लोक संगीतराजस्थानी कला व संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो प्रदेश की परंपराओं, लोक जीवन और भावनाओं को अभिव्यक्त करता है। यह संगीत प्रायः मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है और त्योहारों, विवाहों तथा सामाजिक अवसरों पर प्रस्तुत किया जाता है। लोक संगीत राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और लोक पहचान को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
परिभाषा: जन-साधारण के सुख-दुःख, प्रेम और भक्ति की सहज संगीतमयी अभिव्यक्ति
विशेषता: यह शास्त्रीय नियमों से मुक्त और मौखिक परंपरा पर आधारित होता है
गाँधीजी – “लोक संगीत संस्कृति का पहरेदार”
टैगोर – “संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाने वाली कला”
देवेंद्र सत्यार्थी – “लोकगीत किसी संस्कृति के मुंह बोले चित्र हैं”
राजस्थान की लोक गायन शैलियां
मांड गायन शैली –
मांड जैसलमेर का प्राचीन नाम था, इसी कारण इस क्षेत्र में मांड गायन शैली का विकास हुआ
प्रारंभ में यह केवल जैसलमेर क्षेत्र तक सीमित थी, परंतु कालांतर में राजस्थान के अन्य भागों (जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और उदयपुर) में भी लोकप्रिय हो गई
यह शैली शृंगार रस और विरह भाव की कोमल अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती है
प्रमुख गीत –
केसरिया बालम – माँड गायन शैली का सबसे प्रसिद्ध और मुख्य गीत
प्रमुख कलाकार –
अल्लाह जिल्लाह बाई (बीकानेर, पद्मश्री 1982)
गवरी देवी (जोधपुर, मरु कोकिला)
मांगी बाई (उदयपुर)
जमीला बानो (जोधपुर)
बन्नो बेगम (जयपुर)
अली-गनी मोहम्मद
विशेष तथ्य –
माँड गायन शैली के लिए बतूल बेगम (जयपुर) को नारी शक्ति पुरस्कार 2021 प्रदान किया गया
यह पुरस्कार 8 मार्च 2022 को प्रदान किया गया
माँड गायन शैली को राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता है
मांगणियार गायन शैली –
मांगणियार गायन शैली का विकास राजस्थान के जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्र में हुआ
यह शैली मांगणियार समुदाय के परंपरागत गायकों द्वारा विकसित की गई
इसमें 6 राग, 36 रागिनियों का प्रयोग
मांगणियार गायन शैली में लोक जीवन, राजाश्रय और सामाजिक घटनाओं का प्रभाव दिखाई देता है
प्रयुक्त वाद्य यंत्र – कामायचा , खड़ताल, सुरनाई
प्रमुख कलाकार –
साकर खां मांगणियार –
कामायचा के जादूगर (2012 पद्मश्री, 1991 संगीत अकादमी पुरस्कार)
सद्दीक खाँ मांगणियार –
खड़ताल के जादूगर (पद्म श्री)
2002 में मांगणियार लोक कला एवं अनुसंधान परिषद् (जयपुर)
अनवर खाँ मांगणियार (2020 पद्म श्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार2017)
रुकमा माँगनीयार (थार की लता, देवी अहिल्या सम्मान)
लंगा गायन शैली –
लंगा गायन शैली का विकास जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्र में लंगा समुदाय के गायकों द्वारा हुआ
लंगा गायन शैली में वीरता, शृंगार और सामाजिक भावनाओं का सुंदर समन्वय दिखाई देता है
प्रयुक्त वाद्य यंत्र – कामायचा , सारंगी
प्रमुख गीत –
निम्बुड़ा – लंगा गायन शैली का मुख्य एवं सर्वाधिक प्रसिद्ध गीत
तालबंदी गायन शैली –
तालबंदी गायन शैली का विकास औरंगजेब के काल से जुड़ा हुआ है
जब औरंगजेब द्वारा संगीत पर प्रतिबंध लगाया गया, तब मथुरा (उत्तर प्रदेश) क्षेत्र के साधु- संन्यासी पूर्वी राजस्थान की ओर आ गए
इन्हीं साधु-संन्यासियों द्वारा तालबंदी गायन शैली का विकास किया गया
इस शैली में गायन के साथ ताल का विशेष महत्व होता है
प्रयुक्त वाद्य यंत्र –
नगाड़ा – हारमोनियम, तबला, तालबंदी गायन शैली का प्रमुख वाद्य यंत्र
हवेली संगीत गायन शैली –
क्षेत्र – नाथद्वारा , जयपुर , किशनगढ़ , कोटा
मुख्यत: – ब्रज क्षेत्र की गायन शैली है
संबंध – वैष्णव सम्प्रदाय के सभी मंदिरों में गाया जाता है
बोल –“श्री कृष्णं शरणं मम…”
विशेष तथ्य – हवेली संगीत को संगीत घरानों का दर्जा प्राप्त नहीं है
फड़ गायन शैली
भोपा समुदाय के लोग अलग अलग वाद्य यंत्रों के साथ फड़ गायन करते हैं
जैसे – देवनारायण जी की फड़ (वाद्य – जंतर)
पाबूजी की फड़(वाद्य – रावण हत्था)
राजस्थान के लोक गीतों का वर्गीकरण
क्षेत्र आधारित लोक गीत
संस्कार सम्बन्धी लोक गीत
अन्य प्रमुख लोक गीत
क्षेत्र आधारित लोक गीत
क्षेत्र
विशेषता
रेगिस्तानी क्षेत्र
क्षेत्र – जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर
लोक गीत –
पीपली – शेखावाटी क्षेत्र में तीज पर्व पर, पत्नी द्वारा पति को घर बुलाने का गीत
मूमल – शृंगारिक गीत जिसमें लोद्रवा की राजकुमारी मूमल के नख शिख वर्णन है
झोरावा – पति के परदेस जाने पर उसके वियोग में गाया जाने वाले विरह गीत
कुरजा – संदेशवाहक (कुरजा पक्षी) के रूप में पति तक संदेश पहुँचाने का गीत