दैनिक जीवन में विज्ञान विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण भाग है, जो हमारे रोज़मर्रा के कार्यों को सरल और प्रभावी बनाता है। भौतिक विज्ञान के सिद्धांत जैसे गति, ऊर्जा, प्रकाश, विद्युत और गुरुत्वाकर्षण हमारे आसपास की हर गतिविधि में दिखाई देते हैं। ये अवधारणाएँ न केवल उपकरणों के कार्य को समझाती हैं बल्कि हमारे जीवन को अधिक सुविधाजनक और उन्नत बनाती हैं।
विज्ञान सोचने, देखने-समझने और कार्य करने का एक तरीका है, जिसके माध्यम से हम अपने आसपास की दुनिया को समझते हैं और ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने का प्रयास करते हैं।
भौतिक विज्ञान
इकाइयाँ और मापन
- इकाई (Unit) : इकाई वह निश्चित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानक है जिसका उपयोग किसी भौतिक राशि के मापन के लिए किया जाता है।
- मूलभूत (आधारभूत) इकाइयाँ – ये वे इकाइयाँ हैं जो किसी अन्य इकाई पर निर्भर नहीं होती हैं।
- मूलभूत राशियाँ – इकाई और प्रतीक
- लंबाई – मीटर (m)
- द्रव्यमान – किलोग्राम (kg)
- समय – सेकंड (s)
- विद्युत धारा – एम्पियर (A)
- तापमान – केल्विन (K)
- पदार्थ की मात्रा – मोल (mol)
- प्रकाश तीव्रता – कैण्डेला (cd)
- इन सात आधार इकाइयों के अलावा दो और इकाइयाँ होती हैं—
- समतल कोण की इकाई — रेडियन (rad)
- ठोस कोण की इकाई — स्टेरेडियन (sr)
- ये दोनों आयाम रहित राशियाँ होती हैं।
- व्युत्पन्न राशियाँ
- वे राशियाँ जिन्हें मूलभूत राशियों की सहायता से व्यक्त किया जा सकता है।
- उदाहरण – क्षेत्रफल (m²), वेग – m/s
अंतरराष्ट्रीय इकाई प्रणाली
- पुराने समय में विभिन्न देशों में मापन की अलग-अलग प्रणालियों का उपयोग किया जाता था।
- सबसे अधिक प्रचलित मापन प्रणालियाँ थीं:
| प्रणाली | लंबाई | द्रव्यमान | समय |
| CGS | सेंटीमीटर (सेमी) | ग्राम (g) | सेकंड (s) |
| FPS | फुट (फीट) | पाउंड (lb) | सेकंड (s) |
| MKS | मीटर (मी) | किलोग्राम (kg) | सेकंड (s) |
- SI प्रणाली (अंतर्राष्ट्रीय इकाई प्रणाली) — यह इकाइयों की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत प्रणाली है।
- इसे अंतरराष्ट्रीय भार एवं माप ब्यूरो द्वारा विकसित किया गया था।
- इसका नवीनतम संशोधन नवंबर 2018 में किया गया।
कुछ महत्वपूर्ण भौतिक राशियाँ और उनकी इकाइयाँ
| भौतिक राशि | इकाइयाँ |
| दाब | पास्कल (Pa), एटमॉस्फियर (atm), बार (bar), टॉर (mmHg) |
| ध्वनि की प्रबलता | डेसीबल (decibel), बेल (bel), फोन (phon) |
| ऊर्जा / कार्य / ऊष्मा | जूल (J), एर्ग (erg), कैलोरी (calorie), इलेक्ट्रॉन-वोल्ट (eV), किलोवाट-घंटा (kWh) |
| बल | न्यूटन (N), डाइन (dyne), किलोग्राम-बल (kgf) |
| शक्ति | वाट (W), हॉर्सपावर (hp), एर्ग/सेकंड (erg/sec) |
| तापमान | सेल्सियस (°C), केल्विन (K), फारेनहाइट (°F) |
| लंबाई / दूरी | मीटर (m), किलोमीटर, माइल, फुट, इंच, नॉटिकल माइल, प्रकाश-वर्ष (light year), खगोलीय इकाई (AU), पारसेक (parsec) |
| द्रव्यमान | किलोग्राम (kg), ग्राम, टन (tonne), पाउंड (lb), औंस (ounce) |
| प्रकाश / आलोकन | ल्यूमेन (lm), कैण्डेला (cd), लक्स (lux) |
| गहन गुण | व्यापक गुण |
| वे गुण जो पदार्थ के आकार या मात्रा पर किसी भी प्रकार से निर्भर नहीं करते हैं। | वे गुण जो किसी तंत्र के आकार या उसमें उपस्थित पदार्थ की मात्रा पर निर्भर करते हैं। |
| उदाहरण — तापमान, घनत्व, क्वथनांक, गलनांक, रंग, तन्यता, चालकता, दाब, चमक, हिमांक, गंध, अपवर्तनांक, विशिष्ट ऊष्मा धारिता, श्यानता आदि। | उदाहरण — लंबाई, द्रव्यमान, आयतन, भार, एन्थैल्पी, एंट्रोपी, गिब्स ऊर्जा, आंतरिक ऊर्जा। |
गति व गति कि नियम
सीधी रेखा में गति
- गति – जब किसी वस्तु की स्थिति समय के साथ बदलती है, तो वह वस्तु गति में मानी जाती है। जब यह गति सीधी रेखा के साथ होती है, तो उसे सरल रेखीय गति कहते हैं।
- दूरी – किसी वस्तु द्वारा तय किए गए मार्ग की कुल लंबाई को दूरी कहते हैं। यह एक अदिश राशि है, अर्थात इसमें केवल परिमाण होता है। यह हमेशा धनात्मक या शून्य होती है।
- विस्थापन – प्रारंभिक स्थिति से अंतिम स्थिति तक सीधी रेखा में होने वाले सबसे कम परिवर्तन को विस्थापन कहते हैं। यह एक सदिश राशि है, अर्थात इसमें परिमाण और दिशा दोनों होते हैं।
- दूरी ≥ विस्थापन हमेशा होता है।
- चाल – समय के साथ दूरी के परिवर्तन की दर को चाल कहते हैं। यह एक अदिश राशि है, जिसमें केवल परिमाण होता है। यह हमेशा धनात्मक या शून्य होती है। यह बताती है कि कोई वस्तु कितनी तेज चल रही है।
- वेग – समय के साथ विस्थापन के परिवर्तन की दर को वेग कहते हैं। यह एक सदिश राशि है, जिसमें परिमाण और दिशा दोनों होते हैं। यह धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य हो सकता है। यह बताता है कि कोई वस्तु कितनी तेज और किस दिशा में चल रही है।
- त्वरण – वेग के परिवर्तन की दर को त्वरण कहते हैं। वेग में परिवर्तन निम्न कारणों से हो सकता है — चाल में परिवर्तन, दिशा में परिवर्तन, या दोनों में परिवर्तन। त्वरण धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य हो सकता है।
- एकसमान त्वरण – जब किसी वस्तु का त्वरण समय के साथ नियत रहता है, तो उसे एकसमान त्वरण कहते हैं। मुक्त पतन जैसे कई गतियाँ समान त्वरण के उदाहरण हैं।
गति के समीकरण (समान त्वरण वाली गति के लिए)
- v = u + at (अंतिम वेग, प्रारंभिक वेग, त्वरण और समय पर निर्भर करता है)
- S = ut + ½ at² (विस्थापन, प्रारंभिक वेग, समय और त्वरण पर निर्भर करता है)
- v² = u² + 2as (वेग और विस्थापन के बीच संबंध बताता है — इसमें समय शामिल नहीं होता)
मुक्त पतन
- जब कोई वस्तु केवल गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में गिरती है और उस पर कोई अन्य बल (जैसे वायु प्रतिरोध) कार्य नहीं करता, तो इस गति को मुक्त पतन कहते हैं।
- इस स्थिति में वस्तु पर केवल गुरुत्वाकर्षण बल ही कार्य करता है।
- वस्तु का द्रव्यमान मुक्त पतन को प्रभावित नहीं करता।
- गिरते समय वस्तु की गति लगातार बढ़ती रहती है।
भारहीनता
- जब किसी वस्तु का आभासी भार (किसी वस्तु द्वारा महसूस किया गया या तराजू पर दिखने वाला वजन) शून्य हो जाता है, तो उस स्थिति को भारहीनता कहते हैं।
- नोट — वस्तु का वास्तविक भार शून्य नहीं होता, लेकिन उसे महसूस नहीं किया जा सकता।
- जब कोई व्यक्ति मुक्त रूप से गिरता है, तो उस पर लगने वाला आधार बल शून्य हो जाता है, इसलिए उसे भारहीनता महसूस होती है।
- उदाहरण –
- अंतरिक्ष यात्री भारहीनता का अनुभव करते हैं क्योंकि उपग्रह और अंतरिक्ष यात्री दोनों पृथ्वी के चारों ओर लगातार मुक्त पतन की अवस्था में होते हैं।
- यदि कोई लिफ्ट मुक्त रूप से गिरने लगे, तो उसके अंदर मौजूद व्यक्ति को भारहीनता महसूस होती है।
बल व गति के नियम
- बल एक बाह्य कारक (धक्का देना या खींचना) है, जो निम्न कार्य कर सकता है—
- विराम अवस्था का गतिशील अवस्था में परिवर्तन
- गति या वेग में परिवर्तन
- दिशा में परिवर्तन
- वस्तु के आकार में परिवर्तन (विकृत) करना
- बल (क्रिया के आधार पर)
- संपर्क बल — जब बल के लिए वस्तुओं का संपर्क आवश्यक होता है। उदाहरण — घर्षण बल, तनाव बल, अभिलंब बल
- असंपर्क बल — जब बिना संपर्क के बल कार्य करता है।
- उदाहरण — गुरुत्वाकर्षण बल, चुंबकीय बल
गति के नियम
जड़त्व का नियम (गैलीलियो) –
- घर्षण रहित सतह पर गतिमान वस्तु स्वयं नहीं रुकती।
- यदि कोई वस्तु विराम अवस्था में है या सीधी रेखा में समान वेग से गति करती है तो यह दोनों एक जैसी भौतिक अवस्थाएँ मानी जाती हैं, क्योंकि इनमें से किसी भी अवस्था को बनाए रखने के लिए कोई बल आवश्यक नहीं होता।
- इसी विचार से न्यूटन का प्रथम नियम विकसित हुआ।
न्यूटन का गति का प्रथम नियम
- प्रत्येक वस्तु अपनी विराम अवस्था या सीधी रेखा में समान वेग से गति की अवस्था को बनाए रखती है, जब तक उस पर कोई बाह्य बल कार्य न करे।
- इस नियम को गैलीलियो का नियम या जड़त्व का नियम भी कहा जाता है।
- जड़त्व — जड़त्व वह गुण है जिसके कारण कोई वस्तु अपनी प्रारंभिक अवस्था (विराम या समान वेग से सीधी रेखा में गति) में परिवर्तन का विरोध करती है।
- जड़त्व दो प्रकार का होता है –
- 1. विराम का जड़त्व 2. गति का जड़त्व
- उदाहरण —
- जब कार या ट्रेन अचानक चलना शुरू करती है, तो यात्री पीछे की ओर झुक जाते हैं।
- जब दौड़ता हुआ घोड़ा अचानक रुकता है, तो सवार आगे की ओर झुक जाता है।
- जब कोट या कंबल को डंडे से झटका जाता है, तो उसमें से धूल निकल जाती है।
न्यूटन का गति का द्वितीय नियम
- किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर उस पर लगाए गए बल के समानुपाती होती है और यह परिवर्तन बल की दिशा में होता है।
- F = ma
- उदाहरण —
- रॉकेट का प्रक्षेपण
- कराटे खिलाड़ी द्वारा ईंटों की स्लैब तोड़ना
- खिलाड़ी गेंद पकड़ते समय अपने हाथ पीछे की ओर ले जाते हैं, जिससे गेंद को अपनी गति कम करने के लिए अधिक समय मिलता है।
न्यूटन का गति का तृतीय नियम
- प्रत्येक क्रिया के लिए बराबर और विपरीत दिशा में एक प्रतिक्रिया होती है।
- यह दोनों बल परस्पर टकराव के बिना भी उत्पन्न हो सकते है और ये दोनों बल हमेशा दो अलग-अलग वस्तुओं पर कार्य करते हैं।
- उदाहरण —
- बंदूक का प्रतिक्षेप
- रॉकेट की गति
- तैरना
- कुएँ से पानी खींचते समय यदि रस्सी टूट जाए तो पानी खींचने वाला व्यक्ति पीछे की ओर गिर जाता है।
- स्वतंत्र रूप से लटके हुए लकड़ी के फ्रेम में कील ठोकना कठिन होता है।
रेखीय संवेग संरक्षण का सिद्धांत
- यदि किसी निकाय पर कोई बाह्य बल कार्य न कर रहा हो, तो उस निकाय का कुल रेखीय संवेग हमेशा स्थिर या संरक्षित रहता है।
- इसका अर्थ है कि टक्कर से पहले और टक्कर के बाद निकाय का कुल संवेग समान रहता है।
- रॉकेट रेखीय संवेग संरक्षण के सिद्धांत पर कार्य करता है।
आवेग
- जब किसी वस्तु पर बहुत कम समय के लिए बहुत अधिक बल लगाया जाता है, तो उस बल को आवेगात्मक बल कहते हैं।
- आवेग को बल और समय के गुणनफल के रूप में परिभाषित किया जाता है।
- आवेग = बल × समय = संवेग में परिवर्तन। (अर्थात किसी वस्तु के संवेग में होने वाला परिवर्तन है, जो एक छोटे समय अंतराल के लिए उस पर लगने वाले बल के कारण होता है)
- यह एक सदिश राशि है और इसकी दिशा बल की दिशा के समान होती है। इसका SI मात्रक न्यूटन-सेकंड (Ns) है।
घर्षण व बलों के प्रकार
घर्षण
- परस्पर संपर्क में स्थित दो वस्तुओं के बीच सापेक्ष गति का विरोध करने वाले बल को घर्षण कहते हैं।
- घर्षण संपर्क सतह की प्रकृति पर निर्भर करता है। सतह जितनी अधिक खुरदरी होती है, घर्षण उतना ही अधिक होता है।
- घर्षण के प्रकार
- स्थैतिक घर्षण– जब दो वस्तुओं के बीच कोई सापेक्ष गति नहीं होती है तो उस समय लगने वाले बल को स्थैतिक घर्षण कहते हैं। यह एक स्व-समायोजित बल होता है। जब लगाया गया बल इतना बढ़ जाता है कि वस्तु गतिमान होने की कगार पर पहुँच जाती है, तब स्थैतिक घर्षण का मान अधिकतम हो जाता है। स्थैतिक घर्षण के इस अधिकतम मान को सीमांत घर्षण कहते हैं।
- गतिज घर्षण –जब एक वस्तु दूसरी वस्तु की सतह पर फिसलती हुई गतिमान होती है, तब उन दोनों सतहों के मध्य कार्य करने वाले घर्षण को गतिज घर्षण कहते हैं। गतिज घर्षण का मान सीमांत घर्षण से कम होता है। यदि वस्तुओं के बीच की गति कम हो, तो गतिज घर्षण आपेक्षिक वेग पर निर्भर नहीं करता।
- लोटनिक घर्षण – जब कोई वस्तु किसी दूसरी सतह पर लुढ़कती है, तो संपर्क क्षेत्र के विरूपण के कारण जो प्रतिरोध उत्पन्न होता है, उसे लोटनिक घर्षण कहते है।
लोटनिक घर्षण का मान गतिज घर्षण से बहुत कम होता है।
बलों के प्रकार
| संरक्षी बल | असंरक्षी बल |
| जब किसी बल द्वारा किया गया कार्य केवल वस्तु की प्रारंभिक और अंतिम स्थिति पर निर्भर करता है और वस्तु द्वारा अपनाए गए पथ पर निर्भर नहीं करता, तो ऐसे बल को संरक्षी बल कहते हैं।संरक्षी बल द्वारा बंद पथ में किया गया कुल कार्य शून्य होता है।उदाहरण — गुरुत्वाकर्षण बल, चुंबकीय बल, स्थिर विद्युत बल, प्रत्यास्थ बल आदि। | जब किसी बल द्वारा किया गया कार्य वस्तु द्वारा तय किए गए पथ पर निर्भर करता है, तो ऐसे बल को असंरक्षी बल कहते हैं।असंरक्षी बल द्वारा बंद पथ में किया गया कुल कार्य शून्य नहीं होता।उदाहरण: घर्षण बल, श्यान बल आदि। |
- संपर्क बल – पेशीय बल, घर्षण बल
- असंपर्क बल – चुम्बकीय, स्थिर विद्युत बल, गुरुत्वाकर्षण बल
अभिकेन्द्रीय बल
- जब कोई वस्तु वृत्ताकार पथ पर गति करती है, तो उसका वेग निरंतर बदलता रहता है। इसलिए उस वस्तु पर हमेशा पथ के केंद्र की ओर एक बाह्य बल कार्य करता है।
- वृत्ताकार गति को बनाए रखने के लिए आवश्यक बाह्य बल को अभिकेन्द्रीय बल कहते हैं।
- F = mv² / R

अभिकेन्द्रीय बल के उदाहरण
- यदि किसी पत्थर को डोरी से बाँधकर वृत्ताकार पथ में घुमाया जाए, तो आवश्यक अभिकेन्द्र बल डोरी में उत्पन्न तनाव द्वारा प्राप्त होता है।
- सूर्य के चारों ओर ग्रहों की गति के लिए आवश्यक अभिकेंद्रीय बल सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा प्राप्त होता है।
- परमाणु में नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों की गति के लिए आवश्यक अभिकेंद्रीय बल नाभिक के प्रोटॉन द्वारा उत्पन्न स्थिर विद्युत आकर्षण से मिलता है।
- जब कोई साइकिल चालक घुमावदार रास्ते से गुजरता है, तो वह पथ के केंद्र की ओर झुक जाता है, ताकि जमीन द्वारा लगाया गया अभिलंब अभिक्रिया का क्षैतिज घटक आवश्यक अभिकेंद्रीय बल प्रदान कर सके। इसी कारण घुमावदार सड़कों के बाहरी किनारे को ऊँचा बनाया जाता है, जिसे सड़क का बैंकिंग कहते हैं।
अपकेंद्रीय बल
- न्यूटन के गति नियमों को लागू करते समय कभी-कभी हमें ऐसे बलों को भी मानना पड़ता है, जिन्हें आसपास की किसी वस्तु से सीधे नहीं जोड़ा जा सकता। ऐसे बलों को काल्पनिक (छद्म) बल या जड़त्वीय बल कहते हैं।
- अपकेंद्रीय बल ऐसा ही एक काल्पनिक बल है। यह अभिकेन्द्र बल के बराबर और विपरीत दिशा में होता है।
- क्रीम सेपरेटर (ऐसा उपकरण है जो दूध से क्रीम को अलग करने में मदद करता है) और सेंट्रीफ्यूगल ड्रायर (औद्योगिक मशीन जो तीव्र गति से घूमकर प्लास्टिक, धातु के टुकड़ों या खाद्य पदार्थों की सतह से नमी या तेल को हटाती है।) अपकेंद्रीय बल के सिद्धांत पर कार्य करते हैं।
- अपकेंद्रीय बल को अभिकेंद्रीय बल की प्रतिक्रिया नहीं समझना चाहिए, क्योंकि क्रिया और प्रतिक्रिया के बल हमेशा दो अलग-अलग वस्तुओं पर कार्य करते हैं।
कार्य, ऊर्जा और शक्ति
- कार्य –जब किसी वस्तु पर बल लगाने से वह वस्तु विस्थापित हो जाती है, तो कहा जाता है कि कार्य किया गया है।
- कार्य का मान बल और विस्थापन के गुणनफल के बराबर होता है, जहाँ विस्थापन बल की दिशा में लिया जाता है।
- कार्य एक अदिश राशि है और इसका SI मात्रक जूल है।
- W = F S cosθ (यहाँ θ = बल और विस्थापन के बीच का कोण)
- समान वृत्तीय गति के मामले में अभिकेंद्रीय बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है।
- ऊर्जा – किसी वस्तु की कार्य करने की क्षमता को उसकी ऊर्जा कहते हैं।
- ऊर्जा एक अदिश राशि है और इसकी SI इकाई जूल है।
- किसी वस्तु पर कार्य करने से उसमें जो ऊर्जा उत्पन्न होती है, उसे यांत्रिक ऊर्जा कहते हैं।
- यांत्रिक ऊर्जा दो प्रकार की होती है:
- स्थितिज ऊर्जा – किसी वस्तु की स्थिति या विन्यास के कारण उसमें उत्पन्न कार्य करने की क्षमता को स्थितिज ऊर्जा कहते हैं। उदाहरण: खींची या दबाई हुई स्प्रिंग की ऊर्जा, ऊँचाई पर संचित पानी की ऊर्जा, तना हुआ धनुष। पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र में किसी वस्तु की स्थितिज ऊर्जा —PE = mgh
- गतिज ऊर्जा – किसी वस्तु की गति के कारण उसमें मौजूद ऊर्जा को गतिज ऊर्जा कहते हैं। उदाहरण के लिए उड़ता हुआ हवाई जहाज में स्थितिज ऊर्जा और गतिज ऊर्जा दोनों होती हैं।
ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत
- ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है। ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो सकती है।
- जब ऊर्जा का उपयोग किसी एक रूप में होता है, तो उतनी ही मात्रा में ऊर्जा किसी दूसरे रूप में बदल जाती है। इसलिए ब्रह्मांड की कुल ऊर्जा हमेशा स्थिर रहती है। इसे ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत कहते हैं।
- जब किसी गेंद को ऊपर की ओर फेंका जाता है, तो उसकी स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है और गतिज ऊर्जा घटती है, लेकिन कुल ऊर्जा स्थिर रहती है।
| उपकरण | ऊर्जा का रूपांतरण |
| डायनेमो | यांत्रिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा |
| ट्यूब लाइट | विद्युत ऊर्जा → प्रकाश ऊर्जा |
| बैटरी | रासायनिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा |
| बिजली का बल्ब | विद्युत ऊर्जा → प्रकाश और ऊष्मा ऊर्जा |
| सौर सेल | सौर ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा |
| लाउडस्पीकर | विद्युत ऊर्जा → ध्वनि ऊर्जा |
| मोमबत्ती | रासायनिक ऊर्जा → प्रकाश और ऊष्मा ऊर्जा |
| विद्युत मोटर | विद्युत ऊर्जा → यांत्रिक ऊर्जा |
| माइक्रोफ़ोन | ध्वनि ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा |
| सितार | यांत्रिक ऊर्जा → ध्वनि ऊर्जा |
| फोटो सेल | प्रकाश ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा |
| रेक्टिफायर | प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) में परिवर्तित करता है |
| इन्वर्टर | दिष्ट धारा (DC) को प्रत्यावर्ती धारा (AC) में परिवर्तित करता है |
- शक्ति – कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं।
- शक्ति की SI इकाई वाट है, जिसका नाम वैज्ञानिक जेम्स वाट के सम्मान में रखा गया है।
- 1 वाट = 1 जूल/सेकंड
- हॉर्स पावर (H.P.) शक्ति की एक व्यावहारिक इकाई है। 1 H.P. = 746 वाट।
- 1 किलोवाट-घंटा (kWh) = 3.6 × 10⁶ जूल
गुरुत्वाकर्षण व अंतरिक्ष भौतिकी
गुरुत्वाकर्षण
- प्रत्येक पिंड (वस्तु) दूसरे पिंड (वस्तु) को एक बल से आकर्षित करता है, जिसे गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं।
- न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम – दो बिंदु पिंडों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती और उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
- यदि दो पिंडों के द्रव्यमान m₁ और m₂ हों तथा उनके बीच की दूरी r हो, तो उनके बीच गुरुत्वाकर्षण बल होगा –

- गुरुत्व – पृथ्वी द्वारा किसी वस्तु को अपने केंद्र की ओर खींचने वाले गुरुत्वाकर्षण बल को गुरुत्व कहते हैं।
- गुरुत्व के कारण किसी वस्तु में उत्पन्न त्वरण को गुरुत्वीय त्वरण कहते हैं, जिसे g से दर्शाते हैं। g का मान = 9.8 m/s²
- गुरुत्वीय त्वरण पिंड के आकार, आकृति और द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता। चंद्रमा पर g का मान पृथ्वी से कम होता है, इसलिए चंद्रमा पर मनुष्य पृथ्वी की तुलना में अधिक ऊँचा कूद सकता है।
गुरुत्वीय त्वरण (g) में परिवर्तन
- पृथ्वी की सतह से ऊँचाई या गहराई बढ़ने पर g का मान घटता है।
- ध्रुवों पर g का मान अधिकतम होता है।
- भूमध्य रेखा पर g का मान न्यूनतम होता है।
- पृथ्वी के घूर्णन के कारण g का मान घटता है।
- यदि पृथ्वी का कोणीय वेग बढ़ता है, तो g घटता है; और यदि कोणीय वेग घटता है, तो g बढ़ता है।
- यदि पृथ्वी का कोणीय वेग वर्तमान मान से 17 गुना हो जाए, तो भूमध्य रेखा पर वस्तु भारहीन हो जाएगी।
लिफ्ट में वस्तु का भार
- यदि लिफ्ट स्थिर हो या समान वेग से ऊपर या नीचे की ओर गतिमान हो, तो वस्तु का आभासी भार उसके वास्तविक भार के बराबर होता है।
- यदि लिफ्ट त्वरण के साथ ऊपर की ओर गतिमान हो, तो वस्तु का आभासी भार वास्तविक भार से अधिक हो जाता है।
- यदि लिफ्ट त्वरण के साथ नीचे की ओर गतिमान हो, तो वस्तु का आभासी भार वास्तविक भार से कम हो जाता है।
- यदि लिफ्ट की रस्सी टूट जाए, तो लिफ्ट मुक्त पतन में गिरती है। इस स्थिति में लिफ्ट के अंदर वस्तु का भार शून्य हो जाता है, जिसे भारहीनता कहते हैं।
- नीचे की ओर गति करते समय यदि लिफ्ट का त्वरण गुरुत्वीय त्वरण से अधिक हो जाए, तो लिफ्ट के अंदर रखी वस्तु लिफ्ट के सापेक्ष ऊपर की ओर गति करती है और लिफ्ट की छत से टकरा जाती है।
केप्लर के ग्रहों की गति के नियम
- प्रथम नियम – सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घ वृत्ताकार कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं और सूर्य दीर्घ वृत्ताकार कक्षा के एक फोकस पर स्थित होता है।
- द्वितीय नियम – सूर्य को केंद्र मानकर ग्रह का स्थिति सदिश समान समय में समान क्षेत्रफल तय करता है। अर्थात सूर्य के चारों ओर ग्रह की क्षेत्रीय वेग हमेशा स्थिर रहती है।

- इस नियम के अनुसार जब ग्रह सूर्य के पास होता है, तो उसकी गति अधिक होती है और जब ग्रह सूर्य से दूर होता है, तो उसकी गति कम हो जाती है। ग्रह की गति निकटतम बिंदु पर अधिकतम और दूरतम बिंदु पर न्यूनतम होती है।
- तृतीय नियम – सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हुए किसी ग्रह का परिक्रमण काल का वर्ग, सूर्य से ग्रह की औसत दूरी के घन के समानुपाती होता है। इससे स्पष्ट है कि जो ग्रह सूर्य से अधिक दूर होते हैं, उनका परिक्रमण काल अधिक होता है। उदाहरण के लिए बुध ग्रह का परिक्रमण काल 88 दिन है, जबकि प्लूटो (यम) ग्रह का परिक्रमण काल 247.7 वर्ष है।
उपग्रह – उपग्रह वे प्राकृतिक या कृत्रिम पिंड होते हैं जो किसी ग्रह के चारों ओर उसके गुरुत्वाकर्षण के कारण परिक्रमा करते हैं। चंद्रमा पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है, जबकि INSAT-IB पृथ्वी का एक कृत्रिम उपग्रह है।
उपग्रह का कक्षीय वेग
- उपग्रह का कक्षीय वेग उसके द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता। इसलिए समान त्रिज्या की कक्षा में घूमने वाले अलग-अलग द्रव्यमान के उपग्रहों का कक्षीय वेग समान होता है।
- कक्षीय वेग कक्षा की त्रिज्या (अर्थात पृथ्वी की सतह से उपग्रह की ऊँचाई) पर निर्भर करता है। कक्षा की त्रिज्या जितनी अधिक होगी, कक्षीय वेग उतना ही कम होगा।
- पृथ्वी की सतह के पास परिक्रमा करने वाले उपग्रह का कक्षीय वेग लगभग 7.92 km/s होता है।
पलायन वेग
- पलायन वेग वह न्यूनतम वेग है जिससे किसी वस्तु को पृथ्वी की सतह से ऊपर फेंकने पर वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को पार कर जाए और पुनः पृथ्वी पर न लौटे।
- पलायन वेग वस्तु के द्रव्यमान, आकार और आकृति तथा प्रक्षेपण की दिशा पर निर्भर नहीं करता।
- पलायन वेग को द्वितीय ब्रह्मांडीय वेग भी कहते हैं।
- पृथ्वी के लिए पलायन वेग = 11.2 km/s
- चंद्रमा के लिए पलायन वेग = 2.4 km/s
- पलायन वेग कक्षीय वेग का √2 गुना होता है। अर्थात यदि किसी उपग्रह के कक्षीय वेग को √2 गुना (लगभग 41% अधिक) कर दिया जाए, तो वह कक्षा छोड़कर अंतरिक्ष में चला जाएगा।
द्रव यांत्रिकी और पदार्थ के गुण
दाब
- दाब को किसी सतह के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लंबवत लगने वाले बल के रूप में परिभाषित किया जाता है।
- दाब का SI मात्रक N/m² है, जिसे पास्कल (Pa) कहते हैं। दाब एक अदिश राशि है।
अनुप्रयोग –
- बैग और सूटकेस में चौड़े हैंडल लगाए जाते हैं, ताकि उठाते समय हाथ पर कम दाब पड़े।
- रेलवे की पटरियों को बड़े आकार के लकड़ी के स्लीपरों पर रखा जाता है, ताकि ट्रेन के भार से उत्पन्न बल बड़े क्षेत्रफल में फैल जाए।
- पिन के सिरे नुकीले बनाए जाते हैं। इसी कारण सुई से गैस भरे गुब्बारे को आसानी से फोड़ा जा सकता है, क्योंकि सुई अधिक दाब उत्पन्न करती है।
- वायुमंडलीय दाब – पृथ्वी की सतह के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर वायु के भार द्वारा लगाया गया दाब वायुमंडलीय दाब कहलाता है।
- समुद्र तल पर 45° अक्षांश और 0°C तापमान पर 76 सेमी लंबाई के पारे के स्तंभ द्वारा लगाया गया दाब वायुमंडलीय दाब माना जाता है।
- यह 1 सेमी² क्षेत्रफल वाले 76 सेमी पारे के स्तंभ के भार के बराबर होता है। आमतौर पर इसे बार (bar) में मापा जाता है।
- 1 बार = 10⁵ N/m²,
- 1 atm = 1.01बार = 1.01 × 10⁵ N/m² = 760 टॉर।
- वायुमंडलीय दाब ऊंचाई बढ़ने पर घटता जाता है। इसी कारण —
- पहाड़ों पर खाना पकाना कठिन होता है।
- ऊँचाई पर विमान में यात्री की फाउंटेन पेन से स्याही बाहर निकल सकती है।
- वायुमंडलीय दाब को बैरोमीटर से मापा जाता है।
- बैरोमीटर की सहायता से मौसम का पूर्वानुमान भी लगाया जाता है।
- बैरोमीटर की रीडिंग में अचानक गिरावट — तूफान का संकेत
- रीडिंग में धीरे-धीरे गिरावट — वर्षा का संकेत
- रीडिंग में धीरे-धीरे वृद्धि — साफ मौसम का संकेत
द्रव का दाब –
द्रव के अणुओं द्वारा पात्र की दीवारों या तली के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगाए गए बल को द्रव का दाब कहते हैं।
द्रव के दाब के लिए पास्कल का नियम
- यदि गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव नगण्य हो, तो संतुलन की स्थिति में द्रव के सभी बिंदुओं पर दाब समान होता है।
- यदि किसी बंद द्रव पर बाहरी दाब लगाया जाए, तो वह दाब बिना घटे सभी दिशाओं में समान रूप से संचारित हो जाता है।
- हाइड्रोलिक लिफ्ट, हाइड्रोलिक प्रेस और हाइड्रोलिक ब्रेक पास्कल के नियम पर कार्य करते हैं।
तैरना (प्लवन)
उत्प्लावन बल
- जब किसी वस्तु को किसी द्रव में आंशिक या पूर्ण रूप से डुबोया जाता है, तो द्रव उस वस्तु पर ऊपर की ओर एक बल लगाता है। इस बल को उत्प्लावन बल, उत्क्षेप बल या उत्प्लावक बल कहते हैं। यह बल वस्तु द्वारा विस्थापित द्रव के भार के बराबर होता है और विस्थापित द्रव के गुरुत्व केंद्र पर कार्य करता है। इसका अध्ययन सबसे पहले आर्किमिडीज ने किया था।
आर्किमिडीज का सिद्धांत
- जब किसी वस्तु को किसी द्रव में आंशिक या पूर्ण रूप से डुबोया जाता है, तो वस्तु के भार में कमी महसूस होती है, जो वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होती है।
प्लवन का नियम
- कोई वस्तु द्रव में तभी तैरेगी, जब वस्तु के पदार्थ का घनत्व द्रव के घनत्व से कम या बराबर हो।
- यदि वस्तु का घनत्व द्रव के घनत्व के बराबर हो, तो वस्तु पूरी तरह डूबी हुई अवस्था में तैरेगी, जिसे उदासीन संतुलन कहते हैं।
- जब कोई वस्तु उदासीन संतुलन में तैरती है, तो वस्तु का भार विस्थापित द्रव के भार के बराबर होता है।
- वस्तु का गुरुत्व केंद्र और विस्थापित द्रव का गुरुत्व केंद्र एक ही ऊर्ध्वाधर रेखा में होना चाहिए।
- यदि नाव (पानी में तैरती हुई) से कोई ठोस वस्तु पानी में गिरा दी जाए, तो पानी का स्तर —
- कम हो जाएगा, यदि वस्तु का घनत्व पानी के घनत्व से अधिक हो और वह डूब जाए। उदाहरण — नाव से लोहे की कीलें निकालकर पानी में डालने पर वे डूब जाती हैं और पानी का स्तर कम हो जाता है।
- यदि निकाली गई वस्तु का घनत्व पानी के घनत्व से कम हो और वह पानी में तैरती रहे, तो पानी का स्तर नहीं बदलता।
- जब किसी द्रव में तैर रही बर्फ का टुकड़ा पूरी तरह पिघल जाता है, तो द्रव + पानी का स्तर —
- अपरिवर्तित रहता है, यदि द्रव का घनत्व = पानी के घनत्व के बराबर हो।
- घट जाता है, यदि द्रव का घनत्व < पानी के घनत्व से कम हो।
- बढ़ जाता है, यदि द्रव का घनत्व > पानी के घनत्व से अधिक हो।
- यदि किसी बर्फ के टुकड़े में कोई ठोस वस्तु जमी हुई हो और वह पानी में तैर रही हो, तो बर्फ के पूरी तरह पिघलने पर पानी का स्तर —
- घट जाएगा, यदि ठोस का घनत्व पानी के घनत्व से अधिक हो।
- नहीं बदलेगा, यदि ठोस का घनत्व पानी के घनत्व से कम हो।
- सापेक्ष घनत्व को हाइड्रोमीटर से मापा जाता है।
- समुद्री जल का घनत्व सामान्य पानी के घनत्व से अधिक होता है, इसलिए समुद्र के पानी में तैरना आसान होता है।
- जब बर्फ पानी में तैरती है, तो उसका लगभग 1/10 भाग पानी के ऊपर रहता है।
- यदि किसी पात्र में पानी में तैरती हुई बर्फ पिघल जाए, तो पात्र में पानी का स्तर नहीं बदलता।
- दूध की शुद्धता को लैक्टोमीटर से मापा जाता है
पृष्ठ तनाव
- पृष्ठ तनाव द्रव का वह गुण है जिसके कारण वह अपनी मुक्त सतह का क्षेत्रफल न्यूनतम रखने की प्रवृत्ति रखता है, उनकी सतह एक खिंची हुई प्रत्यास्थ झिल्ली की तरह व्यवहार करती है और न्यूनतम क्षेत्रफल घेरने की कोशिश करती है।

- तापमान बढ़ने पर द्रव का पृष्ठ तनाव घटता है और क्रांतिक तापमान पर यह शून्य हो जाता है।
- द्रव का पृष्ठ तनाव द्रव की मुक्त सतह पर खींची गई किसी काल्पनिक रेखा के दोनों ओर प्रति इकाई लंबाई पर लगने वाले सामान्य बल द्वारा मापा जाता है, जो सतह के स्पर्शरेखीय दिशा में होता है। (द्रव की सतह पर इकाई लंबाई पर कार्य करने वाले बल को पृष्ठ तनाव कहते हैं)
अनुप्रयोग
- द्रव की बूँद गोलाकार होती है, क्योंकि दिए गए आयतन के लिए गोले का पृष्ठ क्षेत्रफल न्यूनतम होता है।
- यदि एक साफ और सूखी सुई को धीरे से पानी की सतह पर रखा जाए, तो वह पृष्ठ तनाव के कारण तैरती रहती है।
- पानी में डिटर्जेंट या साबुन मिलाने से पृष्ठ तनाव कम हो जाता है, जिससे उसकी सफाई करने की क्षमता बढ़ जाती है।
- साबुन के घोल के बुलबुले बड़े होते हैं, क्योंकि साबुन मिलाने से पानी का पृष्ठ तनाव कम हो जाता है।
- जब पानी की सतह पर केरोसिन तेल छिड़का जाता है, तो पानी का पृष्ठ तनाव कम हो जाता है। इसके कारण पानी की सतह पर तैरने वाले मच्छरों के लार्वा डूबकर मर जाते हैं।
- गर्म सूप अधिक स्वादिष्ट लगता है, क्योंकि अधिक तापमान पर उसका पृष्ठ तनाव कम होता है और सूप जीभ के सभी भागों में आसानी से फैल जाता है।
केशिकात्व
- केशिका नली – यह बहुत ही संकीर्ण (बारीक) आंतरिक व्यास वाली एक पतली नली होती है।
- केशिकत्व – जब किसी केशिका नली को किसी द्रव में डुबोया जाता है, तो द्रव उस नली में ऊपर चढ़ता है या नीचे उतरता है। इस घटना को केशिकत्व कहते हैं।
- केशिका नली में द्रव जितनी ऊंचाई तक ऊपर चढ़ता या नीचे उतरता है, वह नली की त्रिज्या पर निर्भर करता है।
- केशिकत्व द्रव की प्रकृति और नली के पदार्थ पर भी निर्भर करता है।
- जो द्रव नली की दीवार को भिगोता है, वह नली में ऊपर चढ़ता है, और जो द्रव दीवार को नहीं भिगोता, वह नली में नीचे उतरता है।
- उदाहरण — जब काँच की केशिका नली को पानी में डुबोया जाता है, तो पानी नली में ऊपर चढ़ता है और पानी की मेनिस्कस (पानी की सतह पर बनने वाला वक्र) का आकार अवतल होता है। इसी प्रकार जब काँच की केशिका नली को पारे में डुबोया जाता है, तो पारा नली में नीचे उतरता है और पारे की मेनिस्कस का आकार उत्तल होता है।

अनुप्रयोग
- ब्लॉटिंग पेपर स्याही को सोख लेता है, क्योंकि उसके छिद्र केशिका नलियों की तरह कार्य करते हैं।
- दीपक की बत्ती में तेल ऊपर चढ़ता है, क्योंकि बत्ती में केशिकत्व क्रिया होती है।
- पौधों की जड़ों के सूक्ष्म रेशे मिट्टी से पानी को केशिकत्व क्रिया द्वारा खींचते हैं।
- केशिकत्व के कारण पानी की हानि को रोकने के लिए किसान मिट्टी को ढीला करके उसे टुकड़ों में तोड़ देते हैं।
- यदि किसी कृत्रिम उपग्रह में केशिका नली को पानी में डुबोया जाए, तो पानी नली के दूसरे सिरे तक ऊपर चढ़ जाता है, क्योंकि वहाँ वस्तु का आभासी भार शून्य होता है, इसलिए नली की लंबाई का प्रभाव नहीं पड़ता।
- तौलिया शरीर से पानी सोख लेता है, क्योंकि तौलिये के कपास के रेशों में केशिकत्व क्रिया होती है।
- मोमबत्ती में पिघला हुआ मोम बत्ती में ऊपर की ओर केशिकत्व क्रिया से चढ़ता है।
नोट:
- ससंजक बल – एक ही पदार्थ के अणुओं के बीच लगने वाले आकर्षण बल को संयोजक बल कहते हैं। ससंजक बल ठोसों में अधिकतम होता है, इसलिए ठोसों का आकार निश्चित होता है। गैसों में ससंजक बल नगण्य होता है।
- आसंजक बल – दो भिन्न पदार्थों के अणुओं के बीच लगने वाले आकर्षण बल को आसंजक बल कहते हैं। आसंजक बल के कारण एक वस्तु दूसरी वस्तु से चिपक जाती है।
श्यानता
- श्यान बल – द्रव या गैस की विभिन्न परतों के बीच होने वाली सापेक्ष गति का विरोध करने वाले बल को श्यान बल कहते हैं।
- श्यानता द्रव का वह गुण है जिसके कारण वह अपनी विभिन्न परतों के बीच सापेक्ष गति का विरोध करता है।
- श्यानता द्रव और गैस दोनों का गुण है।
- द्रव की श्यानता उसके अणुओं के बीच ससंजक बल के कारण होती है। गैस की श्यानता उसके अणुओं के एक परत से दूसरी परत में प्रसार के कारण होती है।
- गैसों की श्यानता द्रवों की तुलना में बहुत कम होती है। ठोस सामान्य परिस्थितियों में प्रवाहित नहीं होते, इसलिए ठोसों के लिए श्यानता परिभाषित नहीं की जाती।
- आदर्श द्रव की श्यानता शून्य होती है।
- तापमान बढ़ने पर द्रवों की श्यानता घटती है तथा गैसों की श्यानता बढ़ती है।
बरनौली प्रमेय
- बरनौली के प्रमेय के अनुसार, यदि असंपीड्य और अश्यान द्रव (आदर्श द्रव) किसी नली में रेखीय प्रवाह में बह रहा हो, तो द्रव के प्रति इकाई आयतन की कुल ऊर्जा सभी बिंदुओं पर समान रहती है।
- यह कुल ऊर्जा दाब ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा और गतिज ऊर्जा के योग के बराबर होती है।
- यह प्रमेय मूलतः ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है।
- वेंटुरी मीटर – द्रव के प्रवाह की दर मापने के लिए प्रयुक्त उपकरण है, जो बरनौली के प्रमेय पर कार्य करता है।
प्रत्यास्थता व तरंग गति
प्रत्यास्थता
- प्रत्यास्थता – किसी पदार्थ का वह गुण है जिसके कारण विकृत करने वाला बल हटाने पर वस्तु अपना मूल आकार और आयाम पुनः प्राप्त कर लेती है।
- प्रत्यास्थता सीमा – बल का वह अधिकतम मान है, जहाँ तक पदार्थ लचीलेपन का गुण प्रदर्शित करता है तथा इसके ऊपर पदार्थ अपना लचीलेपन का गुण खो देता है और पदार्थ विकृत हो जाता है, प्रत्यास्थता सीमा कहलाती है।
- तनाव – जब किसी वस्तु पर विकृत करने वाला बल लगाया जाता है, तो उसके भीतर उत्पन्न होने वाला प्रति इकाई क्षेत्रफल पर पुनर्स्थापक बल तनाव कहलाता है। सरल शब्दों में, किसी पदार्थ या वस्तु के भीतर प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाला बल तनाव कहलाता है।
- विकृति – तनाव के कारण किसी वस्तु के आकार या आयाम में होने वाले सापेक्ष परिवर्तन को विकृति कहते हैं।
- इसे निम्न अनुपातों से मापा जाता है –
- लंबाई में परिवर्तन / मूल लंबाई — अनुदैर्ध्य विकृति
- आयतन में परिवर्तन / मूल आयतन — आयतन विकृति
- हुक का नियम – प्रत्यास्थ सीमा के भीतर, किसी वस्तु (जैसे स्प्रिंग) में उत्पन्न विकृति या विस्तार, उस पर लगाए गए बल\तनाव के समानुपाती होता है, अर्थात बल\तनाव ∝ विकृति।
तरंग
- तरंग — एक प्रकार का विक्षोभ जो बिना माध्यम के कणों को स्थानांतरित किए, ऊर्जा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है।
- तरंगें सामान्यतः दो प्रकार की होती हैं –
- यांत्रिक तरंग – वे तरंगें जिनके संचरण के लिए किसी भौतिक माध्यम (ठोस, द्रव या गैस) की आवश्यकता होती है, यांत्रिक या प्रत्यास्थ तरंग कहलाती हैं।
- यांत्रिक तरंगें दो प्रकार की होती हैं –
- (i) अनुदैर्ध्य तरंग – जब माध्यम के कण तरंग के संचरण की दिशा में ही कंपन करते हैं, तो ऐसी तरंग को अनुदैर्ध्य तरंग कहते हैं। उदाहरण — स्प्रिंग में उत्पन्न तरंगें, वायु में ध्वनि तरंगें।
- (ii) अनुप्रस्थ तरंग – जब माध्यम के कण तरंग के संचरण की दिशा के लंबवत (समकोण पर) कंपन करते हैं, तो ऐसी तरंग को अनुप्रस्थ तरंग कहते हैं।
- उदाहरण — तनी हुई डोरी में उत्पन्न तरंगें, पानी की सतह पर बनने वाली तरंगें।

- नोट: जल की सतह पर चलती हुई मोटर बोट द्वारा उत्पन्न तरंगें अनुप्रस्थ तथा अनुदैर्ध्य दोनों होती हैं।
- अयांत्रिक या विद्युत चुंबकीय तरंगें – वे तरंगें जिनके संचरण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती और जो निर्वात में भी गति कर सकती हैं, उन्हें अयांत्रिक या विद्युत चुंबकीय तरंगें कहते हैं।
- प्रकाश और ऊष्मा इसके उदाहरण हैं। वास्तव में सभी विद्युत चुंबकीय तरंगें अयांत्रिक तरंगें होती हैं।
- सभी विद्युत चुंबकीय तरंगें फोटॉन से बनी होती हैं।
- विद्युत चुंबकीय तरंगों में विद्युत क्षेत्र और चुंबकीय क्षेत्र के सदिश एक-दूसरे के लंबवत होते हैं और दोनों तरंग के संचरण की दिशा के भी लंबवत कंपन करते हैं।

विद्युत चुंबकीय तरंगों के गुण
- ये उदासीन (आवेश रहित) होती हैं।
- ये अनुप्रस्थ तरंगों के रूप में संचरित होती हैं।
- ये प्रकाश के वेग से चलती हैं।
- इनमें ऊर्जा और संवेग दोनों होते हैं।
| विद्युत-चुंबकीय तरंगें | खोजकर्ता | तरंगदैर्घ्य सीमा (मीटर में) | आवृत्ति श्रेणी |
| गामा तरंगे (γ-Rays) | हेनरी बेकवरेल | < 10⁻³ nm | 10²⁰ – 10¹⁸ |
| एक्स-तरंगे | डब्ल्यू. रॉन्टजन | 1 nm – 10⁻³ nm | 10¹⁸ – 10¹⁶ |
| पराबैंगनी तरंगें | जोहान रिटर | 400 nm – 1 nm | 10¹⁶ – 10¹⁴ |
| दृश्य तरंगें | न्यूटन | 700 nm – 400 nm | 3.75 × 10¹⁴ Hz – 7.5 × 10¹⁴ Hz |
| अवरक्त तरंगें | हर्शेल | 1 mm – 700 nm | 10¹² – 10¹⁰ |
| माइक्रो तरंगें | हेनरिक हर्ट्ज | 0.1 m – 1 mm | 10¹⁰ – 10⁸ |
| रेडियो तरंगें | मार्कोनी | > 0.1 m | 10⁸ – 10⁶ |
- निम्नलिखित तरंगें विद्युत चुंबकीय तरंगें नहीं हैं —कैथोड किरणें, कैनाल किरणें, अल्फा किरणें (α-किरणें), बीटा किरणें (β-किरणें), ध्वनि तरंगें तथा पराश्रव्य तरंगें।
शब्दावली
- आयाम– कंपन करने वाले कण का संतुलन स्थिति से दोनों ओर होने वाला अधिकतम विस्थापन आयाम कहलाता है।
- तरंगदैर्ध्य –माध्यम के दो निकटतम कणों के बीच की दूरी, जो समान कला में कंपन करते हैं, तरंगदैर्ध्य कहलाती है। इसे ग्रीक अक्षर लैम्ब्डा (λ) से दर्शाया जाता है।
- अनुप्रस्थ तरंग में दो क्रमागत शिखरों या गर्तों के बीच की दूरी तथा अनुदैर्ध्य तरंग में दो क्रमागत संपीडनों या विरलनों के बीच की दूरी तरंगदैर्ध्य के बराबर होती है।
ध्वनि तरंगें
- ध्वनि तरंगें अनुदैर्ध्य यांत्रिक तरंगें होती हैं।
- आवृत्ति के आधार पर अनुदैर्ध्य यांत्रिक तरंगों को निम्न प्रकारों में बाँटा जाता है —
- श्रव्य तरंगें – जिन तरंगों की आवृत्ति 20 Hz से 20000 Hz के बीच होती है, उन्हें श्रव्य ध्वनि तरंगें कहते हैं। ये तरंगें मानव कान द्वारा सुनी जा सकती हैं।ये तरंगें कंपन करने वाली वस्तुओं जैसे स्वरित्र, स्वर-तंतु आदि से उत्पन्न होती हैं।
- अवश्रव्य तरंगें – जिन तरंगों की आवृत्ति 20 Hz से कम होती है, उन्हें अवश्रव्य तरंगें कहते हैं। ये तरंगें बड़े स्रोतों जैसे भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, समुद्री तरंगें तथा हाथी और व्हेल द्वारा उत्पन्न होती हैं।
- पराश्रव्य तरंगें – जिन तरंगों की आवृत्ति 20000 Hz से अधिक होती है, उन्हें पराश्रव्य तरंगें कहते हैं। मानव कान इन तरंगों को नहीं सुन सकता। लेकिन कुत्ता, बिल्ली, चमगादड़ और मच्छर जैसे जीव इन तरंगों को पहचान सकते हैं। चमगादड़ इन तरंगों को पहचानने के साथ-साथ उत्पन्न भी कर सकता है।
पराश्रव्य तरंगें निम्न विधियों से उत्पन्न की जा सकती हैं —
- गाल्टन की सीटी द्वारा
- हार्टमैन जनित्र द्वारा
- क्वार्ट्ज क्रिस्टल को प्रत्यावर्ती विद्युत क्षेत्र में कंपन कराने से (इसे पाइजो-इलेक्ट्रिक प्रभाव कहते हैं)
- फेरोमैग्नेटिक छड़ को प्रत्यावर्ती चुंबकीय क्षेत्र में कंपन कराने से (इसे मैग्नेटोस्ट्रिक्शन प्रभाव कहते हैं)
पराश्रव्य तरंगों के अनुप्रयोग
- संकेत भेजने में।
- समुद्र की गहराई मापने में।
- कपड़ों, हवाई जहाजों तथा घड़ियों के मशीनरी भागों की सफाई में।
- कारखानों की चिमनियों से कालिख हटाने में।
- द्रवों के निर्जीवीकरण में।
- अल्ट्रासोनोग्राफी में।
ध्वनि की चाल
- ध्वनि की चाल अलग-अलग माध्यमों में भिन्न होती है। किसी माध्यम में ध्वनि की चाल मुख्यतः उस माध्यम की प्रत्यास्थता और घनत्व पर निर्भर करती है।
- ध्वनि की चाल ठोसों में अधिकतम और गैसों में न्यूनतम होती है।
- जब ध्वनि एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करती है, तो उसकी चाल और तरंगदैर्ध्य बदल जाते हैं, लेकिन आवृत्ति अपरिवर्तित रहती है।
- किसी माध्यम में ध्वनि की चाल आवृत्ति से स्वतंत्र होती है।
- दाब का प्रभाव –ध्वनि की चाल दाब पर निर्भर नहीं करती, अर्थात दाब बढ़ने या घटने से ध्वनि की चाल में परिवर्तन नहीं होता।
- तापमान का प्रभाव – माध्यम का तापमान बढ़ने पर ध्वनि की चाल बढ़ जाती है। वायु में तापमान 1°C बढ़ने पर ध्वनि की चाल लगभग 0.61 m/s बढ़ जाती है।
- आर्द्रता का प्रभाव – आर्द्र वायु में ध्वनि की चाल शुष्क वायु की तुलना में अधिक होती है, क्योंकि आर्द्र वायु का घनत्व शुष्क वायु से कम होता है।
ध्वनि तरंगों की विशेषताएँ
- ध्वनि तरंगों की मुख्यतः तीन विशेषताएँ होती हैं —
- तीव्रता
- किसी निश्चित समय में, ध्वनि की दिशा के लंबवत प्रति इकाई क्षेत्रफल से गुजरने वाली ध्वनि ऊर्जा को ध्वनि की तीव्रता कहते है। तीव्रता की SI इकाई वाट/मीटर² (W/m²) है।
- किसी बिंदु पर ध्वनि की तीव्रता —
- स्रोत से दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
- कंपन के आयाम के वर्ग के समानुपाती होती है।
- आवृत्ति के वर्ग के समानुपाती होती है।
- माध्यम के घनत्व के समानुपाती होती है।
- तीव्रता के कारण ध्वनि तेज या मंद सुनाई देती है।
- कान द्वारा महसूस की जाने वाली ध्वनि की अनुभूति को ध्वनिता कहते हैं। यह ध्वनि की तीव्रता तथा कान की संवेदनशीलता पर निर्भर करती है। ध्वनिता की इकाई बेल है। इसकी व्यावहारिक इकाई डेसीबल (dB) है, जो 1/10 बेल के बराबर होती है। ध्वनिता की एक अन्य इकाई फोन है।
- तारत्व
- तारत्व ध्वनि का वह गुण है जिससे तीखी और भारी या गंभीर ध्वनि में अंतर किया जाता है।
- यह आवृत्ति पर निर्भर करता है। आवृत्ति अधिक होने पर तारत्व अधिक होता है और ध्वनि तीखी होती है। आवृत्ति कम होने पर तारत्व कम होता है और ध्वनि गंभीर होती है।
- गुणवत्ता
- गुणवत्ता ध्वनि का वह गुण है जिसके कारण समान तीव्रता और समान तारत्व वाली दो ध्वनियों के स्रोतों में अंतर पहचाना जा सकता है।
- ध्वनि की गुणवत्ता अधिस्वरों की संख्या, उनकी आवृत्ति और सापेक्ष तीव्रताओं पर निर्भर करती है।
ध्वनि का बहु-परावर्तन
- जब ध्वनि तरंगें किसी माध्यम की सतहों से बार-बार परावर्तित होती हैं, तो इस घटना को ध्वनि का बहु-परावर्तन कहते हैं।
- उदाहरण —
- स्टेथोस्कोप — हृदय या फेफड़ों की ध्वनि नली के अंदर कई बार परावर्तित होती है, इसलिए डॉक्टर उसे स्पष्ट सुन पाते हैं।
- लाउडस्पीकर / मेगाफोन / हॉर्न / ट्रम्पेट — इनमें बहु-परावर्तन के कारण ध्वनि एक दिशा में केंद्रित होकर अधिक तेज सुनाई देती है।
- शहनाई / बांसुरी — इन वाद्य यंत्रों के अंदर ध्वनि तरंगें बार-बार परावर्तित होकर संगीत उत्पन्न करती हैं।
- सभागार में ध्वनि पटल — ध्वनि को पूरे हॉल में स्पष्ट रूप से पहुँचाने के लिए लगाए जाते हैं।
प्रतिध्वनि
- जब ध्वनि तरंगें किसी ऊँची इमारत, पहाड़ या अन्य सतह से परावर्तित होकर वापस सुनाई देती हैं, तो उसे प्रतिध्वनि कहते हैं।
- प्रतिध्वनि सुनने के लिए प्रेक्षक और परावर्तक के बीच न्यूनतम दूरी लगभग 17 मीटर (16.6 m) होनी चाहिए।
- कान पर ध्वनि के प्रभाव की अवधि, जिसे ‘श्रवण की निरंतरता’ कहते हैं, लगभग 1/10 सेकंड होती है।
- अपवर्तन के कारण ध्वनि दिन की अपेक्षा रात में अधिक दूरी तक सुनाई देती है।
अनुनाद
- जब किसी वस्तु के कंपन की बाहरी आवृत्ति उसकी प्राकृतिक आवृत्ति के बराबर हो जाती है, तो वस्तु बहुत अधिक आयाम के साथ कंपन करने लगती है। इस घटना को अनुनाद कहते हैं।
- उदाहरण – पुल पार करते समय सैनिकों को एक साथ कदम न मिलाकर चलने के लिए कहा जाता है, ताकि अनुनाद की स्थिति उत्पन्न न हो।
ध्वनि का व्यतिकरण
- जब समान आयाम और आवृत्ति वाली दो ध्वनि तरंगें एक ही माध्यम में एक ही दिशा में चलते हुए आपस में मिलती हैं या अध्यारोपित है , तो इस घटना को ध्वनि का व्यतिकरण कहते हैं।
- यदि दो तरंगें किसी बिंदु पर समान कला में मिलती है, तो उस बिंदु पर ध्वनि की तीव्रता अधिकतम हो जाती है। इसे संपोषी व्यतिकरण कहते हैं।
- यदि दो तरंगें किसी बिंदु पर विपरीत कला में मिलती है, तो उस बिंदु पर ध्वनि की तीव्रता न्यूनतम हो जाती है। इसे विनाशी व्यतिकरण कहते हैं।
ध्वनि का विवर्तन
- ध्वनि की तरंगदैर्ध्य लगभग 1 मीटर के क्रम की होती है। ध्वनि तरंगें किसी अवरोध के किनारों से टकराकर मुड़ जाती है तो इस घटना को ध्वनि का विवर्तन कहते हैं।
डॉप्लर प्रभाव
- जब ध्वनि के स्रोत और प्रेक्षक के बीच आपेक्षिक गति होती है, तो प्रेक्षक को सुनाई देने वाली ध्वनि की आवृत्ति वास्तविक आवृत्ति से भिन्न हो जाती है।
- जब स्रोत और प्रेक्षक के बीच दूरी घटती है, तो आवृत्ति बढ़ी हुई प्रतीत होती है।
- जब स्रोत और प्रेक्षक के बीच दूरी बढ़ती है, तो आवृत्ति घटी हुई प्रतीत होती है।

मैक संख्या
- मैक संख्या को ध्वनि के स्रोत की गति और उसी माध्यम में ध्वनि की गति के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है, जब तापमान और दाब समान हों।
- यदि मैक संख्या > 1 हो, तो वस्तु की गति सुपरसोनिक कहलाती है।
- यदि मैक संख्या > 5 हो, तो वस्तु की गति हाइपरसोनिक कहलाती है।
- यदि मैक संख्या < 1 हो, तो वस्तु की गति सब-सोनिक कहलाती है।
ऊष्मा, तापमान, थर्मामीटर
ऊष्मा
- ऊष्मा, ऊर्जा का ही एक रूप है जो दो वस्तुओं के बीच तापमान के अंतर के कारण एक वस्तु से दूसरी वस्तु में प्रवाहित होती है। किसी वस्तु में मौजूद ऊष्मा की मात्रा उस वस्तु के द्रव्यमान पर निर्भर करती है।
- ऊष्मा की इकाइयाँ
- C.G.S. इकाई (कैलोरी) – यह वह ऊष्मा की मात्रा है जो 1 ग्राम शुद्ध पानी का तापमान 1°C बढ़ाने के लिए आवश्यक होती है।
- अंतरराष्ट्रीय कैलोरी – यह वह ऊष्मा की मात्रा है जो 1 ग्राम शुद्ध पानी का तापमान 14.5°C से 15.5°C तक बढ़ाने के लिए आवश्यक होती है।
- F.P.S. इकाई – (ब्रिटिश थर्मल यूनिट) – यह वह ऊष्मा की मात्रा है जो 1 पाउंड शुद्ध पानी का तापमान 1°F बढ़ाने के लिए आवश्यक होती है।
तापमान
- तापमान वह भौतिक कारण है जो यह निर्धारित करता है कि ऊष्मा किस दिशा में प्रवाहित होगी। ऊष्मा हमेशा उच्च तापमान से निम्न तापमान की ओर प्रवाहित होती है।
- थर्मामीटर – तापमान मापने वाले उपकरण को थर्मामीटर कहते हैं।
- पारे का हिमांक –39°C होता है। इससे कम तापमान को मापने के लिए अल्कोहल थर्मामीटर का उपयोग किया जाता है, क्योंकि अल्कोहल का हिमांक –115°C होता है।
विभिन्न थर्मामीटरों की परास
- पारा थर्मामीटर : –30°C से 350°C
- स्थिर आयतन गैस थर्मामीटर :
- –200°C से 500°C (हाइड्रोजन के साथ)
- –200°C से नीचे –268°C तक (हीलियम के साथ)
- 1000°C से ऊपर 1600°C तक (नाइट्रोजन गैस और ग्लेज्ड पोर्सिलेन बल्ब के साथ)
- प्लैटिनम प्रतिरोध थर्मामीटर : –200°C से 1200°C
- थर्मोकपल थर्मामीटर : –200°C से 1600°C
समग्र विकिरण (पायरोमीटर / अग्निमान)
- एक विशेष गैर-संपर्क थर्मामीटर है, जिसका उपयोग भट्टी या गर्म धातुओं जैसी बहुत उच्च तापमान (800°C से अधिक) वाली वस्तुओं का तापमान मापने के लिए किया जाता है
- जब कोई वस्तु बहुत अधिक तापमान पर होती है, तो वह चमकने लगती है और उससे निकलने वाले विकिरण का रंग वस्तु के परम तापमान के चौथे घात के समानुपाती होता है।
- इसका कार्य स्टीफन–बोल्ट्जमैन नियम पर आधारित होता है।
- स्टीफन–बोल्ट्जमैन नियम के अनुसार, किसी कृष्णिका (Black Body) की प्रति इकाई सतह से उत्सर्जित कुल ऊर्जा उसके परम तापमान (T⁴) के समानुपाती होती है।
- इस प्रकार के थर्मामीटर को वस्तु के संपर्क में नहीं रखा जाता। लेकिन यह 800°C से कम तापमान नहीं माप सकता, क्योंकि कम तापमान पर विकिरण बहुत कम होता है और उसे पहचानना कठिन होता है।
विशिष्ट ऊष्मा धारिता
- किसी पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा धारिता वह ऊष्मा की मात्रा है जो उस पदार्थ के इकाई द्रव्यमान का तापमान 1°C बढ़ाने के लिए आवश्यक होती है। इसकी SI इकाई जूल/किलोग्राम-केल्विन (J/kgK) है।
- 1 ग्राम पानी का तापमान 1°C बढ़ाने के लिए 1 कैलोरी ऊष्मा की आवश्यकता होती है। इसलिए पानी की विशिष्ट ऊष्मा धारिता 1 कैलोरी/ग्राम °C होती है।
ऊष्मीय प्रसार
- जब किसी वस्तु को गर्म किया जाता है, तो उसकी लंबाई, क्षेत्रफल और आयतन बढ़ जाते हैं।
- तापमान बढ़ने पर लंबाई, क्षेत्रफल और आयतन में होने वाली वृद्धि को निम्न गुणांकों द्वारा मापा जाता है —
- रेखीय प्रसार गुणांक — α
- पृष्ठीय प्रसार गुणांक — β
- घनीय प्रसार गुणांक — γ
- α, β और γ के बीच संबंध
- α : β : γ = 1 : 2 : 3 या β = 2α तथा γ = 3α
जल का असामान्य प्रसार
- लगभग सभी द्रव तापमान बढ़ने पर फैलते हैं। लेकिन जल का तापमान 0°C से 4°C तक बढ़ाया जाता है, तो उसका आयतन घटता है।
- 4°C से अधिक तापमान बढ़ने पर आयतन बढ़ता है। इसलिए 4°C पर जल का घनत्व अधिकतम होता है।
ऊष्मा का संचरण
- एक स्थान से दूसरे स्थान तक ऊष्मा के स्थानांतरण को ऊष्मा का संचरण कहते हैं।
- ऊष्मा के संचरण के तीन प्रकार से होता है –

चालन
- इस प्रक्रिया में ऊष्मा एक स्थान से दूसरे स्थान तक माध्यम के कणों के क्रमिक कंपन के माध्यम से पहुँचती है, जबकि कण स्वयं अपने स्थान से स्थानांतरित नहीं होते।
- ठोसों में ऊष्मा का संचरण मुख्यतः चालन द्वारा होता है।
- धातुएं सामान्यतः ऊष्मा की अच्छी चालक होती हैं, जबकि ईंट, कंक्रीट, ऊनी कपड़ा, बर्फ, लकड़ी, बुरादा, कागज, वायु, काँच और कपड़ा ऊष्मा के कुचालक होते हैं।
- इसी कारण बर्फ को पिघलने से बचाने के लिए बुरादे में पैक किया जाता है।
संवहन
- इस प्रक्रिया में ऊष्मा का स्थानांतरण माध्यम के कणों के वास्तविक स्थान परिवर्तन के द्वारा होता है। कणों के इस स्थान परिवर्तन से संवहन धारा बनती है।
- द्रवों और गैसों में ऊष्मा का संचरण संवहन द्वारा होता है। पृथ्वी का वायुमंडल भी संवहन के कारण गर्म होता है।
विकिरण
- इस विधि में ऊष्मा का संचरण प्रकाश के वेग से होता है और इसके लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती। अर्थात ऊष्मा का संचरण निर्वात में भी संभव है।
न्यूटन का शीतलन नियम
- किसी वस्तु द्वारा ऊष्मा के ह्रास की दर, उस वस्तु और उसके आसपास के वातावरण के तापमान के अंतर के समानुपाती होती है।
किरचॉफ का नियम
- किरचॉफ के नियम के अनुसार, समान तापमान पर, किसी वस्तु की उत्सर्जकता उसकी अवशोषकता के बराबर होती है। और इस तापमान पर कृष्णिका की उत्सर्जन शक्ति के बराबर होता है।
- यह नियम बताता है कि अच्छे अवशोषक अच्छे उत्सर्जक भी होते हैं।
- यदि किसी चमकदार धातु की गेंद पर एक काला धब्बा हो और उसे उच्च तापमान तक गर्म करके अंधेरे में देखा जाए, तो चमकदार धातु की सतह मंद दिखाई देती है, जबकि काला धब्बा अधिक चमकता है, क्योंकि काला भाग गर्म करने के दौरान अधिक विकिरण अवशोषित करता है और बाद में उसे उत्सर्जित करता है।
स्टीफन का नियम
- किसी कृष्णिका द्वारा प्रति इकाई क्षेत्रफल से प्रति सेकंड उत्सर्जित विकिरण ऊर्जा उसके परम तापमान के चौथे घात के समानुपाती होती है।
- E = σT⁴
- यहाँ σ (सिग्मा) एक स्थिरांक है, जिसे स्टीफन स्थिरांक कहते हैं।
अवस्था परिवर्तन
- कोई भी पदार्थ अपनी तीन अवस्थाओं — ठोस, द्रव और गैस — में रह सकता है। किसी पदार्थ को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलना अवस्था परिवर्तन कहलाता है। यह परिवर्तन पदार्थ को गर्म करने या उससे ऊष्मा निकालने पर होता है। अवस्था परिवर्तन निश्चित तापमान पर होता है।

- गलन (Fusion) – वह प्रक्रिया जिसमें कोई पदार्थ ठोस अवस्था से द्रव अवस्था में बदलता है, उसे गलन कहते हैं। गलन एक निश्चित तापमान पर होता है जिसे गलनांक कहते हैं।
- जमना (Freezing) – वह प्रक्रिया जिसमें कोई पदार्थ द्रव अवस्था से ठोस अवस्था में बदलता है, उसे जमना या ठोसकरण कहते हैं। यह एक निश्चित तापमान पर होता है जिसे हिमांक कहते हैं। किसी पदार्थ के लिए गलनांक = हिमांक होता है।
- दाब का प्रभाव : किसी पदार्थ का गलनांक दाब के बदलने से बदल सकता है।
- जिन पदार्थों का आयतन गलन के समय घटता है (जैसे बर्फ), उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर कम हो जाता है।
- जिन पदार्थों का आयतन गलन के समय बढ़ता है (जैसे मोम), उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर बढ़ जाता है।
- अशुद्धि का प्रभाव : यदि किसी पदार्थ में अशुद्धि मिला दी जाए (जैसे बर्फ में नमक), तो उसका गलनांक कम हो जाता है।
- वाष्पीकरण – वह प्रक्रिया जिसमें कोई पदार्थ द्रव अवस्था से वाष्प अवस्था में बदलता है, उसे वाष्पीकरण कहते हैं।
- वाष्पीकरण दो प्रकार से होता है —
- वाष्पीकरण
- उबालना
- वाष्पीकरण – जब द्रव की खुली सतह से किसी भी तापमान पर वाष्प बनने की प्रक्रिया होती है, तो उसे वाष्पीकरण कहते हैं। वाष्पीकरण के कारण शीतलन होता है। इसी कारण गर्मियों में मिट्टी के घड़े का पानी ठंडा हो जाता है।
- उबालना – जब द्रव का वाष्पीकरण निश्चित तापमान पर और सम्पूर्ण द्रव में होता है, तो उसे उबालना कहते हैं। जिस तापमान पर यह प्रक्रिया होती है, उसे क्वथनांक कहते हैं। दाब बढ़ने पर द्रव का क्वथनांक बढ़ जाता है। अशुद्धि मिलाने पर भी द्रव का क्वथनांक बढ़ जाता है।
- संघनन – वह प्रक्रिया जिसमें कोई पदार्थ वाष्प अवस्था से द्रव अवस्था में बदलता है, उसे संघनन कहते हैं।
गुप्त ऊष्मा / अवस्था परिवर्तन की ऊष्मा
- स्थिर तापमान पर किसी पदार्थ के इकाई द्रव्यमान की अवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को गुप्त ऊष्मा कहते हैं।
- यदि किसी पदार्थ के द्रव्यमान m की अवस्था बदलने के लिए Q ऊष्मा की आवश्यकता हो और L गुप्त ऊष्मा हो, तो
- Q = mL
- गुप्त ऊष्मा का SI मात्रक जूल/किलोग्राम (J/kg) है।
- समान तापमान पर भाप से जलने की चोट अधिक गंभीर होती है, क्योंकि भाप की आंतरिक ऊर्जा पानी से अधिक होती है (गुप्त ऊष्मा के कारण)।
- गुप्त ऊष्मा के प्रकार –
- गलन की गुप्त ऊष्मा
- निश्चित ताप पर, किसी पदार्थ के इकाई द्रव्यमान को उसके गलनांक पर ठोस अवस्था से द्रव अवस्था में बदलने के लिए, आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को गलन की गुप्त ऊष्मा कहते है। इसी प्रकार, जब इकाई द्रव्यमान का द्रव अपने हिमांक पर ठोस अवस्था में बदलता है, तो उतनी ही ऊष्मा उत्सर्जित होती है।गलन की गुप्त ऊष्मा = 80 Cal/g
- वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा
- निश्चित ताप पर, किसी पदार्थ के इकाई द्रव्यमान को उसके क्वथनांक पर द्रव अवस्था से वाष्प अवस्था में बदलने के लिए, आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा कहते है वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा = 540 Cal/g
- गलन की गुप्त ऊष्मा
उर्ध्वपातन
- ठोस पदार्थ का सीधे वाष्प में बदलना उर्ध्वपातन कहलाता है।
- यह प्रक्रिया तब होती है जब किसी पदार्थ का क्वथनांक उसके गलनांक से कम होता है।
- कपूर और शुष्क बर्फ निर्वात में उर्ध्वपातन का उदाहरण हैं।
पाला या तुषार
- पाला या तुषार उर्ध्वपातन की विपरीत प्रक्रिया है, जिसमें वाष्प सीधे ठोस में बदल जाती है।
सापेक्ष (आपेक्षिक) आर्द्रता
- किसी निश्चित तापमान पर वायु में उपस्थित वास्तविक जलवाष्प की मात्रा और उसी तापमान पर वायु द्वारा धारण की जा सकने वाली जलवाष्प की अधिकतम मात्रा के अनुपात को सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे सामान्यतः प्रतिशत (%) में व्यक्त किया जाता है।
- सापेक्ष (आपेक्षिक) आर्द्रता हाइग्रोमीटर से मापा जाता है।
- तापमान बढ़ने पर आपेक्षिक आर्द्रता बढ़ती है।
ऊष्मागतिकी
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम
- किसी तंत्र को दी गई ऊष्मा ऊर्जा का उपयोग मुख्यतः दो प्रकार से होता है —
- तंत्र का तापमान बढ़ाने तथा उसकी आंतरिक ऊर्जा बढ़ाने में।
- तंत्र द्वारा कार्य करने में।
- यदि ΔQ = तंत्र को दी गई ऊष्मा, ΔU = तंत्र की आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि, ΔW = तंत्र द्वारा किया गया कार्य तो संबंध होगा — ΔQ = ΔU + ΔW
- किसी तंत्र की आंतरिक ऊर्जा उसके अणुओं की स्थितिज ऊर्जा और गतिज ऊर्जा का योग होती है, जो उनके आपसी आकर्षण और अनियमित गति से संबंधित होती है।
- ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत के समान है। अर्थात ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है।
- समतापी प्रक्रिया – जब किसी तंत्र में परिवर्तन इस प्रकार होता है कि पूरे परिवर्तन के दौरान तंत्र का तापमान स्थिर रहता है, तो इस प्रक्रिया को समतापी प्रक्रिया कहते हैं।
- रुद्धोष्म प्रक्रिया – जब किसी तंत्र में परिवर्तन इस प्रकार होता है कि तंत्र और उसके परिवेश के बीच ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता, तो उसे रुद्धोष्म प्रक्रिया कहते हैं।
- उदाहरण — यदि कार्बन डाइऑक्साइड गैस को अचानक प्रसारित किया जाए, तो वह शुष्क बर्फ में बदल सकती है। यह रुद्धोष्म प्रक्रिया का उदाहरण है।
ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम
- ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम बताता है कि प्राकृतिक प्रक्रियाएँ केवल एक निश्चित दिशा में होती हैं और किसी भी स्वतः होने वाली प्रक्रिया में ब्रह्मांड की कुल एंट्रॉपी (अव्यवस्था) बढ़ती रहती है।
- इसके अनुसार ऊष्मा का प्रवाह स्वतः केवल अधिक तापमान वाली वस्तु से कम तापमान वाली वस्तु की ओर होता है, और ऊष्मा को पूरी तरह कार्य में परिवर्तित करना संभव नहीं है।
- इस नियम से यह भी स्पष्ट होता है कि ऊर्जा परिवर्तन की कुछ सीमाएँ होती हैं, इसलिए किसी भी ऊष्मा इंजन की दक्षता 100% नहीं हो सकती।
- यहाँ एंट्रॉपी (S) किसी तंत्र की अव्यवस्था का माप होती है।
- केल्विन का कथन : ऊष्मा को पूरी तरह कार्य में परिवर्तित करना संभव नहीं है।
- क्लासियस का कथन : ऊष्मा स्वतः निम्न तापमान से उच्च तापमान की ओर प्रवाहित नहीं हो सकती। अर्थात बाहरी कार्य के बिना ऊष्मा स्वतः ही ठंडी वस्तु से गर्म वस्तु की ओर प्रवाहित नहीं हो सकती।
प्रकाश और प्रकाशिकी
प्रकाश
- प्रकाश ऊर्जा का एक रूप है, जो विद्युत चुंबकीय तरंगों के रूप में फैलती है। विद्युत चुंबकीय तरंगों के स्पेक्ट्रम में यह पराबैंगनी और अवरक्त क्षेत्र के बीच स्थित होती है तथा इसकी तरंगदैर्ध्य लगभग 3900 Å से 7800 Å के बीच होती है।
- विद्युत चुंबकीय तरंगे अनुप्रस्थ होती हैं, इसलिए प्रकाश भी अनुप्रस्थ तरंग है।
- सभी विद्युत चुंबकीय तरंगों की तरह प्रकाश को भी संचरण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।
- प्रकाश की तरंग प्रकृति से निम्न घटनाओं की व्याख्या होती है — सीधी रेखा में गमन, परावर्तन, अपवर्तन, व्यतिकरण, विवर्तन, ध्रुवण।
- लेकिन प्रकाश-वैद्युत प्रभाव और कॉम्पटन प्रभाव जैसी घटनाओं की व्याख्या केवल तरंग सिद्धांत से नहीं हो पाती। इन घटनाओं की व्याख्या प्रकाश के क्वांटम सिद्धांत से की जाती है, जिसे आइंस्टीन ने प्रस्तुत किया।
- इस सिद्धांत के अनुसार प्रकाश ऊर्जा के छोटे-छोटे कणों (पैकेट) के रूप में होता है, जिन्हें फोटॉन कहते हैं। फोटॉन की ऊर्जा — E = hν
- इस प्रकार प्रकाश तरंग और कण दोनों की तरह व्यवहार करता है, इसलिए कहा जाता है कि प्रकाश की द्वैत प्रकृति होती है।
- प्रकाश का वेग निर्वात तथा वायु में अधिकतम (3 × 10⁸ m/s) होता है।
- सूर्य से पृथ्वी तक प्रकाश को पहुँचने में लगभग 8 मिनट 19 सेकंड (499 सेकंड) लगते हैं। चंद्रमा से परावर्तित प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में लगभग 1.28 सेकंड लगते हैं।
अपवर्तनांक
- निर्वात में प्रकाश की चाल और उस माध्यम में प्रकाश की चाल के अनुपात को माध्यम का अपवर्तनांक के रूप में परिभाषित किया जाता है। प्रकाश की चाल अलग-अलग माध्यमों में भिन्न होती है। जिस माध्यम का अपवर्तनांक कम होता है, उसमें प्रकाश की चाल अधिक होती है।
प्रकाश का परावर्तन
- जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में गमन करता है, तो परावर्तक सतह से टकराकर पुनः उसी माध्यम में लौट जाता है। इसे प्रकाश का परावर्तन कहते है।

परावर्तन के नियम
- आपतित किरण, परावर्तित किरण और अभिलंब तीनों एक ही तल में स्थित होते हैं।
- परावर्तन कोण, आपतन कोण के बराबर होता है।
- समतल दर्पण द्वारा परावर्तन
- प्रतिबिंब आभासी तथा उलटा होता है। प्रतिबिंब का आकार वस्तु के बराबर होता है।
- दर्पण से प्रतिबिंब की दूरी, दर्पण से वस्तु की दूरी के बराबर होती है। यदि कोई वस्तु v वेग से समतल दर्पण की ओर (या उससे दूर) जाती है, तो प्रतिबिंब वस्तु के सापेक्ष 2v वेग से उसकी ओर (या उससे दूर) जाता है।
- समतल दर्पण की फोकस दूरी अनंत होती है।
- किसी व्यक्ति को अपना पूरा प्रतिबिंब देखने के लिए अपने कद (लंबाई) की कम से कम आधी ऊंचाई का दर्पण चाहिए।
- यदि दो समतल दर्पण एक-दूसरे से θ कोण पर झुके हों, तो किसी बिंदु वस्तु द्वारा बनने वाले प्रतिबिम्बों की संख्या संख्या निम्न प्रकार से होती है —
- यदि 360° / θ एक पूर्णांक हो, तो प्रतिबिम्बों की संख्या = (360° / θ − 1)
- यदि वस्तु सममित स्थिति में न रखी हो, तो प्रतिबिम्बों की संख्या = 360° / θ
- विशेष स्थितियाँ –
- जब वस्तु दो समानांतर समतल दर्पणों के बीच रखी जाती है, तो अनंत प्रतिबिंब बनते हैं।
- जब वस्तु दो परस्पर लम्बवत (90°) समतल दर्पणों के बीच रखी जाती है, तो तीन प्रतिबिंब बनते हैं।
- जब वस्तु दो समानान्तर समतल दर्पणों के बीच रखी जाती है, तो अनंत प्रतिबिंब बनते हैं।

- जब वस्तु दो परस्पर लम्बवत (90°) समतल दर्पणों के बीच रखी जाती है, तो तीन प्रतिबिंब बनते हैं।

- गोलीय दर्पण से परावर्तन
- गोलीय दर्पण द्वारा बनने वाले प्रतिबिंब की स्थिति एवं प्रकृति।


अवतल दर्पण

अवतल दर्पण के उपयोग
- शेविंग मिरर (दर्पण) के रूप में।
- वाहनों की हेडलाइट और सर्चलाइट के परावर्तक के रूप में।
- डॉक्टरों द्वारा आँख, कान और नाक की जाँच (ऑफ्थैल्मोस्कोप) में।
- सौर कुकर में।
- प्रकाश को एक निश्चित बिंदु पर केंद्रित करने के लिए।
उत्तल दर्पण

- नोट: उत्तल दर्पण द्वारा बना प्रतिबिंब सदैव आभासी, सीधा तथा छोटा होता है।
उत्तल दर्पण के उपयोग
- वाहनों में रियर व्यू मिरर के रूप में, क्योंकि इससे पीछे का अधिक क्षेत्र दिखाई देता है और बनने वाला प्रतिबिंब सीधा होता है।
- सोडियम रिफ्लेक्टर लैम्प में।
प्रकाश का अपवर्तन
- जब कोई प्रकाश किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करती है, तो वह अपने पथ से विचलित हो जाती है। दो माध्यमों की सीमा पर (अभिलंब) प्रकाश की दिशा में होने वाले इस परिवर्तन को प्रकाश का अपवर्तन कहते हैं।

- जब प्रकाश किरण विरल माध्यम से सघन माध्यम (जैसे पानी से कांच) में जाती है, तो वह अभिलंब की ओर मुड़ती है।
- इसी प्रकार जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में गमन करती है, तो वह अभिलंब से दूर मुड़ जाती है।
- यदि प्रकाश किरण अभिलंब के समानांतर (सामान्य रूप से) सीमा पर गिरे, तो वह दूसरे माध्यम में बिना मुड़े सीधे प्रवेश करती है।
अपवर्तन के नियम
- आपतित किरण, अपवर्तित किरण और अभिलंब तीनों एक ही तल में होते हैं।
- स्नेल का नियम : जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में गमन करता है, तो आपतन कोण (i) की ज्या (sini) और अपवर्तन कोण (r) की ज्या (sinr) का अनुपात स्थिर रहता है। यह स्थिर मान दूसरे माध्यम का पहले माध्यम के सापेक्ष अपवर्तनांक कहलाता है।
- निरपेक्ष अपवर्तनांक: किसी माध्यम का निरपेक्ष अपवर्तनांक निर्वात में प्रकाश की चाल और उस माध्यम में प्रकाश की चाल के अनुपात के बराबर होता है।
- μ = (निर्वात में प्रकाश की चाल) / (माध्यम में प्रकाश की चाल)
- अपवर्तनांक के गुण :
- किसी माध्यम का अपवर्तनांक प्रकाश के विभिन्न रंगों के लिए अलग-अलग होता है।
- तरंगदैर्ध्य बढ़ने पर अपवर्तनांक कम हो जाता है।
- इसलिए बैंगनी प्रकाश के लिए अपवर्तनांक अधिकतम और लाल प्रकाश के लिए न्यूनतम होता है।
- तापमान बढ़ने पर माध्यम का अपवर्तनांक थोड़ा कम हो जाता है।
- जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाता है, तो उसकी आवृत्ति और कला नहीं बदलते, लेकिन उसकी तरंगदैर्ध्य और चाल बदल जाती है।
अपवर्तन के कुछ उदाहरण
- जब कोई सीधी वस्तु आंशिक रूप से किसी द्रव में डुबोई जाती है, तो वह मुड़ी हुई दिखाई देती है।
- तारों का टिमटिमाना भी अपवर्तन के कारण होता है।
- सुबह और शाम के समय सूर्य का आकार अंडाकार दिखाई देना भी अपवर्तन के कारण होता है।
- जब किसी सघन माध्यम में रखी वस्तु को विरल माध्यम से देखा जाता है, तो वह वास्तविक दूरी से कम दूरी पर दिखाई देती है। इसलिए —
- तालाब में मछली वास्तविक गहराई से कम गहराई पर दिखाई देती है।
- पानी से भरे बर्तन के तल में रखा सिक्का ऊपर उठा हुआ दिखाई देता है।
- ऊपर से देखने पर पानी की टंकी कम गहरी दिखाई देती है।
नोट : अपवर्तनांक तरंगदैर्ध्य पर निर्भर करता है। कम तरंगदैर्ध्य वाली किरणों का अपवर्तन अधिक होता है और अधिक तरंगदैर्ध्य वाली किरणों का अपवर्तन कम होता है। इसलिए यदि किसी काँच की पट्टी को रंगीन अक्षरों पर रखा जाए, तो – बैंगनी रंग (सबसे कम तरंगदैर्ध्य) कम उठा हुआ दिखाई देता है जबकि लाल रंग (सबसे अधिक तरंगदैर्ध्य) सबसे अधिक उठा हुआ दिखाई देता है।
क्रांतिक कोण
- जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में गमन करता है, तो आपतन कोण वह मान जिसके लिए अपवर्तन कोण 90° हो जाता है, उसे क्रांतिक कोण कहते हैं।
पूर्ण आंतरिक परावर्तन
- जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में गमन करता है और आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक हो, तो प्रकाश किरण पुनः उसी सघन माध्यम में वापस लौट जाती है या परावर्तित हो जाती है। इस घटना को पूर्ण आंतरिक परावर्तन कहते है।

- पूर्ण आंतरिक परावर्तन के लिए शर्तें
- प्रकाश का संचरण सघन से विरल माध्यम की ओर होना चाहिए। इसलिए यदि प्रकाश पानी से कांच में जाए, तो पूर्ण आंतरिक परावर्तन नहीं होगा।
- आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक होना चाहिए।
पूर्ण आंतरिक परावर्तन के उदाहरण
- हीरे का चमकना।
- मृग मरीचिका एवं प्रकाशीय भ्रम।

- पानी में वायु के बुलबुले का चमकना
- सूर्य के दिखाई देने की अवधि बढ़ जाना — सूर्य सूर्योदय से पहले दिखाई देने लगता है और सूर्यास्त के बाद भी कुछ समय तक दिखाई देता है।
- धुएँ से काली की गई धातु या गेंद का पानी में चमकना
- प्रकाश तंतु : प्रकाश तंतु बहुत बारीक काँच या क्वार्ट्ज के हजारों तंतुओं से बना होता है, जिनका अपवर्तनांक लगभग 1.7 होता है। प्रत्येक तंतु के ऊपर कम अपवर्तनांक (लगभग 1.5) वाली परत चढ़ी होती है।इनमें प्रकाश पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण बार-बार परावर्तित होकर तंतु के भीतर आगे बढ़ता रहता है, इसलिए फाइबर मुड़ा होने पर भी ऊर्जा की हानि नहीं होती।

- अनुप्रयोग :
- ऑप्टिकल संकेतों और द्वि-आयामी चित्रों के संचार में।
- विद्युत संकेतों को प्रकाश संकेतों में बदलकर भेजने में।
- डॉक्टरों द्वारा एंडोस्कोपी में शरीर के अंदर के भागों को देखने के लिए।
लेंस द्वारा प्रकाश का अपवर्तन
- उत्तल लेंस – जब किसी लेंस का मध्य भाग किनारों की अपेक्षा मोटा होता है, तो उसे उत्तल लेंस या अभिसारी लेंस कहते हैं।
- अवतल लेंस – जब किसी लेंस के किनारे मध्य भाग की अपेक्षा मोटे होते हैं, तो उसे अवतल लेंस या अपसारी लेंस कहते हैं।
- लेंस की शक्ति – किसी लेंस द्वारा प्रकाश किरण को मोड़ने की क्षमता (अभिसरण या अपसरण) को लेंस की शक्ति कहते हैं। यह फोकस दूरी (मीटर में) के व्युत्क्रम के बराबर होती है। इसका SI मात्रक डायोप्टर (D) है। उत्तल लेंस की शक्ति धनात्मक होती है। अवतल लेंस की शक्ति ऋणात्मक होती है। यदि दो लेंसों को आपस में संपर्क में रख दिया जाए, तो संयोजन की कुल शक्ति दोनों लेंसों की शक्तियों के योग के बराबर होती है।
लेंस द्वारा प्रतिबिम्ब का निर्माण
उत्तल लेंस


अवतल लेंस


प्रकाश का वर्ण-विक्षेपण
- जब श्वेत प्रकाश (या मिश्रित प्रकाश) की किरण को प्रिज्म से गुजारा जाता है, तो वह अपने विभिन्न रंगों में विभाजित हो जाती है। इस घटना को प्रकाश का वर्ण-विक्षेपण कहते हैं।
- विक्षेपण के बाद सतह पर बनने वाली रंगीन पट्टियों को वर्णक्रम कहते हैं।
- प्रकाश का वर्ण-विक्षेपण विभिन्न रंगों की किरणों के भिन्न-भिन्न मात्रा में विचलन के कारण होता है। बैंगनी रंग का विचलन सबसे अधिक होता है जबकि लाल रंग का विचलन सबसे कम होता है।
- वर्णक्रम में रंगों का क्रम इस प्रकार होता है — बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल (VIBGYOR)।
- वर्ण-विक्षेपण इसलिए होता है क्योंकि किसी माध्यम में विभिन्न रंगों के प्रकाश की चाल अलग-अलग होती है। इसी कारण किसी माध्यम का अपवर्तनांक विभिन्न रंगों के लिए अलग-अलग होता है। जिस रंग के लिए अपवर्तनांक कम होता है, उसकी चाल अधिक होती है।
- इस प्रकार — किसी माध्यम में बैंगनी प्रकाश की चाल न्यूनतम होती है और उसका अपवर्तनांक अधिकतम होता है। लाल प्रकाश की चाल अधिकतम होती है और उसका अपवर्तनांक न्यूनतम होता है।
इंद्रधनुष

- इंद्रधनुष आकाश में वृत्ताकार चाप के रूप में दिखाई देने वाला रंगीन दृश्य है, जो हल्की वर्षा के दौरान या उसके बाद सूर्य के विपरीत दिशा में दिखाई देता है। इंद्रधनुष का निर्माण जल की सूक्ष्म बूंदों द्वारा सूर्य के प्रकाश के अपवर्तन, विवर्तन (वर्ण-विक्षेपण) और पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण होता है।
- इंद्रधनुष के प्रकार
- प्राथमिक इंद्रधनुष – यह दो बार अपवर्तन और एक बार पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण बनता है।प्राथमिक इंद्रधनुष में — लाल रंग बाहरी (उत्तल) भाग में होता है। बैंगनी रंग भीतरी (अवतल) भाग में होता है। इसकी कोणीय चौड़ाई लगभग 2° होती है और यह लगभग 41° के औसत उन्नयन कोण पर दिखाई देता है।
- द्वितीयक इंद्रधनुष – यह दो बार अपवर्तन और दो बार आंतरिक परावर्तनों के कारण बनता है। द्वितीयक इंद्रधनुष में रंगों का क्रम उल्टा होता है।इसकी कोणीय चौड़ाई लगभग 3.5° होती है और यह लगभग 52.75° के औसत उन्नयन कोण पर दिखाई देता है। द्वितीयक इंद्रधनुष की तीव्रता प्राथमिक इंद्रधनुष से कम होती है।

रंगों का सिद्धांत
- रंग वह अनुभूति है जो प्रकाश के कारण आँख की शंकु कोशिकाओं (आँख के रेटिना में पाई जाने वाली प्रकाश-संवेदी कोशिकाएं) द्वारा महसूस की जाती है।
- प्राथमिक रंग – स्पेक्ट्रम के नीला, हरा और लाल रंग प्राथमिक रंग कहलाते हैं, क्योंकि इन तीनों को उचित अनुपात में मिलाकर सभी रंग प्राप्त किए जा सकते हैं। नीला + लाल + हरा = सफेद
- द्वितीयक रंग – किसी भी दो प्राथमिक रंगों को मिलाने से जो रंग बनता है, उसे द्वितीयक रंग कहते हैं। तीन द्वितीयक रंग है — पीला, मैजेंटा और सायन (नीला + हरा)।
प्रकाश का प्रकीर्णन
- जब प्रकाश तरंगें धूल के कणों, जल की बूंदों या कोलॉइडी विलयन में निलंबित कणों पर गिरती हैं, तो वे सभी दिशाओं में फैल जाती हैं। इस घटना को प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं।
- प्रकाश का प्रकीर्णन बैंगनी रंग के लिए अधिकतम और लाल रंग के लिए न्यूनतम होता है।
- आकाश का नीला रंग प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण दिखाई देता है।
- सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य का चमकीला लाल रंग भी प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण होता है।

रेले प्रकीर्णन
- यह वह प्रकीर्णन है जिसमें प्रकाश का प्रकीर्णन उन कणों द्वारा होता है जिनका आकार प्रकाश की तरंगदैर्ध्य से बहुत छोटा होता है।
- यह मुख्यतः अणुओं और बहुत छोटे कणों (जैसे वायुमंडल में O₂ और N₂) के लिए होता है।
- प्रकीर्णन की तीव्रता तरंगदैर्ध्य पर बहुत अधिक निर्भर करती है।
- गणितीय संबंध = तीव्रता (I) ∝ 1 / λ⁴
- अर्थात प्रकीर्णन की तीव्रता तरंगदैर्ध्य के चौथे घात के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
- कम तरंगदैर्ध्य → अधिक प्रकीर्णन
- अधिक तरंगदैर्ध्य → कम प्रकीर्णन
- इसी कारण बैंगनी और नीला प्रकाश लाल प्रकाश की तुलना में अधिक प्रकीर्णित होता है।
अनुप्रयोग / प्राकृतिक घटनाएँ
- आकाश का नीला रंग — क्योंकि नीला प्रकाश लाल की तुलना में अधिक प्रकीर्णित होता है।
- सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य का लाल दिखाई देना — जब सूर्य क्षितिज के पास होता है, तब नीला प्रकाश प्रकीर्णित हो जाता है और हमारी आँखों तक मुख्यतः लाल और नारंगी प्रकाश पहुँचता है।
- प्रदूषित क्षेत्रों में आकाश का सफेद दिखाई देना — बड़े धूल कण सभी रंगों का प्रकीर्णन कर देते हैं, जिससे आकाश सफेद दिखाई देता है (माइ प्रकीर्णन)।
- दूर के पहाड़ों का नीला दिखाई देना — वायु में उपस्थित कणों द्वारा नीले प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण।
प्रकाश का व्यतिकरण
- जब समान आवृत्ति और समान कला अंतर वाली दो प्रकाश तरंगें एक ही दिशा में चलती हुई परस्पर अध्यारोपित होती हैं, जिससे कुछ बिंदुओं पर तीव्रता अधिकतम और कुछ पर न्यूनतम हो जाती है। अध्यारोपण के क्षेत्र में प्रकाश की तीव्रता में होने वाले इस परिवर्तन को प्रकाश का व्यतिकरण कहते हैं।
- अध्यारोपण के क्षेत्र में प्रकाश की तीव्रता में होने वाले इस परिवर्तन को प्रकाश का व्यतिकरण कहते हैं।
- संपोषी व्यतिकरण – जब दो तरंगें समान कला में होती हैं, वहाँ परिणामी तीव्रता अधिकतम होती है। इस प्रकार के व्यतिकरण को संपोषी व्यतिकरण कहते हैं।
- विनाशी व्यतिकरण – जब दो तरंगें विपरीत कला में होती हैं, वहाँ परिणामी तीव्रता न्यूनतम होती है। इस प्रकार के व्यतिकरण को विनाशी व्यतिकरण कहते हैं।

प्रकाश का विवर्तन
- जब प्रकाश तरंगें किसी अवरोध के किनारों से या किसी संकीर्ण छिद्र से गुजरती हैं, तो वे मुड़कर फैल जाती हैं और ज्यामितीय छाया क्षेत्र में प्रवेश कर जाती हैं। इस घटना को प्रकाश का विवर्तन कहते हैं। अर्थात प्रकाश के सीधी रेखीय प्रसार द्वारा निर्धारित सीमा से परे प्रकाश ऊर्जा के फैलने को प्रकाश का विवर्तन कहते हैं।
- दूसरे शब्दों में, जब प्रकाश की किरण किसी संकीर्ण छिद्र से या किसी किनारे के पास से गुजरती है, तो वह फैल जाती है और यह घटना प्रकाश के तरंग स्वरूप के कारण होती है।
प्रकाश का ध्रुवण
- ध्रुवण वह घटना है जो यह सिद्ध करती है कि प्रकाश एक अनुप्रस्थ तरंग है।
- प्रकाश एक विद्युत चुंबकीय तरंग है, जिसमें विद्युत क्षेत्र और चुंबकीय क्षेत्र के सदिश एक-दूसरे के लंबवत होते हैं तथा दोनों तरंग के संचरण की दिशा के भी लंबवत कंपन करते हैं।
- प्रकाश की तरंगों के कंपन को एक विशेष दिशा तक सीमित करने की घटना को प्रकाश का ध्रुवण कहते हैं, जो तरंग के संचरण की दिशा के लंबवत तल में होता है।

स्थिर वैद्युतिकी
- जब दो वस्तुओं को आपस में रगड़ा जाता है, तो वे कागज के छोटे टुकड़ों, धूल के कणों आदि को आकर्षित करने का गुण प्राप्त कर लेती हैं। ऐसी वस्तुओं को विद्युतीकृत या आवेशित कहा जाता है।
- आवेश : आवेश पदार्थ का वह मूल गुण है जिसके कारण वह विद्युत और चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करता है तथा उनका अनुभव करता है।
- बेंजामिन फ्रैंकलिन ने आवेश के दो प्रकार बताए — धनात्मक आवेश और ऋणात्मक आवेश।
- समान आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं और विपरीत आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।
- वस्तुओं का आवेशित होना इलेक्ट्रॉनों के एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरण के कारण होता है।
- आवेश का पृष्ठ घनत्व – किसी चालक की सतह पर प्रति इकाई क्षेत्रफल पर उपस्थित आवेश की मात्रा को आवेश का पृष्ठ घनत्व कहते हैं।
- किसी चालक की सतह के किसी बिंदु पर आवेश का पृष्ठ घनत्व चालक के आकार तथा उसके पास उपस्थित अन्य चालकों या कुचालकों की उपस्थिति पर निर्भर करता है।
- किसी चालक की सतह के किसी भाग पर आवेश का पृष्ठ घनत्व उस बिंदु पर वक्रता त्रिज्या के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
- इसी कारण चालक के नुकीले भागों पर आवेश का पृष्ठ घनत्व अधिकतम होता है।
कूलॉम का नियम
- कूलॉम के नियम के अनुसार, स्थिर दो बिंदु आवेशों के बीच आकर्षण या प्रतिकर्षण का बल उनके आवेशों के परिमाण के गुणनफल के समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। यह बल दोनों आवेशों को जोड़ने वाली रेखा की दिशा में कार्य करता है।
- शब्दावली –
- विद्युत क्षेत्र – किसी आवेश या आवेशित वस्तु के चारों ओर का वह क्षेत्र, जहाँ उसके विद्युत प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है, विद्युत क्षेत्र कहलाता है।
- विद्युत क्षेत्र की तीव्रता – विद्युत क्षेत्र में किसी बिंदु पर रखे इकाई धनात्मक आवेश पर लगने वाले बल को उस बिंदु की विद्युत क्षेत्र की तीव्रता कहते हैं।
- खोखले चालक का विद्युत क्षेत्र – किसी आवेशित खोखले चालक के अंदर विद्युत क्षेत्र शून्य होता है। ऐसे चालक को दिया गया आवेश उसकी सतह पर ही रहता है। इसी कारण खोखला चालक स्थिर वैद्युत परिरक्षक का कार्य करता है। इसलिए बिजली कड़कने के समय कार या बस में बैठना अधिक सुरक्षित माना जाता है।
- विद्युत विभव – किसी विद्युत क्षेत्र के किसी बिंदु पर अनंत से इकाई धनात्मक आवेश को उस बिंदु तक लाने में किया गया कार्य उस बिंदु का विद्युत विभव कहलाता है। इसका SI मात्रक वोल्ट (V) है और यह एक अदिश राशि है।
- विभवांतर – किसी विद्युत क्षेत्र में इकाई धनात्मक आवेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में किया गया कार्य दोनों बिंदुओं के बीच का विभवांतर कहलाता है। इसका SI मात्रक वोल्ट (V) है और यह एक अदिश राशि है।
विद्युत धारा व चुंबकत्व
विद्युत धारा
- विद्युत धारा को आवेश के प्रवाह की दर या प्रति इकाई समय में प्रवाहित होने वाले आवेश के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसकी दिशा धनात्मक आवेश के प्रवाह की दिशा होती है। इसका SI मात्रक एम्पियर (A) है और यह अदिश राशि है।
- किसी चालक में 1 एम्पियर धारा प्रवाहित हो रही है, तो इसका अर्थ है कि 6.25 × 10¹⁸ इलेक्ट्रॉन प्रति सेकंड चालक के एक सिरे से प्रवेश कर रहे हैं या दूसरे सिरे से उत्सर्जित हो रहे हैं।
प्रतिरोध
- किसी चालक द्वारा धारा के प्रवाह में उत्पन्न अवरोध, प्रतिरोध कहलाता है। यह गतिमान इलेक्ट्रॉनों के चालक के आयनों से टकराने के कारण उत्पन्न होता है। इसका SI मात्रक ओम है।
ओम का नियम
- यदि तापमान, प्रकाश की तीव्रता आदि भौतिक परिस्थितियाँ स्थिर रहें, तो किसी चालक में प्रवाहित विद्युत धारा उसके सिरों के बीच के विभवांतर के समानुपाती होती है। यदि –
- V = चालक के सिरों के बीच विभवांतर
- I = चालक में प्रवाहित धारा
- तो ओम के नियम के अनुसार V ∝ I अथवा V = RI
- चालक का प्रतिरोध: किसी चालक का प्रतिरोध उसकी लंबाई के सीधे समानुपाती और अनुप्रस्थ क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
- यदि – l = चालक की लंबाई
- A = चालक का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल
- R = चालक का प्रतिरोध
- तो R ∝ l / A या R = ρ l / A
प्रतिरोध का संयोजन
- श्रेणीक्रम संयोजन– श्रेणीक्रम संयोजन में समतुल्य प्रतिरोध, सभी प्रतिरोधों के योग के बराबर होता है।
- R = R₁ + R₂ + …… + Rₙ
- समांतरक्रम संयोजन – समांतरक्रम संयोजन में समतुल्य प्रतिरोध के व्युत्क्रम का मान, सभी प्रतिरोधों के व्युत्क्रमों के योग के बराबर होता है।
- 1 / R = 1 / R₁ + 1 / R₂ + …… + 1 / Rₙ
- विद्युत शक्ति– किसी परिपथ में विद्युत ऊर्जा के उपभोग की दर को विद्युत शक्ति कहते हैं। इसका SI मात्रक वाट (W) है।
- विद्युत शक्ति = I²R = V² / R = VI
- 1 किलोवाट-घंटा (kWh) = 3.6 × 10⁶ जूल
- 1 kWh को बोर्ड ऑफ ट्रेड यूनिट भी कहते हैं।
- अमीटर – वह उपकरण जिससे किसी परिपथ में विद्युत धारा मापी जाती है। इसे परिपथ में श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है। आदर्श अमीटर का प्रतिरोध शून्य होता है।
- वोल्टमीटर – वोल्टमीटर वह उपकरण है जिससे परिपथ के दो बिंदुओं के बीच का विभवांतर मापा जाता है। इसे परिपथ में समांतरक्रम जोड़ा जाता है। आदर्श वोल्टमीटर का प्रतिरोध अनंत होता है।
- विद्युत फ्यूज – विद्युत फ्यूज एक सुरक्षा उपकरण है, जिसे विद्युत उपकरण के साथ श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है, ताकि अधिक धारा से उपकरण को क्षति से बचाया जा सके। यह सामान्यतः ताँबा, टिन और सीसा के मिश्रधातु की पतली तार से बना होता है। शुद्ध फ्यूज टिन से बनाया जाता है। फ्यूज के पदार्थ का गलनांक कम और प्रतिरोध अधिक होना चाहिए।
- गैल्वेनोमीटर – गैल्वेनोमीटर वह उपकरण है जिसका उपयोग परिपथ में सूक्ष्म (बहुत कम) विद्युत धारा को पहचानने और मापने के लिए किया जाता है। यह लगभग 10⁻⁶ एम्पियर तक की धारा माप सकता है।
- विद्युत चुंबकीय प्रेरण – जब किसी परिपथ से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तो उस परिपथ में विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है। इस घटना को विद्युत चुंबकीय प्रेरण कहते हैं। उत्पन्न हुए विद्युत वाहक बल को प्रेरित विद्युत वाहक बल और यदि परिपथ बंद हो तो उत्पन्न धारा को प्रेरित धारा कहते हैं। प्रेरित धारा की दिशा फ्लेमिंग के दाहिने हाथ के नियम या लेन्ज के नियम से निर्धारित की जाती है।

- लेन्ज का नियम – लेन्ज के नियम के अनुसार, प्रेरित विद्युत धारा (या प्रेरित विद्युत वाहक बल) की दिशा ऐसी होती है कि वह उस चुंबकीय फ्लक्स के परिवर्तन का विरोध करती है, जिसके कारण वह उत्पन्न हुई है। इस प्रकार ऊर्जा संरक्षण सुनिश्चित होता है।

- ट्रांसफार्मर – ट्रांसफॉर्मर वह उपकरण है जो कम वोल्टेज की प्रत्यावर्ती धारा (A.C.) को अधिक वोल्टेज की प्रत्यावर्ती धारा में तथा अधिक वोल्टेज की प्रत्यावर्ती धारा को कम वोल्टेज की प्रत्यावर्ती धारा में परिवर्तित करता है।
- यह विद्युतचुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है और इसका उपयोग केवल प्रत्यावर्ती धारा (A.C.) के साथ ही किया जा सकता है।
चुंबकत्व
- चुंबकत्व वह गुण है जो चुंबकों द्वारा प्रदर्शित होता है और विद्युत आवेशों की गति से उत्पन्न होता है, जिसके कारण वस्तुएँ आकर्षित या प्रतिकर्षित होती हैं।
- चुंबक की विशेषताएँ
- आकर्षण गुण : चुंबक लोहा, कोबाल्ट, निकेल तथा इनके कुछ मिश्रधातुओं जैसे मैग्नेटाइट (Fe₃O₄) को आकर्षित करता है।
- दिशात्मक गुण : जब किसी चुंबक को स्वतंत्र रूप से लटकाया जाता है, तो वह भौगोलिक उत्तर-दक्षिण दिशा में स्थिर हो जाता है।
- चुंबकों के प्रकार – 1. प्राकृतिक चुंबक 2. कृत्रिम चुंबक
- प्राकृतिक चुंबक लौह का ऑक्साइड होता है। लेकिन अनियमित आकार, कमजोर चुंबकत्व और अधिक भंगुरता के कारण इनका प्रयोग प्रयोगशाला में नहीं किया जाता।
- कृत्रिम विधियों से बनाए गए चुंबकों को कृत्रिम या मानव निर्मित चुंबक कहते हैं। इनके प्रकार हैं — छड़ चुंबक, घोड़े की नाल आकार का चुंबक, रॉबिन्सन का गेंदाकार चुंबक, चुंबकीय सुई, विद्युत चुंबक।
- चुंबक के गुण
- चुंबक के मध्य भाग में आकर्षण शक्ति न्यूनतम होती है।
- चुंबक के दो ध्रुवों को जोड़ने वाली काल्पनिक रेखा को चुंबकीय अक्ष कहते हैं।
- समान ध्रुव एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं और असमान ध्रुव एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।
- जब किसी चुंबकीय पदार्थ को चुंबक के पास रखा जाता है, तो वह प्रेरण के कारण चुंबकित हो जाता है।
- चुंबकीय क्षेत्र – चुंबक के चारों ओर का वह क्षेत्र जहाँ उसका चुंबकीय प्रभाव अनुभव किया जा सकता है, चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है।
- चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता – किसी चुंबकीय क्षेत्र के किसी बिंदु पर रखे इकाई ध्रुव पर लगने वाले बल को उस बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता कहते हैं। इसे H से प्रदर्शित करते हैं। इसका SI मात्रक एम्पीयर प्रति मीटर (A/m) होता है। यह एक सदिश राशि है।
- चुंबकीय फ्लक्स – किसी चुंबकीय क्षेत्र में प्रति इकाई क्षेत्रफल से गुजरने वाली कुल चुंबकीय बल रेखाओं की संख्या को चुंबकीय फ्लक्स कहते है। यह एक सदिश राशि है, जिसे ‘B’ से दर्शाया जाता है। इसका SI मात्रक टेस्ला (T) या वेबर प्रति वर्ग मीटर (Wb/m) है।
- किसी चुंबकीय क्षेत्र के किसी बिंदु पर रखे गए इकाई शक्ति वाले उत्तर ध्रुव पर लगने वाला बल उस बिंदु का चुंबकीय फ्लक्स घनत्व कहलाता है। इसकी SI इकाई न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर या वेबर/मीटर² या टेस्ला (T) है।
चुंबकीय बल रेखाएं
- वे काल्पनिक रेखाएं हैं जो किसी चुंबक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा और प्रबलता को दर्शाती हैं। इन रेखाओं के किसी बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा उस बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा बताती है।

- चुंबकीय बल रेखाओं के गुण
- चुंबकीय बल रेखाएं बंद वक्र बनाती हैं। यह उत्तरी ध्रुव से बाहर की और निकलते हुए और दक्षिणी ध्रुव से अंदर की ओर प्रवेश करती है।
- दो चुंबकीय बल रेखाएं कभी एक-दूसरे को नहीं काटती है। क्योंकि कटान बिंदु पर दो स्पर्श रेखाएं खींची जा सकती है जो की संभव एनएच है।
- जहाँ चुंबकीय बल रेखाएं अधिक सघन होती हैं, वहाँ चुंबकीय क्षेत्र अधिक प्रबल होता है।
- यदि बल रेखाएं समानांतर और समान दूरी पर हों, तो चुंबकीय क्षेत्र समान होता है।
- चुंबकीय पदार्थ – इन्हें तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है —
- प्रतिचुंबकीय (डायमैग्नेटिक) पदार्थ – वे पदार्थ जिन्हें चुंबकीय क्षेत्र में रखने पर वे चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के विपरीत दिशा में बहुत कम बल से प्रतिकर्षित होते हैं। उदाहरण — बिस्मथ, जिंक, ताँबा, चाँदी, सोना, हीरा, पारा, पानी आदि।
- अनुचुंबकीय (पैरामैग्नेटिक) पदार्थ – वे पदार्थ जिन्हें चुंबकीय क्षेत्र में रखने पर वे चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं और उसी दिशा में चुंबकित हो जाते हैं। उदाहरण — एल्यूमिनियम, प्लेटिनम, मैंगनीज, सोडियम, ऑक्सीजन आदि।
- लौहचुंबकीय (फेरोमैग्नेटिक) पदार्थ – वे पदार्थ जिन्हें चुंबकीय क्षेत्र में रखने पर वे चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में बहुत प्रबल रूप से आकर्षित होते हैं और उसी दिशा में प्रबल रूप से चुंबकित हो जाते हैं। उदाहरण — लोहा, कोबाल्ट, निकेल आदि।
- वह विशिष्ट तापमान है, जिसके ऊपर चुंबकीय पदार्थ अपना लौहचुंबकीय गुण खो देते हैं और अनुचुंबकीय पदार्थ में बदल जाते है। इस तापमान को क्यूरी तापमान कहते हैं।
क्यूरी तापमान
भू-चुंबकत्व
- पृथ्वी एक शक्तिशाली चुंबक की तरह व्यवहार करती है, जिसका दक्षिण ध्रुव भौगोलिक उत्तर ध्रुव के पास और उत्तर ध्रुव भौगोलिक दक्षिण ध्रुव के पास स्थित होता है। किसी स्थान पर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को तीन तत्वों के द्वारा व्यक्त किया जाता है —
- दिक्पात कोण : पृथ्वी के चुंबकीय याम्योत्तर और भौगोलिक याम्योत्तर के बीच का कोण दिक्पात कोण कहलाता है।
- नमन या नति कोण : पृथ्वी का परिणामी चुंबकीय क्षेत्र क्षैतिज तल के साथ जो कोण बनाता है, उसे नमन या नति कोण कहते हैं। ध्रुवों पर इसका मान 90° और विषुवत रेखा पर 0° होता है।
- पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक : किसी स्थान पर चुंबकीय याम्योत्तर के अनुदिश पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का घटक चुंबकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक कहलाता है। इसका मान भिन्न- भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न होता है। इसका लगभग मान 0.4 गॉस या 0.4 × 10⁻⁴ टेस्ला होता है।
भंवर धाराएं
- जब किसी चालक को परिवर्तनशील चुंबकीय फ्लक्स में रखा जाता है, तो विद्युत धारा के बंद लूप उत्पन्न हो जाते हैं। इन्हें भंवर धाराएं कहते हैं। इन्हें फूको धाराएं भी कहा जाता है।
- भंवर धाराएँ उत्पन्न होने के कारण का विरोध करती हैं। जब किसी चुंबक को ताँबे की प्लेट के पास लाया जाता है, तो प्लेट में उत्पन्न भंवर धाराएँ अपना स्वयं का चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती हैं, जो चुंबक को दूर धकेलने का प्रयास करता है। यह लेन्ज के नियम के अनुसार होता है।

भंवर धाराओं के अनुप्रयोग
- विद्युत चुंबकीय ब्रेक – इनका उपयोग विद्युत रेलगाड़ियों में किया जाता है। पहियों के घूमने की दिशा के लंबवत चुंबकीय फ्लक्स प्रवाहित किया जाता है, जिससे पहियों में भंवर धाराएँ उत्पन्न होती हैं। ये धाराएं पहियों के घूर्णन की दिशा के विपरीत दिशा में बहती हैं और उनकी गति को कम करके ट्रेन को रोकने में सहायता करती हैं।
- प्रेरण मोटर
परमाणु एवं नाभिकीय व आधुनिक भौतिकी
- परमाणु पदार्थ का सबसे छोटा कण है जो रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग लेता है। एक ही तत्व के परमाणु द्रव्यमान, आकार और गुणों में समान होते हैं।
- परमाणु तीन मूलभूत कणों से मिलकर बना होता है — इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन।
- सभी प्रोटॉन और न्यूट्रॉन परमाणु के केंद्रीय भाग में होते हैं, जिसे नाभिक कहते हैं। इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।
- परमाणु में इलेक्ट्रॉनों और प्रोटॉनों की संख्या समान होती है और इनके आवेश बराबर तथा विपरीत होते हैं। इसी कारण परमाणु विद्युत रूप से उदासीन होता है।
रेडियोधर्मिता
- जब किसी परमाणु का नाभिक स्वतः विखंडित होकर हानिकारक विकिरण या कणों का उत्सर्जन करता है, तो इस घटना को रेडियोधर्मिता कहते हैं।
- रेडियोधर्मिता की खोज हेनरी बेकरल ने की थी, जिसके लिए उन्हें मैडम क्यूरी और पियरे क्यूरी के साथ संयुक्त रूप से भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था।
- जिन नाभिकों में 83 या उससे अधिक प्रोटॉन होते हैं, वे अस्थिर होते हैं। ये नाभिक α, β और γ कणों का उत्सर्जन करके स्थिर हो जाते हैं।
- ऐसे नाभिक वाले तत्व रेडियोधर्मी तत्व कहलाते हैं और α, β तथा γ कणों के उत्सर्जन की घटना को रेडियोधर्मिता कहते हैं।
- β किरणें तेज गति से चलने वाले इलेक्ट्रॉन होती हैं। नाभिक में न्यूट्रॉन के प्रोटॉन में बदलने के कारण इलेक्ट्रॉन उत्पन्न होता है।
- γ किरणें विद्युत चुंबकीय तरंगें होती हैं। ये सामान्यतः α और β किरणों के उत्सर्जन के बाद निकलती हैं।
α, β और γ कणों के गुणधर्म
| गुणधर्म | α कण | β कण | γ किरणें |
| प्रकृति | धनावेशित | ऋणावेशित | उदासीन |
| संरचना | He⁴ नाभिक के समान | e⁰ (इलेक्ट्रॉन) | फोटॉन |
| द्रव्यमान | 6.4 × 10⁻²⁷ kg | 9.1 × 10⁻³¹ kg | शून्य |
| शुल्क | +2e | −e | शून्य |
| विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्र का प्रभाव | विचलित | विचलित | कोई प्रभाव नहीं |
| भेदन शक्ति | न्यूनतम | α एवं γ के मध्य | अधिकतम |
| आयनीकरण शक्ति | अधिकतम | α एवं γ के मध्य | न्यूनतम |
| वेग | 1.4 × 10⁷ m/s से 2.2 × 10⁷ m/s | प्रकाश के वेग का 1% से 99% | 3 × 10⁸ m/s |
- α-कण के उत्सर्जन से परमाणु क्रमांक 2 घट जाता है और द्रव्यमान संख्या 4 घट जाती है।
- β-कण के उत्सर्जन से परमाणु क्रमांक 1 बढ़ जाता है, जबकि द्रव्यमान संख्या अपरिवर्तित रहती है।
- α, β और γ किरणों के उत्सर्जन से परमाणु क्रमांक और द्रव्यमान संख्या में होने वाले परिवर्तन को समूह-विस्थापन नियम या सोडी–फजान नियम से समझाया जाता है।
- रेडियोधर्मिता का पता गीगर-मुलर काउंटर (पोर्टेबल उपकरण है, जो आयनकारी विकिरण (अल्फा, बीटा, गामा किरणों) का पता लगाने और मापने के लिए गैस-भरी ट्यूब का उपयोग करता है) से लगाया जाता है।
- जिस समय में किसी रेडियोधर्मी पदार्थ के आधे नाभिक क्षय हो जाते हैं, उसे उस पदार्थ का अर्ध-आयु कहते हैं।
- रेडियोधर्मी कार्बन-14 का उपयोग जीवाश्मों और पौधों की आयु ज्ञात करने के लिए किया जाता है। इसे कार्बन डेटिंग कहते हैं। इस विधि में आयु का निर्धारण C¹² और C¹⁴ के अनुपात को मापकर किया जाता है।
नाभिकीय विखंडन और संलयन
- नाभिकीय विखंडन – वह नाभिकीय अभिक्रिया जिसमें कोई भारी नाभिक दो लगभग समान द्रव्यमान वाले नाभिकों में विभाजित हो जाता है, उसे नाभिकीय विखंडन कहते हैं। नाभिकीय विखंडन में मुक्त होने वाली ऊर्जा को नाभिकीय ऊर्जा कहते हैं।

- श्रृंखला अभिक्रिया – जब यूरेनियम परमाणु पर धीमे न्यूट्रॉन से प्रहार किया जाता है, तो विखंडन होता है। प्रत्येक यूरेनियम नाभिक के विखंडन से औसतन 3 न्यूट्रॉन और बहुत अधिक ऊर्जा निकलती है। इस प्रकार यूरेनियम नाभिकों के विखंडन की एक श्रृंखला शुरू हो जाती है, जो तब तक चलती रहती है जब तक पूरा यूरेनियम समाप्त नहीं हो जाता। इसे श्रृंखला अभिक्रिया कहते हैं।
- “लिटिल बॉय” यूरेनियम आधारित परमाणु बम था, जिसमें यूरेनियम-235 के नाभिकीय विखंडन का उपयोग किया गया था। इसे 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर गिराया गया था।
- “फैट मैन” दूसरा परमाणु बम था, जो प्लूटोनियम आधारित था। इसे 9 अगस्त 1945 को नागासाकी (जापान) पर गिराया गया था।
- श्रृंखला अभिक्रिया के प्रकार –
- अनियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया – प्रत्येक विखंडन अभिक्रिया में तीन नए न्यूट्रॉन उत्पन्न होते हैं। ये तीन न्यूट्रॉन आगे तीन अन्य U²³⁵ नाभिकों का विखंडन करते हैं और 9 न्यूट्रॉन उत्पन्न होते हैं, और यह क्रम चलता रहता है। इस प्रकार न्यूट्रॉनों की संख्या बढ़ती जाती है और पूरा विखंडनीय पदार्थ समाप्त होने तक अभिक्रिया चलती रहती है। इसे अनियंत्रित या विस्फोटक श्रृंखला अभिक्रिया कहते हैं। यह अभिक्रिया बहुत तेज होती है और कम समय में बहुत अधिक ऊर्जा मुक्त होती है।
- परमाणु बम – यह नाभिकीय विखंडन पर आधारित होता है।
- इसमें U²³⁵ और Pu²³⁹ का उपयोग विखंडनीय पदार्थ के रूप में किया जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने इसे 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर प्रयोग किया था।
- नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया – ऐसी नाभिकीय विखंडन प्रक्रिया है जिसमें उत्पन्न न्यूट्रॉन की संख्या को नियंत्रित किया जाता है, नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया कहते हैं। इस स्थिति में प्रत्येक विखंडन से उत्पन्न न्यूट्रॉनों में से केवल एक न्यूट्रॉन ही आगे विखंडन करता है।
- नाभिकीय रिएक्टर – नाभिकीय रिएक्टर वह व्यवस्था है जिसमें नियंत्रित नाभिकीय विखंडन अभिक्रिया होती है।
परमाणु रिएक्टर के घटक :
- विखंडनीय ईंधन : इसमें U²³⁵ या Pu²³⁹ का उपयोग किया जाता है।
- मंदक : यह न्यूट्रॉनों की ऊर्जा को कम करता है ताकि वे आगे विखंडन अभिक्रिया में प्रयुक्त हो सकें। इसके लिए भारी जल और ग्रेफाइट का उपयोग किया जाता है।
- नियंत्रण छड़ें :कैडमियम या बोरॉन की छड़ों का उपयोग अतिरिक्त न्यूट्रॉनों को अवशोषित करने के लिए किया जाता है, जिससे श्रृंखला अभिक्रिया नियंत्रित रहती है।
- शीतलक : विखंडन के दौरान बहुत अधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है। शीतलक इस ऊष्मा को अवशोषित करता है और तापमान को अत्यधिक बढ़ने से रोकता है। शीतलक के रूप में पानी, भारी जल (D₂O) या हीलियम (He) तथा CO₂ जैसी गैसें उपयोग की जाती हैं।
नाभिकीय संलयन
- जब दो या दो से अधिक हल्के नाभिक आपस में मिलकर एक भारी नाभिक का निर्माण करते हैं, तो बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। इस घटना को नाभिकीय संलयन कहते हैं।

- नाभिकीय संलयन का एक सामान्य उदाहरण सूर्य और अन्य तारों से प्राप्त ऊर्जा है। यह ऊर्जा नाभिकीय संलयन के कारण उत्पन्न होती है। नाभिकीय संलयन के लिए लगभग 10⁸ K तापमान की आवश्यकता होती है।
- हाइड्रोजन बम – यह 1952 में अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया था। यह नाभिकीय संलयन पर आधारित होता है और परमाणु बम से लगभग 1000 गुना अधिक शक्तिशाली होता है।
नोट :-
- समस्थानिक : वे परमाणु जिनका परमाणु क्रमांक समान लेकिन द्रव्यमान संख्या भिन्न होती है, समस्थानिक कहलाते हैं। उदाहरण — कार्बन के समस्थानिक : ¹²C, ¹³C, ¹⁴C (Z = 6, 6, 6)
- समस्थानिकों में प्रोटॉनों और इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है, लेकिन न्यूट्रॉनों की संख्या अलग-अलग होती है।
- कुछ महत्वपूर्ण रेडियोधर्मी समस्थानिक और उनके उपयोग
- यूरेनियम-235 (U²³⁵) — नाभिकीय ऊर्जा के उत्पादन में।
- सोडियम-24 (Na²⁴) — रक्त परिसंचरण का पता लगाने में।
- कोबाल्ट-60 (Co⁶⁰) — रक्त कैंसर के उपचार में।
- आर्सेनिक-74 (As⁷⁴) — ट्यूमर के निदान में।
- आयोडीन-131 (I¹³¹) — थायरॉयड ग्रंथि के उपचार में।
- फॉस्फोरस-32 (P³²) — ल्यूकेमिया के उपचार में।
- लौह-59 (Fe⁵⁹) — एनीमिया के निदान में।
- समभारिक : वे परमाणु जिनकी द्रव्यमान संख्या समान लेकिन परमाणु क्रमांक अलग-अलग होते हैं, समभारिक कहलाते हैं। उदाहरण — ⁴⁰K (Z = 19), ⁴⁰Ca (Z = 20), ⁴⁰Ar (Z = 18)
- समन्यूट्रॉनिक : वे विभिन्न तत्वों के परमाणु जिनमें न्यूट्रॉनों की संख्या समान होती है, समन्यूट्रॉनिक कहलाते हैं। उदाहरण — ¹⁴C, ¹⁵N, ¹⁶O (Z = 6, 7, 8; सभी में 8 न्यूट्रॉन)
- समइलेक्ट्रॉनिक : वे परमाणु, अणु या आयन जिनमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है, समइलेक्ट्रॉनिक कहलाते हैं।
- समावयवी : वे रासायनिक यौगिक जिनका आणविक सूत्र समान होता है लेकिन परमाणुओं की स्थानिक व्यवस्था अलग-अलग होती है, समावयवी कहलाते हैं। इस कारण उनके भौतिक और रासायनिक गुण अलग-अलग होते हैं।
- द्रव्यमान–ऊर्जा संबंध –1905 में आइंस्टीन ने सापेक्षता के विशेष सिद्धांत के आधार पर द्रव्यमान और ऊर्जा के बीच संबंध स्थापित किया। इस संबंध के अनुसार द्रव्यमान को ऊर्जा में और ऊर्जा को द्रव्यमान में परिवर्तित किया जा सकता है।
- E = mc² (जहाँ c = प्रकाश की चाल और E = द्रव्यमान m के समतुल्य ऊर्जा)
अर्धचालक
- अर्धचालक वे पदार्थ होते हैं जो सामान्य ताप पर विद्युत के कुचालक जबकि ताप बढ़ाने पर विद्युत के चालक होते है। अर्थात इनकी विद्युत चालकता सुचालक और कुचालक के बीच की होती है।
- जर्मेनियम और सिलिकॉन दो महत्वपूर्ण अर्धचालक हैं।
- अर्धचालक के क्रिस्टल जालक में कुछ इलेक्ट्रॉन बंधन से मुक्त हो जाते हैं। जहाँ से इलेक्ट्रॉन निकलते हैं वहाँ इलेक्ट्रॉनों की कमी हो जाती है, जो आभासी धनात्मक आवेश की तरह व्यवहार करती है। इन आभासी धनात्मक आवेशों को होल (रिक्ति) कहते हैं।
- अर्धचालकों का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में किया जाता है।
- अर्धचालक दो प्रकार के होते हैं:
- आंतरिक अर्धचालक – यह अर्धचालक का अत्यंत शुद्ध रूप होता है, जिसमें कोई अशुद्धि नहीं मिलाई जाती।
- बाह्य अर्धचालक – इसमें चालकता बढ़ाने के लिए रासायनिक अशुद्धि मिलाई जाती है।
| बाह्य अर्धचालक | N-प्रकार | P-प्रकार |
| मिलाई जाने वाली अशुद्धि | 15वें समूह के तत्व | 13वें समूह के तत्व |
| आवेश- वाहक | प्रमुख – इलेक्ट्रॉन, गौण – होल (रिक्ति) | प्रमुख — होल (रिक्ति)गौण — इलेक्ट्रॉन |
- डोपिंग : शुद्ध अर्धचालक में रासायनिक अशुद्धि मिलाने की प्रक्रिया को डोपिंग कहते हैं। इसमें अशुद्धि की मात्रा और प्रकार को सावधानीपूर्वक नियंत्रित किया जाता है।
- अर्धचालक की विद्युत चालकता तापमान बढ़ने पर बढ़ जाती है।
सामान्य विज्ञान तथ्यों के साथ दैनिक जीवन में विज्ञान
मापन उपकरण
| उपकरण | मापने के लिए उपयोग |
| एयरोमीटर | वायु/गैस का घनत्व/भार मापन |
| फैदोमीटर | महासागर की गहराई |
| सोनार | समुद्र तल की गहराई |
| पाइरहिलियोमीटर | सौर विकिरण |
| एनीमोमीटर | हवा की गति |
| सिस्मोग्राफ | भूकंप की तीव्रता |
| थियोडोलाइट | ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज तल में कोणीय दूरी |
| अमीटर | विद्युत धारा मापन |
| बैरोमीटर | वायुमंडलीय दाब |
| पाइरोमीटर | अत्यधिक तापमान |
| हाइग्रोमीटर | वायुमंडल की आर्द्रता |
| स्फिग्मोमैनोमीटर | रक्तचाप मापन |
| कार्टोमीटर | सोने की शुद्धता की जांच |
| लक्समीटर | प्रकाश की तीव्रता |
| ओडोमीटर | मोटर वाहनों द्वारा तय दूरी |
| ऑडियोमीटर | ध्वनि की तीव्रता |
| लैक्टोमीटर | दूध की शुद्धता एवं घनत्व |
| वोल्टमीटर | विद्युत विभव |
| गैल्वेनोमीटर | परिपथ में विद्युत धारा की उपस्थिति |
| गीगर-मुलर काउंटर | रेडियोधर्मिता |
धातुएँ और उनके अयस्क
| धातु | अयस्क |
| चांदी (Ag) | रूबी सिल्वर, हॉर्न सिल्वर, गैलेना, सिल्वेनाइट, आर्जेंटाइट, क्लोरार्जिराइट |
| मैंगनीज (Mn) | पाइरोलुसाइट, मैंगनाइट, क्रिप्टोमेलिन, साइलोमैलिन |
| सोना (Au) | कैलावेराइट, सिल्वेनाइट |
| लोहा (Fe) | हेमेटाइट, लिमोनाइट, मैग्नेटाइट, साइडराइट, गोएथाइट, आयरन पाइराइट |
| जस्ता (Zn) | जिंक ब्लेंड, जिंकाइट, कैलामाइन |
| पारा (Hg) | सिनेबार |
| यूरेनियम (U) | कार्नोटाइट, पिचब्लेंड, यूरेनिनाइट |
| सीसा (Pb) | गैलेना |
| टिन (Sn) | कैसिटेराइट |
| कॉपर (Cu) | क्यूप्राइट, कॉपर ग्लेंस, कॉपर पाइराइट्स, मैलाकाइट, |
| मैग्नीशियम (Mg) | मैग्नेसाइट, डोलोमाइट, एप्सम नमक, कीसेराइट, कार्नेलाइट |
| पोटेशियम (K) | नाइट्रे (साल्टपीटर), कार्नेलाइट |
| एल्युमिनियम (Al) | बॉक्साइट, कोरंडम, फेल्सपार, क्रायोलाइट, एलुनाइट, काओलिन, काओलिनाइट |
मिश्र धातु
| मिश्र धातु | संघटन |
| पीतल | Cu (70%) + Zn (30%) |
| कांसा | Cu (90%) + Sn (10%) |
| जर्मन सिल्वर | Cu (60%) + Zn (20%) + Ni (20%) |
| रोल्ड गोल्ड | Cu (90%) + Al (10%) |
| गन मेटल | Cu (88%) + Sn (10%) + Zn (1%) + Pb (1%) |
| डेल्टा मेटल | Cu (60%) + Zn (38%) + Fe (2%) |
| मन्ज़ मेटल | Cu (60%) + Zn (40%) |
| डच मेटल | Cu (80%) + Zn (20%) |
| मोनेल मेटल | Cu (70%) + Ni (30%) |
| रोज़ मेटल | Bi (50%) + Pb (28%) + Sn (22%) |
| सोल्डर | Pb (50%) + Sn (50%) |
| मैग्नेलियम | Al (95%) + Mg (5%) |
| ड्यूरालुमिन | Al (94%) + Cu (3%) + Mg (2%) + Mn (1%) |
| टाइप मेटल | Sn (5%) + Pb (80%) + Sb (15%) |
| बेल मेटल | Cu (80%) + Sn (20%) |
| स्टेनलेस स्टील | Fe (75%) + Cr (15%) + Ni (10%) + C (0.5%) |
| निकेल स्टील | Fe (95%) + Ni (5%) |
दैनिक जीवन में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले रसायन
| साधारण नाम | रासायनिक सूत्र |
| बेकिंग सोडा | NaHCO₃ |
| प्लास्टर ओफ़ पेरिस | CaSO₄ · ½H₂O |
| वॉशिंग (धावन) सोडा | Na₂CO₃ · 10H₂O |
| क्विक लाइम | CaO |
| लोहे का जंग | Fe₂O₃ |
| ब्लीचिंग पाउडर | CaOCl₂ |
| मिल्क ऑफ मैग्नीशिया | Mg(OH)₂ |
| नीला थोथा (कॉपर सल्फेट) | CuSO₄ |
| चूने का पानी (लाइम वाटर) | Ca(OH)₂ |
| जिप्सम | CuSO₄ · 2H₂O |
| फिटकरी | K₂SO₄ · Al₂(SO₄)₃ · 24H₂O |
| बुझा हुआ चूना | Ca(OH)₂ |
| कास्टिक सोडा | NaOH |
| कास्टिक पोटाश | KOH |
| एक्वा रेजिया | 3HCl + HNO₃ |
| नौसादर | NH₄Cl |
कृत्रिम वर्षा
- कृत्रिम वर्षा वह प्रक्रिया है जिसमें बादलों में कुछ रसायनों का छिड़काव करके वर्षा की प्रक्रिया को तेज किया जाता है, ताकि वर्षा की बूंदें बनने लगें।

- क्लाउड सीडिंग में निम्न पदार्थों का प्रयोग किया जाता है —
- सिल्वर आयोडाइड (AgI)
- पोटैशियम आयोडाइड
- सोडियम क्लोराइड
- शुष्क बर्फ (ठोस CO₂)
- ये पदार्थ संघनन केंद्र का कार्य करते हैं। इन पर जल की बूंदें इकट्ठी होकर बड़ी बूंदें बनाती हैं और अंततः वर्षा होने लगती है।
- आवश्यक परिस्थितियाँ :
- वर्षा वाले संभावित बादल
- पर्याप्त आर्द्रता और वायुमंडलीय अस्थिरता
- अनुकूल पवन और तापमान की स्थिति
रेयर अर्थ एलिमेंट्स (दुर्लभ मृदा तत्त्व)
- दुर्लभ मृदा तत्व आवर्त सारणी के समूह 3 के 17 धात्विक तत्व हैं, जिनमें लैंथेनाइड श्रेणी के तत्व तथा स्कैन्डियम और इट्रियम शामिल होते हैं।
- इनके भौतिक गुण समान होते हैं और ये प्रायः एक ही प्रकार के अयस्कों और भंडारों में पाए जाते हैं।
- इनके नाम के विपरीत ये तत्व प्रकृति में मध्यम मात्रा में उपलब्ध हैं, लेकिन इतनी अधिक मात्रा में एक स्थान पर नहीं मिलते कि उनका आर्थिक दोहन आसानी से किया जा सके।
- भारत के पास दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा दुर्लभ मृदा संसाधन है, जो मुख्यतः मोनाजाइट खनिजों में पाया जाता है।
- दुर्लभ मृदा तत्व भविष्य की प्रौद्योगिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- इनका उपयोग स्वच्छ ऊर्जा, उच्च स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा क्षेत्र आदि में व्यापक रूप से होता है और इनके समान कोई आसान विकल्प उपलब्ध नहीं है।

उपकरण और उनके कार्य करने के भौतिक सिद्धांत
1. आर्किमिडीज के सिद्धांत पर आधारित (उत्प्लावन एवं घनत्व)
- लैक्टोमीटर → दूध की शुद्धता (घनत्व) मापने के लिए।
- हाइड्रोमीटर → द्रवों का घनत्व मापने के लिए।
- जहाज / पनडुब्बी → तैरने और डूबने के सिद्धांत पर।
2. पास्कल के नियम पर आधारित (द्रव में दाब का संचरण)
- हाइड्रोलिक प्रेस / ब्रेक / लिफ्ट → द्रव में बल की वृद्धि।
- सिरिंज (सुई) → द्रव दाब के संचरण पर।
3. बॉयल के नियम / गैस के नियमों पर आधारित
- स्फिग्मोमैनोमीटर → रक्तचाप मापने के लिए (गैस दाब)।
- एयर पंप / साइकिल पंप → दाब और आयतन के संबंध पर।
4. बरनौली के सिद्धांत पर आधारित
- कणित्र (एटोमाइज़र)/ इत्र स्प्रेयर
- विमान के पंख (लिफ्ट)
- इंजन में कार्ब्यूरेटर
5. विद्युत चुंबकीय प्रेरण (फैराडे के नियम) पर आधारित
- ट्रांसफॉर्मर → वोल्टेज को बढ़ाने या घटाने के लिए।
- विद्युत जनित्र (डायनेमो) → यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने के लिए।
- इंडक्शन स्टोव → भंवर धाराओं द्वारा ताप उत्पन्न करना।
6. ऊष्मागतिकी / ऊष्मा पर आधारित
- भाप इंजन → ऊष्मा इंजन के सिद्धांत पर।
- रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर → ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम (हीट पंप) पर।
- थर्मोकपल → सीबेक प्रभाव पर।
7. प्रकाशिकी पर आधारित (परावर्तन / अपवर्तन / विवर्तन)
- पेरिस्कोप → समतल दर्पण द्वारा परावर्तन।
- दूरबीन / सूक्ष्मदर्शी → लेंसों द्वारा अपवर्तन।
- स्पेक्ट्रोमीटर → अपवर्तन और विवर्तन।
- प्रिज्म → प्रकाश का वर्ण-विक्षेपण।
- कैमरा → अपवर्तन और प्रतिबिंब निर्माण।
- ऑप्टिकल फाइबर → पूर्ण आंतरिक परावर्तन।
8. परासरण / डायलिसिस पर आधारित
- कृत्रिम गुर्दा → परासरण।
- विलवणीकरण संयंत्र → रिवर्स ऑस्मोसिस।
9. विकिरण / नाभिकीय भौतिकी पर आधारित
- एक्स-रे ट्यूब → इलेक्ट्रॉनों के अचानक मंदन पर।
- गीगर–मूलर काउंटर → रेडियोधर्मी कणों द्वारा आयनीकरण।
- साइक्लोट्रॉन → लॉरेंज बल और आवेशित कणों की वृत्तीय गति पर।
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घटना |
वास्तविक जीवन के उदाहरण |
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अपवर्तन |
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प्रकीर्णन |
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परावर्तन |
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ध्वनि का परावर्तन |
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पूर्ण आंतरिक परावर्तन |
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वर्ण विक्षेपण |
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