अम्लीय वर्षा और जैवविविधता का क्षरण विश्व भूगोल का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो पर्यावरणीय संतुलन और जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता है। औद्योगिक प्रदूषण से उत्पन्न अम्लीय वर्षा प्राकृतिक संसाधनों को क्षति पहुँचाती है, जिससे जैव विविधता में निरंतर कमी आ रही है। यह समस्या वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन चुकी है, जिसके समाधान हेतु ठोस प्रयास आवश्यक हैं।
अम्लीय वर्षा
अम्ल वर्षा तब होती है जब उद्योगों से निकलने वाली गैसें जैसे सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO₂) वायुमंडलीय नमी के साथ अभिक्रिया करके अम्लीय यौगिक बनाती हैं।
मुख्य तथ्य:
- वायुमंडल में 60-90% अम्लता H₂SO₄ (सल्फ्यूरिक अम्ल) के कारण होती है, तथा 30-40% HNO₃ (नाइट्रिक अम्ल) के कारण होती है।
- रासायनिक प्रतिक्रियाएँ:
- SO₂ + H₂O → H₂SO₄ (सल्फ्यूरिक अम्ल)
- NO₂ + H₂O → HNO₃ (नाइट्रिक अम्ल)
- अम्ल वर्षा का pH मान 5 से 2.5 के बीच होता है, जो तटस्थ pH 7 से कम होता है और अधिक अम्लता को दर्शाता है।
- इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन आयन (H⁺) की सांद्रता बढ़ जाती है।
नोट – सामान्य वर्षा का pH लगभग 5.6 होता है। अम्ल वर्षा का pH सामान्यतः 4.2 से 4.4 के बीच होता है (US EPA, 2019)।

अम्लीय वर्षा के कारण
- अम्लीय वर्षा का प्रमुख कारण NO₂, SO₂, NO, CO आदि है।
- SO₂ और NO₂ के प्रमुख स्रोत-
मानवजनित:
- वाहन, कोयला तथा ताप विद्युत संयंत्र।
- ताप विद्युत स्टेशन जहाँ विद्युत उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में कोयला जलाया जाता है।
- पेट्रोलियम परिष्करण उद्योग।
- मोटर वाहन।
- जीवाश्म ईंधनों का दहन।
प्राकृतिक:
- वनाग्नि (वनों में लगने वाली आग) एवं ज्वालामुखीय गतिविधियाँ
अम्लीय वर्षा के प्रभाव:
- मृदा उत्पादकता में कमी: अधिक अम्लता के कारण मिट्टी में खनिजों और पोषक तत्वों की कमी हो जाती है।
- विस्तृत प्रभावित क्षेत्र: अम्ल वर्षा लंबी दूरी तक फैल सकती है, जिससे औद्योगिक और परिवहन स्रोतों से दूर स्थित क्षेत्र भी प्रभावित होते हैं।
- पेयजल का प्रदूषण: अम्ल वर्षा जल स्रोतों में धातुओं की घुलनशीलता बढ़ा देती है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- वनों पर प्रभाव: अम्ल वर्षा पत्तियों की प्राकृतिक सुरक्षात्मक मोमी परत को नुकसान पहुंचाती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण और जैविक प्रक्रियाएँ कम हो जाती हैं। लगभग 8% वन अम्लीय वर्षा के कारण नष्ट हो चुके हैं।
- जल निकायों पर प्रभाव: झीलें और नदियाँ अधिक अम्लीय हो जाती हैं, जिससे जलीय जीवन और वनस्पति प्रभावित होते हैं।
- मिट्टी की अम्लता में वृद्धि: अम्ल वर्षा पौधों और सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुँचाती है, जिससे जैविक प्रक्रियाएँ धीमी हो जाती हैं।
- भवनों को नुकसान: अम्ल वर्षा संगमरमर और पत्थर की संरचनाओं में क्षरण उत्पन्न करती है, जिससे ताजमहल और यूरोपीय मूर्तियों जैसे स्मारक प्रभावित होते हैं।
संभावित समाधान:
- SO₂ और NO₂ का नियंत्रण: उद्योगों को उत्सर्जन कम करने के लिए स्क्रबर, बैग फ़िल्टर और कोलाइडल टैंक का उपयोग करना चाहिए।
- नवीकरणीय ऊर्जा: जीवाश्म ईंधनों के उपयोग को कम करने के लिए सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा देना चाहिए।
- वाहनों का कम उपयोग: निजी वाहनों की संख्या सीमित की जानी चाहिए तथा नियमित प्रदूषण जांच सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- जल एवं मृदा उपचार: अम्लीय जल स्रोतों और मिट्टी की अम्लता को निष्क्रिय करने के लिए चूना (CaCO₃) मिलाया जाना चाहिए।
- औद्योगिक विनियमन: बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों से हानिकारक गैसों की सांद्रता को प्रभावी रूप से रोकना चाहिए।
अम्लीय वर्षा से संबंधित वैश्विक सम्मेलन और प्रयास –
- दीर्घकालीन सीमा पार वायु प्रदूषण पर सम्मेलन (LRTAP) – 1979
- संयुक्त राष्ट्र यूरोपीय आर्थिक आयोग (UNECE) के अंतर्गत आयोजित, यह सदस्य देशों के बीच वायु प्रदूषण नियंत्रण हेतु एक व्यापक समझौता है।
- इस सम्मेलन के अंतर्गत वायु प्रदूषकों के उत्सर्जन को कम करने के लिए विशिष्ट उपायों की पहचान हेतु आठ प्रोटोकॉल विकसित किए गए हैं।
- अमेरिका-कनाडा वायु गुणवत्ता समझौता (1986) एवं ओजोन एनएक्स (2000) –
- ये समझौते अम्ल वर्षा नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण हैं और दोनों देशों को नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ) तथा वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) के उत्सर्जन को कम करने के लिए प्रतिबद्ध करते हैं, जो ओजोन निर्माण में योगदान करते हैं।
जैव विविधता का ह्रास
परिभाषा – किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवों की संख्या और विविधता को जैव विविधता कहा जाता है। यह एक प्राकृतिक संपत्ति है जो मानव अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
वर्गीकरण – जैव विविधता को मुख्यतः तीन आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है:
- प्रजातीय विविधता
- आनुवंशिक विविधता
- पारिस्थितिकी तंत्र विविधता
जैव विविधता के ह्रास के कारण
- प्राकृतिक आवासों का विनाश
- जनसंख्या वृद्धि, उद्योग, कृषि, बाँध, बस्तियों आदि के कारण वनों का विनाश।
- इससे पौधों और जानवरों की प्रजातियाँ अस्थिर हो जाती हैं तथा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।
- प्रदूषण
- वायु, जल, मृदा तथा रासायनिक प्रदूषण से आवास में परिवर्तन होता है।
- धीमी अनुकूलन क्षमता वाली प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं।
- अतिदोहन
- पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, अत्यधिक चराई, ईंधन संग्रहण तथा बाघ और हाथी जैसे जानवरों का शिकार।
- विदेशी प्रजातियों का आक्रमण
- विदेशी प्रजातियों के प्रवेश से स्थानीय जैव विविधता प्रभावित होती है।
- उदाहरण: पार्थेनियम, आर्जेमोन और लैंटाना (खरपतवार)।
- पर्यावरणीय क्षरण
- कारण: वैश्विक ऊष्मीकरण, CO₂ में वृद्धि, परमाणु विकिरण, पराबैंगनी किरणें, तेल रिसाव आदि।
- इनके कारण कई प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में है।
जैव विविधता संरक्षण के उपाय
- जैव विविधता सम्मेलन (CBD) 1992
- यह एक विधिक रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय संधि है।
- इसका उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण करना, इसके सतत उपयोग को बढ़ावा देना तथा लाभों के समान और न्यायसंगत वितरण को सुनिश्चित करना है।
- जैव विविधता अधिनियम, 2002
- जैविक संसाधनों के संरक्षण के लिए भारत सरकार द्वारा लागू किया गया।
- इस अधिनियम के तहत 2003 में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) की स्थापना की गई।
- नागोया प्रोटोकॉल (2010)
- आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच सुनिश्चित करने तथा उनके उपयोग से उत्पन्न लाभों के न्यायसंगत और समान वितरण के लिए अपनाया गया।
- यह जैव विविधता सम्मेलन (CBD) का एक अनुपूरक समझौता है।
COP 16 (कैली + रोम)
- COP16 (CBD – जैव विविधता सम्मेलन): 21 अक्टूबर – 1 नवम्बर 2024, कैली (कोलंबिया) में आयोजित।
- उद्देश्य: कुनमिंग–मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे (KMGBF) की समीक्षा तथा राष्ट्रीय लक्ष्यों का निर्धारण।
- इसे पुनः 25–27 फरवरी 2025 को रोम में आयोजित किया गया।
मुख्य उपलब्धियाँ
- वित्त पोषण रणनीति (Resource Mobilization Strategy)
- 2030 तक प्रतिवर्ष 200 अरब अमेरिकी डॉलर जुटाने का लक्ष्य।
- अपर्याप्त वित्तपोषण वाले देशों के लिए 2025 तक 20 अरब अमेरिकी डॉलर तथा 2030 तक प्रति वर्ष 30 अरब अमेरिकी डॉलर।
- सतत वित्त तंत्र(Sustainable Finance Mechanism)
- निगरानी एवं समीक्षा (PMRR Framework)
- योजना, निगरानी, प्रतिवेदन एवं समीक्षा (Planning, Monitoring, Reporting & Review – PMRR) प्रारूप को अपनाया गया।
- युवा, महिलाएँ, आदिवासी समूहों तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित करता है।
- कैली फंड (Digital Sequence Information)
- 25 फरवरी 2025 को आधिकारिक रूप से प्रारम्भ।
- एक महत्वपूर्ण समझौता जिसके तहत आनुवंशिक डेटा का उपयोग करने वाली कंपनियां बहुपक्षीय कोष में राजस्व का योगदान देंगी, जिसमें 50% राशि IPLCs, महिलाओं और युवाओं के लिए निर्धारित होगी।
- इस कोष की 50% राशि आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों (IPLCs), महिलाओं और युवाओं के लिए आरक्षित की गई है।
COP 17
- जैव विविधता पर सम्मेलन के पक्षकारों का 17वाँ सम्मेलन (CBD COP 17) 19 से 30 अक्टूबर 2026 तक आर्मेनिया की राजधानी येरेवन में आयोजित किया जाएगा।
