राजस्व मंडल राजस्थान राज्य की राजस्व न्यायिक व्यवस्था का सर्वोच्च निकाय है, जिसका अध्ययन राजस्थान राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत किया जाता है। यह भूमि राजस्व से संबंधित अपीलों, पुनर्विचार याचिकाओं तथा विवादों का निपटारा करता है। राज्य में राजस्व प्रशासन की दक्षता, पारदर्शिता और विधिक नियंत्रण सुनिश्चित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
राजस्व मण्डल की स्थापना एवं वैधानिक स्वरूप
- स्थापना: संयुक्त राजस्थान के निर्माण के बाद महामहिम राजप्रमुख द्वारा 7 अप्रैल, 1949 को अध्यादेश संख्या 22, 1949 के माध्यम से स्थापना की गई।
- प्रवर्तन तिथि: यह अध्यादेश 1 नवंबर, 1949 को लागू हुआ।
- विलय: इसने बीकानेर, जयपुर, जोधपुर, मत्स्य और पूर्व राजस्थान के पूर्ववर्ती राजस्व मण्डलों का स्थान ले लिया।
- अधिकारिता: यह राजस्व मामलों में अपील, पुनरीक्षण (Revision) और सन्दर्भ (Reference) का राज्य में ‘उच्चतम न्यायालय’ बन गया।
- 1956 में राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 लागू हुआ, जिसने इस अध्यादेश का स्थान लिया।
- राजस्व मण्डल राज्य का उच्चतम राजस्व न्यायालय है।
- राजस्थान का राजस्व मण्डल अजमेर में स्थित है।
- इसमें कम से कम 5 सदस्य होते हैं।
- राजस्व मामलों में प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार, सहायक जिलाधीश का होता है।
- सहायक जिलाधीश के निर्णयों के विरूद्ध राजस्व अपीलीय प्राधिकरण में अपील की जा सकती है
रियासतों में राजस्व मण्डलों की शुरुआत
- स्वतंत्रता से पूर्व ही कुछ रियासतों ने प्रशासनिक सुधार हेतु मण्डल गठित किए थे:
- बीकानेर: 1909 में राजस्व मण्डल गठित।
- जयपुर: 1942 में राजस्व मण्डल गठित।
- कार्य: भू-राजस्व के अलावा सीमा शुल्क, आबकारी, नाबालिग-संरक्षण और पंजीकरण जैसे कार्य भी इनके पास थे।
- जयपुर का मण्डल अंतिम अपीलीय न्यायालय के रूप में भी कार्य करता था।
भूमिका:
- राजस्व मामलों के शीर्षस्थ न्यायालय के रूप में कार्यरत।
- अपील, निगरानी, संदर्भ (रेफरेंस) के शीर्ष न्यायालय के रूप में काम करता है।
- राजस्व मंडल एक अर्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) संस्था है जो राजस्व से संबंधित मामलों में अंतिम अपील और पुनर्विलोकन (Revision) की सुनवाई करती है।
राजस्थान के प्रमुख राजस्व एवं भूमि सुधार अधिनियम
| क्र.सं. | अधिनियम का नाम | वर्ष | विशेष विवरण/महत्व |
| 1. | राजस्थान काश्तकारी अधिनियम | 1955 | काश्तकारों के अधिकारों और भूमि जोत से संबंधित मुख्य कानून। |
| 2. | राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम | 1956 | भू-राजस्व प्रशासन, रिकॉर्ड और मण्डल के गठन हेतु। |
| 3. | कृषि भूमि उपयोगिता अधिनियम | 1956 | कृषि भूमि के उचित उपयोग को सुनिश्चित करने हेतु। |
| 4. | राजस्थान राजगामी संपत्ति नियमन अधिनियम | 1956 | बिना उत्तराधिकारी वाली संपत्ति (Escheats) के प्रबंधन हेतु। |
| 5. | राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम | 1952/1959 | जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन और भूमि के पुन अधिग्रहण हेतु। |
| 6. | राजस्थान पब्लिक मांग वसूली अधिनियम | 1952 | सरकारी बकाया (Dues) की वसूली की प्रक्रिया हेतु। |
| 7. | राजस्थान जमींदारी एवं बिस्वेदारी उन्मूलन अधिनियम | 1959 | जमींदारी और बिस्वेदारी प्रथा को समाप्त करने हेतु। |
| 8. | राजस्थान भू-सुधार एवं भू-स्वामी संपदा अवाप्ति अधिनियम | 1963 | बड़े भू-स्वामियों की संपदा के अधिग्रहण हेतु। |
| 9. | राजस्थान उपनिवेशन अधिनियम | 1954/1971 | सिंचित क्षेत्रों (जैसे IGNP) में भूमि आवंटन और बसावट हेतु। |
| 10. | जयपुर मातमी नियम | 1945 | जयपुर रियासत के उत्तराधिकार (Matmi) से संबंधित पुराने नियम। |
| 11. | भारतीय निखात निधि (ट्रेजर ट्रोव) अधिनियम | 1878 | जमीन में दबे हुए खजाने या प्राचीन वस्तुओं से संबंधित कानून। |
राजस्व मंडल का प्रशासनिक ढाँचा

राजस्व मंडल की शक्तियाँ:
- विभिन्न अधिनियमों में राज्य सरकार को प्रदत्त शक्तियों का हस्तांतरण।
- राजस्व मामलों में निर्णय लेने के साथ-साथ इन शक्तियों का क्रियान्वयन।
प्रशासनिक कार्य:
- भू-अभिलेखों का संधारण एवं पर्यवेक्षण, जो न्यायिक नहीं बल्कि प्रशासनिक कार्य है।
- राज्य सरकार की ओर से प्रतिनिधित्व करते हुए राजस्व मामलों में सक्रिय भूमिका निभाता है।
प्रमुख कार्य:
- अपील: निचली अदालतों द्वारा दिए गए निर्णयों के खिलाफ अपील की सुनवाई।
- निगरानी: अधीनस्थ न्यायालयों के कार्यों की निगरानी।
- रेफरेंस: संदर्भित मामलों का निपटारा।
अधीनस्थ राजस्व न्यायालय
- राजस्व मण्डल के अधीनस्थ निम्नांकित न्यायालय हैं:-
- संभागीय आयुक्त -7
- जिला कलक्टर
- अतिरिक्त जिला कलक्टर
- राजस्व अपील प्राधिकारी
- भू-प्रबन्ध पदेन राजस्व अपील प्राधिकारी
- उपखण्ड अधिकारी
- सहायक कलक्टर
- तहसीलदार
पटवारी
- पटवारी प्रणाली की शुरुआत शेरशाह सूरी के काल में हुई थी।
- इस प्रणाली को बाद में मुगल सम्राट अकबर और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भी जारी रखा।
- 1814 में, पटवारी का मुख्य कार्य ग्राम अभिलेखों को संरक्षित करना और महत्वपूर्ण जानकारी, जैसे गाँव के मुखिया और अन्य प्रमुख व्यक्तियों के बारे में जानकारी एकत्र करना था।
- मुख्य कार्य:
- भूमि रिकॉर्ड का रखरखाव:
- फसल रिकॉर्ड का रखरखाव:
- म्यूटेशन रिकॉर्डिंग: जब भी भूमि का स्वामित्व बदलता है (उदाहरण के लिए बिक्री या उत्तराधिकार के मामले में), पटवारी म्यूटेशन (स्वामित्व का हस्तांतरण) को रिकॉर्ड करता है।
- सांख्यिकीय रिटर्न की तैयारी:
- भू-अभिलेख सम्बन्धी
- पंचायतीराज संस्थाओं से सम्बन्धित कार्य
- आपातकालीन सहायता
- नोट : करों व फीस संबंधी कार्यवाही ग्राम सेवक का कार्य है
तहसीलदार की भूमिका :
- भू-राजस्व
- भू-अभिलेख
- उप-राजकोष
- पंजीयन
- राजस्व सम्बन्धी झगड़ें
- राशनिंग
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम
- इस अधिनियम को राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 कहा जाएगा।
- इसका विस्तार पूरे राजस्थान राज्य में होगा।
- यह उस तिथि से प्रभावी होगा जिसे राज्य सरकार राजकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट करेगी।
- यह अधिनियम 15 अक्टूबर 1955 से लागू हुआ।
- आबू, अजमेर और सुनेल क्षेत्र के लिए यह 15 जून 1958 से लागू हुआ।
धारा 5: परिभाषाएँ
- कृषि वर्ष: कृषि वर्ष 1 जुलाई से शुरू होकर 30 जून को समाप्त होने वाले वर्ष को कहा जाएगा।
- कृषि: कृषि में उद्यान कार्य (बागवानी), पशुपालन, दुग्धपालन, कुक्कुट पालन और वन विकास सम्मिलित होगा।
- काश्तकार: काश्तकार वह व्यक्ति होगा जो कृषि कार्य स्वयं, अपने आप या अपने परिवार के सदस्यों अथवा नौकरों या सहायकों द्वारा करता है और यह खेती उसकी जीविका का प्रमुख साधन होती है।
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 (अधिनियम संख्या 15) :
- इसे “राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956” कहा जाता है, जो सम्पूर्ण राजस्थान राज्य पर लागू होता है।
- इस अधिनियम के उपबंध राजस्थान भूमि सुधार और जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम, 1952 और अजमेर मध्यस्थ उन्मूलन अधिनियम, 1955 जैसे अन्य महत्वपूर्ण कानूनों को प्रभावित नहीं करते।
- एक व्यापक अधिनियम है, जो राजस्थान राज्य में भूमि से संबंधित कानूनों को समेकित और संशोधित करने के उद्देश्य से बनाया गया है। इस अधिनियम में राजस्व न्यायालयों, राजस्व अधिकारियों, और ग्राम सेवकों की नियुक्ति, उनके कर्तव्य और शक्तियों के बारे में विस्तार से प्रावधान किया गया है। इसके अलावा, भूमि अभिलेख, मानचित्रों की तैयारी और रखरखाव, राजस्व और किराया निर्धारण, संपदाओं का विभाजन, और राजस्व संग्रह की प्रक्रिया को भी निर्धारित किया गया है।
मुख्य बिंदु:
- राजस्थान राज्य के लिए एक राजस्व बोर्ड की स्थापना की गई है। इसमें अध्यक्ष और अधिकतम 20 सदस्य हो सकते हैं। बोर्ड अपील, पुनरीक्षण और संदर्भ के मामलों का निपटारा करता है।
- राज्य में राजस्व और सामान्य प्रशासन के लिए मण्डल, जिले, उप-तहसीलें बनाई गई हैं। राज्य सरकार इन प्रभागों की सीमाएं और उनके प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र निर्धारित करती है।
- संभागीय आयुक्त, कलेक्टर, तहसीलदार, और अन्य राजस्व अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है, जो भूमि और राजस्व से संबंधित कार्यों को नियंत्रित करते हैं। इनके कार्यकाल, अधिकार क्षेत्र, और शक्तियों का भी अधिनियम में उल्लेख किया गया है।
- राजस्व न्यायालय और अधिकारी राजस्व से संबंधित सभी न्यायिक और प्रशासनिक मामलों का निपटारा करते हैं। न्यायालय की संरचना और कार्य विधियों का निर्धारण अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार किया जाता है।
- राज्य में भूमि अभिलेखों का रखरखाव एक प्रमुख कार्य है, जो कलेक्टर और भूमि अभिलेख निदेशक द्वारा किया जाता है। भूमि से जुड़े विवादों का निपटारा और भूमि सुधार संबंधी कार्यवाही भी इस अधिनियम के दायरे में आती है।
- भूमि के राजस्व का निपटारा, संपदाओं का विभाजन, और राजस्व की दरें निर्धारित करने के प्रावधान भी इस अधिनियम में किए गए हैं।
- बोर्ड और अन्य राजस्व न्यायालयों के निर्णयों के खिलाफ अपील करने की प्रक्रिया और अपील न्यायालय की शक्तियां भी इस अधिनियम में शामिल हैं।
