राजस्थान विधानसभा राजस्थान राजनीतिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो राज्य की विधायिका के रूप में कार्य करती है। यह जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों का सदन है, जो कानून निर्माण, शासन की जवाबदेही सुनिश्चित करने तथा जनहित के मुद्दों पर विचार-विमर्श का मंच प्रदान करता है।राजस्थान विधान सभा राज्य के लोकतांत्रिक ढांचे को सुदृढ़ बनाते हुए शासन और जनता के बीच सेतु का कार्य करती है।
विधानपरिषद
विधानपरिषद का गठन विषमांगी है यह विभिन्न हितों को प्रदर्शित करती है और इसमें विभिन्न रूप से निर्वाचित सदस्य होते हैं और कुछ नामित सदस्य भी सम्मिलित होते हैं । इसकी संरचना ही इसे कमजोर बनाती है और प्रभावी पुनरीक्षण निकाय के रूप में इसकी उपयोगिता को कम करती है। दूसरी ओर राज्यसभा का गठन समांग है । यह राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है और इसमें मुख्यत: निर्वाचित सदस्य होते है (250 में से सिर्फ 12 नामित होते हैं)।
अनुच्छेद 169. राज्यों में विधान परिषदों का सृजन अथवा उत्सादन
- संसद एक विधानपरिषद को (यदि यह पहले से है) विघटित कर सकती है और (यदि पहले से नहीं है) इसका गठन कर सकती है । यदि संबंधित राज्य की विधानसभा इस संबंध में संकल्प पारित करे।
- इस तरह का कोई विशेष प्रस्ताव राज्य विधानसभा द्वारा विशेष बहुमत से पारित होना जरूरी है
- राज्य विधानसभा द्वारा पूरी सदस्य संख्या के बहुमत से तथा उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या के दो-तिहाई बहुमत से विधानपरिषद् के सृजन या समाप्ति का प्रस्ताव पारित कर दे।
- तत्पश्चात् संसद साधारण बहुमत से प्रस्ताव पारित कर किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन एवं समाप्त कर सकती है।
- संसद का यह अधिनियम अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों हेतु संविधान का संशोधन नहीं माना जाएगा और सामान्य विधान की तरह (अर्थात् साधारण बहुमत से) पारित किया जायेगा।
विधानपरिषद (अनुच्छेद 171)
- संविधान के अनुच्छेद 169, 171(1) और 171(2) में विधानपरिषद के गठन एवं संरचना से जुड़े प्रावधान हैं।
- संविधान का अनुच्छेद 169 किसी राज्य में विधानपरिषद के उत्सादन या सृजन का प्रावधान करता है, वहीं अनुच्छेद 171 विधानपरिषदों की संरचना से जुड़ा है।
- राज्यसभा की तरह ही विधानपरिषद भी एक स्थायी सदन है जो कभी भंग नहीं होता है
- विधान परिषद के सदस्यों की संख्या विधान सभा की सदस्य संख्या के एक तिहाई से अधिक नहीं होगी किन्तु वह संख्या कम से कम 40 अवश्य होगी | जम्मू कश्मीर इसका अपवाद (36) है
- वर्तमान में देश के 6 राज्यों .आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में विधानपरिषद है
- विधान परिषद् स्थायी सदन है अतः विधान परिषद् में प्रति दूसरे वर्ष 1/3 सदस्य अवकाश ग्रहण कर लेते हैं ”
- निर्वाचित व मनोनीत सदस्य विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या के क्रमशः 5/6 व 1/6 होते है।
- विधान परिषद के सदस्यों का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर सदस्य, एकल संक्रमणीय मत के द्वारा समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से चुने जाते हैं। राज्यपाल द्वारा नामित सदस्यों को किसी भी स्थिति में अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
- इसके सदस्यों का निर्वाचन अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के आधार पर किया जाता है|
- विधान परिषद के सदस्यों को अलग अलग निर्वाचक मंडलों द्वारा (प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष, मनोनयन)चुना जाता है –
- 1/3 सदस्य- राज्य विधान सभा के सदस्यों द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से चुने जाते हैं जो कि विधान सभा के सदस्य नहीं हो।
- 1/3 सदस्य – उस राज्य की नगरपालिकाओं, जिला परिषदों तथा अन्य ऐसे स्थानीय प्राधिकारियों, जिन्हें संसद विधि द्वारा विनिर्दिष्ट करे, के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचक मण्डलों द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं।
- 1 /12 सदस्य – राज्य की माध्यमिक शिक्षण संस्थाओं तथा उससे उच्च स्तर की शिक्षण संस्थाओं में कम से कम 3 वर्ष के पुराने शिक्षकों के निर्वाचक मण्डल द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं।
- 1/12 सदस्य – विश्वविद्यालय के कम से कम तीन वर्ष पुराने स्नातकों या उनके समान योग्यता रखने वाले उस राज्य के निवासियों द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं।
- 1/6 सदस्य – राज्यपाल द्वारा मनोनीत किये जाते हैं। जिन्हें साहित्य, ज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा का विशेष ज्ञान व व्यावहारिक अनुभव हो
विधान परिषद् के अधिकार तथा शक्तियाँ :
- विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को विधान परिषद अधिकतम 04 महीने तक रोके रख सकती है। पहली बार में तीन माह के लिए और दूसरी बार में एक माह के लिए।
- विधान सभा द्वारा पुनः विधेयक को पारित करने पर वह विधान परिषद के पास दूसरी बार आने पर भी यदि परिषद उसे पास नहीं करती है उसे संशोधनों सहित लौटा देती है या उसे एक माह तक रोके रखती है (किसी भी स्थिति में) वह विधेयक दोनों सदनो द्वारा पारित मानकर राज्यपाल की स्वीकृति हेतु भेज दिया जाता है।
- विधान परिषद को धन विधेयक को केवल मात्र 14 दिन विलम्बित करने का अधिकार व शक्ति प्राप्त है।यदि विधान परिषद 14 दिन से अधिक धन विधेयक को अपने पास रोके रखती है तो स्वतः ही पारित मान लिया जाता है।
विधानसभा
विधानसभा (अनुच्छेद-170)
- विधानसभा के प्रतिनिधियों को प्रत्यक्ष मतदान से वयस्क मताधिकार के द्वारा निर्वाचित किया जाता है। इसकी अधिकतम संख्या 500 और निम्नतम 60 तय की गई है। हालांकि अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम एवं गोवा के मामले में यह संख्या 30 तय की गई है एवं मिजोरम व नागालैंड के मामले में क्रमश: 40 एवं 46। इसके अलावा सिक्किम और नागालैंड विधानसभा के कुछ सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से भी चुने जाते हैं।
- राज्यपाल आंग्ल-भारतीय समुदाय के एक व्यक्ति को विधानसभा में मनोनीत कर सकता है। (अनुच्छेद – 333)
- अनुसूचित जाति/जनजाति को जनसंख्या के अनुपात में राज्य विधानसभा में आरक्षण प्रदान किया गया है। (अनुच्छेद – 332)
- राज्य विधायका की गणपूर्ति सदन की कुल सदस्य संख्या का 1/10 भाग से होती है।
- एक वर्ष में न्यूनतम दो सत्र अवश्य हों तथा दो सत्रों के मध्य 6 माह से अधिक का अन्तर नहीं होना चाहिए।
- अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लगा होने पर संसद द्वारा विधि पूर्वक विधान सभा का एक बार में 01 वर्ष का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है।
राज्य विधानमंडल से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान
अनुच्छेद 172: राज्यों के विधानमंडलों की अवधि
- विधानसभा: प्रत्येक राज्य की विधानसभा अपनी प्रथम बैठक (अधिवेशन) के लिए नियत तिथि से 5 वर्ष की अवधि तक बनी रहेगी।
- अपवाद (आपातकाल): यदि आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में है, तो संसद विधि द्वारा इसकी अवधि बढ़ा सकती है। यह विस्तार एक बार में 1 वर्ष से अधिक नहीं होगा। आपातकाल समाप्त होने की स्थिति में यह विस्तार 6 माह की अवधि से अधिक नहीं रहेगा।
- विधान परिषद: यह एक स्थायी सदन है, जिसका विघटन नहीं होगा। इसके यथासंभव निकटतम एक-तिहाई (1/3) सदस्य प्रत्येक दो वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
अनुच्छेद 173: विधानमंडल की सदस्यता के लिए अर्हता (Qualifications)
- कोई व्यक्ति विधानमंडल का सदस्य बनने के लिए तभी अर्ह होगा यदि:
- वह भारत का नागरिक हो।
- आयु सीमा: विधानसभा के लिए न्यूनतम 25 वर्ष और विधान परिषद के लिए न्यूनतम 30 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
- उसके पास ऐसी अन्य अर्हताएं हों जो संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन विहित की जाएं।
अनुच्छेद 174: विधानमंडल के सत्र, सत्रावसान और विघटन (राज्यपाल की शक्तियां)
- सत्र आहूत करना: राज्यपाल समय-समय पर सदन के सत्र बुलाएगा। दो सत्रों (अंतिम बैठक और आगामी प्रथम बैठक) के बीच 6 माह से अधिक का अंतर नहीं होगा।
- सत्रावसान: राज्यपाल सदन के सत्र को समाप्त (सत्रावसान) कर सकता है।
- विघटन: राज्यपाल विधानसभा को विघटन (भंग) करने की शक्ति रखता है।
अनुच्छेद 175: सदन/सदनों में अभिभाषण और संदेश भेजने का राज्यपाल का अधिकार
- राज्यपाल विधानमंडल के किसी एक सदन या एक साथ समवेत दोनों सदनों में अभिभाषण कर सकेगा और लंबित विधेयकों या अन्य विषयों के संबंध में संदेश भेज सकेगा।
अनुच्छेद 176: राज्यपाल का विशेष अभिभाषण
- राज्यपाल दो विशेष अवसरों पर अनिवार्य रूप से अभिभाषण करता है:
- प्रत्येक आम चुनाव (साधारण निर्वाचन) के पश्चात प्रथम सत्र के आरम्भ में।
- प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरम्भ में।
अनुच्छेद 177: मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार
- बोलने और भाग लेने का अधिकार: राज्य का कोई भी मंत्री और महाधिवक्ता विधानसभा (और यदि राज्य में विधान परिषद है, तो दोनों सदनों) की बैठकों में बोल सकते हैं और उसकी कार्यवाही में हिस्सा ले सकते हैं।
- समिति में अधिकार: यदि उन्हें विधानमंडल की किसी समिति का सदस्य बनाया जाता है, तो वे उस समिति की बैठकों में भी बोल सकते हैं और भाग ले सकते हैं।
- वोट देने का अधिकार नहीं: इस अनुच्छेद के जरिए उन्हें वोट (मत) देने का अधिकार नहीं मिलता। मंत्री केवल उसी सदन में वोट दे सकता है जिसका वह सदस्य है, और महाधिवक्ता तो किसी भी सदन में वोट नहीं दे सकता।
अनुच्छेद 189 (3): विधानमंडल की गणपूर्ति (Quorum)
- सदन की कार्यवाही चलाने के लिए आवश्यक न्यूनतम सदस्य संख्या (गणपूर्ति) सदन की कुल सदस्य संख्या का दसवां भाग (1/10) या 10 सदस्य, जो भी अधिक हो, होनी अनिवार्य है।
अनुच्छेद 178 : विधानसभा अध्यक्ष / उपाध्यक्ष-
- अध्यक्ष का चुनावः- प्रोटम स्पीकर की अध्यक्षता में विधायकों के ध्वनिमत से (आमतौर पर सबसे वरिष्ठतम् सदस्य) (चुनाव तिथि राज्यपाल द्वारा निर्धारित)
- उपाध्यक्ष का चुनाव सदस्यों द्वारा अपने में से ही किया जाता है। (चुनाव तिथि अध्यक्ष द्वारा निर्धारित)
अनुच्छेद 179: अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना- विधान सभा के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के रूप में पद धारण करने वाला सदस्य-
- (क) यदि विधान सभा का सदस्य नहीं रहता है तो अपना पद रिक्त कर देगा;
- (ख) किसी भी समय, यदि वह सदस्य अध्यक्ष है तो उपाध्यक्ष को संबोधित और यदि वह सदस्य उपाध्यक्ष है तो अध्यक्ष को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा; और
- (ग) विधान सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (विशिष्ट बहुमत) से पारित संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा :
- कोई संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने के आशय की कम से कम चौदह दिन की सूचना न दे दी गई हो :
- परंतु यह और कि जब कभी विधान सभा का विघटन किया जाता है तो विघटन के पश्चात् होने वाले विधान सभा के प्रथम अधिवेशन के ठीक पहले तक अध्यक्ष अपने पद को रिक्त नहीं करेगा ।
अनुच्छेद 180- अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति
- जब अध्यक्ष का पद रिक्त है तो उपाध्यक्ष, या यदि उपाध्यक्ष का पद भी रिक्त है तो विधान सभा का ऐसा सदस्य, जिसको राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा ।
- [नोट : इस हेतु राज्यपाल द्वारा प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति की जाती है।]
- विधान सभा की किसी बैठक से अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा व्यक्ति, जो विधान सभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए, या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है तो ऐसा अन्य व्यक्ति, जो विधान सभा द्वारा अवधारित किया जाए, अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा ।
अनुच्छेद 181: अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पीठासीन न होना
- यदि अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन है, तो वे सदन में उपस्थित रहकर बोल सकते हैं और शुरुआत में वोट भी दे सकते हैं, लेकिन वे पीठासीन (अध्यक्ष की कुर्सी पर) नहीं बैठेंगे और वोट बराबर होने पर निर्णायक मत नहीं दे सकेंगे।
अनुच्छेद 182: विधान परिषद का सभापति और उपसभापति
- विधान परिषद अपने सदस्यों में से एक सभापति और एक उपसभापति चुनेगी और पद खाली होने पर नए सदस्य को चुनती रहेगी।
अनुच्छेद 183: सभापति और उपसभापति का पद रिक्त होना, त्यागपत्र या हटाया जाना
- सभापति या उपसभापति का पद तब खाली होगा जब वे सदन के सदस्य न रहें, या वे एक-दूसरे को इस्तीफा दे दें, या सदन के बहुमत से संकल्प पारित कर उन्हें हटा दिया जाए (जिसकी 14 दिन पहले सूचना देना अनिवार्य है)
- यदि समस्त तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से संकल्प पारित हो जाए, तो पद रिक्त माना जाता है (राजस्थान के इतिहास में अब तक 6 बार ऐसे संकल्प लाए गए हैं; पहला संकल्प नरोत्तम लाल जोशी के खिलाफ था)।
अनुच्छेद 184: सभापति के कर्तव्यों का पालन करने की शक्ति
- सभापति का पद रिक्त होने पर उपसभापति कार्य संभालेगा, और यदि दोनों पद रिक्त हों तो राज्यपाल द्वारा नियुक्त सदस्य कार्य करेगा। बैठक में सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति या नियमों द्वारा तय व्यक्ति अध्यक्ष बनेगा।
अनुच्छेद 185: सभापति या उपसभापति का पीठासीन न होना
- यदि सभापति या उपसभापति को हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन है, तो वे सदन में उपस्थित रहकर बोल सकते हैं और प्रथमतः मत दे सकते हैं, लेकिन वे पीठासीन नहीं होंगे और वोट बराबर होने की स्थिति में निर्णायक मत नहीं दे पाएंगे।
अनुच्छेद 186: अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति और उपसभापति के वेतन-भत्ते
- अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति और उपसभापति को वे वेतन और भत्ते मिलेंगे जो राज्य विधानमंडल कानून द्वारा तय करेगा (तब तक दूसरी अनुसूची के अनुसार भुगतान होगा)।
अनुच्छेद 187: राज्य विधानमंडल का सचिवालय
- विधानमंडल का अपना अलग सचिवालय और कर्मचारी होंगे। इनकी भर्ती और सेवा की शर्तें विधानमंडल तय करेगा, और जब तक कानून नहीं बनता तब तक राज्यपाल अध्यक्ष/सभापति की सलाह से नियम बना सकेगा।
अनुच्छेद 188: सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
- प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले राज्यपाल या उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची के अनुसार शपथ या प्रतिज्ञान लेगा और हस्ताक्षर करेगा।
अनुच्छेद 189: सदनों में मतदान और गणपूर्ति (कोरम)
- सदन के सभी फैसले बहुमत से होंगे। अध्यक्ष/सभापति शुरुआत में वोट नहीं देंगे, लेकिन वोट बराबर होने पर निर्णायक मत देंगे। सदन में गणपूर्ति (कोरम) कुल सदस्यों का 1/10 या 10 सदस्य (जो भी अधिक हो) होगी, जिसके अभाव में अध्यक्ष बैठक स्थगित कर देगा।
अनुच्छेद 190 : स्थानों का रिक्त होना
- कोई व्यक्ति एक साथ दो या अधिक राज्यों का सदस्य नहीं होगा; तय समय में एक राज्य न चुनने पर सभी राज्यों से उसकी सदस्यता खत्म हो जाएगी।
- सदस्य का स्थान तब रिक्त होगा यदि वह अयोग्य हो जाए या इस्तीफा दे दे (अध्यक्ष इस्तीफा तभी स्वीकार करेगा जब वह अपनी मर्जी से और असली हो)।
- बिना अनुमति 60 दिन तक अनुपस्थित रहने पर सदन सीट खाली घोषित कर सकता है।
अनुच्छेद 191 (अयोग्यता):
- सदस्य अयोग्य होगा यदि:
- (क) वह लाभ का पद (मंत्री पद छोड़कर) धारण करे,
- (ख) दिवालिया हो,
- (ग) मानसिक रूप से अस्वस्थ हो,
- (घ) भारत का नागरिक न रहे,
- (ङ) संसद के किसी कानून या 10वीं अनुसूची (दल-बदल) के तहत अयोग्य हो।
अनुच्छेद 192 (अयोग्यता पर निर्णय):
- अयोग्यता (191-1) से जुड़े किसी भी सवाल पर राज्यपाल का फैसला अंतिम होगा। फैसला लेने से पहले राज्यपाल निर्वाचन आयोग की राय लेगा और उसी के अनुसार कार्य करेगा।
अनुच्छेद 193 (शास्ति/जुर्माना):
- यदि कोई व्यक्ति बिना शपथ लिए, अयोग्य होते हुए या सदस्यता से रोके जाने पर भी सदन में बैठता है या वोट देता है, तो उसे 500 रुपये प्रतिदिन का जुर्माना देना होगा।
अनुच्छेद 194 (विशेषाधिकार):
- विधानमंडल में सदस्यों को बोलने की आजादी (वाक्-स्वातंत्र्य) होगी। सदन में कही गई किसी बात या दिए गए वोट के लिए किसी भी न्यायालय में कार्यवाही नहीं की जा सकती। अन्य शक्तियां और विशेषाधिकार कानून द्वारा तय किए जाएंगे।
अनुच्छेद 195 (वेतन-भत्ते):
- सदस्यों को वे वेतन और भत्ते मिलेंगे जो विधानमंडल कानून बनाकर तय करेगा।
अनुच्छेद 196 (विधेयक पारित करना):
- धन/वित्त विधेयक छोड़कर कोई भी विधेयक किसी भी सदन में पेश हो सकता है।
- विधेयक तभी पारित माना जाएगा जब दोनों सदन सहमत हों।
- सत्रावसान (सत्र खत्म होने) से विधेयक खत्म (व्यपगत) नहीं होता।
- विधान परिषद में लंबित विधेयक जो विधानसभा से पास नहीं हुआ है, वह विधानसभा भंग होने पर भी खत्म नहीं होगा।
- लेकिन जो विधेयक विधानसभा में लंबित है या विधानसभा से पास होकर परिषद में गया है, वह विधानसभा भंग होते ही खत्म हो जाएगा।
विधानसभा के विघटन का लम्बित विधेयको पर प्रभाव-
- यदि कोई विधेयक विधानसभा में प्रस्तुत किया गया तथा वहाँ से पारित होकर विधान परिषद् में प्रक्रियाधीन है तो वह समाप्त हो जायेगा।
- यदि कोई विधेयक विधानसभा में प्रस्तुत किया गया तथा विधानसभा में ही प्रक्रियाधीन है तो वह समाप्त हो जायेगा।
- यदि कोई विधेयक विधान परिषद् में प्रस्तुत किया गया तथा वहाँ से पारित होकर विधानसभा में प्रक्रियाधीन है तो वह समाप्त हो जायेगा।
- यदि कोई विधेयक विधान परिषद् में प्रस्तुत किया गया तथा वहाँ प्रक्रियाधीन है तो वह समाप्त नहीं होगा।
अर्थात् विधानसभा के विघटन पर ऐसे समस्त लम्बित विधेयक समाप्त हो जाते है, जिन विधेयको ने विधानसभा को छू लिया हो।
अनुच्छेद 197 (साधारण विधेयक पर परिषद की शक्तियों पर रोक):
- यदि विधानसभा से पारित विधेयक को विधान परिषद अस्वीकार कर दे, या 3 माह तक पास न करे, या ऐसे संशोधन करे जिससे विधानसभा सहमत न हो, तो विधानसभा उसे दोबारा पास कर सकती है। दोबारा भेजने पर यदि परिषद फिर से उसे अस्वीकार करे, या 1 माह तक पास न करे, या असहमत संशोधन करे, तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाएगा। (यह नियम धन विधेयक पर लागू नहीं होता)।
अनुच्छेद 198 (धन विधेयक की विशेष प्रक्रिया):
- धन विधेयक केवल विधानसभा में पेश होगा। विधानसभा से पास होकर यह परिषद को सिफारिश के लिए भेजा जाएगा। परिषद को इसे 14 दिन में लौटाना होगा। विधानसभा परिषद की सिफारिशें मान भी सकती है और नहीं भी। यदि 14 दिन में नहीं लौटाया गया, तो विधेयक वैसा ही पास मान लिया जाएगा जैसा विधानसभा ने पास किया था।
अनुच्छेद 199 (धन विधेयक की परिभाषा):
- धन विधेयक वह है जिसमें केवल कर (Tax) लगाने, धन उधार लेने, संचित/आकस्मिक निधि से धन निकालने, या किसी खर्च को संचित निधि पर भारित घोषित करने जैसे विषय हों। जुर्माना या स्थानीय टैक्स के विधेयक धन विधेयक नहीं माने जाते।
- कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इस पर विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होगा।
नोट :
- राज्य की संचित निधि (Consolidate fund) या आकस्मिक निधि से सम्बन्धित विधेयक।
- कार्यवाही सलाहकार समिति के द्वारा निर्धारित तिथि को विधेयक का द्वितीय वाचन होता है। इसमें विधेयक के गुण-दोषों पर सामान्य रूप से प्रकाश डाला जाता है।
- सरकारी विधेयक के लिए कोई पूर्व सूचना देने की आवश्यकता नहीं है परन्तु निजी सदस्य द्वारा प्रस्तुत गैर सरकारी विधेयकों के लिए एक माह पूर्व सूचना देना आवश्यक है।
अनुच्छेद 200 (विधेयकों पर अनुमति):
- दोनों सदनों से पास विधेयक राज्यपाल के पास जाएगा। राज्यपाल या तो अनुमति देगा, या रोक लेगा, या राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख लेगा। राज्यपाल विधेयक (धन विधेयक को छोड़कर) को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है, लेकिन दोबारा पास होकर आने पर वह अनुमति नहीं रोकेगा। यदि विधेयक से उच्च न्यायालय की शक्तियाँ कम होती हों, तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति के लिए आरक्षित जरूर रखेगा।
अनुच्छेद 201 (राष्ट्रपति द्वारा विचार):
- राष्ट्रपति आरक्षित विधेयक पर या तो अनुमति देगा या रोक लेगा। वह राज्यपाल को निर्देश दे सकता है कि विधेयक सदन को पुनर्विचार के लिए लौटा दिया जाए। सदन को 6 माह के भीतर उस पर पुनर्विचार करना होगा और फिर से पास होने पर उसे दोबारा राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा।
बजट / वार्षिक वित्तीय विवरण (अनु. 202)
बजट का सामान्य विवरण:
- आगामी वित्तीय वर्ष में सरकार की आय और व्यय का ब्यौरा प्रस्तुत किया जाता है।
- वित्त वर्ष: 1 अप्रैल से 31 मार्च तक।
- राज्यपाल प्रतिवर्ष विधानसभा में बजट पेश करवाते हैं, और इस दिन कोई चर्चा नहीं होती।
- राज्यपाल की सिफारिश के बिना अनुदान की कोई मांग नहीं की जाती।
बजट पर चर्चा के प्रक्रम:
- सामान्य चर्चा: बजट पेश होने के बाद आम बहस।
- अनुदान मांगों पर मतदान: विभागीय मांगों पर मतदान होता है।
बजट पारित होने के चरण:
- बजट प्रस्तुतीकरण: राज्यपाल द्वारा निर्धारित दिन पर वित्त मंत्री बजट पेश करते हैं और बजट भाषण देते हैं।
- आम बहस: बजट पेश होने के बाद तीन-चार दिनों तक विधानसभा में बजट पर सामान्य विचार-विमर्श होता है।
- लेखानुदान (अनु. 206): वित्त वर्ष समाप्त होने (31 मार्च) तक सरकार के व्ययों के लिए अग्रिम राशि का 1/6 भाग।
- विभागीय समितियों द्वारा जाँच: लेखानुदान पारित होने के बाद, विभागीय समितियाँ अनुदान मांगों की जाँच करती हैं।
- अनुदान मांगों पर मतदान: विभागीय रिपोर्ट के आधार पर मतदान किया जाता है। विपक्ष द्वारा कटौती प्रस्ताव प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
कटौती प्रस्ताव के प्रकार:
- नीति अनुमोदन कटौती: मांग की राशि घटाकर ₹1 कर दी जाती है, यह नीति के विरोध में होता है।
- मितव्ययता कटौती: मांग की राशि में विशेष कमी की जाती है।
- सांकेतिक कटौती: मांग की राशि में ₹100 की कमी, किसी विशेष शिकायत को व्यक्त करने हेतु।
- विनियोग विधेयक (अनु. 204): संचित निधि से राशि निकालने के लिए विनियोग विधेयक पारित किया जाता है। इसे धन विधेयक भी कहा जाता है।
- वित्त विधेयक का पारित होना: आगामी वित्त वर्ष के लिए बजट से संबंधित प्रस्ताव लागू करने हेतु वार्षिक वित्त विधेयक प्रस्तुत किया जाता है।
अनुदान के प्रकार:
- अनुपूरक अनुदान (अनु. 205): बजट में स्वीकृत राशि से अधिक आवश्यकता होने पर, सरकार अनुपूरक अनुदान मांगती है।
- अतिरिक्त/अधिक अनुदान (अनु. 205): किसी सेवा के लिए स्वीकृत राशि से अधिक धन होने पर अतिरिक्त अनुदान माँगा जाता है।
- प्रत्ययानुदान (अनु. 206): आकस्मिक और अनिश्चित आवश्यकताओं के लिए, जिन्हें बजट में सम्मिलित करना संभव नहीं होता, प्रत्ययानुदान पारित किया जाता है। इसे “ब्लैंक चेक” कहा जाता है।
- अपवादानुदान (अनु. 206): सरकार की भविष्य की योजनाओं से संबंधित व्यय, जो वर्तमान वित्त वर्ष की मद से संबंधित नहीं होता।
राजस्थान विधान सभा
- राजस्थान में एक सदनीय विधायिका है।
- विधानसभा
- स्वतंत्रता पूर्व: सितंबर 1945 में जयपुर महाराजा मानसिंह द्वितीय द्वारा द्विसदनीय विधानमंडल (धारा सभा और प्रतिनिधि सभा) का गठन किया गया था।
- प्रथम गठन: देश का संविधान लागू होने के बाद प्रथम आम चुनाव जनवरी 1952 में हुए। 23 फरवरी, 1952 को 160 सदस्यीय प्रथम विधानसभा का गठन हुआ।
- प्रथम बैठक: 29 मार्च, 1952 को जयपुर के सवाई मानसिंह टाउन हॉल में आयोजित की गई।
- विधानसभा भवन: ज्योति नगर, जयपुर में स्थित नए भवन का लोकार्पण 6 नवंबर, 2001 को तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन द्वारा किया गया।
- राजस्थान के पहली विधानसभा के चुनाव 1952 में 6 प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हुए जो सभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के थे –
- श्री घासीराम यादव (मण्डावर-एक सदस्यीय)
- श्री सम्पत राम (लक्ष्मणगढ़-राजगढ़ द्वि सदस्यीय)
- श्री जयचन्द (बड़ी सादड़ी कपासन-द्वि सदस्यीय)
- लक्ष्मण भील (सराड़ा सलूम्बर द्वि सदस्यीय क्षेत्र से)
- श्री हजारी लाल (कोटपुतली)
- श्री हरीराम (बागीडोरा)
- राजस्थान के प्रथम विधानसभा आम चुनाव 1952 में केवल चार महिलाएँ प्रत्याशी के रूप में खड़ी हुईं और चारों ही चुनाव हार गईं अर्थात् इस चुनाव में कोई भी महिला प्रत्याशी विधायक नहीं बन पायी। वे चार क्षेत्र एवं महिलाएँ निम्नानुसार रहीं-
- चिरंजी देवी फागी के. एल.पी. पार्टी
- वीरेन्द्रा बाई जयपुर शहर निर्दलीय \
- शांता देवी उदयपुर शहर निर्दलीय
- रानी देवी सोजत मेन जनसंघ
- राजस्थान के प्रथम विधान चुनाव 1952-1957 की अवधि में उप-चुनाव सम्पन्न हुए, जिसमें बांसवाड़ा की विधानसभा क्षेत्र की सामान्य सीट से 1953 में जीतकर राजस्थान में पहली महिला विधायक के रूप में यशोदा देवी विधानसभा पहुँची।
- वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जीत कर विधानसभा पहुँची।
- इन्हें राज्य की प्रथम विधानसभा की प्रथम महिला बनने का गौरव प्राप्त हुआ
- प्रथम विधानसभा में उप-चुनाव में जीतकर आने वाली दूसरी महिला श्रीमती कमला बेनीवाल थी जो 1954 में विधायक बनी।
- अशोक गहलोत सरकार ने पहली बार 18 अप्रैल, 2012 को विधान सभा से उच्च सदन (विधान परिषद्) के गठन का प्रस्ताव पारित करवाकर केन्द्र सरकार को भेजा था जिसे मंत्रिमण्डल की स्वीकृति भी मिल गयी थी, परन्तु अभी तक राजस्थान में विधान परिषद् का गठन होना शेष है।
- राजस्थान में विधान सभा के प्रथम आम चुनाव 1952 में प्रारम्भ:-हुए और अब तक (2023 तक) विधान सभा के 16 आम चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं।
- अब तक राज्य में कांग्रेस ने 10 बार एवं बीजेपी ने 5 बार सरकार का गठन किया है।
- सीटों का विस्तार: 1977 के परिसीमन में सदस्य संख्या बढ़ाकर 200 कर दी गई। छठी विधानसभा (1977) से अब तक यह संख्या 200 ही बनी हुई है।
- आरक्षण की स्थिति: कुल 200 सीटों में से 34 सीटें अनुसूचित जाति (SC) और 25 सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं।
- सर्वाधिक सीटें: जयपुर जिला (19 सीटें) और अलवर जिला (11 सीटें)।
- न्यूनतम सीटें: प्रतापगढ़ (2 सीटें) और जैसलमेर (2 सीटें)।
- मतदाता: झोटवाड़ा (जयपुर) क्षेत्र में सर्वाधिक पंजीकृत मतदाता हैं, जबकि बसेड़ी (धौलपुर) में सबसे कम।
- ईवीएम (EVM): वर्ष 2003 की 12वीं विधानसभा में पहली बार पूरे राज्य में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का उपयोग किया गया।
- 1980 में भारतीय जनता पार्टी का राजस्थान की राजनीति में प्रवेश हुआ।
- 1977 से पहले यहाँ एक दल की प्रधानता रही है । राजस्थान में पहली बार 1977 में गैर कांग्रेसी सरकार भेंरोसिंह शेखावत के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी।
- श्री हरिदेव जोशी: कांग्रेस के नेता हरिदेव जोशी देश के एकमात्र ऐसे विधायक थे, जिन्होंने प्रथम 10 विधानसभा चुनाव लगातार जीते थे।
राजस्थान विधानसभा: वर्षवार स्थिति एवं राजनीतिक सफर (1952 – 2023)
| वर्ष | विधानसभा | कुल सीटें | सबसे बड़ा दल (सीटें) |
| 1952 | प्रथम | 160 | कांग्रेस (82) |
| 1957 | द्वितीय | 176 | कांग्रेस (119) |
| 1962 | तृतीय | 176 | कांग्रेस (89) |
| 1967 | चतुर्थ | 184 | कांग्रेस (103) |
| 1972 | पंचम | 184 | कांग्रेस (145) |
| 1977 | छठी | 200 | जनता पार्टी (150) |
| 1980 | सातवीं | 200 | कांग्रेस (133) |
| 1985 | आठवीं | 200 | कांग्रेस (113) |
| 1990 | नौवीं | 200 | भाजपा (84) |
| 1993 | दसवीं | 200 | भाजपा (95) |
| 1998 | ग्यारहवीं | 200 | कांग्रेस (152) |
| 2003 | बारहवीं | 200 | भाजपा (123) |
| 2008 | तेरहवीं | 200 | कांग्रेस (102) |
| 2013 | चौदहवीं | 200 | भाजपा (163) |
| 2018 | पंद्रहवीं | 200 | कांग्रेस (99) |
| 2023 | सोलहवीं | 200 | भाजपा (115) |
- 1952 में सीटें 160 थीं, जो 1977 (छठी विधानसभा) से बढ़कर 200 हो गईं और तब से स्थिर हैं।
- राज्य में अब तक कांग्रेस ने 10 बार और भाजपा (जनसंघ/जनता पार्टी सहित) ने 6 बार (1977, 1990, 1993, 2003, 2013, 2023) मुख्य भूमिका निभाई है।
- 2013 में भाजपा की 163 सीटें राजस्थान के चुनावी इतिहास में किसी भी दल की अब तक की सबसे बड़ी जीत है।
राजस्थान विधानसभा की कार्य प्रणाली
मंत्रिपरिषद में अविश्वास प्रस्ताव (नियम 132)
- यह प्रस्ताव विपक्षी दल द्वारा सरकार के प्रति अविश्वास प्रकट करने के लिए लाया जाता है।
- प्रस्तुतीकरण की प्रक्रिया:
- समय: अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुमति प्रश्नों के तुरंत बाद और उस दिन की कार्यसूची (Business of the day) शुरू होने से पहले मांगी जाती है।
- सूचना: प्रस्ताव लाने वाले सदस्य को बैठक शुरू होने से पहले सचिव के पास लिखित सूचना देनी अनिवार्य है।
- अध्यक्ष की भूमिका: यदि अध्यक्ष की राय में प्रस्ताव नियमानुकूल है, तो वह सदन में प्रस्ताव पढ़कर सुनाएंगे और समर्थन करने वाले सदस्यों को अपने स्थान पर खड़े होने को कहेंगे।
- न्यूनतम समर्थन: यदि सदन की कुल सदस्य संख्या के पांचवें भाग (1/5) यानी राजस्थान विधानसभा के कम से कम 40 सदस्य पक्ष में खड़े हो जाएं, तो अध्यक्ष अनुमति प्रदान कर देता है।
- चर्चा का समय: अनुमति मिलने के बाद प्रस्ताव पर चर्चा किसी ऐसे दिन होगी जो अनुमति मिलने के दिन से 10 दिन के भीतर हो।
- महत्वपूर्ण तथ्य: यदि आवश्यक सदस्य (40) खड़े नहीं होते, तो अनुमति नहीं दी जाती। अविश्वास प्रस्ताव की अनुमति स्वयं विधानसभा देती है।
- ऐतिहासिक संदर्भ (अविश्वास प्रस्ताव):
- प्रथम बार: अक्टूबर 1952 में मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल के विरुद्ध लाया गया था।
- कुल अवसर: अब तक कुल 13 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है।
- परिणाम: आज तक एक भी अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं हुआ है।
- अंतिम बार: वर्ष 1985 में मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी के विरुद्ध लाया गया था।
- राजस्थान के मुख्यमंत्री जिनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया (लेकिन कभी पारित नहीं हुआ):
- टीकाराम पालीवाल – प्रथम विधानसभा
- मोहनलाल सुखाड़िया – द्वितीय विधानसभा तथा तृतीय विधानसभा में 5 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया।
- बरकतुल्ला खाँ – चौथी विधानसभा
- हरिदेव जोशी – पाँचवी विधानसभा तथा आठवीं विधानसभा में भी
- भैरोंसिंह शेखावत – छठवीं विधानसभा में 2 बार
- जगन्नाथ पहाड़िया – सातवीं विधानसभा
राजस्थान विधानसभा: अविश्वास प्रस्तावों का विवरण
| क्र.सं. | विधानसभा | मुख्यमंत्री (पार्टी) | प्रस्तावक सदस्य (पार्टी सहित) | तिथि | परिणाम |
| 1. | प्रथम | टीकाराम पालीवाल (कांग्रेस) | इन्द्रनाथ मोदी (निर्दलीय) | 10, 17, 21 अक्टू. 1952 | ध्वनि मत से खारिज |
| 2. | द्वितीय | मोहन लाल सुखाड़िया (कांग्रेस) | राजा मान सिंह (निर्दलीय), भैरोंसिंह शेखावत (जनसंघ) | 19, 20 फरवरी 1958 | ध्वनि मत से खारिज |
| 3. | तृतीय | मोहन लाल सुखाड़िया (कांग्रेस) | रामकिशन (समाजवादी), मुरलीधर व्यास (प्रजा समाजवादी) | 05 अप्रैल 1962 | गणपूर्ति अभाव (अनुमति नहीं) |
| 4. | तृतीय | मोहन लाल सुखाड़िया (कांग्रेस) | लक्ष्मण सिंह, भैरोंसिंह शेखावत, मुरलीधर व्यास, उमराव चौधरी, मुकुट बिहारी गोयल | 26-28 अगस्त 1963 | ध्वनि मत से खारिज |
| 5. | तृतीय | मोहन लाल सुखाड़िया (कांग्रेस) | लक्ष्मण सिंह, भैरोंसिंह शेखावत, मुरलीधर व्यास, हरी राम चौहान | 20, 28-30 अक्टू. 1964 | ध्वनि मत से खारिज |
| 6. | तृतीय | मोहन लाल सुखाड़िया (कांग्रेस) | सतीश चन्द्र अग्रवाल (जनसंघ) | 16 अप्रैल 1965 | गणपूर्ति अभाव (अनुमति नहीं) |
| 7. | तृतीय | मोहन लाल सुखाड़िया (कांग्रेस) | लक्ष्मण सिंह (निर्दलीय) | 26-29 सितम्बर 1966 | ध्वनि मत से खारिज |
| 8. | चतुर्थ | बरकतुल्लाह खान (कांग्रेस) | मनोहर सिंह (निर्दलीय) | 15, 16 नवम्बर 1971 | ध्वनि मत से खारिज |
| 9. | पंचम | हरिदेव जोशी (कांग्रेस) | प्रो. केदार (समाजवादी), मीठालाल (निर्दलीय), भानु कुमार शास्त्री, मनोहर सिंह | 28 अगस्त 1974 | गणपूर्ति अभाव (अनुमति नहीं) |
| 10. | छठी | भैरोंसिंह शेखावत (जनता पार्टी) | लक्ष्मण सिंह, परसराम मदेरणा, मथुरादास माथुर, शोपत सिंह, नवनीत पालीवाल, नूरा | – | ध्वनि मत से खारिज |
| 11. | छठी | भैरोंसिंह शेखावत (जनता पार्टी) | गुल्मोहन, नवनीत पालीवाल (जनता पार्टी) | 25, 26, 28 सितम्बर 1979 | प्रस्ताव वापस ले लिया गया |
| 12. | सातवीं | जगन्नाथ पहाड़िया (कांग्रेस) | यदुनाथ सिंह, ललित किशोर चतुर्वेदी (BJP), राजबहादूर, मेघराज तंवर, त्रिलोक सिंह | 03 अप्रैल 1981 | ध्वनि मत से खारिज |
| 13. | आठवीं | हरिदेव जोशी (कांग्रेस) | भैरोंसिंह शेखावत (BJP), नाथू राम मिर्धा (लोकदल), प्रो. केदार, शोपत सिंह | 29 जुलाई 1985 | ध्वनि मत से खारिज |
मंत्रिपरिषद में विश्वास प्रस्ताव (नियम 132-क)
- यह प्रस्ताव स्वयं सरकार (सत्ता पक्ष) द्वारा अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए लाया जाता है।
- मुख्य प्रावधान:
- प्राथमिकता (Precedence): यदि नियम 132 (अविश्वास) और नियम 132-क (विश्वास) दोनों की सूचना प्राप्त हो, तो विश्वास प्रस्ताव को अविश्वास प्रस्ताव पर प्राथमिकता दी जाएगी।
- प्रक्रिया: इसे भी सदन में चर्चा के बाद मतदान के लिए रखा जाता है।
- ऐतिहासिक संदर्भ (विश्वास प्रस्ताव):
- कुल विश्वास प्रस्ताव: 05 बार (सभी सफल रहे)।
- नेतृत्ववार विभाजन:
- भैरोंसिंह शेखावत: 3 बार (1990 में दो बार, 1993 में एक बार)।
- अशोक गहलोत: 2 बार (2009 और 2020 में)।
- सर्वाधिक बहुमत: 15वीं विधानसभा में अशोक गहलोत सरकार के पक्ष में 124 मत पड़े।
- प्रथम प्रस्तावक: मुख्यमंत्री स्वयं (1990)।
- अंतिम प्रस्तावक: शांति धारीवाल (संसदीय कार्य मंत्री के रूप में)
राजस्थान विधानसभा: विश्वास प्रस्तावों का विवरण
| क्र.सं. | विधानसभा | मुख्यमंत्री (पार्टी) | सदस्य संख्या | प्रस्तावक सदस्य | तिथि | परिणाम व बहुमत |
| 1. | 9वीं | भैरोंसिंह शेखावत (भाजपा) | 85/200 | भैरोंसिंह शेखावत | 23.03.1990 | मंजूरी (ध्वनिमत से पारित) |
| 2. | 9वीं | भैरोंसिंह शेखावत (भाजपा) | 85/200 | ओम प्रकाश गुप्ता | 08.11.1990 | मंजूरी (पक्ष: 116, विपक्ष: 80) |
| 3. | 10वीं | भैरोंसिंह शेखावत (भाजपा) | 95/200 | भैरोंसिंह शेखावत | 31.12.1993 | मंजूरी (पक्ष: 108, विपक्ष: 00) |
| 4. | 13वीं | अशोक गहलोत (कांग्रेस) | 96/200 | अशोक गहलोत | 03.01.2009 | मंजूरी (ध्वनिमत से पारित) |
| 5. | 15वीं | अशोक गहलोत (कांग्रेस) | 107/200 | शांति धारीवाल | 14.08.2020 | मंजूरी (पक्ष: 124, ध्वनिमत से) |
राजस्थान विधानसभा (अधिकारियों तथा सदस्यों की परिलब्धियां और पेंशन) विधेयक 2019
- प्रभावी तिथि: ये सभी वेतनमान 1 अप्रैल, 2019 से प्रभावी हैं।
- अतिरिक्त सुविधाएँ: वेतन और भत्तों के अलावा इन पदों पर आसीन व्यक्तियों को राजकीय आवास, वाहन, चिकित्सा सुविधा और टेलीफोन व्यय जैसी अन्य सुविधाएँ नियमानुसार देय होती हैं।
- विधायक पेंशन: पूर्व विधायकों के लिए भी पेंशन का प्रावधान इसी अधिनियम के तहत तय किया जाता है।
राजस्थान सरकार के मंत्रियों का वेतन एवं सत्कार भत्ता
| क्र. सं. | पद | वेतन भत्ता (₹) | सत्कार भत्ता (₹) | कुल (प्रति माह) |
| 1 | मुख्यमंत्री | 75,000 | 85,000 | 1,60,000 |
| 2 | उपमुख्यमंत्री | 65,000 | 80,000 | 1,45,000 |
| 3 | मंत्री (कैबिनेट) | 65,000 | 80,000 | 1,45,000 |
| 4 | राज्यमंत्री | 62,000 | 80,000 | 1,42,000 |
| 5 | उपमंत्री | 60,000 | 60,000 | 1,20,000 |
विधानसभा अधिकारियों एवं विधायकों की परिलब्धियां
| क्र. सं. | पदनाम | वेतन भत्ता (₹) | सत्कार/ निर्वाचन भत्ता (₹) | कुल (प्रति माह) |
| 1 | विधानसभा अध्यक्ष | 70,000 | 80,000 (सत्कार) | 1,50,000 |
| 2 | विधानसभा उपाध्यक्ष | 65,000 | 80,000 (सत्कार) | 1,45,000 |
| 3 | नेता प्रतिपक्ष | 65,000 | 80,000 (सत्कार) | 1,45,000 |
| 4 | मुख्य सचेतक | 65,000 | 80,000 (सत्कार) | 1,45,000 |
| 5 | उप मुख्य सचेतक | 62,000 | 70,000 (सत्कार) | 1,32,000 |
| 6 | विधायक (MLA) | 40,000 | 70,000 (निर्वाचन क्षेत्र भत्ता) | 1,10,000 |
राजस्थान विधानसभा: निर्वाचन, शपथ एवं कार्यप्रणाली
- शपथ एवं पद: अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में कोई अलग शपथ नहीं होती (वे केवल ‘विधानसभा सदस्य’ के रूप में ही शपथ लेते हैं)।
- अध्यक्ष का निर्वाचन: निर्वाचन की तिथि राज्यपाल निश्चित करता है (प्रत्याशी का नाम लिखित रूप में सचिव को दिया जाता है, जिसका एक सदस्य प्रस्ताव और दूसरा अनुमोदन करता है; कोई सदस्य स्वयं का नाम प्रस्तावित नहीं कर सकता)।
- उपाध्यक्ष का निर्वाचन: निर्वाचन की तिथि अध्यक्ष निश्चित करता है (प्रक्रिया अध्यक्ष के निर्वाचन के समान ही होती है; बहुमत से स्वीकृत होने पर पीठासीन व्यक्ति निर्वाचित सदस्य की घोषणा करता है)।
- सभापति तालिका: अध्यक्ष सदस्यों में से अधिकतम 4 सभापतियों की एक तालिका मनोनीत करता है (अध्यक्ष व उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में इनमें से कोई एक सदन की अध्यक्षता कर सकता है)।
- सदन की बैठक एवं समय: बैठक तभी वैध होगी जब अध्यक्ष या कोई सदस्य पीठासीन हो (सामान्यतः समय सुबह 11:00 से शाम 5:00 बजे तक होता है; बैठकों के दिन और स्थगन का निर्णय ‘अध्यक्ष’ करता है)।
- सचिव की भूमिका: सचिव प्रतिदिन की कार्य सूची तैयार करता है (विधेयकों और प्रस्तावों की ग्राह्यता (Admissibility) का अंतिम निर्णय अध्यक्ष द्वारा लिया जाता है)।
राजस्थान विधानसभा समितियां
- विधानसभा में दो प्रकार की समितियाँ होती हैं—
- तदर्थ (Ad-hoc) समितियाँ (विशेष परिस्थितियों के लिए गठित)
- स्थाई (Standing) समितियाँ (कुल संख्या 22; कार्यकाल 1 वर्ष)।
- वर्तमान स्थिति (16वीं विधानसभा): वर्ष 2025-26 हेतु कुल 18 समितियों का गठन किया गया है (इनमें 17 स्थाई समितियाँ—जिनमें 4 वित्तीय समितियाँ शामिल हैं—और 1 ‘राजस्थान कोचिंग सेंटर विधेयक 2025’ पर गठित प्रवर समिति है)।
- वित्तीय समितियाँ: इनकी संख्या 4 है—
- लोक लेखा – सरकारी खर्चों की ऑडिट रिपोर्ट की जाँच
- राजकीय उपक्रम – सार्वजनिक उपक्रमों के लेखों की जाँच
- प्राक्कलन’क’ – बजट अनुमानों और मितव्ययिता की जाँच
- प्राक्कलन ‘ख’ – बजट अनुमानों और मितव्ययिता की जाँच
- (इनके सदस्यों का चुनाव ‘एकल संक्रमणीय मत’ द्वारा होता है, जबकि अन्य 18 समितियों के सदस्य अध्यक्ष द्वारा मनोनीत होते हैं)।
- अध्यक्ष एवं सदस्यता: सभी समितियों के अध्यक्षों का मनोनयन विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है (इनमें सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों के सदस्य होते हैं, लेकिन ‘मंत्री’ इनका सदस्य नहीं हो सकता; अपवाद: मुख्यमंत्री ‘कार्य मंत्रणा समिति’ में रह सकते हैं)।
- रिपोर्ट प्रस्तुतीकरण: समितियाँ अपनी रिपोर्ट विधानसभा को देती हैं (यदि विधानसभा का सत्र नहीं चल रहा हो, तो रिपोर्ट ‘विधानसभा अध्यक्ष’ को सौंपी जाती है)।
- स्थायी समितियों में अधिकतम 15 सदस्य हो सकते हैं।
- किसी भी मंत्री को इन समितियों में अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता।
- समिति के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल 1 वर्ष का होता है।
- सदस्यों का चयन आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर किया जाता है।
- गणपूर्ति के लिए 1/3 सदस्य आवश्यक होते हैं।
- अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति विधानसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।
राजस्थान विधानसभा: समितियों के सभापति (2026)
| क्रम | समिति का नाम | सभापति |
| 1. | कार्य सलाहकार समिति | वासुदेव देवनानी (पदेन अध्यक्ष) |
| 2. | सामान्य प्रयोजनों संबंधी समिति | वासुदेव देवनानी (पदेन अध्यक्ष) |
| 3. | नियम समिति | वासुदेव देवनानी (पदेन अध्यक्ष) |
| 4. | प्राक्कलन समिति ‘क’ | अर्जुनलाल जीनगर |
| 5. | प्राक्कलन समिति ‘ख’ | बाबू सिंह राठौड़ |
| 6. | राजकीय उपक्रम समिति | कालीचरण सर्राफ |
| 7. | लोक लेखा समिति | टीकाराम जूली |
| 8. | गृह, स्थानीय निकाय एवं पंचायती राज संस्थान संबंधी समिति | जितेन्द्र कुमार गोठवाल |
| 9. | पुस्तकालय एवं सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति | हरिसिंह रावत |
| 10. | याचिका एवं सदाचार समिति | कैलाश चन्द वर्मा |
| 11. | पिछड़े वर्ग के कल्याण संबंधी समिति | नरेन्द्र बुडानियां |
| 12. | अल्पसंख्यकों के कल्याण एवं पर्यावरण संबंधी समिति | डॉ. दयाराम परमार |
| 13. | अनुसूचित जाति कल्याण समिति | डॉ. विश्वनाथ मेघवाल |
| 14. | अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति | फूलसिंह मीणा |
| 15. | महिला एवं बालक कल्याण संबंधी समिति | श्रीमती कल्पना देवी |
| 16. | विशेषाधिकार एवं अधीनस्थ विधान संबंधी समिति | केसाराम चौधरी |
| 17. | प्रश्न एवं संदर्भ समिति | संदीप शर्मा |
समितियों से जुड़े महत्वपूर्ण नियम (संसदीय परंपरा):
- मंत्री की सदस्यता पर रोक: विधानसभा की किसी भी स्थाई समिति (जैसे लोक लेखा, प्राक्कलन आदि) का सदस्य राजस्थान सरकार का कोई भी मंत्री नहीं हो सकता।
- पद त्याग: यदि समिति का कोई सदस्य अपने कार्यकाल के दौरान मंत्री पद पर नियुक्त हो जाता है, तो वह नियुक्ति की तिथि से ही समिति का सदस्य नहीं रहेगा।
- संसदीय परामर्शदात्री समिति: इस समिति की अध्यक्षता हमेशा मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) या उस विभाग का राज्यमंत्री ही करता है।
- लोकलेखा समिति के अध्यक्ष आमतौर पर विपक्ष के नेता होते हैं।
- नियम समिति की अध्यक्षता स्वयं विधानसभा अध्यक्ष करते हैं।
राजस्थान विधानसभा: अध्यक्ष एवं उपाध्यक्षों की सूची
|
विधानसभा |
कार्यकाल |
विधानसभा अध्यक्ष |
विधानसभा उपाध्यक्ष |
|
प्रथम |
1952 – 1957 |
नरोत्तम लाल जोशी |
लाल सिंह शक्तावत |
|
द्वितीय |
1957 – 1962 |
राम निवास मिर्धा |
निरंजन नाथ आचार्य |
|
तृतीय |
1962 – 1967 |
राम निवास मिर्धा |
नारायण सिंह मसूदा |
|
चतुर्थ |
1967 – 1972 |
निरंजन नाथ आचार्य |
1. पूनम चंद विश्नोई, 2. रामनारायण चौधरी |
|
पंचम |
1972 – 1977 |
राम किशोर व्यास |
राम सिंह यादव |
|
षष्ठम |
1977 – 1980 |
1. लक्ष्मण सिंह, 2. गोपाल सिंह |
राम चन्द्र |
|
सप्तम |
1980 – 1985 |
पूनम चंद विश्नोई |
अहमद बक्शी सिंधी |
|
अष्ठम |
1985 – 1990 |
हीरा लाल देवपुरा, गिरिराज प्रसाद तिवाड़ी, पूनमचंद विश्नोई |
गिरिराज प्रसाद तिवाड़ी, किशन मोटवानी |
|
नवमी |
1990 – 1992 |
हरी शंकर भाभड़ा |
यदुनाथ सिंह,हीरा सिंह चौहान |
|
दशमी |
1993 – 1998 |
शांति लाल चपलोत समरथ लाल मीणा |
शांति लाल चपलोत, समरथ लाल मीणा, तारा भंडारी |
|
ग्यारहवीं |
1998 – 2003 |
समरथ लाल मीणा, परसराम मदेरणा |
देवेंद्र सिंह |
|
बारहवीं |
2003 – 2008 |
सुमित्रा सिंह (प्रथम महिला अध्यक्ष) |
रामनारायण विश्नोई |
|
तेरहवीं |
2008 – 2013 |
दीपेंद्र सिंह शेखावत |
रामनारायण मीणा |
|
चौदहवीं |
2013 – 2018 |
कैलाश चन्द्र मेघवाल |
राव राजेंद्र सिंह |
|
पन्द्रहवीं |
2018 – 2023 |
सी.पी. जोशी |
रिक्त |
|
सोलहवीं |
2023 – वर्तमान |
वासुदेव देवनानी |
रिक्त |
विधानसभा अध्यक्ष (Speaker)
- प्रथम अध्यक्ष: नरोत्तम लाल जोशी (झुंझुनू से; प्रथम विधानसभा में निर्वाचित)।
- सर्वाधिक कार्यकाल: रामनिवास मिर्धा (दो बार अध्यक्ष रहे; दूसरी और तीसरी विधानसभा में)।
- न्यूनतम कार्यकाल: समर्थ लाल मीणा (सबसे कम समय तक अध्यक्ष का पद संभाला)।
- प्रथम गैर-कांग्रेसी अध्यक्ष: लक्ष्मण सिंह (छठी विधानसभा के दौरान; जनता पार्टी की सरकार में)।
- पूर्व मुख्यमंत्री जो अध्यक्ष रहे: हीरालाल देवपुरा (आठवीं विधानसभा में; वे राजस्थान के मुख्यमंत्री भी रह चुके थे)।
- प्रथम महिला अध्यक्ष: सुमित्रा सिंह (12वीं विधानसभा में; झुंझुनू से निर्वाचित)।
- राम निवास मिर्धा: सर्वाधिक समय तक अध्यक्ष रहे और बाद में राज्यसभा में उप-सभापति भी रहे।
- हरी शंकर भाभड़ा: विधानसभा अध्यक्ष के साथ-साथ राज्य के उप-मुख्यमंत्री भी रहे।
- ऐसे विधानसभा अध्यक्ष जो प्रोटेम स्पीकर तथा नेता प्रतिपक्ष भी रहे- लक्ष्मणसिंह
- जिन विधानसभा अध्यक्षों के विरुद्ध हटाने का प्रस्ताव लाया गया, लेकिन यह कभी पारित नहीं हुआ-
- नरोत्तम लाल जोशी (प्रथम विधानसभा 2 बार)
- निरंजन नाथ आचार्य (चौथी विधानसभा)
- गिरीराज प्रसाद तिवारी (आठवीं विधानसभा)
- शांतिलाल चपलोत (दसवीं विधानसभा 2 बार)
विधानसभा उपाध्यक्ष (Deputy Speaker)
- प्रथम उपाध्यक्ष: लाल सिंह शक्तावत (प्रथम विधानसभा के दौरान नियुक्त)।
- प्रथम महिला उपाध्यक्ष: तारा भंडारी (10वीं विधानसभा में; भाजपा सरकार के दौरान)।
- न्यूनतम कार्यकाल (उपाध्यक्ष): तारा भंडारी एवं रामनारायण चौधरी (मात्र 125 दिन का कार्यकाल)।
विशिष्ट व्यक्तित्व एवं उपलब्धियाँ
- पूनम चंद विश्नोई: एकमात्र व्यक्ति जो राजस्थान विधानसभा में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और प्रोटेम स्पीकर तीनों महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
- उपाध्यक्ष जो बाद में अध्यक्ष बने:
- निरंजन नाथ आचार्य
- पूनमचंद विश्नोई
- गिरिराज प्रसाद तिवाड़ी
- शांति लाल चपलोत
- समर्थ लाल मीणा
राजस्थान विधानसभा: प्रोटेम स्पीकर
- नियुक्ति एवं शपथ: प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति राजस्थान के राज्यपाल द्वारा की जाती है (राज्यपाल ही इन्हें पद की शपथ दिलाते हैं; सामान्यतः सदन के सबसे वरिष्ठ सदस्य को इस पद हेतु चुना जाता है)।
- अर्थ एवं कार्यकाल: ‘प्रोटेम’ शब्द का अर्थ है ‘कुछ समय के लिए’ (इनका मुख्य कार्य नवनिर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाना और नए अध्यक्ष के चुनाव का संचालन करना है; नए अध्यक्ष के चुने जाते ही इनका कार्यकाल स्वतः समाप्त हो जाता है)।
राजस्थान विधानसभा के प्रोटेम स्पीकर्स की सूची
| विधानसभाक्रम | प्रोटेम स्पीकर का नाम |
| 1. | महाराव संग्राम सिंह (प्रथम), जय नारायण व्यास (द्वितीय) |
| 2. | नारायण सिंह मसूदा |
| 3. | नारायण सिंह मसूदा |
| 4. | पूनम चंद विश्नोई |
| 5. | यशवंत सिंह नाहर |
| 6. | मेजर फतेह सिंह |
| 7. | परसराम मदेरणा |
| 8. | लक्ष्मण सिंह |
| 9. | पूनम चंद विश्नोई |
| 10. | पूनम चंद विश्नोई |
| 11. | भैरोंसिंह शेखावत |
| 12. | गंगाराम चौधरी |
| 13. | देवी सिंह भाटी |
| 14. | प्रद्युम्न सिंह |
| 15. | गुलाब चंद कटारिया |
| 16. | कालीचरण सराफ |
- सर्वाधिक अवसर: पूनम चंद विश्नोई सबसे अधिक तीन बार (4थी, 9वीं और 10वीं विधानसभा) प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किए गए हैं।
- मुख्यमंत्री जो प्रोटेम स्पीकर रहे: राजस्थान के दो मुख्यमंत्री सदन के सदस्यों को शपथ दिलाने हेतु इस पद पर रहे हैं।
- जय नारायण व्यास
- भैरोंसिंह शेखावत
- प्रोटेम स्पीकर, जो नेता प्रतिपक्ष भी रहे –
- लक्ष्मण सिंह
- परसराम मदेरणा
- भैरों सिंह शेखावत
- गुलाबचंद कटारिया
राजस्थान विधानसभा: नेता प्रतिपक्ष की सूची
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विधानसभा |
नेता प्रतिपक्ष |
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प्रथम |
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द्वितीय |
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तृतीय |
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चतुर्थ |
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पंचम |
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षष्ठम |
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सप्तम |
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अष्ठम |
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नवमी |
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दशमी |
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ग्यारहवीं |
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बारहवीं |
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तेरहवीं |
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चौदहवीं |
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पन्द्रहवीं |
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सोलहवीं |
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- मुख्यमंत्री जो नेता प्रतिपक्ष भी रहे
- भैरों सिंह शेखावत: सर्वाधिक 3 बार (7वीं, 8वीं, 11वीं विधानसभा)।
- हरिदेव जोशी
- वसुंधरा राजे
- सर्वाधिक कार्यकाल – लक्ष्मण सिंह – सर्वाधिक 4 विधानसभाओं में नेता प्रतिपक्ष रहे।
- नेता प्रतिपक्ष जो विधानसभा अध्यक्ष भी रहे
- लक्ष्मण सिंह
- परसराम मदेरणा
- नेता प्रतिपक्ष जो प्रोटेम स्पीकर भी रहे
- लक्ष्मण सिंह
- परसराम मदेरणा
- भैरों सिंह शेखावत
- गुलाबचंद कटारिया
