “कोई अन्य विषय” (Any other matter)।
राज्य सूची पर संसद की विधायी शक्ति
- सामान्यतः राज्य सूची (State List) के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल राज्य विधानमण्डल को होता है।
- लेकिन संविधान कुछ विशेष परिस्थितियों में संसद को भी यह अधिकार प्रदान करता है।
अनुच्छेद 249 – राष्ट्रीय हित में
- राज्यसभा संसद को राज्य सूची पर कानून बनाने का अधिकार दे सकती है।
- शर्तें :
- राज्यसभा में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से संकल्प पारित होना चाहिए।
- यह संकल्प संसद को राज्य सूची पर कानून बनाने की शक्ति देता है।
- अवधि :
- यह शक्ति अधिकतम एक वर्ष तक रहती है।
- इसे हर बार एक-एक वर्ष आगे बढ़ाया जा सकता है।
अनुच्छेद 250 – आपातकाल की स्थिति में
- जब संविधान के अनुच्छेद 352, 356, 360 के अंतर्गत आपातकाल लागू हो, तब संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है।
- आपातकाल की समाप्ति के बाद यह कानून केवल 6 महीने तक प्रभावी रहता है।
अनुच्छेद 251 :
- अनुच्छेद 249 और 250 के तहत संसद द्वारा बनाई गई विधि यदि राज्य की किसी विधि से असंगत हो, तो संसदीय विधि प्रभावी रहेगी।
अनुच्छेद 252 – राज्यों के अनुरोध पर
- यदि दो या अधिक राज्य संकल्प पारित कर संसद से अनुरोध करें, तो संसद राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकती है।
- यह कानून केवल उन्हीं राज्यों पर लागू होगा जिन्होंने अनुरोध किया है।
- अन्य राज्य भी बाद में अपने विधानमण्डल द्वारा संकल्प पारित कर इस कानून को अंगीकार (Adopt) कर सकते हैं।
- इस कानून में संशोधन या निरसन केवल संसद ही कर सकती है।
- इस स्थिति में राज्यों ने अपनी विधायी शक्ति को स्वेच्छा से संसद को सौंप दिया होता है।
- अभी तक केवल 02 बार ही
- उदाहरण –वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972
अनुच्छेद 253 – अंतर्राष्ट्रीय करारों का पालन
- संसद को शक्ति है कि वह किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि, करार, अभिसमय (Convention) या सम्मेलन को लागू करने हेतु भारत के सम्पूर्ण क्षेत्र के लिए कानून बना सके।
- इसमें संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है।
- उदाहरण :
- United Nations (Privileges and Immunities) Act, 1947
- Geneva Convention Act, 1960
- Anti-Hijacking Act, 1982
अनुच्छेद 254 – असंगतता (Inconsistency)
अनुच्छेद 254(1) :
- यदि संसद और राज्य की विधि में टकराव हो तो संसद की विधि प्रभावी होगी।
- राज्य की विधि विरोधी की मात्र तक शून्य होंगी।
अनुच्छेद 254(2) :
- समवर्ती सूची पर भी संसदीय विधि प्रभावी रहेगी।
- यदि राज्य ने किसी विषय पर विधेयक राष्ट्रपति के पास आरक्षित रखा हो और राष्ट्रपति की अनुमति मिल जाए, तो वह राज्य की विधि उस राज्य में प्रभावी रहेगी, भले ही संसद की विधि उससे असंगत क्यों न हो।
आपातकाल में संघ-राज्य संबंध
- अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल के समय शक्तियों का विभाजन निलंबित हो जाता है।
- राज्य सूची के विषय, समवर्ती सूची के समान हो जाते हैं।
- राज्य विधानमण्डल बने रहते हैं, पर संसद को भी इन विषयों पर शक्ति मिल जाती है।
- अनुच्छेद 250 संसद की शक्ति का विस्तार राज्य सूची तक करता है।
अनुच्छेद 255 : सिफारिशों और पूर्व मंज़ूरी के बारे में अपेक्षाओं को केवल प्रक्रिया के विषय मानना
अन्य परिस्थितियाँ जिनमें संसद राज्य सूची पर कानून बना सकती है
- अनुच्छेद 200 :
- राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रख सकता है।
- राष्ट्रपति बिना कारण बताए विधेयक को अस्वीकृत कर सकता है।
- अनुच्छेद 304(B) :
- राज्यों के मध्य व्यापार, वाणिज्य और समागम पर प्रतिबंध लगाने वाला विधेयक
- केवल राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति से ही विधानमण्डल में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 356 :
- यदि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था भंग हो जाए, तो संसद उस राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है।
- वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360)
- वित्तीय आपातकाल के दौरान राज्य द्वारा पारित धन विधेयकों को राष्ट्रपति की अनुमति से नियंत्रित किया जा सकता है।
अनुसूची – 7 : शक्तियों का विभाजन
शक्ति विभाजन की प्रकृति
- शक्तियों का यह विभाजन लम्बवत् (Vertical Division of Powers) है।
- संविधान की सातवीं अनुसूची (Schedule – VII) द्वारा केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है।
- इसमें तीन सूचियाँ (Lists) हैं –
- संघ सूची (Union List)
- राज्य सूची (State List)
- समवर्ती सूची (Concurrent List)
1. संघ सूची (Union List)
- अनुच्छेद 246 के अनुसार संघ सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार संसद को है।
- इसमें राष्ट्रीय महत्व (National Importance) के विषय शामिल किए गए हैं।
- प्रारम्भ में इसमें 97 प्रविष्टियाँ (Entries) थीं।
- वर्तमान में भी प्रविष्टियाँ 97 ही हैं और विषय 98 है, लेकिन –
- प्रविष्टि 33 और 92 विलोपित (Repealed) हैं।
- प्रविष्टि 92 से दो नई प्रविष्टियाँ जोड़ी गईं – 92A और 92B।
- संघ सूची में प्रथम प्रविष्टि रक्षा (Defence) है तथा अंतिम (97वीं) प्रविष्टि अवशिष्ट विषय (Residuary Subjects) से संबंधित है।
- 101वां संशोधन अधिनियम, 2017:
- सातवीं अनुसूची में बदलाव किए गए, विशेषकर संघ सूची (Union List) में से कुछ प्रविष्टियाँ हटाई गईं जो अब जीएसटी के अंतर्गत आती हैं।
- संघ सूची से हटाई गई प्रविष्टियाँ:
- प्रविष्टि 92 – “विक्रय या खरीद कर (Sale or purchase tax) (सम्पत्ति पर कर को छोड़कर)”
- प्रविष्टि 92ग (92C) – “सेवाओं पर कर लगाने का अधिकार
- संघ सूची की प्रविष्ठि संख्या 84 में संशोधन –
- भारत में निम्न विनिर्मित या उत्पादित अधोलिखित माल पर उत्पाद शुल्क केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाएगा –
- अपरिष्कृत पेट्रोलियम उच्च गति डीजल
- मोटर स्पिरिट
- प्राकृतिक गैस
- विमानन टरबाईन ईंधन
- तंबाकू और तंबाकू उत्पाद
- ये माल पहले राज्य सूची के प्रविष्टि संख्या 64 में थे । लोप हो गया।
- भारत में निम्न विनिर्मित या उत्पादित अधोलिखित माल पर उत्पाद शुल्क केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाएगा –
2. राज्य सूची (State List)
- अनुच्छेद 246 के अनुसार राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य विधानमण्डल को है।
- इसमें स्थानीय महत्व (Local Importance) के विषय रखे गए हैं।
- प्रारम्भ में इसमें 66 प्रविष्टियाँ थीं।
- 42वाँ संविधान संशोधन (1976) द्वारा 5 विषय हटाकर समवर्ती सूची में डाल दिए गए –
- शिक्षा,
- वन,
- नाप एवं तौल
- वन्य जीव व पक्षियों का संरक्षण,
- न्याय का प्रशासन।
- (66 – 5 = 61 विषय बचे)
- 101वाँ संविधान संशोधन (2016) द्वारा 2 और विषय हटाए गए।
- वर्तमान में राज्य सूची में 59 विषय ही शेष हैं, पर प्रविष्टियों की संख्या अब भी 66 ही है।
- प्रविष्टि संख्या 11, 19, 20, 29, 36, 52 और 55 विलोपित हैं।
- राज्य सूची की प्रथम प्रविष्टि लोक व्यवस्था (Public Order) है।
3. समवर्ती सूची (Concurrent List)
- इस सूची के विषयों पर संघ और राज्य दोनों ही कानून बना सकते हैं।
- यह सूची ऑस्ट्रेलिया से ग्रहण की गई है।
- प्रारम्भ में इसमें 47 प्रविष्टियाँ व 47 विषय थे।
- वर्तमान में इसमें 47 प्रविष्टियाँ व 52 विषय हैं।
- 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा –
- राज्य सूची से 5 विषय हटाकर इसमें डाले गए।
- साथ ही एक नया विषय जोड़ा गया – जनसंख्या नियंत्रण व परिवार नियोजन (Population Control and Family Planning)।
- संशोधन के बाद समवर्ती सूची में जोड़े गए विषय –
- न्याय का प्रशासन (प्रविष्टि 11A)
- वन (प्रविष्टि 17A)
- वन्य जीव एवं पक्षियों का संरक्षण (प्रविष्टि 17B)
- जनसंख्या नियंत्रण व परिवार नियोजन (प्रविष्टि 20A)
- शिक्षा (प्रविष्टि 25 में संशोधन)
- बाट व नाप-तौल (प्रविष्टि 31A) – यहाँ “मानक नियत करना” संघ सूची में आते हैं।
- संघीय व राज्यीय कानून में असंगति (Conflict):
- यदि किसी समवर्ती विषय पर राज्य और केन्द्र के कानून में टकराव हो तो केन्द्रीय कानून प्रभावी होगा।
- अपवाद: यदि राज्य विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर लेता है, तो वह राज्य में प्रभावी रहेगा।
- समवर्ती सूची का प्रथम विषय है – दण्ड विधि (Criminal Law)।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्याख्या व सिद्धांत
- सूचियों की प्रविष्टियों में कुछ दोहराव (Overlap) पाया जाता है, जैसे –
- “जल” राज्य सूची का विषय है।
- “जल प्रबन्धन” समवर्ती सूची का विषय है।
- ऐसे विवादों के निपटान का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को दिया गया है।
न्यायालय ने कई सिद्धांत विकसित किए –
- संघ की सर्वोच्चता का सिद्धांत
- संघ सूची की प्रविष्टियों को राज्य सूची और समवर्ती सूची पर प्रधानता प्राप्त है।
- यदि कोई विषय संघ और राज्य दोनों सूचियों में आता है, तो संघ सूची मान्य होगी।
- प्रविष्टियों का उदार निर्वचन
- प्रत्येक प्रविष्टि को अधिकतम व्यापक अर्थ दिया जाना चाहिए।
- लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए कि अन्य प्रविष्टि व्यर्थ हो जा
- समन्वयकारी अर्थान्वयन का सिद्धांत
- न्यायालय को दोनों सूचियों की प्रविष्टियों को पढ़ते समय तालमेल और संगति बनाना चाहिए।
- केवल जब समन्वय असंभव हो, तभी संघ की प्रधानता लागू होती है।
- सार और तत्त्व का सिद्धांत (Doctrine of Pith and Substance)
- न्यायालय देखता है कि किसी विधि का वास्तविक उद्देश्य और विषय क्या है।
- यदि विधेयक का सार किसी सूची से मेल खाता है, तो उसे वैध माना जाएगा।
- उदाहरण:
- बंगाल साहूकारी अधिनियम – वचनपत्रों (Union List) पर प्रभाव होने के बावजूद वैध माना गया क्योंकि उसका सार “साहूकारी” था।
- एफ.एस. बलसारा वाद (1951) – मुम्बई मधनिषेध अधिनियम को वैध ठहराया गया क्योंकि उसका वास्तविक उद्देश्य मद्यनिषेध था, न कि आयात।
- आभासी विधायन का सिद्धांत (Doctrine of Colourable Legislation)
- जब कोई विधायिका दिखावे में अपने अधिकार क्षेत्र में कानून बनाती है, पर वास्तव में दूसरे क्षेत्र में अतिक्रमण करती है, तो वह आभासी विधायन कहलाता है।
- सिद्धांत – “जो प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जा सकता, वह परोक्ष रूप से भी नहीं किया जा सकता।”
- बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 को इसी आधार पर शून्य घोषित किया गया।
शक्ति विभाजन का सार (Summary)
- संघ सूची (97 विषय) – रक्षा, विदेश संबंध, संचार, परमाणु ऊर्जा, नागरिकता, युद्ध-शांति, बीमा, रेलवे, डाक-तार, शेयर बाजार, मुद्रा, रिजर्व बैंक, आर्थिक नियोजन, जनगणना, आयकर (कृषि को छोड़कर), संयुक्त राष्ट्र संघ, लॉटरी, निखत निधि, अवशिष्ट विषय
- राज्य सूची (59 विषय) – लोक व्यवस्था, पुलिस, कारागार, भूमि, स्थानीय स्वशासन, लोक स्वास्थ्य, आबकारी, कृषि आय कर, मनोरंजन, सिंचाई, विद्युत, गैस, सिंचाई
- समवर्ती सूची (52 विषय)- शिक्षा, वन, न्याय प्रशासन, वन्य जीव संरक्षण, बाट व माप-तौल, जनसंख्या नियंत्रण व परिवार नियोजन, मजदूर संघ, जन्म-मरण पंजीकरण, विवाह व तलाक, कारख़ाने, स्वच्छता व ओषधालय, उत्तराधिकार, औद्योगिक विवाद, कीमत नियंत्रण, आंतरिक अनुसंधान
प्रशासनिक संबंध
(भाग 11 – अध्याय 1)(अनुच्छेद 256 से 263)
स्रोत व आधार
- संविधान का भाग–11 (अध्याय–2) केन्द्र और राज्यों के प्रशासनिक संबंधों को नियंत्रित करता है।
- इसका आधार भारत शासन अधिनियम, 1935 है।
- अनुच्छेद 73 – केन्द्र की कार्यकारी शक्ति।
- अनुच्छेद 73 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति उन विषयों तक विस्तृत है जिन पर संसद को विधि बनाने का अधिकार है।
- अनुच्छेद 162 – राज्यों की कार्यकारी शक्ति।
- अनुच्छेद 162 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति उन विषयों तक विस्तृत है जिन पर राज्य विधानमंडल को विधि बनाने का अधिकार है।
संघ का राज्यों पर नियंत्रण
अनुच्छेद 256 – संसदीय कानूनों का पालन
- संघीय कार्यपालिका राज्यों को यह निर्देश दे सकती है कि वे संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन करें।
अनुच्छेद 257 – बाधा रहित कार्यपालिका
- राज्य अपनी कार्यपालिका शक्ति इस प्रकार प्रयोग करेगा कि संघीय कार्यपालिका की शक्तियों में बाधा न उत्पन्न हो।
- राज्य निम्नलिखित विषयों पर केंद्र के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं:
- संचार के साधनों का रख-रखाव।
- रेलवे संपत्ति की सुरक्षा।
- भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा।
- अनुसूचित जनजातियों के कल्याण की योजनाओं का क्रियान्वयन।
अनुच्छेद 365 : निर्देश की अवहेलना पर कार्रवाई
- अनुच्छेद 256 व 257 का पालन न होने पर अनुच्छेद 365 के तहत उस राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता घोषित की जा सकती है ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू कर सकता है।
अनुच्छेद 258 – कार्य सौंपना
- राष्ट्रपति, राज्य की सहमति से, किसी राज्य सरकार या उसके अधिकारियों को संघ की कार्यपालिका से संबंधित कार्य सौंप सकता है।
अनुच्छेद 258(A) – राज्यों द्वारा कार्य सौंपना
- राज्यपाल, भारत सरकार की सहमति से, राज्य की कार्यपालिका शक्ति के कुछ कार्य संघ को सौंप सकता है।
- यह प्रावधान सातवाँ संशोधन 1956 द्वारा जोड़ा गया।
अनुच्छेद 259 – निरसित
अनुच्छेद 260 – भारत के बाहर के राज्य क्षेत्रों के संबंध में संघ की अधिकारिता
अनुच्छेद 261 – सरकारी कृत्यों की मान्यता
- केन्द्र व राज्य दोनों सरकारों का कर्तव्य है कि:
- सभी सरकारी कृत्यों का आदर करें।
- देश के न्यायालयों के अंतिम निर्णयों को लागू करें।
जल विवाद समाधान
अनुच्छेद 262 – अंतर्राज्यीय नदियों व नदी – दूनों के जल संबंधी विवादों का न्याय निर्णयन
अनुच्छेद 262(1) – संसद को अधिकार है कि राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे से उत्पन्न विवादों को सुलझाने हेतु कानून बनाए।
अनुच्छेद 262(2) -समाधान के लिए न्यायाधिकरण बना सकती है।
- संसद चाहे तो सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों को ऐसे विवादों में दखल देने से रोक सकती है।
- यानी, जल विवाद न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम होता है। पुनरावलोकन नहीं।
- नदी जल विवाद अधिनियम 1956
- संसद ने अनुच्छेद 262 के तहत पारित किया।
- राज्यों की सहमति पर न्यायाधिकरण गठित होते हैं।
प्रमुख अन्तर्राज्यीय जल विवाद
| नदी/नदियाँ | सम्बंधित राज्य | अधिकरण गठन की तिथि | न्यायनिर्णयन की तिथि |
| कृष्णा-I | महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक | अप्रैल 1969 | (अधिकरण-I)मई 1976 |
| गोदावरी | महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशा | अप्रैल 1969 | जुलाई 1980 |
| नर्मदा | राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र | अक्टूबर 1969 | दिसम्बर 1979 |
| रावी–व्यास | पंजाब, हरियाणा, राजस्थान | अप्रैल 1986 | — |
| कावेरी | केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, पुडुचेरी | जून 1990 | फरवरी 2013 |
| कृष्णा-II | आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र | अप्रैल 2004(अधिकरण-II) | — |
| महादयी | गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र | नवम्बर 2010 | — |
| वंसधरा | आंध्र प्रदेश, ओडिशा | फरवरी 2010 | सितम्बर 2017 |
| महानदी | ओडिशा, छत्तीसगढ़ | मार्च 2018 | — |
- नदी विवादों पर न्यायाधिकरण गठित नहीं हैं –
- मांडवी (गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र)
अनुच्छेद 263 – अंतर्राज्यीय परिषद्
- स्थापना: राष्ट्रपति द्वारा, लोकहित की सिद्धि हेतु।
- राष्ट्रपति ही इसकी संरचना, प्रक्रिया व कर्तव्य परिभाषित करता है।
- स्थायी सचिवालय स्थापित, नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
- संरचना व बैठक
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री।
- अनुपस्थिति में – प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट स्तर का मंत्री।
- बैठक के लिए कम से कम 10 सदस्य अनिवार्य।(अध्यक्ष सहित )
- साल में तीन बार अधिवेशन।
- सदस्य
- प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)।
- 6 नामित कैबिनेट मंत्री (गृहमंत्री सहित)। – प्रधानमंत्री द्वारा नामित
- सभी राज्यों के मुख्यमंत्री।
- संघ शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री (दिल्ली, पुड्डुचेरी) व शेष के प्रशासक।
- प्रकृति व कार्य
- संवैधानिक निकाय, केवल सलाहकारी प्रकृति।
- कार्य:
- संघ व राज्यों तथा राज्यों के बीच विवादों की जांच व समाधान हेतु सलाह।
- सामान्य हितों पर विचार-विमर्श।
- समन्वय हेतु सिफारिशें।
- यह सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism) को बढ़ावा देता है।गठन: सरकारिया आयोग की सिफारिश पर, वी.पी. सिंह सरकार (1990) ने पहली बार किया।
- राष्ट्रपति ने 28 मार्च 1990 को आदेश जारी किया।
अनुच्छेद 311 – अखिल भारतीय सेवाओं का संरक्षण
- अखिल भारतीय सेवाओं (IAS, IPS, IFS) के अधिकारियों को विशेष संरक्षण।
- इनके वेतन-भत्ते व सेवा शर्तें केन्द्र निर्धारित करता है।
- राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त पद पर रहते हैं।
- राज्य सरकार इनके विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर सकती, जबकि राज्यों का प्रशासन इन्हीं अधिकारियों के माध्यम से चलता है।
- नियुक्ति और प्रशिक्षण
- इन सेवाओं की नियुक्ति एवं प्रशिक्षण केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है।
- ये अधिकारी केंद्र और राज्यों दोनों में कार्य करते हैं।
- नियंत्रण व्यवस्था
- पूर्ण नियंत्रण केंद्र सरकार का होता है।
- तात्कालिक नियंत्रण राज्य सरकार द्वारा किया जाता है।
- इतिहास और संवैधानिक मान्यता
- 1947: ICS को बदलकर IAS, और IP को बदलकर IPS बनाया गया।
- 1966: IFS (Indian Forest Service) को तीसरी अखिल भारतीय सेवा घोषित किया गया।
- सेवा की विशेषताएँ
- राज्यों की आवश्यकतानुसार अधिकारियों का राज्य आवंटन किया जाता है।
- वेतन और पद समान होते हैं।
अनुच्छेद 312: संसद को राज्यसभा के प्रस्ताव पर नई अखिल भारतीय सेवा गठित करने का अधिकार देता है।
केंद्र द्वारा राज्यो को निम्न निर्देश भी दिया जा सकता है –
- अनुच्छेद 339 – अनुसूचित जनजातियाँ
- राष्ट्रपति, राज्यों को अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए योजनाएँ बनाने और उन्हें लागू करने के संबंध में निर्देश दे सकता है।
- अनुच्छेद 350A – भाषाई अल्पसंख्यक
- प्रत्येक राज्य का कर्तव्य है कि भाषाई अल्पसंख्यकों के बच्चों को उनकी मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त सुविधाएँ प्रदान करे।
- अनुच्छेद 351 – हिन्दी भाषा
- संघ का कर्तव्य है कि हिन्दी भाषा का विकास इस प्रकार किया जाए कि वह भारत की मिश्रित संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम बने और राष्ट्र की संपर्क भाषा के रूप में कार्य करे।
- अनुच्छेद 353 – आपातकालीन शक्तियाँ
- आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान केंद्र सरकार कार्यपालिका की शक्तियों का विस्तार कर सकती है और राज्य सरकारों की शक्तियों पर भी प्रभाव डाल सकती है।
- अनुच्छेद 355 – केंद्र का कर्तव्य
- केंद्र सरकार का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक राज्य को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से बचाए तथा यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य की सरकार संविधान के अनुसार चलाई जाए।
वित्तीय संबंध (भाग 12) (अनुच्छेद 264 से 293)
- भारतीय संविधान के अनुसार केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों (Part XII, Article 268–293) केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों को स्पष्ट करता है।
अनुच्छेद 265 : कराधान का प्रावधान
- बिना किसी विधि (Law) के कोई कर न तो लगाया जा सकता है और न ही संग्रहित किया जा सकता है।(कर लगाने का प्रतिषेध, शुल्क लगाने का नहीं)
- कर लगाने की शक्ति विधायिका के पास है।
- संघीय कर – संसद द्वारा लगाए जाते हैं।
- मुख्य संघीय कर: आयकर (कृषि आय को छोड़कर), सीमा शुल्क, निर्यात शुल्क, निगम कर।
- राज्य कर – राज्य विधानमण्डल द्वारा लगाए जाते हैं।
- मुख्य राज्य कर: भू-राजस्व (लगान), कृषि आय कर, आबकारी कर, पथ कर (Toll Tax)।
अनुच्छेद 266 : संचित निधि और लोक लेखा
- संचित निधि (Consolidated Fund of India & States) – अनुच्छेद 266(1)
- इसमें भारत सरकार को प्राप्त होने वाला समस्त राजस्व, ऋण और ऋण की अदायगी से प्राप्त राशि जमा की जाती है।
- राज्यों की संचित निधि का भी प्रावधान है।
- संचित निधि से व्यय केवल संसद की अनुमति से ही संभव है।
- इसके लिए विनियोग विधेयक (Appropriation Bill) लाया जाता है।
- खर्च दो प्रकार का होता है:
- साधारण व्यय
- भारित व्यय (Charged Expenditure) → इस पर संसद में चर्चा हो सकती है, पर मतदान नहीं।
- उदाहरण: राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश आदि के वेतन।
- लोक खाता (Public Account) – अनुच्छेद 266(2)
- इसमें वे सभी धनराशियाँ जमा होती हैं जो संचित निधि में नहीं जातीं।
- जैसे: लघु बचत, जमाएँ, भविष्य निधि (PF)।
- इसमें जमा धन सरकार का नहीं होता, सरकार केवल संरक्षक (Custodian) होती है।
- भुगतान करने के लिए संसद/विधानमण्डल की अनुमति आवश्यक नहीं।
- यह कार्यपालिका के अधीन रहता है।
अनुच्छेद 267 : आकस्मिक निधि (Contingency Fund)
- 267(1) में ‘भारत की आकस्मिक निधि’ व 267 (2) में ‘राज्यों की’ आकस्मिक निधि का वर्णन है।
- अग्रदाय प्रकृति (Imprest Nature) की निधि।
- इसका प्रयोग आकस्मिक व अप्रत्याशित (Unforeseen) व्यय की पूर्ति हेतु।
- संसद की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं, पर बाद में अनुमोदन अनिवार्य।
- राष्ट्रपति के अधीन।
अनुच्छेद 268 से 272 : करों का बँटवारा
- अनु. 268 –
- संघ द्वारा लगाए गए कर
- जिन्हें राज्य वसूलते और खर्च करते हैं।
- उदाहरण: स्टाम्प शुल्क, औषधि व सौन्दर्य प्रसाधनों पर कर।
- अनु. 269 –
- संघ कर लगाता व एकत्र करता है
- पर राज्यों को दे देता है।
- उदाहरण: अंतर्राज्ययी व्यापार के दौरान, वस्तुओं के पारसेन पर कर, समाचार पत्रों की बिक्री पर कर, कृषि भूमि को छोड़कर उत्तराधिकार कर।
- अनु. 270 –
- संघ कर लगाता और वसूलता है
- पर उसका बँटवारा संघ और राज्यों में होता है।
- संघीय सूची में वर्णित सभी कर
- वित्त आयोग की सिफारिश पर
- 80वें संविधान संशोधन के बाद सभी संघीय करों का बँटवारा होता है।
- 13वें वित्त आयोग के अनुसार राज्यों को 32% हिस्सा।
- जैसे: कृषि आय के अतिरिक्त आय पर कर, आयकर, निगम कर, सीमा शुल्क, आदि।
- 15 वाँ वित्त आयोग (2020-25)
- राज्यो को 41% देगा (पहले 42% था)
- 1% जम्मू – कश्मीर व लद्दाख की वित्तीय आवश्यकता के लिये
- अनुच्छेद 271:
- अधिभार – केवल केंद्र को प्राप्त होता है, राज्यों को हिस्सा नहीं।
- कुल आय भारत की संचित निधि की भाग
- अनुच्छेद 271: निरसित
राज्यो को संघ से अनुदान (अनु. 273, 275, 282)
- अनु. 273 – संविधान लागू होने के बाद 10 वर्षों तक असम, बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल को जूट उत्पादों पर निर्यात शुल्क के बदले अनुदान।
- संविधान लागू के 10 वर्षों तक
- अनु. 275 (विधिक अनुदान) – संसद वित्त आयोग की सिफारिश पर राज्यों को संचित निधि से अनुदान देती है।
- अनु. 282 (विवेकाधीन अनुदान) – योजनागत लक्ष्यों/सामाजिक कार्यो की प्राप्ति हेतु केन्द्र सरकार राज्यों को अनुदान देती है।
- पहले योजना आयोग की सिफारिश पर, अब नीति आयोग व वित्त मंत्रालय द्वारा।
- विवेकाधीन अनुदान अक्सर विवाद का कारण।
अनु. 274 : कराधान और राष्ट्रपति की सिफारिश
- ऐसा कराधान विधेयक जिससे राज्य के हित प्रभावित होते हैं, वह संसद में केवल राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश पर ही प्रस्तुत हो सकता है।
अनु. 276 : वृत्तियों, व्यापारोंआजीविकाओं और नियोजन पर कर
- राज्य विधानमंडल द्वारा
अनु. 277 : संविधान लागू पूर्व के विधिपूर्वक tax तब तक जब तक संसद कानून नहीं बनती।
अनु. 292-293 : ऋण लेने के प्रावधान
- अनु. 292 – केन्द्र अपनी संचित निधि की साख पर देशवासियों व विदेशी सरकारों से ऋण ले सकता है।
- अनु. 293 – राज्य अपने राज्य क्षेत्र के भीतर ऋण ले सकते हैं।
अनु. 269A : जी.एस.टी. (GST)
- 101वाँ संशोधन (2016) द्वारा जोड़ा गया।
- अंतरराज्यिक व्यापार/वाणिज्य पर GST संघ सरकार वसूलती है और फिर संघ व राज्यों के बीच बाँटा जाता है।
- संसद द्वारा विधि के अनुसार, GST परिषद (GST Council) की सिफारिश पर।
अनु. 279A : जी.एस.टी. परिषद का गठन
- गठन – राष्ट्रपति द्वारा (संविधान संशोधन लागू होने के 60 दिन के भीतर)।
- संरचना:
- अध्यक्ष – संघ का वित्त मंत्री
- प्रथम – अरुण जेटली
- सदस्य- संघ का वित्त राज्य मंत्री
- सदस्य – प्रत्येक राज्य का वित्त/कराधान मंत्री
- स्थाई आमंत्रित सदस्य – केंद्रीय उत्पाद एवम् सीमा शुल्क बोर्ड अध्यक्ष
- अध्यक्ष – संघ का वित्त मंत्री
- सदस्य अपने में से उपाध्यक्ष चुनते हैं।
- बैठकों की गणपूर्ति: कुल सदस्यों का आधा।
- निर्णय – भारित मातो के ¾ बहुमत
- केंद्र के मतो का भार – ⅓
- राज्य के मतो का भार – 2/3
- महत्व: सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम।
अनु. 280 : वित्त आयोग
- संवैधानिक निकाय।
- राष्ट्रपति प्रत्येक 5 वर्ष बाद गठन करता है।
- संरचना: 1 अध्यक्ष + 4 सदस्य।
- 4 सदस्य:
- वित्तीय मामलों का अनुभवी
- विधिक मामलों का अनुभवी
- नागरिक सेवा का अनुभवी
- लेखा सेवा का अनुभवी
- अध्यक्ष – सार्वजनिक कार्यों का अनुभव रखने वाला व्यक्ति।
- वित्त आयोग की सदस्यता हेतु अर्हताओं का निर्धारण संसद द्वारा विधि बनाकर किया जाता।
- पहला वित्त आयोग (1951) – अध्यक्ष के.सी. नियोगी।
- 3rd – ए.के. चंद्रा
- 13 th – डॉ.विजय केलकर
- 14वाँ वित्त आयोग (2015-20) – अध्यक्ष वाई.वी. रेड्डी।
- 15वाँ वित्त आयोग (2020-25) – अध्यक्ष एन.के. सिंह।
- सदस्य –
- अजय नारायण
- प्रो. अनूप सिंह
- अशोक लाहिडी
- रमेश चंद्र
- कार्य
- संघ और राज्यों के मध्य करों का विभाजन।
- अनु. 275 के अंतर्गत राज्यों को अनुदान की सिफारिश।
- 73वें व 74वें संशोधन (1992) के बाद पंचायतों व नगर निकायों को आर्थिक सहायता की सिफारिश।
- देश की वित्तीय स्थिति सुदृढ़ करने हेतु राष्ट्रपति द्वारा दिए गए नये विषयों पर सुझाव।
- आयोग की सिफारिशें केवल परामर्शात्मक (Advisory) होती हैं।
- अनु. 281 – वित्त आयोग की रिपोर्ट राष्ट्रपति संसद में प्रस्तुत कराते हैं।
केंद्र-राज्य संबंधों में प्रवृत्तियां
प्रारम्भिक स्थिति (1950–1967)
- संविधान लागू होने से लेकर चौथे आम चुनाव (1967) तक केन्द्र व राज्यों के संबंध सामान्यतः सहयोगपूर्ण और सौहार्दपूर्ण रहे।
- इसका कारण था कांग्रेस का प्रभुत्व – केन्द्र और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस सरकारें थीं।
- 1950–1967 के बीच जो भी छोटे विवाद हुए, उन्हें आन्तरिक या पारिवारिक झगड़े की तरह निपटा लिया गया।
1967 के बाद की स्थिति
- चौथे आम चुनाव (1967) में कांग्रेस का वर्चस्व कमजोर हो गया और 9 राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बन गईं।
- इसके बाद केन्द्र व राज्यों के बीच टकराव प्रारम्भ हो गया।
- उदाहरण:
- पश्चिम बंगाल की संयुक्त मोर्चा सरकार
- तमिलनाडु में डीएमके सरकार
- पंजाब में अकाली दल की सरकार
- इन सरकारों ने राज्यों को अधिक शक्तियाँ और स्वायत्तता देने की मांग उठाई।
- मुख्य नारे और वक्तव्य:
- 1970 में डीएमके नेता एवं मुख्यमंत्री करूणानिधि का नारा –
- “Self Rule in the States and Composite Rule at the Centre”
- एक और नारा – “भारत भारतवालों के लिए और तमिलनाडु तमिलों के लिए”।
- आंध्रप्रदेश के तेलुगु देशम पार्टी के नेता एन.टी. रामाराव ने कहा – “केन्द्र एक मिथक है।”
- 1970 में डीएमके नेता एवं मुख्यमंत्री करूणानिधि का नारा –
प्रो. इकबाल नारायण के अनुसार विवाद की तीन श्रेणियाँ
- संस्थागत विवाद (Institutional Conflicts)
- राज्यपाल की नियुक्ति या बर्खास्तगी
- अखिल भारतीय सेवाएँ
- कार्यात्मक विवाद (Functional Conflicts)
- केन्द्रीय कानूनों का राज्यों में लागू करना
- राज्यों में केन्द्रीय बलों की नियुक्ति
- राज्य सूची के विषयों पर केन्द्र का हस्तक्षेप
- राष्ट्रपति शासन लागू करना
- राज्यपाल द्वारा विधेयकों को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना
- आर्थिक विवाद (Economic Conflicts)
- 2015 से पहले योजना आयोग की भूमिका
- सहायता अनुदान
- केन्द्र व राज्यों के बीच वित्तीय बंटवारा
प्रमुख विवादित विषय
1. राज्यपाल की नियुक्ति और अनुच्छेद 356
| राज्य | मुख्यमंत्री | राज्यपाल |
| राजस्थान(पहला बड़ा विवाद 1967) | मोहनलाल सुखाड़िया | डॉ. सम्पूर्णानन्द |
| पश्चिम बंगाल | अजय मुखर्जी | धर्मवीर |
| आंध्रप्रदेश | न.टी. रामाराव | रामलाल |
| तमिलनाडु | जयललिता | चन्ना रेड्डी |
| हरियाणा | चौ. देवीलाल | जी.डी. तपासे |
| उत्तर प्रदेश | कल्याण सिंह | रोमेश भण्डारी |
| पश्चिम बंगाल | ममता बनर्जी | जगदीप धनखड़ |
- अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) – डॉ. अंबेडकर ने इसे “सेफ्टी वाल्व” और “मृतप्रायः अनुच्छेद” कहा था। इस अनुच्छेद का दुरुपयोग केन्द्र-राज्य संबंधों को सबसे अधिक तनावपूर्ण बनाने में हुआ।
2. राज्यों में केन्द्रीय बलों की नियुक्ति
- कानून-व्यवस्था राज्य सूची का विषय है।
- परन्तु केन्द्र अक्सर अव्यवस्था के कारण राज्यों में केन्द्रीय बलों की नियुक्ति करता है।
- राज्य इसे स्वायत्तता में हस्तक्षेप मानकर विरोध करते हैं।
- अनुच्छेद 355 के अनुसार बाहरी आक्रमणों व आन्तरिक अव्यवस्था से राज्यों की रक्षा करना केन्द्र की जिम्मेदारी है।
3. योजना आयोग की भूमिका और अनुदान
- 15 मार्च 1950 को के.सी. नियोगी समिति की सिफारिश पर योजना आयोग बना।
- यह गैर-सांवैधानिक व परामर्शदात्री निकाय था, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते थे।
- मुख्य कार्य: पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण।
- 1952 में राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) बनी – यह भी गैर-सांवैधानिक निकाय थी।
- धीरे-धीरे योजना आयोग “सुपर केबिनेट” की तरह व्यवहार करने लगा।
- राज्यों को योजनागत व्यय और अनुदान में भेदभाव का सामना करना पड़ा।
- विरोधी दलों की सरकार वाले राज्यों ने भेदभाव के आरोप लगाए।
- अब योजना आयोग समाप्त होकर 1 जनवरी 2015 से नीति आयोग बना।
राज्यों के बीच आपसी विवाद
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बेलगांव विवाद 156511_7dbcdf-fe> |
महाराष्ट्र +कर्नाटक 156511_42b67e-4c> |
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कासरगोड़ विवाद 156511_277f96-9b> |
केरल +कर्नाटक 156511_3139d2-8e> |
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चंडीगढ़ विवाद 156511_fb900b-3d> |
पंजाब + हरियाणा 156511_b7791d-18> |
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रंगापानी क्षेत्र विवाद 156511_52c131-1d> |
असम + नागालैंड 156511_efecda-1a> |
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जम्मू-कश्मीर के लिए समितियाँ 156511_d7d2a8-93> |
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केन्द्र-राज्य संबंधों पर गठित आयोग एवं प्रस्ताव
1. प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (First Administrative Reforms Commission – I ARC), 1966
- गठन: 5 जनवरी, 1966 को मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में।
- मोरारजी देसाई उप-प्रधानमंत्री बने तो अध्यक्ष पद के. हनुमंतैया को सौंपा गया।
- आयोग ने कुल 13 रिपोर्टें प्रस्तुत कीं, जिनमें से 9वीं रिपोर्ट केन्द्र-राज्य संबंधों पर थी। (22 सिफारिशें)
- इस आयोग की रिपोर्ट के अध्ययन के लिए एम.सी शीतलवाड़ के अधीन एक दल का गठन किया
- आयोग की प्रमुख अनुशंसाएँ
- राज्यपाल संबंधी सिफारिशें
- राज्यपाल ऐसा व्यक्ति होना चाहिए, जिसे सार्वजनिक जीवन एवं प्रशासन का लम्बा अनुभव हो तथा जो दलीय पूर्वाग्रहों से मुक्त हो।
- राज्यपाल की नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री से परामर्श करना एक स्वस्थ परम्परा है और इसे जारी रहना चाहिए।
- राज्यपाल द्वारा विवेकाधीन शक्तियों के प्रयोग हेतु दिशा-निर्देश अन्तर-राज्य परिषद् द्वारा तय किए जाने चाहिए।
- यदि राज्यपाल को विश्वास हो जाए कि मंत्रिपरिषद् का विधानसभा में बहुमत नहीं है, तो वह विधानसभा का सत्र बुला सकता है।
- यदि मुख्यमंत्री सत्र बुलाने की सलाह न दे तो राज्यपाल स्वयं (Suo Motu) सत्र आहूत कर सकता है।
- यदि मंत्रिपरिषद् किसी महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दे पर पराजित हो और मुख्यमंत्री विधानसभा भंग करने की सलाह दे, तो राज्यपाल को यह सलाह स्वीकार करनी चाहिए।
- कार्यकाल पूरा होने पर राज्यपाल को आगे पुनः नियुक्ति योग्य नहीं माना जाना चाहिए।
- सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को राज्यपाल के रूप में नियुक्त न किया जाए।
- परन्तु यदि कोई न्यायाधीश राजनीति में प्रवेश करके विधायक/जन-प्रतिनिधि बनता है, तो उसे राज्यपाल पद के लिए अयोग्य न माना जाए।
- अन्तर-राज्य परिषद् संबंधी सिफारिशें
- अनुच्छेद 263 के अंतर्गत अन्तर-राज्य परिषद् की स्थापना की जानी चाहिए।
- राज्यपाल संबंधी सिफारिशें
- एम.सी. सीतलवाड़ समिति – 1966
- I ARC की अनुशंसा पर गठित।
- उद्देश्य: केन्द्र-राज्य संबंधों पर रिपोर्ट पर विचार।
- अध्यक्ष: एन.सी. सीतलवाड़।
2. राजमन्नार आयोग, 1969
- गठन: 1969 में तमिलनाडु की डी.एम.के. सरकार (मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि) द्वारा।
- केन्द्र-राज्य संबंधों की समीक्षा करने एवं राज्यों को स्वायत्तता दिलाने के लिये संविधान में संशोधन के सुझाव देने हेतु तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया।
- अध्यक्ष: डॉ. पी.वी. राजमन्नार।
- अन्य सदस्य: ए.एल. मुदालियर व चन्ना रेड्डी।
- रिपोर्ट: 1971 में प्रस्तुत।
- केन्द्र सरकार ने इस समिति की सिफारिशें खारिज कर दीं।
- प्रमुख अनुशंसाएँ
- अन्तर-राज्य परिषद् एवं केन्द्र-राज्य सहयोग
- अनुच्छेद 263 के अंतर्गत अन्तर-राज्य परिषद् की तत्काल स्थापना हो।
- सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व मिले; सभी मुख्यमंत्री/प्रतिनिधि सदस्य हों और प्रधानमंत्री अध्यक्ष हों।
- इसमें कोई केन्द्रीय मंत्री न हो।
- राष्ट्रीय महत्त्व के विधेयक संसद में रखने से पूर्व परिषद् में चर्चा हेतु प्रस्तुत हों।
- परिषद् की सिफारिशें केन्द्र व राज्यों के लिए बाध्यकारी हों।
- राज्यपाल से संबंधित सुधार
- राज्यपाल की नियुक्ति राज्य कैबिनेट की सलाह से हो।
- राज्यपाल को दूसरा कार्यकाल न मिले।
- राज्यपाल केवल उच्चतम न्यायालय की जाँच के बाद ही हटाए जा सकें।
- राज्यपाल की शक्तियाँ सीमित की जाएँ।
- मंत्रिपरिषद् का राज्यपाल के प्रसादपर्यंत रहने का प्रावधान समाप्त हो।
- विधायी शक्तियाँ एवं संसद–राज्य संबंध
- अपशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) राज्यों को दी जाएँ।
- विधान परिषद् का गठन/विलोपन का अधिकार केवल राज्य विधानसभा को मिले।
- अनुच्छेद 356, 357, 365 समाप्त किए जाएँ।
- राज्य की सीमाओं का परिवर्तन बिना राज्य की सहमति न हो।
- वित्त एवं योजना से जुड़ी सिफारिशें
- वित्त आयोग को स्थायी निकाय बनाया जाए और उसकी सिफारिशें बाध्यकारी हों।
- योजना आयोग समाप्त किया जाए।
- न्यायपालिका से संबंधित सुधार
- उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की पदच्युति का अधिकार राज्य विधानमंडल को मिले।
- अन्तर-राज्य नदी जल विवादों का निर्णय केवल सुप्रीम कोर्ट द्वारा हो।
- राज्यसभा सुधार
- राज्यसभा में जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व न हो; सभी राज्यों का समान प्रतिनिधित्व हो।
- राज्यसभा में नामित सदस्यों की व्यवस्था समाप्त की जाए।
- सुरक्षा एवं अखिल भारतीय सेवाएँ
- CRPF जैसी सेनाएँ राज्यों में तभी तैनात हों जब राज्य स्वयं अनुरोध करें (अनुच्छेद 355 में संशोधन)।
- अखिल भारतीय सेवाएँ समाप्त करने हेतु अनुच्छेद 312 हटाया जाए।
- केन्द्रीय मंत्रिपरिषद सुधार
- केन्द्रीय कैबिनेट में क्षेत्रीय संतुलन हो।
- किसी एक राज्य से मंत्रियों की संख्या कुल मंत्रियों की संख्या का 1/5 से अधिक न हो।
- अन्तर-राज्य परिषद् एवं केन्द्र-राज्य सहयोग
3. आनन्दपुर साहिब प्रस्ताव, 1973
- 1973 में, अकाली दल ने पंजाब के आनंदपुर साहिब में हुयी एक बैठक में राज्यों की धार्मिक एवं राजनैतिक मांगों के संबंध में एक प्रस्ताव को स्वीकृति दी।
- सिफारिश: रक्षा, संचार, विदेश, रेलवे और मुद्रा को छोड़कर सभी विषय राज्यों को सौंपे जाएँ।
- संविधान को वास्तविक संघीय रूप दिया जाए।
- केंद्र में राज्यों को समान प्रतिनिधित्व और अधिकार मिलें।
4. पश्चिम बंगाल सरकार का मेमोरेण्डम (1977)
- 1977 में, पश्चिम बंगाल सरकार (जिसका नेतृत्व साम्यवादियों के हाथों में था) ने केंद्र-राज्य संबंधों पर एक स्मरण पत्र या मेमोरंडम प्रकाशित किया तथा उसे केंद्र सरकार को प्रेषित किया।
- केंद्र सरकार ने इस ज्ञापन को अस्वीकार किया।
- प्रमुख बिंदु
- संविधान में ‘Union’ शब्द की जगह ‘Federation’ शब्द प्रयुक्त हो।
- संघ सरकार की शक्तियाँ केवल रक्षा, विदेश, मुद्रा, संचार और आर्थिक समन्वय तक सीमित हों।
- शेष विषय राज्य सूची में हस्तांतरित हों।
- अवशिष्ट शक्तियाँ राज्य सूची में जाएँ।
- अनुच्छेद 356, 357 और 360 समाप्त हों।
- केंद्रीय राजस्व का 75% हिस्सा राज्यों को मिले।
- राज्यसभा को लोकसभा के समान अधिकार दिए जाएं।
- अखिल भारतीय सेवाएँ समाप्त हों; केवल केन्द्रीय और राज्य सेवाएँ रहें।
- नए राज्यों का निर्माण या पुनर्गठन केवल सम्बंधित राज्यों की सहमति से हो।
5. सरकारिया आयोग, 1983
- गठन: जून 1983, प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी द्वारा।
- अध्यक्ष: न्यायमूर्ति रणजीत सिंह सरकारिया (सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश)।
- अन्य सदस्य: बी. शिवरामण व डॉ. एस.आर. सेन।
- आयोग का कार्यकाल चार बार बढ़ाया गया।
- अंतिम रिपोर्ट: अक्टूबर 1987
- सरकारी प्रकाशन: जनवरी 1988
- प्रमुख दृष्टिकोण
- केन्द्र सरकार की शक्तियों में कटौती की मांग अस्वीकार की।
- राष्ट्र की एकता और अखण्डता हेतु केन्द्र की मजबूत भूमिका आवश्यक बताई।
- सरकारिया आयोग की मुख्य सिफारिशें
- अन्तर्राज्यीय परिषद् (अनुच्छेद 263)
- अनुच्छेद 263 के तहत अन्तर्राज्यीय परिषद् की स्थापना की जाए।
- इस सिफारिश के आधार पर 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने अन्तर्राज्यीय परिषद् का गठन किया।
- राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356)
- अनुच्छेद 356 का प्रयोग केवल अन्तिम विकल्प के रूप में हो।
- राज्य की विधानसभा को केवल संसद की स्वीकृति मिलने के बाद ही भंग किया जाए।
- अनुच्छेद 200, 356, 357, 365 को हटाने की आवश्यकता नहीं है।
- समवर्ती सूची एवं विधि निर्माण
- समवर्ती सूची पर कानून बनाने से पूर्व केन्द्र सरकार को राज्यों से परामर्श करना चाहिए।
- राष्ट्रीय विकास परिषद्
- राष्ट्रीय विकास परिषद् का पुनर्गठन कर इसे राष्ट्रीय आर्थिक एवं विकास परिषद् बनाया जाए।
- क्षेत्रीय परिषदें
- क्षेत्रीय परिषदों का गठन किया जाना चाहिए।
- अखिल भारतीय सेवाएँ
- अखिल भारतीय सेवाओं को आवश्यक माना।
- कुछ नई अखिल भारतीय सेवाओं के निर्माण की सिफारिश की, जैसे –
- इंजीनियरिंग
- चिकित्सा
- शिक्षा
- कृषि
- सहकारिता
- उद्योग
- अनुच्छेद 200 संबंधी
- यदि राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति की राय के लिए सुरक्षित रखते हैं, तो राष्ट्रपति को चार माह के भीतर निर्णय लेना चाहिए।
- भाषा संबंधी
- भारत में त्रिभाषा फार्मूला लागू किया जाए।
- केन्द्रीय बलों की तैनाती
- राज्य में केन्द्रीय सशस्त्र बलों को तैनात करने से पहले यथासम्भव राज्य से परामर्श कर लिया जाए।
- परन्तु यह परामर्श केन्द्र के लिए बाध्यकारी न हो।
- राज्यपाल संबंधी सिफारिशें
- राज्यपाल ऐसा व्यक्ति हो, जो स्थानीय दलीय राजनीति से अलग और निष्पक्ष हो।
- राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष निश्चित हो, और उसे 5 वर्ष से पहले न हटाया जाए।
- राज्यपाल राज्य के बाहर का व्यक्ति होना चाहिए।
- राज्यपाल की नियुक्ति से पूर्व मुख्यमंत्री से परामर्श किया जाए।
- अन्तर्राज्यीय परिषद् (अनुच्छेद 263)
- अमल की स्थिति
- केंद्र सरकार ने 247 में से 180 सिफारिशों को लागू कर दिया है।
- 1990 में अंतर-राज्यीय परिषद की स्थापना, सबसे महत्वपूर्ण सिफारिशों में से एक है।
6. पूंछी आयोग (2007 – रिपोर्ट 2010)
- गठन: 2007, मनमोहन सिंह सरकार द्वारा।
- अध्यक्ष: मदन मोहन पूंछी (पूर्व मुख्य न्यायाधीश, भारत)।
- सदस्य: धीरेन्द्र सिंह, विनोद कुमार दुग्गल, माधव मोहन, अमरेश बागची।
- रिपोर्ट सौंपी: अप्रैल 2010
- कुल पृष्ठ: 1456
- खंड: 7 खंडों में विभाजित
- आधार सामग्री:
- सरकारिया आयोग की रिपोर्ट
- संविधान समीक्षा आयोग (NCRWC) की रिपोर्ट
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट
- आयोग का उद्देश्य व कार्यक्षेत्र
- संविधान के अनुरूप केंद्र-राज्य संबंधों की समग्र समीक्षा।
- निम्नलिखित क्षेत्रों में सिफारिशें देना:
- विधायी और प्रशासनिक संबंध
- राज्यपाल की भूमिका
- आपातकालीन प्रावधान
- वित्तीय संबंध
- पंचायती राज संस्थाएँ
- संसाधनों का बंटवारा (जैसे अंतर-राज्य नदी जल)
- सामाजिक एवं आर्थिक योजना निर्माण
- संविधान की भावना के अनुसार सामाजिक-आर्थिक विकास को तेज करने की सिफारिशें देना।
- राष्ट्रीय एकता व अखंडता बनाए रखते हुए सुशासन (Good Governance) को सुनिश्चित करने की रणनीति प्रस्तुत करना।
- प्रमुख सिफारिशें
- आयोग ने 310 अनुशंसाएँ कीं जिनमें से कुछ केन्द्र-राज्य संबंधों का भी स्पर्श करती हैं। कुछ प्रमुख अनुशंसाएँ निम्नलिखित हैं:
- राज्यपाल संबंधी सिफारिशें
- राज्यपाल पर सरकारिया आयोग जैसी ही सिफारिशें दोहराईं।
- चुनाव–पश्चात गठबंधन को एक दल माना जाए ताकि मुख्यमंत्री नियुक्ति में विवाद न हो।
- राज्यपाल को हटाने हेतु विधानसभा में महाभियोग की प्रक्रिया हो।
- राज्यपाल की नियुक्ति एक समिति की सिफारिश पर हो, जिसमें प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री शामिल हों। (संविधान समीक्षा आयोग / वेंकटचलैया आयोग की सिफारिश का समर्थन)
- राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष निश्चित हो।
- राज्यपालों की मनमानी बर्खास्तगी की आलोचना की गई।
- अनुच्छेद 200 संबंधी
- अनुच्छेद 200 के तहत राष्ट्रपति के पास आरक्षित विधेयक 4 माह से अधिक लंबित न रखा जाए।
- वित्तीय एवं प्रशासनिक सुधार
- राज्यों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता दी जाए।
- पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत किया जाए।
- GST (माल एवं सेवा कर) अपनाने की सिफारिश।
- आपातकालीन प्रावधान
- अनुच्छेद 355 और 356 में संशोधन किया जाए।
- आपातकाल का प्रयोग स्थानीय स्तर (जिले या क्षेत्र विशेष) पर भी किया जा सके।
- आपातकाल की अवधि 3 महीने से अधिक न हो।
- स्थायी आपातकाल की अवधारणा :
- राज्य सरकार काम करती रहेगी।
- विधानसभा भंग नहीं होगी।
- केवल केन्द्र विशिष्ट मुद्दों पर कार्यवाही करेगा।
- आन्तरिक सुरक्षा व परिषदें
- आन्तरिक सुरक्षा हेतु अमेरिका की तरह राष्ट्रीय एकता परिषद् को अधिक शक्तिशाली बनाया जाए।
- इसकी बैठक वर्ष में कम से कम एक बार अनिवार्य हो।
- अन्तर्राज्यीय परिषद् को समवर्ती सूची पर बने कानूनों की समीक्षा / अंकेक्षण का अधिकार हो।
- संघ-राज्य विधायी संबंध
- केवल संसदीय सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए संघ को समवर्ती सूची पर कानून बनाने का अधिकार न हो।
- समवर्ती सूची पर कानून बनाते समय राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित हो।
- न्यायिक सिफारिशें
- एस.आर. बोम्मई वाद (1994) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णयों को संविधान में शामिल किया जाए।
- राज्यसभा संबंधी
- राज्यसभा की शक्तियाँ बढ़ाई जाएँ ताकि संघीय ढाँचा मजबूत हो।
- राज्यों को समान प्रतिनिधित्व दिया जाए।
- राज्यसभा की भूमिका अधिक प्रभावी बनाई जाए।
7. भगवान सहाय समिति (1971)
- सिर्फ़ मुख्यमंत्री व राज्यपालों के संबंध में रिपोर्ट दी ।
केन्द्र-राज्य संबंधों को प्रभावित करने वाले वर्तमान मुद्दे
(A) वस्तु एवं सेवा कर (GST – Goods and Services Tax)
- जीएसटी एक अप्रत्यक्ष कर है, जो “एक देश, एक कर” की अवधारणा पर आधारित है।
- इसमें केन्द्र व राज्य के विभिन्न करों को सम्मिलित किया गया है:
- केंद्रीय कर – सेवा कर, केंद्रीय उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क आदि।
- राज्य कर – बिक्री कर (Sales Tax), वैट, मनोरंजन कर, विलासिता कर आदि।
- कैलकर समिति (2003) ने पहली बार जीएसटी की सिफारिश की थी।
- 101वां संविधान संशोधन (2016) द्वारा जीएसटी लागू करने का प्रावधान हुआ और 1 जुलाई 2017 से इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया।
- 101वें संशोधन से जुड़े अनुच्छेद और प्रावधान
- अनुच्छेद 246(A)(1): संसद व राज्य विधानमंडल दोनों जीएसटी से संबंधित कानून बना सकते हैं।
- अनुच्छेद 246(A)(2): संसद को अंतर्राज्यीय व्यापार और वाणिज्य के लिए जीएसटी कानून बनाने की विशेष शक्ति।
- अनुच्छेद 269(A): अंतर्राज्यीय व्यापार/वाणिज्य के दौरान जीएसटी का संग्रह केंद्र करेगा और जीएसटी परिषद की सिफारिश पर राज्यों व केंद्र के बीच बांटा जाएगा।
- अनुच्छेद 279(A): जीएसटी परिषद का गठन –
- अध्यक्ष: केंद्रीय वित्त मंत्री
- सदस्य: राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के वित्त/राजस्व मंत्री।
- कार्य: कर दरों का निर्धारण व वितरण।
(B) नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), 2019
- नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन।
- प्रमुख प्रावधान:
- अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शरणार्थियों (31 दिसम्बर 2014 तक) को अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा।
- मुसलमानों को इसमें शामिल नहीं किया गया।
- आलोचना:
- भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन।
- केरल, पंजाब, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों ने इसे लागू करने से मना किया।
- आरोप: केंद्र सरकार ने धार्मिक आधार पर कानून बनाया।
(C) किसान आंदोलन (2020-21)
- केंद्र सरकार द्वारा संसद में पारित तीन कृषि कानून:
- कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम, 2020
- कृषि (किसान समझौता और मूल्य आश्वासन) अधिनियम, 2020
- आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020
- विवाद:
- किसानों ने इन्हें “काले कानून” और शोषणकारी बताया।
- पंजाब व अन्य विपक्षी राज्यों ने कहा – “कृषि राज्य सूची (Entry-14) का विषय है, इस पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों का है, न कि संसद का।”
- विरोध के चलते अंततः केंद्र सरकार ने कानून वापस ले लिए।
(D) कोविड-19 महामारी
- महामारी ने भारतीय संघवाद और सहकारी संघवाद को कमजोर किया।
- केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को “तदर्थ बाध्यकारी निर्देश” (Adhoc Binding Guidelines) दिए गए – राज्यों ने इनका विरोध किया।
- पहली लहर (मार्च-जुलाई 2020): राज्यों की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई, केंद्र पर निर्भरता बढ़ी।
- दूसरी लहर (अप्रैल-मई 2021):
- वैक्सीन वितरण, ऑक्सीजन आपूर्ति और जीवन रक्षक दवाओं को लेकर केंद्र-राज्य संघर्ष।
- राज्यों का आरोप: केंद्र ने भेदभावपूर्ण और सौतेला व्यवहार किया।
(E) सीबीआई (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED)
- राज्यों के नेताओं का आरोप:
- केंद्र सरकार विपक्षी दलों को दबाने और डराने के लिए इन केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करती है।
- इससे राजनीतिक संघवाद में टकराव बढ़ा।
(F) 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 (महिला आरक्षण अधिनियम, 2023)
- लोकसभा से पारित – 20 सितंबर 2023
- राज्यसभा से पारित – 21 सितम्बर 2023
- राष्ट्रपति की मंज़ूरी – 28 सितंबर 2023
- लागू होने की तिथि – आगामी जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होगा
- उद्देश्य: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये एक-तिहाई (33%) सीटों का आरक्षण।
- पृष्ठभूमि:
- यह विधेयक पहले भी कई बार संसद में लाया जा चुका है:
- 1996: पहली बार पेश (गीता मुखर्जी समिति)
- फिर क्रमशः 1998, 2009, 2010, 2014 में
- यह विधेयक पहले भी कई बार संसद में लाया जा चुका है:
- संबंधित समितियाँ:
- भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति (1971)
- मार्गरेट अल्वा समिति (1987)
- गीता मुखर्जी समिति (1996)
- दूसरी महिलाओं की स्थिति पर समिति (2013)
- जोड़े गए अनुच्छेद:
- अनुच्छेद 330A – लोकसभा में महिलाओं को 1/3 आरक्षण।
- अनुच्छेद 332A – प्रत्येक राज्य विधानसभा में महिलाओं को 1/3 आरक्षण।
- अनुच्छेद 239AA (संशोधित) – दिल्ली विधानसभा में महिलाओं को 1/3 आरक्षण।
- अनुच्छेद 334A (नया) – यह आरक्षण अगली जनगणना और परिसीमन के बाद प्रभावी होगा।
- समयावधि: आरक्षण 15 वर्षों के लिए होगा (आवश्यकता अनुसार बढ़ाया जा सकता है)।
- रोटेशन प्रणाली:
- प्रत्येक परिसीमन के बाद आरक्षित सीटों का पुनः निर्धारण।
महिला आरक्षण का इतिहास
- 1996 – एच.डी. देवगौड़ा सरकार ने 81वां संशोधन प्रस्तुत किया, पर पारित नहीं हुआ।
- अटल बिहारी वाजपेयी सरकार – 1998, 1999, 2002, 2004 में प्रयास किया, सफल नहीं हुए।
- 2008 – मनमोहन सिंह सरकार ने विधेयक पेश किया।
- 2010 – राज्यसभा ने इसे पारित किया पर लोकसभा में प्रस्तुत नहीं किया गया।
- 2023 – नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा 106वां संशोधन पारित करवाया गया।
- तर्क:
- पक्ष में:
- यह संशोधन महिलाओं को राजनीतिक अधिकारों में भागीदारी सुनिश्चित करता है।
- यह समानता, लैंगिक न्याय और समावेशी लोकतंत्र की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
- निर्णय प्रक्रिया में विविधता और संतुलन
- सार्वजनिक जीवन में भेदभाव समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम
- विरुद्ध में:
- जनगणना 2021 अभी तक पूरी नहीं हुई
- राज्यसभा और विधान परिषद में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं
- राजनीतिक रूप से महिलाओं की स्वतंत्रता पर सवाल (सरपंच-पतिवाद जैसी समस्या)
- पक्ष में:
अन्य महत्वपूर्ण
- भारत में पश्चिम बंगाल के अलावा समस्त राज्य सरकारों ने कृषि भूमि पर संपदा शुल्क वसूल करने का अधिकार केंद्र को दे रखा है।
- करो के संबंध में कोई समवर्ती विषय नहीं है।
- अवशिष्ट विषयों पर कर – केंद्र यथा उपहार कर तथा व्यय कर
- भारत में नियोजन द्वारा “आर्थिक विकास का सिद्धांत” – एम विश्वेश्वरैया
- राज्यो की करारोपण शक्ति – 250 रुपये से अधिक नहीं होंगी ।
- 60 वें संशोधन 1988 द्वारा – 2500 से अधिक नहीं।
- अनुच्छेद 279
- शुद्ध आगम – गणना (AG द्वारा अंतिम)
- अनुच्छेद 285(1)
- संघ की संपत्ति पर राज्यो को कर लगाने का अधिकार नहीं
- अनुच्छेद 285(2)
- उन संपत्ति पर कर लगा सकती है जिस पर संविधान लागू से पूर्व अधिकार था।
- अनुच्छेद 286
- माक के क्रय या विक्रय पर राज्यो द्वारा कुछ दशाओ में कर लगाने पर निर्बन्धन के बारे में ।
- अनुच्छेद 287
- राज्य सरकार को भारत सरकार की रेलो में काम आने वाली बिजली पर कर लगाने का निषेध करता है ।
- अनुच्छेद 289
- राज्यो की सम्पति और आय को संघ के करो से विमुक्ति प्रदान करता है।
- किंतु संसद चाहे तो लगा सकती है।
- संघ व राज्य के बीच करो के विभाजन संबंधी प्रावधान – राष्ट्रीय आपातकाल के समय निलंबित किया जा सकता है ।
- भारतीय प्रेस काउंसिल – अर्द्ध न्यायिक वैधानिक संस्था है।
- वित्त आयोग + योजना आयोग के परस्पर विलय का प्रस्ताव – M. वी. माथुर
संपत्ति, संविदाये, अधिकार, दायीत्व, बाध्यताये और वाद (भाग -12) अध्याय – 3 अनुच्छेद 294 – 300 तक
- अनुच्छेद 294 –
- संपत्ति आस्तियों आदि का उत्तराधिकार
- देशी राज्य की + भारत डोमिनियन सरकार की – संघ सरकार में
- प्रांतीय सरकार की – राज्य सरकार की
- संपत्ति आस्तियों आदि का उत्तराधिकार
- अनुच्छेद 296 –
- राजगामी (राज्य में) या व्यपगत, संपत्ति का उत्तराधिकार
- अनुच्छेद 297 –
- राज्य क्षेत्रिये सागर खंड (संघ की) आदि की मूल्यवान चीजे
- अनुच्छेद 298 –
- संघ तथा राज्यो को व्यापार करने की शक्ति
- अनुच्छेद 299 –
- संघ तथा राज्य सरकारे सभी संविदाये राष्ट्रपति या राज्यपाल के नाम से
- अनुच्छेद 300 z-
- भारत संघ तथा राज्यो को विधिक व्यक्तित्व प्रदान करती है।
- अनुच्छेद 300(क) –
- कोई भी व्यक्ति विधि के प्राधिकार से ही संपत्ति से वंचित होगा।
