सामाजिक रीति-रिवाज और परम्परा

सामाजिक रीति-रिवाज और परम्परा किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान और जीवन मूल्यों का दर्पण होते हैं। राजस्थानी कला व संस्कृति के अंतर्गत ये परम्पराएँ जन्म, विवाह तथा मृत्यु जैसे जीवन के विभिन्न संस्कारों के माध्यम से समाज की समृद्ध परंपरागत विरासत को प्रदर्शित करती हैं। राजस्थान में प्रचलित सामाजिक रीति-रिवाज यहाँ के लोकजीवन, मान्यताओं और सांस्कृतिक निरंतरता को सशक्त बनाते हैं।

राजस्थान के सामाजिक रीति-रिवाजों को मुख्यतः चार भागों में बाँटा गया है → जन्म, विवाह, मृत्यु, अन्य

16 संस्कार

जन्म से पहले

  • गर्भाधान – स्वस्थ और संस्कारी संतान के लिए गर्भाधान का संकल्प
  • पुंसवन – गर्भस्थ शिशु के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए (तीसरे-चौथे महीने में)
  • सीमन्तोन्नयन – गर्भवती माँ को मानसिक शांति और खुश रखने के लिए (मारवाड़ में ‘अगरणी ‘ कहते हैं)

बचपन के संस्कार

  • जातकर्म – जन्म के समय पिता द्वारा शिशु को शहद चटाना और आशीर्वाद देना
  • नामकरण – शिशु का नाम रखना; जन्म के 11वें या 12वें दिन
  • निष्क्रमण – बच्चे का पहली बार घर से बाहर निकलना (सूर्य और चंद्रमा के दर्शन)
  • अन्नप्राशन – 6 महीने बाद बच्चे को पहली बार अन्न (ठोस भोजन) खिलाना
  • चूड़ाकर्म (मुंडन) – सिर के बाल कटवाना ताकि शुद्धि और तेज बढ़े
  • कर्णवेध – कान छेदना (स्वास्थ्य और शिक्षा के दृष्टिकोण से)

शिक्षा और विद्यार्थी जीवन

  • विद्यारंभ – बच्चे को अक्षर ज्ञान और प्रारंभिक शिक्षा की शुरुआत कराना
  • उपनयन (जनेऊ) – गुरु के पास शिक्षा के लिए जाना और जनेऊ धारण करना
  • वेदारंभ – वेदों और शास्त्रों की गंभीर शिक्षा शुरू करना
  • केशांत  – किशोरावस्था के अंत में पहली बार दाढ़ी-मूंछ बनाना
  • समावर्तन – शिक्षा पूरी कर गुरुकुल से विदाई (आज का दीक्षांत समारोह)

गृहस्थ और अंतिम चरण

  • विवाह – गृहस्थ जीवन में प्रवेश करना और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना
  • अंत्येष्टि – मृत्यु के पश्चात अंतिम विदाई और अंतिम संस्कार

जन्म संबंधी रीति-रिवाज

रिवाजव्याख्या
पंचमासीगर्भावस्था के 5वें महीने में की जाने वाली रस्म (शिशु की कुशलता के लिए)
दसोटणबच्चे के जन्म के 10वें दिन किया जाने वाला उत्सव और नामकरण
सुहावड़प्रसूता (माँ) के लिए बनाया जाने वाला पौष्टिक भोजन या उससे जुड़ी रस्म
अगरणीसीमन्तोन्नयन संस्कार का मारवाड़ में नाम 
जामणाबच्चे के जन्म पर ननिहाल पक्ष की ओर से भेजे जाने वाले उपहार और कपड़े
ढूँढहोली के आसपास छोटे बच्चों के लिए ननिहाल से आने वाले उपहार और उत्सव
न्हावण/ न्हाणबच्चे और माँ का प्रथम औपचारिक स्नान (शुद्धिकरण की रस्म)
सतवाड़ौप्रसव के सातवें दिन होने वाली पारंपरिक रस्म
पनघट पूजनकुआँ पूजन (जलवा पूजन); जल के देवता की पूजा और माँ का बाहर निकलना
गोद लेनाकिसी बालक को कानूनी या धार्मिक रूप से अपना उत्तराधिकारी बनाना
आख्याबच्चे के जन्म के आठ दिन बाद बहन-बेटियों द्वारा घर के द्वार पर सांतिया (स्वस्तिक) बनाना 
कोथलाबेटी का पहलां प्रसव होने पर उसके पीहर वालों द्वारा जवाईं और उसके संबंधियों को भेंट देना
विशेषअकीकौ मुस्लिम बच्चों का मुण्डन एवं नामकरण संस्कारबपतिस्मा संस्कार ईसाई धर्म में शिशुओं के नामकरण की एक रस्म

विवाह संबंधी रीति-रिवाज

रिवाजव्याख्या
सगाईविवाह का प्रारंभिक रिश्ता तय होना 
टीकावधू पक्ष द्वारा वर के माथे पर तिलक लगाकर रिश्ते की पुष्टि करना
चिकणी कौथलीसगाई के बाद वधू के लिए वर पक्ष द्वारा भेजे गए उपहार और मिठाई, रावणी गोद भरना भी कहते हैं 
पीली चिट्ठीविवाह की शुभ तिथि तय होने पर वधू पक्ष द्वारा भेजा गया निमंत्रण पत्र
इकताईदर्जी वर-वधू के कपड़े बनाने के लिए पहले मुहूर्त से नाप लेता है 
गणपति पूजन /कुमकुम पत्रिकाविघ्नहर्ता गणेश की पूजा और प्रथम निमंत्रण पत्र उन्हें अर्पित करना
रीतसगाई के समय वर पक्ष द्वारा वधू को दिए जाने वाले जेवर और कपड़े
मुगधणारसोई के लिए सूखी लकड़ी (ईंधन) का पूजन और उसे लाना
बान बिठानादूल्हा-दुल्हन को उबटन लगाना और घर से बाहर न निकलने की पाबंदी
कांकनडोर बाँधनाविवाह से दो दिन पहले दूल्हा-दुल्हन को मौली (धागे) में लोहा, लौंग, कौड़ी बांधकर सात गांठें लगाई जाती हैं; यह बुरी नजर से बचाव का प्रतीक है और विवाह के बाद हटा दिया जाता है
बना-बनीविवाह के लोक गीत जो दूल्हा (बना) और दुल्हन (बनी) के लिए गाए जाते हैं
बत्तीसी नूतनामाँ द्वारा अपने पीहर (भाई) को भात (मायरा) भरने का न्योता देना
मायरा (भात)मामा द्वारा अपनी बहन के बच्चों की शादी में कपड़े, जेवर और उपहार लाना
निकासी या बिन्दोरीदूल्हे का घोड़ी पर बैठकर गाँव/शहर में भ्रमण करना (बिंदोली नृत्य झालावाड़ )
सांकड़ी की रातविवाह से ठीक पहले वाली रात का उत्सव और जागृति
जानोंटणबारात का सामूहिक भोज या बारात की व्यवस्था
बारातवर पक्ष का वधू के घर प्रस्थान करना
कंवारी जान का भातबारात के फेरों से पहले वधू पक्ष द्वारा दिया जाने वाला भोजन
कंवर कलैवादूल्हे को वधू पक्ष की महिलाओं द्वारा कराया जाने वाला नाश्ता
परणी जान का जीमणफेरों के बाद बारात को दिया जाने वाला मुख्य शाही भोज
टूँटियापुरुषों के बारात जाने के बाद घर की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला स्वांग/नाटक
सामेलावधू पक्ष द्वारा बारात का स्वागत और मिलनी करना
बरी पड़लावर पक्ष द्वारा वधू के लिए लाए गए गहने और शादी का जोड़ा
तोरण मारनावधू के घर के द्वार पर लटके तोरण को दूल्हे द्वारा स्पर्श करना (विजय प्रतीक)
सुहाग थालवधू को सुहाग सामग्री अर्पित करना
पावणादामाद का ससुराल में विशेष आदर-सत्कार
सीठने महिलाओं द्वारा हँसी-ठिठोली में गाए गाली गीत
कामणदूल्हे को जादू-टोने या बुरी नजर से बचाने के लिए गाए जाने वाले गीत
बिनोटावर और वधू के लिए विशेष रूप से बनाई गई शादी की जूतियाँ
कन्यावलवधू पक्ष के करीबी रिश्तेदारों द्वारा फेरों तक रखा जाने वाला उपवास
वधू के तेल चढ़ानावधू को तेल और उबटन चढ़ाकर शुद्धिकरण करना
फेरेअग्नि के सात फेरे लेकर वैवाहिक बंधन में बँधना
हथलेवाचंवरी (फेरे का मंडप) में बैठने के बाद वधू काहाथ वर के हाथ में देना, इसे पाणिग्रहण भी कहते हैं
कन्यादानविवाह के द्वारा कन्या (वधू) की जिम्मेदारी उसके माता-पिता द्वारा वर को सौंपने की रस्म
सीखविदाई के समय मेहमानों और बारातियों को दिया जाने वाला उपहार
ओझणवधू को दहेज या उपहार सामग्री देना
पहरावणी/रंगबरीबारात विदाई के समय वधू पक्ष के द्वारा बारातियों को दी जाने वाली भेंट या उपहार
मुकलावागौना; शादी के कुछ समय बाद वधू का स्थायी रूप से ससुराल जाना
कोयलड़ीबेटी की विदाई के समय गाए विरह और विदाई गीत
आंणौशादी के बाद पहली बार वधू का वापस पीहर आना
पैसरोंवधू का ससुराल में पहली बार गृह प्रवेश
जुआ-जुईथाली में दूल्हा-दुल्हन का अंगूठी ढूँढने का खेल 
बढ़ारविवाह के अगले दिन, सार्वजनिक प्रीति भोज
बरोटीविवाह के बाद वधू के स्वागत में किया गया भोज
हथबौलणोनई बहू का प्रथम परिचय 
हीरावणीविवाह के समय नववधू को दिया गया कलेवा
जांनोटणवर पक्ष की ओर से दिया जाने वाला भोज 
रियाणअफीम या चाय के साथ मेहमानों का पारंपरिक मेल-मिलाप
सोटा-सोटीदूल्हा-दुल्हन द्वारा छड़ी से एक-दूसरे को मारने की रस्म
छातशादी के बाद कुल देवी-देवता की पूजा की रस्म
बाला चुनड़ीननिहाल पक्ष से दी जाने वाली विशेष ओढ़नी
कंवर जोड़दूल्हे और उसके साथ आए कुँवर की पोशाक
बयाणौ/बिहांणाशुभ कार्यों के अंत में दिया जाने वाला दान 
जात देनाकुल देवता के मंदिर जाकर मत्था टेकना

मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज

रिवाजव्याख्या
बैकुण्ठीमृत शरीर को बांस/लकड़ी की शैय्या पर श्मशान ले जाना
बखेर/उछालश्मशान ले जाते समय रास्ते में पैसे बिखेरना
पिंडदानश्मशान ले जाते समय पहले चौराहे पर आटे का पिंड देना
दण्डोतमृत व्यक्ति की बैकुण्ठी के आगे उसके रिश्तेदारों द्वारा किया गया प्रणाम 
आधेटाघर से श्मशान तक चौराहे पर बैकुण्ठी की दिशा बदलना
लांपा/मुखाग्निअंत्येष्टि में सबसे बड़े बेटे/निकट भाई द्वारा अग्नि देना
अंत्येष्टिश्मशान में चिता पर शव रखकर मुखाग्नि देना
सांतरवाड़ा / मुगटीअंत्येष्टि तक घर/पड़ोस में चूल्हा न जलाना, 12 दिन तक लोगो का सान्त्वनार्थ आना जाना 
दोषणियाँ12 वे दिन पानी से भरे जाने वाले घटक 
पानीवाड़ा व्यक्ति की मृत्यु के समय सब लोग एकत्र होकर स्नान करके सांत्वना देते हैं
भदर/भद्दरशोक में बाल, दाढ़ी, मूंछ कटवाना
कपाल क्रियाउत्तराधिकारी द्वारा दाह संस्कार के समय शवके कपाल को फोड़कर उसमें घी डालने की प्रक्रिया
फूल एकत्र करनामृत्यु के तीसरे दिन अस्थियां चुनकर कलश में रखना (हरिद्वार में विसर्जन)
तीये की बैठकतीसरे दिन शाम को बैठक; पुष्प अर्पण, मौन प्रार्थना
मौसरमृत्यु भोज; ‘औसर/नुक्ता‘ भी कहते हैं; जीते जी ‘जोसर
लैणनुक्ता पर सगे-संबंधियों को दिया जाने वाला उपहार (काँगिया – आदिवासियों का मृत्युभोज )
मूकांणमृतक संबंधियों से संवेदना प्रकट करना
डांगड़ी राततीर्थ से लौटकर रात्रि जागरण
पगड़ीमौसर पर बड़े पुत्र को उत्तराधिकारी रूप में पगड़ी बांधना
नारायण बलिमृतक की आत्मा के भटकाव को रोकने हेतु किया गया संस्कार
महीने का घड़ामृत्यु के एक माह बाद यज्ञ अनुष्ठान
छमाहीमृत्यु के छह माह बाद यज्ञ अनुष्ठान व भोज
बारह माह का घड़ामृत्यु के एक वर्ष बाद यज्ञ अनुष्ठान व भोज
श्राद्धभाद्रपद पूर्णिमा- आश्विन अमावस्या तक 16 दिन
आदि श्राद्धमृत्यु के 11वें दिन किया जाने वाला श्राद्ध

अन्य प्रथाएँ

प्रथा

व्याख्या

सती प्रथा

  • पति की मृत्यु के पश्चात् पत्नी द्वारा अपने पति के शव के साथ चिता रोहण होना
  • अन्य नाम – सहमरण प्रथा/अन्वारोहण / सहगमन प्रथा
  • राजस्थान की प्रथम सती – जोधपुर सेनापति राणुक की पत्नी संपल्ल कंवर (1861ई. घटियाला शिलालेख)
  • राजस्थान में सर्वप्रथम सती प्रथा पर रोक लगाने के प्रयास – सवाई जयसिंह जी II 
  • राजस्थान में सर्वप्रथम गैर-कानूनी घोषित –
    • 1822 ई. में बूंदी रियासत (विष्णु सिंह)
    • 1823 ई. में कोटा रियासत ने इस प्रथा
    • 1825 ई. में बीकानेर रियासत ने 
    • 1830 ई. में अलवर रियासत ने 
    • 1844 ई. में जयपुर रियासत ने
  • सती निवारण अधिनयम,1829
    • लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा (सर्वप्रथम बंगाल में, 1830 ई से पूरे देश में)
    • अधिनियम के तहत् राज्य में सर्वप्रथम अलवर रियासत ने प्रतिबंध लगाया  (बन्नेसिंह)
  • राजस्थान की अंतिम सती:
    • 1987 ई., दिवराला गाँव सीकर निवासी मालसिंह/मोहनसिंह की पत्नी रूप कँवर
  • राजस्थान सरकार ने सती निवारण अध्यादेश, 1987 ई. में पारित किया।
  • महासती /अनुमरण प्रथा
    • पति की किसी निशानी के साथ सती होने वाली महिला
    • राजस्थान की एकमात्र महासती पत्नी – रूठी रानी उमादे भटियाणी

बाल विवाह

  • भारत में बाल-विवाह का प्रथम लिखित प्रमाण हर्षवर्धन के समय से मिलता है
    • अल्पव्यस्क बहन राजश्री का विवाह कन्नौज नरेश ग्रहवर्मन से करवाया
  • विवाह की निश्चित आयु
    • लड़की – 18 वर्ष 
    • लड़के – 21 वर्ष
  • सर्वप्रथम बाल विवाह प्रतिबंधक कानून
    • 1885 में, जोधपुर PM प्रधानमंत्री सर प्रताप सिंह ने (जसवंत सिंह द्वितीय)
  • शारदा एक्ट 1929
    • अजमेर निवासी हरविलास शारदा के प्रयासों से 
    • न्यूनतम आयु – लड़का 18 वर्ष, लड़की 14 वर्ष
  • संशोधन 1978 – बाल विवाह अंकुश निवारण अधिनियम के तहत् न्यूनतम आयु लड़का 21 वर्ष एवं लड़की 18 वर्ष

विधवा पुनर्विवाह

  • सर्वप्रथम प्रयास – सवाई जयसिंह द्वितीय II  द्वारा नियम बनाने के प्रयास 
  • विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856
    • ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के प्रयासों से लॉर्ड डलहौजी ने पारित किया
    • जुलाई, 1856 ई. में लॉर्ड कैनिंग ने लागू किया
  • प्रथा से संबंधित रिवाज
    • नातरा / आणा – पति की मृत्यु के पश्चात् अन्य पुरुष से दूसरा विवाह 
    • गाधराणौ – देवर के साथ पुनर्विवाह कर
    • कागली / नाता – विधवा के पुनर्विवाह के अवसर पर प्रति विवाह एक रुपये कर
      • नाता – बीकानेर में नाता का नाम
      • छेली राशि – जयपुर में नाम 
      • नाता कागली – कोटा में 
      • नाता बराड़ – मेवाड़ में

समाधि प्रथा

  • किसी साधु महापुरुष द्वारा जीवित अवस्था में गड्डा खोदकर या पानी में मृत्यु का वरन करना
  • सर्वप्रथम रोक – 1844 ई. जयपुर (एजेंट लुडलो के प्रयास) सवाई रामसिंह द्वितीय के समय
  • समाधि निवारण अधिनियम, 1861 – जीवित समाधि को आत्महत्या माना गया

कन्या वध प्रथा

  • कन्या के जन्म लेते ही उसे अफीम देकर या गला दबाकर मार दिया जाता था
  • राजस्थान में सर्वप्रथम रोक – अंग्रेज अधिकारी हॉल ने मेरवाड़ा क्षेत्र में मेर जाति की बैठक में लगाई
  • सर्वप्रथम गैरकानूनी
    • 1833 ई. – कोटा नरेश रामसिंह द्वितीय द्वारा (पॉलिटिकल एजेंट विलकिंसन के प्रयास)
  • 1834 ई. – बूँदी रियासत (महाराव बुद्धसिंह)
  • 1837 ई. – बीकानेर महाराज रतनसिंह ने 
  • 1839 ई. – जोधपुर महाराजा मानसिंह ने
  • 1844 ई – उदयपुर, जयपुर द्वारा

त्याग प्रथा

  • एक उपहार जो राजकुमारियों के विवाह पर वंशावली रखरखाव वाले चारण / भाटों को दिया जाता था 
  • सर्वप्रथम रोक1841 ई. में जोधपुर रियासत 
  • 1844 ई. – बीकानेर व जयपुर रियासत रोक 
  • वाल्टर कृत राजपूत हितकारिणी सभा ने इस प्रथा पर नियम बनाये

दहेज प्रथा

  • विवाह के समय / विवाह के उपरान्त वधू पक्ष द्वारा विवाह की आवश्यक शर्त के रूप में वर पक्ष को धन या सम्पत्ति देना
  • दहेज निवारण अधिनियम, 1961
  • भारत सरकार दहेज निवारक कानून, 2006

संथारा / संल्लेखना प्रथा

  • जैन धर्म से संबंधित प्रथा
  • अन्न व जल का त्याग कर अपने प्राण त्यागना

पर्दा प्रथा

  • मुस्लिम आक्रांताओं की बुरी नजर से बचने हेतु मध्यकालीन इतिहास में इस प्रथा का प्रचलन हुआ जो धीरे-धीरे हिन्दू समाज की एक नैतिक प्रथा बन गई
  • इस प्रथा का सर्वाधिक विरोध स्वामी दयानंद सरस्वती ने किया

दास प्रथा

  • युद्ध के समय बंधक बनाए या ऋण ना चुका पाने की वजह से जागीरदारों द्वारा दास बना लेना 
  • प्रथम प्रयास – अकबर द्वारा 
  • गैर कानूनी – 1832 ई. में लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा
  • राजस्थान में सर्वप्रथम प्रतिबंध 1832 ई. कोटा रियासत द्वारा
  • पासवान / खवासन – राजा द्वारा किसी दासी को अंगूठी/आभूषण पहनने की अनुमति देने पर उस दासी को पासवान कहा जाता था

बेगार प्रथा /हाली प्रथा

  • सामन्तों एवं राजाओं द्वारा अपनी रैयत से मुफ्त सेवाएं लेना
  • बूंदी रियासत में महिलाओं से भी बेगार ली जाती थी
  • बंधित श्रम पद्धति अधिनयम, 1976

सागड़ी /बन्धुआ मजदूर प्रथा

  • सेठ, साहूकार द्वारा पैसे उधार देकर किसी व्यक्ति को कम मेहनताने/ब्याज की राशि के बदले में अपने पास घरेलू नौकर बनाकर कार्य करवाना
  • सागड़ी निवारण अधिनयम, 1961

डावरिया प्रथा

  • उच्च राजघरानों में कन्या की विदाई के समय साथ भेजी जाने वाली कुँवारी कन्याएँ
  • महिलाओं का क्रय-विक्रय – सामन्ती समाज में विवाह में दहेज के साथ दास-दासी देने हेतु लड़के-लड़कियों को खरीदा जाता था
  • चौधान – कोटा रियासत में महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर वसूला जाने वाला कर 
  • सर्वप्रथम रोक – 1831 ई. में कोटा रियासत

मौताणा प्रथा

  • आदिवासियों में मौत का हर्जाना वसुलना

नाता प्रथा

  • पत्नी का अपने पति के जीते जी बिना फेरे के किसी अन्य पुरुष के साथ रहने लग जाना 
  • आदिवासियों में प्रचलित

डाकण प्रथा

  • कई जाति-जनजातियों में स्त्रियों को ‘डाकन’ कहकर मार देना 
  • रोक – मेवाड़ भील कोर के कमांडर जे.सी. ब्रुक ने 1853 ई. में, स्वरूप सिंह जी के समय

छेड़ा-फाड़ना प्रथा

  • भील पुरुष द्वारा पंच लोगों के समक्ष नई साड़ी के किनारे में पैसे बाँधकर साड़ी को चौड़ाई की ओर से फाड़ा जाता है
  • तत्पश्चात् यह मान लिया जाता है कि उस पुरुष ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया

ओजकौ 

  • रात्रिभर जागरण करना ओजकौ कहलाता है

मानव विक्रय प्रथा

  • सर्वप्रथम रोक – 1847 ई., जयपुर के पॉलिटिकल एजेंट लुडलो के प्रयासों से जयपुर रियासत 

चारी प्रथा 

  • टोंक तथा भीलवाड़ा जिले में 
  • दहेज लड़की वाले ना देकर लड़के वाले देते हैं

कूकड़ी रस्म 

  • साँसी जनजाति में प्रचलित 
  • विवाह से पहले लड़की द्वारा चरित्र की परीक्षा देना

दापा प्रथा

  • जनजातियों में वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को वधू मूल्य देना

अनाला भोर-भू प्रथा

  • गरासिया जनजाति में नवजात शिशु की नाल काटना

अट्टा-सट्टा प्रथा

  • विवाह प्रथा जिसमें लड़की के बदले में उसी घर की लड़की को बहू के रूप में लेना

नांगल

  • नया मकान बनाने के बाद नवनिर्मित गृह के प्रवेश की रस्म

धरेजा

  • अविवाहित पुरुष या विधुर द्वारा अविवाहित स्त्री व विधवा से आपसी सहमति से विवाह करना

तागा करना

  • आत्महत्या के लिए शरीर पर शस्त्र आदि से घाव करना

जम्मर

  • पुरुषों द्वारा जौहर करना

आन प्रथा

  • मेवाड़ में प्रचलित आन प्रथा (स्वामी भक्ति की शपथ)
  • 1863 ई में शंभू सिंह के काल में समाप्त 

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