जहाँगीर से औरंगज़ेब तक मुग़लकाल: प्राचीन व मध्यकालीन इतिहास के अंतर्गत जहाँगीर से औरंगज़ेब (17वीं शताब्दी) का काल मुग़ल साम्राज्य के उत्कर्ष और विस्तार का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इस अवधि में प्रशासनिक सुदृढ़ता, क्षेत्रीय विस्तार तथा कला और स्थापत्य का विकास हुआ, साथ ही अंततः ऐसे आंतरिक एवं बाहरी चुनौतियाँ उभरीं, जिन्होंने साम्राज्य की स्थिरता को प्रभावित किया।
जहाँगीर (1605-1627 ई.)
- जहाँगीर का जन्म सीकरी गाँव में हुआ, और बचपन में उसे सलीम नाम से पुकारा जाता था।
- उसका पहला विवाह मानसिंह की बहन मानबाई [शाहबेगम] से हुआ, लेकिन 1601 में मानबाई ने आत्महत्या कर ली। इसके बाद उसने जोधाबाई या जगत गुसाई से विवाह किया।
- 1599 में सलीम ने अकबर के खिलाफ विद्रोह किया और इलाहाबाद में स्वतंत्र रूप से शासन किया।
- 1605 में वह नूर-उद-दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से अकबर का उत्तराधिकारी बना। आगरा के किले में इसका राज्याभिषेक हुआ।
- गद्दी पर बैठते ही इसने 12 अध्यादेश जारी किये जिनमें महत्त्वपूर्ण थे छोटे-छोटे अनेक करों की समाप्ति, मद्यनिषेध, अस्पतालों एवं हकीमों की व्यवस्था, रविवार एवं बृहस्पतिवार को पशुबलि पर रोक तथा पुराने कैदियों की रिहाई।
- जहांगीर एक न्यायप्रिय शासक था, सबको न्याय मिले इसके लिए उसने सोने की जंजीर लगवाई जिसे जंजीर- ए-अदली के नाम से जाना जाता था।
- एक जैन संत मानसिंह ने इसके बारे में भविष्यवाणी की थी कि उनका शासन दो वर्ष से अधिक नहीं चलेगा।
सैन्य उपलब्धियां –
खुशरो का विद्रोह
- 1606 में खुसरो विद्रोह करके तन तारन (पंजाब) पहुँचा और सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जुन से आशीर्वाद प्राप्त किया।
- लाहौर के पास भैरावल नामक स्थान पर जहांगीर और खुसरो के बीच युद्ध हुआ जिसमें खुसरो पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया।
- जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव को मृत्यु दण्ड दे दिया था।
मेवाड़ अभियान
- इस समय यहां का शासक अमरसिंह था।
- 1614 में खुर्रम के नेतृत्त्व में मेवाड़ अभियान हुआ।
- मेवाड़ के साथ समझौता:
- मेवाड़ के राजा अमर सिंह ने मेवाड़ की खराब आर्थिक स्थिति के कारण मुगल संप्रभुता स्वीकार कर ली, जिससे चार दशक लंबा संघर्ष समाप्त हो गया।
- उन्हें 5000 की जात और 5000 सवारी के साथ मनसबदारी दी गई।
- मुगल इस बात पर सहमत हुए कि मेवाड़ के राजा को मुगल दरबार के अधीन होने की आवश्यकता नहीं है और न ही उन्हें वैवाहिक संबंध के लिए बाध्य किया जाएगा।
- बदले में अमर सिंह को चित्तौड़ का किला वापस दे दिया गया, इस शर्त के साथ कि वह इसकी मरम्मत नहीं कर सकेगा, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मेवाड़ इतना मजबूत न हो जाए कि वह अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग कर सके।
दक्षिण अभियान
- अकबर की मृत्यु के बाद अहमदनगर के वजीर मलिक अम्बर के नेतृत्त्व में अहमदनगर स्वतंत्र हो गया था।
- 1616 में खुर्रम के नेतृत्त्व में दक्षिण अभियान हुआ तथा उसके आतंक से घबराकर मलिक अंबर ने जहांगीर की अधीनता स्वीकार कर ली।
- दक्षिण विजय के उपलक्ष में जहांगीर ने खुर्रम को शाहजहां की उपाधि दी।
खुर्रम का विद्रोह
- 1623 में खुर्रम ने जहांगीर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया परन्तु असफल रहा।
- 1622-26 में, उनके बेटे खुर्रम ( शाहजहाँ ) ने दक्कन के अहमदनगर के मलिक अंबर के साथ मिलकर जहाँगीर के खिलाफ विद्रोह किया। महाबत खाँ ने उसे हरा दिया।
- अंततः 1626 में जहांगीर से इसने क्षमा मांगकर विद्रोह समाप्त कर दिया।
- कंधार, जिसे अकबर ने 1595 में फारसियों से जीत लिया था, 1622 में फारसी सम्राट शाह अब्बास ने पुनः जीत लिया। जहाँगीर इसे फिर से प्राप्त करना चाहते थे, लेकिन शाहज़ादा खुर्रम के विद्रोह के कारण सफल नहीं हो सके।
- जहाँगीर शासनकाल के दौरान, पूर्वी बंगाल में मुगल सत्ता मजबूती से स्थापित हो गयी थी।
जहाँगीर पर ब्रिटिश प्रभाव:
- विलियम हॉकिन्स के नेतृत्त्व में पहला ब्रिटिश दूत 1608 में जहांगीर से मिलने आया। लेकिन मुगलों को यूरोपीय लोगों के साथ व्यवहार करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
- हालाँकि, पुर्तगालियों के साथ ब्रिटिश संघर्ष ने अंग्रेजों के प्रति मुगलों के रवैये को बदल दिया। 1612 के स्वाली के युद्ध में, कैप्टन थॉमस बेस्ट के नेतृत्त्व में ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूरत के पास एक नौसैनिक युद्ध में पुर्तगालियों को हराया।
- इससे मुगल प्रभावित हुए क्योंकि वे सूरत, दीव, दादर और नागर हवेली, बेसिन और बम्बई में पुर्तगाली बस्तियों को लेकर चिंतित थे।
- 1615 में जब थॉमस रो भारत आये तो जहांगीर ने उन्हें सूरत में एक कारखाना बनाने की अनुमति दी और उन्हें 400 की जात के साथ मनसबदार नियुक्त किया।
- जहाँगीर ने दानियाल (भाई) के पुत्रों को ईसाई धर्म ग्रहण करने की अनुमति प्रदान की। इसकी प्रशंसा स्पेन के तत्कालीन शासक फिलिप III ने की है।
मेहरुन्निसा (नूरजहाँ)
- इसका प्रारम्भिक नाम मेहरुन्निसा था।
- इसके पिता ग्यासबेग (एतमादुद्दौला) थे तथा माता का नाम अस्मत बेगम था जिन्होंने गुलाब के फूल से इत्र का आविष्कार किया।
- 1594 में मेहरुन्निसा का विवाह अलीकुली खाँ से हुआ।
- 1611 में, जहाँगीर ने मेहरुन्निसा से विवाह किया। मेहरुन्निसा (नूरजहाँ) 1620 से 1627 में अपनी मृत्यु तक मुगल सम्राट जहाँगीर की पत्नी और मुख्य संगिनी थी ।
- जहांगीर की शराब और अफीम की लत के कारण नूरजहां के लिए जहांगीर पर अपना प्रभाव डालना आसान हो गया और उसके पास अपार शक्ति थी।
- जहांगीर स्वयं कहता था, कि मैंने बादशाहत नूरजहां बेगम को सौंप दिया है अब मुझे शेर भर शराब और आधा शेर कबाब चाहिए।
- उन्हें बादशाह बेगम की उपाधि दी गई और उनके नाम पर सिक्के भी जारी किये गए।
- उन्हें फरमान जारी करने का विशेषाधिकार प्राप्त था।
- नूरजहाँ ने अपने परिवार के सदस्यों का एक शक्तिशाली समूह बनाया, जिसमें वह खुद, उसके पिता मिर्ज़ा गयास बेग , उसका भाई आसफ़ खान और राजकुमार खुर्रम (शाहजहाँ) शामिल थे , ताकि वह अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सके। इस तरह के समूह को जूँटा (एक शक्तिशाली राजनीतिक समूह को संदर्भित करने वाला लैटिन शब्द) कहा जाता है।
मुगल कला पर नूरजहाँ का प्रभाव:
- नूरजहाँ के प्रभाव के कारण दरबार में फ़ारसी कला और संस्कृति का विकास हुआ।
- उनकी वास्तुकला में पित्रा दयूरा (अर्द्ध-कीमती पत्थरों का उपयोग करके कला) का उपयोग किया जाने लगा। उदाहरण: एतमादुल्ला का मकबरा।
- उन्होंने नूरमहली पोशाक , चांदी-धागे वाले ब्रोकेड ( बादला ) और चांदी-धागे वाले फीते (किनारी) जैसे विभिन्न नए वस्त्रों को पेश करके महत्त्वहीन योगदान दिया ।
जहांगीर की मृत्यु
- 1627 में जहांगीर कश्मीर में रुका तथा जब यह कश्मीर से वापस आ रहा था तब लाहौर नामक स्थान पर इसकी मृत्यु हो गई।
- इसके शव को लाहौर लाया गया और यहीं पर शाहदरा में दफनाया गया।
नोट –
- जहाँगीर ने सर्वप्रथम मराठों को अपने अमीर वर्ग में शामिल किया।
- विलियम फिन्च ने अनारकली की कथा का वर्णन अपनी पुस्तक “लॉर्ड जनरल” में किया था।
कला और संस्कृति में योगदान:
- उन्होंने अकबर की धार्मिक नीति ‘ सुलह-ए-कुल’ को जारी रखा ।
- जहाँगीर ने वास्तुकला पर कम ध्यान दिया, लेकिन चित्रकला, विशेष रूप से चित्र शैली को संरक्षण दिया । उन्होंने चित्रों में प्रभामंडल का उपयोग शुरू किया।
- उन्होंने अपनी आत्मकथा, तुजुक-ए-जहाँगीरी, फ़ारसी में लिखी। जिसे मोतमिद खाँ व मुहम्मद हादी ने पुरा किया।
- कला संस्कृति विषय में विस्तार से मिलेगा।
चित्रकला
- स्वयं चित्रकला का परखी, चित्रकला का स्वर्ण काल
- प्रमुख चित्रकार – फारूख बेग, दौलत, मनोहर, मुराद, बिसन दास, मंसूर तथा अबुल हसन
- अबुल हसन और मनोहर द्वारा 1620 में चित्रित जहाँगीरनामा (कई संग्रहों में बिखरा हुआ) का चित्र ‘दरबार में जहाँगीर’ एक विलक्षण चित्र है।
- अबुल हसन
- ‘नादिर उद ज़मा’ खिताब से नवाज़ा गया था।
- प्रसिद्ध चित्र – जहाँगीर का स्वप्न (1618-22)
- रेतघड़ी (आवरग्लास) पर विराजमान जहाँगीर का चित्र, दरबारी चित्रकार बिचित्र द्वारा चित्रित किया गया। यह चित्र 1625 में बनाया गया था।
- उस्ताद मंसूर
- नादिर उल असन
- दुर्लभ पशु, विरले पक्षियों, अनोखे पुष्पों के चित्रण हेतु प्रसिद्ध
- कृति – साइबेरिया सारस एवं बंगाल का एक अनोखा पुष्प
- बिसन दास को फारस भेजकर शाह और अमीरों के यथार्थ चित्र बनवाए।
- हैरत का अगा रजा / अका रिज़ा और उसके पुत्र अबुल हसन को नियुक्त किया। अगा रजा के नेतृत्व में आगरा में चित्रशाला की स्थापना की।
- चित्रण की प्राथमिकता बदली:
- हस्तलिखित ग्रंथों की बजाय छवि चित्र व प्राकृतिक दृश्यों को महत्त्व।
- युद्ध व कहानियों से हटकर दरबार दृश्य, शाही छवियाँ, वनस्पति व जीव-जंतु प्रमुख विषय बने।
- मंसूर ने मानव व पशु चित्रण में ख्याति अर्जित की।
- उसके संरक्षण में मुगल चित्रकला शैली ने उच्चतम दर्जे की वास्तविकता व वैज्ञानिक शुद्धता हासिल की।
- मुरक्का चित्र (एल्बम में संग्रहित एकल चित्र) लोकप्रिय हुए, जिनके हाशिए सोने मिश्रित रंगों से सजाए जाते थे।
- यूरोपीय प्रभाव से यथार्थवाद व जीवंतता बढ़ी, साथ ही ईसाई धार्मिक उत्सवों के चित्र बनाए गए।
- पर्सी ब्राउन के अनुसार, जहाँगीर के काल में मुगल चित्रकला की आत्मा लुप्त, लेकिन भारतीय पद्धति का विकास व यूरोपीय प्रभाव जारी रहा।
जहाँगीर कालीन स्थापत्य कला
- जहांगीर के शासनकाल के दौरान, वास्तुकला की अवनति हुई क्योंकि उसने चित्रकला और कला के अन्य रूपों पर अधिक ध्यान दिया।
- इसके शासनकाल में सफेद संगमरमर पर ‘पच्चीकारी’ प्रारंभ हुई।
- इसके समय बनी सबसे पहली इमारत – ‘अकबर का मकबरा’
- कश्मीर में शालीमार बाग जैसे अनेक उद्यानों का विकास करवाया था।
- लाहौर में मोती मस्जिद का भी निर्माण करवाया था।
- नूरजँहा ने आगरा में अपने पिता मिर्ज़ा गयास बेग के लिए “एतमादुद्दौला” का मकबरा” बनवाया जो “पित्राड्यूरा शैली” में निर्मित प्रथम मकबरा है। मुगल काल के अन्य मकबरों से अपेक्षाकृत छोटा होने से, इसे कई बार श्रृंगारदान भी कहा जाता है।
- एतमादुद्दौला का मकबरा भारत का पहला ऐसा स्मारक है जिसका निर्माण पूरी तरह से संगमरमर से किया गया है।
- निर्माण 1622-1628 के बीच कराया गया था।
- यह मकबरा यमुना नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है।
- इसका गुंबद फारसी वास्तुकला शैली में बनाया गया है

जहाँगीर का मकबरा (शाहदरा) –
- लाहौर में शाहदरा नगर में रावी नदी के निकट स्थित जहांगीर मकबरा मुगल सम्राट जहांगीर को समर्पित है।
- इसे जहांगीर की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी नूरजहां ने बनवाया था। मकबरे की योजना स्वयं जहांगीर द्वारा की गई, लेकिन इसको पूरा नूरजहां ने करवाया ।
अकबर का मकबरा (सिंकदरा, आगरा)
- चारों तरफ 1 मील के घेरे में फैला हुआ एक बगीचा, जिसके मध्य यह मकबरा बना हुआ है।
- 1613 में निर्माण
- पाँच मंजिला इमारत है।
- सबसे ऊपर की मंजिल पर संगमरमर से बनी दीवार से घिरा एक आँगन है।
- आँगन में फारसी भाषा में 36 दोहे लिखे हैं।
- इस मकबरे को इस्लामी, हिन्दू, ईसाई और बौद्ध कलाओं का मिश्रित रूप माना जा सकता है।

शाहजहाँ (1627-1658 ई.)
- इसकी माता का नाम जोधाबाई (जगतगुसाई) था।
- 1612 में इसका विवाह आसफ खाँ की पुत्री अर्जुमन्द बानो बेगम से हुआ जिसे शाहजहां ने मुमताज महल की उपाधि दी।
- शाहजहां अकबर और जहांगीर की तुलना में धार्मिक रूप से कट्टर था।
- शाहजहां ने नए मंदिरों के निर्माण पर रोक लगा दिया।
- इसने पुनः तीर्थ यात्रा कर लगाया।
- इसने ईसाई धर्म परिवर्तन पर रोक लगाई।
- राजकुमार खुर्रम, जिन्हें शाहजहाँ के नाम से भी जाना जाता है, ने 1627 में जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसके सबसे छोटे भाई शहरयार मिर्ज़ा को हराकर आगरा किले में स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया।
शाहजहाँ की सैन्य उपलब्धियाँ:
राजनीतिक घटना
बुन्देलों का विद्रोह
- इसके समय में 1628 में ओरछा के शासक जुझारसिंह ने विद्रोह किया।
- अंततः 1635 में इस विद्रोह का अंत हुआ और जुझारसिंह की हत्या कर दी गई।
पुर्तगालियों का दमन
- 1632 में शाहजहां ने बंगाल के सूबेदार कासिम खाँ को हुगली के पुर्तगालियों का दमन करने का आदेश दिया।
- कासिम खाँ ने हुगली पर आक्रमण करके अनेक पुर्तगालियों की हत्या की और हजारों बंदी बना लिये गए।
दक्षिण अभियान
- अफगान पीर ख़ान, जिन्हें खानजहाँ की उपाधि दी गई थी और जो साम्राज्य के दक्षिणी प्रांतों के गवर्नर थे, शत्रुतापूर्ण हो गए। शाहजहाँ ने उन्हें दक्कन से हटाने का आदेश दिया, लेकिन उन्होंने अहमदनगर के सुल्तान मुर्तजा निज़ाम शाह द्वितीय से मिलकर षड्यंत्र रचा। स्थिति गंभीर हो गई, तो शाहजहाँ ने स्वयं दक्कन की ओर कूच किया।
- 1630 में शाहजहां ने अहमदनगर अभियान किया।
- नव नियुक्त दक्कन के गवर्नर इरादत खाँ, जिन्हें आजम खाँ की उपाधि दी गई, ने शाही सेना का नेतृत्त्व किया और बालाघाट पर हमला किया। शाही सैनिकों द्वारा मचाई गई तबाही को देखकर मुर्तजा ने खानजहाँ से दूरी बना ली। खानजहाँ वहाँ से भागकर मालवा चले गए, लेकिन उनका पीछा किया गया और अंततः उन्हें मार डाला गया। इसके बाद दक्कन में शांति बहाल हुई।
- शाहजहाँ ने दक्कन को चार प्रांतों में विभाजित किया — अहमदनगर (दौलताबाद सहित), खानदेश, बरार और तेलंगाना। इन चार प्रांतों का प्रभार उन्होंने अपने अठारह वर्षीय पुत्र औरंगज़ेब को सौंपा।
- इस प्रकार, शाहजहाँ के शासनकाल में दक्कन पर मुगल साम्राज्य का प्रभावी नियंत्रण स्थापित हुआ।
- अहमदनगर, जिसने मुगलों का विरोध किया, मलिक अंबर के प्रयासों के बावजूद मुगलों द्वारा अधिग्रहित कर लिया गया।
- 1636 में, शाहजहाँ ने महाबत खाँ की सहायता से अहमदनगर के निज़ामशाही शासकों को शांत किया।
कन्धार विजय
- 1638 में यहां के प्रशासक अलीमर्दान खाँ को शाहजहां ने अपने पक्ष में कर लिया।
- इसने कन्धार शाहजहां को सौंप दिया।
नोट – इसके शासनकाल में कई यूरोपीय यात्री भारत आए, जिनमें फ्रांसीसी चिकित्सक और यात्री बर्नियर, फ्रांसीसी रत्न व्यापारी ट्रैवर्नियर, जर्मन साहसी मांडेलस्लो, अंग्रेज़ व्यापारी पीटर मुंडी और इतालवी लेखक और यात्री मनूची शामिल थे। इन यात्रियों ने भारत के बारे में विस्तृत विवरण छोड़े हैं। पीटर मुंडी ने उसके शासनकाल में पड़े अकाल का वर्णन किया है।
शाहजहाँ के पुत्रों के मध्य उत्तराधिकार का युद्ध
| 1. बहादुरपुर का युद्ध1658 में | शाहशुजा एवं दारा की शाही सेना। |
| 2. धरमत का युद्ध1658 में | औरंगजेब एवं मुराद की संयुक्त सेना तथा दारा की शाही सेना। |
| 3. सामूगढ़ का युद्ध 1658 | औरंगजेब एवं मुराद की संयुक्त सेना एवं दारा के बीच। |
| 4. खजुवा का युद्ध1659 | औरंगजेब एवं शाहशुजा के बीच |
| 5. देवराई का युद्ध1659 | औरंगजेब एवं दारा के बीच |
नोट –
- शाहजहाँ ने “चहार तस्लीम” की प्रथा शुरू की
- शाहजहाँ ने कवीन्द्राचार्य के अनुरोध पर इलाहाबाद एवं बनारस में तीर्थयात्रा कर समाप्त कर दिया था।
- दाराशिकोह कादिरी सिलसिले के सूफी संत मुल्लाशाह बदख्शी का शिष्य था।
- दाराशिकोह ने भगवद् गीता, योग वशिष्ठ तथा 52 उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया। उपनिषदों के अनुवाद को सिर्र-ए-अकबर नाम दिया।
- दारा ने सफीनत-उल-औलिया तथा मज्म-उल-बहरीन नामक फारसी ग्रंथ की रचना की।
- इटालवी यात्री मनूची ने दारा के तोपची के रूप में कार्य किया।
शाहजहाँ कालीन स्थापत्य
- उनके शासनकाल को मुगल वास्तुकला के स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है। 1631 में, उन्होंने अपनी प्यारी पत्नी मुमताज महल की याद में ताज का निर्माण शुरू किया ।
- मस्जिद और किले का निर्माण कार्य उनके शासनकाल में चरम पर था।
- शाहजहानाबाद- इसकी स्थापना 1639 में शाहजहानाबाद नामक एक चारदीवारी से घिरे शहर के रूप में की गई थी
- शाहजहाँ (तत्कालीन मुगल सम्राट) ने मुगल साम्राज्य की राजधानी को आगरा से स्थानांतरित करने का फैसला किया था।
- शाहजहाँ ने तख्त-ए-ताऊस(मयूर सिंहासन) का निर्माण कराया।
- सिंहासन का प्रारुपकर्ता जेरोनियो-विरोनियो नामक एक यूरोपीय था।
- “तख्त-ए-ताउस” का शिल्पकार बेबादल खाँ।
- ‘तख्त-ए-ताऊस’ में विश्व का सर्वाधिक महंगा हीरा कोहिनूर लगा था।
- इसने आगरा व लाहौर के किलों में अकबर द्वारा बनवाई गई इमारतों को तुड़वाकर नई इमारतों का निर्माण करवाया।
- इसके द्वारा आगरा किले में कई इमारतें बनवाई गईं –
- दीवान-ए-आम
- दीवान-ए-खास
- मच्छी भवन
- शीश महल
- अंगूरी बाग
- मोती मस्जिद – संगमरमर से निर्मित है।
- नगीना मस्जिद
स्थापत्य कला के अन्य उदाहरण
- जामा मस्जिद (आगरा)
- जामा मस्जिद (दिल्ली)
- लाल किला (दिल्ली)
- दीवान-ए-आम
- दीवान-ए-खास
- मोती महल
- हीरा महल
- रंग महल
- नहर-ए-बहिश्त
ताज महल
- ताजमहल में मध्यकालीन भारत की विकासात्मक वास्तु प्रक्रिया अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई।
- ताजमहल मुगल वास्तुकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। यह भव्यता और ऐश्वर्य की प्रचुरता का प्रदर्शन करता है।
- इसके संरचनात्मक और अलंकरणात्मक, दोनों ही प्रकार के तत्त्वों में मुगलों द्वारा हिंदुस्तान लाए गए व यहां पहले से उपस्थित तथा शाहजहाँ व उसके वास्तुकारों द्वारा ताज के लिए परिकल्पित, सभी प्रकार के प्रभावों का संगम दिखाई देता है।

- निर्माण अर्जुबंद बानो बेगम या मुमताज महल की स्मृति में
- वास्तुकार – इंशा खाँ एवं उस्ताद अहमद लाहौरी
- निर्माण कार्य लगभग 1632 में आरंभ हुआ। इस भव्य समाधि को 1638-39 तक पूरा करने के लिए भारत, फारस, ऑटोमन साम्राज्य और यूरोप से 20,000 से अधिक कारीगरों को नियोजित किया गया। सहायक भवन 1643 तक निर्मित हो गए, और सजावट का कार्य 1647 तक चलता रहा।
- मुमताज का मकबरा
- स्थापत्य विशेषताए
- इसमें अलंकरण के लिए सुलेखन, पित्रा दूरा के काम, अग्रदृश्य तकनीक, चार बाग शैली के उद्यान के उपयोग और परिसर में पानी के उपयोग सहित मुगल स्थापत्य कला की सभी विशेषताएं विद्यमान हैं।
- ताजमहल में जाली का काम बहुत सर्वश्रेष्ठ है।
- संगमरमर पर नक्काशियां कम उभार वाली हैं।
- चबूतरे पर बना वर्गाकार मकबरा
- अष्टभुजाकार आकृति
- मकबरे के ऊपर ‘दोहरा गुम्बद’
- प्रवेश द्वार संकरा लेकिन ऊँचा।
- ईंटों से बनी इमारत जिसे संगमरमर से ढ़का गया है। इसमें मकराना से लाया गया संगमरमर प्रयुक्त किया गया है।
- चबूतरे के किनारों पर चार मीनारें खड़ी हैं जो ऊपर की ओर पतली होती जाती हैं। इन मीनारों की ऊंचाई 132 फुट है।
दिल्ली का लाल किला
- निर्माण – 1639 ई. में शुरुआत
- आकार – अनियमित अष्टभुजाकार
- दीवारें तथा प्रवेश द्वार लाल बलुआ पत्थर से निर्मित हैं।
- दीवान-ए-आम – ‘पित्रा दूरा’ पद्धति में बनाया गया है। यह संगमरमर से निर्मित तीन तरफ से खुली इमारत है। यहीं पर शाहजहां का तख्त-ए-ताउस (मयूर सिंहासन) रखा जाता था।
- दीवान-ए-खास –
- ऊँचा अलंकृत स्तंभों वाला सभागृह।
- यह भी संगमरमर से निर्मित इमारत है।
- इसकी दीवार पर अमीर खुसरो का एक दोहा लिखा है जो इन इमारतों को उपयुक्त श्रद्धा प्रदान करता है-
अगर फिरदौस बररुये जमी अस्त
हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त।।
- रंग महल :- यह शाहजहां का अपना महल था। यह संगमरमर से निर्मित इमारत थी।
- शीश महल :- यह शाही परिवार का स्नानागार था।
दिल्ली की जामा मस्जिद –
- लाल किले के बाहर 1644 में इसका निर्माण प्रारंभ हुआ और 1658 में बनकर यह तैयार हो गई। यह लाल पत्थर की इमारत है। इसके ऊपर संगमरमर के तीन गुम्बद बने हैं।
- निर्माण की तारीख अंकित की गई है।
- खर्च का अंकन भी किया गया है।

चित्रकला
- यथार्थवाद से हटकर आदर्शीकरण और शैलीकरण पर जोर।
- शाही छवियाँ सम्राट के वैभव, हीरे-जवाहरात और समृद्धि को दर्शाती थीं।
- प्रमुख चित्रकार: गोवर्धन, चतुर, चिंतारमण, अनूप, बालचंद्र।
- महत्त्वपूर्ण कृति: पादशाहनामा – भारतीय लघु चित्रकला की उत्कृष्ट उपलब्धि।
- विशेषताएँ:
- शाही, ऐतिहासिक व रहस्यवादी विषयों को सम्मोहक रंगों व जटिल संयोजनों में चित्रित किया गया।
- प्रसिद्ध यूरोपीय चित्रकार रेम्ब्रां मुगल चित्रकला की बारीकियों व रेखाओं से प्रभावित हुआ, जिससे मुगल चित्रकला को वैश्विक पहचान मिली।
औरंगजेब(1658-1707)
- औरंगज़ेब ने 1658 में सिंहासन पर अधिकार किया। उन्होंने उत्तराधिकार युद्ध में अपने भाइयों दारा शिकोह, शुजा और मुराद को पराजित कर सत्ता पाई।
- उनके शासन का 50-वर्षीय काल दो भागों में विभाजित है। पहले 25 वर्षों में उन्होंने दिल्ली में रहकर मुख्यतः उत्तरी भारत के मामलों पर ध्यान केंद्रित किया। 1681 में अपने पुत्र, शहजादा अकबर के विद्रोह के कारण उन्हें दक्कन जाना पड़ा। इसके बाद वे कभी दिल्ली नहीं लौटे और 1707 में अहमदनगर में निराशावस्था में उनकी मृत्यु हुई।
- उन्होंने लगभग पचास वर्षों तक शासन किया, जिसके दौरान मुगल साम्राज्य के क्षेत्र अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गये।
- अपने चरम पर यह उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में जिंजी (तमिलनाडु) तक तथा पश्चिम में हिंदुकुश से लेकर पूर्व में चटगाँव तक फैला हुआ था।

- दक्कन के उनके विनाश को एक राजनीतिक भूल माना जाता है और इतिहासकारों ने इसे दक्कन अल्सर का नाम दिया है क्योंकि इससे मराठों के साथ सीधा टकराव हुआ और इससे मुगल खजाने पर भी गंभीर असर पड़ा।
- शिवाजी और उनके उत्तराधिकारियों के अधीन मराठों ने औरंगजेब के अधीन मुगल साम्राज्य को चुनौती दी और उनकी मृत्यु के बाद वे एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरे।
प्रमुख सैन्य अभियान
- औरंगज़ेब ने मुग़ल साम्राज्य की सीमाओं को विस्तारित करने के लिए कई सैन्य अभियान चलाए, जिनमें उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी भारत में युद्ध शामिल थे। इन अभियानों ने खजाने पर भारी दबाव डाला।
- उनके पिता शाहजहाँ के शासनकाल में फसल के राजस्व को एक-तिहाई से बढ़ाकर आधा कर दिया गया था, और औरंगज़ेब के दीर्घकालिक सैन्य अभियानों ने किसानों पर अधिक कर लगाने की आवश्यकता उत्पन्न की।
जाटों का विद्रोह
- 1669 में गोकुल के नेतृत्त्व में मथुरा के आस-पास के क्षेत्रों में जाटों ने विद्रोह किया।
अहोमों के विरुद्ध अभियान
- अहोमों के विरुद्ध अभियान भेजा (सरायघाट का युद्ध 1671) लेकिन उन्हें सीमित सफलता मिली।
सतनामियों का विद्रोह
- 1672 में मेवात और नारनौल क्षेत्र में सतनामियों ने विद्रोह कर दिया। सतनामियों का विद्रोह स्थानीय हिंदू ज़मींदारों की मदद से कुचला गया।
बुंदेलखंड में चम्पतराय और छत्रसाल बुंदेला के नेतृत्त्व में विद्रोह हुआ।
सिक्खों का विद्रोह
- औरंगजेब के समय सिक्खों के नए गुरु तेगबहादुर थे।
- इन्होंने औरंगजेब की धार्मिक नीतियों का विरोध किया।
- औरंगजेब ने इन्हें दिल्ली बुलाया और इस्लाम धर्म स्वीकार करने को कहा।
- गुरु तेगबहादुर ने इसका विरोध किया और जिसकी वजह से 1775 में इन्हें मृत्यु दण्ड दे दिया गया।
- सिक्खों के 10वें गुरु गुरु गोविंद सिंह हुए हुए। इन्होंने 80 हजार सैनिकों की खालसा सेना तैयार की।
अकबर का विद्रोह
- यह औरंगजेब का पुत्र था।
- 1681 में उसने विद्रोह कर दिया और भागकर मराठा शासक सम्भाजी के पास रायगढ़ में शरण ली।
- 1682 में यह फारस चला गया।
औरंगजेब की दक्षिण विजय
- औरंगजेब की दक्षिण विजय का मुख्य उद्देश्य साम्राज्य का विस्तार करना था।
- इसके अतिरिक्त दक्षिण में मराठे मुगलों के लिए भावी खतरा बन रहे थे अतः इनकी शक्ति को समाप्त करना औरंगजेब का उद्देश्य था।
बीजापुर अभियान (1685-86)
- इस समय बीजापुर का सुल्तान सिकन्दर आदिल शाह था।
- औरंगजेब ने इसे पराजित कर उसके किले पर अधिकार कर लिया और इसे 1 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर बीजापुर को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।
गोलकुण्डा अभियान (1686-87)
- इस समय गोलकुण्डा का शासक अबुल हसन कुतुबशाह था।
- औरंगजेब ने इसे बंदी बना लिया और इसे 50 हजार रुपये वार्षिक पेंशन देकर इसके राज्य को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।
मराठों से संघर्ष
- मराठों ने औरंगजेब को अत्यधिक परेशान किया।
- मराठों में शिवाजी ने मुगलों से निरन्तर संघर्ष किया और महाराष्ट्र में मराठों के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।
- शिवाजी के बाद उनके पुत्र संभाजी ने मुगलों से निरंतर संघर्ष किया।
- 1689 में औरंगजेब ने सम्भाजी को बन्दी बना लिया और इनकी हत्या कर दी तथा मराठा राज्य पर अधिकार कर लिया।
1707 में अहमदनगर के पास औरंगजेब की मृत्यु हो गई और औरंगाबाद में इसको दफनाया गया।
धार्मिक और प्रशासनिक नीतियां
- औरंगज़ेब ने जज़िया (सर्वधर्म कर) को पुनः लागू किया।
- उन्होंने नए मंदिरों के निर्माण पर रोक लगाई, लेकिन पुराने मंदिरों की मरम्मत की अनुमति दी। ये नीतियां उनके धार्मिक विश्वासों और राजनीतिक जरूरतों से प्रेरित थीं।
- हिंदू अधिकारियों की संख्या: औरंगज़ेब के शासनकाल में हिंदू अधिकारियों की संख्या उनके पिता शाहजहाँ के काल से अधिक थी।
- शरियत के अनुसार शासन: औरंगज़ेब ने शरियत कानून के अनुसार अबवाब (अतिरिक्त कर) जैसे असंगत करों को समाप्त कर दिया।
- उन्होंने मुहर्रम के साथ-साथ नौरोज के त्यौहार पर भी प्रतिबंध लगा दिया क्योंकि शिया लोग इसे मनाते थे।
- दक्कन के खिलाफ उनके अभियान को भी शियाओं के प्रति उनकी नफरत से जोड़ा गया।
- उन्होंने दरबार में संगीत पर रोक लगा दी , जजिया कर पुनः लागू कर दिया , केवल हिंदुओं पर सीमा शुल्क लगाया तथा नैतिक संहिता और शरियत लागू करने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति की।
- इस्लामी मूल्यों का कड़ाई से पालन करने के कारण उन्हें ‘ज़िंदा पीर’ (जीवित संत) कहा जाता था। सादगी से भरे जीवन के कारण उन्हें ‘शाही दरवेश’ भी कहा जाता था।
औरंगजेब की प्रतिक्रियावादी कार्य
- हिन्दुओं पर पुनः जजिया कर लगाना।
- राजपूतों को छोड़कर हिन्दुओं को अच्छे घोड़े एवं पालकी की सवारी पर रोक।
- मंदिरों के निर्माण एवं मरम्मत पर रोक।
- संगीत पर प्रतिबंध।
- इतिहास लेखन एवं ज्योतिष पर रोक।
- मंदिरों को तोड़ने का आदेश।
मुगलों और राजपूतों का संबंध
- राजपूतों के साथ अकबर के संबंध: राजपूतों द्वारा प्रदान की गई दृढ़ वफादारी अकबर के साम्राज्य के सुदृढ़ीकरण और विस्तार में सबसे महत्त्वपूर्ण कारक थी। जो राजपूत अकबर के समक्ष आत्मसमर्पण करते थे, उनके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाता था तथा उन्हें मनसबदार नियुक्त किया जाता था।
- अकबर ने राजपूतों के साथ वैवाहिक गठबंधन किया और राजा भारमल की बेटी हरका बाई से विवाह किया ।
- चार दशक लंबे संघर्ष के बाद जहाँगीर मेवाड़ के राजा अमर सिंह को मुगल संप्रभुता के अधीन लाने में सफल रहा , और अंततः पूरे राजपूताना पर उसका नियंत्रण हो गया। हालाँकि मेवाड़ और मारवाड़ को काफ़ी स्वतंत्रता दी गई थी और इसलिए उन्हें वतन जागीर के नाम से जाना जाता था ।
- औरंगजेब ने उत्तराधिकार की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करके राजपूतों को अलग-थलग कर दिया । उसने एक कठोर धार्मिक नीति भी अपनाई जिसे राजपूतों ने पसंद नहीं किया।
महत्त्वपूर्ण तथ्य
- औरंगजेब को कुरान कंटस्थ होने के कारण ”हाफिज“ भी कहा गया था। औरंगजेब ने कुरान की हस्तलिखित दो प्रतियाँ मक्का और मदीना भेजा।
- पुत्र जन्म के समय हिन्दुओं से लिया जाने वाला कर समाप्त किया। इसके समय में प्रशासन में सर्वाधिक हिन्दू मनसबदार थे।
- उसने सती प्रथा को प्रतिबंधित किया तथा मनूची के अनुसार उसने वेश्याओं को शादी कर घर बसाने का आदेश दिया।
- 1669 ई. में बनारस स्थित विश्वनाथ मंदिर तथा मथुरा का केशवराय मंदिर तुड़वा दिया था।
शासनकाल का अंत
- औरंगज़ेब के शासनकाल के अंतिम वर्षों में साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। उनके बाद के कमजोर उत्तराधिकारियों के कारण मुग़ल साम्राज्य केवल नाममात्र का बना रहा। उनके शासनकाल में प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर हो गया और कई प्रांत स्वतंत्र हो गए।
- औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद, मुग़ल साम्राज्य भारत की राजनीतिक जीवन में प्रभावी शक्ति नहीं रह गया।
औरंगज़ेब कालीन स्थापत्य कला
- औरंगजेब के शासनकाल के दौरान, मुगल वास्तुकला की अवनति हुई। कट्टरतावादी होने के नाते, उसने कला और स्थापत्य के विकास में कोई सक्रिय रुचि नहीं ली।
- फिर भी कई कार्य सम्पन्न हुए –
- मोती मस्जिद (दिल्ली लाल किला में) – 1662 में निर्माण। संगमरमर से निर्मित ईमारत।
- राबिया-उद्-दुरानी [औरंगजेब की पत्नी] का मकबरा –
- औरंगाबाद
- निर्माण 1678 में राजकुमार आज़म शाह (औरंगज़ेब के बेटे) द्वारा किया गया था।
- इसको बीबी का मकबरा और दक्षिण का ताजमहल भी कहा जाता है।
- बादशाही मस्जिद (लाहौर) – 1672 में निर्माण, मस्जिद में 8 मीनारों का निर्माण।
- औरंगजेब का मकबरा दौलताबाद (खुल्दाबाद) में स्थित है
- इसके अतिरिक्त मथुरा और वाराणसी में भी इसने मस्जिद बनवाई जो लाल पत्थर से निर्मित है।
चित्रकला
- औरंगज़ेब ने मुगल चित्रशाला में चित्रों को निर्मित करने के काम को आगे नहीं बढ़ाया।
- हालाँकि शाही चित्रशाला को तुरंत बंद नहीं किया गया और सुंदर चित्रों का चित्रण जारी रहा।
