नागरिक चार्टर

नागरिक चार्टर राजनीतिक व्यवस्था और शासन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो नागरिकों को प्रदान की जाने वाली सेवाओं के मानक, समय-सीमा और अधिकारों को स्पष्ट करता है। यह पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर सेवा वितरण को बढ़ावा देता है। नागरिकों और प्रशासन के बीच विश्वास स्थापित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

उद्देश्य

  • नागरिक अधिकार पत्र का मुख्य उद्देश्य सरकारी संगठनों को पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिकों के अनुकूल बनाना है।
  • यह सरकार और जनता के बीच विश्वास स्थापित करने में भी सहायक होता है।

वैश्विक संदर्भ

  • नागरिक अधिकार पत्र की अवधारणा का पहला प्रयास ब्रिटेन में हुआ।
  • ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जॉन मेजर ने 1901 में इस पहल को राष्ट्रीय कार्यक्रमों में शामिल किया।
  • टोनी ब्लेयर ने ब्रिटेन में “चार्ट मार्क स्कीम” के माध्यम से नागरिक अधिकार पत्र की शुरुआत करने की बात कही।
  • चार्ट मार्क स्कीम को ब्रिटेन में नागरिक अधिकार पत्र के रूप में देखा गया।

सिटीजन चार्टर की प्रकृति और वैधानिक स्थिति

  • शुरुआत: भारत में इसकी औपचारिक शुरुआत 1997 से हुई।
  • नोडल मंत्रालय: इसे प्रभावी ढंग से लागू करने का उत्तरदायित्व कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय को सौंपा गया है।
  • वैधानिक स्थिति: वर्तमान में भारत में सिटीजन चार्टर वैधानिक (कानूनी रूप से बाध्यकारी) नहीं है। इसे न्यायालय के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता।

सिटीजन चार्टर और शिकायत निवारण विधेयक, 2011

  • इसे चार्टर को वैधानिक स्वरूप देने के लिए संसद में पेश किया गया था, परंतु यह अभी तक पारित नहीं हुआ है।
  • प्रमुख प्रावधान: प्रत्येक सार्वजनिक अधिकारी को विधेयक लागू होने के 6 महीने के भीतर चार्टर बनाना अनिवार्य होगा।
  • दंड का प्रावधान: चार्टर का निर्माण न करने वाले अधिकारियों के लिए दंड का प्रस्ताव इस विधेयक में दिया गया है।

भारत में नागरिक अधिकार पत्र की शुरुआत

  • 1996 में पहली बार मुख्य सचिवों के सम्मेलन में नागरिक अधिकार पत्र पर चर्चा की गई। यह सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित किया गया।
  • 1997 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में नई दिल्ली में मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें नागरिक अधिकार पत्र पर व्यापक चर्चा की गई। मुख्यमंत्रियों के इस सम्मेलन का प्रमुख शीर्षक “उत्तरदायी एवं जवाबदेही प्रशासनिक व्यवस्था” था।
  • 1997 में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय द्वारा भारत में पहली बार नागरिक अधिकार पत्र की व्यवस्था लागू की गई।
  • यह मंत्रालय भारत सरकार के अधीन कार्यरत है।
  • प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (DARPG) ने 14 मई, 2003 को सभी नागरिक चार्टरों का संक्षिप्त संकलन (पुस्तक और CD) जारी किया।
  • क्षेत्रीय सेमिनार (2001-02): हैदराबाद, मसूरी, भोपाल और गुवाहाटी में आयोजित। इसमें 24 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और 15 केंद्रीय विभागों ने अनुभव साझा किए।

भारत में ‘सेवोत्तम’ (Sevottam) मॉडल

  • भारत सरकार ने नागरिक अधिकार पत्र को और प्रभावी बनाने के लिए ‘सेवोत्तम’ मॉडल विकसित किया है। इसके तीन स्तंभ हैं:
    • प्रथम स्तंभ: नागरिक अधिकार पत्र का प्रभावी कार्यान्वयन।
    • द्वितीय स्तंभ: सार्वजनिक शिकायत निवारण प्रणाली।
    • तृतीय स्तंभ: सेवा वितरण क्षमता (Service Delivery Capability)।
  • वर्ष 2008 में नागरिक अधिकार पत्रों के प्रभाव एवं सीमाओं के मूल्यांकन.. हेतु प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग द्वारा प्रायोजित रिपोर्ट के अनुसार इसकी सीमाएँ निम्नलिखित है-
    • अंगीकृत न होना: कई मंत्रालयों, विभागों और सरकारी संस्थानों ने अब तक नागरिक अधिकार पत्रों को औपचारिक रूप से अपनाया नहीं है, जिससे नागरिकों के अधिकारों और सेवाओं तक पहुंच में बाधा उत्पन्न होती है।
    • जड़वत प्रक्रिया: कुछ मामलों में, नागरिक अधिकार पत्र केवल औपचारिकता बन कर रह गए हैं। एक बार लागू करने के बाद उनमें निरंतर अद्यतन या सुधार नहीं किया गया है, जिससे उनकी प्रभावशीलता कम हो गई है।
    • परिष्करण का अभाव: कई विभागों ने नागरिक अधिकार पत्रों में निर्धारित मानकों और प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया है, जिससे उनके कार्यान्वयन में अस्पष्टता बनी रहती है।
    • उत्तरदायित्व और समीक्षा तंत्र का अभाव: नागरिक अधिकार पत्रों में कोई स्पष्ट उत्तरदायित्व या निगरानी प्रणाली नहीं है, जिससे उनके अनुपालन की निगरानी और समीक्षा करना मुश्किल हो जाता है।
    • भागीदारीपूर्ण तंत्र की कमी: प्रभावी कार्यान्वयन के लिए नागरिकों और अन्य हितधारकों की भागीदारी आवश्यक होती है, लेकिन नागरिक अधिकार पत्रों में इस प्रकार की भागीदारीपूर्ण तंत्र का अभाव है।
  • ये सीमाएँ दर्शाती हैं कि नागरिक अधिकार पत्रों की सफलता के लिए निरंतर सुधार, स्पष्ट उत्तरदायित्व, और जनसहभागिता की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

  • नागरिक अधिकार पत्र प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देता है।
  • यह जनता को सुनिश्चित सेवाएं प्रदान करने के साथ-साथ सरकार और जनता के बीच एक विश्वास का पुल स्थापित करने में मदद करता है।
  • भारत और राजस्थान में इसे लागू करने का उद्देश्य नागरिकों की संतुष्टि और प्रशासन की कार्यक्षमता में सुधार करना है।

नागरिक घोषणा-पत्र के 6 मूल सिद्धांत

  1. गुणवत्ता: सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करना।
  2. मानक: समय-सीमा में सेवाओं के मानकों का पालन और सुधारात्मक कार्यवाही का निर्धारण।
  3. विकल्प: उपयोगकर्ताओं के लिए अधिकतम सेवा विकल्प प्रदान करना।
  4. उत्तरदायित्व: सेवाएं प्रदान करने वाले की जवाबदेही तय करना।
  5. मूल्य: करदाता के पैसों का सही उपयोग सुनिश्चित करना।
  6. पारदर्शिता: नियमों, योजनाओं, प्रक्रियाओं और शिकायत निवारण में पारदर्शिता।

नागरिक अधिकार के सकारात्मक तथ्य निम्न है

  1. लोक प्रशासन में पारदर्शिता व जवाबदेही
  2. भ्रष्टाचार में कमी
  3. कार्यकुशलता में वृद्धि
  4. प्रभावी सेवा वितरण में वृद्धि
  5. जनता में विश्वास में वृद्धि

सार्वजनिक सेवा के अंतर्गत किसी संस्था या फर्म द्वारा 6 सिद्वानों का पालन किया जाता है।

  1. मापदण्ड/मानक
  2. खुलापन (पारदर्शिता)
  3. सूचना 
  4. स्वैच्छिक चुनाव (विकल्प)
  5. निष्पक्षता
  6. सुलभता
  1. संगठन का दृष्टिकोण और मिशन
  2. कार्य और व्यवसाय का विवरण
  3. नागरिकों और ग्राहकों की पहचान
  4. सेवाओं का विवरण, गुणवत्ता और समय-सीमा
  5. शिकायत निवारण तंत्र
  6. नागरिकों/ग्राहकों से अपेक्षाएँ
  7. विफलता की स्थिति में मुआवजे की प्रतिबद्धता
  • एक अच्छे चार्टर के अन्य आवश्यक तत्व
  1. सरल भाषा
  2. ग्राहकों की आवश्यकताओं पर केंद्रित
  3. समय-समय पर समीक्षा
  4. विश्वसनीयता और निरंतरता
  • कार्यान्वयन की प्रमुख बाधाएँ 
  1. शीर्षगामी दृष्टिकोण
  2. प्रशिक्षण का अभाव
  3. प्रशासनिक अस्थिरता
  4. जागरूकता की कमी
  5. अवास्तविक मानक
  6. भ्रमपूर्ण समझ

द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2ARC) की मुख्य अनुशंसा

  1. उपाय और मुआवजे का स्पष्ट उल्लेख
  2. पूरा किए जा सकने वाले वादों का समावेश
  3. संगठनात्मक संरचना और प्रक्रियाओं का पुनर्गठन
  4. स्थानीय और अनुकूलित चार्टर का निर्माण (सभी के लिए एक समान नहीं)
  5. सभी हितधारकों की भागीदारी
  6. दृढ़ वादे और नागरिक अनुकूल शिकायत निवारण तंत्र
  7. अधिकारियों की जवाबदेही का निर्धारण
  8. नियमित समीक्षा और संशोधन

प्रशासनिक सुधार आयोग और लोक शिकायत 2006 के तीन प्रारूप:

  1. नागरिक अधिकार पत्र: प्रशासन को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए नागरिकों के अधिकारों को स्पष्ट करने वाला दस्तावेज़।
  2. लोक शिकायत समाधान प्रणाली:नागरिकों की शिकायतों के त्वरित और प्रभावी समाधान के लिए एक प्रणाली।
  3. सेवा प्रारूप की सक्षमता: सेवाओं की गुणवत्ता और कार्यक्षमता को बढ़ाने के लिए सुधार प्रक्रिया।
  4. प्रारंभिक कार्यान्वयन: यह प्रक्रिया प्रारंभ में 10 विभागों में लागू की गई, जिनमें मुख्य रूप से डाक विभाग, रेलवे, पेंशन विभाग, केन्द्रीय विद्यालय, कॉर्पोरेट और वाणिज्य क्षेत्र शामिल थे।

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