राज्यपाल की भूमिका : शक्ति, कार्य, संबंधित विवाद, समितियां राजस्थान राजनीतिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो राज्य स्तर पर संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करता है। राज्यपाल की शक्तियाँ मुख्यतः कार्यपालिका, विधायिका और कुछ न्यायिक कार्यों से जुड़ी होती हैं, जिनका उद्देश्य संविधान के सुचारु संचालन को सुनिश्चित करना है। हालांकि, समय-समय पर उनकी भूमिका को लेकर विभिन्न विवाद और समितियों की सिफारिशें भी चर्चा का विषय रही हैं।
राज्यपाल की शक्तियाँ एवं कार्य
- राज्यपाल को कार्यकारी, विधायी, वित्तीय और न्यायिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। परन्तु राष्ट्रपति के समान उसे कूटनीतिक, सैन्य व आपातकालीन शक्तियाँ प्राप्त नहीं होती हैं।
- अनुच्छेद 163 के अन्तर्गत राज्यपाल की शक्तियों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है –
- वे शक्तियां जिनका प्रयोग वह मुख्यमंत्री ( अथवा मंत्रिपरिषद) की सलाह से करता है।
- वे शक्तियां जिनका प्रयोग वह स्वविवेक के आधार पर करता है।
राज्यपाल की शक्तियों का अध्ययन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है –
राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तियाँ
- अनुच्छेद – 154 – राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा।
- अनुच्छेद – 166 –
- किसी राज्य की सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्यवाही राज्यपाल के नाम से की जाती है।
- राज्यपाल द्वारा बनाए गये नियमों के तहत प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य राज्यपाल के द्वारा ही किया हुआ माना जाता है।
- राज्य की सरकार के सुचारू रूप से संचालन के लिए तथा मंत्रियों में कार्य वितरण के लिए राज्यपाल को नियमों का निर्माण करने का अधिकार है।
- मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा करना मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है।
- अनुच्छेद 166 (1) व (2) में दिये गये प्रावधानों का स्वरूप निदेशात्मक है, आदेशात्मक नहीं। अर्थात् यदि कोई आदेश इन उपबंधों का उल्लंघन करता है तो वह केवल इस आधार पर अवैध नहीं होगा कि राज्यपाल द्वारा व्यक्तिगत रूप से हस्ताक्षरित नहीं किया गया है। ऐसे विवादों में केवल इतना साबित करना उपयुक्त होगा कि अनुच्छेद 166(3) के अन्तर्गत ऐसा आदेश उचित अधिकार द्वारा पारित किये गये थे।
- उपर्युक्त उपबंधों के अधीन राज्यपाल द्वारा राजस्थान सरकार के कार्य विधि नियम ( Rule of business ) का निर्माण किया है । इनके तहत कुछ मामलों में आदेश जारी करने से पूर्व मुख्यमंत्री के साथ-साथ राज्यपाल के सम्मुख भी प्रस्तुत करना आवश्यक है-
निम्नलिखित वर्गों के मामले, आदेश दिये जाने के पूर्व, राज्यपाल को भी प्रस्तुत किये जायेंगे –
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसरण में किसी दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने के लिए अथवा किसी दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण के लिए प्रस्ताव
- (i) सरकार द्वारा नियुक्त किसी अधिकारी को पदच्युत करने, हटाने या अनिवार्य सेवानिवृत्त करने के लिए कोई प्रस्ताव।
- (ii) जब कोई पुनर्विलोकन याचिका अस्वीकृत किये जाने के लिए प्रस्तावित हो और वह राज्यपाल को प्रस्तुत किये जाने के पश्चात जारी किये गये आदेश के विरुद्ध हो।
- ऐसे मामले, जो मृत्युदंड प्राप्त व्यक्तियों द्वारा या उनकी ओर से दया याचिका से संबंधित है।
- राज्यपाल के कार्मिक स्थापन और राज भवन से संबंधित मामले।
- राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य की नियुक्ति के लिए प्रस्ताव।
- महाधिवक्ता को देय वेतन को निर्धारित करने या उसमें परिवर्तन करने के प्रस्ताव।
- विधानमण्डल के सत्र का आह्वान तथा सत्रावसान, विधानसभा विघटित करने, विधान मण्डल के निर्वाचनों में मतदाताओं की निरहताओं को हटाने, विधान मण्डल के निर्वाचन की तारीखें नियत करने तथा अन्य संसक्त विषयों से संबंधित समस्त मामले।
- संसद के या राज्य विधान मण्डल के अधिनियमों को अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू किये जाने और उन क्षेत्रों में शांति तथा सुशासन के लिए विनिमय बनाये जाने से संबंधित समस्त मामले।
- प्रशासनिक महत्त्व का कोई भी अन्य मामला जिसे मुख्य सचिव या मुख्यमंत्री आवश्यक समझे ।
- अनुच्छेद 164 के तहत छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड और उड़ीसा में राज्यपाल जनजाति कल्याण मंत्री की नियुक्ति करता है।
- नोट- 94 संविधान संशोधन अधिनियम 2006 में छत्तीसगढ़ तथा झारखंड को जोड़ा गया ।
- एस.आर. बोम्बई बनाम कर्नाटक राज्य (1994) के मामले में यह निर्णय दिया गया था कि बहुमत का निर्णय राजभवन में नहीं होकर विधानसभा भवन में होना चाहिए।
- संविधान के अनुच्छेद 244 के अन्तर्गत ‘विशेष क्षेत्र’ घोषित जनजातियों के प्रशासन एवं विकास योजनाओं के क्रम में संबंधित राज्य के राज्यपाल के पास कतिपय विशिष्ट शक्तियाँ होती हैं।
- वह राज्य के लेखों से संबंधित राज्य वित्त आयोग, राज्य लोक सेवा आयोग और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट को राज्य विधानसभा के सामने प्रस्तुत करता है।
राज्यपाल की नियुक्ति संबंधी शक्तियाँ
|
क्षेत्र / पद |
संबंधित अनुच्छेद |
मुख्य विवरण |
|
मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद |
अनुच्छेद 164(1) |
|
|
महाधिवक्ता (Advocate General) |
अनुच्छेद 165 |
|
|
राज्य निर्वाचन आयुक्त |
243K, 243ZA |
|
|
राज्य वित्त आयोग |
243I, 243Y |
|
|
राज्य लोक सेवा आयोग (RPSC) |
अनुच्छेद 316 |
|
|
विभिन्न राज्य आयोग |
– |
|
|
विश्वविद्यालय |
– |
|
|
जिला न्यायाधीश |
अनुच्छेद 233 |
|
|
विधानसभा पद रिक्तता |
– |
|
|
उच्च न्यायालय न्यायाधीश |
– |
|
|
रेडक्रॉस सोसाइटी का चेयरमैन। |
– |
भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी
- 1920 से भारतीय रेड क्रॉस देश भर में फैली अपनी 700 शाखाओं के माध्यम से मानवीय सेवाएं प्रदान करके भारत में काम कर रहा है ।
- यह दुनिया के बड़े स्वतंत्र मानवतावादी संगठन, अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस और रेड क्रॉस आंदोलन का एक अग्रणी सदस्य है ।
- विश्व रेड क्रॉस दिवस – 8 मई इसके संस्थापक ‘जीन हेनरी ड्यूनेंट’ जिनका जन्म इसी दिन 1828 में हुआ था ।
रेड क्रोस सोसाइटी राजस्थान
- 1951 में स्थापना राजस्थान के माननीय राज्यपाल राजस्थान राज्य शाखा के President हैं ।
- माननीय मुख्यमंत्री Vice- President हैं;
- माननीय स्वास्थ्य मंत्री इसके Chairman हैं । राजस्थान राज्य शाखा की 33 जिला शाखाएँ हैं ।
राज्यपाल राज्य में स्थित पश्चिमी क्षेत्रीय सांस्कृतिक विकास केंद्र (उदयपुर) का अध्यक्ष होता है ।
पश्चिमी क्षेत्रीय सांस्कृतिक विकास केंद्र (WZCC)
- उदयपुर – स्थापना- 1985-1987 में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना।
- उद्देश्य: भारत के शहरी, ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की विभिन्न कलाओं को बढ़ावा देना, विकसित करना और उन्हें आपस में जोड़ना।
- कार्य क्षेत्र: राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और गोवा।शिल्पग्राम (एक शिल्प गांव): WZCC द्वारा 1989 में स्थापित।
- शिल्पग्राम उत्सव: प्रत्येक वर्ष दिसंबर के अंतिम सप्ताह में आयोजित।
- मुख्यालय: बागोर-की-हवेली, उदयपुर।शिल्पग्राम स्थापित करने वाला भारत का पहला क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र।
राज्यपाल राज्य में स्थित सैनिक कल्याण बोर्ड का संरक्षक होता है ।
राज्य सैनिक बोर्ड
- पूर्व सैन्य कर्मियों के हितलाभों के प्रबंधन के लिए यह समिति कार्यरत है।अध्यक्ष : राज्यपालराज्य सैनिक बोर्ड का निदेशक पदेन सदस्य सचिव होता है।सैनिक कल्याण निदेशालय राजस्थान सरकार के सैनिक कल्याण विभाग के अधीन एक स्थायी कार्यालय है।24 जिला सैनिक कल्याण कार्यालय संचालित।
राज्यपाल, अरावली प्रबंध बोर्ड का संरक्षक होता है ।
राज्यपाल, राजस्थान राज्य भारत स्काउट एवं गाइड के संरक्षक है ।
राजस्थान राज्य भारत स्काउट एवं गाइड
- भारत स्काउट्स एंड गाइड्स सोसायटी, पंजीकरण अधिनियम XXI 1860 के तहत पंजीकृत संगठन है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
- बीसवीं सदी के दूसरे दशक से राजस्थान में स्काउट/गाइड आंदोलन सक्रिय है।
- औपनिवेशिक काल में जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, भरतपुर, अलवर, और अजमेर में इसकी इकाइयाँ स्थापित हुईं।
- 7 नवंबर 1950 को भारत स्काउट्स और गाइड्स के विलय के साथ, “राजस्थान राज्य भारत स्काउट्स और गाइड्स” का गठन किया गया।
पदाधिकारियों के पदच्युति संबंधी शक्तियाँ
निम्नलिखित पद राज्यपाल के प्रसाद पर्यन्त होते हैं-
- राज्य सरकार के मंत्री
- महाधिवक्ता
अर्थात् इन्हें किसी भी समय बिना किसी प्रक्रिया के और बिना कोई कारण बताये राज्यपाल द्वारा पद से हटाया जा सकता है।
विधायी शक्तियां –
- अनुच्छेद 168 के अंतर्गत राज्यपाल राज्य विधानमंडल का अभिन्न अंग होता है अर्थात् विधानमंडल का गठन राज्यपाल, विधानसभा तथा विधान परिषद से मिलकर होता है।
- राज्य के विधान मण्डल के सत्र, सत्रावसन और विघटन करना – अनुच्छेद 174
- अनुच्छेद 174 (1) – समय समय पर ऐसे समय और स्थान पर जो वह ठीक समझे सत्र आहूत करना, एक सत्र की अंतिम बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के लिए नियत तारीख़ के बीच 6 माह का अंतर नहीं होगा।
- अनुच्छेद 174 (2) – सत्रावसान करना तथा विधानसभा का विघटन करना
- नोट :- विधानसभा अध्यक्ष को विधानसभा स्थगित करने का अधिकार है।
- विधानमण्डल को संदेश भेजना – अनुच्छेद 175 के अंतर्गत राज्यपाल को विधानमण्डल में संदेश (विधानमंडल में लंबित किसी विधेयक के संबध में या कोई अन्य सन्देश) भेजने तथा अभिभाषण जारी करने का अधिकार प्राप्त है।
- आरम्भिक अभिभाषण देना – अनुच्छेद 176 के अंतर्गत राज्यपाल हर वर्ष विधानमंडल के प्रथम सत्र के आरम्भ में तथा विधानसभा के साधारण निर्वाचन के पश्चात् प्रथम सत्र के आरम्भ में विशेष अभिभाषण देता है तथा विधानमण्डल को उसके आह्वान के कारण बताता है।
- विधायकों की अयोग्यता संबंधी विवाद पर निर्णय – अनुच्छेद 192 के अन्तर्गत राज्यपाल राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग के परामर्श से राज्य विधानमण्डल के किसी भी सदस्य की अयोग्यता का निर्धारण करता है तथा राज्यपाल का विनिश्चय अन्तिम होता है पर इस संबंध में उसको राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग की सलाह माननी होती है।
- सदस्यों का मनोनयन – अनुच्छेद 171 के अन्तर्गत राज्यपाल राज्य विधानपरिषद् में उसकी कुल सदस्य संख्या के 1/6 सदस्यों को मनोनीत करता है जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन तथा समाजसेवा का विशेष ज्ञान अथवा अनुभव हो।
- नोट : 26 जनवरी, 2020 से पूर्व अनुच्छेद 333 के अन्तर्गत यदि राज्यपाल को ऐसा प्रतीत होता कि राज्य विधानसभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह आंग्लभारतीय समुदाय के एक व्यक्ति को राज्य विधानसभा में मनोनीत कर सकता है। 104वें संविधान संशोधन द्वारा इस प्रावधान को निष्प्रभावी कर दिया गया है । राजस्थान में एक बार भी आंग्ल भारतीय सदस्य विधानसभा में मनोनीत नहीं हुआ है।
- अनुच्छेद 180. विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त हो तब राज्यपाल द्वारा किसी सदस्य को अध्यक्ष पद के कर्तव्यो का पालन करने के लिए नियुक्त करना
- जब विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त हो तब राज्यपाल, विधानसभा के किसी सदस्य को अध्यक्ष पद के कर्तव्यो का पालन करने के लिए नियुक्त कर सकता है ।
- विधान सभा की किसी बैठक से अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा व्यक्ति, जो विधान सभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए, या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है तो ऐसा अन्य व्यक्ति, जो विधान सभा द्वारा अवधारित किया जाए, अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा ।
- अनुच्छेद 188. सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
- किसी राज्य की विधान सभा या विधान परिषद का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पूर्व राज्यपाल या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा।
- राज्यपाल, विधानसभा के वरिष्ठतम सदस्यों में से किसी एक को शपथ दिलाकर प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करते हैं। प्रोटेम स्पीकर राज्यपाल के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं। प्रोटेम स्पीकर विधानसभा के अन्य सदस्यों को शपथ ग्रहण कराते हैं।
- विधानमण्डल द्वारा पारित विधेयक पर राज्यपाल की स्वीकृति – अनुच्छेद-200 के अन्तर्गत राज्य विधानमण्डल द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल की अनुमति के बाद ही कानून बनता है ।
- जब कोई विधेयक विधानमण्डल द्वारा पारित होने के बाद राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तो राज्यपाल के पास विधेयक के सम्बन्ध में चार विकल्प होते हैं :
- (i) वह विधेयक पर स्वीकृति प्रदान कर सकता है।
- (ii) वह विधेयक पर स्वीकृति को रोके रख सकता है। (इसे ‘आत्यंतिक वीटो’ कहा जाता है ।)
- (iii) वह विधेयक को (धन विधेयक को छोड़कर ) सदन के समक्ष पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है। (इसे निलम्बनकारी वीटो कहते है)
- (iv) वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है।
- जब कोई विधेयक विधानमण्डल द्वारा पारित होने के बाद राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तो राज्यपाल के पास विधेयक के सम्बन्ध में चार विकल्प होते हैं :
नोट:
- वह धन विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है।
- राज्यपाल धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु नहीं लौटा सकता क्योंकि राज्यपाल की पूर्व अनुमति के बाद ही धन विधेयक को विधान सभा में रखा जाता है । (पुरःस्थापित किया जाता है)
- आत्यंतिक वीटो का प्रयोग गैर-सरकारी विधेयकों पर किया जाता है ।
- पॉकेट वीटो केवल राष्ट्रपति के पास है, राज्यपाल के पास नहीं होता ।
- जब कोई साधारण विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा जाता है तो राष्ट्रपति के पास तीन विकल्प होते हैं-
- (i) वह विधेयक को स्वीकृति दे सकता है जिसके बाद वह अधिनियम बन जाएगा,
- (ii) वह विधेयक को अपनी स्वीकृति रोक सकता है, फिर विधेयक खत्म हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पाएगा,
- (iii) वह विधेयक को राज्य विधानपरिषद के सदन या सदनों के पास पुनर्विचार के लिए भेज सकता है। सदन द्वारा छह महीने के भीतर इस पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। यदि विधेयक को कुछ सुधार या बिना सुधार के राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए दोबारा भेजा जाए तो राष्ट्रपति इसे स्वीकृति देने के लिए बाध्य नहीं है; वह स्वीकृत कर भी सकता है और नहीं भी।
- जब कोई वित्त विधेयक किसी राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को विचारार्थ भेजा जाता है तो राष्ट्रपति के पास दो विकल्प होते हैं–
- (i) वह विधेयक को अपनी स्वीकृति दे सकता है, ताकि विधेयक अधिनियम बन सके,
- (ii) वह उसे अपनी स्वीकृति रोक सकता है। तब विधेयक खत्म हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पाएगा। इस प्रकार राष्ट्रपति वित्त विधेयक को राज्य विधान सभा के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता।
- जब कोई वित्त विधेयक किसी राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को विचारार्थ भेजा जाता है तो राष्ट्रपति के पास दो विकल्प होते हैं–
- अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल के लिए स्वीकृति देने हेतु कोई समय अवधि निर्धारित नहीं है।
- राज्यपाल द्वारा पुनर्विचार के लिए लौटाये गये विधेयक को विधानमंडल द्वारा पारित कर दिये जाने पर राज्यपाल उसे स्वीकृति देने हेतु बाध्य है।
- राज्यपाल जब किसी विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए आरक्षित रखता है तो उसके बाद उस विधेयक पर राज्यपाल की भूमिका समाप्त हो जाती है अर्थात अब उस पर राज्यपाल की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं रहती है ।
- अनुच्छेद 200 से यह स्पष्ट होता है कि राज्यपाल अपने स्वविवेक से किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेज सकता है लेकिन अनुच्छेद 200 में यह भी स्पष्ट उल्लेखित है कि उच्च न्यायालय की शक्तियों को प्रभावित करने वाला विधेयक अनिवार्य रूप से राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के पास स्वीकृति हेतु भेजा जाएगा।
- अनुच्छेद 201 में इस प्रकार के विधेयकों पर राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति दिये जाने का उल्लेख है। राष्ट्रपति इन्हें –
- (i) स्वीकृति दे सकते है।
- (ii) स्वीकृति को रोक सकता है।
- (iii) पुनर्विचार हेतु भेज सकते हैं।
- अनुच्छेद 201 में यह स्पष्ट उललेखित है कि इस प्रकार के विधेयकों को पुनर्विचार हेतु भेजे जाने पर राज्यपाल उसे 6 माह के भीतर विधानमण्डल से पारित करवाकर पुनः राष्ट्रपति को भेजते हैं। पुनर्विचार के उपरांत पुन: लौटकर आए विधेयक पर स्वीकृति देने हेतु राष्ट्रपति बाध्य नहीं है।
- राष्ट्रपति इस संदर्भ में सभी निर्णय केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् की परामर्श से लेते हैं।
राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति की मंजूरी हेतु भेजे जाने वाले विधेयक:
- ऐसा कोई विधेयक जो उच्च न्यायालय की शक्तियों को कम करता हो।ऐसा विधेयक जो संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) के विरुद्ध हो।
- ऐसा विधेयक जो संपत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण या नियंत्रण से संबंधित हो और अनुच्छेद 31(C) के तहत आता हो।
- ऐसा विधेयक जो राष्ट्रीय महत्व का हो।ऐसा कोई विधेयक जो संविधान के किसी भी प्रावधान के विपरीत हो।ऐसा कोई विधेयक जो देश के व्यापक या राष्ट्रीय हित के विरुद्ध हो।
- वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) के दौरान राज्य विधानमंडल द्वारा पारित धन विधेयक (Money Bill)।
- अध्यादेश जारी करना (अनु. 213)
- (i) जब विधानमण्डल का सत्र न चल रहा हो तब किसी कानून की अति आवश्यकता होने की स्थिति में राज्यपाल उन्हीं विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है जिन विषयों पर राज्य विधानमंडल कानून (राज्यसूची और समवर्ती सूची )बना सकता है।
- (ii) राज्यपाल, अध्यादेश राष्ट्रपति/राज्य मंत्रिपरिषद् की सलाह से जारी करता है अर्थात यह राज्यपाल की स्वविवेकीय शक्ति नहीं है ।
- (iii) ऐसा अध्यादेश न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा।
- (iv) राज्यपाल द्वारा इसे किसी भी समय वापस लिया जा सकता है।
- (v) ऐसा अध्यादेश नये सत्र के शुरू होने से 6 सप्ताह की अवधि तक प्रभावी रहता है।
- (vi) राज्य विधानमण्डल इस अवधि से पूर्व भी इस अध्यादेश को समाप्त कर सकती है।
- अनुच्छेद 191 में राज्य विधान मंडल के सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने के आधारों का उल्लेख हैं ।
- अनुच्छेद 192 में यह स्पष्ट लिखित हैं कि राज्यपाल चुनाव आयोग की राय से राज्य विधान मंडल के सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने के संदर्भ में निर्णय करेगा । राज्यपाल को यह राय माननी होती हैं ।
- राज्यपाल की सिफारिश के बिना राज्य विधानसभा में धन विधेयक को पेश नहीं किया जा सकता अर्थात् धन विधेयक राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति से ही केवल विधानसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- राज्यपाल राज्य के वित्त मंत्री के माध्यम से राज्य विधानसभा में राज्य का वार्षिक बजट पेश करता है।
- राज्य की आकस्मिक निधि से व्यय राज्यपाल की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता।
- किसी प्रकार के अनुदान की माँग को या करों के प्रस्ताव को राज्यपाल के अनुमोदन से विधानसभा में पेश किया जाता है।
- पंचायतों व नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थितियों की समीक्षा के लिए वह प्रत्येक पाँच वर्ष पर राज्य वित्त आयोग का गठन करता है।
- वह धन विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है। इस तरह राज्यपाल धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए राज्य विधानसभा को वापस नहीं कर सकता है।
- वह राज्य के लेखों से संबंधित राज्य वित्त आयोग, राज्य लोक सेवा आयोग और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक आदि की रिपोर्ट को राज्य विधानसभा के सामने प्रस्तुत करता है ।
वित्तीय शक्तियाँ
- धन विधेयक पर राज्यपाल की स्वीकृति: अनुच्छेद 200 के अनुसार, राज्यपाल के पास धन विधेयक पर स्वीकृति देने, उसे रोकने या राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखने का अधिकार है। धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु विधानमंडल को वापस नहीं भेजा जा सकता। धन विधेयक राज्यपाल की पूर्व अनुमति से ही पेश किये जा सकते हैं।
- अनुदान की मांग पर राज्यपाल की संस्तुति (अनुच्छेद 205): अनुदान की किसी भी मांग को राज्यपाल की संस्तुति के बिना विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
- राज्य की आकस्मिक निधि (अनुच्छेद 267) राज्य की आकस्मिक निधि राज्यपाल के अधीन होती है। हालांकि, यह राज्यपाल का स्वविवेक नहीं है; मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही इस निधि से धन खर्च किया जाता है।
- वार्षिक वित्तीय विवरण (अनुच्छेद 202): राज्यपाल प्रत्येक वित्तीय वर्ष में वित्त मंत्री को विधानमंडल के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत करने के लिए निर्देशित करते हैं।
- राज्य वित्त आयोग का गठन (अनुच्छेद 243I तथा 243Y): पंचायतों व नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थितियों की समीक्षा हेतु राज्यपाल प्रति पाँच वर्ष में राज्य वित्त आयोग का गठन करता है।
- ऐसा कोई विधेयक, जो राज्य की संचित निधि से धन खर्च करने की व्यवस्था करता है, राज्यपाल की स्वीकृति के बिना पारित नहीं किया जा सकता।
- नोट – संचित निधि पर नियंत्रण विधानमंडल का होता है
न्यायिक शक्ति
- क्षमादान की शक्ति (अनु. 161)- राज्यपाल को क्षमादान की इस शक्ति के अन्तर्गत पाँच प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त है-
- क्षमा – इसमें दण्ड और बंदीकरण दोनों को हटा दिया जाता है तथा दोषी की सभी दण्ड, दण्डादेशों और निर्रहताओं से पूर्णतः मुक्त कर दिया जाता है।
- लघुकरण – इसका अर्थ है कि दंड के स्वरूप को बदलकर कम करना। उदाहरणार्थ मृत्युदंड का लघुकरण कर कठोर कारावास में परिवर्तित करना,जिसे साधारण कारावास में परिवर्तित किया जा सकता है।
- परिहार – इसका अर्थ है, दंड की प्रकृति में परिवर्तन किए बिना उसकी अवधि कम करना। उदाहरण के लिए दो वर्ष के कठोर कारावास को एक वर्ष के कठोर कारावास में परिहार करना।
- विराम – इसका अर्थ है किसी दोषी को मूल रूप में दी गई सजा को किन्हीं विशेष परिस्थिति में कम करना, जैसे- शारीरिक अपंगता अथवा महिलाओं को गर्भावस्था की अवधि के कारण
- प्रविलंबन – इसका अर्थ है किसी दंड (विशेषकर मृत्यु दंड) पर अस्थायी रोक लगाना। इसका उद्देश्य है कि दोषी व्यक्ति को क्षमा याचना अथवा दंड के स्वरूप परिवर्तन की याचना के लिए समय देना।
- नोट :
- यह राज्यपाल का स्वविवेक नहीं है वह मंत्रिपरिषद की सलाह पर इस संदर्भ में निर्णय लेते हैं
क्षमादान के मामले में राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की तुलनात्मक शक्तियां
|
क्र.सं. |
राष्ट्रपति |
राज्यपाल |
|
1 |
|
|
|
2 |
|
|
|
3 |
|
|
- अनुच्छेद 217 में यह उल्लेखित है कि राष्ट्रपति, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में संबंधित राज्य के राज्यपाल के साथ परामर्श करते हैं ।
- अनुच्छेद 219 के तहत राज्यपाल उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीशों को शपथ दिलाते हैं ।
- अनुच्छेद 233 के तहत राज्यपाल, उच्च न्यायालय से परामर्श कर जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना और प्रोन्नति करते हैं ।
- अनुच्छेद 234 के तहत राज्यपाल, जिला न्यायाधीशों के अलावा अन्य न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति, उच्च न्यायालय तथा राज्य लोक सेवा आयोग से परामर्श के पश्चात करते हैं ।
स्व-विवेकीय शक्तियाँ तथा विशेषाधिकार
- अनु. 163 के अन्तर्गत राज्यपाल के स्व-स्वविवेकीय शक्तियों का उल्लेख है।
- अनुच्छेद 163(1) के तहत संविधान में किए गए राज्यपाल के विवेकाधीन प्रावधानों के अतिरिक्त उसको सहायता एवं सलाह के लिए एक मंत्रिपरिषद् होगी जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा।
- अनुच्छेद 163(2) के तहत इस बात का निर्धारण करना स्वयं राज्यपाल का क्षेत्राधिकार है कि संविधान के अनुसार कौन सा कार्य उसके विवेकाधिकार में आता है कौन सा नहीं । विवेकाधिकार का प्रयोग राज्यपाल अपने विवेक या व्यक्तिगत निर्णय से करता है । उसे इस संबंध में मंत्रिपरिषद से परामर्श लेने की आवश्यकता नहीं है ।
संबंधित संविधान संशोधन
- 42 संविधान संशोधन 1976 के बाद राष्ट्रपति के लिए मंत्रियों की सलाह की बाध्यता कर दी गई है हालांकि 44वें संशोधन – 1978 द्वारा इसे एक बार पुनर्विचार हेतु लौटाने का प्रावधन किया गया। जबकि राज्यपाल के संबंध में ऐसा नहीं है। अर्थात् राज्यपाल के विवेकाधिकार पर कोई प्रश्न उठता तो राज्यपाल का निर्णय अंतिम और वैध है।
इन स्व-विवेकीय शक्तियों के दो रूप है –
- संविधान द्वारा प्रदत्त स्व-विवेकीय शक्तियाँ :
- (i) अनुच्छेद 200 के अन्तर्गत राज्य विधानमंडल द्वारा प्रस्तुत किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करना।
- (ii) राष्ट्रपति को अनु. 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करना।
- (iii) कुछ स्वविवेकीय शक्तियाँ असम, नागालैण्ड, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश के राज्यपालों को प्रदान की गई हैं। जैसे- असम के राज्यपाल को यह स्वविवेकीय शक्ति प्राप्त है कि वह असम में गौण खनिजों से प्राप्त आय को असम की जनजातियों के विकास हेतु खर्च कर सकता हैं।
- (iv) राज्य के विधान मंडल एवं प्रशासनिक मामलों में मुख्यमंत्री से जानकारी प्राप्त करना (अनुच्छेद 167)
- (v) जब राज्य की सरकार अल्पमत में आ जाये तो विधानसभा को भंग करना (अनुच्छेद 174)
- परिस्थितिजन्य स्व-विवेकीय शक्तियाँ : इन शक्तियों का प्रयोग राज्यपाल निम्न परिस्थितियों में करता है-
- (i) किसी एक दल या गठबंधन को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त न होने की दशा में मुख्यमंत्री का चयन राज्यपाल स्वविवेक से करता है।
- (ii) किसी मुख्यमंत्री को अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए दी गई समय सीमा का निर्धारण राज्यपाल स्वविवेक से करता है।
मुख्यमंत्री की नियुक्ति में राज्यपाल का विवेकाधिकार:
- डॉक्टर गुरुमुख निहाल सिंह का कहना है कि राज्यपाल को मुख्यमंत्री की नियुक्ति में विवेकाधिकार का उपयोग अभिसमयों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
- सितंबर, 2001 में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल की विवेकाधिकार शक्तियां असीमित नहीं हैं।
- यदि राज्यपाल किसी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है जो विधानसभा का सदस्य बनने के योग्य नहीं है, तो वह नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत असंवैधानिक होगी।
मंत्रिपरिषद् को भंग करना:
- संविधान की रक्षा के दृष्टिकोण से, विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल मंत्रिपरिषद को भंग कर सकता है।
- यदि विधानसभा में मंत्रिपरिषद के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो और मंत्रिपरिषद त्याग पत्र नहीं दे, तो राज्यपाल उसे बर्खास्त कर सकता है।
- यदि राज्यपाल को विश्वास हो कि सरकार का विधानसभा में पर्याप्त बहुमत नहीं है, और मुख्यमंत्री अधिवेशन बुलाने से इंकार कर दे, तो राज्यपाल मंत्रिपरिषद को बर्खास्त कर सकता है।
- यदि मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार या अन्य गंभीर अपराध में दोषी पाया जाए और वह इस्तीफा देने से इंकार करे, तो राज्यपाल मंत्रिपरिषद को बर्खास्त कर सकता है।
राज्यपाल की स्व-विवेकीय शक्तियों की आलोचना
- विवेकाधिकार का दबावपूर्ण प्रयोग:
- राज्यपाल द्वारा विवेकाधिकार शक्तियों का प्रयोग केंद्र सरकार के आदेशों या केंद्रीय हितों के अनुसार किया जाता है।
- यह निर्णय स्वतंत्र नहीं होते, बल्कि दबावपूर्ण होते हैं।
- पक्षपाती व्यवहार:
- राज्यपालों का व्यवहार अक्सर पक्षपाती होता है, जिससे उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
- अजय मुखर्जी का आग्रह (1967):
- भूतपूर्व मुख्यमंत्री अजय मुखर्जी ने नवंबर 1967 में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन से प्रार्थना की कि राज्यपाल के विवेकाधिकार पर उच्चतम न्यायालय से राय ली जाए।
- हालांकि, संघ सरकार ने इस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया और इस विषय को उच्चतम न्यायालय में ले जाने की आवश्यकता नहीं मानी।
विशेष दायित्व – राज्यपाल
| अनुच्छेद | विशेष दायित्व |
| अनुच्छेद 371 | महाराष्ट्र और गुजरात के राज्यपाल को विशेष दायित्व:महाराष्ट्र के राज्यपाल को विदर्भ और मराठवाडा के विकास के लिए विकास बोर्ड का गठन करने का अधिकार।गुजरात के राज्यपाल को कच्छ और सौराष्ट्र के विकास के लिए विकास बोर्ड का गठन करने का अधिकार। |
| अनुच्छेद 371(A) | नागालैंड में कानून व्यवस्था बनाए रखना और त्वेंसांग जिले के विकास के लिए विकास परिषद का गठन करना राज्यपाल का विशेष दायित्व। |
| अनुच्छेद 371(B) | असम – जनजातीय इलाकों में प्रशासनिक व्यवस्था |
| अनुच्छेद 371(C) | मणिपुर – राज्य के पहाड़ी इलाकों में प्रशासनिक व्यवस्था |
| अनुच्छेद 371(D) | आंध्र प्रदेश और तेलंगाना |
| अनुच्छेद 371(E) | आंध्र प्रदेश |
| अनुच्छेद 371(F) | सिक्किम में कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्यपाल का विशेष दायित्व। |
| अनुच्छेद 371(G) | मिजोरम |
| अनुच्छेद 371(H) | अरुणाचल प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्यपाल का विशेष दायित्व। |
| अनुच्छेद 371(I) | गोवा |
| अनुच्छेद 371(J) | कर्नाटक व हैदराबाद क्षेत्र |
राज्यपाल के अन्य कार्य :
- केंद्र और राज्य सरकार के मध्य समन्वय
- राज्य प्रशासन की रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजना
- राज्य शासन का संचालन
- संघ के हितों की रक्षा करना
- राष्ट्रीय राजमार्ग और संचार साधनों की रक्षा
राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की वीटो शक्ति की तुलना
|
राष्ट्रपति |
राज्यपाल |
|
सामान्य विधेयकों से संबंधित |
|
|
|
|
धन विधेयकों के बारे में |
|
|
|
|
|
|
अध्यादेश जारी करने की शक्ति |
|
|
|
|
|
|
राष्ट्रपति या राज्यपाल का यह समाधान हो जाना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनके कारण तुरंत कार्यवाही करना उसके लिए आवश्यक हो गया है । |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
राज्यपाल: केंद्र सरकार का एजेंट या राज्य का संवैधानिक प्रमुख?
पक्ष: राज्यपाल केंद्र सरकार का एजेंट है
- नियुक्ति: राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जो केंद्र सरकार की सिफारिश पर निर्भर होती है।
- कार्यकाल: राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।
- केंद्र के निर्देशों का पालन: केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का क्रियान्वयन राज्यपाल के माध्यम से होता है।
- विधेयकों का आरक्षण: राज्य सूची के विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु आरक्षित करना।
- राष्ट्रपति शासन की सिफारिश: अनुच्छेद 356 के तहत राज्यपाल राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश करता है।
- प्रशासनिक संचालन: अनुच्छेद 356 लागू होने पर राज्य के प्रशासन का संचालन केंद्र सरकार राज्यपाल के माध्यम से करती है।
- विदेश यात्रा पर सूचना: 2015 के आदेश के अनुसार, विदेश यात्रा से पहले राज्यपाल को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को सूचित करना होता है।
- स्थानांतरण: राज्यपाल का स्थानांतरण राष्ट्रपति द्वारा (केंद्र मंत्रिपरिषद की सिफारिश पर) होता है।
विपक्ष: राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है / केंद्र सरकार का एजेंट नहीं है
- संवैधानिक शपथ: राज्यपाल शपथ लेता है कि वह राज्य का संवैधानिक प्रमुख होगा, न कि केंद्र का एजेंट।
- संवैधानिक शक्तियाँ: राज्यपाल को शक्ति संविधान से प्राप्त होती है, न कि केंद्र सरकार से।
- वेतन और भत्ते: राज्यपाल के वेतन और भत्ते राज्य की संचित निधि (Consolidated Fund) पर भारित होते हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (1979): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य में राज्यपाल का कार्यालय एक स्वतंत्र संवैधानिक कार्यालय हैं यह न तो केंद्र सरकार के अधीनस्थ है और ना ही केंद्र सरकार के अधीन रोजगार हैं ।
- बीपी सिंघल बनाम भारत संघ (2010) : सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करने की व्याख्या करते हुए कहा गया कि बिना ठोस कारण या राजनीतिक आधार पर राज्यपाल को हटाया नहीं जा सकता।\
राज्यपाल से संबंधित मुद्दे
- पुनर्वास संबंधी नियुक्तियाँ: राज्यपाल का पद राजनीतिक रूप से वफादार नेताओं के लिए सेवानिवृत्ति पैकेज के रूप में देखा जा रहा है।
- मनमाने ढंग से हटाना: राज्यपालों को उनके कार्यकाल की समाप्ति से पहले हटाने के मामले हाल के दिनों में बढ़े हैं।
- विवेकाधीन शक्तियों का दुरुपयोग: सबसे बड़े दल/गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने में राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों का दुरुपयोग होता है।
- पद का दुरुपयोग: केंद्र में सत्तारूढ़ दल द्वारा राज्यपाल के पद का उपयोग अपने लाभ के लिए किया गया है।
- पक्षपातपूर्ण भूमिका: राज्यपालों पर सत्तारूढ़ दल के पक्ष में काम करने और आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं।
- अनुच्छेद 356 के तहत शक्ति का दुरुपयोग: राज्यों में संवैधानिक संकट का बहाना बनाकर राष्ट्रपति शासन लागू करने में इस शक्ति का दुरुपयोग केंद्र सरकार द्वारा किया गया है।
- मात्र रबर स्टांप या कठपुतली: मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह राज्यपाल के लिए बाध्यकारी होती है, जिससे उनकी स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।
राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति –
- अनुच्छेद 154 – राज्य की कार्यकारी शक्तियाँ राज्यपाल में निहित होगी। वह इसका प्रयोग स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा।
- अनुच्छेद 163 – अपने विवेकाधिकार वाले कार्यों के अलावा अपने अन्य कार्यों को करने के लिए राज्यपाल को मुख्यमंत्री के नेतृत्त्व वाली मंत्रिपरिषद् से सलाह लेनी होगी।
- कार्यपालिका प्रमुख होने के नाते राज्यपाल दोहरी भूमिका को निभाता है –
- राज्य के प्रमुख के रूप में, तथा
- केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में, जो केन्द्र एवं राज्य के बीच कड़ी के रूप में काम करता है।
- राज्यपाल कुछ परिस्थितियों में राज्य में संघीय शासन के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। वास्तविक रूप में राज्यपाल राज्य के प्रमुख के रूप में कार्य करता है, न कि संघीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में ।
- उच्चतम न्यायालय ने 1979 व्यवस्था दी कि राज्यपाल केन्द्र सरकार के अधीन रोजगार नहीं है, यह एक स्वतंत्र संवैधानिक कार्यालय है।
राज्यपाल के संदर्भ में विभिन्न कथन
- सरोजिनी नायडू – वह ‘सोने के पिंजरे में बंद चिड़िया के समान है।’
- श्री प्रकाश – उसे छूटी हुई जगह पर हस्ताक्षर करने के अतिरिक्त कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।
- श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित – ‘पद नहीं वेतन के आकर्षण के कारण ही कोई व्यक्ति राज्यपाल बनना स्वीकार करता है।’
- डॉ. पट्टाभि सीतारमैया – ‘राज्यपाल का पद अतिथि सत्कार तथा राष्ट्रपति को एक पखवाड़े का प्रतिवेदन देने के लिए है।
राज्यपाल के पद से सम्बन्धित प्रमुख समितियाँ और उनकी सिफारिशें:
|
समिति/आयोग का नाम |
गठन एवं अध्यक्षता |
प्रमुख सिफारिशें |
|
प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) |
|
|
|
राजमन्नार आयोग (1969) |
|
|
|
भगवान सहाय समिति (1970) |
|
|
|
सरकारिया आयोग (1983) |
|
|
प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग
- 5 जनवरी 1966 को स्थापित किया गया था। आयोग की शुरुआत में अध्यक्षता मोरारजी देसाई ने की थी , और बाद में जब देसाई भारत के उप प्रधान मंत्री बने तो के. हनुमंतैया इसके अध्यक्ष बने ।
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग
- (एआरसी) का गठन वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में 31 अगस्त 2005 को एक जांच आयोग के रूप में किया गया था।
