अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र: अंतरिक्ष स्टेशन, मलबा, नीतियां और इसरो संस्था

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र: अंतरिक्ष स्टेशन, मलबा, नीतियां और इसरो संस्था: विज्ञान व प्रौद्योगिकी के अंतर्गत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र में अंतरिक्ष स्टेशन, अंतरिक्ष मलबा प्रबंधन, नीतिगत ढांचा तथा इसरो जैसी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका शामिल होती है। यह पारिस्थितिकी तंत्र संचार, नेविगेशन, वैज्ञानिक अनुसंधान और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने के साथ-साथ अंतरिक्ष के सतत एवं सुरक्षित उपयोग को सुनिश्चित करता है।

  • यह एक मॉड्यूलर (खंडीय) अंतरिक्ष स्टेशन (रहने योग्य कृत्रिम उपग्रह) है और निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में स्थित अब तक की सबसे बड़ी मानव निर्मित संरचना है।
  • कार्य: यह सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण (Microgravity) और अंतरिक्ष पर्यावरण अनुसंधान प्रयोगशाला के रूप में कार्य करता है।
  • प्रक्षेपण: इसे 1998 में लॉन्च किया गया था। यह पांच अंतरिक्ष एजेंसियों की एक बहुराष्ट्रीय सहयोगी परियोजना है:
    • नासा (NASA): संयुक्त राज्य अमेरिका
    • रॉसकॉसमॉस (Roscosmos): रूस
    • जाक्सा (JAXA): जापान
    • ईएसए (ESA): यूरोप
    • सीएसए (CSA): कनाडा 
  • ऐतिहासिक संदर्भ: इससे पहले, सोवियत संघ का सैल्युट (Salyut – 1971) और अमेरिका का स्काईलैब (Skylab – 1973) सरकारी अंतरिक्ष स्टेशन थे।
  • भारतीय मिशन: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) 2035 तक ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (BAS) स्थापित करने पर कार्य कर रहा है।

तियांगोंग (Tiangong) – चीन का अंतरिक्ष स्टेशन

  • परिचय: यह चीन का पहला मॉड्यूलर अंतरिक्ष स्टेशन है, जो निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में स्थित है। ‘तियांगोंग’ का अर्थ “स्वर्गीय महल” है।
  • स्वतंत्र विकास: संयुक्त राज्य अमेरिका के वुल्फ संशोधन के कारण ISS से चीन के बहिष्करण के परिणामस्वरूप चीन ने इसे स्वतंत्र रूप से विकसित किया।
  • संरचना: यह T-आकार का है और इसमें तीन मुख्य मॉड्यूल हैं:
    • तियानहे कोर मॉड्यूल (अप्रैल 2021)
    • वेंटियन प्रयोगशाला मॉड्यूल (2022)
    • मेंगटियन प्रयोगशाला मॉड्यूल (2022)
  • विशेषताएँ: इसका वजन लगभग 66–70 टन है, जो ISS के द्रव्यमान का लगभग 1/5 है। 
  • चीनी अंतरिक्ष यान ‘शेनझोउ-12’ ने तीन सदस्यीय दल के साथ तियानहे-1 से डॉक किया था।
  • हालिया मिशन (2025):
    • शेनझोउ-20: मलबे से सुरक्षा के लिए अपग्रेड और 6 महीने का प्रवास।
    • शेनझोउ-21: मानवयुक्त अंतरिक्ष यान, जिसने चार छोटे स्तनधारियों (चूहों) को ले जाकर तियांगोंग में पहला जैविक प्रजनन अध्ययन किया। इसे लॉन्ग मार्च-2F रॉकेट से प्रक्षेपित किया गया।
  • आगामी: शुंटियन (Xuntian) अंतरिक्ष दूरबीन लॉन्च की जाएगी, जो सर्विसिंग के लिए तियांगोंग के साथ जुड़ेगी।

भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) – ISRO की योजना

  • लक्ष्य: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) 2035 तक ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (BAS) स्थापित करने पर कार्य कर रहा है।
  • उद्देश्य: BAS भारत की पहली राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रयोगशाला बनेगा, जो बहु-विषयक सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण (Microgravity) प्रयोगों को संभव बनाएगा।
  • विकास चरण:
    • पहला मॉड्यूल (2028): इसे LVM3 रॉकेट के माध्यम से प्रक्षेपित किया जाएगा।
    • पूर्ण स्टेशन (2035)
  • डिज़ाइन: इसमें पाँच मॉड्यूल होंगे, जिनका कुल वजन लगभग 52 टन होगा। यह 400–450 किमी की ऊँचाई पर स्थित होगा और एक साथ 3-4 अंतरिक्ष यात्रियों के रहने का समर्थन करेगा।
  • आधार: यह मिशन भारत के मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम (गगनयान) से प्राप्त तकनीक और विशेषज्ञता पर आधारित है।
गगनयान कार्यक्रम – मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन
  • भारत का पहला मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन
  • उद्देश्य: निम्न पृथ्वी कक्षा (400 किमी) में भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता का प्रदर्शन करना।
  • मिशन योजना: 3-7 दिनों के लिए निम्न पृथ्वी कक्षा में मानवयुक्त अंतरिक्ष यान → इसके बाद सुरक्षित पुन: प्रवेश और पुनर्प्राप्ति।
  • 2028 तक 8 मिशन (अपडेटेड) (भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन BAS-1 के पहले यूनिट के प्रक्षेपण के साथ):
    • 6 मानव रहित मिशन: व्योममित्र – महिला रूपी मानवरूपी (ह्यूमनॉइड) रोबोट अंतरिक्ष यात्री, जिसे ISRO ने मानव रहित परीक्षण मिशनों हेतु विकसित किया है।
    • 2 मानव युक्त मिशन: 3 सदस्यीय दल।
  • अंतरिक्ष यात्री घोषणा (फरवरी 2024): → चार चयनित अंतरिक्ष यात्रियों को प्रधानमंत्री द्वारा ‘स्पेस विंग्स’ प्रदान किए गए।
    • ग्रुप कैप्टन प्रशांत बालकृष्णन नायर
    • ग्रुप कैप्टन अजीत कृष्णन
    • ग्रुप कैप्टन अंगद प्रताप
    • ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला
  • प्रशिक्षण अपडेट:
    • ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने एक्सिओम मिशन-4 के तहत अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर 18-दिन का मिशन पूरा किया। वे 1984 (राकेश शर्मा) के बाद ISS पर रहने वाले पहले भारतीय बने।
    • जबकि ग्रुप कैप्टन प्रशांत नायर ने बैकअप के रूप में सेवा दी और गगनयान की तैयारी के तहत NASA के जॉनसन स्पेस सेंटर में प्रशिक्षण जारी रखा।
  • मानव-रेटेड LVM3 (GSLV Mk-III): गगनयान मिशन के लिए प्रक्षेपण यान के रूप में चुना गया है।

मानव अंतरिक्ष उड़ान केंद्र (HSFC)

  • इसरो के भावी मानव मिशनों का केंद्र।
  • बेंगलुरु स्थित इसरो मुख्यालय में स्थित।
स्पैडेक्स (SpaDeX) मिशन (स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट)
  • विकासकर्ता: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)
  • मिशन प्रकार: अंतरिक्ष में स्वायत्त मिलन (rendezvous), डॉकिंग और अनडॉकिंग का प्रदर्शन करने के लिए दो उपग्रहों वाला तकनीकी प्रदर्शन मिशन।
  • प्रक्षेपण यान: PSLV-C60 | कक्षा: ~470 किमी LEO
  • उपग्रह: दो (~220 किग्रा प्रत्येक) → SDX-01 (चेज़र) और SDX-02 (टारगेट)
  • उद्देश्य
    • स्वायत्त मिलन और डॉकिंग का प्रदर्शन (V-bar approach)
    • डॉक किए गए उपग्रहों के बीच पावर ट्रांसफर को सत्यापित करना
    • डॉकिंग के दौरान संयुक्त अंतरिक्ष यान नियंत्रण का परीक्षण
    • अनडॉकिंग और स्वतंत्र संचालन की पुष्टि करना।
  • महत्व
    • भारत चौथा देश बना (USA, रूस, चीन के बाद) जिसने स्पेस डॉकिंग हासिल की।
    • यह तकनीक भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:
      • मानव अंतरिक्ष उड़ानें (जैसे गगनयान, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन)
      • कक्षा में उपग्रहों की मरम्मत, ईंधन भरना और सेवा देना
      • गहन अंतरिक्ष मिशन (जैसे चंद्रयान-4)।
  • स्थिति (मई 2025 तक): डॉकिंग सफल; पेलोड प्रयोगों के साथ विस्तारित चरण जारी।

प्रमुख वाणिज्यिक अंतरिक्ष स्टेशन परियोजनाएँ (Commercial Space Stations)

एक्सियम अंतरिक्ष स्टेशन (Axiom Space Station)

  • विशेषता: यह ISS की सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र रूप से संचालित होने वाला दुनिया का पहला वाणिज्यिक अंतरिक्ष स्टेशन होगा।
  • अन्य: यह ‘आर्टेमिस पीढ़ी’ के लिए AxEMU (एक्सियम एक्स्ट्रावेहिकुलर मोबिलिटी यूनिट) नामक अगली पीढ़ी का स्पेससूट भी प्रदान करता है।
हेवन-1 (Haven-1)
  • निर्माता: वास्ट स्पेस (Vast Space) द्वारा विकसित।
  • लॉन्च: इसे अगले वर्ष स्पेसएक्स फाल्कन (SpaceX Falcon) रॉकेट द्वारा LEO में स्थापित किया जाना निर्धारित है।
स्टारलैब (Starlab – USA-Europe)
  • सहयोग: वोयाजर स्पेस, एयरबस और नासा की एक संयुक्त परियोजना।
  • उद्देश्य: LEO में निरंतर मानव उपस्थिति बनाए रखना।
  • वैज्ञानिक फोकस: सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण अनुसंधान और व्यावसायिक विनिर्माण।
ऑर्बिटल रीफ (Orbital Reef – Blue Origin + Sierra Space)
  • अवधारणा: इसे अंतरिक्ष में एक “बिजनेस पार्क” के रूप में पेश किया गया है।
  • समर्थक: ब्लू ओरिजिन, बोइंग, रेडवायर और अमेज़न AWS जैसी कंपनियाँ।
  • उपयोग: पर्यटन, अनुसंधान और औद्योगिक गतिविधियों के लिए डिज़ाइन किया गया।

नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन फ्री-फ्लाईयर स्टेशन (Northrop Grumman Free-Flyer Station)

  • विवरण: यह एक स्वतंत्र मॉड्यूलर (खंडीय) स्टेशन परियोजना है।
  • सेवाएँ: यह रसद, वैज्ञानिक प्रयोगों और कार्गो सेवाएँ प्रदान करता है।
  • परिभाषा: अंतरिक्ष कचरा, जिसे ‘स्पेस जंक’ (Space Junk) भी कहा जाता है, पृथ्वी की कक्षा में छोड़ी गई किसी भी मानव निर्मित वस्तुओं को संदर्भित करता है।
  • शामिल वस्तुएं: इसमें पुराने और निष्क्रिय उपग्रह (Defunct satellites) जैसी बड़ी वस्तुओं से लेकर रॉकेट लॉन्च के दौरान निकले छोटे टुकड़े या पेंट के कण जैसे सूक्ष्म मलबे शामिल हैं।
Space Technology Ecosystem | अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र

केसलर सिंड्रोम (Kessler Syndrome)

  • यह एक सैद्धांतिक स्थिति है जहाँ निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में अंतरिक्ष मलबे के बीच होने वाली टक्करें एक श्रृंखला अभिक्रिया (Chain reaction)उत्पन्न करती हैं।
  • प्रभाव: इससे इतना अधिक मलबा पैदा हो जाता है कि वह विशेष कक्षा उपग्रहों के उपयोग के लिए अनुपयोगी और खतरनाक हो जाती है।

अंतरिक्ष कचरे से निपटने के लिए प्रमुख पहलें (Initiatives)

  1. IS4OM (इसरो सिस्टम फॉर सेफ एंड सस्टेनेबल ऑपरेशंस मैनेजमेंट)
    1. ISRO द्वारा बेंगलुरु में स्थापित एक नियंत्रण केंद्र (2022)।
    2. उद्देश्य: अंतरिक्ष मलबे से होने वाले जोखिमों की ट्रैकिंग, भविष्यवाणी और उन्हें कम (Mitigate) करना। 
    3. यह अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (SSA) में सुधार करता है।
  2. प्रोजेक्ट नेत्रा (Project NETRA) (नेटवर्क फॉर स्पेस ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग एंड एनालिसिस) 
    1. यह अंतरिक्ष वस्तु ट्रैकिंग और विश्लेषण के लिए इसरो की एक पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early warning system) है।
    2. कार्य: यह भारतीय उपग्रहों के लिए खतरा पैदा करने वाले मलबे और खतरों का पता लगाता है।
  3. मलबा मुक्त अंतरिक्ष मिशन (DFSM – Debris Free Space Missions)
    1. घोषणा: अप्रैल 2024।
    2. उद्देश्य: 2030 तक सभी भारतीय सरकारी और निजी अंतरिक्ष मिशनों को मलबा-मुक्त करना।
  4. PSLV ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल (POEM): यह पेलोड के रूप में रॉकेट के अंतिम चरण का उपयोग करके प्रयोग करने की एक तकनीक है, जिससे अंतरिक्ष में अतिरिक्त कचरा कम होता है।
  5. दिगंतरा रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी द्वारा विकसित भारत की पहली इन-ऑर्बिट (In-orbit) अंतरिक्ष मलबा निगरानी और ट्रैकिंग प्रणाली।
PSLV ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल (POEM / PS4-OP)
  • इसरो की पहल: PSLV के चौथे चरण (PS4) को अंतरिक्ष मलबे के बजाय एक कक्षीय प्रयोगात्मक मंच में परिवर्तित किया गया।
  • सौर पैनल, बैटरियाँ, एटीट्यूड कंट्रोल, संचार और डेटा सिस्टम से सुसज्जित एक कम लागत वाली अंतरिक्ष प्रयोगशाला के रूप में कार्य करता है।
  • उपयोग: स्टार्टअप्स और अकादमिक संस्थानों के लिए कम लागत वाला परीक्षण प्लेटफॉर्म → प्रयोग क्षेत्र: रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सूक्ष्मगुरुत्व जीवविज्ञान, हरित प्रणोदन।
  • POEM पेलोड क्षमता को प्रभावित नहीं करता; यह एक मिशन के बाद उपयोग की अवधारणा है।
  • POEM पुन: प्रवेश नहीं करता; यह केवल कक्षीय प्रयोगों के लिए है।
  • POEM विशेष रूप से PSLV से संबंधित है, GSLV से नहीं।
  • प्रमुख मिशन:
    • 2019 (C44): पहला डेमो मिशन – KalamSAT-V2 के साथ।
    • POEM-1 (C53, 2022): पहला पूर्ण रूप से स्थिर मिशन; 6 पेलोड्स शामिल – जैसे: Digantara, Dhruva Space
    • POEM-3 (C58, 2024): 10 पेलोड्स; प्रशांत महासागर के ऊपर सुरक्षित डी-ऑर्बिटशून्य मलबा।
    • POEM-4.0 (PSLV-C60 / SpaDeX Mission): 24 पेलोड, जिसमें रोबोटिक आर्म (भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का पूर्ववर्ती), मलबा पकड़ने वाला मैनिपुलेटर, हरित प्रणोदन, पौधों की वृद्धि (CROPS) शामिल। नियंत्रित पुनः प्रवेश से पहले 1,000 कक्षाएँ पूरी कीं।
    • CROPS (कॉम्पैक्ट रिसर्च मॉड्यूल फॉर ऑर्बिटल प्लांट स्टडीज) प्रयोग
      • उद्देश्य: माइक्रोग्रैविटी में लोबिया (cowpea) बीजों के अंकुरण और वृद्धि का अध्ययन।
दिगंतरा रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी:
  • अंतरिक्ष क्षेत्र में कार्य करने वाला एक स्टार्टअप (स्थापना: 2018, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्रों – अनिरुद्ध शर्मा और राहुल रावत द्वारा)।
  • भारत की पहली ‘इन-ऑर्बिट’ अंतरिक्ष मलबा निगरानी और ट्रैकिंग प्रणाली विकसित की है। यह प्रणाली लाइडर (LIDAR) तकनीक पर आधारित है।
  • वाणिज्यिक SSA वेधशाला:भारत की पहली व्यावसायिक अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (SSA) वेधशाला उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में स्थापित की जाएगी।

अंतरिक्ष कचरे से निपटने के लिए प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय प्रयास

  • अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति (IADC):
    • स्वरूप: यह 13 प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसियों का एक वैश्विक समन्वय मंच है।
    • मुख्य कार्य: यह मिशन-पश्चात निपटान, विखंडन को कम करने और सुरक्षित पुनः प्रवेश (Re-entry) नियमों जैसे विषयों पर मानक दिशा-निर्देश जारी करता है।
    • नवीनतम अद्यतन (2025/26): IADC ने ’25-वर्षीय डीऑर्बिट नियम’ को काफी सख्त करते हुए 5 वर्ष करने का प्रस्ताव किया है, जिसका अर्थ है कि निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में मौजूद उपग्रहों को मिशन खत्म होने के 5 साल के भीतर कक्षा से हटाना होगा।
    • भारत की स्थिति: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) इस समिति का स्थायी सदस्य है।
  • यूएन कॉपुओस (UN COPUOS – बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की समिति):
    • योगदान: इसने अंतरिक्ष मलबा शमन (Mitigation) दिशा-निर्देश (2007, संशोधित 2019 में) जारी किए।
    • उद्देश्य: ये दिशा-निर्देश अंतरिक्ष में सभी देशों और संस्थाओं के लिए एक जिम्मेदार व्यवहार की उच्च-स्तरीय रूपरेखा प्रदान करते हैं।
  • जीरो डेब्रिस चार्टर (Zero Debris Charter):
    • प्रस्तावक: यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA)।
    • लक्ष्य: इस पहल का उद्देश्य 2030 तक सभी अंतरिक्ष मिशनों को “मलबा तटस्थ” (Debris Neutral) बनाना है। 2026 तक 40 से अधिक संगठनों द्वारा इस पर हस्ताक्षर करने का लक्ष्य है।
  • क्लियरस्पेस-1 मिशन (ClearSpace-1 – 2026):
    • प्रवर्तक: यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA)।
    • पहचान: यह दुनिया का पहला सक्रिय मलबा हटाने (Active debris removal) वाला मिशन होगा।
    • कार्यप्रणाली: यह चार रोबोटिक भुजाओं (चिंमटी जैसी क्रिया) का उपयोग करके एक निष्क्रिय ‘वेगा’ (Vega) रॉकेट के टुकड़े को पकड़ेगा और उसे नियंत्रित तरीके से कक्षा से बाहर (Deorbit) करेगा।
  • टर्मिनेटर टेप (Terminator Tape):
    • विकासकर्ता: टेथर्स अनलिमिटेड (अमेरिका)।
    • तकनीक: यह 230 फीट लंबी चालक टेप (Conductive tape) है।
    • कार्य: इस टेप का उपयोग निष्क्रिय उपग्रहों पर वायुमंडलीय कर्षण/ड्रैग (Atmospheric drag) को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाने के लिए किया जाता है, जिससे वे तेजी से कक्षा से नीचे गिरकर (Deorbit) नष्ट हो जाते हैं।
मिशन शक्ति (Mission Shakti – DRDO)
  • भारत ने 2019 में एंटी-सैटेलाइट (A-SAT) मिसाइल का उपयोग करके निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) (300 किमी) में एक उपग्रह को सफलतापूर्वक नष्ट करने की क्षमता का प्रदर्शन किया।
  • लक्ष्य उपग्रह: माइक्रोसैट-आर (Microsat-R) (सैन्य इमेजिंग उपग्रह, 274 किमी कक्षा में)।
  • प्रयुक्त हथियार: पृथ्वी डिलीवरी व्हीकल मार्क-II (PDV MK-II)।
  • प्रयुक्त तकनीक: ‘हिट टू किल’ (Hit to Kill)
    • उपग्रह को सीधे टक्कर मारकर नष्ट करना,
    • जिसमें विस्फोटक के बजाय टक्कर की गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) का उपयोग किया जाता है।
    •  A-SAT मिसाइल ‘एक्सो-एटमॉस्फेरिक किल व्हीकल‘ (वायुमंडल के बाहर) तकनीक पर आधारित थी, जो अंतरिक्ष के निर्वात में लक्ष्य को भेदने में सक्षम है। 
अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र
मानकडीआरडीओ (DRDO)इसरो (ISRO)
संस्थान का प्रकाररक्षा अनुसंधान एवं विकास विंग (प्रभाग)अंतरिक्ष एजेंसी
विभाग /मंत्रालयरक्षा मंत्रालय (भारत सरकार)अंतरिक्ष विभाग (सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय – PMO के अधीन)
स्थापना1958 (भारतीय सेना के तकनीकी विकास प्रतिष्ठान (TDE) और रक्षा विज्ञान संगठन के तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय (DTDP) के विलय से)15 अगस्त, 1969 (इनकोस्पार – INCOSPAR के स्थान पर, जिसे 1962 में स्थापित किया गया था)
ध्येय वाक्य“बलस्य मूलं विज्ञानम्” (शक्ति का आधार विज्ञान है)“मानव जाति की सेवा में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी”
मुख्यालय (HQ)नई दिल्लीबेंगलुरु

एंट्रिक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड, बेंगलुरु

  • स्थापना: सितंबर 1992 में एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में।
  • प्रशासनिक नियंत्रण: अंतरिक्ष विभाग (DoS) के अधीन, भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व में।
  • भूमिका (Role): यह इसरो (ISRO) की विपणन शाखा है।
  • कार्य: इसरो द्वारा विकसित अंतरिक्ष उत्पादों, तकनीकी परामर्श सेवाओं और प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण और व्यावसायिक दोहन को बढ़ावा देना। यह दुनिया भर के ग्राहकों को अंतरिक्ष उत्पाद और सेवाएँ प्रदान करती है।

न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL), बेंगलुरु

  • स्थापना: 6 मार्च 2019 को (कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत)।
  • प्रशासनिक नियंत्रण: अंतरिक्ष विभाग (DOS) के अधीन, भारत सरकार की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी।
  • भूमिका (Role): यह इसरो की वाणिज्यिक शाखा है।
  • उत्तरदायित्व: भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के उत्पादों और सेवाओं का व्यावसायीकरण और संवर्धन करना।
  • कार्यक्षेत्र: उपग्रहों का निर्माण, प्रक्षेपण यान का उत्पादन और अंतरिक्ष-आधारित सेवाओं का विपणन।

भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe)

  • स्थापना: जून 2020।
  • मुख्यालय: बोपल, अहमदाबाद।
  • प्रकृति: अंतरिक्ष विभाग (DoS) के तहत एक स्वायत्त एकल-खिड़की नोडल एजेंसी
  • उद्देश्य: भारत की अंतरिक्ष गतिविधियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को सुगम बनाना और विनियमित करना।
  • मुख्य कार्य:
    • गैर-सरकारी निजी संस्थाओं (NGPEs) को प्रक्षेपण यान और उपग्रह बनाने के लिए प्राधिकृत (Authorize) करना।
    • निजी संस्थाओं के साथ इसरो के बुनियादी ढांचे को साझा करने में सक्षम बनाना।
    • निजी संस्थाओं द्वारा नए अंतरिक्ष बुनियादी ढांचे की स्थापना की अनुमति देना।

भारतीय अंतरिक्ष संघ (ISpA)

  • स्थापना: अक्टूबर 2021।
  • प्रकृति: भारत में निजी अंतरिक्ष उद्योग के सफल सहयोगात्मक विकास के लिए स्थापित एक शीर्ष गैर-लाभकारी उद्योग निकाय
  • मुख्य कार्य:
    • भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की एकमात्र सामूहिक आवाज़ के रूप में कार्य करना।
    • सरकार और निजी उद्योग के बीच सेतु (Liaison) का कार्य करना।
    • उद्योग–उद्योग और उद्योग–सरकार के बीच संपर्क स्थापित करना, जिससे साझेदारी और बाजार पहुंच संभव हो सके।
  • महत्वपूर्ण नोट:
    • अंतरिक्ष गतिविधियों का प्राधिकरण और विनियमन IN-SPACe का कार्य है।
    • ISpA एक उद्योग निकाय है जो केवल निजी कंपनियों के साथ सहयोग करता है; यह उपग्रहों का निर्माण या प्रक्षेपण नहीं करता है।

भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 (Indian Space Policy 2023)

  • यह नीति अंतरिक्ष क्षेत्र में शामिल विभिन्न संस्थाओं की भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है।
  • विजन (दृष्टिकोण):
    • अंतरिक्ष क्षमताओं में वृद्धि करना।
    • अंतरिक्ष क्षेत्र में व्यावसायिक भागीदारी को सक्षम और प्रोत्साहित करना।
    • प्रौद्योगिकी के प्रेरक (Driver) के रूप में अंतरिक्ष का उपयोग करना और इससे जुड़े लाभ प्राप्त करना।
    • अंतरिक्ष अनुप्रयोगों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) बनाना।
  • प्राथमिकता: भारत को वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनाए रखने के लिए अनुसंधान और विकास (R&D) पर विशेष बल।
  • लागू क्षेत्र (Scope): भारतीय क्षेत्र और अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के भीतर या वहां से होने वाली सभी अंतरिक्ष गतिविधियों पर लागू।
  • संस्थागत भूमिकाएँ (Roles)
    • इसरो (ISRO): अनुप्रयुक्त अनुसंधान, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी विकास, और मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान (जैसे- गगनयान) पर केंद्रित।
    • इन-स्पेस (IN-SPACe): एक स्वायत्त निकाय के रूप में, यह विशेष रूप से निजी क्षेत्र की अंतरिक्ष गतिविधियों को बढ़ावा देने, मार्गदर्शन करने और उन्हें प्राधिकृत करने का कार्य करता है।

राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति (NGP) 2022

  • जारीकर्ता: विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा (28 दिसंबर 2022)।
  • उद्देश्य: भू-स्थानिक डेटा तक पहुंच को सरल बनाना, नवाचार को बढ़ावा देना, नागरिक सेवाओं को उन्नत करना और भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भर भारत को मजबूत करना।
  • प्रमुख दृष्टिकोण और समयबद्ध लक्ष्य
    • 2035 तक: भारत को वैश्विक भू-स्थानिक नेता के रूप में स्थापित करना।
    • विश्व-स्तरीय नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र और आसान डेटा पहुंच का निर्माण करना।
    • आर्थिक विकास, सुशासन और नागरिक सेवाओं को समर्थन प्रदान करना।
  • मुख्य विशेषताएँ:
    • उच्च-रिज़ॉल्यूशन मैपिंग (2030 तक): टोपोग्राफिकल और डिजिटल एलिवेशन मॉडल सहित।
    • जियोस्पेशियल नॉलेज इन्फ्रास्ट्रक्चर (GKI): एकीकृत डेटा के लिए निर्माण।
    • डेटा तक उदार पहुंच: स्व-प्रमाणन पर आधारित, पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता समाप्त।
    • पीपीपी (सार्वजनिक-निजी भागीदारी), स्टार्टअप्स, खुले मानकों और अंतरसंचालनीयता (Interoperability) को बढ़ावा देना।
    • राष्ट्रीय भू-स्थानिक डेटा रिपॉजिटरी की स्थापना।
    • 2035 के लिए निर्धारित लक्ष्य: शहरी केंद्रों के लिए डिजिटल ट्विन्स का विकास, उप-सतह मैपिंग, ब्लू इकोनॉमी डेटा से संबंधित कार्य।

राष्ट्रीय भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS)/ भू-स्थानिक मिशन

  • यह मिशन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत संचालित है।
  • बजट: ₹100 करोड़ (बजट 2025-26)
  • आधार: राष्ट्रीय जियोस्पेशियल नीति 2022
  • लक्ष्य:
    • पूरे भारत में एक मूलभूत भू-स्थानिक अवसंरचना का विकास करना।
    • भूमि अभिलेखों का आधुनिकीकरण करना।
    • शहरी नियोजन को मजबूत करना।
    • अवसंरचना डिजाइन में सुधार लाना।
  • प्रमुख घटक:
    • राष्ट्रीय भू-मापक संदर्भ ढांचा (NHRF – क्षैतिज और NVRF – ऊर्ध्वाधर संदर्भ प्रणालियाँ)।
    • ऑर्थोरेक्टिफाइड इमेजरी (ORI)।
    • डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM)।
    • जियो-ICT बैकबोन (आधारभूत संरचना)।
  • संबंधित योजनाएं: प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना, स्वामित्व योजना।

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में नवीनतम अपडेट 

  • पहला राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस (National Space Day – NSpD)
    • तिथि: 23 अगस्त 2024 को मनाया गया।
    • विषयवस्तु (Theme): “चंद्रमा को छूते हुए जीवन को छूना: भारत की अंतरिक्ष गाथा।”
    • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 23 अगस्त 2023 को भारत चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतरने वाला चौथा देश बना, और इसके दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र तक पहुँचने वाला विश्व का पहला देश बना। इस ऐतिहासिक सफलता के सम्मान में, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 23 अगस्त को “राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस” घोषित किया।
    • उद्देश्य: यह दिवस अंतरिक्ष अन्वेषण में भारत की उपलब्धियों का उत्सव मनाने और भविष्य की संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित करने के लिए समर्पित है।
  • दूसरा राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस (2025):
    • विषय (Theme): “आर्यभट्ट से गगनयान तक।”
    • प्रमुख पहल: “एस्ट्रोनॉट पूल” पहल की शुरुआत की जाएगी।
    • इसरो नेशनल स्पेस मीट 2.0 (22 अगस्त 2025):
      • विषय: “विकसित भारत 2047 के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और अनुप्रयोगों का लाभ उठाना।”
      • स्थान: भारत मंडपम, नई दिल्ली।
  • हालिया नीतिगत और तकनीकी विकास
    • नीतिगत निर्णय:
      • वेंचर फंड (उद्यम पूंजी कोष): अंतरिक्ष क्षेत्र के स्टार्टअप्स को सहायता प्रदान करने के लिए ₹1,000 करोड़ का वेंचर फंड स्थापित किया गया है।
      • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI): अंतरिक्ष क्षेत्र में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति दी गई है।
  • स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर:
    • नाम: विक्रम-3201 और कल्पना-3201 (VIKRAM3201 and KALPANA3201)।
    • विवरण: ये अंतरिक्ष अनुप्रयोगों के लिए विकसित पहले ‘मेक-इन-इंडिया’ 32-बिट माइक्रोप्रोसेसर हैं।
    • विकासकर्ता: इन्हें इसरो के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) और इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तहत सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला (SCL), चंडीगढ़, द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है।
  • प्रमुख अनुसंधान और शैक्षिक केंद्र
    • एस. रामकृष्णन उत्कृष्टता केंद्र (S Ramakrishnan Centre of Excellence – CoE):
      • स्थान: आईआईटी-मद्रास (IIT-Madras)।
      • फोकस क्षेत्र: ‘फ्लुइड एंड थर्मल साइंसेज’ (द्रव और तापीय विज्ञान) में अनुसंधान।
      • नामकरण: इसका नाम इसरो (ISRO) के द्रव प्रणोदन प्रणाली केंद्र (LPSC) और विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) के पूर्व निदेशक डॉ. एस. रामकृष्णन के सम्मान में रखा गया है।
    • NE-SPARKS कार्यक्रम (पूर्वोत्तर छात्र अंतरिक्ष जागरूकता, पहुँच और ज्ञान कार्यक्रम):
      • उद्देश्य: भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र (NER) के छात्रों में अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रति जिज्ञासा और जागरूकता को बढ़ाना।
      • लक्ष्य: भौगोलिक और सूचनात्मक अंतराल (Gaps) को कम करना।
      • गतिविधि: छात्रों को बेंगलुरु स्थित इसरो केंद्रों का भ्रमण कराकर भारत की अंतरिक्ष प्रगति का तल्लीन/इमर्सिव (Immersive) अनुभव प्रदान किया जाता है।
  • अंतरिक्ष चिकित्सा में संस्थागत सहयोग
    • समझौता ज्ञापन (MoU): अंतरिक्ष विभाग (DoS) के तहत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी (SCTIMST) के बीच अंतरिक्ष चिकित्सा के क्षेत्र में सहयोग के लिए हस्ताक्षर किए गए हैं।

अंतरिक्ष एजेंसी (ISRO) को प्राप्त पुरस्कार और सम्मान

पुरस्कार का नामविवरण और महत्व 
IAA वॉन कर्मन पुरस्कार 2025अंतरिक्ष विज्ञान (Astronautics) में आजीवन उपलब्धि और योगदान के लिए प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार।
AIAA गोडार्ड एस्ट्रोनॉटिक्स पुरस्कारअंतरिक्ष उड़ान में उत्कृष्ट योगदान के लिए, विशेष रूप से चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग हेतु।
ब्रोग्लियो पुरस्कार (Broglio Award)एयरोस्पेस क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए दिया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार।
विज्ञान श्री पुरस्कार और राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार 2025भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार।
राजभाषा कीर्ति पुरस्कार (द्वितीय पुरस्कार) 2024-25गृह मंत्रालय द्वारा अंतरिक्ष विभाग को आधिकारिक भाषा हिंदी के सर्वोत्तम कार्यान्वयन के लिए प्रदान किया गया।
इसरो (ISRO) से संबंधित प्रमुख संस्थान और केंद्र
संस्थान का नामस्थानमुख्य कार्य/विशेषता 
भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (IIST)तिरुवनंतपुरम, केरलअंतरिक्ष विज्ञान में शिक्षा और अनुसंधान हेतु समर्पित संस्थान।
भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL)अहमदाबाद, गुजरातअंतरिक्ष और संबद्ध विज्ञानों के लिए ‘नक्षत्र’ (Cradle) माना जाता है।
भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (IIRS)देहरादून, उत्तराखंडसुदूर संवेदन (Remote Sensing) के क्षेत्र में प्रशिक्षण और शिक्षा।
राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC)हैदराबाद, तेलंगानाउपग्रह डेटा का प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी।
अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC)अहमदाबाद, गुजरातउपग्रहों के लिए पेलोड और संचार प्रणालियों का विकास।
द्रव प्रणोदन प्रणाली केंद्र (LPSC)वलियामाला, तिरुवनंतपुरमउपग्रहों और रॉकेटों के लिए तरल ईंधन इंजन का विकास।
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC)तिरुवनंतपुरम, केरलइसरो का प्रमुख रॉकेट और प्रक्षेपण यान विकास केंद्र।
सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC)श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेशभारत का मुख्य अंतरिक्ष बंदरगाह (Spaceport) और प्रक्षेपण केंद्र।
एशिया-प्रशांत अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी शिक्षा केंद्र (CSSTEAP)देहरादून, उत्तराखंडसंयुक्त राष्ट्र (UN) से संबद्ध अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र।
इसरो प्रणोदन परिसर (IPRC)महेन्द्रगिरी, तमिलनाडुरॉकेट इंजनों का परीक्षण और संयोजन (Assembly)।
उत्तर-पूर्वी अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (NE-SAC)उमियम, मेघालयपूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग।
यू.आर. राव उपग्रह केंद्र (URSC)बेंगलुरु, कर्नाटकभारतीय उपग्रहों के डिजाइन और निर्माण का मुख्य केंद्र।

राजस्थान में स्थित इसरो (ISRO) से संबंधित केंद्र

केंद्र का नामस्थानविवरण 
पश्चिमी RRSC (क्षेत्रीय सुदूर संवेदन केंद्र)जोधपुरजनक संस्थान: इसरो/राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC), हैदराबाद।कार्य: यह केंद्र राजस्थान सहित पश्चिमी क्षेत्र की आवश्यकताओं को पूरा करता है। यह उन्नत उपग्रह डेटा प्रसंस्करण और भू स्थानिक समाधान (Geospatial solutions) प्रदान करता है। (SRSAC और RRSC-W अक्सर सहयोग करते हैं)।
सौर वेधशाला (Solar Observatory)उदयपुरसौर भौतिकी और सूर्य की गतिविधियों का अध्ययन।
अवरक्त वेधशाला (Infrared Observatory)माउंट आबूइन्फ्रारेड तरंगदैर्ध्य के माध्यम से खगोलीय पिंडों का प्रेक्षण।

राज्य सुदूर संवेदन अनुप्रयोग केंद्र (SRSAC)

  • स्थान: जोधपुर (मुख्य केंद्र)।
  • जनक विभाग: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), राजस्थान सरकार।
  • कार्य: यह राज्य में प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और बुनियादी ढांचा नियोजन के लिए सुदूर संवेदन (RS), भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) और ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) अनुप्रयोगों के लिए एक नोडल एजेंसी है।
  • विशेष नोट: हाल ही में जयपुर में SRSAC का एक उप-केंद्र (Sub-centre) खोला गया है।

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