उपग्रह (Satellites)

उपग्रह विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो पृथ्वी या अन्य खगोलीय पिंडों की कक्षा में स्थापित कृत्रिम या प्राकृतिक वस्तुओं से संबंधित है। ये संचार, मौसम पूर्वानुमान, नेविगेशन तथा पृथ्वी अवलोकन जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।इस विषय के अंतर्गत हम उपग्रहों के प्रकार, कक्षाएँ, कार्यप्रणाली तथा उनके विभिन्न अनुप्रयोगों का अध्ययन करेंगे।

एक उपग्रह वह वस्तु है जो गुरुत्वाकर्षण बलों के कारण किसी बड़ी वस्तु के चारों ओर परिक्रमा करती है। अपनी उत्पत्ति के आधार पर उपग्रह प्राकृतिक(जैसे चंद्रमा) या कृत्रिम (मानव निर्मित) हो सकते हैं।उपग्रह (Satellites): विज्ञान व प्रौद्योगिकी के अंतर्गत उपग्रह पृथ्वी या अन्य ग्रहों की परिक्रमा करने वाली कृत्रिम या प्राकृतिक वस्तुएँ होती हैं, जिनका उपयोग संचार, मौसम पूर्वानुमान, नेविगेशन और रक्षा जैसे क्षेत्रों में किया जाता है। आधुनिक युग में उपग्रह तकनीक ने वैश्विक संपर्क, आपदा प्रबंधन और वैज्ञानिक अनुसंधान को अत्यधिक सशक्त बनाया है।

श्रेणीप्रकारभार सीमाइसरो (ISRO) के उदाहरण
A) भार/द्रव्यमान के आधार पर (Based on Mass)बड़े उपग्रह1000 किलोग्राम से अधिकGSAT श्रृंखला (संचार उपग्रह)
मध्यम आकार के उपग्रह500–1000 किलोग्रामINSAT-3DR (मौसम उपग्रह)
मिनी उपग्रह100–500 किलोग्रामIMS-1 (Youthsat), IMS-2 (SARAL)
माइक्रो उपग्रह10–100 किलोग्रामISRO द्वारा निर्मित Microsat
नैनो उपग्रह1–10 किलोग्रामभारत का पहला नैनो उपग्रह: जुगनू (Jugnu) – IIT कानपुर द्वारा निर्मित; ISRO नैनो उपग्रह: INS-1A और INS-1B
पिको उपग्रह1 किलोग्राम से कमस्टूडेंट सैटेलाइट (STUDSAT): भारत में विकसित किया गया पहला पिको-सैटेलाइट है। 
B) ऊंचाई के आधार परनिम्न पृथ्वी कक्षा (LEO)200–2000 किमीCartosat-2 (पृथ्वी अवलोकन उपग्रह)
मध्यम पृथ्वी कक्षा (MEO)2000–35786 किमीNavIC उपग्रह (भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली)
भूस्थैतिक कक्षा (GEO)35786 किमीINSAT-3DR (मौसम उपग्रह)
C) अनुप्रयोग के आधार परसंचार उपग्रहGSAT श्रृंखला
नेविगेशन उपग्रहNavIC (भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली)।
रिमोट सेंसिंग / पृथ्वी अवलोकनकार्टोसैट-2, RISAT-1 (पृथ्वी के संसाधनों की निगरानी हेतु)।
अंतरिक्ष अन्वेषण / वेधशाला उपग्रहएस्ट्रोसैट (ASTROSAT) – भारत की अंतरिक्ष वेधशाला।

संचार उपग्रह (INSAT / GSAT / CMS श्रृंखला)

  • इन उपग्रहों को सामान्यतः भू-स्थैतिक कक्षा (GEO) में स्थापित किया जाता है ताकि दूरसंचार, टेलीविजन प्रसारण और VSAT सेवाओं के लिए निरंतर कवरेज (व्याप्ति) प्रदान की जा सके।
  • INSAT (भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह) श्रृंखला (1982 से)
    • अनुप्रयोग: दूरसंचार, प्रसारण और मौसम विज्ञान।
    • INSAT-4 श्रृंखला (2000 के दशक से वर्तमान): यह मुख्य रूप से डायरेक्ट-टू-होम (DTH) टेलीविजन प्रसारण और संचार सेवाओं के लिए समर्पित है।

GSAT और CMS श्रृंखला में संक्रमण (Transition)

  • GSAT श्रृंखला (2001 से): बेहतर सेवाओं और उन्नत तकनीक के लिए ‘INSAT’ का नाम बदलकर GSAT कर दिया गया। ये उच्च-थ्रूपुट (High-throughput) वाले संचार उपग्रह हैं जो डेटा ट्रांसमिशन की गति को बढ़ाते हैं।
  • CMS श्रृंखला (2020 से): तकनीकी सुधारों को और आगे ले जाने के लिए 2020 से CMS (Communication Management System) श्रृंखला की शुरुआत की गई।
उपग्रहप्रक्षेपण वर्षप्राथमिक अनुप्रयोगमुख्य विशेषताएं
GSAT-3 (EduSat)2004शिक्षाउपग्रह आधारित दूरस्थ शिक्षा (Distance Education) के लिए समर्पित।
GSAT-7 (रुक्मिणी)2013सैन्य संचार (भारतीय नौसेना)भारतीय नौसेना के लिए पहला समर्पित सैन्य संचार उपग्रह।
GSAT-7A (एंग्री बर्ड)2018हवा-से-हवा एवं हवा-से-भूमि संचार (वायु सेना)भारतीय वायु सेना के लिए नेटवर्क-केंद्रित युद्ध प्रणाली (Network-centric warfare) को सुदृढ़ करता है।
GSAT-82011संचार एवं नौवहन (GAGAN)DTH और नौवहन सेवाओं के लिए उच्च शक्ति वाले ट्रांसपोंडर प्रदान करता है।
GSAT-92017क्षेत्रीय सहयोग (दक्षिण एशिया उपग्रह)दक्षिण एशियाई देशों को दूरसंचार और प्रसारण सेवाएं प्रदान कर क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है।
GSAT-112018ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटीइसरो द्वारा निर्मित अब तक का सबसे भारी उपग्रह (5,854 किग्रा); ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाओं को बढ़ाता है।
GSAT-302020दूरसंचार एवं प्रसारणINSAT-4A का स्थान लिया; DTH और दूरसंचार सेवाएं प्रदान करता है।
CMS-012020संचार (विस्तारित-C बैंड)भारतीय मुख्य भूमि, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप द्वीपों के लिए सेवाएं; भारत का 42वाँ संचार उपग्रह।
GSAT-24 (GSAT-N1)2022संचार एवं DTH सेवाएं24-Ku बैंड उपग्रह; टाटा प्ले (Tata Play) के लिए अखिल भारतीय कवरेज; अंतरिक्ष सुधारों के बाद NSIL का पहला मांग-संचालित (Demand-driven) मिशन।
GSAT-20 (GSAT-N2)2024इंटरनेट (ब्रॉडबैंड)स्पेसएक्स (SpaceX) फाल्कन-9 द्वारा प्रक्षेपित; उड़ान के दौरान कनेक्टिविटी (In-flight connectivity) हेतु भारत का पहला उच्च-थ्रूपुट उपग्रह।
GSAT-7R (CMS-03)नवंबर 2025(LVM3-M5)भारतीय नौसेना के लिए समर्पितभारतीय धरती से GTO में प्रक्षेपित किया जाने वाला सबसे भारी संचार उपग्रह (~4,400 किग्रा); मल्टी-बैंड (UHF, S, C और Ku-बैंड), मल्टी-मिशन संचार उपग्रह।हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षित वास्तविक समय संचार (Real-time communication) प्रदान करता है।

सुदूर संवेदन/पृथ्वी अवलोकन उपग्रह (IRS / EOS श्रृंखला)

  • अधिकांश सुदूर संवेदन उपग्रह सूर्य-तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (Sun-Synchronous Polar Orbits – SSPO) में संचालित होते हैं।
  • आधारशिला: भास्कर-1 (1979) और भास्कर-2 (1981) ने स्वदेशी भारतीय सुदूर संवेदन (IRS) कार्यक्रम की नींव रखी।
  • प्रारंभ: भारत का औपचारिक सुदूर संवेदन कार्यक्रम 1988 में IRS-1A के साथ शुरू हुआ।
श्रेणी/श्रृंखलाउपग्रहविवरणअनुप्रयोग
Resourcesat (रिसोर्ससैट)Resourcesat-2 & 2Aसंसाधनों की निगरानी हेतु समर्पित।फसल निगरानी, जल निकायों का मानचित्रण।
Cartosat (कार्टोसैट)Cartosat-3 (2019)उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली इमेजिंग।शहरी नियोजन, उच्च-रिज़ॉल्यूशन 3D मानचित्रण।
Oceansat (ओशनसैट)Oceansat-3 (EOS-06) – 2022समुद्री डेटा के विश्लेषण हेतु।समुद्र की सतह का तापमान, क्लोरोफिल निगरानी।
Oceansat-3A (PSLV N1/EOS-10) HAL/L&T उद्योग संघ द्वारा निर्मित PSLV-N1 द्वारा प्रक्षेपित। यह समुद्र विज्ञान और मौसम संबंधी अध्ययन के लिए EOS-06 के साथ मिलकर कार्य करेगा।
RISAT श्रृंखला (Radar Imaging)RISAT-1A (EOS-04), RISAT-2B & RISAT-2BR1रडार इमेजिंग (Radar Imaging): बादलों के आवरण के बावजूद इमेजिंग।कृषि और वानिकी के लिए सभी मौसमों (दिन/रात) में इमेजिंग।
आधुनिक EOS श्रृंखला (Modern EOS Series – वर्तमान मानक)EOS-01 (नवंबर 2020)कृषि, वानिकी और आपदा प्रबंधन
EOS-04 (RISAT-1A, फरवरी 2022)सभी मौसमों में उच्च गुणवत्ता वाली रडार छवियां प्रदान करता है।
EOS-06 (Oceansat-3, नवंबर 2022)- PSLV-C54 यह समुद्र के रंग, सतह के तापमान और पवन वेक्टर डेटा पर केंद्रित है।
EOS-07 (Microsat-2B, फरवरी 2023) – SSLV-D2विभिन्न पृथ्वी अवलोकन अनुप्रयोगों के लिए एक माइक्रो-सैटेलाइट।
EOS-08 (अगस्त 2024) – SSLV-D3इन्फ्रारेड (EOIR) और नेविगेशन रिफ्लेक्टोमेट्री (GNSS-R) पेलोड ले जाने वाला आधुनिक माइक्रो-सैटेलाइट।
EOS-N1 (अन्वेषा)जनवरी 2026, मिशन विफल रहा।
EOS-10 (Oceansat-3A)मार्च 2026 
NISAR/GSLV-F16 इसरो-नासा संयुक्त मिशनइसमें L-बैंड और S-बैंड रडार इमेजिंग तकनीक का उपयोग किया गया है।

नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार (NISAR) मिशन

  • यह पृथ्वी अवलोकन के लिए दुनिया का पहला दोहरी-आवृत्ति (Dual-frequency) रडार उपग्रह है।
    • इसमें नासा का L-बैंड SAR और इसरो का S-बैंड SAR शामिल है।
  • प्रक्षेपण: श्रीहरिकोटा से GSLV Mk-II (GSLV-F16) द्वारा।
  • कक्षा: सूर्य-तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (747 किमी की ऊंचाई)।
  • तकनीक: स्वीपSAR (SweepSAR) तकनीक → बिना रिज़ॉल्यूशन खोए बीम स्टीयरिंग संभव।
  • माइक्रोवेव इमेजिंग मिशन → पूर्णतः ध्रुवणमितीय (Polarimetric) और व्यतिकरणमितीय (Interferometric) डेटा प्राप्त करता है।
  • कवरेज: यह प्रत्येक 12 दिनों में पृथ्वी के हर स्थान का पुनरावलोकन (Revisit) करेगा।
  • संरचना:
    • एंटीना: 12-मीटर का विस्तार योग्य (Deployable) मेश एंटीना।
    • बूम: स्कैनिंग के लिए 9-मीटर का बूम।
  • उद्देश्य
    • सतह परिवर्तन: वैश्विक भूमि सतह परिवर्तनों (पारिस्थितिकी तंत्र, बर्फ की चादरों का ढहना, भूकंप, भूस्खलन, ज्वालामुखी) का मापन करना।
    • निगरानी: आपदा और जलवायु प्रबंधन के लिए खतरों, समुद्र के स्तर, भूजल और बायोमास की निगरानी।
    • सटीकता: सेंटीमीटर-स्तर की सटीकता के साथ भू-पर्पटी (Crust) और जमे हुए क्षेत्रों के विस्थापन का पता लगाना।
    • वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग और खुले डेटा तक पहुँच को प्रोत्साहन देना।

तृष्णा (TRISHNA): उच्च-रिज़ॉल्यूशन प्राकृतिक संसाधन मूल्यांकन हेतु थर्मल इन्फ्रारेड इमेजिंग सैटेलाइट।

  • संयुक्त मिशन: इसरो (भारत) और CNES (फ्रांस)
  • मुख्य फोकस: पृथ्वी की सतह के तापमान और जल प्रतिबल/दबाव का अध्ययन करने के लिए उच्च-रिज़ॉल्यूशन थर्मल इन्फ्रारेड इमेजिंग।
  • उद्देश्य:
    • सतह का तापमान: भूमि की सतह के तापमान (LST) की निगरानी करना।
    • कृषि: फसलों में जल प्रतिबल का आकलन करना।
    • जलवायु: सूखे, लू (Heatwaves) और वाष्पोत्सर्जन पर नज़र रखना।
  • पेलोड (Payloads):
    • TIR उपकरण: थर्मल इन्फ्रारेड सेंसर (फ्रांसीसी)।
    • दृश्य + निकट-इन्फ्रारेड सेंसर: इसरो (भारतीय)।
  • मुख्य विशेषताएं:
    • रिज़ॉल्यूशन: उच्च रिज़ॉल्यूशन (50–60 मीटर)।
    • पुनरावलोकन समय: 3 दिन।
    • भूमि, तटीय क्षेत्र और उथले पानी के क्षेत्रों को कवर करता है।

प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी अवलोकन उपग्रह

  • Landsat 9 (NASA + USGS) – सितंबर 2021 में प्रक्षेपित; भू-संसाधनों की निगरानी हेतु।
  • Sentinel श्रृंखला (ESA – कॉपरनिकस कार्यक्रम) – भारत भी इस कार्यक्रम में एक भागीदार है।
    • सेंटिनल-6 माइकल फ्रीलिच – नवंबर 2020 में प्रक्षेपित; रडार अल्टीमेट्री (Radar Altimetry) के माध्यम से समुद्र के स्तर की ट्रैकिंग।
    • सेंटिनल-1C & 2C – पृथ्वी अवलोकन का विस्तार करने वाले आगामी उपग्रह।
    • सेंटिनल-6B उपग्रह
      • यह एक उन्नत समुद्र-अल्टीमेट्री उपग्रह है जिसे स्पेसएक्स (SpaceX) फाल्कन-9 के माध्यम से प्रक्षेपित किया गया है।
      • संयुक्त मिशन: यह नासा (NASA), एनओएए (NOAA), ईएसए (ESA), यूमेटसैट (Eumetsat), यूरोपीय आयोग का एक संयुक्त मिशन है, जिसे सीएनईएस (CNES) का समर्थन प्राप्त है।
      • उद्देश्य: यह समुद्र की सतह की ऊँचाई, लहरों, हवाओं और समुद्री गतिकी को मापता है। इसका लक्ष्य निरंतर और उच्च-सटीकता वाला डेटा प्रदान करना है, जो बेहतर जलवायु पूर्वानुमान और तटीय नियोजन के लिए आवश्यक है।
  • Gaofen श्रृंखला (चीन) – 2020–2023 के दौरान प्रक्षेपित उच्च-रिज़ॉल्यूशन उपग्रह।
  • GOSAT-2 (Greenhouse Gases Observing Satellite) – JAXA (जापान) – ग्रीनहाउस गैस अवलोकन उपग्रह; जलवायु परिवर्तन के अध्ययन हेतु।
  • KOMPSAT-6 (दक्षिण कोरिया) (2022).

सेंटिनल-6B उपग्रह

  • यह एक उन्नत समुद्र-अल्टीमेट्री उपग्रह है जिसे स्पेसएक्स (SpaceX) फाल्कन-9 के माध्यम से प्रक्षेपित किया गया है।
  • संयुक्त मिशन: यह नासा (NASA), एनओएए (NOAA), ईएसए (ESA), यूमेटसैट (Eumetsat), यूरोपीय आयोग का एक संयुक्त मिशन है, जिसे सीएनईएस (CNES) का समर्थन प्राप्त है।
  • उद्देश्य: यह समुद्र की सतह की ऊँचाई, लहरों, हवाओं और समुद्री गतिकी को मापता है। इसका लक्ष्य निरंतर और उच्च-सटीकता वाला डेटा प्रदान करना है, जो बेहतर जलवायु पूर्वानुमान और तटीय नियोजन के लिए आवश्यक है।

नौवहन उपग्रह (Navigation Satellites)

  • नौवहन उपग्रह स्थिति (Positioning), नौवहन (Navigation) और समय निर्धारण (Timing) सेवाएँ (PNT) प्रदान करते हैं।
  • नौवहन प्रणालियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं:
    • वैश्विक (Global)
    • क्षेत्रीय (Regional)
  • GPS सबसे पुरानी प्रणाली है, गैलीलियो (Galileo) सबसे सटीक है, और बाइदु (BeiDou) के पास सबसे बड़ा उपग्रह समूह है।
  • कक्षा: अधिकांश नौवहन उपग्रहों को मध्यम पृथ्वी कक्षा (MEO) में स्थापित किया जाता है (NavIC, QZSS और बाइदु के कुछ उपग्रहों को छोड़कर, जो विभिन्न कक्षाओं का मिश्रण हैं)।

र्तमान में दुनिया में चार प्रमुख वैश्विक नौवहन प्रणालियाँ संचालित हैं:

वैश्विक उपग्रह-आधारित नौवहन प्रणालियाँ (Global Systems)

देशनेविगेशन प्रणालीउपग्रहों की संख्या 
संयुक्त राज्य अमेरिकाग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS)31
रूसग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GLONASS)24
चीनबाइदु नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (BDS)35
यूरोपीय संघगैलीलियो (Galileo)26

क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणालियाँ (Regional navigation systems)

  • क्वासी-ज़ेनिथ सैटेलाइट सिस्टम (QZSS): जापान
  • NavIC (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन): भारत
  • KPS (कोरियन पोजिशनिंग सिस्टम): दक्षिण कोरिया (विकासाधीन)।

भारतीय नौवहन उपग्रह प्रणाली 

  • इसरो (ISRO) नागरिक उड्डयन और सामान्य उपयोगकर्ता की जरूरतों के लिए स्वतंत्र उपग्रह-आधारित नौवहन सेवाएँ प्रदान करता है।
  • भारत की प्रमुख नौवहन प्रणालियाँ:
    • IRNSS / NavIC (नाविक): राष्ट्रीय स्थिति निर्धारण सेवाओं (National Positioning Services) के लिए।
    • गगन (GAGAN): नागरिक उड्डयन (Civil Aviation) के लिए GPS सहायता प्राप्त भू-संवर्धित नौवहन प्रणाली।
    • जेमिनी (GEMINI): मछुआरों को आपातकालीन अलर्ट और जानकारी प्रदान करने हेतु।
नाविक (NavIC – इसरो की क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली)
  • विकासकर्ता: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)
  • पूर्व नाम: इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS)
  • कवरेज: भारत और इसके सीमावर्ती क्षेत्रों से 1,500 किमी तक।
  • नक्षत्र (Constellation) संरचना: इसमें कुल 7 उपग्रह मुख्य भूमिका में हैं (वर्तमान में कुल 11 प्रक्षेपित किए जा चुके हैं):
    • 3 – भूस्थैतिक कक्षा (GEO)
    • 4 – भू-तुल्यकालिक कक्षा (GSO)
  • सेवाएँ: नाविक मुख्य रूप से दो प्रकार की सेवाएँ प्रदान करता है:
    • मानक स्थिति निर्धारण सेवा (SPS): यह सामान्य नागरिक उपयोग के लिए उपलब्ध है।
    • प्रतिबंधित सेवा (RS): यह एक कूटबद्ध (Encrypted) सेवा है, जो केवल रक्षा और रणनीतिक उपयोग के लिए आरक्षित है।
हालिया विकास (Recent Developments)
  • अगली पीढ़ी के नाविक उपग्रह (NVS श्रृंखला) यह नाविक की दूसरी पीढ़ी (Second-generation) के उपग्रहों का हिस्सा है।
    • NVS-01: 2023 में GSLV Mk-II (GSLV-F12) द्वारा प्रक्षेपित → दूसरी पीढ़ी का उपग्रह स्वदेशी परमाणु घड़ी के साथ।
      • L1 नेविगेशन बैंड: इसमें ‘L1 बैंड’ जोड़ा गया है, जो वैश्विक GNSS उपकरणों (विशेषकर स्मार्टफोन और उपभोक्ता तकनीक) के साथ संगत है।
    • NVS-02: जनवरी 2025 में GSLV-F15 द्वारा प्रक्षेपित → यह उपग्रह समूह की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है (इससे पहले के 7 में से केवल 4 उपग्रह ही पूर्णतः क्रियाशील थे)।आगामी लक्ष्य:
    • NVS-03 (2026 तक – GSLV-F17), NVS-04 और NVS-05 की योजना बनाई गई है, जो कवरेज और सटीकता में वृद्धि करेंगे।
  • IMO मान्यता: अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने नाविक को वर्ल्ड वाइड रेडियो नेविगेशन सिस्टम (WWRNS) के हिस्से के रूप में स्वीकार किया है। अब व्यापारिक जहाज महासागरीय नौवहन के लिए GPS और GLONASS की तरह नाविक का उपयोग कर सकते हैं।
  • स्मार्टफोनों में अनिवार्य NavIC समर्थन: 2025 से → नागरिक उपयोग को बढ़ावा देगा।1 जनवरी 2025 से सभी 5G फोन के लिए नाविक समर्थन अनिवार्य कर दिया गया है।
    • दिसंबर 2025 तक सभी नॉन-5G (4G) फोन के लिए भी यह अनिवार्य होगा।
  • कवरेज विस्तार: नाविक की पहुंच को भारतीय सीमाओं से 1,500 किमी से बढ़ाकर 3,000 किमी तक करने की योजना है।
  • वैश्विक महत्वाकांक्षा (GINS): भारत ने ग्लोबल इंडियन नेविगेशन सिस्टम (GINS) पर कार्य शुरू कर दिया है। इसके तहत वैश्विक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए उपग्रहों को मध्यम पृथ्वी कक्षा (MEO) में स्थापित किया जाएगा।
अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी

गगन (GAGAN – GPS एडेड GEO ऑगमेंटेड नेविगेशन)

  • प्रकार: उपग्रह आधारित संवर्धन प्रणाली (SBAS)। 
  • संयुक्त विकास: इसरो (ISRO) और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI)।
  • उद्देश्य:
    • नागरिक उड्डयन के लिए उच्च-सटीकता वाली उपग्रह आधारित नौवहन सेवा प्रदान करना।
    • भारतीय हवाई क्षेत्र में बेहतर वायु यातायात प्रबंधन (Air Traffic Management) सुनिश्चित करना।
    • वैश्विक अंतःप्रचालनीयता: निर्बाध नौवहन के लिए वैश्विक SBAS प्रणालियों के साथ अंतःप्रचालनीय (Interoperable) होना।
  • सिग्नल-इन-स्पेस (SIS): यह सेवा मुख्य रूप से GSAT-8 और GSAT-10 उपग्रहों के माध्यम से प्रदान की जाती है।

जेमिनी (GEMINI – गगन इनेबल्ड मेरिनर्स इंस्ट्रूमेंट फॉर नेविगेशन एंड इंफॉर्मेशन)

  • प्रकार: उपग्रह आधारित संचार उपकरण (हैंडहेल्ड डिवाइस), जिसे 2019 में लॉन्च किया गया था। 
  • विकासकर्ता: AAI + ISRO + INCOIS (भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र)। 
  • कार्यप्रणाली: यह डेटा संचारित करने के लिए ‘गगन’ (GAGAN) उपग्रहों का उपयोग करता है।
  • प्रदान की जाने वाली सेवाएँ (Services):
    • वास्तविक समय अलर्ट: चक्रवात, तूफान और ऊँची लहरों जैसी प्रतिकूल मौसम स्थितियों की वास्तविक समय में चेतावनी।
    • सुरक्षित मार्ग: सुरक्षित मछली पकड़ने के मार्गों के लिए नौवहन संबंधी जानकारी।
    • आपातकालीन संचार: मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध न होने पर भी आपातकालीन संदेश प्राप्त करने की सुविधा।
  • व्याप्ति (Coverage): गगन उपग्रह की पहुंच के भीतर संपूर्ण हिंद महासागर क्षेत्र
  • लक्षित उपयोगकर्ता: मछुआरे, तटीय समुदाय और समुद्री ऑपरेटर।

अंतरिक्ष विज्ञान और अन्वेषण (अंतर-ग्रहीय मिशन)

  • ये “अन्य” श्रेणी के मिशन हैं जो गहरे अंतरिक्ष और वैज्ञानिक खोज पर ध्यान केंद्रित करते हैं। 
  • अंतर-ग्रहीय मिशन (Interplanetary Missions):पृथ्वी की कक्षा से परे अंतरिक्ष मिशन, जिनका उद्देश्य चंद्रमा, मंगल, सूर्य, क्षुद्रग्रहों और सुदूर अंतरिक्ष का अन्वेषण करना है।

चंद्र मिशन (Moon Missions)

भारत के चंद्र मिशन (India’s Moon Missions)

आयाम 

चंद्रयान-1

चंद्रयान-2

चंद्रयान-3

प्रक्षेपण वर्ष

2008

2019

2023

उद्देश्य

चंद्रमा की सतह का अध्ययन करना।

  • चंद्रमा की सतह का अध्ययन और दक्षिणी ध्रुव पर रोवर उतारना।
  • चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित और सॉफ्ट लैंडिंग का प्रदर्शन; 
  • चंद्रमा पर रोवर की गतिविधि का प्रदर्शन करना
  • यथास्थान (In-situ) वैज्ञानिक प्रयोग।

घटक 

ऑर्बिटर 

  • ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम), रोवर (प्रज्ञान)
  • प्रणोदन मॉड्यूल (Propulsion Module), लैंडर, रोवर

प्रक्षेपण यान

PSLV C11

  • GSLV MkIII-M1
  • LVM3 M4

लैंडिंग स्थल

जवाहर स्थल

  • चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव (तिरंगा पॉइंट)
  • चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव (शिव शक्ति पॉइंट) – 23 अगस्त (राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस)।

प्रमुख पेलोड

MIP (मून इम्पैक्ट प्रोब)

  • चंद्रयान-2 लार्ज एरिया सॉफ्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (CLASS)
  • सोलर एक्स-रे मॉनिटर (XSM)\
  • चंद्राज़ एटमॉस्फेरिक कंपोजिशनल एक्सप्लोरर 2 (CHACE 2)
  • प्रणोदन मॉड्यूल: SHAPE (स्पेक्ट्रो-पोलरिमेट्री ऑफ हैबिटेबल प्लैनेट अर्थ); 
  • लैंडर: ChaSTE (चंद्राज़ सरफेस थर्मोफिजिकल एक्सपेरिमेंट), ILSA (इंस्ट्रूमेंट फॉर लूनर सिस्मिक एक्टिविटी), RAMBHA (रेडियो एनाटॉमी ऑफ मून बाउंड हाइपरसेंसिटिव आयनोस्फीयर एंड एटमॉस्फेयर);
  • रोवर: APXS (अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर), LIBS (लेजर इंड्यूस्ड ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप)

तकनीकी सत्यापन

  • सॉफ्ट लैंडिंग तक सीमित
  • हॉप (HOP) प्रयोग: चंद्रमा से वापस आने की भविष्य की संभावना का परीक्षण।

उपलब्धियां

चंद्रमा की सतह पर जल के अणुओं की खोज की।

  • चंद्र बहिर्मंडल (Exosphere), सतह मानचित्रण और खनिज संरचना का अध्ययन।
  • सल्फर की पुष्टि: रोवर द्वारा चंद्रमा पर सल्फर (गंधक) की यथास्थान (In-situ) पुष्टि की गई, जो चंद्रमा के प्राचीन ज्वालामुखी इतिहास की ओर संकेत करता है।
  • तापीय विसंगति (Thermal Anomaly): ChaSTE पेलोड ने रिकॉर्ड किया कि सतह का तापमान 70°C था (अपेक्षा 20-30°C की थी)।इससे सिद्ध हुआ कि चंद्रमा की ऊपरी मिट्टी (Topsoil) एक शक्तिशाली विसंवाहक (Insulator) है, जो गहराई में तापमान को स्थिर रखती है।

चंद्रयान-3 की प्रमुख उपलब्धियां

  • भारत → चंद्रमा पर सॉफ्ट-लैंडिंग करने वाला चौथा देश (संयुक्त राज्य अमेरिका, USSR, चीन के बाद)।
  • भारत → चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट-लैंडिंग करने वाला पहला देश → प्रमुख मील का पत्थर।
  • कई स्थानों पर जल बर्फ की मौजूदगी की पुष्टि।
  • प्रणोदन मॉड्यूल ने चंद्र वापसी प्रक्षेपवक्र का सफल परीक्षण किया, जो चंद्रयान-4 के लिए सहायक होगा।

भविष्य के चंद्र मिशन (Future Moon Missions)

  • चंद्रयान-4 (2024 में स्वीकृत)
    • यह इसरो (ISRO) का एक प्रस्तावित सैंपल रिटर्न मिशन है, जिसका उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव से मिट्टी और चट्टानों के नमूने एकत्र करना और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है।
    • मुख्य घटक: एसेंडर मॉड्यूल (AM), डिसेंडर मॉड्यूल (DM), री-एंट्री मॉड्यूल (RM), ट्रांसफर मॉड्यूल (TM) और प्रणोदन मॉड्यूल (PM)।
    • प्रक्षेपण यान: इसके लिए दो अलग-अलग LVM3 रॉकेटों का उपयोग किया जाएगा।
  • चंद्रयान-5/लुपेक्स (LUPEX – लूनर पोलर एक्सप्लोरेशन)
    • यह इसरो और जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा (JAXA) का एक संयुक्त चंद्र मिशन है।
    • इसे 2026 या उसके बाद प्रक्षेपित किए जाने की उम्मीद है।
    • उद्देश्य: चंद्रमा की सतह का अन्वेषण करना, पानी की खोज करना और चंद्रमा पर भविष्य की मानवीय गतिविधियों की संभावनाओं पर विचार करना।
    • साझेदारी: JAXA द्वारा रोवर और प्रक्षेपण यान प्रदान किया जाएगा, जबकि इसरो लैंडर प्रदान करेगा।
  • मानवयुक्त चंद्र लैंडिंग (Manned Moon Landing):
    • लक्ष्य: भारत ने 2040 तक चंद्रमा पर मानव भेजने का लक्ष्य रखा है।
    • रॉकेट: इसके लिए स्वदेशी NGLV (सूर्या) रॉकेट का उपयोग किया जाएगा।

अन्य देशों के प्रमुख चंद्र मिशन (Moon Missions of Other Countries)

मिशन

विवरण

आर्टेमिस मिशन (Artemis Mission – NASA)

  • यह नासा (NASA) के नेतृत्व में ESA, JAXA और कनाडा की अंतरिक्ष एजेंसी (CSA) का एक संयुक्त मिशन है।
  • उद्देश्य: चंद्रमा पर पहली महिला और पहले अश्वेत व्यक्ति को उतारना, चंद्रमा पर एक स्थायी बेस (Lunar Base) की स्थापना करना और भविष्य में मंगल ग्रह की यात्रा के लिए आधार तैयार करना।
  • आर्टेमिस-1 (2022): ‘ओरियन’ (Orion) अंतरिक्ष यान का मानवरहित सफल परीक्षण।
  • आर्टेमिस-2 (2026): अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर चंद्रमा के चारों ओर परिक्रमा करना (लूनर फ्लाईबाई)।
  • आर्टेमिस-3 (2027): अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट उतारना।
  • आर्टेमिस-4 (2028): चालक दल को चंद्रमा की कक्षा में स्थित अंतरिक्ष स्टेशन, ‘लूनर गेटवे’ तक पहुँचाना।

चांग-ई प्रोग्राम (Chang’e Program – चीन)

  • यह चीन की राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन (CNSA) द्वारा संचालित एक चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम है।
  • चांग-ई 4 (2019): यह चंद्रमा के सुदूर हिस्से (Far Side) पर सफलतापूर्वक उतरने वाला पहला मिशन था।
  • चांग-ई 5 (2020): इस मिशन के तहत चंद्रमा के निकट हिस्से से नमूने पृथ्वी पर वापस लाए गए।
  • चांग-ई 6 (2024): यह दुनिया का पहला मिशन है जो चंद्रमा के सुदूर हिस्से (Far Side) से नमूना वापसी करेगा। इसने अपोलो क्रेटर (जो लगभग 2.5 अरब वर्ष पुराना है) में लैंडिंग की।
  • चांग-ई 7 (2026-27): इस आगामी मिशन का उद्देश्य डार्क क्रेटर (अंधेरे गड्ढों) में ‘हॉपर’ (Hopper) उपकरण का उपयोग करके पानी की खोज करना है।

ILRS (अंतरराष्ट्रीय चंद्र अनुसंधान स्टेशन)

  • चीन और रूस आर्टेमिस समझौते के प्रतिद्वंद्वी के रूप में ILRS का नेतृत्व कर रहे हैं। इनका लक्ष्य 2030-2035 तक दक्षिणी ध्रुव पर एक रोबोटिक (बाद में मानवयुक्त) बेस बनाना है।

SLIM (स्मार्ट लैंडर फॉर इन्वेस्टिगेटिंग मून) – जापान

  • इसे “मून स्नाइपर” भी कहा जाता है, जिसे जनवरी 2024 में लॉन्च किया गया।
  • मुख्य उद्देश्य: चंद्रमा के मेंटल (Mantle) के एक हिस्से की विस्तृत जांच करना।
  • लैंडिंग स्थान: शिओली क्रेटर (Shioli Crater) के पास।
  • महत्वपूर्ण उपलब्धि: जापान, चंद्रमा पर सफलतापूर्वक सॉफ्ट-लैंडिंग करने वाला पाँचवाँ देश बन गया।
  • जापान के अन्य चंद्र मिशन: सेलेन (SELENE – कागुया) और सेलेन-2 (रद्द किया गया)

बेरेशीट (Beresheet – इज़राइल)

  • इज़राइल का पहला चंद्र मिशन और किसी निजी कंपनी द्वारा चंद्रमा पर उतरने का पहला प्रयास (2019 में लैंडिंग के दौरान विफल)।

लूना-25 (Luna-25 – रूस)

  • रूस (Roscosmos द्वारा संचालित) का दक्षिणी ध्रुव मिशन, जो लैंडिंग के दौरान विफल रहा।
  • उद्देश्य: चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरना और वैज्ञानिक प्रयोग करना।

राशिद-2 (Rashid-2 – UAE)

  • संयुक्त अरब अमीरात का रोवर, जो 2026 के अंत में एक अमेरिकी/जापानी लैंडर के माध्यम से चंद्रमा पर भेजा जाएगा।
चंद्रमा से नमूने वापस लाने वाले मिशन:
  • चांग’ई-5, चांग’ई-6 (चीन), अपोलो मिशन (नासा), लूना 16, 20, 24 और 25 (रूस)।

सौर मिशन (Solar Missions)

आदित्य-L1 मिशन (2023)

  • मिशन प्रकार: भारत का पहला सौर वेधशाला-श्रेणी का मिशन।
  • कक्षा: लैग्रेंज बिंदु L1 (पृथ्वी से ~15 लाख किमी) के चारों ओर हेलो ऑर्बिट।
  • कक्षा का लाभ: सूर्य का निरंतर, निर्बाध अवलोकन (कोई ग्रहण/अवरोध नहीं)।
  • वैज्ञानिक उद्देश्य:
    • सूर्य के वायुमंडल (क्रोमोस्फीयर और कोरोना) की गतिशीलता का अध्ययन
    • कोरोना के ताप, सौर ज्वालाओं और CME (कोरोनल मास इजेक्शन) की उत्पत्ति की जांच करना।
    • L1 बिंदु के निकट स्थित प्लाज्मा और कणों का ऑन-साइट अवलोकन करना।
    • अंतरिक्ष मौसम के कारणों का अध्ययन (जैसे सौर पवन की उत्पत्ति, संरचना, और गतिशीलता)।
  • पेलोड्स: कुल 7 (ISRO द्वारा 5 और भारतीय शैक्षणिक संस्थानों द्वारा 2)।
    • रिमोट सेंसिंग पेलोड
      • विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (VELC)
      • सोलर अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (SUIT)
      • सोलर लो एनर्जी X-रे स्पेक्ट्रोमीटर (SoLEXS)
      • हाई एनर्जी L1 ऑर्बिटिंग X-रे स्पेक्ट्रोमीटर (HEL1OS)
    • इन-सीटू पेलोड
      • आदित्य सोलर विंड पार्टिकल एक्सपेरिमेंट (ASPEX)
      • प्लाज्मा एनालाइज़र पैकेज फॉर आदित्य (PAPA)
      • एडवांस्ड ट्राइएक्सियल हाई रेजोल्यूशन डिजिटल मैग्नेटोमीटर्स।

इसरो के साथ ESA का प्रोब-3 मिशन

  • एजेंसी: यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA)
  • प्रक्षेपण यान: PSLV-XL (PSLV-C59), ISRO द्वारा
  • कक्षा: उच्च दीर्घवृत्ताकार कक्षा — अपोजी (Apogee) – पृथ्वी से लगभग 60,000 किमी 
  • मिशन प्रकार: इन-ऑर्बिट प्रदर्शन (IOD)
  • उद्देश्य: अंतरिक्ष में सटीक फॉर्मेशन फ्लाइंग का प्रदर्शन।
  • वैज्ञानिक लक्ष्य: नवीन उपग्रह संरचना उड़ान का उपयोग करके सौर कोरोना का अवलोकन। 
  • अन्य बिंदु:
    • Proba-1 (2001) के बाद यह ESA का भारत से पहला प्रक्षेपण है।
    • यह दुनिया का पहला सटीक फॉर्मेशन फ्लाइट मिशन है → दो उपग्रह मिलकर एक विशाल कोरोनाग्राफ की तरह कार्य करते हैं। → एक उपग्रह सूर्य की डिस्क को ब्लॉक करता है। दूसरा उपग्रह कोरोना का अवलोकन करता है। → इससे सौर कोरोना का निर्बाध अवलोकन संभव होता है।
    • कोरोना सूर्य के वायुमंडल का सबसे बाहरी हिस्सा है।

प्रमुख सौर मिशन (Important Solar Missions)

मिशन

विशेषताएँ

सोलर एंड हीलियोस्फेरिक ऑब्जर्वेटरी (SOHO – सोहो)

  • NASA और ESA द्वारा संयुक्त रूप से (1995)।यह सूर्य के प्रकाश को रोकने के लिए कोरोनोग्राफ (Coronagraph) का उपयोग करता है ताकि कोरोना और सौर विस्फोटों को बेहतर ढंग से देखा जा सके।

सोलर ऑर्बिटर (SolO)

  • NASA और ESA2020 में लॉन्च किया गया।
  • यह 7 वर्षीय मिशन है।
  • यह उच्च स्थानिक रिज़ॉल्यूशन वाले टेलिस्कोप से सूर्य का अवलोकन करता है।
  • यह अध्ययन करता है कि सूर्य पूरे सौर मंडल के अंतरिक्ष वातावरण को कैसे प्रभावित करता है।

पार्कर सोलर प्रोब (Parker Solar Probe)

  • NASA का मिशन: इसे वर्ष 2018 में लॉन्च किया गया था।
  • उद्देश्य: यह किसी भी अन्य अंतरिक्ष यान की तुलना में सूर्य के वातावरण का सर्वाधिक निकट से अध्ययन कर रहा है।
  • महत्वपूर्ण उपलब्धि: 2021 में, यह सूर्य के कोरोना (ऊपरी वायुमंडल) से उड़ान भरने वाला पहला अंतरिक्ष यान बना।
  • प्रमुख खोज: प्रोब ने यह पता लगाया है कि सूर्य के वायुमंडल में स्थित “कोरोनल छिद्र” ही तीव्र सौर पवन का स्रोत हैं। ये सौर पवनें चुंबकीय क्षेत्रों के तीव्र पुनर्व्यवस्थापन (rearrangement) के दौरान उत्पन्न होती हैं।

स्टीरियो (STEREO)

  • सोलर टेरेस्ट्रियल रिलेशंस ऑब्जर्वेटरी (STEREO) मिशन
  • NASA ने 2006 में सूर्य के अध्ययन हेतु STEREO-A और STEREO-B नामक दो जुड़वां अंतरिक्ष यान प्रक्षेपित किए थे।
  • ये यान, SOHO और सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेटरी (SDO) के साथ मिलकर, सूर्य का त्रि-आयामी (3D) दृश्य प्रस्तुत करेंगे। 

कुफू-1 (Kuafu)-1 सोलर प्रोब

  • यह एक उन्नत अंतरिक्ष-आधारित सौर वेधशाला (solar observatory) है, जिसे चीन द्वारा 2022 में लॉन्च किया गया था।
  • इसका उद्देश्य सूर्य के विस्फोटों के रहस्यों को उजागर करना है।

आदित्य L-1 

  • सितंबर 2023 में प्रक्षेपित भारत का पहला अंतरिक्ष-आधारित वेधशाला श्रेणी का सौर मिशन

स्माइल (SMILE – Solar wind Magnetosphere Ionosphere Link Explorer)

  • यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) और चीन का संयुक्त मिशन।
  • उद्देश्य: सौर पवन (Solar wind) का पृथ्वी के चुंबकत्व मंडल (Magnetosphere) के साथ होने वाली अंतःक्रिया का विस्तृत अध्ययन करना।

सनराइज (SunRISE – 2024)

  • पूर्ण रूप: सन रेडियो इंटरफेरोमीटर स्पेस एक्सपेरिमेंट।
  • प्रकार: यह क्यूबसैट (CubeSats) का एक समूह है जो अंतरिक्ष-आधारित रेडियो टेलीस्कोप के रूप में कार्य करता है।
  • उद्देश्य: सौर रेडियो विस्फोटों (Solar radio bursts) का अध्ययन करना और
  • अंतरिक्ष मौसम (Space weather) की घटनाओं (जैसे सौर तूफान) की निगरानी करना जो पृथ्वी को प्रभावित कर सकती हैं।

शीहे-2 (Xihe-2 – प्रस्तावित 2026-28)

  • चीन ने हाल ही में L5 बिंदु (L5 Lagrange Point) पर दुनिया का पहला कृत्रिम प्रोब स्थापित करने की योजना की घोषणा की है।
  • यह सौर गतिविधियों की निरंतर निगरानी के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है।

आईमैप (IMAP – Interstellar Mapping and Acceleration Probe)

  • संस्था: नासा (NASA)।प्रक्षेपण यान: स्पेसएक्स फाल्कन 9 (SpaceX Falcon 9)।
  • उद्देश्य: हेलियोस्फीयर (Heliosphere) की सीमा का मानचित्रण करना और ऊर्जावान कणों की गति और त्वरण का पता लगाना।
  • स्थान: इसे पृथ्वी से सूर्य की ओर लगभग 15 लाख किमी दूर L1 (प्रथम पृथ्वी-सूर्य लैग्रेंज बिंदु) पर स्थापित किया जाएगा।

पंच (PUNCH – 2025/26)

  • पूर्ण रूप: पोलरीमीटर टू यूनिफाई द कोरोना एंड हेलियोस्फीयर।
  • प्रक्षेपण संस्था: नासा (NASA)
  • उद्देश्य: यह एक ‘स्मॉल-सैट’ (Small-sat) मिशन है। इसका मुख्य कार्य सौर कोरोना (Solar corona) के उस क्षेत्र की इमेजिंग करना है, जिसे “लापता कड़ी” (Missing link) कहा जाता है। यह वह क्षेत्र है जहाँ सौर कोरोना सौर पवन में परिवर्तित हो जाता है।

शुक्र मिशन (Venus Missions)

शुक्रयान मिशन (वीनस ऑर्बिटर मिशन)

  • इसरो (ISRO) का शुक्र ऑर्बिटर मिशन मार्च 2028 में प्रक्षेपित किया जाना निर्धारित है। 
  • यह 2013 में प्रक्षेपित मंगल ऑर्बिटर मिशन (मंगलयान) के बाद भारत का दूसरा अंतर-ग्रहीय मिशन होगा।
  • मिशन का प्रकार: यह केवल एक ऑर्बिटर (कक्षीय) मिशन है।
  • लक्ष्य: शुक्र ग्रह के वायुमंडल, सतह और सूर्य के साथ इसकी अंतःक्रिया (Interaction) का अन्वेषण करना।
  • विशेषता: यह शुक्र पर जाने वाला पहला ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार (सतह भेदी रडार) ले जाएगा।
  • प्रक्षेपण यान: शुक्रयान-1 को GSLV Mk II या GSLV Mk III (LVM3) द्वारा प्रक्षेपित किया जाएगा।
  • तकनीक: निम्न-ऊंचाई वाली कक्षा प्राप्त करने के लिए यह एयरोब्रेकिंग (Aerobraking) तकनीक का उपयोग करेगा।
  • वैज्ञानिक पेलोड और प्रयोग: इस मिशन में कुल 19 पेलोड शामिल हैं: 16 भारतीय, 2 भारतीय-अंतरराष्ट्रीय सहयोग वाले और 1 पूर्णतः अंतरराष्ट्रीय पेलोड।
    • प्रमुख भारतीय पेलोड:
      • S-बैंड सिंथेटिक एपर्चर रडार (VSAR)
      • वीनस सतह उत्सर्जन एवं वायुमंडलीय मानचित्रक (VSEAM)
      • वीनस लाइटनिंग उपकरण (LIVE)
      • वीनस थर्मोस्फीयर-आयनोस्फीयर संरचना विश्लेषक (VETHICA)
      • वीनस एडवांस्ड रडार (VARTISS)
      • वीनस इलेक्ट्रॉन तापमान एवं घनत्व विश्लेषक (VEDA)
      • वीनस आयनमंडलीय प्लाज़्मा वेव डिटेक्टर (VIPER)
      • वीनस विकिरण वातावरण मॉनिटर (VeRad)
      • वीनस ऑर्बिट डस्ट प्रयोग (VODEX)
    • भारतीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त पेलोड
      • वीनस आयनमंडलीय एवं सौर पवन कण विश्लेषक (VISWAS)
      • वीनस आयनमंडल का रेडियो विश्लेषण (RAVI)
    • अंतरराष्ट्रीय पेलोड
      • VIRAL (वीनस इन्फ्रारेड एटमॉस्फेरिक गैस लिंकर)

अन्य प्रमुख शुक्र मिशन (Major Venus Missions)

नासा (NASA – अमेरिका)

  • मैरिनर 2 (Mariner 2): 1962 में शुक्र के पास से गुजरने वाला (Flyby) किसी अन्य ग्रह का पहला सफल मिशन।
  • पायनियर वीनस 1 (Pioneer Venus 1) (1978): शुक्र की कक्षा में स्थापित होने वाला पहला अमेरिकी अंतरिक्ष यान।
  • मैगलन (Magellan) (1989): शुक्र की संपूर्ण सतह की इमेजिंग करने वाला पहला अंतरिक्ष यान।
  • आगामी मिशनDAVINCI: शुक्र के वायुमंडल और सतह का गहन अध्ययन करेगा।
  • VERITAS: इसे 2031 में प्रक्षेपित किया जाना है। इसका उद्देश्य मैगलन की तुलना में शुक्र का अधिक विस्तृत मानचित्रण करना है।
  • HAVOC (मिशन अवधारणा): यह नासा की एक मिशन अवधारणा है, जिसके तहत शुक्र के वायुमंडल के अन्वेषण के लिए मानवयुक्त वायुयानों (Airships) का उपयोग किया जाएगा।

ESA – यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी

  • वीनस एक्सप्रेस (Venus Express): यह पहला यूरोपीय अंतरिक्ष यान था जिसे 2005 में शुक्र की कक्षा में स्थापित किया गया।
  • एनविज़न (EnVision): यह एक ऑर्बिटर मिशन है जिसका उद्देश्य शुक्र के इतिहास, गतिविधि और जलवायु का अध्ययन करना है। इसे 2031 में प्रक्षेपित करने की योजना है।

जापान (JAXA)

  • अकात्सुकी (Akatsuki) – 2010 में प्रक्षेपित जापान का पहला शुक्र मिशन।

रूस 

  • वेनेरा (Venera – 1963) और
  • वेगा (Vega) श्रृंखला के मिशन।

चीन (CNSA)

  • VOICE (वीनस वोल्केनो इमेजिंग एंड क्लाइमेट एक्सप्लोरर) – इसके 2026 में प्रक्षेपित होने और 2027 में शुक्र पहुँचने की उम्मीद है।

अन्य महत्वपूर्ण अंतर-ग्रहीय मिशन (Interplanetary Missions)

प्रमुख मंगल मिशन (Important Mars Missions)

देश/एजेंसीसक्रिय/हालिया मिशन आगामी मिशन (2028-2030)
भारत (ISRO)मंगलयान-1 (2013): (मिशन समाप्त) भारत का पहला सफल अंतर-ग्रहीय प्रयास।मंगलयान-2: इसमें एक लैंडर और रोवर शामिल करने की योजना है।
यूएसए (NASA)Perseverance (पर्सीवरेंस), Curiosity (क्यूरियोसिटी): सक्रिय रोवर। MAVEN: (संपर्क टूट गया)।मार्स सैंपल रिटर्न (Mars Sample Return): मंगल से नमूने वापस लाने का मिशन।
चीन (CNSA)तिआनवेन-1 (2021): ऑर्बिटर + झुरोंग (Zhurong) रोवर। एक ही मिशन में कक्षा, लैंडिंग और रोवर प्राप्त करने वाला पहला देश।तिआनवेन-3 (Tianwen-3): मंगल से नमूना वापसी (Sample Return) मिशन।
यूरोप (ESA)ट्रेस गैस ऑर्बिटर (TGO): मंगल के वायुमंडल में मीथेन और अन्य गैसों के अध्ययन हेतु।रोजालिंड फ्रैंकलिन रोवर (Rosalind Franklin): मंगल पर जीवन के संकेतों की खोज हेतु।

अन्य महत्वपूर्ण मिशन (Other important Missions)

मिशन

विवरण

जूसी (JUICE – जुपिटर आईसी मून्स एक्सप्लोरर) मिशन

  • प्रक्षेपण: यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) द्वारा 2023 में प्रक्षेपित।
  • लक्ष्य: बृहस्पति ग्रह और उसके तीन सबसे बड़े बर्फीले चंद्रमाओं – यूरोपा, गेनीमीड, और कैलिस्टो – का विस्तृत अध्ययन करना।
  • विशेष फोकस: संभावित आवास (Habitat) और ग्रहीय पिंड के रूप में ‘गेनीमीड’ पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है।

ओसिरिस-रेक्स (OSIRIS-REx)

  • प्रकार: यह नासा (NASA) द्वारा संचालित एक क्षुद्रग्रह अध्ययन और नमूना वापसी मिशन है।
  • इतिहास: इसे 2016 में ‘बेन्नू’ (Bennu) नामक क्षुद्रग्रह का अध्ययन करने के लिए प्रक्षेपित किया गया था, और यह 2023 में विश्लेषण के लिए क्षुद्रग्रह का नमूना लेकर सफलतापूर्वक पृथ्वी पर वापस लौटा।
  • महत्व: इस नमूने के विश्लेषण से वैज्ञानिक हमारे सौर मंडल के जन्म (लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व) और पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति (Genesis) से संबंधित महत्वपूर्ण सुराग प्राप्त करने की उम्मीद कर रहे हैं।

डार्ट (DART – डबल एस्टेरॉयड रिडायरेक्शन टेस्ट)

  • यह नासा (NASA) और जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी एप्लाइड फिजिक्स लेबोरेटरी के बीच एक सहयोगात्मक मिशन है।
  • प्रक्षेपण: नवंबर 2021।
  • उद्देश्य: “ग्रहीय रक्षा (Planetary Defense)” तकनीक का प्रदर्शन करना, जिसके तहत किसी अंतरिक्ष यान को जानबूझकर क्षुद्रग्रह से टकराकर उसके प्रक्षेपवक्र (Trajectory) को बदलने की क्षमता का परीक्षण किया गया।
  • लक्ष्य प्रणाली: डिडिमॉस (Didymos) नामक द्वि-तारा क्षुद्रग्रह प्रणाली, जिसमें एक बड़ा क्षुद्रग्रह (डिडिमॉस) और उसका छोटा चंद्रमा (डिमॉर्फोस) शामिल है।
  • उपलब्धि: सितंबर 2022 में, अंतरिक्ष यान सफलतापूर्वक डिमॉर्फोस से टकराया और उसकी कक्षा (Orbit) को बदलने में कामयाब रहा।
  • आगामी मिशन: यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) का हेरा (Hera) मिशन इस टक्कर के प्रभावों का विस्तृत सर्वेक्षण करेगा।

लूसी मिशन (Lucy Mission – NASA)

  • प्रमुख लक्ष्य: यह मिशन बृहस्पति के ट्रोजन क्षुद्रग्रहों का अध्ययन करने के लिए समर्पित है। इन क्षुद्रग्रहों को हमारे सौर मंडल के निर्माण के अवशेष माना जाता है।
  • प्रक्षेपण विवरण: इसे 2021 में यूनाइटेड लॉन्च अलायंस के एटलस V रॉकेट की सहायता से प्रक्षेपित किया गया था।
  • प्रक्षेपवक्र: ट्रोजन क्षुद्रग्रहों तक पहुंचने के लिए, लूसी अंतरिक्ष यान पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का उपयोग ‘स्लिंगशॉट प्रभाव’ (Slingshot effect) या गुरुत्वाकर्षण सहायता (Gravity Assist) के रूप में करेगा।

कैसिनी अंतरिक्ष यान (Cassini Spacecraft)

  • संयुक्त मिशन: नासा (NASA), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) और इतालवी अंतरिक्ष एजेंसी (ASI) का एक साझा प्रयास।
  • प्रक्षेपण: 15 अक्टूबर, 1997; यह 2004 में शनि (Saturn) ग्रह पर पहुँचा।
  • मुख्य घटक:
    • कैसिनी ऑर्बिटर (NASA): शनि की कक्षा में स्थापित होने वाला पहला अंतरिक्ष यान, जिसने शनि प्रणाली का विस्तृत अध्ययन किया।
    • ह्यूजेंस प्रोब (ESA): यह 2005 में शनि के सबसे बड़े चंद्रमा ‘टाइटन’ (Titan) पर सफलतापूर्वक उतरा। यह बाहरी सौर मंडल में की गई पहली सफल लैंडिंग थी। 
  • महत्वपूर्ण अपडेट (2025):
    • जून 2025: कैसिनी के अंतिम अवतरण (Descent) से ठीक पहले, नासा ने अंतिम छवि जारी की, जिसे “द डे अर्थ स्माइल्ड” के पुनरावलोकन के रूप में देखा गया।
  • अक्टूबर 2025: कैसिनी द्वारा एकत्र किए गए डेटा के नए विश्लेषण से महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। शनि के चंद्रमा ‘एन्सेलाडुस’ पर फास्फेट और अमीनो एसिड के साक्ष्य मिले हैं, जो वहां सूक्ष्मजीवी जीवन की संभावना की ओर इशारा करते हैं

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

error: Content is protected !!
Scroll to Top
Telegram WhatsApp Chat