लोक वाद्य यंत्रराजस्थानी कला व संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसमें पारंपरिक संगीत में उपयोग होने वाले विभिन्न वाद्यों का अध्ययन किया जाता है। इन वाद्यों को तत (तार वाले), सुषिर, अवनद्ध और घन वाद्यों में वर्गीकृत किया जाता है, जो राजस्थान की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं।
तत वाद्य (तार वाले वाद्य)
इस श्रेणी के वाद्ययंत्रों में ध्वनि तार के कंपन से उत्पन्न होती है। तार को खींचकर, झंकारकर या गज़ से रगड़कर कंपन पैदा किया जाता है, जिससे तार की लंबाई और कसावट के आधार पर सुर की ऊँचाई – नीचाई तथा ध्वनि की अवधि तय होती है।
गज़ – घोड़े की पूँछ के बाल से बना एक धनुष
मिज़राब – उँगली कटने से बचाने के लिए वादक द्वारा पहना जाता है
वाद्य यंत्र
मुख्य तथ्य
सारंगी
तंतु वाद्यों में सर्वश्रेष्ठ
27 तार; रोहिड़ा/सागवान लकड़ी; गज से वादन
प्रसिद्ध वादक – रामनारायण (उदयपुर), सुल्तान ख़ाँ (सीकर), उस्ताद सुल्तान खान (सारंगी का अलबेला सुल्तान)
प्रकार –
ढाणी सारंगी – (निहालदे की कथा सुनाने वाले जोगी बजाते हैं)
गुजराती सारंगी – (7 तार, ‘लंगा’ समुदाय द्वारा)
जोगिया सारंगी – (4 तार, अलवर-भरतपुर के भर्तृहरि जोगियों द्वारा भर्तृहरि के साथ प्रयुक्त)
जड़ी की सारंगी/प्यालेदार सारंगी (जैसलमेर जिले के मांगणियारों द्वारा प्रयुक्त)
सिन्धी सारंगी (पश्चिमी राजस्थान-लंगा समुदाय)
कामायचा
सामग्री: चर्मपत्र, आँत, इस्पात, धातु, शीशम, घोड़े के बाल
Material: लकड़ी, धातु, चर्मपत्र, तूमड़ी के खोल, चमड़ा, बकरी की खाल, बाँस, धातु
आविष्कारक – संत इस्माइल नाथ जोगी
अन्य तत् वाद्य – सुरमंडल (2 तार), दो तारा (2 तार), सरोद (तुन की लकड़ी+हाथी दांत+नारियल का खोल), सुरमंडल
सुषिर वाद्य
सुषिर वाद्य वे वाद्य यंत्र हैं जिनमें फूंक मारकर (हवा से) ध्वनि पैदा की जाती है। इनमें न तार होते हैं, न झिल्ली – सिर्फ खोखली नली या ट्यूब में हवा को कंपित करके सुर निकाले जाते हैं।
वाद्य यंत्र
मुख्य तथ्य
अलगोजा
राजस्थान का राज्य वाद्य
Material: बांस
समान आकार की दो बांस की बांसुरियों की जोड़ी
प्रत्येक पर 5 उंगलियों के लिए छेद और एक संकीर्ण मुखनाल।
दोनों को वादक एक साथ मुंह में रखकर फूंकता है।
उपयोग : अलवर के मेव समुदाय, कालबेलिया, भील; तेजाजी की कथा, ढोला-मारू
कलाकार – रामनाथ चौधरी (जयपुर) नाक से बजाते हैं।
तगाराम भील (जैसलमेर)
पद्मश्री 2026
शहनाई / नफीरी / सुंदरी
Material – रोहिड़ा/शीशम,धातु
सुषिर वाद्य यंत्रों में सर्वश्रेष्ठ
8 छेद, मांगलिक अवसर पर
कलाकार – बिस्मिल्लाह ख़ाँ, चाँद मोहम्मद ख़ाँ (जयपुर)
टोटो – शहनाई का देसी रूप, जोगी, भील, ढोली बजाते हैं
करणा/कर्ण
Material:पीतल
राजस्थान का सबसे लंबा
एक लंबी पीतल की तुरही, जिसे दो भागों में बनाया जाता है।
कीप के आकर का चौड़ा खुला हुआ मुख और सँकरे भाग की तरफ संकलित मुखनाल होता है
युद्धभूमि,राजदरबारों में उपयोग
मोरचंग
सुषिर वाद्ययंत्रों में सबसे छोटा
इसे “ज्यू हार्प”(यहूदी वीणा) भी कहा जाता है
होंठों के बीच रखकर बजाया जाता है
लंगा, मांगणियार द्वारा
नोट –संस्कृति मंत्रालय द्वारा इसे घन वाद्य यंत्र माना जाता है
भुंगल / रणभेरी
Material: काँसा
युद्ध में बजाए जाने के कारण रणभेरी कहा जाता है
भवाई जाति; भवाई नृत्य
सतारा
बाँसुरी+अलगोजा+शहनाई का मिश्रित रूप; बाड़मेर-जैसलमेर
गड़रिए एवं मुस्लिम कलाका
नड़
कगौर की लड़की से बनी एक नली।
इस पर चार अंगुल छिद्र होते हैं इसे ऊपरी छोर से फूँक देकर बजाया जाता है
प्रसिद्ध कलाकार – करणा भील
मशक
Material: बकरी की खाल, मोम
स्कॉटिश बैगपाइप जैसा
मशकबीन – बकरी की खाल की
नली – बाँस से बनी एक नली, पाँच अंगुल छिद्र, फूँकने पर संगीत
मेवात— भेरूजी भोपों द्वारा
नागफनी
Material: काँसा/पीतल धातु
काँसे की सर्पिल नली, घंटी (बेल) साँप के फन (हुड) के आकार की होती है, जिसमें धातु की कंपन करने वाली पत्ती लगी होती है।
बाँसुरी
Material: लकड़ी
अन्य नाम – मुरली / मुरला / हरणाई / शंख / टोटो / बर्गु
लंबी लकड़ी की बेलनाकार नली के समान, दूसरा छोर खुला जहाँ छह छिद्र
मुख्य कलाकार – हरिप्रसाद चौरसिया, पन्नालाल घोष
पेली
Material –बाँस
यह एक छोटी बाँसुरी है
इसकी ध्वनि पर रतवई को उच्च स्वर में गाया जाता है
पुंगी / बीन
Material: तूमड़ी, बाँस, मोम
लंबी गर्दन वाली एक गोल तूमड़ी
कालबेलिया / सपेरे सांप को पकड़ने हेतु
पुंगी – 2 नलियाँ, बीन – 1 नली
बंकिया
Material: काँसा
दो भागों में निर्मित एक काँसे की तुरही, बिगुल का बड़ा रूप
बिगुल की तरह नली और संकरी मुखनाल सहित एक तश्तरी के आकार की घंटी
शोभायात्राओं, धार्मिक और सामाजिक समारोहों में उपयोग
बरगू
Material: काँसा
दो भागों में बनी एक काँसे की तुरही
कप के आकार की घंटी,संकरी मुखनाल सहित ‘एस’ आकार की नली
‘सरगडा‘ समुदाय द्वारा उपयोग
पावरी/तारफ़ा/तारपी
Material: लकड़ी, सूखी तूमड़ी, गाय का सींग
पुंगी का एक बड़ा रूप
तले की ओर छह छिद्र, ऊपरी हिस्से में एक चोंच जैसी संरचना
उत्पन्न ध्वनि भारतीय के साथ-साथ यूरोपीय संगीत के स्वरों से भी मिलती है
कथौडी जाति द्वारा
हारमोनियम
Material: लकड़ी, धातु, पीतल, कपड़ा
सुवाह्य लकड़ी की पेटी, जिसकी उत्पत्ति पश्चिम बंगाल में हुई
10 छिद्र होते हैं जो वायु को धौंकनी से गुज़रने देते हैं
मुख्य कलाकार – महमूद धौलपुरी, उस्ताद अल्लादिया खाँ(जयपुर घराना)
तुरही
Material: काँसा
काँसे की लंबी तुरही
दो हिस्सों – कीपदार मुख + लंबाकार मुखनाल
अन्य सुषिर वाद्य –पावरी (गाय के सींग+लकड़ी+सूखी तूमड़ी से निर्मित), पावो (बाँस से बनी एक दोहरी बाँसुरी), सिंगी, रणसिंघा
अवनद्ध वाद्य
ये तालवाद्य यंत्र हैं जिनमें चमड़े (खाल) की झिल्ली को पीटकर या थपथपाकर ध्वनि निकाली जाती है।
वाद्य यंत्र
मुख्य तथ्य
ढोल
Material: लकड़ी, चमड़ा, चर्मपत्र
लकड़ी के बेलनाकार खोल के दोनों सिरों पर बकरे की खाल मढ़कर
सबसे प्राचीन, मांगलिक कार्य; ढोली जनजाति द्वारा
मृदंग / पखावज
Material: लकड़ी, चर्मपत्र, चमड़ा, काला लेप
द्विमुखी बेलनाकार ढोल, दोनों सिरों पर बकरी की खाल मढ़ी, एक सिरा संकरा, दूसरा चौड़ा
दाहिने सिरे पर काला लेप, बाएं सिरे पर बारीक गेहूँ का आटा लेप