- राजभाषा पर विवाद: 1967 के राजभाषा संशोधन अधिनियम ने केंद्रीय स्तर पर आधिकारिक कामकाज के लिए अंग्रेजी को एक सहयोगी भाषा के रूप में स्थापित किया।
- पुनर्गठन की राजनीति: पोट्टी श्रीरामुलु के आमरण अनशन के कारण आंध्र प्रदेश का गठन हुआ। फ़ज़ल अली आयोग (1955) ने राज्यों के पुनर्गठन के लिए भाषा को आधार माना।
- प्रभावी चुनावी कारक: तमिलनाडु में हिंदी थोपने के खिलाफ आंदोलन और पूर्वोत्तर में असमिया-बंगाली भाषा संघर्ष में विशेष रूप से परिलक्षित हुआ।
- धार्मिक और सांप्रदायिक राजनीति: उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, भाषा अक्सर धार्मिक और सांप्रदायिक राजनीति से जुड़ी होती है, हिंदी हिंदू पहचान का प्रतीक है और उर्दू मुस्लिम पहचान का प्रतिनिधित्व करती है, जिससे सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक आंदोलन होते हैं।
- एक राष्ट्र, एक भाषा पर बहस: अनुच्छेद 351 के आसपास की बहस एक सामान्य राष्ट्रीय भाषा को बढ़ावा देने और भाषाई विविधता के संरक्षण के बीच तनाव को उजागर करती है।
- विभिन्न भाषाई समूहों द्वारा 8वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग → उदा. राजस्थानी की हालिया मांग
- मातृभाषा आधारित शिक्षा पर एनईपी का जोर भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सांस्कृतिक विविधता की मान्यता को दर्शाता है।
इस प्रकार भाषा ने स्वतंत्रता के बाद के युग में एक बड़ी समस्या पैदा की और यह देश की राजनीतिक व्यवस्था पर भारी बोझों में से एक बनी हुई है।
