भारतीय राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण निर्धारक है।
- राजनीतिक लामबंदी और मतदान पैटर्न: पार्टियाँ चुनाव टिकट वितरित करते समय जाति संरचना पर विचार करती हैं। मतदाता अक्सर उम्मीदवारों की जाति पर विचार करते हैं। कांग्रेस पार्टी की प्रारंभिक सफलता उसके “जातियों के गठबंधन” के समर्थन आधार से मिली।
- जाति-आधारित राजनीतिक दल: 1984 में स्थापित बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का एक मजबूत दलित आधार है और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में प्रभावशाली है।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर प्रभाव: जातिगत गतिशीलता ने राजनीतिक आरक्षण के माध्यम से विधायी निकायों में हाशिए पर रहने वाले समूहों (दलित, ओबीसी) का प्रतिनिधित्व बढ़ा दिया है।
- जाति का धर्मनिरपेक्षीकरण और राजनीतिकरण: जाति की पहचान को राजनीतिक लाभ के लिए संगठित किया जाता है, पारंपरिक कठोरता को तोड़ा जाता है और सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा दिया जाता है। रजनी कोठारी ने कहा कि जाति का राजनीतिकरण होता है, न कि राजनीति जाति से प्रभावित होती है।
चुनौतियाँ और आलोचनाएँ
- जाति-आधारित राजनीति ने भागीदारी तो बढ़ा दी है, लेकिन जातिगत हिंसा और संघर्षों को भी बढ़ा दिया है।
- जाति पर ध्यान आर्थिक विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर हावी है।
