संविधान निर्माण की पृष्ठभूमि : 1942–1947 भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का वह निर्णायक चरण है, जिसमें औपनिवेशिक शासन के अंत के साथ एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए संवैधानिक आधार तैयार किया गया। इस कालखंड में विभिन्न राजनीतिक प्रस्तावों, आंदोलनों और वार्ताओं ने स्वतंत्र भारत की शासन व्यवस्था को दिशा दी, जिसे राजनीतिक व्यवस्था और शासन के अंतर्गत समझना अत्यंत आवश्यक है।
संविधान निर्माण की पृष्ठभूमि : 1942–1947
- जन-निर्वाचित मंत्रिमडल केवल दो वर्ष के लिए अस्तित्व में रहे। भारतीय विधानमंडलों से परामर्श किए बिना ही भारत को द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल कर दिया गया। इसके विरोध में सभी काग्रेस मंत्रिमंडलों ने 1939 में इस्तीफे दे दिए।
- पाकिस्तान प्रस्ताव:1940 में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान का प्रस्ताव पारित किया।
ब्रिटिश प्रस्ताव एवं राष्ट्रीय आंदोलन
क्रिप्स मिशन (1942 ई.)
- 1942 ई. के क्रिप्स मिशन में भारतीय संविधान बनाने के लिए संविधान सभा के गठन के प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लिया गया कि युद्ध के ठीक बाद भारत में एक संविधान सभा का गठन किया जाएगा जो भारत के लिए संविधान का निर्माण करेगी।
- चर्चिल ने 23 मार्च 1942 को स्टैनफोर्ड क्रिप्स को वार्ता हेतु भारत भेजा।
- आधिकारिक वार्ता में शामिल :-
- पंडित नेहरू
- मौलाना आज़ाद
- प्रस्ताव में –
- युद्धोपरांत निर्वाचित संविधान सभा का गठन होगा
- प्रांतों का संविधान स्वीकार करने या अलग बनाने की स्वतंत्रता
- भारत संघ स्थापित होगा और पूर्ण उपनिवेश का दर्जा
- मुस्लिम लीग को भारतीय संघ स्वीकार करने या ना करने की स्वतंत्रता
- संविधान निर्माण तक भारत की रक्षा का दायित्व ब्रिटिश सरकार पर
- लेकिन भारत के राजनीतिक दलों कांग्रेस व मुस्लिम लीग ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया।
- महात्मा गांधी ने इसे Post dated cheque कहा तथा नेहरू ने इसे ‘शैतान के वकील’ की संज्ञा दी।
- पट्टाभि सीतारमैया → अगस्त प्रस्ताव का परिवर्तित संस्करण मात्र
भारत छोड़ो आंदोलन (8 अगस्त, 1942):
- 14 जुलाई 1942 – वर्धा में, कांग्रेस कार्य समिति की बैठक के पश्चात् भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित।
- 8 अगस्त 1942 – अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बंबई अधिवेशन में आंदोलन का अनुमोदान किया (अध्यक्ष – मौलाना आजाद)
- प्रस्ताव – पं. नेहरू
- समर्थन – सरदार पटेल
- गांधी जी ने घोषणा की कि यह “करो या मरो” का निर्णय है।
- 9 अगस्त 1942 को आंदोलन शुरुवात / अगस्त क्रांति
वेवल योजना (14 जून 1945):
- लार्ड लिनलिथगो के स्थान पर लार्ड वेवल भारत के वायसराय नियुक्त हुए।
- इस योजना के तहत अंतरिम सरकार में भारतीयकरण का प्रस्ताव रखा गया।
- वायसराय और सैन्य कमांडर को छोड़कर कार्यकारी परिषद के सभी सदस्य भारतीय होंगे।
- प्रतिरक्षा विभाग वायसराय के नियंत्रण में रहेगा।
- कार्यकारी परिषद में हिंदू और मुस्लिम सदस्यों की संख्या बराबर रखी जाएगी।
- गवर्नर जनरल बिना उचित कारण के अपनी वीटो पॉवर का उपयोग नहीं करेगा।
- भारतीयों को अपने संविधान निर्माण का अधिकार दिया जाएगा।
शिमला सम्मेलन (1945):
- वायसराय लॉर्ड वेवल ने 25 जून से 14 जुलाई 1945 तक भारतीय नेताओं का सम्मेलन शिमला में आयोजित किया।
- यह सम्मेलन वेवल योजना के क्रियान्वयन हेतु भारतीय नेताओं के बीच सहमति बनाने के उद्देश्य से बुलाया गया था।
- सम्मेलन विफल रहा क्योंकि:
- कांग्रेस अखंड भारत की मांग पर अड़ी रही।
- मुस्लिम लीग अलग पाकिस्तान की मांग पर अडिग रही।
- कांग्रेस प्रतिनिधि: मौलाना अबुल कलाम आजाद
- महात्मा गांधी ने सम्मेलन में भाग नहीं लिया।
नोट :- 1945 में सप्रू समिति ने अपनी रिपोर्ट में संविधान निर्माण की योजना बनाई ।
कैबिनेट मिशन और संविधान सभा
केबिनेट मिशन
- 1945 ई. में ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन बाद क्लीमेण्ट एटली सरकार ने जनवरी, 1946 में लंदन से एक शिष्टमण्डल भारत भेजा जिसे ‘केबिनेट मिशन’ कहा जाता है।
- 14 मार्च 1946 को एटली की घोषणा – भारतीयों को स्वतंत्र होने का अधिकार है ।
- केबिनेट मिशन (मंत्रिमण्डलीय योजना) 24 मार्च, 1946 को भारत आया।
- इस मिशन में तीन सदस्य थे –
- पैथिक लॉरेन्स (अध्यक्ष) – भारत सचिव
- स्टैफर्ड क्रिप्स – व्यापार बोर्ड के अध्यक्ष
- ए. वी. एलेक्जेण्डर – फर्स्ट लार्ड ऑफ एडमिरैलिटी
- केंद्रीय विधान सभा के चुनाव 1945 की अंतिम तिमाही में हुए। प्रांतीय विधान सभाओं के चुनाव अप्रैल 1946 में पूरे हुए। कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव और मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा। कांग्रेस को आठ प्रांतों में पूर्ण बहुमत और केंद्रीय विधान सभा में 102 में से 56 सीटें मिलीं। मुस्लिम आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में कांग्रेस की स्थिति खराब रही।
- भारत के राजनीतिक दलों से शिमला में 5 मई -12 मई, 1946 तक वार्ता करने के बाद केबीनेट मिशन ने अपनी योजना 16 मई, 1946 ई. को प्रकाशित की जिसे केबिनेट मिशन योजना कहा जाता है
- कैबिनेट मिशन (1946) के प्रमुख प्रस्ताव :
- भारत में तत्काल अंतरिम सरकार का गठन किया जाएगा।
- संविधान सभा का गठन किया जाएगा, जो भारत का संविधान बनाएगी।
- भारत एक संघ (Federation of India) होगा, जिसमें:
- ब्रिटिश प्रांत
- देशी रियासतें दोनों शामिल होंगे।
- संघ के पास केवल तीन विषय होंगे:
- विदेश मामले (Foreign Affairs)
- रक्षा (Defence)
- संचार (Communications) शेष सभी विषय (अवशिष्ट शक्तियाँ) प्रांतों के पास रहेंगे।
- प्रांतों को अपना अलग संविधान बनाने का अधिकार दिया जाएगा।
- केबिनेट मिशन ने पाकिस्तान तथा दो संविधान सभाओं की मांग को अस्वीकार किया।
- कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया, लेकिन मुस्लिम लीग ने पहले अस्वीकार किया और बाद में इसमें शामिल हुई।
- मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को ‘सीधी कार्रवाई दिवस’ की घोषणा की, जिससे सांप्रदायिक दंगे भड़क गए।
- कैबिनेट मिशन ने स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य संविधान का विवरण तय करना नहीं, बल्कि भारतीयों को संविधान निर्माण की प्रक्रिया में शामिल करना था।
नोट: कैबिनेट मिशन योजना का उद्देश्य भारत को एकीकृत रखना था और विभाजन को टालना था।
संविधान सभा के गठन के संबंध में केबिनेट मिशन के प्रावधान निम्नलिखित थे-
- संविधान सभा गठन हेतु योजना :- 16 मई 1946 → अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली (न की वयस्क मताधिकार के आधार पर) + मनोनयन अर्थात् आंशिक निर्वाचित व आंशिक मनोनीत
- संविधान सभा में ब्रिटिश भारत तथा देशी रियासतों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर होगा। इसका अर्थ है कि ब्रिटिश भारत तथा देशी रियासतों को सीटों का आवंटन उनकी जनसंख्या के अनुपात में किया जाएगा। मोटे तौर पर 10 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि का प्रावधान होगा।
- प्रतिनिधि तीन समुदायों से प्रांत की जनसंख्या के अनुपात में चुने जायेंगे।
- सामान्य
- मुस्लिम
- सिक्ख
- इस प्रावधान के आधार पर संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 389 निर्धारित की गई। इन सीटों में से 296 सीटें ब्रिटिश भारत तथा 93 सदस्य देशी रियासतों के लिए निर्धारित की गई।
- तत्कालीन ब्रिटिश भारत में 11 ब्रिटिश प्रांत तथा 4 चीफ कमिश्नर थी।
- 11 ब्रिटिश प्रांत –
- पंजाब
- संयुक्त प्रांत
- मध्य प्रांत व बरार
- बिहार
- बंगाल
- असम
- उड़ीसा
- मद्रास
- बंबई
- पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत
- सिंध
- 4 चीफ कमिश्नर –
- अजमेर-मेरवाड़ा
- कूर्ग
- दिल्ली
- बलुचिस्तान
- 11 ब्रिटिश प्रांत –
- ब्रिटिश भारत के लिए निर्धारित 296 सीटों पर निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से किया जायेगा। इनका निर्वाचन ब्रिटिश प्रांतों तथा चीफ कमिश्नर की प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत प्रणाली से किया जाएगा। जिस प्रांत को जितनी सीटें आवंटित होंगी, उन सदस्यों को उसी प्रांत की विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा चुना जाएगा।
- देशी रियासतों के लिए निर्धारित 93 सीटों (सर्वाधिकार – मैसूर 7) पर सदस्यों का परामर्श के आधार पर मनोनयन किया जाएगा। देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के मनोनयन के लिए परामर्श करने हेतु वार्तालाप समिति का गठन किया गया जिसमें देशी रियासतों तथा संविधान सभा के सदस्यों को शामिल किया गया। इन सदस्यों के लिए निर्वाचन का प्रावधान इसलिए नहीं रखा गया क्योंकि देशी रियासतों में विधानसभाएँ नहीं थी । हैदराबाद एक ऐसी रियासत जिसके प्रतिनिधि संविधान सभा में सम्मिलित नहीं हुए। (16 सदस्यों को)
- चूंकि संविधान सभा में ब्रिटिश भारत में प्रतिनिधियों का निर्वाचन हुआ था तथा देशी रियासतों के प्रतिनिधियों का मनोनयन हुआ था, अतः भारत की संविधान सभा पूर्णतः निर्वाचित अथवा पूर्णतः मनोनीत निकाय नहीं थी बल्कि यह आंशिक रूप से चुनी हुई तथा आंशिक रूप से नामांकित निकाय थी। अर्थात् भारतीय संविधान सभा के कुछ सदस्य (296) निर्वाचित थे तथा कुछ सदस्य(93) मनोनीत थे ।
- संविधान सभा के निर्वाचित सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर हुआ था। इस प्रकार संविधान सभा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार तथा प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर गठित संस्था नहीं थी।
- संविधान सभा में कई राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल थे, जैसे
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस,
- मुस्लिम लीग (हालांकि बाद में उसने बहिष्कार किया),
- सिख महासभा,
- कम्युनिस्ट पार्टी,
- स्वतंत्र सदस्य, आदि।
- अतः यह एक बहुदलीय (Multi-party) सभा थी।
- संविधान सभा ने अपने कार्य को व्यवस्थित करने के लिए 22 समितियाँ गठित की थीं।
- संविधान सभा 1946 में सीमित मताधिकार (Limited Franchise) के आधार पर गठित हुई थी, इसलिए समाजवादी नेताओं का मत था कि यह सभा जनता की वास्तविक प्रतिनिधि नहीं है। इसी कारण समाजवादी दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने मांग की थी कि
- “संविधान सभा को भंग कर वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise) के आधार पर नई संविधान सभा का पुनर्निर्वाचन किया जाए।”
संविधान सभा के लिए चुनाव
- ब्रिटिश प्रांतों के 296 प्रतिनिधियों (292+4) का समुदाय के आधार पर निर्वाचन –
- सामान्य – 213
- मुसलमान – 79
- सिख – 4
- संविधान सभा के लिए चुनाव जुलाई-अगस्त 1946 में हुआ। निर्वाचन परिणाम निम्नानुसार रहेः
- ब्रिटिश भारत के लिए आवंटित 296 सीटों सीटें
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस – 208 सीटें
- मुस्लिम लीग – 73 सीटें
- अन्य छोटे समूह एवं स्वतंत्र सदस्य – 15 सीटें (08 सदस्य निर्दलीय)
- हालांकि देसी रियासतों को आवंटित की गईं 93 सीटें भर नहीं पाईं क्योंकि उन्होंने खुद को संविधान सभा से अलग रखने का निर्णय लिया।
- ब्रिटिश भारत के लिए आवंटित 296 सीटों सीटें
- संविधान सभा में 15 महिला सदस्य, 33 अनुसूचित जनजाति, 26 अनुसूचित जाति के सदस्य थे ।
अंतरिम सरकार का गठन (1946) –
- कैबिनेट मिशन योजना के अन्तर्गत अंतरिम राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया।
- भारत की पहली अन्तरिम सरकार का गठन की घोषणा – 24 अगस्त, 1946 को पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में किया गया जिसमें मुस्लिम लीग की भागीदारी नहीं थी।
- अध्यक्ष- बॉयसराय लॉर्ड बेबेल
- उपाध्यक्ष – पं. जवाहरलाल नेहरू
- गठन/शपथ ग्रहण – 2 सितम्बर, 1946 को पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अन्तरिम सरकार के कुल 13 सदस्यों ने (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व 11 अन्य सदस्य) शपथ ग्रहण की। शपथ ग्रहण के समय अन्तरिम सरकार में कांग्रेस के प्रतिनिधि, कुछ निर्दलीय तथा गैर-मुस्लिम लीग सदस्य शामिल थे। मुस्लिम लीग शामिल नहीं थी।
अंतरिम सरकार (1946)
| क्र. सं. | नाम | विभाग |
| 1 | बॉयसराय लॉर्ड बेबेल | अध्यक्ष |
| 2 | जवाहरलाल नेहरू | उपाध्यक्ष/राष्ट्रमंडल संबंध तथा विदेशी मामले |
| 3 | सरदार वल्लभभाई पटेल | गृह, सूचना एवं प्रसारण |
| 4 | डॉ. राजेंद्र प्रसाद | खाद्य एवं कृषि |
| 5 | लियाकत अली खां | वित्त |
| 6 | डॉ. जॉन मथाई – | उद्योग एवं नागरिक आपूर्ति |
| 7 | अब्दुर-रब-निश्तार | डाक एवं वायु |
| 8 | सी. राजगोपालाचारी | शिक्षा एवं कला |
| 9 | जगजीवन राम | श्रम |
| 10 | सरदार बलदेव सिंह | रक्षा |
| 11 | आसफ अली | रेलवे एवं परिवहन |
| 12 | सी. एच. भाभा | कार्य, खान एवं ऊर्जा |
| 13 | आई आई चुंदरीगर | वाणिज्य |
| 14 | गजनफ़र अली ख़ान | स्वास्थ्य |
| 15 | जोगेंद्र नाथ मंडल | विधि |
- अन्तरिम सरकार का पुनर्गठन – 26 अक्टूबर, 1946 को अन्तरिम सरकार का पुनर्गठन कर मुस्लिम लीग को शामिल किया गया । (वेवेल के प्रयास से)
- तीन मूल सदस्यों
- सैयद अली जहीर
- शरतचंद्र बोस
- सर शफात अहमद ख़ाँ) के स्थान पर मुस्लिम लीग के 5 प्रतिनिधि अन्तरिम सरकार में शामिल किये गये।
- पुनर्गठन के पश्चात् अब कुल 15 सदस्य हो गये है।
- तीन मूल सदस्यों
- अंतरिम सरकार में आपसी गतिरोध को देखते हुये अंबेडकर ने कहा – यह एक देश की सरकार है जिसे दो देश चला रहे है।
स्वतंत्रता की प्रक्रिया
माउंटबेटन योजना (Mountbatten Plan) – 1947
- 16 अगस्त 1946 को प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस व मुस्लिम लीग का प्रथम बैठक में अनुपस्थिति के कारण
- प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने 20 फ़रवरी 1947 को घोषणा की कि 30 जून 1948 से पहले सत्ता भारतीयो को हस्तांतरित कर दी जाएगी।
- ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1947 में लॉर्ड वेवेल की जगह लुई माउंटबेटन को भारत का अंतिम वायसराय बनाकर भेजा। वे 22 मार्च, 1947 को भारत पहुंचे।
- उनका उद्देश्य सत्ता के निर्वाध हस्तांतरण की व्यवस्था करना था।
- उन्होंने महसूस किया कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग साथ काम नहीं कर सकते।
- 3 जून, 1947 को एक नीति बयान जारी किया गया जिसमें माउंटबेटन योजना/जून प्लान/बाल्कन प्लान/डी की बर्ड प्लान को स्पष्ट किया गया।
- योजना के अंतर्गत:
- कांग्रेस व लीग ने स्वीकारा।
- विभाजन की अनिवार्यता को मान्यता दी गई।
- अलग संविधान सभा की मांग वाले क्षेत्रों की इच्छाओं का सम्मान किया गया।
- भारत और पाकिस्तान के रूप में दो डोमोनियन स्टेट का गठन सुनिश्चित किया गया।
- 3 जून 1947 की योजना के बाद मुस्लिम लीग के सदस्य भी संविधान सभा में शामिल हुए।
- 15 अगस्त, 1947 को भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बन गए।
- योजना की पुष्टि के लिये –
- 14 जून 1947 (नई दिल्ली) कांग्रेस मीटिंग (अध्यक्ष – जे .बी. कृपलानी)
- भारत विभाजन प्रस्ताव रखा – गोविंद वल्लभ पंत
- समर्थन – मौलाना आजाद, नेहरू , पटेल
- विरोध – ग़फ़्फ़ार ख़ाँ, चौथराम मिटवानी, डॉक्टर किचलू, पुरुषोत्तम दास, मौलाना हफ़िजुर्रहमान
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 –
- यह अधिनियम 5 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया था। इसे 18 जुलाई, 1947 को तत्कालीन ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज VI से शाही स्वीकृति मिली।
- इसका उद्देश्य ब्रिटिश राज से सत्ता को भारत और पाकिस्तान के नए स्वतंत्र राज्यों को हस्तांतरित करना था। इसने भारतीय मामलों पर ब्रिटिश आधिपत्य को समाप्त कर दिया।
- 3 जून, 1947 को वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन की योजना पेश की, जिसे माउंटबेटन योजना या डिकीबर्ड प्लान कहा जाता है। इस योजना को गुप्त रूप से ‘बाल्कन प्लान’ भी कहा जाता है।
- इसने भारत का विभाजन कर दो स्वतंत्र डोमिनियनों संप्रभु राष्ट्र भारत और पाकिस्तान का सृजन किया, जिन्हें ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल से अलग होने की स्वतंत्रता थी। भारत का गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेंटन व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और पाकिस्तान का गवर्नर जनरल मो. अली जिन्ना व प्रधानमंत्री लियाकत अली खाँ होगा।
- बंगाल और पंजाब को भी दो भागों में विभाजित किया गया –
- पूर्वी बंगाल (पाकिस्तान) और पश्चिमी बंगाल (भारत)
- पूर्वी पंजाब (भारत) और पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान)
- पूर्वी बंगाल, सिंध, पश्चिमी पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और असम का सिल्हट जिला पाकिस्तान में शामिल किया गया। तथा शेष भाग भारत में सम्मिलित किया गया।
- भारतीय रियासतों को यह विकल्प दिया गया कि वे किसी भी डोमिनियन (भारत या पाकिस्तान) में शामिल हो सकती हैं या स्वतंत्र रह सकती हैं।
- कांग्रेस के एकमात्र नेता अबुल कलाम आजाद ने अंत तक भारत विभाजन को स्वीकार नहीं किया।
- बलूचिस्तान (उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत) के जनमत संग्रह द्वारा पाकिस्तान में शामिल किये जाने पर खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा – ‘हमें भेड़ियों के आगे फेंक दिया गया है’।
- इस योजना के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि चल रही तत्कालीन संविधान सभा भारत की संविधान सभा होगी तथा पाकिस्तान के लिए नई संविधान सभा का गठन किया जाएगा।
- वायसराय का पद समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर दोनों डोमिनियन राज्यों में गवर्नर-जनरल पद का सृजन किया ।जिसकी नियुक्ति उस राज्य की कैबिनेट की सिफारिश पर ब्रिटिश सम्राट करेगा।
- ब्रिटेन में भारत सचिव का पद समाप्त कर दिया। इसकी सभी शक्तियां राष्ट्रमंडल मामलों के राज्य सचिव को स्थानांतरित कर दी गई।
- नये संविधान के बनने तक शासन संचालन ‘भारत शासन अधिनियम 1935’ के अनुसार होगा।
- दोनों देशों के लिए अलग-अलग संविधान सभा होगी। संविधान सभा नये संविधान के लागू होने तक विधानमंडल के रूप में कार्य करेगी।
- नॉर्मन डी. पामर – विधेयक जो कम समय और कम वाद-विवाद से स्वीकृत हुआ।
15 अगस्त, 1947 के बाद –
- केबिनेट मिशन ने संविधान सभा की संख्या 389 निर्धारित की थी, पर पाकिस्तान के पृथ्यकरण के कारण 15 अगस्त, 1947 के बाद यह संख्या 389 से घटकर 324 रह गई।
- गर्वनर वाले प्रान्तों से – 232 (09 ब्रिटिश प्रांत)
- सयुंक्त प्रांत – 55 (सर्वाधिक)
- मद्रास – 49
- बिहार – 36
- चीफ कमिश्नर – 3
- ब्लूचिस्तान पाकिस्तान में गया।
- देशी राज्यों से – 89
- संयुक्त राजस्थान से – 12
- गर्वनर वाले प्रान्तों से – 232 (09 ब्रिटिश प्रांत)
- 04 चीफ कमिश्नरीज क्षेत्र –
- अजमेर- मेरवाड़ा – मुकुट बिहारी लाल भार्गव (केंद्रीय विधानसभा सदस्य के कारण)
- दिल्ली – देशबंधु गुप्ता (केंद्रीय विधानसभा सदस्य के कारण )
- कुर्ग – सी.एम. पुनाका (विधायिका द्वारा निर्वाचित)
- ब्लूचिस्तान
- भारत – पाक के पश्चात तथा कुछ की सदस्यता समाप्त होने से अब संख्या – 299
- वर्तमान में लोकसभा की वेबसाइट पर 31 दिसम्बर, 1947 को संविधान सभा की तत्कालीन सदस्य संख्या का उल्लेख है, न कि कुल सदस्य संख्या का। यह संख्या इस प्रकार है –
- ब्रिटिश प्रांत. – 226
- चीफ कमिश्नर – 03
- देशी रियासत – 70
- कुल – 299 (पुनर्गठन पश्चात्)
- 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत ओपनिवेशक राज्य था।
स्वतंत्र भारत का पहला मंत्रिमंडल (1947)
| क्र. सं. | नाम | विभाग |
| 1 | चक्रव्रती राजगोपालाचारी | अध्यक्ष (20 जून 1948 बाद) प्रथम व अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल |
| 2 | जवाहरलाल नेहरू | उपाध्यक्ष/प्रधानमंत्री – राष्ट्रमंडल तथा विदेशी मामले; वैज्ञानिक शोध |
| 3 | सरदार वल्लभभाई पटेल | गृह, सूचना एवं प्रसारण, राज्यों के मामले |
| 4 | डॉ. राजेंद्र प्रसाद | खाद्य एवं कृषि |
| 5 | मौलाना अबुल कलाम आजाद | शिक्षा |
| 6 | डॉ. जॉन मथाई – | रेलवे एवं परिवहन |
| 7 | आर.के. षणमुगम शेट्टी | वित्त |
| 8 | डॉ. बी.आर. अंबेडकर | विधि |
| 9 | जगजीवन राम | श्रम |
| 10 | सरदार बलदेव सिंह | रक्षा |
| 11 | राजकुमारी अमृत कौर | स्वास्थ्य |
| 12 | सी. एच. भाभा | वाणिज्य |
| 13 | रफी अहमद किदवई | संचार |
| 14 | डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी | उद्योग एवं आपूर्ति |
| 15 | वी. एन. गाड़गिल | कार्य, ख़ान एवं ऊर्जा |
कार्यकारी परिषद अध्यक्ष लार्ड माउंटबेटन – 15 अगस्त 1947 से 20 जून 1948 तक
- अंतिम गवर्नर जनरल
- स्वतंत्र भारत का प्रथम गवर्नर जनरल
भारतीय संविधान सभा
- भारत में संविधान सभा के संबंध में सर्वप्रथम उल्लेख 1895 ई. में बाल गंगाधर तिलक द्वारा निर्मित ‘स्वराज विधेयक’ में मिलता है, इस विधेयक को (constitution of india bill) के नाम से भी जाना जाता है।
- 1919 के भारत सरकार अधिनियम के विरोध में भारतीयों द्वारा संविधान सभा की मांग उठाई गई।
- 1922 में महात्मा गांधी ने संविधान सभा का स्पष्ट उल्लेख किया।
- 1922 में एनी बेसेंट की पहल पर केंद्रीय विधायिका के सदस्यों की बैठक हुई और संविधान निर्माण का प्रस्ताव रखा गया।
- 1923 में दिल्ली सम्मेलन में भारतीय संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत की गई।
- 1928 ई. में भारत के सभी राजनैतिक दलों ने मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस समिति ने 10 अगस्त, 1928 को भारत के लिए संविधान का एक प्रारूप तैयार किया जिसे “नेहरू रिपोर्ट”’ कहा जाता है। भारतीयों के द्वारा संविधान निर्माण की दिशा में किया गया यह प्रथम प्रयास था।
- 1935 के भारत सरकार अधिनियम को अस्वीकार कर कांग्रेस ने संविधान सभा की मांग को प्रमुख मुद्दा बनाया।
- भारत में संविधान सभा के गठन का विचार वर्ष 1934 में पहली बार एम.एन. रॉय ने रखा।
- 1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पहली बार भारत के संविधान के निर्माण के लिए आधिकारिक रूप से संविधान सभा के गठन की माँग की।
- 1937 में कांग्रेस ने प्रांतीय चुनाव जीते और संविधान सभा के गठन की मांग को दोहराया।
- 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से पंडित जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की कि स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गई संविधान सभा द्वारा किया जाएगा और इसमें कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं होगा। नेहरू की इस मांग को अंतत: ब्रिटिश सरकार ने सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया। इसे सन 1940 के ‘ अगस्त प्रस्ताव ‘ के नाम से जाना जाता है ।
- गांधी जी ने 19 नवबर, 1939 को ‘हरिजन’ में ‘द ओनली वे’ शीर्षक के अंतर्गत एक लेख लिखा जिसमे उन्होने विचार व्यक्त किया कि “संविधान सभा ही देश की देशज प्रकृति का और लोकेच्छा का सही अर्थो मे तथा पूरी तरह से निरूपण करने वाला संविधान बना सकती है।”
- 1940 ई. में कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों बड़े राजनीतक दल संविधान सभा के विचार पर सहमत हो गए। लेकिन जहाँ कांग्रेस पूरे भारत के लिए एक ही संविधान सभा चाहती थी, वहीं मुस्लिम लीग देश में दो राज्यों की मांग के अनुसार दो संविधान सभाएं चाहती थी।
- हैदराबाद एकमात्र ऐसी देशी रियासत थी जिसके प्रतिनिधि संविधान सभा में शामिल नहीं हुए। अत: संविधान सभा में शामिल होने वाली सबसे बड़ी देशी रियासत मैसूर थी जिसके संविधान सभा में 7 सदस्य थे।
- 1922 में महात्मा गांधी ने संविधान सभा का स्पष्ट उल्लेख किया।
- 1922 में एनी बेसेंट की पहल पर केंद्रीय विधायिका के सदस्यों की बैठक हुई और संविधान निर्माण का प्रस्ताव रखा गया।
- 1923 में दिल्ली सम्मेलन में भारतीय संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत की गई।
- 1928 ई. में भारत के सभी राजनैतिक दलों ने मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस समिति ने 10 अगस्त, 1928 को भारत के लिए संविधान का एक प्रारूप तैयार किया जिसे “नेहरू रिपोर्ट”’ कहा जाता है। भारतीयों के द्वारा संविधान निर्माण की दिशा में किया गया यह प्रथम प्रयास था।
- 1935 के भारत सरकार अधिनियम को अस्वीकार कर कांग्रेस ने संविधान सभा की मांग को प्रमुख मुद्दा बनाया।
- भारत में संविधान सभा के गठन का विचार वर्ष 1934 में पहली बार एम.एन. रॉय ने रखा।
- 1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पहली बार भारत के संविधान के निर्माण के लिए आधिकारिक रूप से संविधान सभा के गठन की माँग की।
- 1937 में कांग्रेस ने प्रांतीय चुनाव जीते और संविधान सभा के गठन की मांग को दोहराया।
- 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से पंडित जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की कि स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गई संविधान सभा द्वारा किया जाएगा और इसमें कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं होगा। नेहरू की इस मांग को अंतत: ब्रिटिश सरकार ने सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया। इसे सन 1940 के ‘ अगस्त प्रस्ताव ‘ के नाम से जाना जाता है ।
- गांधी जी ने 19 नवबर, 1939 को ‘हरिजन’ में ‘द ओनली वे’ शीर्षक के अंतर्गत एक लेख लिखा जिसमे उन्होने विचार व्यक्त किया कि “संविधान सभा ही देश की देशज प्रकृति का और लोकेच्छा का सही अर्थो मे तथा पूरी तरह से निरूपण करने वाला संविधान बना सकती है।”
- 1940 ई. में कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों बड़े राजनीतक दल संविधान सभा के विचार पर सहमत हो गए। लेकिन जहाँ कांग्रेस पूरे भारत के लिए एक ही संविधान सभा चाहती थी, वहीं मुस्लिम लीग देश में दो राज्यों की मांग के अनुसार दो संविधान सभाएं चाहती थी।
- हैदराबाद एकमात्र ऐसी देशी रियासत थी जिसके प्रतिनिधि संविधान सभा में शामिल नहीं हुए। अत: संविधान सभा में शामिल होने वाली सबसे बड़ी देशी रियासत मैसूर थी जिसके संविधान सभा में 7 सदस्य थे।
संविधान सभा की संरचना
संविधान सभा में कुल 15 महिलाएं थी
| क्रमांक | नाम | राज्य / प्रांत | विशेष जानकारी |
| 1 | सरोजनी नायडू | बिहार | |
| 2 | सुचेता कृपलानी | उत्तर प्रदेश | |
| 3 | पूर्णिमा बनर्जी | उत्तर प्रदेश | |
| 4 | राजकुमारी अमृत कौर | मध्य प्रांत | |
| 5 | दुर्गाबाई देसाई | पश्चिम बंगाल | |
| 6 | रेणुका राय | पश्चिम बंगाल | |
| 7 | मालती चौधरी | उड़ीसा | |
| 8 | लीला राय | पश्चिम बंगाल | |
| 9 | अम्मू स्वामीनाथन | मद्रास | |
| 10 | दक्षायनी वेलायुदन | मद्रास | एकमात्र दलित महिला |
| 11 | विजयलक्ष्मी पंडित | उत्तर प्रदेश | |
| 12 | हंसा मेहता | बंबई | |
| 13 | बेगम एजाज रसूल | उत्तर प्रदेश | एकमात्र मुस्लिम महिला; मुस्लिम लीग पार्टी |
| 14 | कमला चौधरी | उत्तर प्रदेश | |
| 15 | ऐनी मस्करीनी | त्रावणकोर | कैथोलिक ईसाई; एकमात्र मनोनीत महिला सदस्य |
| प्रथम बैठक में 09 ही उपस्थित थी । | |||
संविधान सभा में राजस्थान के कुल 12 सदस्य थे
| क्रमांक | नाम | प्रतिनिधित्व / क्षेत्र | विशेष जानकारी |
| 1 | हीरालाल शास्त्री | जयपुर | |
| 2 | वी. टी. कृष्णामाचारी | जयपुर | संविधान सभा के उपाध्यक्ष |
| 3 | सरदार सिंह | खेतड़ी | |
| 4 | जयनारायण व्यास | जोधपुर | |
| 5 | बलवंत सिंह मेहता | उदयपुर | |
| 6 | माणिक्यलाल वर्मा | उदयपुर | |
| 7 | जसवंत सिंह | बीकानेर | |
| 8 | राजबहादुर | भरतपुर | |
| 9 | रामचन्द्र उपाध्याय | अलवर | |
| 10 | दलेल सिंह | कोटा | |
| 11 | गोकुललाल असावा | शाहपुरा | |
| 12 | मुकुट बिहारी लाल भार्गव | अजमेर-मेरवाड़ा |
संविधान सभा के वे सदस्य जो राजस्थान की रियासतों के प्रशासनिक अधिकारी थे-
- वी.टी. कृष्णामाचारी – जयपुर रियासत
- सी. एस. वेंकटाचारी – जोधपुर रियासत
- सरदार के. एम. पणिक्कर – बीकानेर रियासत
- सर टी. विजय राघवाचार्य – उदयपुर रियासत
ऐसे व्यक्ति जो संविधान सभा के सदस्य नहीं थे लेकिन संविधान सभा की समितियों के अध्यक्ष रहे-
- एस. वरदाचारी – नागरिकता तदर्थ समिति
- नलिनी रंजन सरकार – वित्तीय प्रावधान पर विशेषज्ञ समिति
- एस. के. धर – भाषायी प्रान्त आयोग
- उषानाथ सेन – प्रेस दीर्घा समिति।
- बी. एन. राव – भारतीय राज्यों के लिए आदर्श संविधान के प्रारूप हेतु राज्य मंत्रालय समिति
संविधान सभा के सदस्य नहीं थे –
- महात्मा गांधी
- जय प्रकाश नारायण
- तेज बहादुर सप्रू
- बी. एन. राव
संविधान सभा के प्रमुख सदस्य
|
क्र. 154839_f7eda1-d6> |
नाम 154839_9e8282-3b> |
प्रतिनिधित्व / प्रांत 154839_ec45ff-55> |
संबद्धता / पद 154839_29a462-5a> |
विशेष जानकारी 154839_fe862d-37> |
|
1 154839_611f72-f5> |
पंडित जवाहरलाल नेहरू 154839_c49823-d4> |
संयुक्त प्रांत 154839_53c5ab-ad> |
अध्यक्ष – अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 154839_f2f67a-00> |
संविधान सभा को “चलायमान राष्ट्र (Moving Nation)” कहा 154839_5e4dd4-84> |
|
2 154839_8b12ab-fe> |
मोहम्मद अली जिन्ना 154839_4151ac-49> |
पंजाब प्रांत 154839_f86eee-44> |
अध्यक्ष – ऑल इंडिया मुस्लिम लीग 154839_1f097e-e3> |
बाद में पाकिस्तान के संस्थापक बने 154839_407d41-8e> |
|
3 154839_654054-21> |
सोमनाथ लाहिडी 154839_9384d5-6b> |
बंगाल 154839_79169f-fc> |
एकमात्र साम्यवादी सदस्य 154839_96cea5-65> |
केवल तीन अधिवेशन तक सदस्य रहे; बंगाल विभाजन के बाद पुनः निर्वाचित नहीं हो सके 154839_e97d92-83> |
|
4 154839_aea5a8-af> |
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 154839_607188-5a> |
बंगाल 154839_5b57f2-a8> |
अध्यक्ष – अखिल भारतीय हिंदू महासभा 154839_013a34-a6> |
कांग्रेस द्वारा नामांकित 154839_16e6bf-c1> |
|
5 154839_db826b-ea> |
फ्रैंक एंथनी 154839_50f8d0-f9> |
बंगाल 154839_c5cb08-56> |
अध्यक्ष – एंग्लो-इंडियन एसोसिएशन 154839_ec4d88-b3> |
कांग्रेस द्वारा नामांकित; एंग्लो-इंडियन समुदाय के प्रमुख नेता 154839_623da1-68> |
|
6 154839_189270-f0> |
जगजीवन राम 154839_349faf-a4> |
बिहार 154839_fd91c3-1b> |
अध्यक्ष – ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज लीग 154839_3dcc20-93> |
कांग्रेस द्वारा नामांकित; दलित वर्गों के प्रमुख नेता 154839_24045e-f5> |
|
7 154839_f7b805-21> |
हंसा मेहता 154839_2d7732-ac> |
बंबई 154839_2ba759-48> |
अध्यक्ष – ऑल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस 154839_dda618-e3> |
कांग्रेस द्वारा नामांकित; महिलाओं के अधिकारों की प्रवक्ता 154839_be4bc7-b0> |
|
8 154839_69aee2-c6> |
कामेश्वर सिंह (दरभंगा महाराजा) 154839_1f25f6-45> |
बिहार 154839_a53593-b0> |
अध्यक्ष – ऑल इंडिया लैंडहोल्डर्स एसोसिएशन 154839_66b12d-6a> |
स्वतंत्र सदस्य; जमींदारों के हितों के प्रतिनिधि 154839_800b07-6c> |
|
9 154839_467a3a-2c> |
मौलाना अबुल कलाम आजाद 154839_53a211-80> |
पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत 154839_d70335-49> |
कांग्रेस पार्टी 154839_0bcb5a-ef> |
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी; शिक्षा और धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक 154839_08c722-ad> |
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10 154839_ccb5fb-3d> |
एनी मस्करीन 154839_afcfad-66> |
त्रावणकोर-कोचीन रियासत 154839_0639df-f4> |
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देसी रियासतों से एकमात्र महिला प्रतिनिधि; कैथोलिक ईसाई 154839_0f3785-a5> |
|
11 154839_f4b515-15> |
पी. एच. मोदी 154839_f0b09c-17> |
बंगाल 154839_588b1e-23> |
पारसी समुदाय का प्रतिनिधित्व 154839_ad7c1a-ab> |
विभाजन के बाद पुनः निर्वाचित नहीं हुए 154839_ff9f62-ad> |
|
12 154839_acbfe1-e9> |
डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर 154839_da859e-20> |
प्रारंभिक: जैसूर-कुलना (बंगाल) → बाद में बंबई प्रांत (पूना) 154839_f94c62-ae> |
अध्यक्ष – ऑल इंडिया शेड्यूल कास्ट फेडरेशन; विधि व न्याय मंत्री 154839_b43c2e-08> |
|
संविधान सभा के अन्य प्रमुख सदस्य –
- डॉ. जयशंकर
- टेकचंद बख्शी
- मीनू मसानी
- एच.एस. गौड़
- सर फिरोज ख़ान
- नूर सुहारावर्दी
- ख़्वाजा नजीमुद्धीन
- जफरुल्लाह खाँ
संविधान सभा की कार्यविधि एवं संविधान निर्माण
- संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को हुई तथा अंतिम बैठक 24 जनवरी, 1950 को हुई । इस दौरान संविधान सभा के कुल 12 सत्र हुए जिनमें कुल 167 बैठकें हुई।
- नोट: अगर संविधान सभा के 11 अधिवेशन माने (11 वां 14 से 26 नवम्बर 1949) तो सभा का कार्यकाल 2 वर्ष, 11 माह व 18 दिन होता है अगर 12 अधिवेशन (24 जनवरी, 1950) माने तो कार्यकाल 3 वर्ष, 1 माह और 16 दिन होती है।
09 दिसम्बर, 1946 (प्रथम बैठक) –
- इस बैठक में आचार्य जे.बी.कृपलानी (कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष) ने संविधान सभा में उपस्थित सदस्यों में से सबसे बुजुर्ग तथा अनुभवी सदस्य सच्चिदानंद सिन्हा (निर्वाचन था) को संविधान सभा के अस्थायी सभापति के रुप में पद ग्रहण करने का अनुरोध किया। इस प्रकार संविधान सभा में बोलने वाले प्रथम वक्ता जे.बी.कृपलानी थे जो उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे।
- डॉ. सिन्हा ने स्वास्थ्य संबंधी कारणों से लंबे समय तक कार्य ना कर पाने की असमर्थता जाहिर करते हुए दोपहर बाद सभा का सभापतित्व करने हेतु फ्रैंक एंथनी को उपसभापति के रुप में मनोनीत किया।
- सिन्हा ने मनोनीत किया था।
- एंग्लो इंडियन
- केद्रीय प्रांत व बरार से निर्वाचन
- 08 बार लोकसभा के मनोनीत सदस्य (06वी और 9वी के अलावा)
- 207 सदस्यों ने भाग लिया ।
- सर्वाधिक उपस्थित सदस्य संख्या – मद्रास
- मुस्लिम लीग ने बहिष्कार किया ।
- चर्चिल – ऐसा विवाह जिसमे दुल्हन गायब है।
10 दिसम्बर, 1946 (दूसरी बैठक)
11 दिसम्बर, 1946 (तीसरी बैठक)
- स्थायी अध्यक्ष – राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष (सभापति) निर्विरोध रूप से चुना गया था।
- प्रस्ताव रखा – जे.बी. कृपलानी ने
- समर्थन – सरदार पटेल ने किया
- संविधान सभा के प्रवक्ता
- स्थायी उपाध्यक्ष – 01 देशी राज्यो से हो (सुझाव -एन.वी.खरे.)
- H.C. मुखर्जी (प. बंगाल) – जनवरी 1947 (निर्वाचित)
- वी.टी.कृष्णामचारी (जयपुर) – जुलाई 1947 (निर्वाचित)
- संविधान सभा में प्रथम महिला वक्ता सरोजिनी नायडू थी जिन्होनें इस बैठक में राजेन्द्र प्रसाद के लिए बधाई संदेश पढ़ा।
12 दिसम्बर, 1946 (चौथी बैठक)
13 दिसम्बर, 1946 (पाँचवीं बैठक)
- इस बैठक में 13 दिसंबर, 1946 को जवाहर लाल नेहरू द्वारा उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया गया जिसमें 8 उद्देश्य शामिल थे।
- विरोध किया – M.R.जयकर, डॉ.अंबेडकर
- उद्देश्य प्रस्ताव हेतु विशेषज्ञ समिति गठित की गई थी – जुलाई 1946 में
- अध्यक्ष – जवाहर लाल नेहरू
- सदस्य –
- गोपाल स्वामी आयंगर
- के.टी.शाह
- आसफ़ अली
- K.M. मुंशी
- वी आर गाडगिल
- हुमायू कबीर
- के संथानम
- 22 जनवरी, 1947 को संविधान सभा ने सर्वसम्मति से उद्देश्य प्रस्ताव को पारित किया।
उद्देश्य-प्रस्ताव की प्रमुख बातें
- भारत एक प्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बनेगा।
- ब्रिटिश भारत, देसी रियासतें और अन्य क्षेत्र भारतीय संघ का हिस्सा होंगे।
- संघीय राज्य व्यवस्था होगी, जिसमें अवशिष्ट शक्तियाँ (Residual Powers) स्वायत्त इकाइयों के पास होंगी और प्रभुता जनता के हाथों में रहेगी।
संविधान सभा के अधिवेशन
- 11 माने तो कार्यकाल – 02 वर्ष 11 माह 18 दिन
- 12 माने तो कार्यकाल – 03 वर्ष 01 माह 16 दिन
- 12 वाँ – 24 जनवरी 1950
पहला अधिवेशन –
- 09 दिसंबर 1946 से 23 दिसंबर 1946
- 211 सदस्यों ने भाग लिया।
चौथा अधिवेशन –
- वर्तमान संविधान सभा भारत की संविधान सभा होगी तथा पाकिस्तान अपनी नई संविधान सभा की स्थापना करेगा।
पांचवा अधिवेशन –
- संविधान सभा पूर्ण प्रभुता संपन्न
सांतवा अधिवेशन –
- डॉ. अम्बेडक़र ने प्रारूप संविधान पेश किया
- 315 अनुच्छेद, 08 अनुसूचियाँ
दसवां अधिवेशन –
- प्रस्तावना अंतिम रूप से स्वीकार
संविधान सभा का 11th सत्र:
- 26 नवम्बर, 1949 ई. के दिन सभा ने संविधान को अंतिम रूप से पारित कर दिया। इसी दिन भारत का संविधान अंगीकृत हो गया तथा संविधान में नागरिकता, निर्वाचन, अंतरिम संसद तथा संक्रमणकालीन प्रावधानों से संबंधित कुल 16 अनुच्छेद (अनुच्छेद 5, 6, 7, 8, 9, 60, 324, 366, 367, 379, 380, 388, 391, 392, 393 तथा 394) इसी दिन प्रवृत हो गए तथा शेष संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ। इसका उल्लेख अनुच्छेद 394 में किया गया है। 394 स्वयं लागू होने का उल्लेख है।
- अनुच्छेद 5,6,7,8,9 – नागरिकता
- अनुच्छेद 60 – राष्ट्रपति की शपथ
- अनुच्छेद 324 – चुनाव आयोग
- अनुच्छेद 366, 367
- अनुच्छेद 379 – तदर्थ संसद / अंतर्कालीन संसद/ अंतरिम संसद
- 26 नवंबर 1949 को बन गई थी ।
- संविधान सभा ने 26 नवम्बर 1949 से 13 मई 1952 तक अंतरिम संसद के रूप में कार्य किया।
- अध्यक्ष → जी.वी. मावलंकर (भारतीय संसद के जनक)।
- अनुच्छेद 380, 388, 391, 392
- अनुच्छेद 393 – संविधान का Title – भारत का संविधान (The Constitution of India) है।
- अनुच्छेद 394 – 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू की तिथि
- शेष उपबंध 26 जनवरी, 1950 से लागू होंगे।
भाग-22 (अनुच्छेद 393 से 395)
- अनु. 393 – इस संविधान का संक्षिप्त नाम (short Title) भारत का संविधान (The Constitution of India) है।
- अनु. 394 – इस अनुच्छेद में 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान के लागु होने की तिथि का उल्लेख है।
- 394 A(a) – राष्ट्रपति को प्राधिकार (Authority) दिया गया है कि वे संविधान को हिन्दी भाषा में अनुवाद करवाएँ तथाउसका प्रकाशन करें।
- 1987 में 58 वें संविधान संशोधन द्वारा 394A नामक नया अनुच्छेद जोड़ा गया अनुच्छेद 394A के तहत राष्ट्रपति का यह दायित्व है कि वे संविधान का हिन्दी में अनुवाद करवाएँ तथा उसका प्रकाशन करें।
- अनु. 395 – इसके द्वारा भारत शासन अधिनियम – 1935, तथा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 को समाप्त (निरसन Repeal ) कर दिया गया पर प्रिवी कौंसिल अधिकारिता उत्सादन अधिनियम – 1949 का निरसन नहीं हुआ।
12th सत्र (24 जनवरी, 1950)
- यह संविधान सभा का अंतिम सत्र था। यह सत्र केवल एक दिन 24 जनवरी, 1950 को हुआ।
- इस दिन संविधान सभा ने राष्ट्रगान तथा राष्ट्रगीत को स्वीकृति प्रदान की।
- इसी दिन अंतरिम राष्ट्रपति के प्रत्याशी के रुप में राजेन्द्र प्रसाद का एकमात्र नामांकन पत्र आया। यह प्रस्ताव जवाहर लाल नेहरू ने रखा तथा इसका समर्थन वलल्लभ भाई पटेल ने किया।
- एकमात्र नामांकन पत्र आने के कारण राजेन्द्र प्रसाद निर्विरोध रुप से अंतरित राष्ट्रपति चुने गए इस चुनाव हेतु निर्वाचन अधिकारी एच.वी.आर. आयंगर थे जो संविधान सभा के सचिव भी थे।
- उसके उपरांत संविधान सभा के पटल पर संविधान की तीन प्रतियाँ पटल पर रखी गई । इनमें से एक प्रति अंग्रेजी भाषा में हस्तलिखित प्रति थी तथा दूसरी प्रति अंग्रेजी भाषा में छपी हुई प्रति थी। तीसरी प्रति हिन्दी भाषा में हस्तलिखित प्रति थी।
- कुल 299 में से संविधान सभा के 284 सदस्यों ने संविधान की तीनों मूल प्रतियों पर हस्ताक्षर किए। 08 महिला सदस्य थी।
- अंग्रेजी की प्रति (हस्तलिखित) –
- नन्दलाल बॉस के नेतृत्व में प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने इटालिक शैली में हाथ से लिखा। उन्होने अपने इस कार्य के लिए वेतन लेने से इंकार कर दिया।
- अंग्रेजी की प्रति (छपी हुई)
- हिंदी की प्रति (हस्तलिखित)
- वसन्त कृष्ण वैद्य ने लिखा।
- अंग्रेजी की प्रति (हस्तलिखित) –
- संविधान पर सर्वप्रथम हस्ताक्षर जवाहर लाल नेहरू ने किए।
- दो सदस्यों ने शपथ ली –
- रतनप्पा भरमप्पा कुमार (बंबई)
- डॉ. वाई एस परमार (हिमाचल प्रदेश)
- संविधान सभा अनिश्चित कल के लिये स्थगित कर दी गई ।
26 जनवरी 1950
- संविधान सभा का अंतर्कालीन संसद (एक सदनीय के रूप में आविर्भाव)
अंतर्कालीन संसद
- 26 नवंबर 1949 को (संविधान सभा ही) बन गई थी।
- एक सदनीय
- निर्वाचित और मनोनीत (पहली संसद अप्रत्यक्ष रूप से)
- विघटन नहीं बल्कि 17 अप्रैल 1952 को अस्तित्व समाप्त
- 15 अगस्त 1947 से 25 जनवरी 1950 तक भारत डोमिनियन स्टेट रहा ।
- भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत
- शासन संचालन अधिनियम 1935 द्वारा
- 26 जनवरी 1950 से अप्रैल 1950 तक (प्रथम निर्वाचित संसद का गठन )
- अंतर्कालीन संसद ने भारतीय संविधान के अनुसार संसद की शक्तियों का प्रयोग किया।
- संविधान सभा डोमिनियन विधानमंडल के रूप में – लभाग 02 वर्ष 01 माह
- प्रथम बैठक – 17 नवंबर 1947
- अंतिम बैठक – 24 नवंबर 1949
- धन्यवाद प्रस्ताव के रूप में राष्ट्रपति अभिभाषण पर चर्चा की प्रथा शुरू
- संविधान का पहला संशोधन – 1951 पारित
- पंजाब में 20 जून 1951 अनुच्छेद 356 का प्रयोग का अनुमोदन किया।
संविधान सभा में प्रमुख पदाधिकारी –
- अस्थायी सभापति : डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा
- अस्थायी उपसभापति : फ्रेंक एंथनी
- अध्यक्ष : राजेन्द्र प्रसाद
- उपाध्यक्ष : एचसी.मुखर्जी तथा वी.टी.कृष्णामाचारी
- संवैधानिक सलाहकार : बी.एन. राव
- इंडियनसिविल सर्विस के सदस्य रहे
- कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश
- कश्मीर राज्य के प्रधानमंत्री
- UNO की सुरक्षा परिषद में भारत जब अस्थायी सदस्य बना (1951-52) तब राव भारत के प्रतिनिधि थे ।
- अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश (1952-53) भी रहे है ।
- सचिव – एच.वी.आर. आयंगर (24 जनवरी को राजेंद्र प्रसाद के निर्वाचन के समय निर्वाचन अधिकारी)
- प्रवक्ता : राजेन्द्र प्रसाद
संविधान सभा की समितियां
संविधान सभा कई समितियों के माध्यम से कार्यरत थी ।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सभापतित्व वाली समितियां –
- कार्य संचालन नियम निर्माण समिति (नियम समिति)
- पहली समिति
- बैठक – 09 दिसंबर 1946
- 1+15 सदस्य – जी.दुर्गाबाई एकमात्र महिला सदस्य
- संचालन समिति
पं.जवाहरलाल नेहरू के सभापतित्व वाली समितियां –
- राज्य समिति – देशी राज्यो से वार्ता हेतु
- संघ शक्ति समिति – शक्तिशाली संघ की वकालत की।
- संघीय संविधान समिति
- प्रारूप समिति द्वारा निश्चित प्रारूप की जांच हेतु विशेष समिति
सरदार वल्लभभाई पटेल के सभापतित्व वाली समितियां –
- प्रांतीय संविधान समिति
- मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों एवं जनजातियों तथा बहिष्कृत क्षेत्रों के लिए सलाहकार समिति (परामर्शदाता समिति)
- इस समिति के अंतर्गत पांच उप-समितियां थीं,जिनमे मुख्य है:-
- मौलिक अधिकार उप-समिति – जे.बी.कृपलानी
- अल्पसंख्यक उप-समिति – एच.सी.मुखर्जी
- इस समिति के अंतर्गत पांच उप-समितियां थीं,जिनमे मुख्य है:-
- पूर्वी पंजाब एवम् पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक समस्याओ पर रिपोर्ट हेतु विशेष समिति
- एकमात्र ऐसी समिति जिसमे सरदार पटेल , राजेंद्र प्रसाद, जवाहर लाल नेहरू, के.एम.मुंशी.व अंबेडकर एक साथ सदस्य थे।
छोटी समितियां –
- सदन समिति – बी. पट्टाभि सीतारमैया
- चीफ कमिश्नर प्रांत संविधान समिति – बी. पट्टाभि सीतारमैया
- कार्य संचालन समिति – डा. के.एम. मुंशी (सर्वाधिक 06 समिति में उपस्थित )
- राष्ट्रध्वज संबंधी तदर्थ समिति- डा. राजेन्द्र प्रसाद
- संविधान सभा के कार्यों के लिए समिति – जी.वी.मावलंकर
- भाषाई प्रांत आयोग – एस.के.धर (जो कि सभा के सदस्य नहीं थे)
- नागरिकता पर तदर्थ समिति – एस. वरदाचारी
- प्रेस दीर्घा समिति – उषा नाथ सेन
- हिंदी अनुवाद समिति – घनश्याम सिंह गुप्ता
अन्य समितियां व आयोग –
- संविधान सभा के कार्यो के लिए समिति – जी.वी.मावलंकर
- मुकुट बिहारी लाल भार्गव (सदस्य)
- राष्ट्रीय ध्वज पर तदर्थ समिति – राजेंद्र प्रसाद (1+9)
- 23 जून 1947 को
- झंडा समिति
- जे.बी. कृपलानी ना तो इसके सभापति थे और ना ही सदस्य थे।
- भाषायी प्रांत आयोग – एस.के.धर (संविधान सभा सदस्य नहीं)
- द्वारा – डॉ. राजेंद्र प्रसाद
- सिफारिश – अंबेडकर
- प्रत्यायन (क्रुडेंशियल) समिति – कृष्णास्वामी अय्यर
संविधान का प्रारूप
- संविधान का पहला प्रारूप संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार बी.एन.राव (नियुक्त लार्ड बेवेल) के नेतृत्व में संविधान सभा के सचिवालय की परामर्श शाखा ने तैयार किया था। इस प्रारूप में 240 अनुच्छेद तथा 13 अनुसूचियाँ थी।
- इस प्रारूप पर विचार कर संविधान का व्यवस्थित एवं सुनियोजित प्रारूप करने के लिए सत्यनारायण सिन्हा ने प्रारूप समिति के गठन का प्रस्ताव रखा। कार्य संचालन समिति की सिफारिश पर 29 अगस्त, 1947 को एक प्रारूप समिति का गठन किया गया।
- 30 अगस्त, 1947 को प्रारूप समिति की पहली बैठक में समिति के सदस्यों द्वारा निर्विरोध रूप से डॉ. भीमराव अम्बेडकर को प्रारूप समिति का सभापति चुन लिया गया। सभी सदस्य भी निर्विरोध निर्वाचित।
- इसमें सात सदस्य थे, जिनके नाम इस प्रकार हैं:
- डॉक्टर बी.आर. अंबेडकर (अध्यक्ष)
- एन. गोपालस्वामी आयंगार
- अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर
- डॉक्टर के.एम. मुंशी – एकमात्र कांग्रेसी सदस्य
- सैय्यद मोहम्मद सादुल्ला – मुस्लिम लीग से संबंधित
- एन. माधव राव (इन्होंने बी.एल. मित्र की जगह ली, जिन्होंने स्वास्थ्य कारणों से त्याग-पत्र दे दिया था)
- टी.टी. कृष्णामाचारी (इन्होंने सन् 1948 में डी.पी. खेतान की मृत्यु के बाद उनकी जगह ली)
- रिक्ति पर सभाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद द्वारा नामजद किया गया।
- प्रारूप पर विचार विमर्श – 114 दिन
- अक्टूबर 1947: संविधान का पहला प्रारूप तैयार किया गया।
- 21 फरवरी 1948: प्रारूप संविधान सभा के अध्यक्ष को प्रस्तुत किया गया।
- प्रारूप समिति द्वारा पुन: विचार किये जाने के उपरांत 26 अक्टूबर, 1948 को संविधान का पुनर्मुद्वित प्रारूप संविधान सभा के अध्यक्ष को सौंपा। अब संविधान के इस प्रारूप में 315 अनुच्छेद तथा 8 अनुसूचियाँ थी।
- 4 नवम्बर, 1948 को भीमराव अम्बेडकर ने इस प्रारूप को संविधान सभा में प्रस्तुत किया । इसी दिन इस पर पहला वाचन शुरु हुआ। संविधान सभा में इस प्रारूप पर निम्नलिखित तीन वाचन हुये-
- प्रथम वाचन – 04 नवम्बर, 1948 – 09 नवम्बर, 1948
- द्वितीय वाचन – 15 नवम्बर, 1948 – 17 अक्टूबर, 1949
- तृतीय वाचन – 14 नवम्बर, 1949 – 26 नवम्बर, 1949
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने ‘द कॉन्सटिट्यूशन एज सैटल्ड बाई द असेंबली बी पास्ड’ प्रस्ताव पेश किया | संविधान के प्रारूप पर पेश इस प्रस्ताव को 26 नवंबर, 1949 को पारित घोषित कर दिया गया और 24 जनवरी 1950 को इस पर अध्यक्ष व सदस्यों के हस्ताक्षर लिए गए। सभा में कुल 299 सदस्यों में से उस दिन केवल 284 सदस्य उपस्थित थे, जिन्होंने संविधान पर हस्ताक्षर किए |
- अंबेडकर – संविधान को संविधान सभा ने जिस रूप में स्वीकार किया है उस रूप में पारित करे।
- 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू करने के लिये पीछे एक विशेष कारण था- जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया गया था। इसी प्रस्ताव के आधार पर 26 जनवरी, 1930 को पूरे देश भर में स्वराज्य दिवस के रूप में मनाया गया बल्कि आगामी प्रत्येक 26 जनवरी को स्वराज्य दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। इसी दिन की स्मृति में भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया।
संविधान सभा ने निम्न कार्य भी किए: –
- इसने 16 मई, 1949 में राष्ट्रमंडल में भारत की सदस्यता का सत्यापन किया।
- इसने 22 जुलाई, 1947 को राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया।
- 22 जुलाई को झंडा दिवस
- प्रस्ताव – पंडित मदन मोहन मालवीय
- इसने 24 जनवरी, 1950 को राष्ट्रीय गान को अपनाया।
- इसने 24 जनवरी, 1950 को राष्ट्रीय गीत को अपनाया।
- इसने 24 जनवरी, 1950 को डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में चुना।
- मुंशी – आयंगर फार्मूला के अन्तर्गत 14 सितम्बर, 1949 को हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकृत किया गया।
मुंशी-आयंगर फार्मूला (1949)
- 12 सितंबर 1949 को के. एम. मुंशी और गोपालस्वामी आयंगर द्वारा यह फार्मूला संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया।
- इसका उद्देश्य हिंदी और अंग्रेजी के प्रयोग को लेकर चल रहे विवादों को सुलझाना था।
- इस फॉर्मूले के माध्यम से यह तय किया गया कि हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं बल्कि राजभाषा का दर्जा दिया जाएगा।
- 14 सितंबर 1949 को इस फॉर्मूले को संविधान सभा ने अंगीकार किया। इसी कारण 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है।
- संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक हिंदी भाषा से संबंधित प्रावधान जोड़े गए।
- महत्वपूर्ण प्रावधान:
- अंग्रेजी का प्रयोग अगले 15 वर्षों तक जारी रहेगा।
- संसद भविष्य में अंग्रेजी के उपयोग और नागरी अंकों पर कानून बना सकती है।
- राष्ट्रपति की अनुमति से उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग किया जा सकता है।
- विधेयकों, अधिनियमों और अध्यादेशों का अनुवाद राज्यों की आधिकारिक भाषा में किया जा सकता है।
संविधान सभा की अध्यक्षता
- विधायिका के रूप में – जी.वी.मावलंकर
- संविधान सभा के रूप में – डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद
संविधान सभा अंतरिम संसद के रूप में –
- भारत स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 में यह प्रावधान किया गया था कि भारत का संविधान निर्मित होने तक भारत का शासन 1935 के अधिनियम के तहत संचालित होगा तथा तब तक कानून निर्माण का कार्य अंतरिम संसद के रूप में संविधान सभा द्वारा ही किया जायेगा।
- संविधान सभा की अध्यक्षता राजेन्द्र प्रसाद करते थे जबकि अंतरिम संसद की अध्यक्षता गणेश वासुदेव मावलंकर करते थे।
- अंतरिम संसद एक सदनीय विधानमण्डल के रूप में थी। भारतीय संविधान का पहला संविधान संशोधन इसी एक सदनीय अंतरिम संसद ने किया था। भारत ने अनुच्छेद 356 का सर्वप्रथम प्रयोग 20 जून, 1951 को किया गया। इसका अनुमोदन इसी अंतरिम संसद ने किया था।
- अंतरिम संसद का विघटन नहीं किया गया बल्कि अनुच्छेद 379 के तहत 17 अप्रैल, 1952 को संसद के दोनों सदनों के गठन के उपरांत इसका अस्तित्व समाप्त हो गया।
संविधान सभा के संबंध में महत्वपूर्ण कथन
ग्रेनविल ऑस्टिन ने संविधान सभा की तीन मुख्य विशेषताएं बतायी है-
- सहमति से निर्णय – उदाहरण- संघीय, भाषायी व अल्पसंख्यकों वाले प्रावधान
- समायोजन का सिद्धांत – संघात्मक व एकात्मक व्यवस्था में समन्वय, केन्द्रीय शासन व पंचायती राज में समन्वय
- परिवर्तन के साथ चयन की कला
- ग्रेनविल ऑस्टिन के अनुसार, संविधान बनाने में भारत का मूल योगदान यह है कि इसकी संविधान सभा ने चयन और समायोजन की कला को दर्शाते हुए सर्वसम्मति पर आधारित निर्णय के माध्यम से एक “सुखद संघ” ( Amicable Union) का निर्माण किया।
- ग्रेनविल ऑस्टिन ने अपने अध्ययन में पाया है कि सर्वोपरि राजनीतिक नेतृत्व में चार नेताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका (राजनीतिक अल्पतन्त्र) रही-
- नेहरू
- पटेल
- राजेन्द्र प्रसाद
- मौलाना अबुल कलाम आजाद
- Book:- द इण्डियन कांस्टीट्यूशन – कॉर्नरस्टोन ऑफ़ ए नेशन – ग्रेनविल ऑस्टिन
- जवाहर लाल नेहरू – “संविधान सभा की मांग पूर्ण आत्मनिर्णय की सामूहिक मांग का प्रतिरूप है।”
- डॉ. अम्बेडकर –
- “यदि नवीन संविधान के अंतर्गत स्थिति खराब होती है तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब है वरन् हमें यह कहना होगा कि मनुष्य ही खराब है।”
- “संविधान की सफलता उन लोगों पर निर्भर करती है जो इसे लागू करेंगे।”
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर –
- “कोई भी संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो यदि उसे क्रियान्वित व्यक्ति बुरे है, तो संविधान भी बुरा हो जाएगा ”
- अंबेडकर को ‘भारत के संविधान के पिता’ के रूप में तथा ‘आधुनिक मनु की संज्ञा’ भी दी जाती है।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद –
- “यदि लोग योग्य चरित्रवान और ईमानदार हैं तो वे एक बुरे संविधान को भी उत्तम संविधान बना सकेंगे और यदि उनमें गुणों का अभाव होगा तो संविधान देश की सहायता नहीं कर सकेगा।’
- “संविधान अच्छा है, लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि इसे लागू करने वाले लोग कैसे हैं।”
- “देश को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।”
- “एक संविधान एक मशीन की तरह बेजान चीज है, इसमें वे लोग जीवन फूँकते हैं जो इसका नियंत्रण करते हैं, भारत में बस कुछ ईमानदार लोगों की आवश्यकता है जिनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि है” [संविधान सभा के समापन सत्र (26 नवम्बर 1949) के दिन]
- हनुमंथैया– संविधान सभा सदस्य ने टिप्पणी की-‘“हम वीणा या सितार का संगीत चाहते थे, लेकिन यहां हम एक इंग्लिश बैंड का संगीत सुन रहे हैं।”
- संविधान सभा द्वारा हाथी को प्रतीक (मुहर) के रूप में अपनाया गया था।
- सर बी.एन. राव को संविधान सभा के लिए संवैधानिक सलाहकार (कानूनी सलाहकार) के रूप में नियुक्त किया गया था।
- एस.एन. मुखर्जी को संविधान सभा का मुख्य प्रारूपकार (चीफ ड्राफ्टमैन) नियुक्त किया गया था।
संविधान सभा की आलोचना
| क्र. | आलोचक / विचारक | आलोचना / टिप्पणी | अतिरिक्त जानकारी / संदर्भ |
| 1 | निराजुद्दीन अहमद | ‘अपवहन समिति’ के सदस्य रहे; संविधान सभा की वैधानिकता और प्रतिनिधित्व पर प्रश्न उठाया | |
| 2 | ग्रेनविले ऑस्टिन | “संविधान सभा एक दलीय देश का एक-दलीय निकाय है। सभा ही कांग्रेस है और कांग्रेस ही भारत है।” | ग्रंथ – The Indian Constitution: A Cornerstone of a Nation तथा Working a Democratic Constitution: The Indian Experience; उन्होंने यह भी कहा कि संविधान के लागू होते ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन गयाफिलाडेल्फिया (1787) के बाद यह सबसे महान राजनीतिक कार्य था। |
| 3 | लॉर्ड विसकाउंट | संविधान सभा को “हिंदुओं का निकाय” कहा | यह टिप्पणी सभा में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व को लेकर की गई थी। |
| 4 | जॉन साइमन | संविधान सभा को हिंदुओं की सभा बताया | सांप्रदायिक दृष्टिकोण का आरोप लगाया गया। |
| 5 | विंस्टन चर्चिल | कहा कि संविधान सभा ने भारत के केवल एक बड़े समुदाय (हिंदू) का प्रतिनिधित्व किया | चर्चिल और एम.आर. जयकर ने दोनों ने इसे प्रभुत्वहीन (non-sovereign) कहा। |
| 6 | एम.आर. जयकर | संविधान सभा प्रभुत्व संपन्न नहीं थी; ब्रिटिश सरकार के अधिकारों के अधीन थी | |
| 7 | जयप्रकाश नारायण | संविधान सभा वास्तव में प्रतिनिधि निकाय नहीं थी | जनता की वास्तविक भागीदारी पर प्रश्न उठाया। |
| 8 | आइवर जेनिंग्स | कहा — “भारतीय संविधान वकीलों का स्वर्ग है।” | उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रवादी दृष्टिकोण में अल्पसंख्यकों के हितों और भावनाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। |
| 9 | लक्ष्मीनारायण साहू | “इस संविधान के आदर्शों का भारत की आत्मा से कोई संबंध नहीं।” | भारतीय परंपरा से विच्छिन्न होने की आलोचना की। |
| नोट : – त्रिकोण – कांग्रेस – संविधान सभा – सरकार | |||
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य :-
- 1765 ई. को एंग्लो इंडियन इतिहास का युग प्रवर्तक कहा – इल्बर्ट ने
- फोर्ट विलियम कॉलेज –
- कोलकाता में, 18 जुलाई 1800 ई.
- कोलकाता में प्राच्य विधाओ एवम भाषाओं का अध्ययन केंद्र
- उद्देश्य – ब्रिटिश अधिकारियों को भारतीय भाषाओं की शिक्षा प्रदान करना
- स्वतंत्रता के बाद पहला विधि आयोग का गठन – 1955 में
- अध्यक्ष – एम सी सीतलवाड़ (भारत के महान्यायवादी )
- बटलर कमेटी (1927)
- भारत सरकार अवम् देसी रियासतों के बीच संबंध सुधारना
- न्यूनतम बहस से पारित प्रस्ताव – सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
- सर्वाधिक विवादित विषय – राष्ट्रभाषा/राजभाषा (मुंशी आयंगर फार्मूला से सुलझा)
- मौलाना आज़ाद ने वयस्क मताधिकार वाले प्रावधान को 15 साल के लिए स्थगित करने का सुझाव दिया था।
- भारत के पहले गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि – इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो
- भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की उद्घोषणा – सी.राजगोपालाचारी (26 जनवरी 1950) , इसके पश्चात डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने शपथ ली।
- 17 अक्टूबर 1949 को संविधान सभा में डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने सभा के सामने प्रस्ताव रखा की उद्देशिका संविधान का अंग बने।
- संविधान दिवस – 26 नवंबर
- शुरुवात – 26 नवंबर 2015 (डॉ. अंबेडकर 125 वीं जयंती)
- 1951 से 2014 तक विधि दिवस के रूप में ।
- महात्मा गांधी – भारत की स्वतंत्रता के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को एक राजनैतिक दल के रूप में भंग कर दिया जाना चाहिए।
