राजस्थान का धार्मिक जीवन राज्य की सांस्कृतिक परंपराओं, आस्थाओं और आध्यात्मिक मूल्यों का सजीव प्रतिबिंब है। राजस्थानी कला व संस्कृति के अंतर्गत यहाँ के मंदिर, तीर्थस्थल, लोकदेवता, संत परंपरा और विविध धार्मिक उत्सव सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित करते हैं। राजस्थान का धार्मिक जीवन विविधता, सहिष्णुता और लोकआस्था की समृद्ध धरोहर को दर्शाता है।
राजस्थान में राम, कृष्ण, शिव तथा दुर्गा पूजा पर आधारित अनेक धार्मिक संप्रदायों का जन्म एवं विकास हुआ। हिन्दू धर्म, राजस्थान प्रदेश का मुख्य धर्म है। हिन्दू धर्म के अंतर्गत ‘विष्णु पूजक’ अर्थात् वैष्णव धर्म में आस्था रखने वाले लोगों की संख्या सर्वाधिक है। वैष्णवों के अतिरिक्त शैव एवं शाक्त मतावलम्बी भी प्रदेश में न्यूनाधिक संख्या में निवास करते हैं। वैष्णव, शैव एवं शाक्त तीनों ही मत अनेक पंथों एवं सम्प्रदायों में बंटे हुए हैं।
वैष्णव एवं शैव उपासकों को उपासना पद्धति के आधार पर दो भागों में विभक्त किया जा सकता हैं-
- सगुण संप्रदाय –
- इसमें ईश्वर को सर्वस्व मानकर ईश्वर के मूर्त रूप की पूजा – आराधना की जाती है
- प्रमुख सगुण संत – रामानुजाचार्य, निम्बकाचार्य, रामानंद, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, मीराबाई, गवरीबाई, दुर्लभजी, रमाबाई
- निर्गुण संप्रदाय –
- इस मत के समर्थक ईश्वर को निराकार एवं निर्गुण परमसत्ता मानकर उसकी भक्ति करते हैं
- प्रमुख निर्गुण संत – जाम्बोजी, जसनाथजी, संत दादूदयाल, कबीर, रैदास, संत पीपा, नवलदासजी, लालगिरी जी, सुंदरदास जी, रज्जब जी, नाथसंप्रदाय
राजस्थान में धार्मिक समुदाय
वैष्णव धर्म एवं उसके सम्प्रदाय
- वैष्णव – भगवान विष्णु व उनके दस अवतारों को प्रधान देव मानकर उसकी आराधना करने वाले वैष्णव कहलाये
- प्रवर्तक – वासुदेव श्रीकृष्ण, वैष्णव धर्म को ‘भागवत धर्म’ भी कहा जाता है
- वैष्णव धर्म के विषय में प्रारंभिक जानकारी उपनिषदों से – घोसुण्डी अभिलेख 2 BC (राजस्थान में सर्वप्रथम उल्लेख)
- विष्णु के चौदह अवतार हैं। मत्स्य पुराण में इनके दस अवतारों का वर्णन है।
- सबसे पवित्र अवतार – वराह का अवतार
- आलवार – दक्षिण भारत में वैष्णव भक्ति आन्दोलन को सक्रिय करने वाले संत
- एकमात्र महिला अलवार सन्त – आंडाल
- दिव्य प्रबंधम – बारह आलवार सन्तों की काव्य रचना
- वैष्णव धर्म के सम्प्रदाय –
- रामानुज सम्प्रदाय
- रामानन्दी सम्प्रदाय
- निम्बार्क सम्प्रदाय
- वल्लभ सम्प्रदाय
- ब्रह्म या गौड़ीय सम्प्रदाय
रामानुज सम्प्रदाय
- प्रवर्तक – रामानुजाचार्य
- जन्म 1017 ई. में तिरुपति नगर (तमिलनाडु)
- गुरु – यमुनाचार्य
- प्रमुख रचना ‘श्री भाष्य’, वेदांत संग्रहम
- प्रवर्तित दर्शन- ‘विशिष्टाद्वैतवाद‘
- श्रीरामानुजाचार्य ने ‘श्री सम्प्रदाय’ चलाया (कांची, श्रीरंगपट्टनम)
- रामानुजाचार्य मुक्ति का मार्ग ज्ञान को नहीं मानकर भक्ति को मानते हैं, अत: इस दर्शन में राम को परब्रह्म मानकर उनकी पूजा-आराधना की जाती है। इसलिए इसे रामावत संप्रदाय भी कहते हैं
- उत्तर भारत में प्रमुख पीठें–
- ‘उत्तर तोताद्रि’ (अयोध्या मठ) एवं
- गलताजी (जयपुर)
रामानन्दी सम्प्रदाय
- प्रवर्तक: रामानंद, गुरु: श्रीराघवानंद
- प्रमुख पीठ: गलताजी (जयपुर), उत्तर तोताद्रि (गालव तीर्थ, मंकी वेली)।
- योगदान: दक्षिण से उत्तर भारत में भक्ति परम्परा की शुरुआत।
- रामावत या रामानन्दी सम्प्रदाय (उत्तरी भारत में प्रवर्तित मत)
- विशेषता: ज्ञानमार्गी राम भक्ति की प्रधानता
- विचार: ऊँच-नीच, जाति-पाँति व छुआछूत के विरोधी
- प्रमुख शिष्य: कबीर (जुलाहा), पीपा (दर्जी), धन्ना (जाट), रैदास (चर्मकार), अनंतानंद, सुरसुरानंद, भावानंद, सदना, सैना (नाई), सुरसुरी, पद्मावती, सुखानंद
- राजस्थान में प्रवर्तन: संत कृष्णदास पयहारी (अनन्तानंद के शिष्य)
- कृष्णदास ने 1503 ई. में चतुरनाथ को शास्त्रार्थ में हराया, आमेर राजा पृथ्वीराज व रानी बाला बाई इनके अनुयायी
- सवाई जयसिंह ने रामानन्दी सम्प्रदाय को प्रश्रय दिया तथा राजकवि श्रीकृष्ण भट्ट कलानिधि से ‘राम रासा’ ग्रन्थ की रचना करवायी
- रसिक सम्प्रदाय – अग्रदास जी ने सीकर के पास रेवासा में स्थापना की, इस संप्रदाय को जानकी संप्रदाय, सिया संप्रदाय तथा रहस्य संप्रदाय भी कहा जाता है।
- किल्हणदास ने राम और सीता की पूजा राधा-कृष्ण के श्रृंगार भाव के भाँति शुरु की
- ध्यान मंजरी – रसिक सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रन्थ (अग्रदास द्वारा रचित)
निम्बार्क सम्प्रदाय
- अन्य नाम: हंस सम्प्रदाय / सनकादि सम्प्रदाय
- प्रवर्त्तक: आचार्य निम्बार्काचार्य (12वीं सदी)
- प्रमुख ग्रंथ: वेदान्त पारिजात भाष्य; अन्य- दशश्लोकी
- दर्शन: द्वैताद्वैत या भेदाभेद
- प्रमुख पीठ: सलेमाबाद (अजमेर), स्थापना- आचार्य परशुराम देवाचार्य द्वारा; अन्य पीठ- उदयपुर
- प्रसार: सर्वप्रथम वृंदावन में; मारवाड़ में ‘नीमावत’ नाम से जाना जाता है।
- विशेषता: राधा को श्रीकृष्ण की परिणीता मानकर युगल स्वरूप की मधुर सेवा
- सखी सम्प्रदाय: निम्बार्क संत हरिदासजी द्वारा कृष्ण भक्ति में प्रवर्तित
- अन्य पीठ- उदयपुर में
वल्लभ (पुष्टिमार्ग) सम्प्रदाय
- प्रवर्त्तक: वल्लभाचार्य; पिता– लक्ष्मण भट्ट, माता– इल्लमागारु
- प्रमुख रचना: अणु भाष्य
- दर्शन: शुद्धाद्वैतवाद
- सम्प्रदाय: पुष्टिमार्ग (अर्थ- ईश्वर की कृपा)
- विजयनगर शासक कृष्णदेवराय द्वारा महाप्रभु उपाधि; वैश्वानरावतार (अग्नि का अवतार)
- अष्टछाप कवि मंडली – वल्लभाचार्य के पुत्र विठ्ठलनाथ जी द्वारा (कवि- कुम्बनदास, सूरदास, परमानंददास, कृष्णदास, नंददास, चतुर्भुजदास, गोविंदस्वामी, छीतस्वामी); सूरदास को ‘पुष्टिमार्ग का जहाज‘ कहा जाता है।
- कुल 7 पीठें, प्रधान पीठ: श्री नाथ जी (नाथद्वारा)
- मथुराधीश जी- कोटा;
- विठ्ठलनाथ जी- नाथद्वारा (राजसमन्द)
- द्वारकाधीश जी- कांकरोली (राजसमन्द)
- गोकुलनाथ जी- गोकुल (UP)
- गोकुलचन्द्रमा जी- कामां (भरतपुर)
- मदनमोहन जी- कामां (भरतपुर)
- बालकृष्ण जी- सूरत (गुजरात)
- मेवाड़ महाराणा राजसिंह के समय श्रीनाथजी प्रतिमा वृन्दावन से सिंहाड़ (नाथद्वारा) लाई गई (दामोदर गुसाई महाराज)
- हवेली संगीत – दर्शन के समय गायक परंपरागत रूप में वाद्य-वादन के साथ अष्टछाप के कवियों के पद गाते हैं
- पिछवाई: श्रीनाथ जी स्वरूप के पीछे कृष्ण लीला चित्रावली वाला पट
- मेले: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी पर मेला; अन्नकूट महोत्सव
- आदर्श वाक्य: श्रीकृष्ण शरणम् मम्।
ब्रह्म या गौड़ीय सम्प्रदाय
- शुरुआत – माध्वाचार्य (द्वैतवाद का सिद्धान्त)
- प्रवर्तक – चैतन्य महाप्रभु (12वीं सदी में)
- जन्म – नदिया (बंगाल), बचपन का नाम – निमाई
- सम्प्रदाय को नया रूप दिया तथा जन-जन तक फैलाया
- प्रमुख पीठ – गोविन्द देवजी का मंदिर (जयपुर)
- गौड़ीय सम्प्रदाय – कृष्ण ही परब्रह्म
- गौड़ स्वामी (माध्वाचार्य के शिष्य) ने इस सम्प्रदाय का प्रचार किया
- मानसिंह प्रथम वृन्दावन में गोविन्द देवजी के मंदिर का निर्माण करवाया। औरंगजेब के काल में इसी मंदिर का मूर्ति समूह आमेर लाया गया।
- जयपुर में गोविंददेव जी मंदिर का निर्माण सवाई जयसिंह ने करवाया था
- श्री गोविन्द देवजी – जयपुर नगर के अधिपति
- सवाई जयसिंह उनके दीवान
- गौड़ीय सम्प्रदाय में ‘राधा-कृष्ण’ के युगल स्वरूप की पूजा की जाती है।
- गौड़ीय सम्प्रदाय के राजस्थान में अन्य प्रसिद्ध मंदिर
- मदन मोहन जी का मंदिर – करौली
- गोपीनाथ मंदिर – जयपुर
- गोविंद देव जी – जयपुर
शैव धर्म एवं उसके सम्प्रदाय
- ये भगवान शिव के उपासक जो शिव के अवतारों को पूजा करते हैं
- लिंग की पूजा, जीवन पर्यंत बाल ब्रह्मचारी रहते हैं
- नयनार – दक्षिण भारत में शैव धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाले
- शैव मत के चार सम्प्रदाय –
- कापालिक
- पाशुपत
- लिंगायत (वीरशैव)
- काश्मीरक
- कापालिक सम्प्रदाय
- भैरव को शिव का अवतार मान कर उपासना करते है
- साधु तांत्रिक व श्मशान वासी होते हैं और अपने शरीर पर भस्म लपेटते हैं तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते हैं
- इनके छ: चिह्न माला, भूषण, कुण्डल, रत्न, भस्म एवं उपवीत मुख्य हैं।
- पाशुपत सम्प्रदाय
- प्रवर्तक – लकुलीश
- लकुलीश को शिव का 24वाँ अवतार मानते हैं
- मेवाड़ के हरित ऋषि लकुलीश सम्प्रदाय के थे
- बप्पा रावल द्वारा निर्मित मेवाड़ का एकलिंगजी का शिव मंदिर पाशुपत सम्प्रदाय का प्रमुख मंदिर है
- राजस्थान में प्राचीनतम प्रमाण – शीतलेश्वर मंदिर
- प्रमुख केंद्र –
- बड़ौली चित्तौड़गढ़
- एकलिंग जी उदयपुर
- शीतलेश्वर मंदिर झालरापाटन
- वीरशैव लिंगायत (कर्नाटक)
- इस सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक बासवन्ना माने जाते हैं।
- काश्मीरक – कश्मीर
नाथ सम्प्रदाय
- शैव सम्प्रदाय का ही एक अन्य रूप नाथ सम्प्रदाय
- प्रवर्त्तक – नाथ मुनि
- प्रमुख संत – मत्स्येन्द्र नाथ, गोपीचंद, भर्तृहरि, गोरखनाथ
- हठ योग प्रणाली के जन्मदाता गोरखनाथ जी
- राजस्थान में नाथ पंथ की शाखाएँ :-
- बैराग पंथ-
- मुख्य केन्द्र – राताडूंगा (पुष्कर)
- प्रथम प्रचारक – भर्तृहरि
- माननाथी पंथ-
- प्रधान पीठ – महामंदिर (जोधपुर)
- महामंदिर जोधपुर का निर्माण 1805 ई. मानसिंह राठौड़ द्वारा, गुरु आयस देवनाथ के लिए (84 खंम्भे)
- रावल जोगी – योगी जो कान नहीं छिदवाते, कुंडल धारण नहीं करते
- औघड़ जोगी – कटे हुए कान, जटा
- बैराग पंथ-
- विशेष- कानपा पंथ- जालंधर नाथ के शिष्य कानपा नाथ ने इस सम्प्रदाय की स्थापना की। (कालबेलियां जाति)
