कृषि विपणन

e-NAM (राष्ट्रीय कृषि बाजार) भारत सरकार द्वारा वर्ष 2016 में शुरू किया गया एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक व्यापार मंच है, जिसका उद्देश्य कृषि विपणन को पारदर्शी एवं दक्ष बनाना है। यह विभिन्न राज्यों की कृषि उपज मंडियों (APMCs) को डिजिटल प्रणाली से जोड़ता है।

प्रमुख विशेषताएँ
  • पूरे भारत के लिए एकीकृत ऑनलाइन कृषि व्यापार मंच।
  • ई-नीलामी एवं ऑनलाइन बोली की सुविधा।
  • एकल व्यापार लाइसेंस एवं एकल मंडी शुल्क व्यवस्था।
  • खरीदारों एवं व्यापारियों की दूरस्थ भागीदारी संभव।
  • किसानों हेतु डिजिटल एवं मोबाइल भुगतान सुविधा।
  • उचित मूल्य निर्धारण के लिए गुणवत्ता परीक्षण (Assaying) व्यवस्था।
  • कृषि विपणन में बिचौलियों की भूमिका में कमी।
  • किसानों को व्यापक बाजार एवं बेहतर मूल्य प्राप्ति।
  • कई मंडियों में AI/ML आधारित गुणवत्ता परीक्षण तकनीक का उपयोग।

वर्ष 2025-26 तक राजस्थान की लगभग 173 मंडियाँ e-NAM से जुड़ चुकी हैं। e-NAM से जुड़ी कृषक उपहार योजना डिजिटल भुगतान एवं ऑनलाइन बिक्री को प्रोत्साहित करती है।

राजस्थान ने किसानों हेतु मूल्य खोज, पारदर्शिता और बाजार पहुंच में सुधार के लिए कई डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाए हैं, जो उन्हें सीधे बाजारों से जोड़ते हैं और बिचौलियों पर निर्भरता कम करते हैं।

प्रमुख डिजिटल पहलें

  • कृषक उपहार योजना: e-NAM पोर्टल के माध्यम से संचालित — e-NAM से उपज बेचने वाले किसानों को ₹10,000 मूल्य का कूपन (और अधिक बिक्री पर गुणकों में) डिजिटल लॉटरी के माध्यम से मिलता है। 2025-26 में (दिसंबर तक), मंडी व संभाग स्तर पर 798 लॉटरियों के माध्यम से ₹1.38 करोड़ के पुरस्कार वितरित किए गए।
  • राज स्पाइस ऐप: मसाला प्रसंस्करण, व्यापार व निर्यात को बढ़ावा देने हेतु राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड द्वारा शुरू; अब तक लगभग 4,000 व्यापारी पंजीकृत।
  • राजकिसान साथी पोर्टल: “खेती में सुगमता” हेतु एकल-खिड़की पोर्टल, जिसमें ~40 योजनाओं के 150 से अधिक मॉड्यूल व 11 मोबाइल ऐप हैं; DBT के माध्यम से ₹3,566 करोड़ हस्तांतरित (दिसंबर 2025 तक)।
  • राज सहकार पोर्टल: MSP आवेदन, अल्पकालिक फसल ऋण एवं ऑनलाइन भुगतान हेतु एकीकृत सहकारी प्लेटफॉर्म।
  • राज-AIMS: डिजिटल कृषि मिशन के अंतर्गत, आधुनिक कृषि व बाजार प्रबंधन हेतु AI, GIS, ब्लॉकचेन व ड्रोन/UAV को एकीकृत करता है।

सहकारी संस्थाएं राजस्थान की ग्रामीण ऋण एवं विपणन संरचना की रीढ़ हैं, जो एक एकीकृत नेटवर्क के माध्यम से किसानों को सुलभ वित्त, आदान आपूर्ति और उपज विपणन से जोड़ती हैं।

A. संस्थागत नेटवर्क
राजस्थान में 42,858 पंजीकृत सहकारी समितियां हैं, जिनमें 23 फेडरेशन, 24 दुग्ध संघ, 38 उपभोक्ता थोक भंडार, 9,086 प्राथमिक कृषि साख समितियां (PACS), तथा 285 सामान्य विपणन एवं फल व सब्जी सहकारी विपणन समितियां शामिल हैं। ऋण वितरण अल्पकालिक ऋण हेतु 29 केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCB) व दीर्घकालिक ऋण हेतु 36 प्राथमिक भूमि विकास बैंकों के माध्यम से होता है।

B. सहकारी ऋण सहायता

ऋण प्रकारउपलब्धि (2025-26, दिसंबर तक)लक्ष्य
अल्पकालिक फसल ऋण (CCB)30.45 लाख किसानों को ₹18,085.89 करोड़₹25,000 करोड़
मध्यकालिक ऋण (कृषि व गैर-कृषि)₹783.79 करोड़
दीर्घकालिक ऋण (PLDB)₹95.13 करोड़₹209.00 करोड़
उपज गिरवी ऋण3% ब्याज पर 27 किसानों को ₹70.50 लाख

नई समिति गठन स्वीकृत: 1,432 PACS, 288 बड़े आकार की आदिवासी बहुउद्देशीय समितियां (LAMPS), और 32 महिला बहुउद्देशीय समितियां।

C. सहकारी विपणन सहायता

  • 285 क्रय विक्रय समितियों व विपणन समितियों ने ₹890 करोड़ मूल्य की कृषि उपज व ₹357.30 करोड़ मूल्य के कृषि आदान संभाले (2025-26, दिसंबर तक)।
  • RAJFED ने 3,000 मीट्रिक टन उर्वरक व बीज वितरित किए।
  • शीर्ष उपभोक्ता सहकारी संस्था CONFED ने ₹1,073.82 करोड़ का व्यवसाय दर्ज किया।

D. महिला समावेशन
1,035 राजीविका महिला सर्वांगीण विकास सहकारी समितियों ने 8.70 लाख से अधिक महिलाओं को लाभान्वित किया है, जो समावेशी ग्रामीण वित्त में सहकारी मॉडल की भूमिका दर्शाता है।

भूमिका का परीक्षण

  • शक्ति: ऋण-विपणन संबंध प्रत्यक्ष है — भंडारित उपज के विरुद्ध गिरवी ऋण (मात्र 3% ब्याज पर) किसानों को संकटपूर्ण बिक्री से बचाते हैं, वेयरहाउसिंग को सीधे किसान आय सुरक्षा से जोड़ते हुए।
  • सीमा: अल्पकालिक ऋण वितरण (₹18,085.89 करोड़) अभी भी ₹25,000 करोड़ के लक्ष्य से पीछे है (~72%), और दीर्घकालिक ऋण लक्ष्य का केवल 45% पहुंचा — यह दर्शाता है कि व्यापक संस्थागत नेटवर्क के बावजूद सहकारी ऋण की पहुंच अभी अपूर्ण है।

निष्कर्ष: सहकारी संस्थाएं एक संरचनात्मक रूप से सुव्यवस्थित एकीकृत ऋण-एवं-विपणन सुरक्षा जाल प्रदान करती हैं, परंतु ऋण लक्ष्यों के विरुद्ध उपलब्धि अंतराल दर्शाते हैं कि इनकी पूर्ण क्षमता साकार करने हेतु केवल संस्थागत उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक पहुंच का विस्तार ही मुख्य चुनौती बनी हुई है।

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