विश्व में वनों की कटाई विश्व भूगोल का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो पर्यावरण संतुलन और जैव विविधता पर गहरा प्रभाव डालता है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण और कृषि विस्तार के कारण विश्वभर में वन क्षेत्र लगातार घट रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन, मृदा अपरदन और वन्यजीवों के आवास पर गंभीर असर पड़ रहा है।
वनोन्मूलन
- UNFCCC (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय) के अनुसार, क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत वनोन्मूलन को मानव द्वारा प्रत्यक्ष रूप से वन भूमि को गैर-वन भूमि में परिवर्तित करने की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें विशेष रूप से वे क्षेत्र शामिल हैं जहाँ वृक्षावरण एक निश्चित सीमा (जैसे 10%) से कम हो जाता है या भूमि को कृषि, चरागाह अथवा शहरी क्षेत्रों में परिवर्तित कर दिया जाता है, जबकि सतत कटाई को इसमें शामिल नहीं किया जाता है।
- वन वे क्षेत्र हैं जहाँ वृक्ष एवं पौधे पाए जाते हैं, जो कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन का उत्सर्जन करते हैं, वायुमंडलीय संतुलन बनाए रखते हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से वैश्विक तापन की रोकथाम में सहायक होते हैं।
- वैज्ञानिकों के अनुसार, मानव विकास से पूर्व पृथ्वी का लगभग 25% भाग वनों से आच्छादित था तथा ये भू-पारिस्थितिकी का प्रमुख उदाहरण हैं।
- वन केवल ईंधन एवं कच्चे माल के स्रोत ही नहीं हैं, बल्कि वायुमंडलीय आर्द्रता बनाए रखते हैं, वर्षा में वृद्धि करते हैं, नदी प्रवाह एवं प्रदूषण को नियंत्रित करते हैं तथा मृदा अपरदन एवं बाढ़ की रोकथाम करते हैं।जल चक्र, वायु चक्र एवं भूमि की उर्वरता बनाए रखने में सहायक होते है।
- वन अनेक पशु-पक्षियों का आश्रय स्थल, औषधियों का स्रोत तथा मनोरंजन एवं आय के साधन के रूप में विकसित किए जा सकते हैं। यह बेंत, शहद, गोंद, लाख आदि कुटीर उद्योगों के लिए कच्चा माल प्रदान करते हैं।
- ध्वनि एवं वायु प्रदूषण की रोकथाम करते हैं तथा किसी भी राष्ट्र की जीवन रेखा है। पर्यावरणीय स्थिरता एवं पारिस्थितिकी संतुलन वनों की स्थिति पर निर्भर करता है।
वनोन्मूलन या वन विनाश
- वर्तमान आर्थिक गतिविधियों के कारण प्राकृतिक वनस्पति को मृदा अपरदन, बाढ़ की आवृत्ति एवं विस्तार में वृद्धि, वर्षा में कमी से सूखा तथा अनेक पशु प्रजातियों के विलुप्त होने जैसी गंभीर पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। पारिस्थितिक संतुलन हेतु प्रत्येक देश के कुल क्षेत्रफल का एक-तिहाई भाग घने वनों से आच्छादित होना चाहिए, परंतु अधिकांश देशों में इस नियम की उपेक्षा की गई है।
वनोन्मूलन या वन विनाश के कारण
- औद्योगिकीकरण: औद्योगिक विकास के लिए वनों को काटकर भूमि उपलब्ध कराई जाती है। उद्योगों के लिए कच्चे माल और ईंधन, खनन और पैकेजिंग में वनों का व्यापक उपयोग होता है।
- झूम खेती: उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भूमि की उर्वरता बढ़ाने हेतु वनों को जलाना, जिससे भूमि का तीव्र अपरदन होता है।
- अतिचारण: पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से नई वनस्पतियों का विकास रुकता है, जिससे वनों का विनाश होता है।
- घास भूमि में रूपांतरण: समुद्री जलवायु वाले सम शीतोष्ण एवं उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रीका) में वनों को डेयरी पशुपालन हेतु चरागाहों में परिवर्तित किया गया।
- कृषि भूमि में परिवर्तन: बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं के कारण कृषि भूमि हेतु तीव्र वनों की कटाई; उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्ण कटिबंधीय विकासशील देश अधिक प्रभावित।
- वनाग्नि: प्राकृतिक (आकाशीय बिजली) एवं मानवजनित कारणों से तीव्र वन विनाश।
- निर्धनता: गरीब समुदाय आजीविका के लिए वनों पर निर्भर हैं, जिससे वनोन्मूलन बढ़ता है। भारतवर्ष जैसे विकासशील देशों में जनसंख्या का एक बड़ा भाग निर्धनता का जीवन व्यतीत कर रहा है। इनकी आजीविका का प्रमुख स्त्रोत वन से प्राप्त होने वाली लकड़ी एवं गौण उपजें हैं।
- बहुउद्देशीय परियोजनाएँ: बांध और जलाशय निर्माण के लिए वनों को जलमग्न किया जाता है।
वनोन्मूलन के प्रतिकूल प्रभाव
- पर्यावरणीय क्षति: वनों का विनाश प्राकृतिक संतुलन को बाधित करता है, जिससे भूमि कटाव, बाढ़, सूखा, कम वर्षा और पर्यावरण प्रदूषण जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
- जल संकट: वनों की अनुपस्थिति से वर्षा में कमी होती है, जिससे जल स्रोत जैसे तालाब, कुएं और धाराएं सूखने लगती हैं।
- मिट्टी का कटाव: वनों के अभाव में वर्षा का जल मिट्टी को क्षतिग्रस्त करता है, जबकि वृक्षों की जड़ें मिट्टी को मजबूती देती हैं।
- भूस्खलन: वनों की कटाई से भूस्खलन की घटनाएं बढ़ती हैं, जिससे जन-धन की भारी हानि होती है।
- वनों के अभाव में बाढ़ नियंत्रण बाधित होता है, जिससे फसल, जानमाल और उपजाऊ मिट्टी नष्ट हो जाती है। परिणामस्वरूप, भूमि की उत्पादकता घटती है और उपजाऊ भूमि की कमी हो जाती है।
वन विनाश या वनोन्मूलन को रोकने के उपाय
उचित वन प्रबंधन नीति
- वनों की कटाई को नियंत्रित करने हेतु वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाया जाए।
- वृक्षों की कटाई तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक ढंग से की जानी चाहिए।
- मृदा अपरदन, पौधों के रोग एवं वनों की कटाई जैसे पर्यावरणीय खतरों से वनों की सुरक्षा हेतु विशेष प्रयास किए जाएँ।
- क्षेत्रीय आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए वनीकरण को प्रोत्साहित किया जाए।
- वृक्षारोपण प्राकृतिक वनों का स्थान नहीं लेना चाहिए; हिमाचल प्रदेश में सेब के बागानों हेतु वनों की कटाई से स्थानीय पर्यावरण को हानि पहुँची है।
वन संरक्षण
- सरकार को वन क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित कर वनों की कटाई पर कठोर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
- भारत में संवेदनशील वन प्रजातियों को सरकारी पहलों के अंतर्गत विधिक संरक्षण प्रदान किया गया है।
सामाजिक वानिकी (Social Forestry)
- सामाजिक वानिकी एक वन विकास प्रणाली है, जिसमें समुदायों की आर्थिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए वनीकरण तथा ईंधन हेतु नियंत्रित वृक्ष कटाई को बढ़ावा दिया जाता है।
- इस प्रणाली के अंतर्गत बंजर भूमि, ग्राम सामुदायिक भूमि, नहरों, सड़कों, रेलवे पटरियों के किनारे एवं अवनत वन क्षेत्रों में वृक्षारोपण किया जाता है।
- सामाजिक वानिकी के लाभ:
- बंजर भूमि का उपयोग
- बेरोजगारी कम करने हेतु रोजगार सृजन
- मनोरंजन स्थलों का विकास
- कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन
- पर्यावरण प्रदूषण में कमी
- ग्रामीण कारीगरों के लिए रोजगार
- गरीबों की आय में वृद्धि
- परिवहन मार्गों का विकास
वन संरक्षण में जन सहभागिता
- वन संरक्षण के लिए जन-जागरूकता आवश्यक; जन सहभागिता के बिना वनों की कटाई को नहीं रोका जा सकता।
- लोगों को वनों की कटाई के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए। प्रमुख आंदोलन: चिपको आंदोलन (उत्तराखंड), मृदा संरक्षण अभियान (होशंगाबाद), श्यामपुर में महिलाओं द्वारा वृक्ष कटाई रोकने की शपथ।
- अन्य पर्यावरणीय आंदोलन: रेणी गाँव (उत्तराखंड) का महिला आंदोलन, अमेज़न वर्षावन की कटाई के विरुद्ध विरोध, “बीमार हिमालय बचाओ” जैसे पर्यावरणीय नारे।
- वन महोत्सव (1952):भारत सरकार द्वारा जुलाई 1952 में राष्ट्रीय वन नीति के अंतर्गत प्रारंभ किया। अवधारणा: “वृक्ष का अर्थ जल, जल का अर्थ अन्न, और अन्न ही जीवन है।”
भारत में पर्यावरण संरक्षण हेतु सरकारी उपाय
पर्यावरण संरक्षण विभाग की स्थापना
- 1980 में भारत सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण विभाग की स्थापना की गई तथा राज्य सरकारों को भी अपने-अपने पर्यावरण विभाग स्थापित करने के निर्देश दिए गए।
- उत्तरदायित्व: पर्यावरण संरक्षण नीतियों का निर्माण एवं क्रियान्वयन
व्यापक पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986
- पर्यावरणीय विनियमों की पूर्व कमियों को दूर करने हेतु 1986 में एक महत्वपूर्ण अधिनियम लागू किया गया।
- यह अधिनियम केंद्र एवं राज्य प्राधिकरणों को पर्यावरण संरक्षण हेतु आवश्यक कदम उठाने के लिए सशक्त बनाता है।
- इस अधिनियम के क्रियान्वयन हेतु 20 राज्य सरकारों को दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार प्रदान किया गया।
जैव-विविधता अधिनियम-2002
- देश के जैविक संसाधनों तक पहुँच को विनियमित कर उनके उपयोग से प्राप्त लाभों के न्यायसंगत बंटवारे को सुनिश्चित करता है।
- इन संसाधनों से संबंधित जैविक ज्ञान के उपयोग को नियंत्रित करने का उद्देश्य।
- जैव विविधता संरक्षण से संबंधित एजेंसियों के समन्वय हेतु राष्ट्रीय जैव विविधता संरक्षण योजना विकसित की गई।
- प्रभावी क्रियान्वयन हेतु चेन्नई में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) की स्थापना।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
- वन व पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था।
- जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अंतर्गत सितंबर 1974 में स्थापित।
- राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs) एवं प्रदूषण नियंत्रण समितियों (PCCs) के साथ समन्वय करता है।
- प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण हेतु केंद्र सरकार को परामर्श प्रदान करता है।
राष्ट्रीय वनीकरण एवं पारिस्थितिकी विकास बोर्ड
- स्थापना: 1992
- इसका उद्देश्य वनीकरण, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना तथा देश में पारिस्थितिकी विकास गतिविधियों को बढ़ावा देना।
राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (NAMP)
- इस कार्यक्रम के अंतर्गत नियमित रूप से चार वायु प्रदूषक [सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NO₂), श्वसनीय निलंबित कण पदार्थ (RSPM/PM₁₀), सूक्ष्म कण पदार्थ (PM₂.₅)] की नियमित रूप से निगरानी की जाती है।
- इसके अलावा देश में सात प्रमुख महानगरों में सीसा एवं बहुचक्रित एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) जैसे विषैले पदार्थों की निगरानी रखी जाती है।
पर्यावरण संरक्षण नीतियाँ
- राष्ट्रीय वन नीति (1986)
- प्रदूषण निवारण रूपरेखा (1991)
- वन संरक्षण अधिनियम (1980, 1988)
- जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम (1977, 1988)
- वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम (1981, 1987)
- राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना
राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय
- गंगा कार्य योजना (GAP) का चरण-I वर्ष 1985 में प्रारंभ, जिसे 31 मार्च 2000 को समाप्त किया गया।
- राष्ट्रीय नदी संरक्षण प्राधिकरण (NRCA) ने गंगा कार्य योजना एवं अन्य नदी स्वच्छता कार्यक्रमों की प्रगति की समीक्षा की।
- गंगा कार्य योजना का चरण-II राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) में विलय किया गया।
वायुमंडलीय पर्यावरण से संबंधित समस्याएं
- वायुमंडलीय पर्यावरणीय समस्याएं: जीवाश्म ईंधनों (कोयला, पेट्रोल, डीजल, गैस) का अत्यधिक उपयोग, तीव्र वनों की कटाई तथा परिवहन गतिविधियों में वृद्धि के कारण वैश्विक जलवायु परिवर्तन।
प्रमुख वायुमंडलीय असंतुलन:
- ओजोन क्षय (ओजोन छिद्र)
- वैश्विक तापन
- अम्ल वर्षा
- ग्रीनहाउस प्रभाव
इन पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान हेतु नीतिगत सुधार, सतत प्रथाओं एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की तात्कालिक आवश्यकता है।
