सामाजिक अंकेक्षण एवं शिकायत निवारण प्रणाली भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही एवं जनभागीदारी सुनिश्चित करता है। इसके माध्यम से नागरिक सरकारी योजनाओं और कार्यों का मूल्यांकन करते हैं तथा अपनी शिकायतों का प्रभावी समाधान प्राप्त करते हैं। यह व्यवस्था सुशासन को सुदृढ़ बनाने और प्रशासनिक उत्तरदायित्व बढ़ाने में सहायक होती है।
सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit)
परिभाषा
- सामाजिक अंकेक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी योजना या कार्यक्रम का मूल्यांकन सरकार और जनता (विशेषकर लाभार्थी) मिलकर करते हैं। यह आधिकारिक रिकॉर्ड की तुलना जमीनी हकीकत से करने का एक तरीका है।
- यह समाज से जुड़े कार्यक्रमों के निष्पादन (Performance) के मूल्यांकन की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच प्रक्रिया है।
ऐतिहासिक विकास और जन आंदोलन
- मज़दूर किसान शक्ति संगठन (1990): राजस्थान में ‘जन सुनवाई’ के माध्यम से पारदर्शिता की शुरुआत।
- भ्रष्टाचार का खुलासा: जन सुनवाई से नकली विकास कार्यों और आधे-अधूरे भवनों के गबन का पता चला।
- प्रमुख मांगें: रिकॉर्ड का खुलासा, अधिकारियों की जवाबदेही, शिकायतों का त्वरित समाधान और अनिवार्य सोशल ऑडिट।
- नारा: “हमारा पैसा, हमारा हिसाब”।
मुख्य उद्देश्य:
- तथ्यों की खोज (Fact Finding): इसका उद्देश्य गलतियाँ ढूँढना नहीं, बल्कि कमियों को सुधारना है।
- जनभागीदारी: इसमें ग्राम सभा और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भूमिका होती है।
- पारदर्शिता और जवाबदेही: सरकारी रिकॉर्ड और ज़मीनी वास्तविकता के बीच मिलान करना।
- भ्रष्टाचार पर रोक: बिचौलियों और फर्जी लाभार्थियों की पहचान करना।
वैधानिक स्थिति और राज्य स्तरीय प्रयास:
- MGNREGA 2005 (धारा 17): यह भारत का पहला कानून है जिसने ग्राम सभा द्वारा सामाजिक अंकेक्षण को अनिवार्य बनाया।
- सामाजिक अंकेक्षण नियम, 2011: ग्रामीण विकास मंत्रालय और CAG के परामर्श से इसे अधिसूचित किया गया, जिसमें स्वतंत्र ‘सामाजिक अंकेक्षण इकाइयों’ (SAU) की स्थापना का प्रावधान है।
- मेघालय: यह भारत का पहला राज्य है जिसने ‘सामाजिक अंकेक्षण’ को अनिवार्य बनाने के लिए राज्य कानून (2017) पारित किया।
- आंध्रप्रदेश: सोशल ऑडिट के माध्यम से सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए।
- सिक्किम, तमिलनाडु और झारखंड भी इस दिशा में सक्रिय हैं।
सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया
- अभिलेखों की उपलब्धता: कार्यान्वयन एजेंसी द्वारा सभी दस्तावेज सामाजिक अंकेक्षण टीम को दिए जाते हैं।
- सत्यापन: टीम दस्तावेजों का भौतिक सत्यापन (site visit) और लाभार्थियों से साक्षात्कार करती है।
- ग्राम सभा/जन सुनवाई: निष्कर्षों को सार्वजनिक रूप से ग्राम सभा में पढ़ा जाता है।
- रिपोर्ट प्रस्तुत करना: अंतिम रिपोर्ट जिला और राज्य स्तर पर भेजी जाती है।
प्रमुख उदाहरण
- MKSS (मजदूर किसान शक्ति संगठन): राजस्थान में अरुणा राय के नेतृत्व में ‘जन सुनवाई’ के माध्यम से सोशल ऑडिट की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया। नारा था: “हमारा पैसा, हमारा हिसाब”।
- NRCSA: सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग ने ‘नेशनल रिसोर्स सेल फॉर सोशल ऑडिट’ की स्थापना की है।
- SEBI: अब सामाजिक स्टॉक एक्सचेंज (SSE) पर पंजीकृत गैर-लाभकारी संगठनों के लिए भी सोशल ऑडिट अनिवार्य कर दिया गया है।
शिकायत निवारण प्रणाली
परिभाषा
- यह एक ऐसा तंत्र है जिसके माध्यम से नागरिक सरकारी सेवाओं या योजनाओं से संबंधित अपनी समस्याओं, शिकायतों या असंतोष को दर्ज कराते हैं और उनका समाधान पाते हैं।
प्रमुख घटक:
- विकेंद्रीकृत व्यवस्था: भारत में शिकायत निवारण प्रणाली मंत्रालय स्तर से लेकर पंचायत स्तर तक फैली हुई है।
- CPGRAMS (Centralized Public Grievance Redress and Monitoring System) – यह भारत सरकार का एक ऑनलाइन पोर्टल है जहाँ कोई भी नागरिक किसी भी मंत्रालय के खिलाफ शिकायत दर्ज कर सकता है।
- लोकपाल और लोकायुक्त: भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों के निवारण हेतु उच्च स्तरीय संस्थाएँ।
- लोकपाल और लोकायुक्त: भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों के लिए उच्च स्तरीय वैधानिक संस्थाएँ।
- सूचना और सुविधा काउंटर (IFC): विभागों में स्थापित काउंटर जो जानकारी देने और शिकायत दर्ज करने के लिए नोडल बिंदु का कार्य करते हैं।
सुधार हेतु सिफारिशें (ARC-II):
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने सुझाव दिया कि राज्यों में ‘स्वतंत्र लोक शिकायत निवारण प्राधिकरण’ होना चाहिए।
- तंत्र को सुलभ, सरल, त्वरित और निष्पक्ष होना चाहिए।
- शिकायत निवारण को सूचना के अधिकार (RTI) की तरह वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए।
प्रभावी प्रणाली की विशेषताएँ:
- पहुँच: शिकायत दर्ज करना आसान और निःशुल्क होना चाहिए।
- समय-सीमा: एक निश्चित समय के भीतर समाधान मिलना चाहिए।
- स्वतंत्रता: जाँच निष्पक्ष और बाहरी दबाव से मुक्त होनी चाहिए।
सामाजिक अंकेक्षण और शिकायत निवारण के बीच अंतर्संबंध
- सामाजिक अंकेक्षण और शिकायत निवारण एक-दूसरे के पूरक हैं:
- सामाजिक अंकेक्षण के दौरान जो अनियमितताएँ सामने आती हैं, वे ‘स्वतः शिकायत’ (Suo-moto complaint) के रूप में दर्ज की जाती हैं।
- सामाजिक अंकेक्षण रिपोर्ट के आधार पर जिला कार्यक्रम समन्वयक द्वारा 7-15 दिनों के भीतर जाँच और एक महीने के भीतर ‘Action Taken Report’ (ATR) प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है।
