राजस्थानी वेशभूषा व आभूषण राजस्थान की पारंपरिक जीवनशैली, सामाजिक पहचान और सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण अंग हैं। राजस्थानी कला व संस्कृति के अंतर्गत यहाँ की वेशभूषा और आभूषण न केवल सौंदर्यबोध को दर्शाते हैं, बल्कि क्षेत्रीय परम्पराओं, जलवायु तथा सामाजिक मान्यताओं का भी प्रतीक हैं। विभिन्न समुदायों द्वारा पहने जाने वाले पारंपरिक परिधान और आभूषण राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को अभिव्यक्त करते हैं।
राजस्थानी वेशभूषा
- किसी भी क्षेत्र की वेशभूषा वहां की जलवायु, उपलब्ध संसाधनों व संस्कृति से प्रभावित होती है। राजस्थानी वेशभूषा की सबसे मुख्य विशेषता है इसका ‘रंग-बिरंगापन’
- इसलिए कहा गया है- “मारू थारे देश में उपजै तीन रतन, इक ढोला दूजी मरवण तीजो कसूमल रंग”
पुरुषों के वस्त्र
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आभूषण 157908_be1956-d7> |
व्याख्या 157908_c6694b-af> |
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पगड़ी 157908_4fe3a0-c5> |
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अंगरखी 157908_a282b6-7c> |
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चुगा/चोगा 157908_2e2d3a-9e> |
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अचकन 157908_9b3342-1b> |
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धोती 157908_c7c9c7-c3> |
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पछेवड़े 157908_0dc218-4b> |
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अंगोछा 157908_448981-91> |
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जामा 157908_f22c42-7f> |
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डौछी 157908_332575-fa> |
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आतमसुख 157908_df0c4e-d6> |
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घूघी 157908_4a8bf0-a5> |
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बिरजस/ब्रीचेस 157908_6ef519-74> |
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कमरबंद/पटका 157908_1e3606-c4> |
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पायजामा/सूथन 157908_7b17e8-01> |
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स्त्रियों के वस्त्र
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आभूषण 157908_153c85-e0> |
व्याख्या 157908_694733-69> |
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कमर से ऊपर के हिस्से के वस्त्र 157908_1e710a-63> |
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कमर से नीचे पहने जाने वाले वस्त्र 157908_7e0335-a7> |
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ऊपर से ओढ़ने वाला वस्त्र 157908_a3ca0b-0b> |
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आदिवासियों के वस्त्र
- अंगोछा – भील पुरुषों का सिर पर बाँधने का वस्त्र
- जामसाई – आदिवासियों की विवाह की फूल-पत्तियों वाली साड़ी
- नान्दणा / नांदड़ा – आदिवासी स्त्रियों का नीले रंग की छींट का प्राचीनतम वस्त्र
- फड़का – कथौड़ी महिलाओं की मराठी शैली की साड़ी
- पोतिया / पोत्या – आदिवासियों में पगड़ी के स्थान पर बाँधा जाने वाला वस्त्र / साफा
- ढेपाड़ा व खोयतु – भील पुरुषों की तंग धोती (ढेपाड़ा), लंगोटी (खोयतु)
- सिन्दूरी – भीलों की शादी की लाल साड़ी
- पिरिया – भील दुल्हन का पीला लहंगा
- कछाबू – भील महिलाओं का घुटने तक का घाघरा
- लूगड़ा (अंगोछा साड़ी) – सफेद जमीन पर लाल बूंटे
- रेजा – सहरिया विवाहित महिलाओं का वस्त्र
- रेनसाई – लहंगे की छींट (काली जमीन पर लाल-भूरे बूंटे)
- खूसनी– कंजर महिलाओं का तंग पायजामा
राजस्थानी आभूषण
आभूषण का शाब्दिक अर्थ – गहना, अलंकार। शरीर को सुंदर एवं आकर्षक बनाने के लिए इन आभूषणों का प्रयोग किया जाता
इतिहास
- राजस्थान में प्राचीन काल से ही मानव सौंदर्य प्रेमी रहा हैं
- कालीबंगा और आहड़ सभ्यता के युग की स्त्रियाँ, मृण्मय तथा चमकीले पत्थरों की मणियों से बने आभूषण पहनती थी
- शुंग काल में स्त्रियाँ मिट्टी के आभूषण प्रयोग में लेती थी। उस समय हाथीदाँत के बने गहनों का भी उपयोग किया जाता था
- धीरे धीरे समयानुसार आभूषणों में परिवर्तन आया एवं वर्तमान में सोना, चाँदी, ताँबा आदि धातुओं से निर्मित आभूषणों का चलन हैं
स्त्रियों के आभूषण
सिर के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| चूडामण | शीशफूल नामक आभूषण |
| टीका, टिकड़ा | स्त्रियों के सिर पर पहना जाने वाला आभूषण |
| टीडीभळकौ | स्त्रियों के भाल (ललाट) का एक विशेष आभूषण |
| फूलगूधर | शीश (सिर) पर गूँथा जाने वाला एक विशेष रजत (चाँदी) का आभूषण |
| गोफण | स्त्रियों के बालों की वेणी (चोटी) में गूँथा जाने वाला आभूषण |
| बोर, बोरला | गोल आकार का आभूषण जो सिर पर पहना जाता है। (इसके चाँद की आकृति वाले हिस्से को मोड़ीया कहते हैं) |
| रखड़ी | सुहाग का प्रतीक, बोरला के समान सिर का आभूषण। इसे सूरज और शक्ति का पर्याय माना जाता है। (गेड़ी, सरी/नली इससे संबंधित हैं)। |
| मावटी | स्त्रियों के सिर की माँग में सजाया जाने वाला आभूषण। |
| सोहली, सिवतिलक | ललाट (माथे) पर सुशोभित होने वाला आभूषण। |
| शीशफूल | सिर पर पीछे की तरफ सोने की बारीक सांकल जैसा पहना जाने वाला आभूषण। |
| मेमंद | महिलाओं द्वारा सिर पर धारण किया जाने वाला प्रसिद्ध आभूषण। |
| सैलड़ौ / सेलड़ौ | स्त्रियों की वेणी (चोटी) में गूँथा जाने वाला आभूषण। |
| टीका / तिलक | रखड़ी या बोरला के ठीक आगे पहना जाने वाला फूल की आकृति का आभूषण। |
| बिन्दी / टीकी | सुहागिन स्त्रियों द्वारा ललाट पर लगाया जाने वाला पारंपरिक चिह्न। |
| सिर के अन्य आभूषण | काचर, रखड़ी, सरकयारौ, सांकली, तावित, सिणगारपट्टी, सूवालळकौ, माँगटीका, माँगफूल, मैण, मोडियौ, मोरमींडली, गेडी, तिलकमणी, खेचा देवाड आदि |
- वेलि कृष्ण रुक्मिणी री में पृथ्वीराज राठौड़ ने रुक्मिणी के श्रृंगार वर्णन में मांग पर लटकते तिलक का उल्लेख किया।
- ललाटिका – पाणिनि के सूत्रों में उल्लेख
- अजमेर म्यूजियम में नगरी से प्राप्त मृण्मय यक्षिणियो की मूर्तियों में बंधे बोल [बोर], शीर्षफूल एवं पतरी आभूषण तथा साथ में टोटिया [कानों का आभूषण]
- हर्षचरित में राजाओ के बालों को बाँधने के लिए सोने के पत्रों का प्रयोग जिन्हें बालापाश कहा जाता था।
- आँख के आभूषण – बादली
कान के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| एरंगपत्तो | स्त्रियों के कान का आभूषण, जिसे ‘झूमरवाली टोटिया’ भी कहा जाता है। |
| ओगनियाँ | कानों के ऊपरी हिस्से पर पहना जाने वाला आभूषण। इसकी आकृति पान या पीपल के पत्ते के समान होती है। |
| खींटली | स्त्रियों के कान में पहना जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण। |
| झुमकी | सोने या चाँदी का बना वह आभूषण जिसके नीचे छोटी-छोटी घुँघरियाँ लगी होती हैं। |
| कर्णफूल | कान के निचले भाग में पहना जाने वाला पुष्पाकार (फूल जैसा) आभूषण, जिसमें अक्सर नगीने जड़े होते हैं। |
| लौंग | मसाले वाले लौंग के आकार का सोने या चाँदी के तार से बना आभूषण, जिसके ऊपर घूँडीदार नगीना लगा होता है। |
| मोरूवर | कान पर लटकाया जाने वाला मोर की आकृति जैसा सुंदर आभूषण। |
| टोटी | गोल चकरी के समान आभूषण, जिसके पीछे कान में पहनने के लिए एक डण्डी लगी होती है। |
| झुंटणौ | स्त्रियों के कान का एक विशिष्ट आभूषण। |
| छैलकड़ी | कान में पहनी जाने वाली एक विशेष प्रकार की कड़ी या आभूषण। |
| कान के अन्य आभूषण | झेलौ, कुड़कलि, कोकरूँ, गुड़दौ, छैलकड़ी, झाळ, झुंटणौ, झूमणं/झूमर/झुमका, ठोरियौ, डरगलियौ/ डुगरली, तड़कली, पत्तीसुरलिया, पासौ, पीपळपान, बाळा, बूझली, माकड़ी, लटकन, वेड़लौ, संदोल, सुरगवाली, सुरळियौ, जमेला, भचूरिया, मुरकी, मुरकीय, मादीकड़कम (पुरुषों के कान का) |
नाक के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| नथ | सोने के तार का बना मोटा छल्ला जिसे नाक में पहना जाता है। |
| भँवरा | यह नथ के समान ही एक आभूषण है जिसे अधिकांशतः विश्नोई जाति की महिलाओं द्वारा पहना जाता है। |
| बेसरी | नाक का एक विशिष्ट आभूषण, जिसमें नाचता हुआ मोर का चिह्न अंकित होता है। (यह किशनगढ़ शैली की ‘बणी-ठणी’ पेंटिंग के कारण भी प्रसिद्ध है)। |
| अन्य नाक के आभूषण | भँवरकड़ी, नथ, बिजली, लूंग, नथ, बारी, काँटा, भोगली, बुलाक, चोप, कोकौ, खीवण, नकफूल, नकेसर, वेण वेसरि, लौंग आदि। |
दाँत के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| रखन | दाँतों के ऊपर सोने के पत्तर की खोल (Plating) बनाकर चढ़ाई जाती है। |
| चूँप | दाँतों के बीच में सोने की छोटी कील जड़वाना ‘चूँप’ कहलाता है। |
| मेख | स्त्री और पुरुष दोनों के दाँतों में जड़ी जाने वाली सोने की चूँप को ‘मेख’ भी कहा जाता है। |
| अन्य | धाँस, ब्वौ |
गले के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| बाड़लो | यह गले में पहना जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण है। |
| बजट्टी | कपड़े की छोटी पट्टी पर सोने के खोखले दानों को पिरोकर तैयार किया गया आभूषण। |
| चंद्रहार | शहरी महिलाओं में अत्यधिक लोकप्रिय हार, जिसमें अक्सर 5 से 7 लड़ियाँ होती हैं। |
| झालरौ | सोने या चाँदी की लड़ियों से बना हार, जिसमें छोटी-छोटी घूँघरियाँ लगी होती हैं। |
| हँसली | धातु के मोटे तार से बना गोलाकार आभूषण। यह विशेषकर छोटे बालकों को उनकी ‘हँसली’ खिसकने से बचाने के लिए पहनाया जाता है। |
| हार | गोलाकार और रत्नों से जड़ित सोने का भारी आभूषण। |
| कंठी / चैन | सोने की बारीक साँकल (chain) जिसमें कोई लॉकेट लगा होता है। |
| मंगलसूत्र | सुहाग के प्रतीक के रूप में काले मोतियों की माला से बना हारनुमा आभूषण। |
| मादलिया | छोटे ढोलक के आकार का आभूषण (ताबीज जैसा), जिसे अक्सर काले डोरे में पिरोकर पहना जाता है। |
| तिमणिया / थमण्यो | महिलाओं द्वारा गले में पहना जाने वाला सोने का एक प्रमुख पारंपरिक आभूषण। |
| बंगड़ी | एक प्रकार का गले का आभूषण |
| पचमाणियौ | मेवात क्षेत्र में गले का आभूषण |
| नक्कस | मेवात क्षेत्र में कंठ का आभूषण |
| थाळौ | देवमूर्ति युक्त गले का आभूषण – |
| तांतणियौ | गले का एक आभूषण |
| हार | चन्द्रहार, कंठहार, हँसहार, सोहनहार, नल हार, मोतीहार, रानीहार |
| माला | हमेरमाल, चन्द्रमाला, मोहनमाला, महर माला, मटरमाला |
| अन्य आभूषण | डोरो, झालरौ, कंठसरी, निगोदर, निगोदरी, तेड़ियौ, आड़, रूचक, बाड़ली, बाड़लौ, हांस, पाट बंगड़ी, गळपटियौ, गळबंध, तखति, तगतगई, थमण्यो, झालरौ, ठुस्सी, कंठी, नक्कस, निंबोळी, पंचलड़ी, पंचमाणियौ, बजट्टी, पटियौ, तुलसी, हाँसली, टेवटौ, ताबीज, तेवटियौ, तांतणियौ, मंगलसूत्र, हौदळ, बटण, खींवली, खूंगाळी, नांगली, छेड़ियौ, हमेल, रामनवमी, चम्पाकली, जुगावली, चोकी, आचोरी, हालरो, हमेल, हांकर आदि। |
बाजू (भुजा) के प्रमुख आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| बिजायठ | बाँह पर धारण किया जाने वाला एक पारंपरिक गहना। |
| डोडी | भुजा पर पहना जाने वाला एक विशेष प्रकार का कड़ा। |
| खाँच | स्त्रियों द्वारा बाँह पर पहना जाने वाला आभूषण। |
| बाजूबंध / उतरणो | सोने की बेल्ट जैसी आकृति वाला आभूषण जो ऊपरी बाँह पर बाँधा जाता है। |
| टडडा | ताँबे की छड़ पर सोने की परत चढ़ा आभूषण जिसमें 3 वल्ल (घेरे) होते हैं। |
| अणत | ताँबे की छड़ पर सोने की परत वाला आभूषण जिसमें केवल 1 वल्ल होता है। |
| अन्य आभूषण | बाजूसोसण, बाहुसंगार, डोडी, डंटकड़ौ, टडौ, कातरियौ, अड़कणी, बहरखां, तकमा, गजरा |
हाथ / कलाई के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| आँवला | सोने या चाँदी से निर्मित, जिसे पैरों में भी पहना जाता है। |
| चूड़ | सोने या चाँदी का बना एक मोटा कड़ा। |
| गजरा | मोतियों से पिरोया जाने वाला सुंदर आभूषण। |
| नोगरी | मोतियों की कई लड़ियों के समूह से बना आभूषण। |
| तांती | देवी-देवताओं के नाम पर बाँधा जाने वाला धार्मिक धागा या आभूषण। |
| लाखीणी | दुल्हन के लिए विशेष रूप से बनाई गई लाख की चूड़ी। |
| बंगड़ीदार | ऐसी चूड़ी जिस पर सोने या चाँदी के पत्तर (Layer) का काम हो। |
| छैलकड़ौ | एक पारंपरिक राजस्थानी कड़ा। |
| गोखरु | छोटे-छोटे तिकोने दानों वाला चूड़ा। (चाँदी के गोखरू को ‘उतरनी’ भी कहते हैं)। |
| अन्य | पछेली, धागा, हारपान, आरत, चूड़ला, नवरतन, चूड़ियाँ, पाटला, कंगन, पूंचिया, दुड़ी, नवग्रही, पुणची (पौंचा), माठी, मूठियौ, कँकण, चूड़ा, बँगड़ी, चूड़ी, कड़ा, हथफूल, खंजरी, आरसि, चूड़ियाँ, छैलकड़ौ, दुगड़ी, सूतड़ौ, सोवनपान, हाथुली, मूंदड़ी, दामणा, हथपान, बल्लया, छाप आदि। |
अंगुली के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| बींटी / मूंदड़ी | अँगुलियों में पहना जाने वाला गोलाकार छल्ला या अँगूठी। |
| झोटा | तीन आँटों (घेरों) वाली एक विशेष मोटी अँगूठी। |
| पट्टा बींटी | सगाई या पाणिग्रहण से पहले वर पक्ष की ओर से वधू को दी जाने वाली चाँदी की मुद्रिका। |
| पवित्री | ताँबा और चाँदी के मिश्रण से बनी अंगूठी, जिसे धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है। |
| अंगूथळौ | विशेष रूप से हाथ के अंगूठे में पहना जाने वाला आभूषण। |
| अरसी | हाथ के अंगूठे में पहने जाने वाली एक बड़ी अँगूठी, जिसमें अक्सर शीशा (Mirror) लगा होता है। |
| मुरसी | अँगुलियों में धारण किया जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण। |
| अन्य | दामणा [बीच की दो अंगुलियों में सांकल], हथपान [अनामिका व तर्जनी अंगुलियों में] / हथफूल [पांचो अँगुलियों में]/खडदावनो |
कमर के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| तगड़ी | सोने अथवा चाँदी से बना कमर में पहना जाने वाला आभूषण। |
| चौथ | चाँदी से बना आभूषण जो जंजीर के समान होता है, इसे पुरुष एवं महिलाएँ दोनों धारण करते हैं। |
| अन्य | सटकौ, मेखला, मेरवाला, सिनामा, हालम, मुखल्ला धाकड़ी, तगड़ी, वसन, करधनी, कन्दोरा, सटका, कणकती, जंजीर, चौथ आदि। |
पैर के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| झाँझर | पायलनुमा आभूषण, जो अपनी रुनझुन की मधुर आवाज़ के लिए प्रसिद्ध है |
| मकियौ | स्त्रियों द्वारा पैरों में धारण किया जाने वाला एक पारंपरिक गहना |
| नेवरी | पायल की तरह का आभूषण, जिसे अक्सर आँवलों के साथ पहना जाता है |
| पायल / पायजेब | इसे रमझोल या शकुन्तला के नाम से भी जाना जाता है |
| टणका / टणको | चाँदी का गोलाकार आभूषण, जिससे चलते समय ‘टणक-टणक’ की आवाज़ आती है |
| लछौ | चाँदी के बारीक तारों से बना पाँव का एक विशेष आभूषण |
| रोळ | पैरों में पहना जाने वाला घुँघरूदार आभूषण |
| अन्य | नेवर, पीजंणी, पायल, पादसकळिका, तेघड़, तांति, झाँझर, सिंजनी, कंकणी, पायल, शंकुतला, पायजेब, (रमझोल), नेवरी, नूपुर, पैंनकूमजनिया, टणका, घुँघरू, आँवला, कड़ा, लंगर, झांझर, तोड़ा-छोड़ा, अणोटपोल, कड़लौ, झंकारतन, टणकौ, टोडरौ, तोड़ौ, तोड़ासाट, मकियौ, मसूरियौ, रोळ, लछौ, हीरानामी, हिरनामैन, तेघड आदि |
पैर की अँगुलियों के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| बिछिया / चूटकी | सुहाग का प्रतीक, जिसे विवाहित स्त्रियाँ पाँव के अंगूठे के पास वाली अँगुली में पहनती हैं |
| फोलरी | चाँदी के बारीक तारों से फूल की आकृति बनाकर पहनी जाने वाली अँगूठी |
| पगपान | पगपान, हथफूल के समान पैर के अंगूठे व अंगुलियों के छल्लों को चैन से जोड़कर पायल की तरह पैर के ऊपर हुक से जोड़कर पाँव में विवाह के अवसर पर पहना जाता हैं |
| नखलियौ | पाँव की अँगुलियों में पहना जाने वाला एक पारंपरिक गहना |
| दोळीकियौ | पैर की अँगुली का एक विशिष्ट आभूषण |
| गोल्या | चाँदी की चौड़ी और सादी अंगुठियाँ जो पैरों में पहनी जाती हैं |
| अन्य | अंगूथळौ, गूठलौ, गौर, लछने, गोळ्या, छल्ला, बीछुड़ी, जोड़ [जोधपुरी जोड़, हवाई जहाज की जोड़] |
पुरुषों के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| चूड़ | गोल कड़े के रूप में हाथों में पहना जाने वाला आभूषण। (हाथ के अन्य: मूरत, ठाला, ताती) |
| कलंगी | साफे पर लगाया जाने वाला आभूषण। |
| बलेवड़ा | पुरुषों के गले में पहना जाने वाला आभूषण। (गले के अन्य: चैन, पैडल, मांदलिया, रामनामी, ताबीज, जन्तर, चैकी) |
| सेहरा | शादी के समय वर द्वारा पहना जाने वाला साफा/पगड़ी। |
| मुरकियाँ | पुरुषों द्वारा कान में पहना जाने वाला गोलाकार आभूषण। (कान के अन्य: लौंग, झाले, बालिया, ओगनिया, छैलकड़ी) |
| चौकी | गले में पहना जाने वाला आभूषण, जिस पर देवताओं का चित्र बना हुआ होता है। |
| रखन या चूंप | सोने या चाँदी से निर्मित यह आभूषण दाँतों पर लगाया जाता है (स्त्री-पुरुष दोनों हेतु)। |
| मादीकड़कम | पुरुषों के कान का आभूषण। |
| माठी | पुरुषों की कलाई पर पहनने के कड़े। (कलाई के अन्य: कड़ा, कनकना) |
| टोडर | पुरुष के पाँवों का स्वर्णभूषण। |
बच्चों के आभूषण
| आभूषण | व्याख्या |
| नजरिया | लाल कपड़े में सोने का खेरा, मूंग का आखा तथा रतनचण बाँधकर गले में पहनाया जाने वाला आभूषण, ताकि रत्यावडी (गाँठगूमडे) न हो। |
| झाँझरिया या पैंजणी | बच्चों के पैरों में पहनाई जाने वाली पतली साँकली, जिनमें घूँघरियाँ लगी होती हैं। |
| कड़ो या कंडूल्या | बच्चों के हाथ व पैर दोनों में पहनाए जाने वाले कड़े। |
| कुड़क | छोटे बच्चों के कान छेद कर पहने जाने वाले सोने-चाँदी या जस्ते के तार; जिनसे बाद में लूँग या बाली पहनी जाती है। |
| कंठ/हंसुली | गले में पहनाया जाने वाला एक सुरक्षात्मक आभूषण |
| मुरकी | ठोस सोने की बनी कुडक (कान का आभूषण)। |
लाख की चूड़ियों के प्रकार
| आभूषण | व्याख्या |
| पड़ला चूड़ा | सादा लाल मुटिया चूड़ा (हींगल का चंड़ा/सुहाग का चूड़ा)। विवाह पूर्व बरी-पड़ला के साथ ससुराल से आता है। |
| लहरिया चूड़ा | श्रावण माह में नवविवाहिताओं द्वारा पहना जाता है। इसमें सफेद, लाल, नीले और पीले रंग की तिरछी धारियाँ होती हैं। |
| चौबन्दा चूड़ा | कोटा-बूंदी क्षेत्र में प्रचलित चार बन्द का चूड़ा सेट। |
| पंचबन्दा चूड़ा | भीलवाड़ा, अजमेर एवं जोधपुर में प्रचलित पाँच बन्द का सेट। |
| तीन लड़ा | गुर्जर समुदाय की स्त्रियों द्वारा विशेष रूप से पहना जाने वाला चूड़ा। |
| पाट का चूड़ा | उदयपुर क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं द्वारा विवाह में पहना जाने वाला चाँदी के पाट का चूड़ा (बरपोई)। |
| वन्य चूड़ा | उदयपुर क्षेत्र की कुँवारी कन्याओं द्वारा पहना जाने वाला चूड़ा। |
| कटीर का चूड़ा | उदयपुर क्षेत्र में प्रचलित एक विशेष प्रकार का चूड़ा। |
| धूपछांव कड़ा सेट | लाख की दो मोटी चूड़ियों का सेट, जिसे क्रांति व रेनबो भी कहते हैं। |
| अन्य प्रकार | लाल पट्टी चूड़ा, जलेबी का चूड़ा, और चीर का चूड़ा। |
