पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन तथा उनका प्रभाव

पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन तथा उनका प्रभाव: विज्ञान व प्रौद्योगिकी के अंतर्गत पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से होने वाले बदलावों और उनके प्रभावों का अध्ययन करते हैं। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता में कमी, प्रदूषण और संसाधनों के अति-दोहन जैसे कारक पारिस्थितिकी संतुलन को प्रभावित करते हैं, जिससे मानव जीवन, अर्थव्यवस्था और सतत विकास पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन तथा उनका प्रभाव

पर्यावरण को सम्पूर्ण पृथ्वी ग्रह की विरासत तथा सभी संसाधनों परिपूर्णता के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसमें सभी जैविक एवं अजैविक कारक शामिल होते हैं, जो एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

अजैविकजैविक 
विकिरणहरे पौधे
तापमान एवं ऊष्मा प्रवाहमनुष्य
भूगर्भीय अधस्तरपशु
मिट्टीसहजीवी
स्थलाकृतिपरजीवी
गुरुत्वाकर्षणअपघटक
वायुमंडलीय गैसें एवं पवनअहरे पौधे (गैर-हरे पौधे)
अग्नि
जल

रियो शिखर सम्मेलन का इतिहास 1972 में स्वीडन के स्टॉकहोम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानव पर्यावरण सम्मेलन से जुड़ा है।

रियो शिखर सम्मेलन 1992, या UNCED, 3 से 14 जून 1992 तक ब्राज़ील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित किया गया था। यह उस समय राष्ट्राध्यक्षों और सरकारी प्रतिनिधियों की सबसे बड़ी सभाओं में से एक था, जिसमें 178 देशों के नेता और अधिकारी शामिल हुए थे, साथ ही अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि और हजारों गैर-सरकारी संगठन (NGOs) भी इसमें सम्मिलित हुए थे।

रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन 1992 के परिणाम

  • 178 देशों की भागीदारी, जिससे यह अपने समय के सबसे बड़े बहुपक्षीय सम्मेलनों में से एक बना।
  • यूएनएफसीसीसी (UNFCCC) तथा जैव विविधता सम्मेलन (CBD) जैसे विधिक रूप से बाध्यकारी समझौतों को अपनाया गया।
  • रियो घोषणा तथा एजेंडा 21 जैसे सॉफ्ट लॉ उपकरणों की शुरुआत की गई।
  • साझा लेकिन भिन्न-भिन्न उत्तरदायित्व (CBDR) के सिद्धांत को मान्यता दी गई।

UNFCCC (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय)

  • यूएनएफसीसीसी (UNFCCC) जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए अंतर-सरकारी प्रयासों हेतु एक समग्र रूपरेखा प्रदान करता है।
  • इसका उद्देश्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को ऐसे स्तर पर स्थिर करना है, जिससे जलवायु तंत्र में मानवजनित खतरनाक हस्तक्षेप को रोका जा सके तथा पारिस्थितिकी तंत्र को जलवायु परिवर्तन के प्रति प्राकृतिक रूप से अनुकूलन के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
  • UNFCCC को अपनाने के साथ ही वर्ष 1992 में इसका सचिवालय स्थापित किया गया। प्रारंभिक सचिवालय जिनेवा में था। वर्ष 1996 से इसका सचिवालय जर्मनी के बॉन में स्थित है।
  • भारत ने वर्ष 1993 में UNFCCC का अनुमोदन किया।
  • यह वर्ष 1994 में प्रभावी हुआ।
  • UNFCCC का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP) है।
  • यह प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है (जब तक पक्षकार अन्यथा निर्णय न लें)।
  • प्रथम COP – वर्ष 1995, बर्लिन (जर्मनी)।

प्रमुख COP

समझौते 

COP 3 (जापान)

क्योटो प्रोटोकॉल

  • आधार: CBDR (साझा लेकिन भिन्न-भिन्न उत्तरदायित्व) जलवायु परिवर्तन सभी को प्रभावित करता है, लेकिन सभी देश समान रूप से जिम्मेदार नहीं हैं।
    • विकसित देश → ऐतिहासिक प्रदूषक (लंबे समय से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते आए हैं)।
    • विकासशील देश → हाल के प्रदूषक (हाल के वर्षों में उत्सर्जन बढ़ा है)।
    • इसलिए समृद्ध देशों को उत्सर्जन कम करने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।
  • क्योटो प्रोटोकॉल के लक्ष्य
    • यह एक विधिक रूप से बाध्यकारी जलवायु समझौता है।
    • इसमें यूरोपीय संघ तथा 37 विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने की आवश्यकता थी।
    • विकासशील देशों (जैसे भारत, चीन आदि) के लिए कोई अनिवार्य लक्ष्य नहीं थे।
    • यह स्वीकार करता है कि भविष्य में बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं का उत्सर्जन अधिक महत्वपूर्ण होगा।
  • शामिल गैसें – कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄), नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O), हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs), परफ्लोरोकार्बन (PFCs), सल्फर हेक्साफ्लोराइड (SF₆)।
  • सदस्य श्रेणियाँ
    • Annex I – विकसित देश तथा संक्रमणशील अर्थव्यवस्थाएँ (जैसे अमेरिका, यूके, रूस, यूक्रेन आदि)
    • Annex II – Annex I का उपसमूह; विकासशील देशों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करना अनिवार्य
    • Annex B – वे देश जिनके लिए क्योटो उत्सर्जन-घटाने के लक्ष्य निर्धारित थे (2008–12 एवं 2013–20)
    • Non-Annex I – विकासशील देश; कोई बाध्यकारी लक्ष्य नहीं
    • अल्पविकसित देश – सीमित क्षमता के कारण कोई लक्ष्य नहीं

क्योटो तंत्र (लचीले बाजार उपकरण)

  • CDM (क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म) – विकसित देश विकासशील देशों में हरित परियोजनाओं में निवेश करते हैं और बदले में कार्बन क्रेडिट प्राप्त करते हैं।
  • JI (ज्वाइंट इम्प्लीमेंटेशन) – Annex B देश किसी अन्य Annex B देश में परियोजना को वित्त पोषित करता है और उत्सर्जन न्यूनीकरण इकाइयाँ (ERUs) प्राप्त करता है।
  • IET (इंटरनेशनल एमिशन ट्रेडिंग) – जिन देशों के पास अतिरिक्त उत्सर्जन इकाइयाँ (कार्बन क्रेडिट) होती हैं, वे उन्हें अन्य देशों को बेच सकते हैं।

COP 7 (2001)

  • मराकेश, मोरक्को
  • मराकेश समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।
  • क्योटो प्रोटोकॉल के अनुमोदन का मार्ग प्रशस्त किया।

COP 8 (2002)

  • नई दिल्ली, भारत
  • दिल्ली घोषणा पर हस्ताक्षर किए गए।
  • विकसित देशों से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और विकासशील देशों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के प्रयासों का आह्वान किया गया।
  • अल्प विकसित देशों की विकास आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान दिया गया।

COP 13 (2007)

  • बाली, इंडोनेशिया
  • बाली रोड मैप।
  • बाली एक्शन प्लान।

COP 15 (2009)

  • कोपेनहेगन, डेनमार्क
  • विकसित देशों ने 2010–12 के लिए 30 अरब डॉलर की त्वरित वित्तीय सहायता की प्रतिबद्धता।

COP 16 (2010)

  • कैनकुन, मेक्सिको
  • कैनकुन समझौता।
  • ग्रीन क्लाइमेट फंड की स्थापना की गई।

COP 18 (2012)

दोहा, कतर

दोहा संशोधन (2013–2020)

  • दूसरी प्रतिबद्धता अवधि (2013–2020) प्रारंभ की गई।
  • प्रभावी होने हेतु 144 अनुमोदनों की आवश्यकता थी (147 प्राप्त हुए)।
  • लक्ष्य – वर्ष 1990 के स्तर से 18% उत्सर्जन में कमी।

COP 19 (2013) –

  • वारसॉ, पोलैंड
  • REDD+ के लिए वारसॉ फ्रेमवर्क।
  • हानि एवं क्षति के लिए वारसॉ अंतर्राष्ट्रीय तंत्र

COP 21(2015)

  • पेरिस, फ्रांस
  • पेरिस समझौता
  • इस समझौते का उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2°C से नीचे सीमित करना तथा इसे 1.5°C तक सीमित करने के प्रयास करना और मानवजनित ग्रीनहाउस गैसों के शुद्ध उत्सर्जन को शून्य करना है।
  • यह 4 नवंबर 2016 को प्रभावी हुआ।
  • पेरिस समझौते के अंतर्गत प्रत्येक देश को 5 वर्ष में अपनी राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) प्रस्तुत एवं अद्यतन करना होता है, जिसमें ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कमी तथा जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन की योजनाएं शामिल होती हैं।

COP 26(2021)

  • ग्लासगो, यूनाइटेड किंगडम
  • ग्लासगो ब्रेकथ्रू एजेंडा (41 देश + भारत)।
  • कोयले के उपयोग को “चरणबद्ध रूप से कम करने” का आह्वान किया गया।

पंचामृत

  • वर्ष 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता प्राप्त करना।
  • वर्ष 2030 तक कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का 50% नवीकरणीय ऊर्जा से प्राप्त करना।
  • वर्तमान से वर्ष 2030 तक कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में एक बिलियन टन की कमी करना।
  • वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में वर्ष 2030 तक अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता में 45% की कमी करना।
  • वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करना।

COP 27 (2022) 

  • शर्म अल-शेख, मिस्र
  • लॉस एंड डैमेज फंड की स्थापना।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के लिए 3.1 बिलियन डॉलर की योजना।
  • G7 द्वारा संचालित ग्लोबल शील्ड फाइनेंसिंग।
  • अफ्रीकन कार्बन मार्केट इनिशिएटिव।
  • AWARE (Action for Water Adaptation & Resilience)- जल अनुकूलन एवं लचीलापन हेतु कार्यवाही)।
  • मैंग्रोव एलायंस (भारत की भागीदारी)

COP 28(2023)

दुबई

ग्लोबल स्टॉक टेक

  • ग्लोबल स्टॉक टेक (GST) एक प्रक्रिया है, जो जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक प्रगति तथा पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने में देशों के प्रयासों का आकलन करती है।
  • यह एक दो वर्षीय प्रक्रिया है, जो प्रत्येक पांच वर्ष में आयोजित की जाती है।
  • पहला GST वर्ष 2022 में प्रारंभ हुआ और COP 28 (2023) में पूर्ण हुआ। अगला GST वर्ष 2028 में आयोजित होगा।
  • लॉस एंड डैमेज फंड हेतु 700 मिलियन डॉलर की प्रतिबद्धता।
  • वर्ष 2050 तक नेट-ज़ीरो प्राप्त करने के लिए जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध रूप से समाप्त करना।
  • वर्ष 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य – 11,000 गीगावॉट।
  • उत्सर्जन में कमी – 66 देशों द्वारा वर्ष 2050 तक कूलिंग उत्सर्जन में 68% की कमी।
  • वर्ष 2050 तक वैश्विक परमाणु क्षमता को तीन गुना करना।
  • COP 28 में भारत की पहलें :
  • ग्रीन क्रेडिट पहल – पर्यावरण अनुकूल कार्यों हेतु क्रेडिट।
  • LeadIT 2.0 – निम्न-कार्बन औद्योगिक परिवर्तन को समर्थन।
  • मिशन लाइफ।
  • ग्लोबल रिवर सिटीज़ एलायंस – सतत नदी विकास।
  • क्वाड क्लाइमेट वर्किंग ग्रुप – सतत विकास प्रयासों को सुदृढ़ करना।

COP 29(2024)

  • बाकू, अज़रबैजान
  • नया जलवायु वित्त लक्ष्य – COP 29 में न्यू कलेक्टिव क्वांटिफाइड गोल ऑन क्लाइमेट फाइनेंस (नया सामूहिक परिमाणित जलवायु वित्त लक्ष्य) पर महत्वपूर्ण प्रगति हुई। इसका उद्देश्य विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त को वर्ष 2035 तक पूर्व लक्ष्य 100 अरब डॉलर से बढ़ाकर 300 अरब डॉलर प्रति वर्ष करना है, जिसमें विकसित देश अग्रणी भूमिका निभाएंगे। 
  • कार्बन बाज़ार समझौता – COP29 में कार्बन बाजार तंत्र को अंतिम रूप देने हेतु एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसमें देश-से-देश व्यापार तथा संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत एक केंद्रीकृत कार्बन बाज़ार शामिल है।
  • मीथेन कमी की घोषणा – अमेरिका, जर्मनी, यूके तथा यूएई सहित 30 से अधिक देशों ने जैविक अपशिष्ट से मीथेन उत्सर्जन में कमी हेतु COP 29 घोषणा का समर्थन किया (भारत हस्ताक्षरकर्ता नहीं है)।
  • स्वदेशी जनजातियाँ एवं स्थानीय समुदाय – COP29 में जलवायु परिवर्तन से निपटने में स्वदेशी जनजातियों एवं स्थानीय समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका को पुनः मान्यता दी गई।
  • लैंगिक समानता एवं जलवायु परिवर्तन –  लीमा वर्क प्रोग्राम ऑन जेंडर (LWPG) को अगले 10 वर्षों के लिए बढ़ाने का निर्णय लिया गया तथा COP30 (बेलेम, ब्राजील) में नए जेंडर एक्शन प्लान को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
  • परमाणु लक्ष्य – वर्ष 2050 तक वैश्विक परमाणु ऊर्जा क्षमता को तीन गुना करने की प्रतिबद्धता।

COP 30(2025)

ब्राज़िल

थीम पेरिस समझौते के वादों को लागू करना : वादों से आगे बढ़कर उनके कार्यान्वयन पर ध्यान। (डिलिवरिंग ऑन द पेरिस प्रॉमिस – शिफ्टिंग फोकस फ्रॉम प्लेजेज टू इम्प्लीमेंटेशन्स ऑफ इट्स एक्शन्स।)

मुख्य परिणाम – बेलेम पॉलिटिकल पैकेज (अंतिम वक्तव्य से जीवाश्म ईंधन चरणबद्ध समाप्ति का उल्लेख हटाया गया)।

  1. बेलेम हेल्थ एक्शन प्लान (बेलेम स्वास्थ्य कार्य योजना)
    • ब्राज़ील की अध्यक्षता का प्रमुख परिणाम, 13 नवम्बर 2025 (हेल्थ डे) को प्रारंभ।
    • जलवायु प्रभावों के विरुद्ध वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों को सशक्त बनाता है।
    • दो स्तंभों पर आधारित – स्वास्थ्य समानता एवं जलवायु न्याय तथा नेतृत्व एवं शासन में जनभागीदारी।
  2. ट्रॉपिकल फॉरेस्ट्स फॉरएवर फैसिलिटी (TFFF)
    • 6 नवंबर 2025 को लॉन्च – एक आत्मनिर्भर कोष, जो उष्णकटिबंधीय वनों के संरक्षण हेतु प्रदर्शन आधारित भुगतान प्रदान करेगा।
    • उपग्रह निगरानी का उपयोग; केवल वनों के संरक्षण की स्थिति में ही निधि प्रदान की जाएगी।
    • लक्ष्य– 125 बिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाना।
    • ब्राज़ील द्वारा सर्वप्रथम 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश।
  3. बेलेम पॉलिटिकल एग्रीमेंट – अंतिम मसौदे से कई देश असंतुष्ट रहे; 29 देशों ने जीवाश्म ईंधन चरणबद्ध समाप्ति के लिए स्पष्ट रोडमैप के अभाव में अस्वीकार किया।
    • चार प्रमुख मुद्दे –
      • (i) जलवायु वित्त दायित्व – विकासशील देशों द्वारा अनुच्छेद 9.1 के कार्यान्वयन की मांग।
      • (ii) जलवायु-संबंधित व्यापार उपाय – CBAM (कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म) पर चिंता (भारत एवं चीन ने इसे भेदभावपूर्ण बताया)।
      • (iii)  1.5°C लक्ष्य एवं जीवाश्म ईंधन – विकसित देशों द्वारा सशक्त न्यूनीकरण की मांग।
      • (iv) ट्रांसपेरेंसी रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क  – मुख्यतः विकसित देशों द्वारा प्रस्तावित।
  4. सांता मार्टा सम्मेलन (2026)
    • कोलंबिया एवं नीदरलैंड द्वारा घोषित।
    • थीम – जीवाश्म ईंधनों से न्यायसंगत संक्रमण। (जस्ट ट्रांजिशन अवे फ्रॉम फॉसिल फ्यूल्स)
    • मुख्य लक्ष्य – जीवाश्म ईंधनों को समाप्त करने के कानूनी, आर्थिक एवं सामाजिक प्रभाव।
  5. ओपन प्लेनेटरी इंटेलिजेंस नेटवर्क (OPIN)
    • डेटा अंतःक्रियाशीलता हेतु एक मंच, जो वैश्विक जलवायु कार्रवाई के समर्थन के लिए डिजिटल तकनीकों को एकीकृत करता है।
  6. ग्लोबल एथिकल स्टॉक टेक (GES) – 
    • जलवायु कार्रवाई के नैतिक एवं सामाजिक आयामों पर केंद्रित।
    • एशिया संस्करण – नई दिल्ली (सितंबर 2025) में आयोजित।
  7. बेलेम 4X प्रतिज्ञा (सस्टेनेबल फ्यूल्स) – स्वच्छ ईंधन संक्रमण के लिए “कॉल टू एक्शन”।
    • लक्ष्य – वर्ष 2035 तक (2024 के स्तर से) सतत ईंधन की खपत को चार गुना करना।
    • प्रोत्साहित ईंधन– तरल जैव ईंधन, बायोगैस, हाइड्रोजन आदि।
  8. ब्राज़ील की ग्लोबल मुतीराओ रणनीति
    • वैश्विक जलवायु सहयोग हेतु एक डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत।
    • ब्राज़ील की सामुदायिक सहभागिता की परंपरा से प्रेरित।
    • मुख्य क्षेत्र – ऊर्जा, वित्त, व्यापार।
    • उद्देश्य – वादों और उनके क्रियान्वयन के बीच के अंतर को कम करना।

मुख्य परिणाम (विशेषताएँ) :

  • जीवाश्म ईंधनों का उल्लेख नहीं – इस मसौदे में कोयला, तेल और गैस के उपयोग को कम करने या समाप्त करने से संबंधित सभी बिंदु हटा दिए गए हैं।
  • चरणबद्ध समाप्ति के लिए कोई समय-सीमा नहीं – कई देशों के समर्थन के बावजूद जीवाश्म ईंधनों के उपयोग को बंद करने के लिए कोई समय-सीमा या योजना नहीं दी गई है।
  • अधिक जलवायु वित्त, लेकिन भुगतानकर्ता अस्पष्ट –  इसमें वर्ष 2030 तक जलवायु वित्त को तीन गुना करने की बात कही गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि कौन से देश धन उपलब्ध कराएंगे या कैसे करेंगे।
  • नए वित्त लक्ष्य (NCQG) एवं अनुकूलन पर वार्ता जारी – 100 अरब डॉलर के लक्ष्य के स्थान पर नए वित्तीय लक्ष्य तथा अनुकूलन में प्रगति पर चर्चा का उल्लेख किया गया है।
  • विवादास्पद मुद्दों से बचाव –बड़े जीवाश्म ईंधन उत्पादक देशों के दबाव के कारण व्यापार नियमों (जैसे CBAM), न्यायसंगत संक्रमण या कड़े उत्सर्जन कटौती पर कोई ठोस प्रतिबद्धता नहीं दी गई है।

COP 31

  • वर्ष 2026 में तुर्किये मेजबान देश होगा।COP के मेज़बान का चयन मतदान द्वारा नहीं किया जाता, बल्कि सर्वसम्मति से निर्णय लिया जाता है।

COP 32

  • वर्ष 2027 – अदीस अबाबा, इथियोपिया।

मरुस्थलीकरण

मरुस्थलीकरण वह प्रक्रिया है, जिसमें उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे अपनी वनस्पति और जीवों को खोकर बंजर भूमि में बदल जाती है।यह शुष्क क्षेत्रों की जैविक उत्पादकता में प्राकृतिक या मानवजनित कारणों से होने वाली कमी को दर्शाता है। इसका मतलब मौजूदा मरुस्थलों का विस्तार नहीं होता।

पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन तथा उनका प्रभाव

मरुस्थलीकरण के कारण    

  • मरुस्थलीकरण को बढ़ावा देने वाली प्रमुख मानव    गतिविधियां इस प्रकार हैं:
    • खराब कृषि पद्धतियाँ – जैसे फसल चक्र का पालन न करना, मिट्टी की सुरक्षा न करना, रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अधिक उपयोग।
    • प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन – जैसे वनस्पति एवं जल का असंतुलित उपयोग।
    • पशुपालन की खराब पद्धतियाँ – जैसे अत्यधिक चराई, जिससे भूमि का कटाव होता है और वनस्पति का पुनर्जनन रुक जाता है।    
    • शहरीकरण: जलवायु परिवर्तन – जलवायु परिवर्तन और मरुस्थलीकरण के बीच गहरा संबंध है।
    • मरुस्थलीकरण के कारण उपजाऊ मिट्टी और वनस्पति का ह्रास होता है।
    • मिट्टी में बड़ी मात्रा में कार्बन होता है, जो मरुस्थलीकरण के कारण वायुमंडल में मुक्त हो सकता है और इससे वैश्विक जलवायु तंत्र पर प्रभाव पड़ता है।
    • भूमि के संसाधनों का अत्यधिक दोहन   
    • प्राकृतिक आपदाएं:वनोन्मूलन – केवल पेड़ों की कटाई ही नहीं, बल्कि इससे आग लगने जैसी घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है।

वनोन्मूलन

  • वनों की कटाई वह प्रक्रिया है, जिसमें बड़े पैमाने पर पेड़ों या जंगलों को काटकर भूमि का उपयोग कृषि, खनन या शहरी विकास जैसे गैर-वन कार्यों के लिए किया जाता है। इससे आवास का नुकसान, मृदा अपरदन, जैव विविधता में कमी तथा जलवायु परिवर्तन पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।    
  • कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
  • ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित 30वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP 30) का समापन एक राजनीतिक समझौते ‘ग्लोबल मुतीराओ समझौता’ के साथ हुआ। इसके तहत देशों ने दो मुख्य रोडमैप बनाने का निर्णय लिया – एक वनों की कटाई को रोकने और उसे कम करने के लिए तथा दूसरा जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से धीरे-धीरे दूर जाने के लिए।
  • जहाँ वन रोडमैप को व्यापक समर्थन मिला, वहीं अंतिम दस्तावेज़ में जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध समाप्त करने पर कोई बाध्यकारी प्रतिबद्धता शामिल नहीं की गई, जिससे गहरे भू-राजनीतिक मतभेद उजागर हुए।   
  • जीवाश्म ईंधन: COP30 में सबसे विवादास्पद मुद्दाचरणबद्ध समाप्ति की मांग
  • यूरोपीय संघ एवं छोटे द्वीपीय देशों सहित 80 से अधिक देशों ने जीवाश्म ईंधनों, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत हैं, के चरणबद्ध समाप्ति के लिए स्पष्ट प्रावधान की मांग की। उन्होंने स्पष्ट समय-सीमा एवं मापनीय प्रतिबद्धताओं पर जोर दिया।
  • विकासशील देशों का विरोधभारत, चीन, रूस, सऊदी अरब तथा दक्षिण अफ्रीका जैसी प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्थाओं ने बाध्यकारी चरणबद्ध समाप्ति के प्रावधान का विरोध किया। उनके तर्कों में शामिल थे – राष्ट्रीय ऊर्जा आवश्यकताएँ एवं विकास प्राथमिकताएँ, अपर्याप्त जलवायु वित्त को लेकर चिंताएँ तथा एक समान वैश्विक समय-सीमा का विरोध, जो घरेलू परिस्थितियों की अनदेखी करती है।
    • भारत एवं कई ब्रिक्स देशों ने इस बात पर जोर दिया कि ऊर्जा परिवर्तन राष्ट्रीय स्तर पर तय किए जाने चाहिए, न कि बाहरी रूप से थोपे  जाने चाहिए।
  • परिणाम: गैर-बाध्यकारी ‘ट्रांजिशन अवे’ रोडमैप
  • समझौते के रूप में COP30 में जीवाश्म ईंधनों से दूर जाने की व्यापक प्रतिबद्धता अपनाई गई, लेकिन इसमें कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई, कोई अनिवार्य उत्सर्जन कमी का मार्ग नहीं दिया गया तथा औपचारिक COP पाठ से अलग राष्ट्रपति द्वारा एक स्वैच्छिक रोडमैप की घोषणा की गई।

REDD (वनों की कटाई और वन क्षरण से होने वाले उत्सर्जन को कम करना’)

  • यह एक संयुक्त राष्ट्र पहल है (वर्ष 2008 में प्रारंभ), जिसका उद्देश्य विकासशील देशों को वन हानि कम करने में सहायता प्रदान करना है।
  • समर्थन – FAO, UNDP तथा UNEP
  • REDD के उद्देश्य – वनों की कटाई एवं वन क्षरण को कम करना। कार्बन भंडार में वृद्धि करना (वनीकरण, पुनर्वनीकरण एवं बेहतर वन प्रबंधन के माध्यम से)। मापन योग्य उत्सर्जन कमी के लिए वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करना।
  • वनों की कटाई वैश्विक CO₂ उत्सर्जन में बड़ा योगदान देती है। REDD देशों को वनों की रक्षा करने के बदले वित्तीय पुरस्कार देकर उत्सर्जन को कम करता है।

REDD वित्तीय तंत्र

  • देश सबसे पहले वर्तमान या संभावित वनों की कटाई की दरों की पहचान करते हैं।यदि वे इन दरों को कम करते हैं, तो उन्हें वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है।कार्बन को संग्रहित करने के कारण वनों का आर्थिक महत्व बढ़ता है, जिससे उनका संरक्षण लाभकारी बन जाता है।
  • अन्य उपायों की तुलना में REDD कम लागत पर उत्सर्जन कम करने में मदद करता है।बाली एक्शन प्लान (2007 – COP 13) – इसमें REDD को जलवायु परिवर्तन से निपटने के एक महत्वपूर्ण समाधान के रूप में मान्यता दी गई तथा विकासशील देशों में वनों की कटाई से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए नीतियाँ एवं प्रोत्साहन देने की बात कही गई।
  • नोट:- वर्ष 2008 में वन संरक्षण, सतत वन प्रबंधन तथा वन कार्बन भंडार बढ़ाने को भी इसमें शामिल किया गया। इसके बाद इस विस्तारित तंत्र को REDD+ के नाम से जाना गया।

REDD+

  • यह REDD का विस्तारित रूप है, जिसे वर्ष 2010 में (COP-16, कैनकुन समझौते) अपनाया गया।यह विकासशील देशों को निम्न कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है – वनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करना, वनों का संरक्षण करना, सतत वन प्रबंधन करना, वन कार्बन भंडार को बढ़ाना।
  • REDD+ केवल वनों की कटाई रोकने तक सीमित न रहकर वनों के समग्र महत्व को मान्यता देता है।
  • यह परिणाम आधारित भुगतान प्रदान करता है — अर्थात केवल सत्यापित उत्सर्जन कमी के लिए ही आर्थिक सहायता दी जाती है।

भारत एवं राजस्थान में मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण (ISRO – एटलस 2021)

मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण एटलस – इसरो द्वारा प्रकाशित

  • यह एटलस वर्ष 2018–19 की समयावधि के लिए राज्यों के अनुसार क्षरित भूमि का क्षेत्रफल दर्शाता है। यह वर्ष 2003–05 से 2018–19 तक की 15 वर्षों की अवधि में हुए परिवर्तनों का विश्लेषण भी प्रस्तुत करता है।
  • भूमि क्षरण – वर्ष 2018–19 के दौरान भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल (328.72 मिलियन हेक्टेयर) में से लगभग 97.85 मिलियन हेक्टेयर (29.7%) क्षेत्र भूमि क्षरण से प्रभावित हुआ।
  • राज्यवार आँकड़े :
    • देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल की तुलना में मरुस्थलीकरण/भूमि क्षरण से प्रभावित लगभग 23.79% क्षेत्र राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, लद्दाख, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश तथा तेलंगाना में पाया गया।
    • भारत में 2011–13 से 2018–19 के बीच 31 में से 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मरुस्थलीकरण के स्तर में वृद्धि देखी गई।    
  • भारत
    • देश में मरुस्थलीकरण/भूमि क्षरण की सबसे प्रमुख प्रक्रियाएं हैं –जल अपरदन – वर्ष 2018–19 में 11.01%, वर्ष 2011–13 में 10.98% तथा वर्ष 2003–05 में 10.83%।
    • वनस्पति क्षरण – वर्ष 2018–19 में 9.15%, वर्ष 2011–13 में 8.91% तथा वर्ष 2003–05 में 8.60%।
    • पवन अपरदन – वर्ष 2018–19 में 5.46%, वर्ष 2011–13 में 5.55% तथा वर्ष 2003–05 में 5.58%।
  • राजस्थान
    • वर्ष 2018–19 – कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 62.06% (21.23 मिलियन हेक्टेयर) क्षेत्र मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण के अंतर्गत। 
    • वर्ष 2011–13 – 62.90% (21.52 मिलियन हेक्टेयर)।
    • वर्ष 2003–05 – 63.19% (21.62 मिलियन हेक्टेयर)
    • प्रवृत्ति – वर्ष 2011–13 से 2018–19 के बीच क्षरित क्षेत्र में कुल मिलाकर 0.84% (लगभग 2,88,847 हेक्टेयर) की हल्की कमी देखी गई।
अपघटन की प्रक्रियाएँ
  1. पवन अपरदन –
    • 2018–19 में 43.37%, 2011–13 में 44.41%।2011–13 से 2018–19 के बीच लगभग 3.5 लाख हेक्टेयर की कमी।
  2. वनस्पति क्षरण
    • 2018–19 में 7.64%, 2011–13 में 7.62%।2011–13 से 2018–19 के बीच लगभग 8418 हेक्टेयर की वृद्धि।
  3. जल अपरदन
    • 2018–19 में 6.21%, 2011–13 में 6.18%।2011–13 से 2018–19 के बीच लगभग 27,000 हेक्टेयर की वृद्धि।
  4. खारापन
    • 2018–19 में 1.07%, 2011–13 में 1.06%।लगभग 2000 हेक्टेयर की वृद्धि।
  5. अन्य गौण प्रक्रियाएँ:
    • जलभराव, मानवजनित कारक, बंजर/पथरीली भूमि, बस्तियाँ (1% से कम)।

टिप्पणी:-

  1. राजस्थान में भूमि क्षरण का प्रमुख कारण पवन अपरदन है (लगभग 43–45% योगदान)।
  2. पवन अपरदन क्षेत्र में हल्की कमी देखी गई, जबकि वनस्पति एवं जल अपरदन में वृद्धि हुई है।
  3. वर्ष 2003–05 (63.19%) से 2018–19 (62.06%) के बीच कुल मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण में हल्का सुधार देखा गया है।

संयुक्त राष्ट्र मरुस्‍थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD)

  • UNCCD की शुरुआत वर्ष 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन (UNCED) की सिफारिशों के आधार पर हुई, जहां एजेंडा 21 में मरुस्थलीकरण के बढ़ते खतरे को उजागर किया गया और इसके लिए वैश्विक स्तर पर कार्रवाई की आवश्यकता बताई गई।इसे 17 जून 1994 को पेरिस में अपनाया गया तथा दिसंबर 1996 में प्रभावी किया गया। इसका उद्देश्य सतत भूमि प्रबंधन के माध्यम से भूमि क्षरण से निपटने के लिए देशों को एक सहयोगात्मक मंच प्रदान करना है।
  • इसका कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP) प्रत्येक दो वर्ष में आयोजित किया जाता है तथा हाल ही में COP-16 का आयोजन रियाद, सऊदी अरब में हुआ।
  • भारत ने वर्ष 1996 में इस अभिसमय का अनुमोदन किया।
  • मरुस्थलीकरण एवं सूखा से निपटने हेतु विश्व दिवस 2025, जो 17 जून को मनाया जाता है, का विषय है – “रिस्टोर द लैंड, अनलॉक द ऑपर्च्युनिटीज” (भूमि को पुनर्स्थापित करें, अवसरों को खोलें)।

प्रमुख COP

समझौते

COP14

दिल्ली घोषणा (2019)

  • दिल्ली घोषणा में भूमि पुनर्स्थापन की आवश्यकता पर जोर दिया गया है तथा बेहतर भूमि पहुँच, लैंगिक संवेदनशील पहल और मजबूत वैश्विक कार्रवाई की बात कही गई है।

COP15

आबिदजान, कोट डी’आईवोआर (2022)\

  • वैश्विक प्रतिज्ञा – वर्ष 2030 तक एक अरब हेक्टेयर क्षरित भूमि के पुनर्स्थापन का लक्ष्य।
  • प्रतिक्रियात्मक संकट प्रबंधन से हटकर सक्रिय सूखा तैयारी पर ध्यान केंद्रित करने के लिए स्थापित।
  • मुख्य घोषणाएं:आबिदजान कॉल फॉर लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी (दीर्घकालिक स्थिरता हेतु आबिदजान आह्वान)।
  • भूमि पुनर्स्थापन में लैंगिक समानता पर आबिदजान घोषणा।ग्लोबल लैंड आउटलुक 2 रिपोर्ट के प्रत्युत्तर में भूमि, जीवन एवं विरासत घोषणा (“लैंड, लाइफ एंड लेगेसी” घोषणा)।
  • “ड्रॉट इन नंबर्स 2022” रिपोर्ट: वैश्विक स्तर पर बढ़ती चरम मौसम घटनाओं के कारण सूखा तैयारी को प्राथमिकता देने का आह्वान।

COP16

रियाद, सऊदी अरब (2024)

  • ग्लोबल ड्राउट फ्रेमवर्क (GDF) – देशों ने सूखे से निपटने के लिए एक वैश्विक योजना पर कार्य किया। अंतिम फ्रेमवर्क COP17, मंगोलिया (2026) में अपेक्षित है।
  • मुख्य वित्तीय प्रतिबद्धताएं  –मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण एवं सूखे से निपटने के लिए 12 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि की प्रतिबद्धता की गई।
  • रियाद ग्लोबल ड्राउट रेसिलिएंस पार्टनरशिप – 80 संवेदनशील देशों के लिए 12.15 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता, जिसमें से 10 अरब डॉलर केवल अरब समन्वय समूह द्वारा।
  • ग्रेट ग्रीन वॉल (GGW) पहल –
  • इटली – साहेल क्षेत्र के परिदृश्य पुनर्स्थापना हेतु 11 मिलियन यूरो।
  • ऑस्ट्रिया – 22 अफ्रीकी देशों में समन्वय समर्थन हेतु 3.6 मिलियन यूरो।
  • स्वदेशी जनजातियाँ एवं स्थानीय समुदाय
  • निर्णय-निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु अलग मंच बनाए गए।
  • भूमि शासन में सहभागिता सुदृढ़ करने हेतु ‘सेक्रेड लैंड्स घोषणा’ प्रस्तुत की गई।
  • बिज़नेस4लैंड पहल – भूमि पुनर्स्थापन के लिए निजी क्षेत्र की भूमिका, ESG (पर्यावरण, सामाजिक एवं शासन) तथा सतत वित्त पर केंद्रित। वर्तमान में निजी क्षेत्र केवल 6% प्रयासों को वित्तपोषित करता है, जिसे बढ़ाने की आवश्यकता है।
  • विज्ञान-नीति इंटरफेस (SPI) का विस्तार – विज्ञान को नीतिगत मार्गदर्शन में परिवर्तित करने हेतु SPI (COP11, 2013 में स्थापित) के कार्यकाल को जारी रखा गया।

COP17

मंगोलिया (2026)

वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF)

  • इसे वर्ष 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन (UNFCCC) के समय पृथ्वी की प्रमुख पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने में सहायता के लिए स्थापित किया गया था।
  • यह विभिन्न कोषों का एक समूह है, जो जैव विविधता ह्रास, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण तथा भूमि एवं महासागर के स्वास्थ्य पर बढ़ते दबाव जैसी समस्याओं से निपटने के लिए समर्पित है।
  • यह पाँच प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय अभिसमयों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है :
    • मिनामाता कन्वेंशन ऑन मर्करीस्टॉकहोम कन्वेंशन ऑन परसिस्टेंट ऑर्गेनिक पोल्यूटेंट्स (POPs)
    • संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता अभिसमय (UNCBD)
    • संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण से रोकथाम अभिसमय (UNCCD)
    • संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC)

अम्लीय वर्षा

पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन तथा उनका प्रभाव

जलवायु परिवर्तन

  • जलवायु परिवर्तन 21वीं सदी की प्रमुख चुनौतियों में से एक है, जो विश्वभर में पारिस्थितिक तंत्र, मौसम के स्वरूप तथा मानव समाज को प्रभावित कर रहा है।
  • जलवायु किसी क्षेत्र के मौसम की दीर्घकालिक औसत स्थिति को दर्शाती है।
  • पृथ्वी की जलवायु स्थिर नहीं है।आज जब लोग ‘जलवायु परिवर्तन’ की बात करते हैं, तो वे पिछले लगभग 100 वर्षों में हुए उन परिवर्तनों की ओर संकेत करते हैं, जो मुख्य रूप से मानव गतिविधियों के कारण हुए हैं।
  • जलवायु परिवर्तन निरंतर बढ़ती वैश्विक ऊष्मीकरण प्रवृत्ति के मापनीय प्रभावों को दर्शाता है।
  • इसे तापमान, वर्षा, हिमपात तथा पवन पैटर्न में दशकों या उससे अधिक समय तक बने रहने वाले प्रमुख परिवर्तनों के आधार पर मापा जाता है।
  • मानव बड़ी मात्रा में जीवाश्म ईंधनों (कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस) का उपयोग तथा वनों की कटाई करके जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा दे रहे हैं।
  • जब जंगलों को काटा या जलाया जाता है, तो वे कार्बन का भंडारण नहीं कर पाते और यह कार्बन वायुमंडल में उत्सर्जित हो जाता है।

ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक तापमान)

  • यह पृथ्वी के औसत सतही तापमान में होने वाली निरंतर वृद्धि को दर्शाता है, जो मुख्य रूप से मानव गतिविधियों जैसे जीवाश्म ईंधनों के दहन के कारण होती है।कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) एवं मीथेन (CH₄) जैसी ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में ऊष्मा को रोककर ताप वृद्धि के प्रभाव को बढ़ाती हैं।
  • सामान्यतः “वैश्विक ऊष्मीकरण” से तात्पर्य मानव गतिविधियों के कारण ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन से होने वाली ताप वृद्धि से होता है।
ग्रीनहाउस प्रभाव
  • ग्रीनहाउस प्रभाव वह प्रक्रिया है, जिसमें ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी की सतह के पास ऊष्मा को रोककर रखती हैं। इन गैसों को एक कंबल की तरह समझा जा सकता है, जो पृथ्वी को ढककर उसका तापमान संतुलित बनाए रखता है।
  • ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, ओजोन, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरोकार्बन तथा जलवाष्प शामिल हैं। जलवाष्प तापमान में होने वाले बदलाव के अनुसार प्रतिक्रिया करता है और ऊष्मीकरण के प्रभाव को और बढ़ा देता है।
  • ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी के वायुमंडल का हिस्सा हैं। इसी कारण पृथ्वी को ‘गोल्डीलॉक्स ग्रह’ कहा जाता है – जहाँ तापमान न बहुत अधिक गर्म होता है और न ही बहुत ठंडा, जिससे जीवन संभव हो पाता है।प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 15°C बनाए रखने में मदद करता है।
  • एक अनुमान के अनुसार, यदि प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव न हो, तो पृथ्वी की सतह का औसत तापमान लगभग -19°C हो जाता।
  • हालाँकि, पिछले एक शताब्दी में मानव गतिविधियों, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधनों के दहन से कार्बन डाइऑक्साइड एवं अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ा है, जिससे पृथ्वी का ऊर्जा संतुलन प्रभावित हुआ है। इसके कारण वायुमंडल एवं महासागरों में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हुई है।पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर कई दशकों से लगातार बढ़ रहा है, जो पृथ्वी की सतह के पास अतिरिक्त ऊष्मा को रोककर तापमान में वृद्धि का कारण बनता है।
पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन तथा उनका प्रभाव
ग्रीनहाउस गैसें
जलवाष्प
  • प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव में सबसे बड़ा योगदान देती है।
  • मनुष्य इसे सीधे बड़ी मात्रा में उत्सर्जित नहीं करते, लेकिन अन्य ग्रीनहाउस गैसें (विशेष रूप से CO₂) तापमान बढ़ाती हैं → जिससे अधिक वाष्पीकरण होता है → और जलवाष्प की मात्रा बढ़ जाती है।
  • यह वायुमंडल में अल्पकाल के लिए रहती है (जल्दी वाष्पित होकर वर्षा या हिम के रूप में प्राप्त होती है)।
  • यह प्रतिपुष्टि (फीडबैक) के रूप में कार्य करती है, न कि सीधे मानवजनित प्रभाव के रूप में।
कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)
  • यह मनुष्यों द्वारा उत्सर्जित प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है।
  • यह प्राकृतिक कार्बन चक्र (वायु, महासागर, मिट्टी, पौधे) का हिस्सा है।
  • मानवजनित कारण – जीवाश्म ईंधनों का दहन, वनों की कटाई (कार्बन सिंक में कमी), औद्योगिक प्रक्रियाएँ।
  • यह वायुमंडल में सदियों तक बनी रहती है और औद्योगिक क्रांति के बाद ताप वृद्धि का एक प्रमुख कारण है।
मीथेन (CH₄)
  • यह प्राकृतिक रूप से आर्द्रभूमियों से तथा मानवजनित स्रोतों जैसे – पशुधन, धान के खेत एवं भराव क्षेत्र से उत्पन्न होती है।
  • प्राकृतिक गैस के निष्कर्षण एवं परिवहन के दौरान भी इसका रिसाव होता है।
  • यह वायुमंडल एवं मिट्टी में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा हटाई जाती है।
  • यह CO₂ की तुलना में अधिक प्रभावशाली है, लेकिन इसका जीवनकाल कम होता है।
नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O)
  • यह नाइट्रोजन चक्र का एक प्राकृतिक हिस्सा है।
  • मानव गतिविधियों जैसे – कृषि (उर्वरक, खाद), जीवाश्म ईंधनों का दहन, अपशिष्ट जल प्रबंधन तथा औद्योगिक प्रक्रियाओं से इसकी मात्रा बढ़ती है।
  • इसकी उच्च तापन क्षमता पाई जाती है तथा यह वायुमंडल में लंबे समय तक बनी रहती है।
फ्लोरीनयुक्त गैसें
  • ये पूर्णतः औद्योगिक गैसें हैं, प्राकृतिक नहीं।इनका उपयोग रेफ्रिजरेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, एरोसोल तथा ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थों के विकल्प के रूप में किया जाता है।
  • इनकी वैश्विक ऊष्मीकरण क्षमता बहुत अधिक होती है तथा ये लंबे समय तक वायुमंडल में बनी रहती हैं।
  • ये केवल वायुमंडल की ऊपरी परत में उच्च ऊर्जा वाली पराबैंगनी (UV) किरणों द्वारा नष्ट होती हैं।

प्रकार :

  • HFCs (हाइड्रोफ्लोरोकार्बन)
  • PFCs (परफ्लोरोकार्बन)
  • SF₆ (सल्फर हेक्साफ्लोराइड) – अत्यधिक उच्च ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP) वाली गैस।

जलवायु लचीलापन की दिशा में भारत की प्रगति

  • भारत ने वर्ष 2021 में आयोजित 26वें पक्षकार सम्मेलन (COP 26) में वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन प्राप्त करने का संकल्प लिया।
  • भारत ने 30 दिसंबर 2024 को UNFCCC को अपनी चौथी द्विवार्षिक अद्यतन रिपोर्ट (BUR-4) प्रस्तुत की।
  • इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 में कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वर्ष 2019 की तुलना में 7.93% की कमी दर्ज की गई।वर्ष 1850 से 2019 के बीच विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 17% होने के बावजूद, वैश्विक संचयी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारत की ऐतिहासिक हिस्सेदारी प्रतिवर्ष लगभग 4% रही है।
  • वर्ष 2019 में भारत की प्रति व्यक्ति वार्षिक प्राथमिक ऊर्जा खपत 28.7 गीगाजूल (GJ) थी, जो विकसित तथा विकासशील देशों की तुलना में काफी कम है।
कार्बन तटस्थता हेतु जलवायु कार्रवाई पहल
  • सरकार ने देश में पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए विभिन्न पहलें की हैं। कुछ प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं :
1. वन भूमि का हस्तांतरण एवं शमन उपाय
  • प्रतिपूरक वनीकरण – गैर-वन उपयोग के लिए वन भूमि के उपयोग के बदले वनीकरण करना अनिवार्य है, जिसमें मृदा एवं नमी संरक्षण तथा पारिस्थितिक पुनर्स्थापन शामिल है।
  • “एक पेड़ माँ के नाम” वृक्षारोपण अभियान – विश्व पर्यावरण दिवस 2024 पर शुरू किया गया देशव्यापी वृक्षारोपण अभियान।
  • ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम – वर्ष 2023 में शुरू किया गया यह कार्यक्रम चिन्हित क्षरित वन भूमि पर वृक्षारोपण करके ग्रीन क्रेडिट प्राप्त करने पर आधारित है।
  • राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम (NAP) – जन सहभागिता के साथ देशभर के चिन्हित क्षरित वन क्षेत्रों में वनीकरण किया जा रहा है।

2. शहरी जलवायु अनुकूलन एवं निम्न-कार्बन विकास

  • शहरी योजना में अनुकूलन को शामिल करना – भारत की LT-LEDS(दीर्घकालिक कम-उत्सर्जन विकास रणनीति) में शहरी योजना की नीतियों एवं दिशा-निर्देशों में अनुकूलन उपायों को शामिल करने तथा ऊर्जा एवं संसाधनों के दक्ष उपयोग को निम्न-कार्बन विकास के महत्वपूर्ण घटक के रूप में बताया गया है।
  • सतत शहरी योजना नीतियाँ – इसके अंतर्गत शहरी एवं क्षेत्रीय विकास योजना निर्माण एवं कार्यान्वयन (URDPFI) दिशा-निर्देश, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग अधिनियम, स्मार्ट सिटी मिशन, अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (AMRUT), प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) तथा स्वच्छ भारत मिशन (SBM) शामिल हैं।

3. वायु प्रदूषण नियंत्रण एवं स्वच्छ वायु पहल

  • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) – 131 शहरों के लिए शहर-विशिष्ट कार्य योजनाओं के माध्यम से वायु गुणवत्ता में सुधार लाने का लक्ष्य।
  • वित्तपोषण एवं क्रियान्वयन – स्वच्छ भारत मिशन (शहरी), AMRUT, सतत किफायती परिवहन हेतु वैकल्पिक उपाय (SATAT), हाइब्रिड एवं इलेक्ट्रिक वाहनों के तीव्र अपनाने एवं निर्माण योजना (FAME-II) तथा नगर वन योजना जैसी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से।
  • वायु प्रदूषण नियंत्रण उपाय – स्वच्छ ईंधन (CNG/LPG), एथेनॉल मिश्रण, BS-VI ईंधन मानक तथा वायु गुणवत्ता प्रबंधन जैसी पहलें शामिल हैं।

4. तटीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण एवं लचीलापन

  • मैंग्रोव एवं प्रवाल भित्ति संरक्षण – तटीय राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को जलवायु सहनशीलता बढ़ाने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, जिसमें मैंग्रोव संरक्षण शामिल है।
  • एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन योजना (ICZMP) – तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए गुजरात, ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल हेतु तैयार की गई।
  • मैंग्रोव पहल फॉर शोरलाइन हैबिटैट्स एंड टैन्जिबल इनकम्स (MISHTI\मिष्टी) कार्यक्रम – वर्ष 2023 में शुरू किया गया मैंग्रोव पुनर्स्थापन/वनीकरण कार्यक्रम, जो 9 तटीय राज्यों एवं 4 केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करता है।

5. जलवायु लचीलापन हेतु नियामक उपाय

  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत जारी तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) अधिसूचनाएँ (2011 एवं 2019), वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, भारतीय वन अधिनियम, 1927 तथा जैव विविधता अधिनियम, 2002 के माध्यम से जलवायु लचीलेपन को बढ़ाने के लिए प्रावधान किए गए हैं।
  • वर्ष 2019 की CRZ अधिसूचना विशेष रूप से मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियों तथा अन्य महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन पर केंद्रित है।

ब्लैक कार्बन

  • यह गैस नहीं, बल्कि अपूर्ण दहन से बनने वाला ठोस कणीय प्रदूषक (कालिख) है।
  • यह शुद्ध कार्बन कणों से बना होता है।
  • मुख्य स्रोत – डीजल इंजन, बायोमास दहन, ठोस ईंधन से खाना बनाना, वनाग्नि, औद्योगिक दहन।

प्रभाव

  • सूर्य के प्रकाश को अधिक मात्रा में अवशोषित करता है, जिससे वायुमंडल गर्म होता है।
  • हिम एवं ग्लेशियरों पर जमकर एल्बेडो (सौर विकिरण को वापस परावर्तित करने की क्षमता या माप) को कम करता है तथा पिघलने की प्रक्रिया को तेज करता है (हिमालय, हिंदूकुश क्षेत्र)।
  • मानसून, बादलों तथा क्षेत्रीय जलवायु को प्रभावित करता है।
  • वायुमंडल में इसका जीवनकाल कम (कुछ दिन से कुछ सप्ताह) होता है, इसलिए उत्सर्जन नियंत्रित करने पर इसका प्रभाव जल्दी कम हो सकता है।
  • भारत का योगदान – भारत एवं चीन मिलकर वैश्विक ब्लैक कार्बन में लगभग 25–35% योगदान करते हैं, जिसका मुख्य कारण लकड़ी एवं गोबर का दहन, डीजल तथा घरेलू ईंधनों का उपयोग है।
  • नियंत्रण उपाय – उन्नत चूल्हे, बायोगैस, सौर कुकर तथा स्वच्छ ईंधन तकनीक का उपयोग।

ब्राउन कार्बन

  • यह प्रकाश को अवशोषित करने वाला कार्बनिक एरोसोल है (कणीय पदार्थ का हिस्सा, गैस नहीं)।
  • यह सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करता है, लेकिन ब्लैक कार्बन की तुलना में कम प्रभावशाली होता है।

स्रोत

  • बायोमास दहन (विशेष रूप से घरेलू लकड़ी का उपयोग)
  • ठोस ईंधन से खाना बनाना
  • डीज़ल उत्सर्जन
  • कृषि एवं वन दहन
  • कार्बनिक तार जैसे एरोसोल, ह्यूमिक पदार्थ, जैव एरोसोल

ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल

  • यह बताता है कि प्रत्येक गैस वैश्विक ऊष्मीकरण पर कितना प्रभाव डालती है।
  • जलवायु प्रभाव के संदर्भ में किसी ग्रीनहाउस गैस की दो प्रमुख विशेषताएँ होती हैं –वह गैस ऊर्जा को कितनी मात्रा में अवशोषित करती है (जिससे ऊष्मा तुरंत अंतरिक्ष में नहीं जा पाती)।
  • वह गैस वायुमंडल में कितने समय तक बनी रहती है।

गैसग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (100 वर्ष)जीवनकाल (वर्षों में)

  • कार्बन डाइऑक्साइड 1100मीथेन 2112नाइट्रस ऑक्साइड310120हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs)140-11,700   1 – 270 परफ्लोरोकार्बन (PFCs) 6,500-9,200 800-50,000 सल्फर हेक्साफ्लोराइड (SF6)23,9003,200

कार्बन उत्सर्जन

कार्बन कैप्चर एवं भंडारण (CCS) या कार्बन पृथक्करण उन तकनीकों को दर्शाता है, जिनका उद्देश्य वैश्विक ऊष्मीकरण से निपटना है। इसमें बिजली संयंत्रों, औद्योगिक स्थलों या सीधे वायु से CO₂ को पकड़कर उसे स्थायी रूप से भूमिगत भंडारित किया जाता है।

कार्बन पृथक्करण

  • यह कार्बन डाइऑक्साइड या कार्बन के अन्य रूपों का दीर्घकालिक भंडारण है, जिससे वैश्विक ऊष्मीकरण को कम किया जा सके।
  • कार्बन पृथक्करण ‘कार्बन सिंक’ में कार्बन को संग्रहित करके किया जाता है, अर्थात ऐसे क्षेत्र जो कार्बन को अवशोषित करते हैं।
  • प्राकृतिक सिंक – महासागर, वन, मिट्टी आदि।
  • कृत्रिम सिंक – समाप्त तेल भंडार, अनुपयोगी खदानें आदि।
  • कार्बन कैप्चर एवं भंडारण (CCS) के प्रमुख चरण : इसमें तीन मुख्य चरण हैं:
    • कैप्चर – औद्योगिक स्थलों या वायु से CO₂ को अन्य गैसों से अलग करना।
    • परिवहन – प्राप्त CO₂ को भंडारण स्थल तक पाइपलाइन या जहाज के माध्यम से ले जाना।
    • भंडारण – CO₂ को गहराई में भूमिगत या महासागरों में संग्रहित करना, ताकि यह वायुमंडल में न पहुँचे।
कार्बन पृथक्करण के प्रकार
  • महासागरीय पृथक्करण – CO₂ को गहरे महासागरों में प्रत्यक्ष अन्तःक्षेपण या उर्वरीकरण (जैसे फाइटोप्लैंकटन की वृद्धि हेतु लौह उर्वरीकरण) द्वारा संग्रहित किया जाता है।
  • भू-वैज्ञानिक पृथक्करण – CO₂ को प्राकृतिक भूमिगत शैल संरचनाओं (जैसे छिद्रयुक्त चट्टानें, समाप्त तेल भंडार) में संग्रहित किया जाता है। इसे निकट भविष्य के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प माना जाता है।
    • प्रक्रियाएँ:- हाइड्रोडायनेमिक ट्रैपिंग – CO₂ कम पारगम्यता वाली चट्टानों की परतों के नीचे फंस जाती है।विलेयता ट्रैपिंग – CO₂ तरल पदार्थों (जल/तेल) में घुल जाती है।
  • स्थलीय पृथक्करण – CO₂ को पौधों, मिट्टी, वनों तथा कृषि भूमि में संग्रहित किया जाता है।
    • विधियाँ: वनरोपण / पुनर्वनीकरण, मिट्टी में कार्बन की वृद्धि, भूमि प्रबंधन द्वारा अपघटन में कमी, कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि    

कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS)      (नीति आयोग ढांचा)

  • उद्देश्य – डीकार्बोनाइजेशन के लिए CCUS को एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में बढ़ावा देना।
  • सीमेंट, इस्पात आदि जैसे कठिन क्षेत्रों में CO₂ उत्सर्जन को कम करने हेतु तकनीकों का विकास करना।
  • विशेषताएँ: फ्लू गैसों (चिमनियों या दहन संयंत्रों  से निकलने वाली निकास गैसें) और वायुमंडल से CO₂ को कैप्चर करता है।
  • विशेषताएँ – फ्ल्यू गैसों एवं वायुमंडल से CO₂ को कैप्चर किया जाता है।
  • कैप्चर की गई CO₂ का पुनः उपयोग निम्न के निर्माण में किया जाता है : ईंधन (मीथेनॉल, मीथेन),  रेफ्रिजरेंट, निर्माण सामग्री (सीमेंट, प्लास्टिक)
  • यह निम्न क्षेत्रों में सहायक है : एन्हांस्ड ऑयल रिकवरी (EOR), बायो-प्लास्टिक एवं हरित रसायन, खाद्य एवं पेय उद्योगCO₂ के उपयोग से बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होते हैं।

कार्बन सिंक

ग्रीन कार्बन
  • प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम से पौधों एवं मिट्टी में संग्रहित कार्बन को ग्रीन कार्बन कहा जाता है।
  • यह मुख्यतः वनों एवं स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्रों में पाया जाता है।जैव द्रव्य (बायोमास) कार्बन को दशकों या सदियों तक संग्रहीत कर सकता है।
  • ग्रीन कार्बन बढ़ाने के उपाय: वनरोपण, पुनर्वनीकरण, मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाना।
ब्लू कार्बन
  • तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों जैसे – मैंग्रोव, दलदली क्षेत्र एवं समुद्री घास में संग्रहित कार्बन को ब्लू कार्बन कहा जाता है।
  • महत्त्व : उष्णकटिबंधीय वनों की तुलना में 3–5 गुना अधिक कार्बन का भंडारण करते हैं।कार्बन को सदियों से सहस्राब्दियों तक संग्रहित रखते हैं।
  • तटीय अपरदन को रोकते हैं।समुद्री जीवों के प्रजनन के लिए अनुकूल स्थान प्रदान करते हैं।
  • ब्लू कार्बन पहल – तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण एवं पुनर्स्थापन हेतु एक वैश्विक कार्यक्रम, जिसमें IUCN, UNESCO, IOC आदि के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सहयोग शामिल है।

कार्बन क्रेडिट

  • परिभाषा: एक व्यापार योग्य प्रमाणपत्र, जो 1 टन CO₂ या उसके समतुल्य गैसों के उत्सर्जन की अनुमति देता है।
  • संगठन कार्बन क्रेडिट अर्जित करते हैं जब वे :अनुमत सीमा से कम CO₂ उत्सर्जित करते हैं।स्वच्छ तकनीकों का उपयोग करते हैं।
  • उत्सर्जन कम करने वाली प्रक्रियाएँ अपनाते हैं।विकासशील देशों की कंपनियां अतिरिक्त क्रेडिट को विकसित देशों को बेच सकती हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर स्वच्छ उत्पादन को बढ़ावा मिलता है।

कार्बन ऑफसेटिंग

परिभाषा – एक स्थान पर उत्सर्जन को कम करके दूसरे स्थान पर होने वाले उत्सर्जन की भरपाई करना।उदाहरण: वृक्षारोपण, पवन ऊर्जा परियोजनाएँ, सौर ऊर्जा परियोजनाएँ, सामुदायिक हरित परियोजनाएँ

लाभ: स्थानीय रोजगार एवं विकास को बढ़ावा मिलता है।वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कमी आती है।कंपनियों को अपने जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

कार्बन टैक्स

  • परिभाषा – ईंधनों की कार्बन मात्रा के आधार पर लगाया जाने वाला कर।
  • उद्देश्य – जीवाश्म ईंधनों के उपयोग को कम करना तथा स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना।कैप-एंड-ट्रेड की तुलना में लाभ : समझने में सरल, हेरफेर की संभावना कम, दक्षता को बढ़ावा, हरित नवाचार को प्रोत्साहन।
  • भारत का दृष्टिकोण – भारतीय आयातों पर लगाए जाने वाले अनुचित “कार्बन टैक्स” को WTO में चुनौती दी जा सकती है।

कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM)

  • यह यूरोपीय संघ (EU) द्वारा कार्बन-गहन उत्पादों पर लगाया जाने वाला एक टैरिफ है।
  • यह कार्बन लीकेज को रोकने हेतु EU का एक नया साधन है, अर्थात उन वस्तुओं के उत्पादन को गैर-यूरोपीय देशों में स्थानांतरित होने से रोकना, जहाँ उनके उत्पादन पर कार्बन लागत कम या नहीं के बराबर होती है।
  • CBAM वर्ष 2026 से अपने पूर्ण रूप में लागू होगा, जबकि इसकी संक्रमणकालीन अवधि वर्ष 2023 से 2025 तक है।
  • CBAM की संक्रमणकालीन अवस्था 1 अक्टूबर 2023 से प्रारंभ हो चुकी है।
  • कार्बन प्रमाणपत्र – यदि योजना के अनुसार लागू किया गया, तो EU आयातकों को ऐसे कार्बन प्रमाणपत्र खरीदने होंगे, जो उस कार्बन मूल्य के अनुरूप हों, जो वस्तुओं के EU में स्थानीय रूप से उत्पादन होने पर चुकाया जाता।
  • इन प्रमाणपत्रों की कीमत EU के कार्बन क्रेडिट बाजार में नीलामी मूल्य के आधार पर निर्धारित की जाएगी।
  • CBAM, “Fit for 55 in 2030 पैकेज” का हिस्सा है, जो यूरोपीय जलवायु कानून के अनुरूप वर्ष 1990 के स्तर की तुलना में 2030 तक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कम से कम 55% की कमी लाने की EU की योजना है।

भारतीय कार्बन बाज़ार (ICM) एवं कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS)

उत्सर्जन तीव्रता में कमी की दिशा में भारत की प्रगति –

  • भारत ने आर्थिक विकास को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से सफलतापूर्वक अलग किया है।भारत ने वर्ष 2005 से 2019 के बीच उत्सर्जन तीव्रता में 33% की कमी की है।
  • भारत पेरिस समझौते के अंतर्गत अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की दिशा में अग्रसर है।
  • भारतीय कार्बन बाज़ार (ICM) – भारत को वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी के NDC लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता करेगा।
  • ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 – भारतीय कार्बन बाज़ार के लिए नियामक ढाँचा स्थापित करता है।
  • धारा 14(w) के अंतर्गत केंद्र सरकार (BEE के साथ) को कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) निर्दिष्ट करने का अधिकार प्रदान किया गया है।

कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS)

  • उद्देश्य – औपचारिक कार्बन बाज़ार के माध्यम से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का मूल्य निर्धारण करना तथा बाज़ार आधारित प्रोत्साहनों के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था का डीकार्बोनाइजेशन करना।
  • कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) को जुलाई 2024 में अपनाया गया।
  • कार्बन बाज़ार के विस्तार हेतु :
  • अनुपालन तंत्र –
    • बाध्य संस्थाओं (ऊर्जा-गहन उद्योगों) के लिए:निर्धारित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता में कमी के मानकों को पूरा करना अनिवार्य है।
    • जो संस्थाएँ निर्धारित लक्ष्यों से अधिक उपलब्धि प्राप्त करती हैं, उन्हें कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र प्रदान किए जाते हैं।
  • ऑफसेट तंत्र –
  • गैर-बाध्य संस्थाओं के लिए :ऐसी परियोजनाओं का पंजीकरण कर सकते हैं, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम / हटाने / टालने में सहायक हों।
  • इन्हें कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र जारी किए जा सकते हैं।
  • उदाहरण: नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ, ऊर्जा दक्षता परियोजनाएँ, कार्बन हटाने की तकनीकें, अपशिष्ट प्रबंधन, मीथेन उत्सर्जन में कमी से संबंधित परियोजनाएँ।
  • CCTS अनुपालन हेतु चिन्हित नौ क्षेत्र– एल्यूमिनियम, सीमेंट, इस्पात, कागज, क्लोर-एल्कली, उर्वरक, रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल, वस्त्र।

प्रदर्शन, उपलब्धि और व्यापार योजना

  • (PAT) योजना से कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) की ओर संक्रमणPAT योजना (2012) – ऊर्जा दक्षता में सुधार हेतु एक बाज़ार आधारित तंत्र। यह ऊर्जा-गहन क्षेत्रों के नामित उपभोक्ताओं पर लागू होती है।उद्योगों को विशिष्ट ऊर्जा खपत में कमी लाने के लक्ष्य दिए जाते हैं।


कार्बन मूल्य निर्धारण

  • कार्बन मूल्य निर्धारण के अंतर्गत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर वित्तीय लागत निर्धारित की जाती है।
  • प्रदूषकों को उनके द्वारा किए गए पर्यावरणीय नुकसान के लिए भुगतान करना पड़ता है। 
  • यह उद्योगों को प्रोत्साहित करता है : उत्सर्जन में कमी लाने के लिए, स्वच्छ ऊर्जा की ओर स्थानांतरण के लिए, निम्न-कार्बन तकनीकों में निवेश करने के लिए। 

भारत की प्रगति

  • भारत निम्न विकसित कर रहा है : दर-आधारित उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS), स्वैच्छिक कार्बन क्रेडिट तंत्र।
  • दर-आधारित ETS – इसमें कुल उत्सर्जन की कोई सीमा निर्धारित नहीं होती। इसके स्थान पर उद्योगों को उत्सर्जन तीव्रता के मानक (उत्पादन की प्रति इकाई पर उत्सर्जन) दिए जाते हैं।
  • जो कंपनियां निर्धारित मानकों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं, उन्हें कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र प्रदान किए जाते हैं।
  • नई क्रेडिटिंग पद्धतियाँ – 28 मार्च 2025 को ऊर्जा मंत्रालय ने 8 पद्धतियों को स्वीकृति दी, जिनमें शामिल हैं: नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, औद्योगिक ऊर्जा दक्षता, मैंग्रोव वनीकरण एवं पुनर्वनीकरण। ये भारत में स्वैच्छिक कार्बन बाज़ार को समर्थन प्रदान करती हैं।

कार्बन बाज़ार को सुदृढ़ करने हेतु सरकारी प्रयास

मिशन LiFE

  • सतत जीवन शैली के लिए एक वैश्विक अभियान।
  • मुख्य उद्देश्य – व्यवहार में परिवर्तन जैसे अपशिष्ट में कमी, ऊर्जा की बचत एवं पुनर्चक्रण।लोगों को प्रो-प्लैनेट पीपल (P3) बनाना।
  • लक्ष्य :वर्ष 2028 तक 1 अरब वैश्विक नागरिकों को जोड़ना।
  • 80% गांवों एवं शहरी निकायों को हरित समुदायों में परिवर्तित करना।

ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम (GCP)

  • प्रारंभ – 12 अक्टूबर 2023यह एक स्वैच्छिक बाजार आधारित तंत्र है, जो क्षरित वन भूमि पर वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करता है।
  • कार्यप्रणाली – वन विभाग भूमि खंडों को सूचीबद्ध कर ‘लैंड बैंक’ तैयार करता है।
  • प्रतिभागी वृक्षारोपण हेतु भूमि खंड का चयन करते हैं।
  • वृक्षारोपण एवं 10 वर्षों तक संरक्षण के बाद ग्रीन क्रेडिट प्रदान किए जाते हैं।(भूमि का चयन → वृक्षारोपण → 10 वर्षों तक संरक्षण → ग्रीन क्रेडिट प्राप्त)
  • क्रेडिट का सत्यापन – उपग्रह निगरानी, डिजिटल ट्रैकिंग, तृतीय-पक्ष ऑडिटलक्ष्य– वन आच्छादन में वृद्धि, क्षरित भूमि का पुनर्स्थापन, स्वैच्छिक जलवायु कार्रवाई को प्रोत्साहन।

भारतीय कार्बन बाज़ार के लिए राष्ट्रीय संचालन समिति (NSCICM)

  • भूमिका – भारत के कार्बन बाज़ार का प्रबंधन करने वाली सर्वोच्च संस्था।
  • कार्य –कार्बन व्यापार हेतु नियम एवं प्रक्रियाओं की सिफारिश करना।उत्सर्जन तीव्रता के लक्ष्य निर्धारित करना।कार्बन क्रेडिट के जारी करने एवं व्यापार के लिए मार्गदर्शन देना।

प्रकृति 2025

  • कार्बन बाज़ारों पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘प्रकृति 2025’ का आयोजन 24–25 फरवरी 2025 को नई दिल्ली में किया गया।
  • इस सम्मेलन का उद्घाटन 24 फरवरी को ऊर्जा तथा आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल द्वारा किया गया।
  • संयुक्त राष्ट्र की सद्भावना दूत एवं अभिनेत्री दिया मिर्ज़ा भी सम्मेलन में शामिल हुईं।
  • यह सम्मेलन जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु विभिन्न पहलों को एक साथ लाने, जागरूकता बढ़ाने, जानकारी साझा करने एवं संसाधनों को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।

नोट – प्रकृति पुनर्स्थापन कानून (नेचर रेस्टोरेशन लॉ-NRL)

  • यह यूरोपीय संघ (EU) द्वारा लागू एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय कानून है। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन एवं जैव विविधता ह्रास से निपटने के लिए EU में पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण को रोकना एवं उसे पुनर्स्थापित करना है।
  • सदस्य देशों को वर्ष 2030 तक EU की कम से कम 20% भूमि एवं समुद्री क्षेत्रों का पुनर्स्थापन करना होगा।वर्ष 2050 तक सभी ऐसे पारिस्थितिकी तंत्रों को शामिल किया जाना है, जिन्हें पुनर्स्थापन की आवश्यकता है।
  • ” ग्रीन फ्यूचर, नेट जीरो” केवल आकर्षक शब्द नहीं हैं, बल्कि भारत की आवश्यकता एवं प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं, जिससे यह नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश एवं नवाचार के लिए एक प्रमुख गंतव्य बनता है। – प्रधानमंत्रीI
  • RENA नवीकरणीय ऊर्जा सांख्यिकी 2025 के अनुसार, भारत नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित क्षमता में विश्व में चौथे स्थान पर, पवन ऊर्जा में चौथे स्थान पर तथा सौर ऊर्जा क्षमता में तीसरे स्थान पर है।
  • 30 सितम्बर 2025 तक देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता 500 गीगावाट को पार कर 500.89 गीगावाट हो गई है। यह उपलब्धि ऊर्जा क्षेत्र में मजबूत नीतिगत समर्थन, निवेश एवं सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।
पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन तथा उनका प्रभाव

भारत की विद्युत क्षमता

  • गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोत (नवीकरणीय ऊर्जा, जलविद्युत एवं परमाणु ऊर्जा) – 256.09 गीगावाट (कुल का 51% से अधिक)।
    • सौर ऊर्जा – 127.33 गीगावाट।
    • पवन ऊर्जा – 53.12 गीगावाट।
  • जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोत – 244.80 गीगावाट (कुल का लगभग 49%)।
    • नवीकरणीय ऊर्जा वह ऊर्जा है, जो प्राकृतिक संसाधनों से उत्पन्न होती है और निरंतर पुनः प्राप्त होती रहती है। इसमें सूर्य प्रकाश, भू-तापीय ऊष्मा, पवन, ज्वार-भाटा, जल तथा विभिन्न प्रकार के बायोमास शामिल हैं। यह ऊर्जा समाप्त नहीं होती और लगातार नवीनीकृत होती रहती है।



नवीकरणीय ऊर्जा

  • सौर ऊर्जा – सूर्य से प्राप्त ऊर्जा।
  • जलविद्युत ऊर्जा – जल से प्राप्त ऊर्जा।
  • बायोमास ऊर्जा – जलावन लकड़ी, पशु गोबर, जैव अपघटनीय अपशिष्ट एवं फसल अवशेषों के दहन से प्राप्त ऊर्जा।
  • भू-तापीय ऊर्जा – गर्म शुष्क चट्टानों, मैग्मा, गर्म जल स्रोतों एवं प्राकृतिक गीजर से प्राप्त ऊर्जा।
  • महासागरीय तापीय ऊर्जा – समुद्री तरंगों एवं ज्वारीय तरंगों से प्राप्त ऊर्जा।
  • सह-उत्पादन (को-जेनरेशन) – एक ही ईंधन से दो प्रकार की ऊर्जा का उत्पादन।
  • ईंधन कोशिकाओं का भी स्वच्छ ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग किया जा रहा है।

सौर ऊर्जा

  • भारत उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में स्थित है तथा कर्क रेखा कई राज्यों से होकर गुजरती है।
  • इससे देश में सौर ऊर्जा उत्पादन की उच्च क्षमता उपलब्ध होती है।
  • भारतीय उपमहाद्वीप की कुल सौर ऊर्जा क्षमता 748 गीगावाट है।
  • राजस्थान, जम्मू एवं कश्मीर, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश जैसे राज्य/केंद्रशासित प्रदेश देश में सर्वाधिक सौर क्षमता वाले क्षेत्रों में शामिल हैं।
  • जम्मू एवं कश्मीर का पल्लि गाँव पूर्ण रूप से सौर ऊर्जा पर आधारित होकर भारत का पहला कार्बन-न्यूट्रल पंचायत बना है।
  • भारत की कुल स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता 127.33 गीगावाट है।

सौर ऊर्जा क्षेत्र में प्रमुख प्रमुख पहलें :

पीएम सूर्य घर : मुफ्त बिजली योजना

  • पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना एक केंद्रीय योजना है, जिसका कुल बजट 75,021 करोड़ रुपये है।
  • इसका उद्देश्य एक करोड़ भारतीय परिवारों को रूफटॉप सोलर पैनल लगाकर प्रति माह 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली उपलब्ध कराना है।
  • सरकार रूफटॉप सोलर सिस्टम पर 1 किलोवाट के लिए ₹30,000, 2 किलोवाट के लिए ₹60,000 तथा 3 किलोवाट या उससे अधिक के लिए ₹78,000 तक की सब्सिडी प्रदान करती है।
  • यदि कोई परिवार सोलर सिस्टम लगाने के लिए ऋण लेता है, तब भी मासिक ईएमआई का भुगतान करने के बाद वे प्रतिवर्ष लगभग ₹15,000 तक बिजली बिल में बचत कर सकते हैं।

पीएम-कुसुम (प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान)

  • पीएम-कुसुम योजना किसानों को डीजल के स्थान पर सौर ऊर्जा के उपयोग हेतु प्रोत्साहित करती है।
  • किसान नए सोलर पंप लगाने या पुराने पंपों को सोलर पंप में परिवर्तित करने के लिए 30% से 50% तक सब्सिडी प्राप्त कर सकते हैं।
  • वे अपनी भूमि पर 2 मेगावाट तक के सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित कर स्थानीय डिस्कॉम को बिजली बेचकर आय अर्जित कर सकते हैं।
  • इस योजना का क्रियान्वयन राज्य स्तरीय कार्यान्वयन एजेंसियों द्वारा किया जाता है।
  • साथ ही, इसका उद्देश्य भारत में किसानों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा भारत की INDCs के अंतर्गत वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से विद्युत स्थापित क्षमता की हिस्सेदारी को 50% तक बढ़ाने की प्रतिबद्धता को पूरा करना है।

सोलर पार्क योजना

  • सरकार “सोलर पार्क एवं अल्ट्रा मेगा सोलर पावर परियोजनाओं के विकास” नामक योजना चला रही है, जिसका उद्देश्य विद्युत ग्रिड से जुड़े बड़े सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करना है।
  • इसका लक्ष्य मार्च 2026 तक 40 गीगावाट क्षमता स्थापित करना है।
  • बड़े सोलर पार्क अब कम लागत पर बिजली उपलब्ध करा रहे हैं, जबकि गुजरात एवं तमिलनाडु के पवन ऊर्जा संयंत्र भारत की सायंकालीन विद्युत आवश्यकता को पूरा कर रहे हैं।
  • बायो-ऊर्जा परियोजनाएँ रोजगार सृजन के माध्यम से ग्रामीण आय में वृद्धि कर रही हैं।

पीएम जनमन : सौर विद्युतीकरण के माध्यम से PVTG समुदायों का सशक्तिकरण

  • प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (PM JANMAN) को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) की विकास आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु 9 मंत्रालयों के अंतर्गत 11 प्रमुख हस्तक्षेपों के साथ प्रारंभ किया गया है।
  • इस मिशन तथा धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (DA JGUA) के अंतर्गत नई सौर ऊर्जा योजना एक प्रमुख पहल है, जिसका कुल बजट ₹515 करोड़ है। इसका उद्देश्य 18 राज्यों के जनजातीय एवं PVTG क्षेत्रों में एक लाख अविद्युतीकृत घरों का विद्युतीकरण करना है, जिससे दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में समावेशी विकास एवं सतत ऊर्जा की पहुँच सुनिश्चित हो सके।

सोलर पीवी विनिर्माण क्षमता में वृद्धि

  • वर्ष 2014 से भारत की सोलर पीवी सेल निर्माण क्षमता लगभग 21 गुना बढ़कर 2014 में 1.2 गीगावाट से मार्च 2025 तक लगभग 25 गीगावाट हो गई है।इसी प्रकार, सोलर पीवी मॉड्यूल निर्माण क्षमता 2014 में 2.3 गीगावाट से बढ़कर मार्च 2025 तक लगभग 78 गीगावाट हो गई है, जो 34 गुना से अधिक वृद्धि को दर्शाती है।

अन्य महत्वपूर्ण पहलें

  • फ्लोटिंग सोलर परियोजनाएँ – मध्यप्रदेश में ओंकारेश्वर फ्लोटिंग सोलर पार्क एशिया के सबसे बड़े फ्लोटिंग सोलर पार्कों में से एक है, जिसकी प्रस्तावित क्षमता 600 मेगावाट है। इसकी लागत ₹330 करोड़ है, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा ₹49.85 करोड़ का सहयोग प्रदान किया गया है।
  • एग्रीवोल्टाइक्स – इसमें सोलर पैनलों के साथ नीचे खेती करने की सुविधा मिलती है, जिससे भूमि का बेहतर उपयोग एवं किसानों की आय में वृद्धि होती है। दिल्ली का सन मास्टर प्लांट तथा जोधपुर में ICAR द्वारा स्थापित 105 किलोवाट प्रणाली स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की प्रगति को दर्शाते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA)

  • भारत एवं फ्रांस द्वारा वर्ष 2015 में COP21 के दौरान प्रारंभ किया गया, ISA 100 से अधिक देशों का एक वैश्विक गठबंधन है, जो सौर ऊर्जा के माध्यम से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्य कर रहा है।
  • मुख्यालय – गुरुग्राम, हरियाणा।
  • इसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश जुटाना, प्रौद्योगिकी एवं वित्तपोषण की लागत को कम करना तथा सस्ती सौर ऊर्जा समाधानों को बढ़ावा देना है।
  • विशेष रूप से अल्पविकसित देशों एवं लघु द्वीपीय विकासशील देशों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, ISA किफायती एवं प्रभावी ऊर्जा समाधानों के माध्यम से निम्न-कार्बन विकास को बढ़ावा देने का प्रयास करता है।

वन सन – वन वर्ल्ड – वन ग्रिड 

  • ‘वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ (OSOWOG) पहल भारत द्वारा वर्ष 2018 में ISA असेंबली के दौरान प्रारंभ की गई थी। यह ‘सूर्य कभी अस्त नहीं होता’ की अवधारणा पर आधारित एक वैश्विक सौर ग्रिड की परिकल्पना प्रस्तुत करती है।ISA के नेतृत्व में इसका उद्देश्य दक्षिण एशिया से लेकर अफ्रीका एवं यूरोप तक विभिन्न क्षेत्रों के सौर संसाधनों को आपस में जोड़ना है, जिसके लिए अध्ययन एवं रूपरेखाएँ पहले से तैयार की जा रही हैं।

नोट – ग्लोबल सोलर एटलस (GSA)

  • यह विश्व बैंक के ऊर्जा क्षेत्र प्रबंधन सहायता कार्यक्रम द्वारा सोलर्गिस (Solargis) के सहयोग से विकसित एक निःशुल्क वेब-आधारित उपकरण है।
  • ग्लोबल सोलर एटलस विश्वभर में, विशेष रूप से विकासशील देशों में, सौर ऊर्जा क्षमता का आकलन करने हेतु उच्च-रिज़ॉल्यूशन डेटा एवं मानचित्र प्रदान करता है।

पवन ऊर्जा

  • वित्त वर्ष 2024–25 में भारत ने 4.15 गीगावाट पवन ऊर्जा जोड़ी, जिससे कुल स्थापित क्षमता बढ़कर 51.6 गीगावाट हो गई।
  • 31 जुलाई 2025 तक भारत 52.14 गीगावाट स्थापित क्षमता के साथ तटीय पवन ऊर्जा में विश्व में चौथे स्थान पर है।
  • अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच पवन ऊर्जा से 83.35 अरब यूनिट विद्युत उत्पादन हुआ, जो कुल बिजली उत्पादन का 4.56% है।
  • देश में पवन ऊर्जा की संभावित क्षमता 1164 गीगावाट है तथा वार्षिक विनिर्माण क्षमता 18 गीगावाट है।
  • अपतटीय पवन ऊर्जा विकास के लिए राष्ट्रीय अपतटीय पवन ऊर्जा नीति (2015) मार्गदर्शन प्रदान करती है, जिसमें भारत के तटीय क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) नोडल मंत्रालय है।

जैव ऊर्जा

  • भारत में 11.60 गीगावाट जैव ऊर्जा क्षमता स्थापित है। इसे बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय जैव ऊर्जा कार्यक्रम (2021–2026) ₹1715 करोड़ के बजट के साथ प्रारंभ किया गया है, जिसके अंतर्गत देशभर में जैव ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना हेतु केंद्रीय वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं :
  • अपशिष्ट से ऊर्जा कार्यक्रम – शहरी, औद्योगिक एवं कृषि अपशिष्ट/अवशेषों से ऊर्जा उत्पादन हेतु।
  • बायोमास कार्यक्रम – ब्रिकेट एवं पेलेट (कृषि अपशिष्ट, लकड़ी के बुरादे और अन्य जैव-भार को दबाकर बनाए गए संपीड़ित ठोस ईंधन) निर्माण को समर्थन देने तथा उद्योगों में बायोमास (गन्ने के रेशे से रहित) आधारित सह-उत्पादन को बढ़ावा देने हेतु।
  • बायोगैस कार्यक्रम – छोटे (प्रति दिन 1 घन मीटर से 25 घन मीटर) तथा मध्यम आकार के (प्रति दिन 25 घन मीटर से 2500 घन मीटर) बायोगैस संयंत्रों की स्थापना के लिए सहायता प्रदान करने हेतु।

जैव ईंधन (एथेनॉल) मिश्रण

  • भारत अब विश्व का तीसरा सबसे बड़ा एथेनॉल उत्पादक एवं उपभोक्ता है।पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण जून 2022 में 10% से बढ़कर फरवरी 2025 तक 17.98% हो गया है।
  • सरकार का लक्ष्य वर्ष 2025–26 तक 20% मिश्रण प्राप्त करना है, जो पूर्व निर्धारित वर्ष 2030 के लक्ष्य से पहले है।
  • इसे सब्सिडी, कम GST तथा दीर्घकालिक खरीद समझौतों के माध्यम से समर्थन दिया जा रहा है।बायोमास से निर्मित एथेनॉल एवं बायोडीजल प्रमुख जैव ईंधन हैं, जो परिवहन क्षेत्र में जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करने में सहायक हैं।

जलविद्युत (पनबिजली) ऊर्जा

  • देश में 7,133 स्थलों से लगभग 21.1 गीगावाट जलविद्युत क्षमता की संभावना है, जो मुख्यतः पर्वतीय राज्यों में स्थित है।
  • भारत में पहले से ही 5.11 गीगावाट क्षमता स्थापित है तथा कई परियोजनाएँ विकासाधीन हैं।
  • बड़े जलविद्युत एवं पम्प्ड स्टोरेज परियोजनाएँ भी बढ़ रही हैं, जिनकी संभावित क्षमता क्रमशः 133.4 गीगावाट जलविद्युत तथा 181.4 गीगावाट पम्प्ड स्टोरेज है।
  • भारत में 25 मेगावाट तक की जलविद्युत परियोजनाओं को लघु जलविद्युत परियोजना कहा जाता है।
  • सरकार इन परियोजनाओं को टैरिफ सहायता एवं ट्रांसमिशन शुल्क में छूट जैसे लाभ प्रदान करती है।

ग्रीन हाइड्रोजन

  • ग्रीन हाइड्रोजन जल को सौर या पवन ऊर्जा की सहायता से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करके बनाई जाती है।
  • ग्रीन हाइड्रोजन की मांग तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि यह परिवहन, नौवहन तथा इस्पात उत्पादन जैसे कई क्षेत्रों में उत्सर्जन एवं प्रदूषण को कम करने में सहायक है।

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन

  • भारत सरकार द्वारा कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने एवं भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी बनाने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया है।
  • वर्ष 2030 तक प्रति वर्ष 5 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिससे ₹8 लाख करोड़ का निवेश आकर्षित होगा, 6 लाख रोजगार सृजित होंगे तथा जीवाश्म ईंधन आयात में ₹1 लाख करोड़ की बचत होगी।
  • इस दिशा में कांडला, पारादीप तथा तूतीकोरिन बंदरगाहों को हरित हाइड्रोजन हब के रूप में विकसित करने हेतु बंदरगाह, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय द्वारा चिन्हित किया गया है।

राष्ट्रीय लक्ष्यों की समय से पहले प्राप्ति

  • भारत ने अपने प्रमुख COP26 पंचामृत लक्ष्यों में से एक — वर्ष 2030 तक स्थापित विद्युत क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य — पाँच वर्ष पहले ही प्राप्त कर लिया है।
  • यह उपलब्धि स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में भारत के नेतृत्व को दर्शाती है, साथ ही विद्युत ग्रिड की स्थिरता एवं विश्वसनीयता को भी बनाए रखा गया है।
  • नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता प्राप्त करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
  • केवल नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता वर्ष 2014 में 76.37 गीगावाट से बढ़कर वर्ष 2025 में 233.99 गीगावाट हो गई है, जो लगभग तीन गुना वृद्धि को दर्शाती है और स्वच्छ एवं सतत भविष्य की ओर मजबूत कदम है।
राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC)
  • पेरिस समझौते के अंतर्गत प्रत्येक देश को हर 5 वर्ष में अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान प्रस्तुत एवं अद्यतन करने होते हैं, जिनमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने तथा जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिए उनकी योजनाएं शामिल होती हैं।
भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (India’s NDC)
  1. संरक्षण एवं संतुलन की पारंपरिक मूल्यों पर आधारित स्वस्थ एवं सतत जीवन शैली को बढ़ावा देना, जिसमें जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ‘LiFE’ (Lifestyle for Environment) को जन आंदोलन के रूप में प्रोत्साहित करना शामिल है।
  2. वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में वर्ष 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी लाना।
  3. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं कम लागत वाले अंतरराष्ट्रीय वित्त, जिसमें ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) का समर्थन शामिल है, की सहायता से वर्ष 2030 तक कुल स्थापित विद्युत क्षमता का लगभग 50% गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त करना।
  4. अतिरिक्त वन एवं वृक्ष आवरण के माध्यम से वर्ष 2030 तक 2.5 से 3 अरब टन CO₂ समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक विकसित करना।

अन्य

  1. विकसित देशों की तुलना में अधिक जलवायु अनुकूल एवं स्वच्छ विकास मार्ग अपनाना।
  2. कृषि, जल, हिमालय, तटीय क्षेत्र, स्वास्थ्य एवं आपदा प्रबंधन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में निवेश कर जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता बढ़ाना।
  3. शमन एवं अनुकूलन उपायों के समर्थन हेतु घरेलू स्रोतों तथा विकसित देशों से वित्तीय संसाधन जुटाना।
  4. भारत में क्षमता निर्माण करना एवं आधुनिक जलवायु प्रौद्योगिकियों के त्वरित हस्तांतरण को बढ़ावा देना, साथ ही अनुसंधान एवं विकास में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित करना।

अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC)

  • इसकी स्थापना वर्ष 1988 में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा की गई थी।
  • यह संयुक्त राष्ट्र (UN) का एक अंतर-सरकारी निकाय है, जो जलवायु परिवर्तन से संबंधित वैज्ञानिक तथ्यों का आकलन करता है।
  • IPCC का मुख्य उद्देश्य सरकारों को वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना है, ताकि वे जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्रभावी नीतियाँ बना सकें।
  • IPCC ने अपनी पहली आकलन रिपोर्ट (AR) वर्ष 1990 में, दूसरी 1995 में, तीसरी 2001 में, चौथी 2007 में तथा पाँचवीं आकलन रिपोर्ट वर्ष 2014 में प्रकाशित की।

छठी आकलन रिपोर्ट (AR6)       

  • प्रमुख निष्कर्ष
  • अभूतपूर्व वैश्विक तापवृद्धि:
  • मानव गतिविधियों, मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण, वैश्विक तापवृद्धि स्पष्ट रूप से हुई है, जिससे 2011–2020 के दौरान वैश्विक सतही तापमान 1850–1900 की तुलना में 1.1°C तक पहुँच गया है।
  • पहले से ही 1.1 डिग्री सेल्सियस वैश्विक तापमान वृद्धि के साथ, जलवायु प्रणाली में ऐसे बदलाव हो रहे हैं जो सदियों से लेकर हजारों वर्षों में भी पहले कभी नहीं हुए थे, जैसे समुद्र स्तर में वृद्धि, अधिक चरम मौसम घटनाएँ और समुद्री बर्फ का तेजी से गायब होना।
  • ओजोन एक प्राकृतिक विषैली गैस है, जो ऑक्सीजन के 3 परमाणुओं से मिलकर बनी होती है।
  • यह दो अलग-अलग परतों क्षोभमंडल (ट्रोपोस्फीयर) और समतापमंडल (स्ट्रैटोस्फियर) में पाई जाती है।
  • क्षोभमंडल में उपस्थित ओजोन हानिकारक होती है, क्योंकि यह वायु को प्रदूषित करती है और फोटोकेमिकल स्मॉग के निर्माण में योगदान देती है।
  • समताप मंडल में उपस्थित ओजोन लाभकारी होती है, क्योंकि यह हानिकारक पराबैंगनी (UV) विकिरण से सुरक्षा प्रदान करती है। ओजोन समताप मंडल में 16 किमी से 50 किमी की ऊँचाई पर पाई जाती है।
  • ओजोन एक घातक विष है। लेकिन वायुमंडल के ऊपरी स्तरों पर ओजोन एक आवश्यक कार्य करता है। यह सूर्य से आने वाले पराबैंगनी (UV) विकिरण से पृथ्वी की सतह की रक्षा करता है। यह विकिरण जीवों के लिए अत्यधिक हानिकारक होता है, उदाहरण के लिए, यह मनुष्यों में त्वचा कैंसर का कारण बनता है।
  • वायुमंडल के ऊपरी स्तरों पर ओजोन, ऑक्सीजन (O₂) अणुओं पर UV विकिरण की क्रिया से बनता है। उच्च ऊर्जा वाले UV विकिरण कुछ आणविक ऑक्सीजन (O₂) को तोड़कर मुक्त ऑक्सीजन (O) परमाणु बना देते हैं। ये परमाणु फिर आणविक ऑक्सीजन के साथ मिलकर ओजोन बनाते हैं, जैसा कि दर्शाया गया है।

ओजोन परत क्षय

  • समताप मंडल में ओजोन का निर्माण और विनाश एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। समताप मंडल की ओजोन ग्रीन हाउस गैसों में योगदान नहीं देती है।
  • ओजोन परत का क्षय ऊपरी वायुमंडल में उपस्थित ओजोन परत के पतले होने को कहते हैं।
  • वायुमंडल में ओजोन की मात्रा 1980 के दशक में तेजी से कम होने लगी। इस कमी का संबंध क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) जैसे कृत्रिम रसायनों से है, जिनका उपयोग रेफ्रिजरेंट और अग्निशामकों में किया जाता है।
  • ओजोन परत की मोटाई को डॉबसन इकाई (Dobson Unit) में मापा जाता है। यदि ओजोन परत की मोटाई 220 डॉबसन इकाई से कम हो जाती है, तो इसे ओजोन परत में छिद्र कहा जाता है।

ओजोन परत के क्षय के कारण

क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)
  • ये विलायक , स्प्रे एरोसोल, रेफ्रिजरेटर, एयर-कंडीशनर आदि से निकलते हैं।समताप मंडल में क्लोरोफ्लोरोकार्बन के अणु पराबैंगनी (UV) विकिरण द्वारा टूट जाते हैं और क्लोरीन परमाणु मुक्त करते हैं।
  • ये परमाणु ओजोन के साथ अभिक्रिया करके उसे नष्ट कर देते हैं।वायुमंडल में उपस्थित क्लोरीन और ब्रोमीन परमाणु ओजोन के संपर्क में आकर ओजोन अणुओं को नष्ट करते हैं।
  • एक क्लोरीन परमाणु 1,00,000 ओजोन अणुओं को नष्ट कर सकता है। ओजोन का विनाश इसके निर्माण से अधिक तेजी से होता है।
नाइट्रोजन यौगिक

NO₂, NO, N₂O जैसे नाइट्रोजन यौगिक ओजोन परत के क्षय के लिए अत्यधिक जिम्मेदार होते हैं।

ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल (PSCs)
  • नैक्रियस (मोती जैसे) बादल – बहुत कम तापमान पर बनते हैं। ये लंबे, रंगीन और चमकीले बादल होते हैं (10–100 किमी लंबे)।
  • नाइट्रिक अम्ल बादल – ये केवल शुद्ध बर्फ से नहीं बल्कि नाइट्रिक अम्ल + जल से बने होते हैं।
  • गैर-चमकीले नैक्रियस प्रकार के बादल – इनकी रासायनिक संरचना नैक्रियस बादलों जैसी होती है, लेकिन ये धीरे-धीरे बनते हैं, इसलिए इनमें चमक नहीं होती।
  • ये उच्च ऊंचाई वाले बादल केवल बहुत कम तापमान पर बनते हैं और ओजोन परत के क्षय में दो प्रकार से योगदान करते हैं:
    • ये क्लोरीन के कम हानिकारक रूपों को प्रतिक्रियाशील, ओजोन-नष्ट करने वाले रूपों में बदलने के लिए सतह प्रदान करते हैं।
    • ये नाइट्रोजन यौगिकों को हटाते हैं, जो क्लोरीन के विनाशकारी प्रभाव को नियंत्रित करते हैं।
  • हाल के वर्षों में आर्कटिक के ऊपर का वायुमंडल सामान्य से अधिक ठंडा रहा है, और ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल वसंत ऋतु तक बने रहते हैं।
  • इसके परिणामस्वरूप ओजोन का स्तर कम होता जा रहा है।CFCs समताप मंडल में क्लोरीन छोड़ते हैं।
  • क्लोरीन निष्क्रिय रूपों में संग्रहित रहता है: HCl (हाइड्रोजन क्लोराइड), ClONO₂ (क्लोरीन नाइट्रेट)ध्रुवीय समतापमंडलीय बादलों की सतह पर रासायनिक अभिक्रियाएँ निष्क्रिय क्लोरीन को सक्रिय क्लोरीन (Cl / ClO) में बदल देती हैं।
  • उदाहरण: HCl + ClONO₂ → ध्रुवीय समतापमंडलीय बादलों की उपस्थिति में सक्रिय क्लोरीन को तेजी से मुक्त करता है।
  • वसंत ऋतु में जब सूर्य का प्रकाश वापस आता है, तो सक्रिय क्लोरीन ओज़ोन (O₃) को तेजी से नष्ट कर देता है।
ओजोन क्षयकारी पदार्थ 
  • क्लोरो फ्लोरो कार्बन , हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन, हेलॉन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, मिथाइल ब्रोमाइड, ब्रोमोफ्लोरोमीथेन।

ओजोन परत के संरक्षण के लिए प्रयास

वियना कन्वेंशन

  • ओजोन परत के संरक्षण के लिए यह एक बहुपक्षीय पर्यावरणीय समझौता है, जिस पर 1985 में हस्ताक्षर किए गए थे।
  • इसने क्लोरोफ्लोरोकार्बन के उत्पादन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमी लाने के लिए एक रूपरेखा प्रदान की, क्योंकि ये ओजोन परत के विनाश में योगदान करते हैं।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल 1987

  •  इसे ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और उपभोग को कम करने के लिए बनाया गया था, ताकि वायुमंडल में उनकी मात्रा घटाई जा सके और पृथ्वी की ओजोन परत की रक्षा की जा सके।
  • इस संधि पर 16 सितंबर 1987 को हस्ताक्षर के लिए खोला गया था, इसलिए हर वर्ष 16 सितंबर को विश्व ओजोन दिवस मनाया जाता है।
  • 2025 की थीम: विज्ञान से वैश्विक कार्रवाई तक (फ्रॉम साइंस टू ग्लोबल एक्शन) 
  • यह 1989 में लागू हुआ।
  • प्रावधान: सभी सदस्य देशों को क्लोरोफ्लोरोकार्बन के उत्पादन और उपयोग को 1986 के स्तर पर बनाए रखना होगा, जिसमें किसी भी प्रकार की वृद्धि प्रतिबंधित है।

कोपेनहेगन संशोधन (1992)

  • इसने ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के चरणबद्ध उन्मूलन की प्रक्रिया को तेज़ किया और विकसित देशों के लिए हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन के चरणबद्ध उन्मूलन को शामिल किया, जिसकी शुरुआत 2004 से हुई।
  • इस समझौते के तहत विकसित देशों में 1996 तक CFCs, हैलोन, कार्बन टेट्राक्लोराइड और मिथाइल क्लोरोफॉर्म को पूर्ण रूप से समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया।
  • इसके अतिरिक्त, मिथाइल ब्रोमाइड के उपभोग को 1991 के स्तर पर सीमित कर दिया गया।

किगाली संशोधन 

  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अंतर्गत किगाली संशोधन एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसका उद्देश्य हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) के उपभोग को धीरे-धीरे समाप्त करना है।
  • यह एक कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है।
  • HFCs, CO₂ की तुलना में हजारों गुना अधिक ऊष्मा को रोकने की क्षमता रखते हैं।
  • इन गैसों के उत्सर्जन को समाप्त करने से वैश्विक ऊष्मीकरण के प्रभाव को काफी कम किया जा सकता है और इस सदी के अंत तक पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 0.5 डिग्री सेल्सियस तक की तापवृद्धि को रोका जा सकता है।
समूहशामिल देशसे शुरू करेंस्तर कटौती का लक्ष्य
समूह 1विकसित देश2019 2011-1385 प्रतिशत 2036 तक
समूह 2विकासशील देशों सहितचीन और अफ्रीकी राष्ट्र20242020-222045 तक 80 प्रतिशत
समूह 3भारत, पाकिस्तान, ईरान, इराक तथा अरब खाड़ी देश शामिल20282024-262047 तक 85 प्रतिशत।

जब भौतिक पर्यावरण (जल, वायु और भूमि) में कुछ प्रदूषक तत्व मिल जाते हैं या इनकी मात्रा अधिक हो जाती है, तो यह जीवन के लिए कम उपयुक्त या अनुपयुक्त बन जाता है। इसे प्रदूषण कहा जाता है।

प्रदूषकों के प्रकार

  • प्राथमिक प्रदूषक: ये उसी रूप में बने रहते हैं, जिस रूप में इन्हें पर्यावरण में छोड़ा जाता है। जैसे – कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOx, NO), सल्फर के ऑक्साइड (SOx), हाइड्रोकार्बन, कणीय पदार्थ (धूल, राख, नमक के कण), मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड।
  • द्वितीयक प्रदूषक: ये प्राथमिक प्रदूषकों के आपसी अभिक्रिया से बनते हैं। जैसे – पेरॉक्सीएसीटाइल नाइट्रेट (PAN), ओज़ोन (O₃), फोटोकेमिकल स्मॉग, फॉर्मल्डिहाइड (HCHO), सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄)।
  • मात्रात्मक प्रदूषक: ये प्रकृति में पाए जाते हैं, लेकिन जब इनकी मात्रा एक सीमा से अधिक हो जाती है, तो ये प्रदूषक बन जाते हैं।जैसे – कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड।
  • गुणात्मक प्रदूषक: ये प्रकृति में नहीं पाए जाते और मानव निर्मित होते हैं। जैसे – कवकनाशी, शाकनाशी, DDT आदि।
  • जैव अपघटनीय प्रदूषक: ऐसे अपशिष्ट पदार्थ जो सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटित हो जाते हैं। जैसे – सीवेज।
  • अजैव अपघटनीय प्रदूषक: ऐसे प्रदूषक जो सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटित नहीं होते। जैसे – प्लास्टिक, कांच, DDT, भारी धातुओं के लवण, रेडियोधर्मी पदार्थ आदि।

वायु प्रदूषण

वायु विभिन्न गैसों का मिश्रण है। आयतन के अनुसार, इसमें लगभग 78% नाइट्रोजन और लगभग 21% ऑक्सीजन होती है। कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन, मीथेन, ओजोन और जल वाष्प भी बहुत कम मात्रा में उपस्थित होते हैं।

पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन तथा उनका प्रभाव
  • जब वायु अवांछित पदार्थों से दूषित हो जाती है, जिनका जीवित और निर्जीव दोनों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है, तो इसे वायु प्रदूषण कहा जाता है।
  • वे पदार्थ जो वायु को दूषित करते हैं, उन्हें वायु प्रदूषक कहा जाता है।
  • कभी-कभी ऐसे पदार्थ प्राकृतिक स्रोतों से भी आ सकते हैं, जैसे जंगल की आग या ज्वालामुखी विस्फोट से निकलने वाला धुआं और धूल।
  • कुछ मानव गतिविधियों के कारण भी वायुमंडल में प्रदूषक मिलते हैं।
  • वायु प्रदूषकों के स्रोतों में कारखाने, विद्युत संयंत्र, वाहनों से निकलने वाला धुआं तथा जलावन लकड़ी और गोबर के उपलों का जलना शामिल है।

प्रमुख वायु प्रदूषक और उनके स्रोत

प्रदूषकस्रोत प्रभाव
कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO)पेट्रोल, डीज़ल, लकड़ी जैसे कार्बन आधारित ईंधनों के अपूर्ण दहन से। सिगरेट जैसे प्राकृतिक/कृत्रिम उत्पादों के जलने से।रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा को कम करता है, कोशिकाओं की गति को धीमा करता है, भ्रम और मिर्गी का कारण बन सकता है।
कार्बन डाईऑक्साइड (CO₂)कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के जलने से।वैश्विक तापन में योगदान देने वाली प्रमुख ग्रीनहाउस गैस।
क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFCs)वातानुकूलन और प्रशीतन प्रणालियों से उत्सर्जित।समताप मंडल में जाकर ओजोन परत को नष्ट करते हैं, जो पृथ्वी को हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाती है।
सीसा (Lead)पेट्रोल, डीजल, सीसे की बैटरियाँ, पेंट, हेयर डाई उत्पाद आदि।तंत्रिका तंत्र को नुकसान, पाचन समस्याएँ, कैंसर का कारण। विशेष रूप से प्रभावित होते हैं।
ओज़ोन (O₃)ऊपरी वायुमंडल में प्राकृतिक रूप से, भूमि स्तर पर वाहनों व उद्योगों से।समताप मंडल में: UV किरणों से सुरक्षा।भूमि स्तर पर: विषैला, आंखों में जलन, ठंड व न्यूमोनिया के प्रति प्रतिरोधकता में कमी।
नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx)पेट्रोल, डीजल, कोयले जैसे ईंधनों के जलने से।धुंध (स्मॉग), अम्लीय वर्षा का कारण, बच्चों को श्वसन रोगों के प्रति संवेदनशील बनाता है।
निलंबित कणीय पदार्थ (SPM)धुआं, धूल, वाष्प जैसे ठोस कण जो लंबे समय तक हवा में निलंबित रहते हैं।दृश्यता कम करते हैं, सूक्ष्म कण फेफड़ों में जमते हैं, जिससे फेफड़ों को नुकसान व श्वसन समस्याएं होती हैं।
सल्फर डाईऑक्साइड (SO₂)
कोयला जलाने (थर्मल पावर प्लांट्स), कागज़ निर्माण, धातु गलाने जैसे औद्योगिक प्रक्रियाओं से।धुंध और अम्लीय वर्षा का मुख्य कारण, फेफड़ों की बीमारियां उत्पन्न कर सकता है।
स्मॉग

धुआँ + कोहरा (धुएँ वाला कोहरा), जो कोयले के अधिक मात्रा में जलने, वाहनों से निकलने वाले धुएँ और औद्योगिक धुएँ (प्राथमिक प्रदूषक) के कारण बनता है।

सल्फर युक्त स्मॉग 
  • इसे “लंदन स्मॉग” भी कहा जाता है (सबसे पहले लंदन में बना)।
  • यह वायु में सल्फर ऑक्साइड की अधिक मात्रा के कारण बनता है और सल्फर युक्त जीवाश्म ईंधनों, विशेष रूप से कोयले के उपयोग से उत्पन्न होता है (उन्नीसवीं सदी में लंदन में कोयला ऊर्जा का मुख्य स्रोत था और इसके बड़े पैमाने पर जलने के प्रभाव बीसवीं सदी की शुरुआत में देखे गए)।
  • इस प्रकार का स्मॉग वायु में नमी और निलंबित कणीय पदार्थों की अधिक मात्रा के कारण और अधिक बढ़ जाता है।
फोटोकेमिकल स्मॉग 
  • इसे “लॉस एंजेलिस स्मॉग” भी कहा जाता है।
  • यह मुख्य रूप से उन शहरी क्षेत्रों में होता है जहाँ वाहनों की संख्या अधिक होती है (नाइट्रोजन ऑक्साइड इसके प्रमुख उत्सर्जन होते हैं)।
  • फोटोकेमिकल (ग्रीष्मकालीन स्मॉग) तब बनता है जब नाइट्रोजन ऑक्साइड (प्राथमिक प्रदूषक) और कार्बनिक यौगिक (प्राथमिक प्रदूषक) सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में आपस में अभिक्रिया करते हैं।
  • इस प्रक्रिया के लिए धुआँ, कोहरा, नाइट्रोजन ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन, ऑक्सीजन, उच्च तापमान और UV किरणों की आवश्यकता होती है।
  • ये अभिक्रिया करके लाल-भूरे रंग का स्मॉग बनाते हैं।
  • यह (PAN + ओजोन + नाइट्रोजन ऑक्साइड) का मिश्रण होता है।
  • फोटोकेमिकल स्मॉग के प्रमुख रासायनिक प्रदूषक NO, NO₂, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक, ओजोन और PAN (पेरॉक्सीएसीटाइल नाइट्रेट) होते हैं।
  • NO₂ अपने पीले रंग के कारण दृश्यता को कम करता है।
फ्लाई ऐश
  • जब भी ठोस पदार्थ का दहन होता है, तब राख उत्पन्न होती है।फ्लाई ऐश ऐसा ही एक अवशेष है, जो गैसों के साथ वायुमंडल में ऊपर उठ जाता है।
  • फ्लाई ऐश के कण आकार में सूक्ष्म होते हैं और इनमें सिलिका, एल्युमिना, आयरन के ऑक्साइड, कैल्शियम और मैग्नीशियम के ऑक्साइड तथा सीसा, आर्सेनिक, कोबाल्ट और कॉपर जैसी विषैली भारी धातुएँ होती हैं।
  • संघटन
    • एल्युमिनियम सिलिकेट (अधिक मात्रा में)
    • सिलिकॉन डाइऑक्साइड
    • कैल्शियम ऑक्साइड (CaO)

नियंत्रण के उपाय

  • प्रदूषकों को तापीय या उत्प्रेरक दहन द्वारा नष्ट करना।प्रदूषकों को कम विषैले रूप में परिवर्तित करना।
  • कणीय पदार्थ का नियंत्रण: वायु से कणीय प्रदूषकों को हटाने के लिए दो प्रकार के उपकरण — अरेस्टर और स्क्रबर — का उपयोग किया जाता है।
    • अरेस्टर: इनका उपयोग दूषित वायु से कणीय पदार्थों को अलग करने के लिए किया जाता है।
    • स्क्रबर: इनका उपयोग वायु को धूल और गैसों से साफ करने के लिए किया जाता है, जिसमें वायु को सूखे या गीले पैकिंग पदार्थ से होकर गुजारा जाता है।
  • गैसीय प्रदूषकों का नियंत्रण: गैसीय प्रदूषकों को दहन, अवशोषण और अधिशोषण की तकनीकों द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।
  • वाहनों से निकलने वाले धुएँ का नियंत्रण 
    • उच्च दक्षता वाले इंजन का उपयोग (जैसे मल्टीपाइंट फ्यूल इंजेक्शन इंजन)।
    • वाहनों में कैटेलिटिक कन्वर्टर फिल्टर का उपयोग, जो नाइट्रोजन ऑक्साइड को नाइट्रोजन में परिवर्तित करके NOx के संभावित खतरों को कम करता है।
    • सीसा रहित पेट्रोल का उपयोग।
    • संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG) का उपयोग।
    • विद्युत वाहनों का उपयोग।

नीतिगत उपाय

राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम 
  • भारत में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा परिवेशीय वायु गुणवत्ता की निगरानी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है, जिसे राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (NAMP) कहा जाता है।
राष्ट्रीय परिवेशीय वायु गुणवत्ता मानक  
  • राष्ट्रीय परिवेशीय वायु गुणवत्ता मानक (NAAQS) वर्ष 1982 में अधिसूचित किए गए थे; जिन्हें स्वास्थ्य मानकों और भूमि उपयोग के आधार पर 1994 में संशोधित किया गया।
  • देश में 516 शहरों को कवर करने वाले वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों का एक नेटवर्क है।
  • 12 मानकों के लिए राष्ट्रीय परिवेशीय वायु गुणवत्ता निर्धारित की गई है — PM₁₀, PM₂.₅, NO₂, SO₂, CO, ओज़ोन, अमोनिया, सीसा, निकेल, आर्सेनिक, बेंज़ोपाइरीन और बेंजीन।
राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक 
  • वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) वायु गुणवत्ता की स्थिति को लोगों तक सरल भाषा में प्रभावी ढंग से पहुँचाने का एक उपकरण है।
  • AQI की छह श्रेणियाँ होती हैं — अच्छा, संतोषजनक, मध्यम रूप से प्रदूषित, खराब, बहुत खराब और गंभीर।
  • इनमें से प्रत्येक श्रेणी वायु प्रदूषकों की परिवेशीय सांद्रता और उनके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों (जिन्हें स्वास्थ्य ब्रेक पॉइंट कहा जाता है) के आधार पर निर्धारित की जाती है।
  • AQI उप-सूचकांक और स्वास्थ्य ब्रेक पॉइंट आठ प्रदूषकों के लिए निर्धारित किए गए हैं — (PM₁₀, PM₂.₅, NO₂, SO₂, CO, ओज़ोन, NH₃ और Pb)।

श्रेणियाँ

अंक

रंग

मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

अच्छा 

0-50

हरा

न्यूनतम प्रभाव

संतोषजनक 

51-100

हल्का हरा

संवेदनशील लोगों को सांस लेने में मामूली असुविधा

मध्यम 

101- 200

पीला 

फेफड़ों, अस्थमा और हृदय रोग से ग्रसित लोगों को सांस लेने में असुविधा

खराब

201- 300

नारंगी 

लंबे समय तक संपर्क में रहने पर अधिकांश लोगों को सांस लेने में असुविधा

बहुत खराब 

301- 400

लाल

लंबे समय तक संपर्क में रहने पर श्वसन संबंधी बीमारी

गंभीर 

401 +

गहरा लाल 

स्वस्थ लोगों को प्रभावित करता है और पहले से बीमार लोगों पर गंभीर प्रभाव डालता है।

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम

  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जनवरी 2019 में शुरू किया गया।
  • उद्देश्य – सभी संबंधित हितधारकों को शामिल करते हुए 24 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के 131 गैर-प्राप्ति (नॉन-अटेनमेंट) और दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों/शहरी समूहों में वायु गुणवत्ता में सुधार करना
  • NCAP का लक्ष्य 2017-18 को आधार वर्ष मानते हुए 2024-25 तक PM₁₀ की सांद्रता में 20-30% की कमी लाना है।
  • इस लक्ष्य को संशोधित कर 2025-26 तक PM₁₀ के स्तर में 40% तक की कमी लाने या राष्ट्रीय मानकों (60 µg/m³) को प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है।
  • PRANA – गैर-प्राप्ति (नॉन-अटेनमेंट) शहरों में वायु प्रदूषण के विनियमन हेतु पोर्टल, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के कार्यान्वयन की निगरानी तथा शहरों की भौतिक और वित्तीय प्रगति को ट्रैक करने के लिए विकसित किया गया है।

राजवायु  

  • वायु की गुणवत्ता जानने के लिए राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राजस्थान सरकार और यूनिसेफ राजस्थान द्वारा राजवायु ऐप लॉन्च किया गया है।
  • जयपुर, जोधपुर और उदयपुर की वायु गुणवत्ता उपलब्ध है।
  • प्रदूषक — PM₁₀, PM₂.₅, CO, ओज़ोन, NO₂, SO₂
  • अन्य ऐप – दृष्टि ऐप (शोर प्रदूषण से संबंधित मामलों के निपटान हेतु)

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) एक वैधानिक संगठन है, जिसका गठन सितंबर 1974 में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत किया गया था।
  • इसके अतिरिक्त, CPCB को वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत शक्तियां और कार्य सौंपे गए।
  • यह एक फील्ड गठन के रूप में कार्य करता है तथा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के तहत पर्यावरण और वन मंत्रालय को तकनीकी सेवाएं भी प्रदान करता है।
  • जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 में CPCB के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
  • (i) राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में जल धाराओं और कुओं की स्वच्छता को बढ़ावा देना, जल प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और कमी के माध्यम से।
  • (ii) देश में वायु की गुणवत्ता में सुधार करना तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण या कमी करना।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) 

  • यह एक भारतीय वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम के अंतर्गत की गई थी।
  • NGT की स्थापना पर्यावरण संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और त्वरित निपटान के लिए की गई थी।
  • अधिकरण को यह सुनिश्चित करने का दायित्व दिया गया है कि आवेदन या अपीलों का अंतिम निपटान दाखिल होने के 6 महीने के भीतर किया जाए।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण के अध्यक्ष की नियुक्ति भारत सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद की जाती है।

ध्वनि मानक 


क्षेत्र की श्रेणी
शोर स्तर (दिन के समय)शोर स्तर (रात का समय)
औद्योगिक75 डेसिबल70 डेसिबल
व्यावसायिक65 डेसिबल55 डेसिबल
आवासीय 55 डेसिबल45 डेसिबल
मौन क्षेत्र50 डेसिबल40 डेसिबल

 ध्वनि प्रदूषण नियम, 2000 के अंतर्गत अधिसूचित।

जल प्रदूषण

  • जब हानिकारक पदार्थ जैसे गंदा पानी, विषाक्त रसायन, गाद आदि पानी में मिल जाते हैं, तो पानी प्रदूषित हो जाता है।
  • जो पदार्थ पानी को प्रदूषित करते हैं, उन्हें जल प्रदूषक कहा जाता है।
  • जिन कस्बों और शहरों से नदी बहती है, वहां भारी मात्रा में कचरा, अव्यवस्थित गंदा पानी, मृत शरीर और अन्य हानिकारक पदार्थ सीधे नदी में डाल दिए जाते हैं।
  • वास्तव में, कई स्थानों पर नदी ‘मरी हुई’ होती है, जहां प्रदूषण स्तर इतने उच्च होते हैं कि जलीय जीवन जीवित नहीं रह सकता।
  • गंदा पानी, कृषि रसायन और औद्योगिक अपशिष्ट जल के कुछ प्रमुख प्रदूषक हैं। 
  • जल प्रदूषण केवल सतही जल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भूमिगत जल, समुद्र और महासागरों तक फैल चुका है।

कुछ महत्वपूर्ण शब्द

घुलित ऑक्सीजन (DO) 

  • पानी में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा।मछलियों और अन्य जलजीवों के जीवित रहने के लिए आवश्यक है।
  • जब जैविक/अजैविक अपशिष्ट बढ़ते हैं, तो घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है क्योंकि अपघटन में अधिक ऑक्सीजन का उपयोग होता है।
  • घुलित ऑक्सीजन स्तर
    • 8 mg/L से नीचे – प्रदूषित जल
    • 4 mg/L से नीचे – अत्यधिक प्रदूषित जल

जैविक ऑक्सीजन मांग (BOD)

  • पानी में जैविक अपशिष्ट को अपघटित करने के लिए बैक्टीरिया द्वारा आवश्यक ऑक्सीजन।
  • उच्च BOD = अधिक प्रदूषण + कम DOइसे mg O₂/L में मापा जाता है।
  • यह केवल जैविक अपशिष्ट की माप करता है। गैर-जैविक प्रदूषकों की अधिकता में यह उपयुक्त नहीं है।

रासायनिक ऑक्सीजन मांग (COD)

  • यह जैविक और गैर-जैविक दोनों प्रकार के कार्बनिक पदार्थों को रासायनिक रूप से ऑक्सीकरण करने के लिए आवश्यक कुल ऑक्सीजन को मापता है।
  • BOD से बेहतर संकेतक है क्योंकि यह सभी प्रदूषकों को कवर करता है, न कि केवल जैविक प्रदूषकों को।

नहाने के पानी की प्राथमिक गुणवत्ता मापदंड    

  • मानदंड
  • फीकल कोलीफार्म MPN/100 मि.ली.: 500 (वांछनीय) – 2500 (अधिकतम अनुमत)फीकल स्ट्रेप्टोकॉकी MPN/100 मि.ली.: 100 (वांछनीय) – 500 (अधिकतम अनुमत)
  • pH: 6.5–8.5 के बीच।
  • घुलित ऑक्सीजन: 5 mg/L या अधिक।
  • जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग 3 दिन, 27°C: 3 mg/L या कम।

जल प्रदूषण नियंत्रण के अन्य उपाय

  • तटवर्ती बफर – नदियों के किनारों पर वनस्पति बनाए रखें ताकि प्रदूषकों को छानकर पानी को शुद्ध किया जा सके।
  • सीवेज और औद्योगिक अपशिष्टों का उपचार – पानी में छोड़ने से पहले इनका उपचार किया जाना चाहिए।
  • थर्मल अपशिष्ट जल का शीतलन – पावर प्लांट्स से निकलने वाले गर्म पानी को जलाशयों में छोड़ने से पहले ठंडा किया जाना चाहिए।
  • जल स्रोतों में घरेलू धुलाई पर प्रतिबंध – पीने के पानी में स्नान, कपड़े धोना या बर्तन धोने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
  • रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की सीमा – रासायनिक प्रवाह और प्रदूषण को रोकने के लिए इनका प्रयोग सीमित करें।
  • जैविक कृषि को बढ़ावा – प्राकृतिक खाद के रूप में पशु अपशिष्ट का उपयोग करें।
  • जलीय पौधों का उपयोग (जलकुंभी) – पानी से विषैले पदार्थ और भारी धातुएँ अवशोषित करती है।
  • तेल के फैलाव को साफ करना – पानी से तेल हटाने के लिए ब्रेगोलि (कागज उद्योग का उपोत्पाद) का उपयोग करें।
  • राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड/प्रदूषण नियंत्रण समितियां द्वारा अपशिष्ट मानकों का प्रवर्तन – उद्योगों के खिलाफ कार्यवाही की जाती है ताकि वे निर्धारित निर्वहन मानकों को पूरा कर सकें।
  • सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र (CETPs) के लिए वित्तीय सहायता – छोटे उद्योगों के समूहों को मिलकर अपशिष्ट जल का उपचार करने में सहायता प्रदान करता है।
  • शून्य तरल निर्वहन (ZLD) निर्देश – उद्योगों से सभी अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण और पुनः उपयोग करने की मांग की जाती है।
  • उद्योगों के लिए कानूनी निर्देश – पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986) की धारा 5 और जल अधिनियम (1974) की धारा 18(1)(b) के तहत निर्देश।
  • झीलों और आर्द्रभूमियों का संरक्षण – पहले NLCP और NWCP के माध्यम से, 2013 से NPCA (राष्ट्रीय जल निकाय संरक्षण योजना) में समाहित।
पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन तथा उनका प्रभाव
  • जैव आवर्धन (बायोमैग्निफिकेशन) –  जैव आवर्धन एक प्रक्रिया है, जिसमें खाद्य श्रृंखला के उच्च स्तरों पर विषाक्त पदार्थों की सांद्रता बढ़ जाती है। इसमें मुख्य रूप से स्थायी जैविक प्रदूषक (POPs) शामिल होते हैं, जो आसानी से विघटित नहीं होते और जीवों के शरीर में वसा के रूप में जमा हो जाते हैं।
  • यह कैसे शुरू होता है: कीटनाशक और रसायन पहले मिट्टी और पानी में मिलते हैं → फिर ये पौधों द्वारा अवशोषित होते हैं → इन पौधों को जानवर खाते हैं → और फिर ये खाद्य श्रृंखला के माध्यम से अन्य जीवों तक पहुंचते हैं।
  • POPs क्योंकि गैर-अपघटनीय होते हैं, इसलिए ये शरीर से बाहर नहीं निकलते, बल्कि समय के साथ जमा होते रहते हैं।
  • उदाहरण: DDT (कीटनाशक), एल्ड्रिन एवं डाईल्ड्रिन (कीटनाशक), एंडोसल्फान, फ्यूरान्स और डाइऑक्सिन्स, हेक्साक्लोरोबेंजीन (HCB) कवकनाशी।
  • मानवों को खाद्य श्रृंखला के सबसे उच्च स्तर पर होने के कारण सबसे अधिक सांद्रता प्राप्त करता है।

जैव आवर्धन के प्रभाव

वन्यजीवों पर प्रभाव– उच्च खाद्य श्रेणी वाले जानवर (जैसे शिकारी पक्षी, बड़े मछलियां, समुद्री स्तनधारी) सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।यह प्रजनन क्षमता में कमी, कमजोर प्रतिरक्षा, और व्यवहार में बदलाव का कारण बनता है।मनुष्यों पर प्रभाव हानिकारक रसायन (जैसे पारा, कीटनाशक) भोजन के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैं।यह तंत्रिका से संबंधित समस्याएं उत्पन्न कर सकता है, विशेष रूप से नवजात और बच्चों में।

जैव-संचयन (बायोएक्यूम्यूलेशन)

  • जैव-संचयन वह प्रक्रिया है जिसमें एक जीव में समय के साथ हानिकारक रसायनों का संचय होता है जब हवा, पानी, मिट्टी, या भोजन से इनका अवशोषण शरीर द्वारा इन्हें उत्सर्जित करने की क्षमता से तेज़ होता है।
  • ये रसायन (जैसे भारी धातु, कीटनाशक) ऊतकों में, विशेष रूप से वसा में, एकत्रित होते हैं और विषैले हो सकते हैं।
  • विशेषताएँ – स्थिर रसायन अधिक संचित होते हैं क्योंकि वे आसानी से टूटते नहीं हैं।वसा-प्रिय (लिपोफिलिक) रसायन शरीर के वसा में संग्रहित होते हैं और लंबे समय तक रहते हैं।
  • धीमा उपापचय/उत्सर्जन → अधिक संचयन (जैसे बड़ी मछलियां छोटी मछलियों की तुलना में अधिक जैव-संचयन करती हैं)।

स्टॉकहोम समझौता

  • यह एक वैश्विक संधि है जिसका उद्देश्य मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को स्थायी कार्बनिक प्रदूषक (POPs) से सुरक्षा करना है।
  • इसे 2001 में स्टॉकहोम (स्वीडन) में हस्ताक्षर के लिए खोला गया और यह 17 मई 2004 को प्रभावी हुआ।
  • भारत ने 2006 में स्टॉकहोम संधि को धारा 25(4) के तहत स्वीकार किया।
  • यह संधि “ख़राब बारह” (12) रसायनों (मुख्य POPs) को प्रतिबंधित करने की मांग करती है।
  • इस संधि में तीन श्रेणियों में बारह रसायनों को सूचीबद्ध किया गया है:
  • आठ कीटनाशक (एल्ड्रिन, क्लोरडेन, डीडीटी, डिएलड्रिन, एंड्रिन, हेप्टाच्लोर, मिरेक्स और टोएक्साफिन)
  • दो औद्योगिक रसायन (पॉली क्लोरिनेटेड बाइफेनिल्स और हेक्साच्लोरबेंजीन)डाइऑक्सिन्स और फ्यूरान्स

रॉटरडैम कन्वेंशन 

  • यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसे 1998 में रॉटरडैम (नीदरलैंड्स) में अपनाया गया और 2004 में यह प्रभावी हुई, जिसका उद्देश्य खतरनाक रसायनों के व्यापार को विनियमित करना है।
  • उद्देश्य – खतरनाक रसायनों के सुरक्षित और सूचित व्यापार की साझा जिम्मेदारी सुनिश्चित करना, ताकि देश मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा कर सकें।
  • कीटनाशकों और औद्योगिक रसायनों को देशों द्वारा प्रतिबंधित या गंभीर रूप से सीमित किया गया है।
  • यह रसायन पूर्व सूचित सहमति प्रक्रिया के तहत सूचीबद्ध हैं।
  • किसी सूचीबद्ध खतरनाक रसायन का निर्यात केवल तभी अनुमति प्राप्त है जब आयातक देश सहमति देता है।

सुपोषण (यूट्रोफिकेशन)

  • सुपोषण एक प्रक्रिया है, जिसमें एक जल निकाय अत्यधिक मात्रा में पोषक तत्वों से भर जाता है — मुख्य रूप से नाइट्रोजन और फास्फोरस — जिसके कारण शैवाल और जल पौधों की अत्यधिक वृद्धि होती है।
  • जल निकाय में शैवाल और प्लवक की अत्यधिक वृद्धि (ब्लूम) इस प्रक्रिया के संकेत होते हैं।
  • सुपोषण के प्रकार
  • प्राकृतिक सुपोषण – यह एक धीमी प्रक्रिया है, जो सदियों तक चलती है, जिसमें जल निकायों में पोषक तत्व अवसादन, मौसम और अन्य कारणों से प्राकृतिक रूप से जमा होते हैं।
  • सांस्कृतिक (कृत्रिम) सुपोषण – इसमें तीव्र पोषक तत्व वृद्धि, जो मानव गतिविधियों जैसे कृषि, शहरी अपशिष्ट निस्तारण और औद्योगिक प्रदूषण के कारण होता है।
  • सुपोषण की प्रक्रिया 
    1. पोषक तत्वों का प्रवेश – अत्यधिक नाइट्रेट्स और फास्फेट्स जल में उर्वरक, सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट से प्रवेश करते हैं।
    2. शैवाल ब्लूम – अतिरिक्त पोषक तत्व उर्वरक के रूप में काम करते हैं → जल सतह पर शैवाल और प्लवकों का तेजी से विकास होता है।
    3. सूर्य प्रकाश अवरुद्ध –  घना शैवाल की परत पानी के नीचे के पौधों तक सूरज की रोशनी नहीं पहुंचने देती।
    4. पौधों एवं शैवाल की मृत्यु – प्रकाश की कमी के कारण जल के नीचे के पौधे मर जाते हैं; शैवाल अपने छोटे जीवन चक्रों के बाद मर जाते हैं।
    5. अपघटन – मृत पौधों और शैवाल को बैक्टीरिया द्वारा अपघटित किया जाता है, जो घुलित ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं।
    6. ऑक्सीजन की कमी (हाइपोक्सिया) – च्च बैक्टीरिया गतिविधि BOD बढ़ाती है → ऑक्सीजन स्तर गिरते हैं।
    7. जल जीवों की मृत्यु / मृत क्षेत्र – मछलियां और अन्य जीव ऑक्सीजन की कमी के कारण मर जाते हैं, जिससे निर्जीव मृत क्षेत्र बन जाते हैं।

समुद्री प्रदूषण

  • मानव गतिविधियों द्वारा समुद्री पर्यावरण में हानिकारक पदार्थों या ऊर्जा का प्रवेश, जिससे समुद्री जीवन के लिए खतरे, मानव स्वास्थ्य पर जोखिम और समुद्री गतिविधियों में रुकावट और जल गुणवत्ता में गिरावट होती है।

कारण

  • तेल का रिसाव: तेल का रिसाव, औद्योगिक अपवाह, कीटनाशक और भारी धातु जहरीली स्थितियाँ और मृत क्षेत्रों का निर्माण करते हैं।
  • औद्योगिक अपशिष्ट: उद्योगों से निकलने वाला अपशिष्ट, जल का तापमान बदलता है, जिससे जल पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होते हैं।
  • वायु प्रदूषक: अम्लीय वर्षा, भारी धातुएं और माइक्रोप्लास्टिक समुद्र में घुल जाते हैं।
  • प्लास्टिक प्रदूषण: समुद्र में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक जाता है, जिससे समुद्री जानवरों और पक्षियों के लिए हानिकारक होता है।
  • गंदा पानी और अपशिष्ट निस्तारण: अधिक पोषक तत्वों के कारण शैवाल का विस्फोट होता है और ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।

समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण की रोकथाम हेतु उपाय

  • सतत विकास लक्ष्य 14: जल के नीचे जीवन
  • UNCLOS (1982): इस संधि के तहत भारत सहित सभी हस्ताक्षरकर्ता देशों को समुद्री प्रदूषण को रोकने, कम करने और नियंत्रित करने के उपाय अपनाने का निर्देश दिया गया है।
  • प्लास्टिक कचरा प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2022: इस नियम के तहत प्लास्टिक पैकेजिंग के लिए विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी की व्यवस्था की गई है, जिसमें उत्पादक को संग्रहण और पुनर्चक्रण के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।
  • सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बैन (2022): यह नियम कुछ सिंगल-यूज़ प्लास्टिक वस्तुओं जैसे कटलरी, स्ट्रॉ और 75 माइक्रोन से पतले कैरी बैग्स पर प्रतिबंध लगाता है।
ब्लू फ्लैग टैग
  • ब्लू फ्लैग एक अंतरराष्ट्रीय इको-लेबल है, जो समुद्र तटों, मरीना और सतत नौकायन पर्यटन संचालकों को दिया जाता है।
  • यह फाउंडेशन फॉर एनवायर्नमेंटल एजुकेशन (FEE) द्वारा प्रशासित किया जाता है, जिसका मुख्यालय कोपेनहेगन, डेनमार्क में है।
  • इसे सफाई, सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता का प्रतीक माना जाता है।
  • विशाखापत्तनम के ऋषिकोंडा समुद्र तट ने ब्लू फ्लैग टैग फिर से प्राप्त किया।
  • भारत में वर्तमान में 13 समुद्र तट हैं जिनके पास ब्लू फ्लैग प्रमाणन है।
  • ब्लू फ्लैग प्राप्त करने के लिए एक समुद्र तट/मरीना को चार मुख्य श्रेणियों में 33 कड़े मानदंडों को पूरा करना होता है:
    • पर्यावरणीय शिक्षा और सूचना
    • जल गुणवत्ता
    • पर्यावरणीय प्रबंधन
    • सुरक्षा एवं सेवाएँ

प्लास्टिक प्रदूषण

  • प्लास्टिक प्रदूषण से तात्पर्य पर्यावरण में प्लास्टिक सामग्री के संचय से है, जो पारिस्थितिकी तंत्र, वन्यजीवों और मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
  • पेट्रोकेमिकल्स से प्राप्त प्लास्टिक जैविक रूप से विघटित नहीं होते हैं, और छोटे टुकड़ों (माइक्रोप्लास्टिक्स) में टूट जाते हैं, जो सदियों तक बने रहते हैं।     
  • भारत का प्लास्टिक कचरा संकट
  • आकार: भारत में प्लास्टिक कचरा उत्पादन लगभग 9.4 मिलियन मीट्रिक टन वार्षिक अनुमानित है, जिसमें से केवल 50% को इकट्ठा और प्रसंस्कृत किया जाता है, जो ज्यादातर अनौपचारिक क्षेत्रों के माध्यम से होता है। (स्रोत: विश्व आर्थिक मंच)
  • असंगत प्रबंधन: शहरी कचरे का 77% खुले लैंडफिल में चला जाता है; 5.8 मिलियन टन कचरा हर साल जलाया जाता है, जिससे 3.5 मिलियन टन मलबा भूमि, हवा और पानी में फैल जाता है। (स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया)
  • माइक्रोप्लास्टिक्स: ये छोटे प्लास्टिक के टुकड़े होते हैं, जो सामान्यतः 5 मिमी से छोटे होते हैं। ये स्थायी होते हैं, बहुत मोबाइल होते हैं और प्रकृति से निकालना कठिन होता है।

छठी दौर की वार्ताएँ

  • अगस्त 2025 में जिनेवा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र की छठी दौर की वार्ता का समापन हुआ, जिसका उद्देश्य प्लास्टिक प्रदूषण पर पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक समझौता प्राप्त करना था, लेकिन कोई समझौता नहीं हो पाया।
  • मुख्य असहमति यह रही कि क्या प्लास्टिक उत्पादन को ही सीमित किया जाए या सिर्फ कचरे का प्रबंधन किया जाए।

मुख्य तथ्य

  • वैश्विक स्थिति – दुनिया में हर साल 430 मिलियन टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिनमें से 2/3 अल्पकालिक उपयोग की वस्तुएं होती हैं।
  • पर्यावरणीय प्रभाव – प्लास्टिक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में 3.4% योगदान देता है (2019), और माइक्रोप्लास्टिक्स खाद्य प्रणालियों में प्रवेश कर रहे हैं।

भारत के प्रयास

  • विश्व पर्यावरण दिवस 2025 (भारत) – थीम: “एक राष्ट्र, एक मिशन: प्लास्टिक प्रदूषण को हराना”प्लास्टिक एक उपयोगी सामग्री है, किंतु इसका अनुचित निपटान प्रदूषण का मुख्य कारण है।
  • नागरिकों से अनुरोध किया गया है कि वे सिंगल-यूज़ प्लास्टिक से बचें और 120 माइक्रोन से नीचे के प्लास्टिक बैग का उपयोग न करें।   
  •  विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी (EPR)
  • EPR दिशानिर्देश:सर्कुलर अर्थव्यवस्था का समर्थनपर्यावरणीय रूप से सुरक्षित प्लास्टिक कचरा प्रबंधनमिशन LiFE सिद्धांतों और पुनर्चक्रण पर जोर, प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिएप्लास्टिक कचरा, विशेष रूप से सिंगल-यूज प्लास्टिक, पारिस्थितिकी तंत्र और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरों का कारण बनता है।
  • शहरी भारत में, जहां प्लास्टिक सूखे कचरे का 46% हिस्सा बनता है, तीव्र शहरीकरण ने समस्या को और बढ़ा दिया है।
  • भारत ने सख्त नियमों के साथ प्रतिक्रिया दी है—1999 से पतले प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध और जुलाई 2022 से प्रमुख सिंगल-यूज वस्तुओं पर प्रतिबंध।
  • स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (2.0) में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन पर जोर दिया गया है, जिसमें कमी, पृथक्करण और पारिस्थितिकीय रूप से सुरक्षित विकल्पों को बढ़ावा दिया गया है।
कानून लागू हुआ 
जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, .1974
वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम,1981
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम,1986
ओजोन क्षयकारी पदार्थ (विनियमन) नियम,2000
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम1972
वन संरक्षण अधिनियम1980
जैव विविधता संरक्षण अधिनियम2002
प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, (संशोधन – 2022)2016
ई-वेस्ट (प्रबंधन) नियम (1 अप्रैल, 2023 से संशोधित नियम प्रभावी हैं।)2016
पर्यावरण संरक्षण (प्रदूषित स्थलों का प्रबंधन) नियम2025

रिपोर्ट

एनविस्टैट्स इंडिया 2025

  • एनविस्टैट्स इंडिया 2025 सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी प्रकाशन का आठवाँ संस्करण है।“ 
  • मुख्य विशेषताएं
  • शक्ति और ऊर्जा
    • थर्मल पावर उत्पादन: 2013–14: 7,92,053 GWh, 2023–24: 13,26,549 GWh → नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में बदलाव के बावजूद महत्वपूर्ण वृद्धि।
    • नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन: 2013–14: 65,520 GWh, 2023–24: 2,25,835 GWh → लगभग 3.5 गुना वृद्धि।
  • तापमान प्रवृत्तियाँ (2001–2024)
    • वार्षिक औसत तापमान: 2001: 25.05°C → 2024: 25.74°C
    • न्यूनतम तापमान: 2001: 19.32°C → 2024: 20.24°C
    • अधिकतम तापमान: 2001: 30.78°C → 2024: 31.25°C
    • सभी तापमान मानकों में स्पष्ट ऊष्मीकरण प्रवृत्ति परिलक्षित होती है।
  • वर्षा प्रवृत्तियाँ (2001–2024) – वर्षा में साल दर साल परिवर्तन दिखता है, जो मुख्य रूप से मानसून से प्रभावित होता है।
  • कोई दीर्घकालिक बढ़ोतरी या कमी की प्रवृत्ति नहीं देखी गई है।भारत की प्रजाति विविधता- भारत वैश्विक प्रजाति विविधता का ~6.25% हिस्सा रखता है। भारत में पाई जाने वाली प्रजातियां: 1,04,561

चौथी द्विवार्षिक संशोधित रिपोर्ट (BUR-4)

  • भारत ने अपनी चौथी द्विवार्षिक अद्यतन रिपोर्ट (BUR-4) 30 दिसंबर 2024 को UNFCCC (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन) को प्रस्तुत की। रिपोर्ट के अनुसार, 2019 की तुलना में 2020 में कुल ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में 7.93% की कमी आई है।

IPCC छठी आकलन रिपोर्ट (AR6) 

 मुख्य निष्कर्ष

  • अभूतपूर्व वैश्विक गर्मी: मानव-जनित वैश्विक तापमान में वृद्धि अब औद्योगिक काल से पहले के स्तर से 1.1°C ऊपर पहुंच चुकी है।
  • यह वृद्धि जलवायु परिवर्तन की ऐसी घटनाओं का कारण बनी है, जो हाल की मानव इतिहास में कभी नहीं देखी गई, जिनमें शामिल हैं:समुद्र स्तर का बढ़ना,चरम ताप लहरें ,प्रचंड चक्रवात ,ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्री बर्फ का गायब होना
  • प्रत्येक अतिरिक्त 0.1°C की वृद्धि जलवायु जोखिमों को अत्यधिक बढ़ा देती है।
  • वैश्विक तापमान: तापमान 1.5°C से अधिक हो सकता है।
  • 2021-2040 के बीच 1.5°C से अधिक होने की 50% से अधिक संभावना।
  • उच्च-उत्सर्जन परिदृश्यों में यह सीमा कहीं जल्दी पार हो सकती है: 2018 से 2037 के बीच।
  • इससे 1.5°C तक तापमान वृद्धि को सीमित करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
  • अनुकूलन : 170 से अधिक देश अब जलवायु नीतियों में अनुकूलन को शामिल करते हैं।
  • लेकिन अनुकूलन की गति धीमी है।
  • वित्तीय बाधाएँ: विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी बाधा है।
  • कार्यवाहियाँ: पुराने जीवाश्म ईंधन संयंत्रों को बंद करना, नए कोयला/तेल/गैस परियोजनाओं को रद्द करना, कार्बन-गहन अवसंरचना को लॉक-इन करने से बचना।
  • लक्ष्य: नेट-जीरो तथा जलवायु-सहनशील भविष्य।

महत्वपूर्ण पर्यावरण एवं जलवायु रिपोर्ट

रिपोर्ट का नामजारीकर्ता/संगठन
ग्लोबल एनवायरनमेंट आउटलुक  रिपोर्टUNEP (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम)
लिविंग प्लैनेट रिपोर्टWWF (वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर)
स्टेट ऑफ वर्ल्ड क्लाइमेट रिपोर्ट / स्टेट ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्टWMO (विश्व मौसम विज्ञान संगठन)
संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची (Red List)IUCN (अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ)
विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्टIQAir (स्विस कंपनी)
CO₂ उत्सर्जन रिपोर्टIEA(अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी )
एमिशन्स गैप रिपोर्टUNEP 
अडैप्टेशन गैप रिपोर्ट UNEP 
संरक्षित ग्रह रिपोर्ट  (द्विवार्षिक)IUCN + UNEP
वर्ल्ड हेरिटेज आउटलुकIUCN
वन्य प्रजातियों के सतत उपयोग पर रिपोर्टIPBES (जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति मंच)
विश्व धरोहर ग्लेशियर: जलवायु परिवर्तन के प्रहरीIUCN + UNESCO
सतत विकास लक्ष्य रिपोर्टUN – SDSN (सतत विकास समाधान नेटवर्क)
ग्लोबल मीथेन ट्रैकरIEA(अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी) 
स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स फॉरेस्ट्स (द्विवार्षिक)FAO (खाद्य और कृषि संगठन)
वैश्विक जोखिम रिपोर्टविश्व आर्थिक मंच (WEF)

चक्र

जैव रासायनिक चक्र

  • सभी मैक्रो और माइक्रो पोषक तत्व निरंतर विभिन्न जैविक और अजैविक घटकों के माध्यम से चलते हैं और एक चक्र पूरा करते हैं, जिसे जैव रासायनिक चक्र कहा जाता है।
  • कार्बन चक्र – कार्बन, वायुमंडल में ऑक्सीजन और नाइट्रोजन की तुलना में एक गौण घटक है।हालांकि, कार्बन डाइऑक्साइड के बिना जीवन संभव नहीं है,
    • क्योंकि यह पौधों द्वारा प्रकाश-संश्लेषण के माध्यम से कार्बोहाइड्रेट के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है।
    • कार्बन वायुमंडल में मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) के रूप में पाया जाता है।
    • कार्बन चक्र में वायुमंडल और जीवों के बीच कार्बन का निरंतर आदान-प्रदान होता है।
    • यह सामान्यतः एक अल्पकालिक चक्र होता है।
    • वायुमंडल से कार्बन हरे पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा जाता है।
    • श्वसन की प्रक्रिया द्वारा जानवरों तक पहुँचता है।
    • मृत जैविक पदार्थों का विघटन होने पर यह फिर से वायुमंडल में लौट जाता है (मिट्टी में अविनाशी कार्बन)।
  • कार्बन एक दीर्घकालिक चक्र में भी प्रवेश करता है। यह दलदली मिट्टी की पीट जैसी परतों में या जल प्रणाली के तलछटों में अविघटित जैविक पदार्थ के रूप में जमा होता है, जहाँ यह लंबे समय तक संग्रहित रहता है, फिर इसे छोड़ा जाता है।
  • गहरे महासागरों में, ऐसा कार्बन लाखों वर्षों तक दबा रह सकता है, जब तक भूवैज्ञानिक गतिविधियां इन चट्टानों को समुद्र सतह से ऊपर नहीं उठातीं। ये चट्टानें क्षरण का शिकार हो सकती हैं, जिससे इनका कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट धाराओं और नदियों में प्रवाहित हो सकता है।

नाइट्रोजन चक्र

नाइट्रोजन, कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बाद जीवों  में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला तत्व है।

  • वायुमंडलीय नाइट्रोजन N₂ (N ≡ N) के रूप में मौजूद होता है, जिसमें एक मजबूत त्रिसंयोजक बंध होता है। नाइट्रोजन (N₂) को अमोनिया में बदलने की प्रक्रिया को नाइट्रोजन स्थिरीकरण कहा जाता है
  • नाइट्रोजन स्थिरीकरण – (नाइट्रोजन को → नाइट्रेट्स और नाइट्राइट्स में बदलना) – वायुमंडलीय नाइट्रोजन को उपयोगी रूपों में बदलना।
    • यह प्रक्रिया बैक्टीरिया द्वारा की जाती है: जैसे कि एजोटोबैक्टर, अनाबेना, और राइजोबियम जैसे सूक्ष्मजीव।
    • गांठ बैक्टीरिया दलहनी पौधों में पाए जाते हैं।
    • आकर्षण और पराबैंगनी विकिरण पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करते हैं, जिससे नाइट्रोजन को नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NO, NO₂, N₂O) में बदला जा सकता है।
  • आत्मसातीकरण (पौधों और जानवरों द्वारा उपयोग)
    • मृत पौधों और जानवरों के जैविक नाइट्रोजन का अमोनिया में विघटन को अमोनिफिकेशन कहा जाता है।
  • अमोनीकरण
    • जब पौधे/जानवर मरते हैं → विघटनकारी बैक्टीरिया जैविक नाइट्रोजन को फिर से अमोनिया, नाइट्राइट्स, नाइट्रेट्स में बदल देते हैं।
  • नाइट्रीकरण
    • इस अमोनिया का कुछ हिस्सा वाष्पित होकर फिर से वायुमंडल में प्रवेश करता है, लेकिन इसका अधिकांश हिस्सा मिट्टी के बैक्टीरिया द्वारा नाइट्रेट में परिवर्तित हो जाता है,
    • जो निम्नलिखित चरणों में होता है:\
    • अमोनिया को सबसे पहले नाइट्रोसोमोनास और नाइट्रोकोकस जीवाणु द्वारा ऑक्सीकरण करके नाइट्राइट में बदला जाता है। इसके बाद नाइट्राइट को नाइट्रोबैक्टर जीवाणु  की मदद से नाइट्रेट में बदल दिया जाता है। इन सभी चरणों को नाइट्रीकरण कहा जाता है। ये नाइट्रीफाइंग बैक्टीरिया कीमो ऑटोट्रॉफिक (जीव जो रसायनों से अपना भोजन स्वयं बनाते) होते हैं।
  • विनाइट्रीकरण
    • इस प्रकार बना नाइट्रेट पौधों द्वारा अवशोषित किया जाता है और पत्तियों तक पहुंचता है।
    • पत्तियों में यह अवकरण होकर अमोनिया बनाता है, जो अंत में अमीनो अम्लों के अमीन समूह का निर्माण करता है।
    • मिट्टी में मौजूद नाइट्रेट को विनाइट्रीकरण की प्रक्रिया द्वारा फिर से नाइट्रोजन में बदल दिया जाता है।
    • यह प्रक्रिया स्यूडोमोनास और थायोबैसिलस बैक्टीरिया द्वारा की जाती है।
नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणुओं के प्रकार
  • राइजोबियम : सहजीवी बैक्टीरिया जो दलहनी पौधों (जैसे मटर, बीन्स, सोयाबीन) की जड़ों में गांठें बनाते हैं।
  • एजोटोबैक्टर :मिट्टी में पाए जाने वाले मुक्त-जीवी, वायवीय जीवाणु।
  • क्लॉस्ट्रिडियम :मुक्त-जीवी, अवायवीय जीवाणु।
  • सायनोबैक्टीरिया : प्रकाश संश्लेषण करने वाले बैक्टीरिया, जैसे नोस्टॉक और एनाबेना, जो जलीय वातावरण में पाए जाते हैं।
  • फ्रैंकिया : गैर-दलहनी पौधों (जैसे एल्डर) के साथ सहजीवी संबंध बनाता है।
  • एजोस्पिरिलम : मुक्त-जीवी बैक्टीरिया, जो घास के साथ जुड़े रहते हैं।

पारिस्थितिकीय शब्दावली

  • की-स्टोन प्रजाति – ऐसी प्रजाति जिसका अपने प्राकृतिक पर्यावरण पर उसकी संख्या की तुलना में बहुत अधिक प्रभाव होता है। इस अवधारणा को रॉबर्ट ट्रीट पेन ने प्रस्तुत किया था। उदाहरण – भेड़िया, शेर।
  • निकेत – यह उन सभी जैविक, भौतिक और रासायनिक आवश्यकताओं को दर्शाता है, जिनकी किसी प्रजाति को जीवित रहने, स्वस्थ रहने और प्रजनन के लिए जरूरत होती है। हर प्रजाति का निकेत अलग होता है, यानी दो प्रजातियों का निकेत एक जैसा नहीं होता।
  • ईकोटोन – यह दो बायोम (विविध पारिस्थितिकी तंत्र) के बीच मिलने वाला संक्रमण क्षेत्र होता है। उदाहरण – घास के मैदान (रेगिस्तान और वन के बीच)।
  • एज प्रभाव – एज प्रभाव से तात्पर्य दो आवासों की सीमा (ईकोटोन) पर प्रजातियों की संख्या या समुदाय की संरचना में होने वाले बदलाव से है। कई बार ईकोटोन क्षेत्र में कुछ प्रजातियों की संख्या और उनकी जनसंख्या घनत्व, दोनों समुदायों की तुलना में अधिक होती है। इसे एज प्रभाव कहा जाता है। उदाहरण के लिए, वन और रेगिस्तान के बीच के ईकोटोन क्षेत्र में पक्षियों का घनत्व अधिक होता है।
  • पारिस्थितिकीय पदचिह्न – यह किसी व्यक्ति या जनसंख्या की पौधों से प्राप्त भोजन और रेशा उत्पादों, पशुधन और मछली उत्पादों, लकड़ी और अन्य वन उत्पादों, शहरी अवसंरचना के लिए स्थान, तथा जीवाश्म ईंधन से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने के लिए आवश्यक वन क्षेत्र की मांग को मापता है।
  • कार्बन फुटप्रिंट – किसी देश के प्रति व्यक्ति वार्षिक कार्बन उत्सर्जन को CO₂-समतुल्य टन में मापा जाता है।
  • अर्थ ओवरशूट डे – वह तिथि जब मानवता की पारिस्थितिक संसाधनों की मांग, पृथ्वी द्वारा एक वर्ष में पुनः उत्पन्न किए जाने वाले संसाधनों से अधिक हो जाती है।
  • ड्रॉडाउन – वह स्थिति जब वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ना बंद हो जाती है और धीरे-धीरे कम होने लगती है।
  • टिपिंग पॉइंट –एक महत्वपूर्ण सीमा, जिसके बाद छोटे परिवर्तन भी बड़े और संभवतः अपरिवर्तनीय जलवायु या प्रणालीगत बदलाव ला सकते हैं।
  • कार्बन डाइट –  जीवन स्तर को कम किए बिना दक्षता बढ़ाकर, ईंधन में बदलाव करके और व्यवहार में परिवर्तन करके ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना।
  • अर्थ आवर – WWF द्वारा आयोजित एक वैश्विक कार्यक्रम है। यह हर साल मार्च के अंतिम शनिवार को मनाया जाता है, जिसमें लोग, समुदाय और व्यवसाय एक घंटे (स्थानीय समयानुसार रात 8:30 से 9:30 बजे तक) के लिए गैर-जरूरी लाइट बंद करते हैं।
  • कार्बन अकाउंटिंग – ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की गणना और निगरानी करने की प्रक्रिया। यह संगठनों और व्यक्तियों को अपने कार्बन फुटप्रिंट को मापने और उसे कम करने की रणनीति बनाने में मदद करती है।
  • इकोमार्क – पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों को चिन्हित करने की एक पहल। इसे भारत में भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा शुरू किया गया है।
  • ग्रीनवॉशिंग –  भ्रामक जानकारी देकर किसी उत्पाद या कंपनी को पर्यावरण के अनुकूल दिखाने का प्रयास।
  • ग्रीनविशिंग –यह शब्द अर्नेस्ट डंकन द्वारा 2019 में दिया गया; इसमें बिना ठोस कार्यवाही के केवल पर्यावरण के अनुकूल होने की इच्छा व्यक्त की जाती है।
  • ग्रीन हशिंग – कंपनियाँ जांच या आलोचना से बचने के लिए अपनी जलवायु रणनीतियों के बारे में जानबूझकर चुप रहती हैं।
  • ब्लू वॉशिंग – एक भ्रामक विपणन तरीका, जिसमें उपभोक्ताओं को यह विश्वास दिलाया जाता है कि कंपनी खाद्य प्रणालियों और जल संरक्षण में स्थिरता को बढ़ावा दे रही है।
  • विश-साइक्लिंग– गैर-पुनर्चक्रण योग्य वस्तु को इस उम्मीद में रीसाइक्लिंग डिब्बे में डाल देना कि उसका पुनर्चक्रण किया जाएगा।
  • रिवाइल्डिंग – एक संरक्षण विधि, जिसमें प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय प्रजातियों को फिर से स्थापित करके प्रकृति को अपने तरीके से विकसित होने दिया जाता है।
  • कीलिंग कर्व – यह एक ग्राफ है, जो 1950 के दशक से हवाई के मौना लोआ वेधशाला में मापी गई वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड की लगातार बढ़ती मात्रा को दर्शाता है।
  • ई-20 ईंधन – 80% पेट्रोल और 20% एथेनॉल का मिश्रण।
  • सरकार का लक्ष्य: 2029–30 तक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को 30% तक बढ़ाना।
  • कार्बन डाइऑक्साइड सूची – यह एक माप या संकेतक है, जो समय के साथ वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) की सांद्रता को ट्रैक करता है। यह CO₂ उत्सर्जन के रुझानों और जलवायु परिवर्तन में उनकी भूमिका की निगरानी में मदद करता है।
  • बादल फटना: लगभग 10 किमी × 10 किमी क्षेत्र में एक घंटे के भीतर 10 सेमी या उससे अधिक वर्षा होने की घटना को बादल फटना कहा जाता है।
  • जैव आवर्धन – वह प्रक्रिया जिसमें विषैले पदार्थों की सांद्रता खाद्य श्रृंखला में ऊपर की ओर बढ़ती जाती है। कीटनाशक, भारी धातु और रसायन जैसे हानिकारक पदार्थ जीवों में धीरे-धीरे जमा होते जाते हैं, विशेषकर शीर्ष उपभोक्ताओं में।
  • जैव संचयन – वह प्रक्रिया जिसमें जीव अपने पर्यावरण जैसे वायु, जल, मिट्टी या भोजन के माध्यम से रसायनों को अवशोषित करते हैं। जब इन रसायनों का प्रवेश, उन्हें बाहर निकालने की जीव की क्षमता से अधिक हो जाता है, तो वे शरीर में जमा होने लगते हैं।
  • पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र
    • इन्हें पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया जाता है (राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना, 2002–2016)।
    • राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों की सीमाओं के 10 किमी के भीतर स्थित भूमि को इको-फ्रैजाइल ज़ोन या इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) के रूप में अधिसूचित किया जाता है।
    • ये इन-सीटू संरक्षण में मदद करते हैं।
    • इको-सेंसिटिव ज़ोन का उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों के आसपास मानव गतिविधियों को विनियमित और प्रबंधित करना है, ताकि पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके, न कि सभी गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना।
  • पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)
    • परियोजना शुरू होने से पहले मौजूदा पर्यावरणीय स्थितियों से संबंधित डेटा का संग्रह किया जाता है।
    • EIA की अवधारणा 1960 और 1970 के दशक में बड़े विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण सामने आई।
    • 27 जनवरी 1994 को भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय ने पहली EIA अधिसूचना जारी की।
    • बांधों, राजमार्गों और औद्योगिक इकाइयों जैसे परियोजनाओं के पारिस्थितिकी तंत्र और समुदायों पर पड़ने वाले विनाशकारी प्रभावों के कारण इन प्रभावों का आकलन और उन्हें कम करने के लिए एक व्यवस्थित दृष्टिकोण की आवश्यकता महसूस हुई।
    • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत जारी की गई EIA अधिसूचना विभिन्न श्रेणियों की परियोजनाओं के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन करने की प्रक्रिया और आवश्यकताओं को निर्धारित करती है।
    • यह अधिसूचना परियोजनाओं को उनके संभावित पर्यावरणीय प्रभावों और केंद्र/राज्य सरकार द्वारा स्वीकृति के आधार पर श्रेणी A और B में विभाजित करती है।
    • श्रेणी A की परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति की आवश्यकता होती है और ये स्क्रीनिंग प्रक्रिया से नहीं गुजरती हैं, जबकि श्रेणी B की परियोजनाएँ स्क्रीनिंग प्रक्रिया से गुजरती हैं।
  • कार्बन पृथक्करण –  कार्बन पृथक्करण वह प्रक्रिया है, जिसमें कार्बन को लंबे समय तक पौधों, मिट्टी, भू-वैज्ञानिक संरचनाओं और महासागरों में संग्रहित किया जाता है।
  • कार्बन पृथक्करण के प्रकार
    • स्थलीय– पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा CO₂ को अवशोषित करते हैं। यह मिट्टी और जैव द्रव्य (जैसे तना, जड़ें, पत्तियाँ) में संग्रहित रहता है।
    • भू-वैज्ञानिक – CO₂ को भूमिगत तेल और गैस भंडार, कोयला परतों, लवणीय और शैल संरचनाओं में संग्रहित किया जाता है।
    • महासागरीय – महासागर प्राकृतिक रूप से CO₂ को अवशोषित करते हैं।
पारिस्थितिकीय शब्दप्रस्तुतकर्ता
पारिस्थितिकीअर्न्स्ट हैकेल, 1869
पारिस्थितिकी तंत्रए. जी. टेन्सले, 1935
पारिस्थितिकीय पिरामिडचार्ल्स एल्टन
गहन  पारिस्थितिकीआर्ने नेस
पारिस्थितिकीय निकेतजोसेफ ग्रिनेल
जैव विविधतावाल्टर जी. रोसेन
पर्यावरणथॉमस कार्लाइल
जैव विविधता तप्त स्थल(हॉटस्पॉट)नॉर्मन मायर्स
तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्रहैबर

खाद्य श्रृंखला

  • पारिस्थितिकी तंत्र में भोजन और ऊर्जा का प्रवाह एक जीव से दूसरे जीव तक होता है, इस प्रवाह को खाद्य श्रृंखला कहा जाता है।
  • खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है।
  • खाद्य श्रृंखला का निर्माण प्राथमिक उत्पादकों (हरे पौधे), प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी के उपभोक्ताओं और अपघटकों (कवक, जीवाणु) से मिलकर बनी होती है।
  • खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक स्तर को ऊर्जा स्तर या ट्रॉफिक स्तर कहा जाता है।
  • खाद्य श्रृंखला के प्रकार – खाद्य श्रृंखला के तीन प्रकार होते हैं-
शिकारी या चराई खाद्य श्रृंखला
  • इसमें खाद्य श्रृंखला की शुरुआत पौधों से होती है और यह छोटे जानवरों से बड़े जानवरों तक जाती है।
  • उदाहरण – हरे पौधे (उत्पादक) → शाकाहारी कीट (प्राथमिक उपभोक्ता) → मेंढक (द्वितीयक उपभोक्ता) → साँप (तृतीयक उपभोक्ता) → चील (शीर्ष उपभोक्ता या उच्च मांसाहारी)
  • हरे पौधे → खरगोश → कुत्ता → भेड़िया → शेर
परजीवी खाद्य श्रृंखला
  • इसमें खाद्य श्रृंखला की शुरुआत पौधों से होती है और यह बड़े जीवों से छोटे जीवों की ओर बढ़ती है।
  • उदाहरण – पेड़ → पक्षी → सूक्ष्मजीव
मृतोपजीवी (मृतपोषी) या अपरद खाद्य श्रृंखला
  • इसमें खाद्य श्रृंखला की शुरुआत मृत जीवों (पौधे या जानवर) से होती है और यह सूक्ष्मजीवों (कवक और जीवाणु) की ओर बढ़ती है।
  • इसमें सूक्ष्मजीव मृत जीवों के जैविक पदार्थ से भोजन या ऊर्जा प्राप्त करते हैं और अंत में अपघटक इन्हें खा जाते हैं।
  • उदाहरण – मृत जैविक पदार्थ खाने वाले जीव → दीमक → चींटी खाने वाले जीव

नोट – लिंडेमैन ने 1942 में ऊर्जा का 10% नियम दिया। इसके अनुसार खाद्य श्रृंखला में कुल ऊर्जा का केवल 10% भाग ही एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर तक स्थानांतरित होता है। शेष ऊर्जा अन्य चयापचय प्रक्रियाओं में उपयोग हो जाती है और कुछ ऊष्मा के रूप में बाहर निकल जाती है।

पारिस्थितिकीय पिरामिड

  • किसी पारिस्थितिकी तंत्र में प्राथमिक उत्पादकों और अलग-अलग श्रेणियों के उपभोक्ताओं (प्रथम, द्वितीय, तृतीय और उच्चतम श्रेणी) की संख्या, जैव भार और संग्रहीत ऊर्जा के बीच संबंध को जब चित्र (ग्राफिकल) के रूप में दिखाया जाता है, तो उसे पारिस्थितिकीय पिरामिड कहा जाता है।
  • पारिस्थितिकीय पिरामिड का वर्णन सबसे पहले ब्रिटेन के चार्ल्स एल्टन ने 1927 में किया था।
  • पारिस्थितिकीय पिरामिड के मुख्य तीन प्रकार होते हैं
  • संख्या का पिरामिड, जैव भार का पिरामिड और ऊर्जा का पिरामिड।

संख्या का पिरामिड

  • इस पिरामिड में उत्पादक और उपभोक्ता स्तर पर जीवों की संख्या को दर्शाया जाता है। सामान्यतः इस प्रकार का पिरामिड सीधा होता है, जिसमें उत्पादकों की संख्या सबसे अधिक और उपभोक्ताओं की संख्या सबसे कम होती है। उदाहरण: वृक्ष पारिस्थितिकी तंत्र
  • अपवाद: कुछ संख्या पिरामिड उल्टे (inverted) भी होते हैं।
  • उदाहरण: परजीवी खाद्य श्रृंखला
  • इस श्रृंखला की शुरुआत एक बड़े पेड़ से होती है, उस पर निर्भर पक्षियों की संख्या अधिक होती है और इन पक्षियों पर निर्भर परजीवियों की संख्या सबसे अधिक होती है।

परजीवी खाद्य श्रृंखला में संख्याओं का पिरामिड (उल्टा)

घास के मैदान पारिस्थितिकी तंत्र में संख्याओं का पिरामिड (सीधा)

जैव भार का पिरामिड

  • किसी पारिस्थितिकी तंत्र की खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक पोषण स्तर पर कुल शुष्क भार को जैव भार कहा जाता है।
  • जैव भार का पिरामिड सीधा और उल्टा दोनों प्रकार का हो सकता है।
  • उदाहरण के लिए, वन और घास भूमि पारिस्थितिकी तंत्र में जैव भार का पिरामिड सीधा होता है।
  • इसके विपरीत, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में जैव भार का पिरामिड अक्सर उल्टा होता है। हालांकि पादप प्लवक (फाइटोप्लैंकटन) और सूक्ष्म एक कोशिकीय शैवाल (डायटम) जैसे प्राथमिक उत्पादक बहुत अधिक संख्या में होते हैं, लेकिन उनकी तीव्र परिवर्तन दर के कारण किसी भी समय उनका जैव भार उच्च पोषण स्तरों की तुलना में कम होता है।

वन पारिस्थितिकी तंत्र में जैव भार का पिरामिड (सीधा)

घास के मैदान पारिस्थितिकी तंत्र में संख्याओं का पिरामिड (सीधा)

ऊर्जा का पिरामिड

  • हर खाद्य श्रृंखला में जब हम एक पोषण स्तर से अगले स्तर की ओर बढ़ते हैं, तो ऊर्जा की मात्रा कम होती जाती है।
  • एक स्तर पर संग्रहित ऊर्जा का केवल 10% भाग ही अगले पोषण स्तर के जीवों तक पहुँचता है।
  • इस प्रकार उत्पादकों के पास सबसे अधिक ऊर्जा होती है, जो खाद्य श्रृंखला के अगले स्तरों (उपभोक्ताओं) पर धीरे-धीरे कम होती जाती है।
  • इसी कारण किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का पिरामिड हमेशा सीधा होता है।
पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन

प्रदूषण सूचक

  • लाइकेन → प्रदूषित क्षेत्रों (विशेषकर अधिक SO₂ प्रदूषण) में नहीं उगते → स्वच्छ वायु के सूचक
  • समुद्री शैवाल → भारी धातुओं वाले प्रदूषित जल में उगते हैं → भारी धातु प्रदूषण के सूचक
  • खरपतवार → उपजाऊ और बंजर दोनों प्रकार की मिट्टी में उगते हैं → मिट्टी की स्थिति (अच्छी/खराब) के सूचक
  • नदी ऊदबिलाव → प्रदूषित जल में लुप्त हो जाते हैं → इनकी उपस्थिति स्वस्थ मीठे पानी/समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत है
  • जल पिस्सू (डैफनिया), ट्राउट मछली, झींगे, स्टोनफ्लाई लार्वा → केवल स्वच्छ जल में पाए जाते हैं → प्रदूषण रहित जल के सूचक
  • टाइफिफ़ैक्स (एनेलिडा), चिटोनोमस लार्वा, ई. कोलाई, सीवेज फंगस, स्लज वर्म, ब्लड वर्म →  प्रदूषित जल में जीवित रहते हैं → जल प्रदूषण के सूचक
  • चमगादड़ → प्रकाश, भारी धातुओं और शहरी प्रदूषण के प्रति संवेदनशील → पारिस्थितिकीय तनाव के सूचक
  • घोंघे (मार्श पेरीविंकल) →  प्रदूषित दलदली क्षेत्रों में इनकी संख्या कम हो जाती है → स्वस्थ दलदली पारिस्थितिकी तंत्र के सूचक
  • उत्तरी चित्तीदार उल्लू →  वन क्षरण के साथ इनकी संख्या घटती है → वन स्वास्थ्य के सूचकडायटम → औद्योगिक/कृषि जनित जैविक प्रदूषण के साथ इनकी संरचना बदलती है → जैविक और पोषक प्रदूषण के सूचक
  • स्यूडोमोनास (जीवाणु) → प्रदूषित वातावरण में जीवित रह सकते हैं → जैविक प्रदूषण के सूचक
  • जिम्नोस्पर्म → प्रदूषण के प्रति कम संवेदनशील → मध्यम प्रदूषण में भी जीवित रह सकते हैं
  • पक्षी → विषैले तत्वों और आवास में बदलाव के प्रति संवेदनशील
  • कबूतर → भारी धातु प्रदूषण (Pb, Zn) के जैव-सूचक
  • मधुमक्खियां → वायु प्रदूषण और रेडियोधर्मी कणों (जैसे स्ट्रॉन्शियम-90) का पता लगाती हैं।

प्रवाल भित्ति (कोरल रीफ)

पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन
  • प्रवाल भित्तियाँ समुद्र के अंदर पाए जाने वाले पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जो प्रवाल पॉलिप्स की कॉलोनियों से बनते हैं और कैल्शियम कार्बोनेट से जुड़े रहते हैं।
  • ये गर्म, उथले और साफ उष्णकटिबंधीय समुद्री जल में अच्छी तरह विकसित होते हैं।
  • प्रवाल वास्तव में जीव होते हैं, जो अवृंत (बिना डंठल का) होते हैं और समुद्र की सतह पर स्थायी रूप से चिपके रहते हैं।
  • प्रवाल का एककोशिकीय शैवाल जोक्सैंथेली के साथ सहजीवी संबंध होता है।
  • ये शैवाल प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से भोजन और पोषक तत्व बनाते हैं और प्रवाल को प्रदान करते हैं।
  • हालाँकि प्रवाल भित्तियाँ समुद्र तल के 0.1% से भी कम क्षेत्र में फैले होते हैं, फिर भी वे समुद्री जैव विविधता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
  • ये लगभग 25% समुद्री प्रजातियों को आवास, भोजन और प्रजनन स्थल प्रदान करते हैं।
  • इसी कारण प्रवाल भित्तियों को अक्सर “समुद्र के वर्षावन” कहा जाता है।

प्रवाल भित्तियों का स्थान

  • प्रवाल त्रिकोण\कोरल ट्रायंगल (दक्षिण पूर्व एशिया): यह दुनिया का सबसे अधिक जैव विविधता वाला प्रवाल भित्ति क्षेत्र है, जिसे अक्सर “समुद्र का अमेज़न” कहा जाता है।
  • इसमें इंडोनेशिया, फिलीपींस, मलेशिया, पापुआ न्यू गिनी, तिमोर-लेस्ते और सोलोमन द्वीप शामिल हैं।
  • यहाँ दुनिया की लगभग 76% कोरल प्रजातियां पाई जाती हैं।
  • ग्रेट बैरियर रीफ: यह विश्व की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति प्रणाली है, जो ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित है।
  • भारत में प्रवाल पारिस्थितिक तंत्र: भारत में प्रवाल भित्तियाँ कच्छ की खाड़ी, मन्नार की खाड़ी, पाक खाड़ी, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप द्वीपसमूह में पाई जाती हैं।


प्रवाल विरंजन (कोरल ब्लीचिंग)

  • यह तब होता है जब – (i) जोक्सैंथेली की संख्या घट जाती है, (ii) जोक्सैंथेली में प्रकाश-संश्लेषी वर्णकों की मात्रा कम हो जाती है।

कारण

  • समुद्र के तापमान में परिवर्तन – जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के तापमान में वृद्धि कोरल ब्लीचिंग का प्रमुख कारण है।
  • बहाव और प्रदूषण – तूफान के दौरान होने वाली वर्षा समुद्री जल को तेजी से पतला कर सकती है और बहकर आने वाला पानी प्रदूषकों को समुद्र तक ले आता है, जिससे तटीय कोरल प्रभावित होते हैं।
  • उच्च सौर विकिरण: जब तापमान अधिक होता है, तब तेज़ सौर विकिरण उथले पानी में रहने वाले कोरल में ब्लीचिंग को बढ़ा देता है।
  • अत्यधिक निम्न ज्वार – अत्यधिक निम्न ज्वार के दौरान उथले पानी के कोरल हवा के संपर्क में आ जाते हैं, जिससे ब्लीचिंग हो सकती है।
  • समुद्र का अम्लीकरण – कार्बन डाइऑक्साइड की अधिक मात्रा समुद्र के pH को कम कर देती है, जिससे कोरल का कंकाल कमजोर हो जाता है और उनकी वृद्धि धीमी हो जाती है। राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के अनुसार औद्योगिक क्रांति के बाद से समुद्र की अम्लता लगभग 30% बढ़ गई है।
  • जलवायु परिवर्तन: समुद्र का गर्म होना, समुद्र स्तर में वृद्धि और तूफानों की तीव्रता बढ़ना कोरल की मृत्यु का कारण बन सकता है।
  • प्रदूषण – समुद्री कचरा: प्लास्टिक और अन्य कचरा कोरल को शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाते हैं और विषैले पदार्थ भी छोड़ते हैं। प्रशांत महासागर में ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच कोरल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा है।अत्यधिक मछली पकड़ना और विनाशकारी मत्स्य पालन पद्धतियाँ
  • मानव गतिविधियाँ – अस्थिर पर्यटन, संसाधनों का अत्यधिक दोहन और लापरवाही से की जाने वाली मनोरंजक गतिविधियां कोरल पारिस्थितिकी तंत्र पर अधिक दबाव डालती हैं।

प्रवाल भित्तियों के प्रकार

तटीय प्रवाल भित्ति (फ्रिंजिंग रीफ): ये समुद्र तट के किनारे विकसित होते हैं और तट से उथले लैगून द्वारा अलग रहते हैं।
एटोल: ये वृत्ताकार (रिंग के आकार की) रीफ होती हैं, जो एक लैगून को चारों ओर से घेरती हैं। ये अक्सर डूबे हुए ज्वालामुखीय द्वीपों के आसपास बनती हैं।
अवरोधक प्रवाल भित्तियाँ (बैरियर रीफ): ये तट से काफी दूर समुद्र में पाए जाते हैं और भूमि से गहरे लैगून द्वारा अलग रहते हैं। ग्रेट बैरियर रीफ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
पैच रीफ: ये छोटी और अलग-थलग रीफ होती हैं, जो समुद्र की तलहटी से ऊपर की ओर बढ़ती हैं और सामान्यतः लैगून के अंदर पाई जाती हैं।

भारत में प्रवाल भित्ति संरक्षण हेतु पहल

  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: सभी कठोर प्रवालों को अनुसूची–I में शामिल किया गया है, जिससे उन्हें उच्चतम स्तर का कानूनी संरक्षण मिलता है।
  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: यह अधिनियम केंद्र सरकार को समुद्री पर्यावरण की रक्षा करने और समुद्री प्रदूषण को नियंत्रित करने का अधिकार देता है।
  • तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) अधिसूचना, 1991:यह अधिसूचना भारत में कोरल खनन पर स्पष्ट रूप से प्रतिबंध लगाती है और तटीय तथा समुद्री जैव विविधता की सुरक्षा करती है।
  • समुद्री संरक्षित क्षेत्र (MPAs): समुद्री आवासों, विशेषकर प्रवाल भित्तियों के संरक्षण के लिए निर्धारित क्षेत्र, जहाँ मत्स्य पालन और पर्यटन गतिविधियों को नियंत्रित किया जाता है।
  • प्रवाल भित्ति निगरानी: प्रवाल स्वास्थ्य और जैव-विविधता का नियमित आकलन, ताकि प्रभावी संरक्षण रणनीतियाँ तैयार की जा सकें। 
  • राष्ट्रीय प्रवाल भित्ति अनुसंधान केंद्र: प्रवाल भित्ति संरक्षण पर शोध करता है और इसके प्रति जागरूकता बढ़ाता है।

मैंग्रोव

  • मैंग्रोव एक लवण-सहिष्णु (नमक सहने वाले) पौधों का समुदाय है, जो उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय ज्वार-भाटा क्षेत्रों में पाया जाता है।
  • ये पारिस्थितिकी तंत्र अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों (1,000–3,000 मिमी) में अच्छे से विकसित होते हैं, जहां तापमान लगभग 26°C से 35°C के बीच रहता है। मैंग्रोव प्रजातियाँ जलभराव वाली मिट्टी, अधिक लवणता और बार-बार आने वाले ज्वारीय प्रभावों में जीवित रहने के लिए अनुकूलित होती हैं।
  • ये पारिस्थितिकी तंत्र जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण आश्रय स्थल का काम करते हैं और चरम जलवायु घटनाओं के खिलाफ जैविक ढाल के रूप में कार्य करते हैं। इसके अलावा, ग्रामीण समुदाय अपनी आजीविका के लिए मैंग्रोव से प्राप्त बायोमास पर निर्भर रहते हैं।
  • मैंग्रोव वन भूमि और समुद्र के बीच एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक बफर के रूप में कार्य करते हैं और कई समुद्री तथा स्थलीय प्रजातियों को आवास प्रदान करते हैं।
  • महत्त्व – मैंग्रोव : प्रकृति का कार्बन भंडार
  • वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) के अनुसार, मैंग्रोव प्रति एकड़ उष्णकटिबंधीय वनों की तुलना में 7.5 से 10 गुना अधिक कार्बन संग्रहित करते हैं। 
  • मैंग्रोव वनों के नष्ट होने से वनों की कटाई से होने वाले वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 10% हिस्सा बढ़ जाता है।
  • ये तटीय वन 21 गीगाटन से अधिक कार्बन को संग्रहित रखते हैं, जिसमें से 87% कार्बन उनकी जड़ों के नीचे की मिट्टी में संग्रहित होता है।
  • यदि नष्ट हुए मैंग्रोव वनों के केवल 1.6 मिलियन एकड़ क्षेत्र को पुनर्स्थापित किया जाए, तो अतिरिक्त 1 गीगाटन कार्बन को अवशोषित किया जा सकता है।
  • विशेषता  
    • वायवीय जड़ें (न्यूमेटोफोर्स) : ये जड़ें जलभराव वाली मिट्टी में सांस लेने में मदद करती हैं।
    • स्तंभ (प्रोप) जड़ें : ये जड़ें लहरों और ज्वार-भाटा के बीच पौधे को मजबूती और सहारा देती हैं।
    • जरायुजता या सजीवप्रजता (विविपेरी) : इसमें बीज माता पौधे से जुड़े रहते हुए ही अंकुरित हो जाते हैं, जिससे खारे पानी में उनके जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है।
    • उच्च कार्बन अवशोषण क्षमता –  मैंग्रोव कार्बन को प्रभावी रूप से संग्रहित करने की क्षमता रखते हैं।
भारत की वन स्थिति रिपोर्ट (आईएसएफआर) 2023 के अनुसार
  1. भारत में कुल मैंग्रोव क्षेत्र 4,991.68 वर्ग किमी है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.15% है।वर्ष 2013 की तुलना में 2023 तक मैंग्रोव क्षेत्र में 363.68 वर्ग किमी (7.86%) की शुद्ध वृद्धि हुई है।वहीं 2001 से 2023 के बीच मैंग्रोव क्षेत्र में 509.68 वर्ग किमी (11.4%) की शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई है।
  2. पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक मैंग्रोव क्षेत्र (42.45%) है, इसके बाद गुजरात (23.66%) और अंडमान व निकोबार द्वीप समूह (12.39%) का स्थान है।
  3. भारत का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन सुंदरबन (पश्चिम बंगाल) में स्थित है, जिसे दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक माना जाता है।
पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन

मैंग्रोव के संरक्षण के लिए भारतीय प्रयास

  • मैंग्रोव इनिशिएटिव फॉर शोरलाइन हैबिटैट्स एंड टैन्जिबल इनकम्स (MISHTI) :
    • यह सरकार द्वारा 2023 में शुरू की गई एक पहल है, जिसका उद्देश्य समुद्री तटों और नमक के मैदान पर मैंग्रोव क्षेत्र को बढ़ाना है।
    • भारत ने नवंबर 2022 में मिस्र में आयोजित UNFCCC के 27वें सम्मेलन (COP27) के दौरान शुरू किए गए मैंग्रोव एलायंस फॉर क्लाइमेट में शामिल होने के बाद यह पहल शुरू की।
    • इसे पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून 2023) के अवसर पर लॉन्च किया गया।
    • MISHTI योजना के तहत 2023–24 से शुरू होकर पाँच वर्षों की अवधि में 13 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 540 वर्ग किमी क्षेत्र में मैंग्रोव का पुनर्स्थापन और वनीकरण करने की योजना है।
  • मैजिकल मैंग्रोव अभियान : यह अभियान तटीय राज्यों के नागरिकों को मैंग्रोव संरक्षण के लिए प्रेरित करता है।
  • ग्रीन क्लाइमेट फंड द्वारा समर्थित “एनहांसिंग कोस्टल रेसिलिएंस ऑफ इंडियन कोस्टल कम्युनिटी” (GCF–ECRICC) : यह परियोजना 2019 से आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा में सक्रिय है।
  • मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र में टिकाऊ जलीय कृषि (SAIME) : इस परियोजना के तहत ऐसे मत्स्य पालन फार्म बनाए जाते हैं, जो सतत एकीकृत मैंग्रोव एक्वाकल्चर प्रणाली का उपयोग करते हैं। यह परियोजना ग्लोबल नेचर फंड (GNF) के सहयोग से भारत और बांग्लादेश में लागू की गई है। 
  • तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) नियम : मैंग्रोव की सुरक्षा के लिए CRZ क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों, कचरा फेंकने और भूमि पुनः प्राप्ति पर प्रतिबंध लगाते हैं।
  • मैंग्रोव एवं प्रवाल भित्तियों का संरक्षण एवं प्रबंधन : इस योजना का उद्देश्य मैंग्रोव वनों की सुरक्षा, संरक्षण, संवर्धन और सतत प्रबंधन के लिए उपाय लागू करना है।
  • राष्ट्रीय मैंग्रोव समिति – मैंग्रोव संरक्षण और विकास के लिए सरकार को सलाह देने हेतु 1976 में स्थापित की गई।

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