पशुपालन और सहायक गतिविधियां

राजस्थान में डेयरी क्षेत्र को मजबूत करने में सहकारिताओं की भूमिका

राजस्थान का डेयरी क्षेत्र, जो राज्य की पशुधन अर्थव्यवस्था में प्रमुख योगदान देता है, मुख्य रूप से तीन-स्तरीय सहकारी संरचना के माध्यम से संगठित है — ग्राम स्तर पर डेयरी सहकारी समितियां (DCS), जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ, तथा शीर्ष निकाय राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन (RCDF) लिमिटेड, जयपुर, जिसकी स्थापना 1977 में हुई थी।

प्रमुख योगदान:
  • शीर्ष संस्था: आरसीडीएफ राज्य में सम्पूर्ण डेयरी सहकारी संरचना की एपेक्स (शीर्ष) संस्था है। यह 21+ जिला दुग्ध संघों का संचालन करती है।
  • ब्रांड निर्माण: प्रसिद्ध “सरस” ब्रांड का प्रबंधन और प्रचार करती है, जो राजस्थान में गुणवत्तापूर्ण डेयरी उत्पादों का प्रतीक है।
  • खरीद, प्रसंस्करण एवं विपणन:
    • किसानों से बड़े पैमाने पर दूध की खरीद।
    • दूध, घी, पनीर आदि मूल्यवर्धित उत्पादों का प्रसंस्करण एवं विपणन।
  • बुनियादी ढांचे का विकास:
    • राजस्थान सहकारी डेयरी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (RCDFIDF) को हाल के बजट में दोगुना कर ₹2,000 करोड़ किया गया है।
  • बाजार विस्तार:
    • सरस को राष्ट्रीय ब्रांड बनाने के लिए ₹100 करोड़ आवंटित।
    • एनसीआर, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में आउटलेट्स का विस्तार।
  • किसान सशक्तिकरण: छोटे एवं सीमांत किसानों को सुनिश्चित बाजार, उचित मूल्य और तकनीकी सहायता प्रदान कर ग्रामीण आय में वृद्धि।

सहकारी मॉडल ने राजस्थान के डेयरी क्षेत्र को पारंपरिक गतिविधि से एक पेशेवर, आर्थिक रूप से मजबूत उद्योग में बदल दिया है, जिससे ग्रामीण परिवारों को स्थिर आय मिल रही है और राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है।

ग्रामीण आजीविका में पशुधन क्षेत्र की केंद्रीयता को देखते हुए, राजस्थान पशु स्वास्थ्य, बीमा और देशी नस्लों के संरक्षण हेतु कई लक्षित योजनाएं संचालित करता है।

प्रमुख योजनाएं

  • मुख्यमंत्री मंगला पशु बीमा योजना: 2024-25 में, 5.54 लाख परिवारों को निःशुल्क बीमा पॉलिसियां जारी की गईं, जिसमें 10.63 लाख पशु शामिल; 2025-26 में 42 लाख पशुओं का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें 100% प्रीमियम राज्य सरकार वहन करती है (गाय, भैंस, भेड़, बकरी व ऊंट हेतु निःशुल्क कवरेज 1 दिसंबर 2025 से प्रभावी)।
  • पशु निःशुल्क स्वास्थ्य योजना: बीमार पशुओं हेतु उपलब्ध निःशुल्क दवाओं की संख्या 138 से बढ़ाकर 200 की गई, जिससे पशुपालकों पर वित्तीय बोझ कम हुआ।
  • ऊंट संरक्षण एवं विकास मिशन: ऊंट प्रजनन हेतु वित्तीय सहायता — 25,364 नवजात ऊंट शावकों को ₹17 करोड़ की सहायता, 9,379 ऊंट पालकों को लाभान्वित करते हुए।
  • गौशाला सहायता: पशु देखभाल हेतु सहायता दरें बढ़ाई गईं (बड़े पशु: ₹44 से ₹50/दिन; छोटे पशु: ₹22 से ₹25/दिन); 3,043 गौशालाओं को ₹1,204.90 करोड़ आवंटित (दिसंबर 2025 तक)।
  • नंदीशाला जनसहभागिता योजना: पंचायत समिति स्तर पर नंदीशालाओं (90:10 सरकार-जनसहभागिता वित्तपोषण) के माध्यम से आवारा नर पशुओं की समस्या का समाधान।

शुष्क एवं अर्ध-शुष्क जलवायु, बार-बार पड़ने वाले सूखे और 83% वर्षा आधारित खेती वाले राजस्थान में फसल विफलता का जोखिम बहुत अधिक है। ऐसे में पशुधन ग्रामीण परिवारों के लिए आर्थिक सदमे का अवशोषक (Shock Absorber) का कार्य करता है। यह राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है (कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र के ~25.74% GSVA का हिस्सा) तथा फसल खराब होने पर स्थिर आय प्रदान करता है।

पशुधन लचीली संपत्ति क्यों है?
  • सूखा सहनशीलता: बकरी, भेड़, ऊँट और देशी नस्ल के पशु निम्न गुणवत्ता वाले चारे और न्यूनतम पानी पर भी जीवित रह सकते हैं। वे सूखे के सबसे गंभीर वर्षों में भी दूध, मांस, ऊन और गोबर देना जारी रखते हैं।
  • आर्थिक योगदान: राजस्थान दूध उत्पादन में दूसरे स्थान पर (भारत का 14.5%) और ऊन उत्पादन में प्रथम स्थान पर (~48%) है। पशुधन 80% से अधिक ग्रामीण परिवारों की आजीविका का आधार है।
  • महिला सशक्तिकरण: डेयरी और पिछवाड़े की मुर्गीपालन मुख्यतः महिलाओं द्वारा संचालित गतिविधियाँ हैं, जो नियमित नकद आय प्रदान करती हैं।
  • बहु-उत्पादक: दूध, गोबर (ईंधन एवं उर्वरक), ऊन, मांस और मशीनरी शक्ति — यह एक बहु-कार्यात्मक संपत्ति है।
  • सरकारी सहायता:
    • राजस्थान सहकारी गोपाल क्रेडिट कार्ड: डेयरी किसानों के लिए ₹1 लाख तक ब्याज-मुक्त ऋण
    • राजीविका के अंतर्गत पशु सखी एवं कृषि सखी: 37,000+ महिलाएँ जमीनी स्तर पर विस्तार सेवाएँ प्रदान कर रही हैं।
    • कृत्रिम गर्भाधान एवं नस्ल सुधार कार्यक्रम
    • आरसीडीएफ (RCDF)सरस ब्रांड के माध्यम से दूध की खरीद, प्रसंस्करण एवं विपणन।
आलोचनात्मक परीक्षण (चुनौतियाँ एवं सीमाएँ)
  • चारे एवं पानी की कमी: सूखे में चारे की भारी कमी हो जाती है। कई पशु कुपोषण के कारण मर जाते हैं या अनुत्पादक हो जाते हैं। स्थायी चरागाह मात्र ~4.81% भूमि पर हैं।
  • कम उत्पादकता: देशी नस्लों में दूध उत्पादन कम है। छोटे/सीमांत किसानों के लिए संकरण और चारे का प्रबंधन अभी भी अपर्याप्त है।
  • रोग एवं मृत्यु दर: सूखे के समय फुट एंड माउथ डिजीज, पीपीआर आदि रोगों के प्रकोप बढ़ जाते हैं। दूर-दराज क्षेत्रों में पशु चिकित्सा सेवाएँ कमजोर हैं।
  • बाजार एवं प्रसंस्करण की कमी: सूखे में पशुओं की संकटकालीन बिक्री, कमजोर कोल्ड चेन और सीमित मूल्य संवर्धन से किसानों की आय प्रभावित होती है।
  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: बढ़ता तापमान और अनियमित वर्षा सूखों को अधिक बार-बार और गंभीर बना रही है, जो मजबूत नस्लों को भी चुनौती दे रही है।
  • समानता संबंधी मुद्दे: योजनाओं का लाभ मुख्यतः बड़े पशुपालकों तक ही पहुँचता है; भूमिहीन और अत्यंत गरीब परिवारों को ऋण और बीमा प्राप्त करने में कठिनाई होती है।

निष्कर्ष: पशुधन को वास्तव में टिकाऊ और उच्च आय वाली संपत्ति बनाने के लिए राजस्थान को विजन 2047 के अंतर्गत चारा बैंक, सूखा प्रतिरोधी नस्लें, मजबूत पशु चिकित्सा ढाँचा, महिला-केंद्रित डेयरी सहकारिताएँ और प्रसंस्करण एवं विपणन के बेहतर एकीकरण पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इन संरचनात्मक सुधारों के बिना पशुधन केवल संकटकालीन जीविका का साधन बना रहेगा, न कि समृद्धि का इंजन

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