हरित गृह प्रभाव, ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन विश्व भूगोल के अध्ययन में ये तीनों परस्पर जुड़े हुए महत्वपूर्ण विषय हैं, जो पृथ्वी के तापमान और पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित करते हैं। हरित गृह प्रभाव के कारण उत्पन्न ग्लोबल वार्मिंग आज जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण बन चुकी है, जिससे मानव जीवन और प्राकृतिक संसाधनों पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है।
हरित गृह प्रभाव, ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन
हरितगृह प्रभाव
- एक प्राकृतिक प्रक्रिया जो पृथ्वी के वायुमंडल को गर्म रखती है और इसे जीवन के लिए उपयुक्त बनाती है।
- यह प्रभाव तब उत्पन्न होता है जब सूर्य से आने वाली ऊर्जा (सौर विकिरण) पृथ्वी की सतह तक पहुंचती है, जहाँ यह अवशोषित हो जाती है और फिर अवरक्त विकिरण के रूप में पुनः उत्सर्जित होती है। यह अवरक्त विकिरण फिर अंतरिक्ष में वापस भेजा जाता है।
- वायुमंडल में उपस्थित ग्रीनहाउस गैसें इस अवरक्त विकिरण को अवशोषित करती हैं और इसे पुनः पृथ्वी की सतह तथा निचले वायुमंडल की ओर भेजती हैं।
- पृथ्वी एक निश्चित तापमान सीमा बनाए रखती है, जिससे जीवन संभव हो पाता है [प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव]। लेकिन मानवीय गतिविधियों के कारण पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है [मानव-प्रेरित ग्रीनहाउस प्रभाव]।

वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग) की परिभाषा –
- यह पृथ्वी के वायुमंडल और सतह के औसत तापमान में दीर्घकालिक वृद्धि है, जो मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन से होती है।
- “ग्लोबल वार्मिंग” शब्द का प्रथम उपयोग वैज्ञानिक वालेस ब्रॉकर द्वारा वर्ष 1975 में किया गया था।
- यह पृथ्वी तक पहुँचने वाली ऊष्मीय ऊर्जा और अंतरिक्ष में वापस परावर्तित होने वाली ऊष्मीय ऊर्जा के बीच संतुलन को दर्शाता है।
- औद्योगिक क्रांति (1850-1900) से पहले वैश्विक औसत तापमान लगभग 13.7°C था। वर्ष 2024 तक यह औसत तापमान बढ़कर लगभग 14.8°C हो गया है, जो 1.1°C की वृद्धि को दर्शाता है।
- IPCC की रिपोर्ट के अनुसार, तापमान प्रति दशक औसतन 0.2°C की दर से बढ़ रहा है।
- नोट – ग्लोबल कूलिंग (वैश्विक शीतलन)यह ग्लोबल वार्मिंग के विपरीत है।
- 1970 के दशक में वैज्ञानिक जेराल्ड स्टैनहिल ने 1950 के बाद तापमान में लगातार गिरावट को ग्लोबल कूलिंग कहा था। हालांकि, यह अवधारणा सही नहीं है क्योंकि पृथ्वी का तापमान वास्तव में बढ़ रहा है।
हरित गृह गैसें (GHG)
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄), नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O), जलवाष्प, ओज़ोन (O₃), F-गैसें [क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन (CFCs), हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs), परफ्लोरोकार्बन (PFCs), सल्फर हेक्साफ्लोराइड (SF₆), नाइट्रोजन ट्राइफ्लोराइड]।
- ग्रीनहाउस गैसों का प्रभाव उनकी मात्रा, सांद्रता, जीवनकाल तथा ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP) पर निर्भर करता है, जिसमें CO₂ को आधार मानते हुए उसका GWP = 1 लिया जाता है।
- GWP (ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल) – यह वायुमंडल में CO₂ की तुलना में ग्रीनहाउस गैसों की ऊष्मा को रोकने की क्षमता को दर्शाता है। सामान्यतः GWP की गणना 100 वर्ष की समयावधि के लिए की जाती है।
- CO₂ – यह मानक संदर्भ गैस है, इसलिए इसका GWP = 1 होता है।
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GHG |
योगदान |
स्त्रोत |
शमन |
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CO₂ |
मानवजनित (एंथ्रोपोजेनिक) ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 75%प्रमुख ग्रीनहाउस गैसGWP: 1जीवनकाल: 50 – 200 वर्ष |
प्राकृतिक स्रोत: श्वसन, दहन प्रक्रिया, ज्वालामुखी विस्फोटमानव गतिविधियाँ: वनों की कटाई, औद्योगीकरण, जीवाश्म ईंधन का जलना |
ऊर्जा संरक्षणकार्बन सिंक (वन/महासागर), नवीकरणीय ऊर्जा |
औद्योगीकरण से पहले CO₂ की सांद्रता लगभग 280 पार्ट्स प्रति मिलियन (ppm) थी।1950 और 1960 के दशक के आसपास यह लगभग 330 ppm हो गई। जून 2024 में यह 426.91 ppm तक पहुँच गई।
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GHG |
योगदान |
स्त्रोत |
शमन |
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CH₄ |
लगभग 16%GWP: 29.8, जीवन-काल: 12 वर्ष। |
आर्द्रभूमि, धान की फसलें, जुगाली करने वाले पशु, दीमक, कोयला खदानें, गैस ड्रिलिंग और महासागर। |
प्राकृतिक प्रक्रियाएँ, रासायनिक अभिक्रियाएँ। |
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N₂O |
लगभग 6%GWP: 273, जीवन-काल 120 वर्ष। |
उर्वरक उद्योग, जीवाश्म ईंधन का दहन, चमड़ा उद्योग, औद्योगिक गतिविधियां, समुद्री जल, ज्वालामुखीय विस्फोट। |
बैक्टीरिया द्वारा अवशोषण, पराबैंगनी (UV) विकिरण द्वारा विनाश। |
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F-गैसें |
लगभग 2%उच्च GWP: 23,500 तकजीवन-काल 50,000 वर्ष तक |
रेफ्रिजरेशन, एयर कंडीशनिंग, औद्योगिक प्रक्रियाएँ। |
CFC
- शीतलक के रूप में उपयोग (रेफ्रिजरेटर, ए.सी.)
- वैश्विक ऊष्मीकरण के अलावा, ओजोन गैस को सबसे अधिक क्षति पहुंचाता है।
HFCS
- औद्योगिक गतिविधियों से उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों से निर्मित।
- रेफ्रिजरेटर, एयरोसोल, सॉल्वेंट और अग्निशामकों में उपयोग।
PFCS
- एल्युमिनियम युक्त इलेक्ट्रॉनिक सामग्री या एल्युमिनियम उद्योगों में उत्पन्न।
SF6
- सल्फर युक्त ईंधनों के दहन से उत्पन्न।
- मुख्यतः विद्युत उद्योग में इंसुलेटिंग गैस के रूप में उपयोग, विशेषकर उच्च वोल्टेज स्विचगियर और सर्किट ब्रेकर में।
- GWP = 25,184
- जीवनकाल = 3,200 वर्ष।
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जलवाष्प |
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ओजोन |
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कार्बन मोनोऑक्साइड
- अल्पकालिक ग्रीन हाउस गैस।
- नोट – ब्लैक कार्बन – निर्माण मुख्यतः कोयले के दहन से होता है, इसलिए इसको कालिख कार्बन (Soot Carbon) भी कहते हैं।
- ब्राउन कार्बन – फसल अवशेषों के जलने से उत्पन्न होता है।


वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में सर्वाधिक योगदान –
(i) चीन [31.8%]
(ii) USA [14.4 %]
(iii) भारत [9.5 %]

हरित गृह प्रभाव के कारण
- औद्योगिकीकरण – उद्योगों में कोयला और पेट्रोलियम के उपयोग के कारण।
- वनों की कटाई – कार्बन डाइऑक्साइड पौधों में प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक गैस है, लेकिन निरंतर वनों की कटाई और पेड़ों की कमी के कारण वायुमंडल में CO₂ की मात्रा लगातार बढ़ रही है। अधिक मात्रा में यह हानिकारक होती है।
- जीवाश्म ईंधनों (लकड़ी और कोयला) के दहन से वायुमंडल में लगभग 80% CO₂ उत्सर्जित होती है।
- रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर का उपयोग – इनके निर्माण और उपयोग से CFC (क्लोरोफ्लोरोकार्बन) गैस उत्पन्न होती है, जो ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को बढ़ाती है।
दुष्परिणाम
- CO₂ की सांद्रता में 30% की वृद्धि हुई है।
- पिछले 100 वर्षों में मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड गैसों के स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- औद्योगिक क्रांति के समय से वायुमंडल में मीथेन की मात्रा लगभग 145% बढ़ गई है।
मुख्य प्रभाव
- तापमान में वृद्धि
- वर्षा के पैटर्न में परिवर्तन – वर्षा का चक्रण बदल जाएगा, कुछ क्षेत्रों में वर्षा बढ़ेगी, जबकि कुछ देशों में इसके विपरीत स्थिति उत्पन्न होकर मरुस्थलीकरण हो सकता है।
- समुद्र स्तर में वृद्धि – तापमान में केवल 0.5°C से 1.5°C की वृद्धि से हिमनदों एवं ध्रुवीय हिमचादरों का पिघलना शुरू हो जाएगा, जिससे तटीय मैदानों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होगी। संभव है कि कई द्वीप जलमग्न हो जाएँ और समुद्र स्तर बढ़े। उदाहरण के लिए, प्रशांत महासागर में तुवालु और कार्टरेट द्वीप पहले ही जलमग्न हो चुके हैं तथा मालदीव के डूबने का भी खतरा है।
- वनस्पति क्षेत्रों में परिवर्तन – घास भूमि एवं वन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव होगा तथा अफ्रीका के रेतीले क्षेत्रों में अकाल की संभावना उत्पन्न हो सकती है।
- रोगों के स्तर में वृद्धि – वनस्पति क्षेत्रों में परिवर्तन से कीटों की संख्या में बदलाव होगा, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ेगा। तापमान में 3–5°C की वृद्धि से मलेरिया के मामलों में 45–60% तक वृद्धि हो सकती है।
- जैव विविधता पर खतरा – तापमान में वृद्धि के परिणामस्वरूप 80% जैव विविधता खतरे में पड़ सकती है।
जलवायु परिवर्तन
- जलवायु परिवर्तन पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में दीर्घकालिक परिवर्तनों को संदर्भित करता है, जो मुख्यतः मानव गतिविधियों (जैसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन) तथा प्राकृतिक कारणों (जैसे ज्वालामुखीय विस्फोट एवं सौर गतिविधि) से उत्पन्न होते हैं।
- जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप वैश्विक तापन, प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि, जैव विविधता की हानि तथा कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कारक:
(A) प्राकृतिक कारक (B) मानवीय कारक
A. प्राकृतिक कारक
- महाद्वीपीय विस्थापन – महाद्वीपों की गति से समुद्री धाराओं तथा स्थल-जल के वितरण में परिवर्तन होता है, जिससे आर्द्रता और वर्षा की मात्रा बदलती है तथा जलवायु प्रभावित होती है।
- पृथ्वी की कक्षा में परिवर्तन – पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार कक्षा के कारण पृथ्वी-सूर्य की दूरी बदलती रहती है। दीर्घकालिक परिवर्तन सौर ऊर्जा की मात्रा को प्रभावित कर तापमान में परिवर्तन लाते हैं।
- पृथ्वी का अक्षीय झुकाव – पृथ्वी का अक्ष 23.5° झुका हुआ है। अक्षीय झुकाव में वृद्धि से सौर विकिरण में परिवर्तन होता है, जिससे जलवायु परिवर्तन प्रभावित होता है।
- ज्वालामुखी – ज्वालामुखी के कारण मुक्त गैसें बादलों का निर्माण करती हैं, जिसके फलस्वरूप सूर्य- प्रकाश पृथ्वी पर कम पहुंचता है, जिससे तापमान में कमी आती है। जैसे- वर्ष 1991 में फिलीपींस के ज्वालामुखी माउंट पिनाटुबो में विस्फोट के कारण तापमान में 0.5 डिग्री सेल्सियस की कमी आई थी।
- सौर्य विकिरण की मात्रा – सूर्य पर कई बार चुंबकीय तूफान उत्पन्न होते हैं, जिसके कारण सूर्याताप में कमी आती है जिन्हें सौर कलंक कहते हैं। साथ ही साथ कभी-कभी सूर्य की सबसे बाहरी परत कोरोना में विस्फोट के कारण सौर तूफान उत्पन्न होते हैं, जिससे सूर्य ताप बढ़ जाता है।
B. मानवीय कारक
(i) जीवाश्म ईंधन दहन
(ii) औद्योगिक प्रक्रिया
(iii) बायोमास दहन
(iv) वनों की कटाई
(v) भू-उपयोग में परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन के साक्ष्य/ प्रमाण
- समुद्र-स्तर में वृद्धि
- वैश्विक तापन में वृद्धि
- समुद्र के जल का तापन
- बर्फ की चादर का सिकुड़ना या ध्रुवों पर बर्फ की मात्रा का कम होना।
- हिमनदों की संख्या में कमी
- समुद्र की लवणता में वृद्धि
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
(i) जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक गर्मी की लहरों, भारी वर्षा, समुद्र-स्तर में वृद्धि, महासागरों के अम्लीकरण तथा वनाग्नि की घटनाओं में वृद्धि होगी। इससे —
- जैव विविधता को खतरा
- कृषि क्षेत्र में चुनौतियां
- मानव स्वास्थ्य में रोगों के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि
- सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं में वृद्धि
(ii) कृषि पर प्रभाव — यद्यपि वैश्विक तापमान वृद्धि एवं CO₂ स्तर में बढ़ोतरी से कुछ फसलों एवं क्षेत्रों को लाभ हो सकता है, परन्तु समग्र रूप से चुनौतियाँ अधिक होंगी। इनमें शामिल हैं —
- पोषक तत्वों की कमी
- मृदा आर्द्रता में कमी
- जल की उपलब्धता में कमी
- अत्यधिक वर्षा के कारण बाढ़
- कम वर्षा के कारण सूखा
इसके अतिरिक्त, जल तापमान में वृद्धि के कारण मछलियाँ एवं अन्य जलीय जीव उपयुक्त आवास की खोज में स्थानांतरित होने के लिए बाध्य होंगे।
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
- तापमान में वृद्धि
- हिमनदों का पिघलना
- समुद्र स्तर में वृद्धि
- चरम मौसम परिस्थितियाँ
- महासागरों का अम्लीकरण
- वर्षा के पैटर्न में परिवर्तन
- वन्यजीवों की हानि
- गंभीर सूखा एवं वनाग्नि
- द्वीपीय देशों का जलमग्न होना
- उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की आवृत्ति में वृद्धि
- कृषि एवं खाद्य संकट
- जैव विविधता के लिए खतरा
- रोगजनकों एवं बीमारियों में वृद्धि
- रोगाणु और रोगों में वृद्धि
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल [IPCC]
- संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक पैनल
- स्थापना : 1988
- विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO)+ संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा स्थापित
- मुख्यालय : जेनेवा (स्विट्जरलैंड)
- अध्यक्ष का चुनाव सभी 195 देश लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत करते हैं।
- भारतीय मूल के राजेन्द्र पचौरी वर्ष 2002 से 2015 तक अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित रहे।
- पचौरी द्वारा तैयार पर्यावरण अध्ययन रिपोर्ट को चतुर्थ मूल्यांकन रिपोर्ट (IVth रिपोर्ट) कहा जाता है।
- वर्ष 2007 में इस संगठन को नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया, जिसे राजेंद्र पचौरी एवं अमेरिका के राष्ट्रपति ने प्राप्त किया।
- नोबेल शांति पुरस्कार: 2007
- सदस्य देश: 195
जलवायु परिवर्तन पर IPCC की रिपोर्ट
- स्थापना (1988) के बाद से IPCC ने छह रिपोर्टें प्रकाशित की हैं।
- यह जलवायु परिवर्तन पर सबसे व्यापक वैज्ञानिक रिपोर्ट है।
- जलवायु परिवर्तन पर IPCC की 1st रिपोर्ट [1990]
- पिछले 100 वर्षों में वैश्विक तापमान में 0.3 – 0.6°C की वृद्धि हुई है।
- वर्ष 2025 तक, औद्योगिक-पूर्व स्तर की तुलना में वैश्विक तापमान में 2°C की वृद्धि होने की संभावना है, और वर्ष 2100 तक यह 4°C तक बढ़ सकता है। साथ ही, समुद्र तल में 65 सेमी तक वृद्धि का अनुमान है।
- वर्ष 1992 में, यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) का आधार बनी।
- 2nd रिपोर्ट [1995] – 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल के लिए वैज्ञानिक आधार।
- 3rd रिपोर्ट [2001]
- 4th रिपोर्ट [2007] – IPCC को 2007 में नोबेल शांति पुरस्कार।
- 5th रिपोर्ट [2014] – 2015 में पेरिस समझौते के लिए वैज्ञानिक आधार।
- जलवायु परिवर्तन पर IPCC की 6th रिपोर्ट [2023]
- वैश्विक जनसंख्या का 45% से अधिक भाग ऐसे क्षेत्रों में निवास करता है जो जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
- अनेक जलवायु संबंधी खतरे एक साथ उत्पन्न होंगे तथा जलवायु और गैर-जलवायु जोखिम आपस में परस्पर क्रिया करेंगे।
- जलवायु परिवर्तन से कुपोषण, भूख और बीमारियों के प्रसार में वृद्धि होने की संभावना है।
- औद्योगिक-पूर्व स्तर की तुलना में वैश्विक तापमान पहले ही 1.1°C बढ़ चुका है।
- मुख्य कारणों में जीवाश्म ईंधन का उपयोग, ऊर्जा खपत तथा अस्थिर भूमि दोहन शामिल हैं।
- जलवायु शमन नीतियों और कानूनों में प्रगति के बावजूद, 21वीं सदी के अंत तक तापमान 1.5°C से अधिक बढ़ने की संभावना है।
- तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करने के लिए, 2019 के स्तर की तुलना में 2030 तक 43% और 2035 तक 60% उत्सर्जन में कमी आवश्यक है।
जलवायु परिवर्तन के समाधान
वैज्ञानिकों ने वैश्विक तापन को कम करने के लिए भू-अभियांत्रिकी तकनीकों का प्रस्ताव दिया है, लेकिन उनकी व्यवहार्यता अभी अनिश्चित है।
- ज्वालामुखी विस्फोट का प्रभाव – सक्रिय ज्वालामुखी वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, जिससे बादलों का निर्माण बढ़ता है। इससे पृथ्वी की सतह तक पहुँचने वाली सूर्य की किरणें कम हो जाती हैं और तापमान घटता है।
- बड़े दर्पणों का उपयोग – अंतरिक्ष में बड़े दर्पण स्थापित कर सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी से दूर परावर्तित करना, जिससे ऊष्मा अवशोषण कम हो।
- कृत्रिम वृक्ष – कृत्रिम वृक्ष वायु से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर उसे गहरे समुद्री स्तरों में संग्रहीत कर सकते हैं।
- सौर विकिरण प्रबंधन (SRM) – वायुमंडल में एरोसोल्स का छिड़काव: वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड कणों का छिड़काव कर सूर्य के प्रकाश को अंतरिक्ष में परावर्तित करना।
- सफेद सतहों का उपयोग: सतहों को सफेद रंग से रंगकर पृथ्वी की परावर्तन क्षमता बढ़ाना।
- समुद्री बादल उज्ज्वलीकरण: बादलों को अधिक परावर्तक बनाने के लिए उनमें समुद्री नमक का छिड़काव करना।
- अंतरिक्ष-आधारित सौर ढाल: सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने से रोकने के लिए अंतरिक्ष में सौर अवरोध स्थापित करना।
IPCC की छठी रिपोर्ट में की गई सिफारिशें:
- नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाना और जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना।
- विकासशील देशों में कार्यवाही हेतु वित्तीय सहायता सबसे महत्वपूर्ण और मूलभूत आवश्यकता है।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी में वृद्धि।
- जलवायु प्रभावों से सर्वाधिक प्रभावित लोगों को समाधान तैयार करने की प्रक्रिया में शामिल करना।
वैश्विक स्तर पर प्रयास
स्टॉकहोम सम्मेलन – 1972
- इसे “पर्यावरण का मैग्नाकार्टा” कहा जाता है।
- मानव विकास एवं पर्यावरण के मध्य संघर्ष को कम करने का निर्णय लिया गया।
- पर्यावरण पर प्रथम वैश्विक शिखर सम्मेलन था इसके तहत संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का गठन किया
- मुख्यालय – नैरोबी (केन्या)
- उद्देश्य – पर्यावरण संरक्षण के लिए तकनीकी एवं वित्तीय सहायता प्रदान करना।
- 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का निर्णय लिया गया।
- इस सम्मेलन के अंतर्गत भारत ने बाघ संरक्षण के लिए “प्रोजेक्ट टाइगर” पहल शुरू की।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन (UNCED)
प्रथम पृथ्वी शिखर सम्मेलन
- कब: 3-14 जून,1992
- कहाँ: ब्राजील के रियो-डि-जेनेरियो में
- आयोजन संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन के रूप में किया गया, जिसमें 178 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
- मुख्य उद्देश्य:
(i) पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करना।
(ii) सतत विकास को वैश्विक एजेंडा में शामिल करना।
(iii) ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जैव विविधता ह्रास, वनों की कटाई और प्रदूषण जैसे मुद्दों का समाधान करना।
(iv) पर्यावरण को क्षति पहुंचाए बिना आर्थिक विकास को बढ़ावा देना।
- इस सम्मेलन में सतत विकास पर चर्चा की गई, जिसमें आर्थिक विकास का ऐसा तरीका सुझाया गया जो पर्यावरण को हानि न पहुँचाए।
- मुख्य परिणाम
- UNFCCC: (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय)
उद्देश्य: ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित करना और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करना।
- जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (CBD): जैव विविधता संरक्षण, जैव संसाधनों के सतत उपयोग और लाभों के समान वितरण हेतु संधि।
- मरुस्थलीकरण से निपटने हेतु संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD):मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण को रोकने के लिए स्थापित।
- एजेंडा 21: 21वीं सदी के लिए सतत विकास हेतु वैश्विक कार्य योजना, जिसमें स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर शामिल हैं।
- वन सिद्धांत: वनों के संरक्षण और सतत प्रबंधन के लिए गैर-बाध्यकारी दिशा निर्देश।
- सतत विकास आयोग (CSD): एजेंडा 21 के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए स्थापित।
- वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF):जलवायु कार्यवाही, जैव विविधता संरक्षण, ओजोन परत सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय जल प्रदूषण नियंत्रण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने हेतु स्थापित कोष।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन समझौता (UNFCCC)
- जलवायु परिवर्तन पर पहला बहुपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय समझौता
- मार्च 1994 से प्रभावी
- कानूनी रूप से गैर-बाध्यकारी
- उद्देश्य: वैश्विक तापन से निपटने हेतु ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना
- कार्यवाही: जलवायु परिवर्तन पर वार्षिक सम्मेलन (COP) आयोजित करना
COP-1
- 1995 में जर्मनी की राजधानी बर्लिन में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए संयुक्त प्रयासों पर सहमति बनी।
क्योटो प्रोटोकॉल (COP-3)
- UNFCCC से जुड़ा एक अंतरराष्ट्रीय समझौता, जिस पर दिसंबर 1997 में क्योटो (जापान) में हस्ताक्षर किए गए।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी प्रोटोकॉल से संबंधित विस्तृत नियम – मारकेश समझौता (Marrakesh Accord)
- 16 फरवरी 2005 से प्रभावी [कनाडा के हस्ताक्षर के साथ]
- 192 देश क्योटो प्रोटोकॉल के पक्षकार हैं [केवल UNFCCC सदस्य ही इसके पक्षकार हैं]
- 84 देश क्योटो प्रोटोकॉल के हस्ताक्षरकर्ता हैं
- कनाडा, एंडोरा, अमेरिका, दक्षिण सूडान क्योटो प्रोटोकॉल के पक्षकार नहीं हैं
- इस सम्मेलन में यह स्वीकार किया गया कि औद्योगिकीकरण के कारण विकसित देश मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं।
- प्रथम प्रतिबद्धता: 2008 से 2012 के बीच 1990 के स्तर से 6 ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 5.2% की कमी।
- द्वितीय प्रतिबद्धता: 2013 से 2020 के बीच 1990 के स्तर से 6 ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 18% की कमी।
- 6 ग्रीन हाउस गैसें (GHGs): CO₂, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, हाइड्रो फ्लोरोकार्बन (HFCs), परफ्लोरोकार्बन (PFCs), सल्फर हेक्साफ्लोराइड
- यूरोप (EU-15) के देशों को 8%, अमेरिका को 7% तथा जापान को 6% उत्सर्जन में कमी का लक्ष्य दिया गया।
- अंतरराष्ट्रीय नौवहन एवं अंतर्राष्ट्रीय विमानन को क्योटो प्रोटोकॉल के लक्ष्यों में शामिल नहीं किया गया।
- देश अपने क्योटो लक्ष्यों को पूरा करने हेतु भूमि उपयोग (LU), भूमि उपयोग परिवर्तन (LUC) एवं वानिकी का उपयोग कर सकते हैं।
- इस प्रोटोकॉल के अंतर्गत सामान्य लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR) का सिद्धांत अपनाया गया।
- क्योटो प्रोटोकॉल के पक्षकार देशों की बैठकों को CMPs कहा जाता है।
क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत सदस्य देशों का वर्गीकरण
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एनेक्स-। |
एनेक्स-॥ |
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- यह सुनिश्चित करने के लिए कि उपर्युक्त उत्सर्जन में कमी का उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, स्वच्छ विकास तंत्र (CDM) की अवधारणा अपनाई गई।
स्वच्छ विकास तंत्र (Clean Development Mechanism – CDM)
- क्योटो प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत स्थापित।
- कार्बन क्रेडिट / कार्बन बाज़ार की अवधारणा पर आधारित।
- उत्सर्जन में कमी के लिए प्रतिबद्ध विकसित देशों को विकासशील देशों में उत्सर्जन घटाने वाली परियोजनाएं लागू करने की अनुमति दी गई।
- ये परियोजनाएँ सतत एवं हरित विकास पर केंद्रित होती हैं, जिससे विकसित देश ऐसे प्रयासों में निवेश कर कार्बन क्रेडिट अर्जित कर सकते हैं।
- कार्बन क्रेडिट खरीदने वाले देश इनका उपयोग अपने उत्सर्जन में कमी दर्शाने तथा अपने उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कर सकते हैं।
- इस तंत्र के दोहरे उद्देश्य हैं:
- विकसित देशों को अपने उत्सर्जन में कमी के लक्ष्यों को पूरा करने में सहायता।
- विकासशील देशों में सतत विकास को प्रोत्साहन।
नोट:
- न्यूजीलैंड ने मई 2005 में कार्बन कर लागू किया, इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने 1 जुलाई 2012 को इसे लागू किया।
- मोजावे मरुस्थल (कैलिफोर्निया, अमेरिका) में एक सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया गया।
- स्वीडन विश्व का एकमात्र देश है जहां ट्रेनें बायोगैस से संचालित होती हैं।
जोहान्सबर्ग सम्मेलन – 2002
- 26 अगस्त से 4 सितंबर 2002 तक जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका में आयोजित।
- इसे “Rio+10” शिखर सम्मेलन भी कहा जाता है, क्योंकि यह एक अन्य पृथ्वी शिखर सम्मेलन था।
- प्रमुख मुद्दा: वैश्विक तापन।
- भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बल दिया कि विकास सतत होना चाहिए, जिससे आर्थिक प्रगति मानव सभ्यता को क्षति न पहुँचाए और जीवन-समर्थन प्रणालियों की रक्षा हो।
COP-11 / CMP-1
- 2005 में मॉन्ट्रियल (कनाडा) में आयोजित।
- कनाडा के हस्ताक्षर के साथ क्योटो प्रोटोकॉल आधिकारिक रूप से प्रभावी हुआ।
COP-13 / CMP-3
- 2007 में बाली (इंडोनेशिया) में आयोजित शिखर सम्मेलन में बाली रोडमैप / बाली एक्शन प्लान अपनाया गया, जिसके अंतर्गत 5 प्रतिबद्धताएं तय की गयी:
- साझा दृष्टि: दीर्घकालिक उत्सर्जन कटौती लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु हितधारकों के बीच सहयोग
- शमन: जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में वृद्धि
- अनुकूलन
- प्रौद्योगिकी
- वित्त
COP-16 / CMP-6
- विकसित देशों ने 2012 से 2020 तक जलवायु परिवर्तन शमन एवं अनुकूलन के लिए विकासशील देशों को प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर प्रदान करने पर सहमति व्यक्त की।
- ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) की स्थापना।
- GCF का उद्देश्य – विकासशील एवं अल्पविकसित देशों को जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में सहायता प्रदान करना।
COP-18 / CMP-8
- नवंबर 2012 में दोहा (कतर) में आयोजित।
- मुख्य उद्देश्य: क्योटो प्रोटोकॉल की पहली प्रतिबद्धता अवधि (2008–2012) को दूसरी अवधि (2013–2020) तक बढ़ाना – जिसे दोहा संशोधन कहा जाता है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली “हानि एवं क्षति (Loss and Damage)” को पहली बार औपचारिक मुद्दे के रूप में मान्यता दी गई।
- विकासशील देशों में जलवायु संबंधी कार्यक्रमों को सुदृढ़ करने हेतु संयुक्त राष्ट्र ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) की आधिकारिक स्थापना 18 नवंबर 2012 को की गई।
- मुख्यालय: इंचियोन, दक्षिण कोरिया (सोंगडो सिटी)।

COP-21 / CMP-11 / CMA-1
- 2015 में पेरिस (फ्रांस) में आयोजित।
- पेरिस समझौता – उद्देश्य: वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक-पूर्व स्तर से 2°C से काफी नीचे सीमित करना।
- तापमान वृद्धि को 1.5°C के भीतर रखने का प्रयास, ताकि गंभीर जलवायु प्रभावों को कम किया जा सके।
- इस समझौते के अंतर्गत सभी देशों से अपेक्षा की गई कि वे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) के माध्यम से अपने-अपने उत्सर्जन कटौती लक्ष्य निर्धारित करें।
- 1.5°C से अधिक तापमान वृद्धि का प्रभाव: छोटे द्वीपीय देशों एवं अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों पर विनाशकारी प्रभाव, जिससे अधिक तीव्र तूफान, सूखा एवं बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होगी।
- क्रियान्वयन हेतु 55% नियम: यह समझौता तभी विधिक रूप से बाध्यकारी होगा जब दो शर्तें पूरी हों:
- कम से कम 55 देशों द्वारा अनुमोदन।
- ये देश वैश्विक GHG उत्सर्जन के कम से कम 55% के लिए उत्तरदायी हों।
- पेरिस समझौता 4 नवम्बर 2016 को औपचारिक रूप से लागू हुआ।
राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (INDC)
- भारत ने 2005 के स्तर की तुलना में 2030 तक अपने उत्सर्जन तीव्रता में 33–35% की कमी करने का संकल्प लिया (बाद में COP-26 में अद्यतन)।
- भारत ने 2030 तक अपनी जलवायु कार्य योजनाओं के लिए 2.5 ट्रिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता की आवश्यकता का अनुमान लगाया।
- ऊर्जा दक्षता पहले:
- परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड (PAT) योजना
- राष्ट्रीय ऊर्जा दक्षता कार्य योजना (NAPEE)
- वनरोपण लक्ष्य: भारत का लक्ष्य 2030 तक 10 मिलियन हेक्टेयर वन भूमि का पुनर्स्थापन करना है।
पेरिस समझौता बनाम क्योटो प्रोटोकॉल
| क्योटो प्रोटोकॉल | पेरिस समझौता |
| विकसित देशों के लिए बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य। | सभी देशों के लिए स्वैच्छिक उत्सर्जन कटौती लक्ष्य। |
| विकसित एवं संक्रमणशील देशों पर लागू। | सभी देशों (विकसित, विकासशील, अल्पविकसित) को समान जिम्मेदारी दी गई। |
| लक्ष्यों को प्राप्त न करने वाले देशों के लिए दंड का प्रावधान। | किसी भी दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं। |
| विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए सीमित लचीलापन। | स्वैच्छिक क्रियान्वयन, निगरानी एवं पारदर्शिता। |
COP-26
- COP-26 (2021) – ग्लासगो, स्कॉटलैंड
- “ग्लासगो घोषणा” – 105 देशों द्वारा हस्ताक्षरित, जो विश्व के 85% वनों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- इस घोषणा के अंतर्गत हस्ताक्षरकर्ता देशों ने 2030 तक वनों की कटाई एवं भूमि क्षरण को समाप्त करने की प्रतिबद्धता जताई।
- भारत ने इस घोषणा पर हस्ताक्षर नहीं किए।
- भारत द्वारा संशोधित INDCs (अगस्त 2022 में UNFCCC को प्रस्तुत)
- भारत की संशोधित प्रतिबद्धताएं COP-26 में घोषित “पंचामृत” रणनीति के अनुरूप हैं:
- 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता को 500 GW तक बढ़ाना।
- 2030 तक ऊर्जा की 50% आवश्यकता नवीकरणीय स्रोतों से पूरी करना।
- 2030 तक (2005 के स्तर की तुलना में) कार्बन तीव्रता में 45% की कमी करना।
- 2030 तक अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 अरब टन की कमी करना।
- 2070 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन प्राप्त करना।
नोट
- भारत की प्रगति पर अतिरिक्त मुख्य बिंदु (अक्टूबर 2023 तक):
- भारत की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता का 43.81% अब गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त होता है।
- भारत ने पहले ही अपनी GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 33% (2005–2019) की कमी कर ली है।
COP-27 – शर्म अल-शेख, मिस्र
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, 2023 / COP-28 – दुबई, UAE
- 30 नवम्बर से 12 दिसंबर 2023 तक आयोजित, UAE के सुल्तान अहमद अल जाबेर की अध्यक्षता में।
- उद्देश्य – जलवायु परिवर्तन की तात्कालिक चुनौतियों का समाधान करना, जिसमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूलन तथा जलवायु कार्यवाही हेतु वित्तीय संसाधनों का संचयन शामिल है।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर चर्चा करने वाला पहला COP।
- ग्लोबल स्टॉक टेक (GST): लगभग 200 देशों ने वैश्विक तापन को 1.5°C तक सीमित करने हेतु पेरिस समझौते के अंतर्गत वैश्विक प्रयासों का आकलन किया।
- हानि एवं क्षति (Loss and Damage) हेतु कोष स्थापित करने पर सहमति।
सम्मेलन के 4 परिणाम / भारत का दृष्टिकोण:
- ग्रीन क्रेडिट पहल
- ट्रिपल न्यूक्लियर ऊर्जा घोषणा-पत्र
- वैश्विक नदी शहर गठबंधन [ग्लोबल रिवर सिटीज एलायंस (GRCA)]
- LeadIT शिखर सम्मेलन, 2023
ग्रीन क्रेडिट पहल
- पर्यावरण संरक्षण को व्यक्तिगत एवं कॉरपोरेट विकास से जोड़ता है।
- वनीकरण परियोजनाओं हेतु बंजर भूमि का एक डाटाबेस।
- पर्यावरण अनुकूल गतिविधियों में संलग्न व्यक्ति एवं संगठनों को व्यापार योग्य ग्रीन क्रेडिट प्रदान किए जाएंगे।
- भारत ने वनीकरण एवं पर्यावरण संरक्षण पर विचारों और अनुभवों के संग्रह हेतु एक वैश्विक पोर्टल की घोषणा की।
ट्रिपल न्यूक्लियर एनर्जी घोषणा-पत्र
- 20 से अधिक देशों ने 2050 तक वैश्विक परमाणु ऊर्जा क्षमता को तीन गुना करने की प्रतिबद्धता जताई।
- उद्देश्य: नेट-ज़ीरो उत्सर्जन प्राप्त करना एवं तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करना।
- ब्रुसेल्स में मार्च 2024 में प्रथम वैश्विक परमाणु ऊर्जा शिखर सम्मेलन आयोजित करने की योजना।
वैश्विक नदी शहर गठबंधन (GRCA)
- भारत, डेनमार्क, कंबोडिया, जापान, भूटान, ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड, घाना एवं ओमान द्वारा प्रारंभ।
- नदी-केंद्रित शहरी विकास पर ज्ञान-साझाकरण एवं सहयोग हेतु एक मंच।
- समर्थन: विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक तथा एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक।
- भारत की “रिवर सिटीज एलायंस” पहल से प्रेरित।
LeadIT शिखर सम्मेलन, 2023
- लीडरशिप फॉर इंडस्ट्री ट्रांजिशन (LeadIT) एक वैश्विक पहल है, जिसका उद्देश्य इस्पात, सीमेंट, रसायन, विमानन एवं नौवहन जैसे उच्च-उत्सर्जन क्षेत्रों को निम्न-कार्बन मार्ग की ओर ले जाना है।
- 38 सदस्य देश 2050 तक ऊर्जा-गहन उद्योगों के डीकार्बोनाइजेशन का लक्ष्य रखते हैं।
- पेरिस समझौते के लक्ष्यों के अंतर्गत प्रतिबद्ध देशों एवं कंपनियों को एक साथ लाता है।
COP-29
- नवंबर 2024 में बाकू, अज़रबैजान में आयोजित।
- सम्मेलन में जलवायु वित्त, कार्बन क्रेडिट व्यापार एवं ऊर्जा संक्रमण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की गई।
- मुख्य परिणाम:
- जलवायु वित्त में वृद्धि: विकसित देशों ने 2035 तक विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु प्रति वर्ष 300 अरब डॉलर प्रदान करने का संकल्प लिया।
- अंतरराष्ट्रीय कार्बन क्रेडिट व्यापार के लिए नए नियम स्थापित किए गए, ताकि जलवायु परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाई जा सके।
- वैश्विक उत्सर्जन कटौती प्रतिबद्धता: देशों ने 2035 तक कार्बन उत्सर्जन में 50% कमी करने का संकल्प लिया।
- ऊर्जा संक्रमण पर सीमित प्रगति: जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध समाप्त करने या नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार हेतु कोई प्रमुख कदम नहीं उठाए गए।
COP-30
- नवंबर 2025 में बेलेम, ब्राजील में आयोजित।
- बेलेम पैकेज एवं ग्लोबल मुटिराओ ढाँचे के माध्यम से महत्वाकांक्षा से क्रियान्वयन की ओर परिवर्तन का प्रतिनिधित्व।
प्रमुख परिणाम
1.बेलेम पैकेज
- 29 वार्ताकृत निर्णयों का एक सेट अपनाया गया।
- प्रमुख क्षेत्र: जलवायु वित्त, न्यायसंगत संक्रमण, अनुकूलन ट्रैकिंग, लैंगिक समावेशन, उन्नत अंतरराष्ट्रीय सहयोग।
2. ग्लोबल मुटिराओ समझौता
- नए बाध्यकारी लक्ष्यों की बजाय सहयोग एवं क्रियान्वयन को प्राथमिकता।
3. ग्लोबल मुटिराओ प्लेटफॉर्म
- ब्राज़ील द्वारा एक डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च किया गया।
- प्रतिबद्धताओं एवं क्रियान्वयन के बीच अंतर को कम करना तथा ऊर्जा, वित्त एवं व्यापार में प्रगति को तेज करना।
4. जस्ट ट्रांजिशन मैकेनिज्म (बेलेम एक्शन मैकेनिज्म– BAM):
- जीवाश्म ईंधन पर निर्भर श्रमिकों एवं अर्थव्यवस्थाओं के लिए क्षमता निर्माण एवं सहयोग का समर्थन।
- किसी नए या सुनिश्चित वित्तीय प्रतिबद्धता का प्रावधान नहीं।
5. ग्लोबल इम्प्लीमेंटेशन ट्रैकर एवं बेलेम मिशन टू 1.5°C:
- NDCs को 1.5°C मार्ग के अनुरूप निगरानी हेतु प्रस्तुत।
- वैश्विक स्तर पर क्रियान्वयन एवं जवाबदेही पर ध्यान केंद्रित।
6. राष्ट्रीय अनुकूलन योजना (NAP) इम्प्लीमेंटेशन एलायंस:
- राष्ट्रीय अनुकूलन योजना को तेज करने हेतु स्थापित।
- देशों ने 2025 के स्तर की तुलना में 2030 तक अनुकूलन वित्त को तीन गुना करने पर सहमति व्यक्त की।
7. ट्रॉपिकल फॉरेस्ट्स फॉरएवर फैसिलिटी (TFFF):
- उष्णकटिबंधीय वनों के संरक्षण हेतु प्रदर्शन-आधारित वित्त पोषण।
- उपग्रह आधारित निगरानी का उपयोग।
- लक्ष्य संचयन: 125 अरब अमेरिकी डॉलर
- ब्राज़ील द्वारा प्रारंभिक 1 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान।
8. बेलेम 4× प्रतिज्ञा:
- 2024 के स्तर की तुलना में 2035 तक सतत ईंधनों के उपयोग को चार गुना करना।
- ईंधनों में हाइड्रोजन, बायोफ्यूल, बायोगैस एवं ई-फ्यूल शामिल।
- प्रगति की वार्षिक निगरानी IEA द्वारा की जाएगी।
COP-30 में भारत की स्थिति
- पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 के अंतर्गत जलवायु वित्त को कानूनी दायित्व के रूप में प्रस्तुत किया।
- ऋण के बजाय अनुदान-आधारित, पूर्वानुमेय एवं बढ़े हुए वित्त की मांग।
- अनुकूलन वित्त अंतराल को रेखांकित किया: 2035 तक विकासशील देशों को प्रतिवर्ष 310–365 अरब अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता।
- CBDR-RC (सामान्य लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व एवं संबंधित क्षमताएँ) सिद्धांत की पुनः पुष्टि।
- यूरोपीय संघ के CBAM का विरोध, इसे एक छिपी हुई व्यापारिक बाधा बताया।
- अनुकूलन एवं शमन को समान प्राथमिकता देने पर बल दिया।
COP-30 की प्रमुख सीमाएँ
- जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध समाप्त करने हेतु स्पष्ट रोडमैप का अभाव।
- अनुच्छेद 9.1 के अंतर्गत कमजोर जलवायु वित्त प्रतिबद्धताएं।
- प्रमुख उत्सर्जक देशों द्वारा अद्यतन NDC प्रस्तुत करने में देरी, जिससे महत्वाकांक्षा अंतराल बढ़ा।
- निम्न के अभाव के कारण क्रियान्वयन अंतराल बना हुआ है:
- स्पष्ट समय-सीमा
- प्रवर्तन तंत्र
- जवाबदेही ढांचा
- जस्ट ट्रांजिशन मैकेनिज्म हेतु समर्पित वित्त का अभाव।
ग्रीनहाउस गैस प्रोटोकॉल
- सरकारों एवं व्यवसायों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को मापने, प्रबंधित करने एवं कम करने हेतु एक अंतरराष्ट्रीय ढाँचा।
- विश्व संसाधन संस्थान (WRI) एवं विश्व सतत विकास व्यवसाय परिषद (WBCSD) द्वारा विकसित।
20/20/20 लक्ष्य [2008 में यूरोपीय संघ (EU) द्वारा प्रस्तुत]
- CO₂ उत्सर्जन में 20% की कमी।
- ऊर्जा बाजार में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी में 20% की वृद्धि।
- ऊर्जा दक्षता में 20% सुधार।
