लोकायुक्त : राजस्थान राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत लोकायुक्त एक महत्वपूर्ण संवैधानिक/वैधानिक संस्था है, जिसका उद्देश्य प्रशासन में भ्रष्टाचार की जांच करना और पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना है।यह संस्था जन शिकायतों के निवारण हेतु उच्च पदस्थ लोकसेवकों के विरुद्ध जांच करती है तथा सुशासन को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
लोकायुक्त: पृष्ठभूमि
वैश्विक उद्भव (स्वीडिश मॉडल)
- विश्व में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाली इस संस्था का जन्म स्वीडन में हुआ।
- 1713: किंग चार्ल्स XII ने राजकीय अधिकारियों के आचरण की निगरानी के लिए एक सभासद नियुक्त किया।
- 1809: स्वीडन के संविधान में औपचारिक रूप से ‘ऑम्बुड्समैन फॉर जस्टिस’ के पद का सृजन हुआ। इसका मुख्य कार्य लोकसेवकों द्वारा कानून के उल्लंघन की जांच करना था।
- विस्तार: स्वीडन की सफलता के बाद फिनलैंड (1919), डेनमार्क (1954), नॉर्वे (1961) और ब्रिटेन (1967) जैसे देशों ने इसे अपनाया।
भारतीय संदर्भ में वैचारिक विकास
- भारत में इस संस्था की आवश्यकता को लेकर लंबी चर्चा चली:
- नामकरण (1963): प्रख्यात कानूनविद डॉ. एल.एम. सिंघवी ने ‘ऑम्बुड्समैन’ के भारतीय विकल्प के रूप में ‘लोकपाल’ और ‘लोकायुक्त’ शब्द दिए।
- संवैधानिक मांग: पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.बी. गजेंद्रगढ़कर ने अपनी पुस्तक ‘लॉ, लिबर्टी एंड सोशियल जस्टिस’ में इस संस्था को संवैधानिक दर्जा देने पर जोर दिया ताकि भ्रष्टाचार का प्रभावी निदान हो सके।
- प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966): मोरारजी देसाई की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने आधिकारिक रूप से सिफारिश की कि नागरिकों की शिकायतों के निवारण हेतु केंद्र में ‘लोकपाल’ और राज्यों में ‘लोकायुक्त’ की स्थापना की जाए।
राज्यों में पहल (राजस्थान के विशेष संदर्भ में)
- केंद्र से पहले कई राज्यों ने अपने स्तर पर कानून बनाकर इसकी शुरुआत की:
- ओडिशा (1970): लोकायुक्त अधिनियम पारित करने वाला देश का प्रथम राज्य बना।
- महाराष्ट्र (1971): लोकायुक्त पद पर नियुक्ति करने वाला देश का प्रथम राज्य बना।
- राजस्थान (1973): राजस्थान में 1963 की प्रशासनिक सुधार समिति की सिफारिशों के आधार पर 3 फरवरी, 1973 को लोकायुक्त अध्यादेश लागू किया गया, जिसे बाद में अधिनियम का रूप दिया गया।
राजस्थान के संदर्भ में लोकायुक्त संस्था
स्थापना और कानूनी ढांचा
- प्रशासनिक सुधार समिति (1963): राजस्थान में ‘ऑम्बुड्समैन’ जैसी संस्था की सिफारिश की।
- अध्यादेश का प्रख्यापन: राजस्थान लोक आयुक्त तथा उप-लोकायुक्त अध्यादेश 24 जनवरी, 1973 को प्रख्यापित किया गया।
- राजपत्र में प्रकाशन: यह अध्यादेश 25 जनवरी, 1973 को राजस्थान राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित हुआ।
- प्रभावी तिथि : अध्यादेश की प्रभावी तिथि 3 फरवरी, 1973 अधिसूचित की गई थी।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति: 26 मार्च, 1973 (इसके बाद यह राजस्थान लोकायुक्त अधिनियम, 1973 बना)।
- यद्यपि राष्ट्रपति की अनुमति मार्च में मिली, लेकिन यह अधिनियम उसी तिथि (3 फरवरी, 1973) से प्रभावी माना गया, जिस दिन से अध्यादेश लागू हुआ था।
- तत्कालीन मुख्यमंत्री: बरकतुल्लाह खान।
- तत्कालीन राज्यपाल: सरदार जोगेंद्र सिंह।
- राजस्थान सरकार द्वारा 28 फरवरी 2014 को मौजूदा लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन कर इसे सशक्त तथा प्रभावी बनाने हेतु महाधिवक्ता नरपत मल लोढा की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया गया।
संस्था का स्वरूप एवं कार्य
- यह संस्था गैर संवैधानिक निकाय है जिसे वैधानिक तथा सांविधिक भी कहा जाता है।
- लोक आयुक्त एक स्वतंत्र संस्था है जिसका क्षेत्राधिकार सम्पूर्ण राज राज्य है।
- यह राज्य सरकार का कोई विभाग नहीं है तथा ना ही राज्य सरकार का कोई हस्तक्षेप है।
- लोकायुक्त शिकायत या स्वप्रेरणा के आधार पर प्रारम्भ की गई जाँच एवं अन्वेषणों के माध्यम से लोक प्रशासन में स्वच्छता, निष्पक्षता एवं संवेदनशीलता लाने हेतु सतत् प्रयासरत है।
- लोकायुक्त प्राप्त शिकायतो की निष्पक्ष जांच करता है। तथा जांच के बाद मामलो को निरस्त करेगा अथवा सक्षम अधिकारी को कार्यवाही करने की सिफारिश करता है।
- लोकायुक्त के पास सिविल कोर्ट की शक्तिया प्राप्त है जिसके अंतर्गत लोकायुक्त जांच हेतु फाइले व दस्तावेज मंगवा सकता है।
- लोकायुक्त 5 वर्ष पुराने मामलो की जांच नहीं कर सकता।
उद्देश्य
- इस संस्था का गठन जन-साधारण को स्वच्छ प्रशासन प्रदान करने के उद्देश्य से लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार एवं पद के दुरुपयोग सम्बन्धी शिकायतों पर स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से जाँच एवं अन्वेषण करना।
- यह लोक सेवा में समर्पण, वचनबद्धताएँ, जवाबदेही, पारदर्शिता एवं उच्च गुणवत्ता प्रदान करवाने हेतु प्रतिबद्ध है।
नियुक्ति, योग्यता एवं सेवा शर्तें
नियुक्ति (धारा 3):
- राज्यपाल अपने हस्ताक्षर और सरकारी मुहर वाले एक आधिकारिक नियुक्ति पत्र (वारंट) के जरिए लोकायुक्त और एक या एक से अधिक उप-लोकायुक्तों की नियुक्ति करेगा।
- लोकायुक्त की नियुक्ति : एक चयन समिति की सिफारिश से की जाती है।
- चयन समिति में कुल 3 सदस्य होते है।
- मुख्यमंत्री – अध्यक्ष
- विपक्ष दल का नेता
- उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
- चयन समिति में कुल 3 सदस्य होते है।
- योग्यता:
- उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का सेवानिवृत न्यायाधीश।
- कोई लाभ का पद धारण नहीं किया हो।
- किसी राजनैतिक दल के साथ जुड़ाव न हो। संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य न हो।
- उप-लोकायुक्त की नियुक्ति: लोकायुक्त के परामर्श से। (प्रथम उप-लोकायुक्त पूर्व सतर्कता आयुक्त होना अनिवार्य था)।
शपथ (धारा 3):
- लोकायुक्त या उप-लोकायुक्त के रूप में नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति, अपना पद ग्रहण करने से पूर्व राज्यपाल अथवा उनके द्वारा नामित व्यक्ति के समक्ष शपथ लेता है।
कार्यकाल (धारा 5):
- 5 वर्ष की अवधि या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)।
- नोट: 2018 में इसे 8 वर्ष किया गया था, जिसे 2019 में पुनः 5 वर्ष कर दिया गया।
- प्रथम उप-लोकायुक्त की पदावधि उतनी होगी जितनी राज्यपाल नियत करें किन्तु किसी भी दशा में यह, उसके पद संभालने की तारीख से पांच वर्ष से अधिक के लिये नियत नहीं की जायेगी.
- लोकायुक्त नहीं तो उप-लोकायुक्त काम करेगा, उप-लोकायुक्त नहीं तो लोकायुक्त काम करेगा।
- लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त दोनों के न होने पर राज्यपाल के अनुरोध पर मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित हाई कोर्ट का कोई जज लोकायुक्त का कार्यभार संभालेगा।
त्यागपत्र (धारा 5):
- राज्यपाल को सम्बोधित करते हुए।
वेतन – भत्ते एवम् पेंशन (धारा 5) :
- लोकायुक्त: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समान। (2.50 लाख रुपये)
- उप-लोकायुक्त: उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों के समान। (2.25 लाख रुपये)
- लोकायुक्त या उप-लोकायुक्त की एक बार नियुक्ति हो जाने के बाद, उनके कार्यकाल के दौरान उनके भत्तों, पेंशन या अन्य सेवा शर्तों में कोई ऐसा बदलाव नहीं किया जाएगा जिससे उन्हें नुकसान (अलाभकारी परिवर्तन) हो।
पद से हटाना (धारा 6)
- आधार: कदाचार या अक्षमता।
- प्रक्रिया: राज्यपाल द्वारा सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त/वर्तमान न्यायाधीश से जांच करवाई जाएगी। जाँच में दोषी पाये जाने पर राज्यपाल द्वारा हटाया जाता है।
- विधानमंडल की भूमिका: सदन के कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वालों के दो-तिहाई बहुमत से संकल्प पारित होने पर राज्यपाल पद से हटाएगा।
वार्षिक रिपोर्ट / प्रतिवेदन (धारा 12):
- राज्य लोकायुक्त वार्षिक रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपता है। तथा राज्यपाल इसे विधानसभा में रखवाता है।
- आवश्यकता पड़ने पर विशेष मामलों में अलग से रिपोर्ट भी भेजी जा सकती है।
राजस्थान लोकायुक्त: कार्यप्रणाली
- शिकायत दर्ज करने की कार्यप्रणाली –
- लोकायुक्त सचिवालय में शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया अत्यंत पारदर्शी और सुलभ है:
- कौन कर सकता है शिकायत: कोई भी व्यक्ति जो स्वयं लोकसेवक न हो।
- असमर्थता की स्थिति में: यदि शिकायतकर्ता की मृत्यु हो जाए या वह स्वयं कार्यवाही करने में असमर्थ हो, तो उसका प्रतिनिधि (संपदा वारिस) या अधिकृत व्यक्ति शिकायत कर सकता है।
- शिकायत के माध्यम: स्वयं उपस्थित होकर, डाक, फैक्स या ई-मेल द्वारा।
- शिकायत का विवरण: शिकायतकर्ता का पूरा नाम, पता और व्यवसाय।
- संबंधित लोकसेवक का नाम और पद।
- लगाए गए आरोपों का पूर्ण विवरण और उन्हें सिद्ध करने वाले साक्ष्य।
- अनिवार्य दस्तावेज: प्रत्येक शिकायत के साथ 10/- रुपये के गैर-न्यायिक स्टाम्प पर मजिस्ट्रेट या नोटरी द्वारा सत्यापित शपथ-पत्र होना अनिवार्य है।
- नोट: फैक्स या ई-मेल से भेजी गई शिकायत के लिए शपथ-पत्र डाक द्वारा अलग से भेजना होता है।
- विशेष श्रेणी: पुलिस हिरासत, जेल या विक्षिप्त व्यक्तियों के आश्रय स्थल से भी शिकायत भेजी जा सकती है। संबंधित प्रभारी का यह कर्तव्य है कि वह ऐसी शिकायत तुरंत लोकायुक्त सचिवालय को प्रेषित करे।
लोकायुक्त की शक्तियाँ एवं क्षेत्राधिकार
- अधिनियम की धारा 7 के तहत लोकायुक्त को निम्न आधारों पर अन्वेषण (Investigation) की शक्ति प्राप्त है:
- लोकसेवक द्वारा किसी को अनुचित हानि या कष्ट पहुँचाना।
- अवैध लाभ हेतु पद का दुरुपयोग करना।
- व्यक्तिगत हित या भ्रष्टाचार से प्रेरित होकर कार्य करना।
- भ्रष्टाचार या निष्ठा/सच्चरित्रता की कमी का दोषी होना।
- राज्य लोकायुक्त के क्षेत्राधिकार में शामिल –
- राज्य के समस्त मंत्री (मुख्यमंत्री को छोड़कर)
- लोक सेवक, सचिव, विभागाध्यक्ष
- जिला प्रमुख व उपजिला प्रमुख
- पंचायत समिति के प्रधान / उपप्रधान
- जिला परिषद व पंचायत समितियो की स्थायी समिति के अध्यक्ष
- नगरनिगम के महापौर व उपमहापौर
- नगरपालिका व नगर विकास न्यासो के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष
- राजकीय कंपनी व निगम अथवा मंडलो के अध्यक्ष, अधिकारियों व कर्मचारियो के विरुद्ध की गयी जांच इनके दायरे में आते है।
- लोक आयुक्त की जांच के दायरे में नहीं आते-
- राज्यपाल
- मुख्यमंत्री
- महालेखाकार
- उच्च न्यायालय व जिला न्यायालय के मुख्य व अन्य न्यायाधीश
- न्यायिक अधिकारी व कर्मचारी
- मुख्य चुनाव आयुक्त व चुनाव अधिकारी
- प्रादेशिक चुनाव आयुक्त
- लोक सेवा आयोग अध्यक्ष व सदस्य
- सेवानिवृत लोकसेवक
- विधायक
- सरपंच व पंच
- विधानसभा सचिवालय के स्टॉप के अधिकारी व कर्मचारी।
राजस्थान लोकायुक्त अधिनियम, 1973 की प्रमुख धाराएं
धारा 2: परिभाषाएं (लोक सेवक कौन है?) –
लोकायुक्त निम्न के विरुद्ध अन्वेषण कर सकते हैं:
- मंत्री: मुख्यमंत्री को छोड़कर सभी मंत्री, राज्य मंत्री और उपमंत्री।
- अधिकारी: राज्य सरकार के अधीन कार्यरत।
- स्थानीय निकाय: जिला प्रमुख/उप-प्रमुख, प्रधान/उप-प्रधान, स्थायी समिति अध्यक्ष, महापौर/उप-महापौर, नगरपालिका अध्यक्ष/उपाध्यक्ष।
- सरकारी संस्थाएं: सरकारी कंपनियां (51% से अधिक अंशपूंजी), राज्य नियंत्रित निगम और अधिसूचित सोसायटियाँ।
धारा 4: प्रतिबंध
- लोकायुक्त/उप-लोकायुक्त:
- संसद या विधानमंडल का सदस्य नहीं होगा।
- लाभ का पद धारण नहीं करेगा।
- किसी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं होगा।
- कोई कारोबार या वृत्ति (व्यवसाय) नहीं करेगा।
धारा 7 से 12: अन्वेषण एवं प्रतिवेदन
- धारा 7: मंत्रियों एवं लोक सेवकों के विरुद्ध अन्वेषण की शक्ति।
- धारा 8(3): 5 वर्ष से अधिक पुराने मामलों की जांच नहीं की जाएगी।
- धारा 9: शिकायत केवल लोक सेवक से भिन्न व्यक्ति ही करेगा (स्वयं के लिए या मृतक की ओर से प्रतिनिधि)।
- धारा 10: अन्वेषण के दौरान सिविल न्यायालय की शक्तियाँ।
- धारा 12: वार्षिक प्रतिवेदन राज्यपाल को प्रस्तुत करना (राज्यपाल इसे विधानसभा पटल पर रखवाएगा)।
धारा 13 से 20: दंड एवं अन्य शक्तियाँ
- धारा 13: मिथ्या (झूठी) शिकायत पर 3 वर्ष तक का कारावास।
- धारा 14: कर्मचारी वर्ग की नियुक्ति लोकायुक्त द्वारा।
- धारा 16: लोक आयुक्त के कार्य में बाधा डालने या अपमान करने पर 6 माह का कारावास।
- धारा 18: राज्यपाल लोकायुक्त से परामर्श कर उसे अतिरिक्त कार्य (भ्रष्टाचार उन्मूलन संबंधी) सौंप सकता है।
- धारा 20: प्रत्यायोजन (Delegation): लोकायुक्त अपनी शक्तियाँ (रिपोर्ट देने के अलावा) अन्य अधिकारियों को लिखित आदेश द्वारा सौंप सकता है।
राजस्थान लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त: नियम एवं महत्वपूर्ण तथ्य
नियम बनाने की शक्ति (धारा 21)
- शक्ति: राज्यपाल को इस अधिनियम के क्रियान्वयन हेतु राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है।
- परिणाम: इस शक्ति का प्रयोग करते हुए राजस्थान के राज्यपाल ने “राजस्थान लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त (कार्यवाहियां) नियम, 1974” बनाए।
- विशेष: ये नियम तत्कालीन राज्यपाल सरदार जोगेंद्र सिंह के कार्यकाल में बनाए गए थे।
- सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority)
- अधिनियम की धारा 2(c)(ii) के तहत लोक सेवकों के विरुद्ध जांच प्रतिवेदन (Report) प्राप्त करने के लिए निम्न सक्षम प्राधिकारी निर्धारित किए गए हैं:
| क्र.सं. | लोक सेवक का प्रकार | सक्षम प्राधिकारी |
| 1 | मंत्री एवं सचिव | राज्य का मुख्यमंत्री |
| 2 | अखिल भारतीय सेवा सदस्य, विभागाध्यक्ष एवं राज्य सेवा सदस्य | कार्मिक विभाग का प्रभारी मंत्री |
| 3 | अन्य राजपत्रित अधिकारी | संबंधित विभाग का प्रभारी मंत्री |
| 4 | अराजपत्रित अधिकारी | संबंधित विभाग का शासन सचिव |
शिकायत प्रक्रिया एवं शर्तें
- स्वतंत्रता: लोकायुक्त एक स्वतंत्र संस्थान है। यह राज्य सरकार का विभाग नहीं है और सरकार का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं होता।
- पात्रता: शिकायत केवल राजस्थान राज्य के लोक सेवकों के विरुद्ध की जा सकती है। शिकायतकर्ता स्वयं लोक सेवक नहीं होना चाहिए।
- शपथ पत्र: शिकायत के साथ 10/- रुपये के नॉन-जुडिशियल स्टाम्प पर सत्यापित शपथ पत्र आवश्यक है। यदि शिकायतकर्ता एक से अधिक हैं, तो किसी एक का शपथ पत्र पर्याप्त है।
- समय सीमा: घटना के 5 वर्ष से अधिक पुराने मामलों की शिकायत नहीं हो सकती (नोट: लगातार चल रहे कृत्य पर यह सीमा लागू नहीं होती)।
- प्रतिबंध: व्यक्तिगत विवाद के मामलों की शिकायत नहीं की जा सकती।
- संबोधन: शिकायत ‘सचिव, लोकायुक्त सचिवालय, शासन सचिवालय परिसर, जयपुर’ के नाम से की जाएगी।
सचिवालय एवं प्रशासनिक ढांचा
- कार्मिक विभाग: यह विभाग लोकायुक्त अधिनियम से संबंधित मामलों का प्रशासनिक विभाग है और सरकार एवं लोकायुक्त के बीच सूचना का माध्यम (Communication Channel) है।
- पद की स्थिति: * लोकायुक्त का सचिव = विभागाध्यक्ष।
- लोकायुक्त का उप-सचिव = कार्यालय अध्यक्ष।
विशेष टिप्पणी: नियम बनाने की शक्ति का उल्लेख मूल अधिनियम में था, जबकि बाक़ी प्रावधान के लिए नियम 25 सितंबर, 1996 को प्रतिस्थापित (अद्यतन) किए गए।
राजस्थान के लोकायुक्तों की सूची (1973 – वर्तमान)
| क्र.सं. | नाम | कार्यकाल की अवधि | विशेष विवरण |
| 1 | न्यायमूर्ति श्री आई.डी. दुआ | 1973 – 1978 | प्रथम लोकायुक्तपूर्व न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय। |
| 2 | न्यायमूर्ति श्री डी.पी. गुप्ता | 1978 – 1979 | प्रथम कार्यवाहक लोकायुक्तराजस्थान के कार्यवाहक राज्यपाल भी रहे। |
| 3 | न्यायमूर्ति श्री मोहनलाल जोशी | 1979 – 1982 | |
| 4 | न्यायमूर्ति श्री के.एस. सिद्ध | 1984 – 1985 | कार्यवाहक लोकायुक्त |
| 5 | न्यायमूर्ति श्री मोहनलाल श्रीमाल | 1985 – 1990 | |
| 6 | न्यायमूर्ति श्री पुरुषोत्तम दास कुदाल | 1990 – 1990 | न्यूनतम कार्यकाल |
| 7 | न्यायमूर्ति श्री महेन्द्र भूषण शर्मा | 1990 – 1993 | सर्वाधिक लम्बे कार्यकाल वाले कार्यवाहक लोकायुक्त |
| 8 | न्यायमूर्ति श्री वीनोद शंकर दवे | 1994 – 1994 | न्यूनतम कार्यकाल वाले कार्यवाहक लोकायुक्त |
| 9 | न्यायमूर्ति श्री महेन्द्र भूषण शर्मा | 1994 – 1999 | |
| 10 | न्यायमूर्ति श्री मिलापचंद्र जैन | 1999 – 2004 | |
| 11 | न्यायमूर्ति श्री जी.एल. गुप्ता | 2007 – 2012 | राजस्थान के कार्यवाहक राज्यपाल भी रहे। |
| 12 | न्यायमूर्ति श्री एस.एस. कोठारी | 2013 – 2019 | सर्वाधिक कार्यकाल |
| 13 | न्यायूर्ति श्री प्रताप कृष्ण लोहरा | 2021 – वर्तमान |
उप-लोकायुक्त
- श्री के.पी.यू- मेनन (पूर्व मुख्य सचिव) 05.06.1973 – 25.06.1974. (एकमात्र)
- प्रथम उपलोकायुक्त
लोकायुक्त सचिव
- प्रथम सचिव: के.वी. शंकरन (IAS) – (20.09.1973 से 04.01.1974)।
- न्यायिक सेवा से प्रथम सचिव: ए.के. सिंह (04.05.1984)। इनके बाद के सभी सचिव राजस्थान उच्च न्यायालय न्यायिक सेवा से ही रहे हैं।
- न्यूनतम कार्यकाल वाले सचिव: परमेश चन्द्र (IAS)।
- अधिकतम कार्यकाल वाले सचिव: हरबन्स लाल (RHJS)।
- वर्तमान सचिव – गौरी शंकर शर्मा
