राजस्थान में ब्रिटिश हस्तक्षेप और प्रशासनिक नियंत्रण

राजस्थान में ब्रिटिश हस्तक्षेप और प्रशासनिक नियंत्रण राजस्थान का इतिहास में ब्रिटिश हस्तक्षेप और प्रशासनिक नियंत्रण का अध्ययन महत्वपूर्ण है। प्रारंभिक ब्रिटिश नीतियाँ और सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance) के माध्यम से अंग्रेजों ने राजस्थान की रियासतों पर राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव बढ़ाया। इस दौरान राजस्थान की रियासतों ने अंग्रेजों से संधियाँ कीं और ब्रिटिश काल में सामाजिक सुधारों के प्रयास जैसे देश हितैषिणी सभा और वाल्टर कृत हितकारणी सभा के माध्यम से सामाजिक सुधारों को बढ़ावा दिया गया।

प्रारंभिक ब्रिटिश नीतियाँ

  • वॉरेन हेस्टिंग्ज (1772–1785) – 
    • नीति: – सुरक्षा घेरे की नीति (Policy of Ring Fence)।
    • उद्देश्य: – अंग्रेजी प्रदेशों को मुख्य शत्रुओं (विशेषकर मराठों) से बचाना।
    • तरीका: – पड़ोसी राज्यों से मैत्री संधि कर उन्हें बफर राज्य बनाना।
  • लॉर्ड कॉर्नवालिस (1786–1793) – 
    • नीति: अहस्तक्षेप की नीति (Policy of Non-intervention)।
    • अंग्रेज भारतीय शासकों के आंतरिक मामलों में नहीं हस्तक्षेप करेंगे।

सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance)

  • परवर्त्तक: लॉर्ड वैलेजली (1798–1805)।
    • शर्तें:
      • राज्य की आंतरिक सुरक्षा व विदेश नीति अंग्रेजों के अधीन।
      • राज्य को खर्च उठाना होगा।
      • राज्य में अंग्रेज़ रेज़िडेंट नियुक्त।
      • सेना राज्य के खर्च पर रखी जाती।
      • भारत में प्रथम संधि: –  1798, हैदराबाद निज़ाम।
    • राजस्थान में प्रारंभिक प्रयास (सहायक संधि से पूर्व) – 
      • जयपुर (महाराजा पृथ्वीसिंह) → 1776 में अंग्रेजों से मैत्री की इच्छा प्रकट की।
      • जोधपुर राज्य → प्रयास असफल।

आंग्ल–मराठा युद्ध व सुर्जी अर्जन गाँव की संधि (30 दिसम्बर 1803) – 

  • मराठों की हार, सिंधिया ने अंग्रेजों से संधि की।
  • परिणाम: – 
    • जयपुर व जोधपुर अंग्रेजी प्रभाव में आए।
    • अंग्रेज व राजपूतों के बीच संधि का मार्ग प्रशस्त।

राजस्थान की प्रमुख संधियाँ (1803–1805) – 

  • भरतपुर – 
    • प्रथम संधि: 29 सितम्बर 1803, रणजीत सिंह व वैलेजली।
    • शर्तें:
      • अंग्रेज सुरक्षा देंगे,
      • खिराज नहीं लेंगे।
      • 1804: रणजीत सिंह ने होल्कर को शरण दी → अंग्रेजों ने आक्रमण किया (5 माह घेराबंदी असफल)।
नई संधि: अप्रैल 1805 →
  • पूर्व स्थिति बहाल, परगने अलवर को दिए गए।
  • डीग क्षेत्र वापस।
  • भरतपुर राजकुमार अंग्रेजों के साथ रहेंगे।
  • 20 लाख रुपये क्षतिपूर्ति।
  • महत्त्व: 1803 की संधि की तुलना में अपमानजनक, परंतु डीग पर जाटों का स्थायी अधिकार।
  • अलवर – 
    • संधि: – 14 नवम्बर 1803, महाराजा बख्तावर सिंह।
    • शर्तें:-
      • अलवर का स्वतंत्र अस्तित्व मान्य।
      • अंग्रेज आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
      • कर नहीं वसूला जाएगा।
      • अलवर की सेना अंग्रेजों के सहयोग में उपलब्ध होगी।
    • सहयोग:- अलवर ने लासवाड़ी के युद्ध (1803) में अंग्रेजों को सहायता दी।
    • महत्त्व: –  राजस्थान का प्रथम विस्तृत रक्षात्मक–आक्रामक संधि करने वाला राज्य।
  • जयपुर – 
    • संधि: –  12 दिसम्बर 1803, महाराजा जगतसिंह द्वितीय।
    • शर्तें:-  अलवर जैसी ही।
    • परिणाम:- 1805 में जनरल बालों ने संधि भंग की।
  • जोधपुर – 
    • संधि:-  22 दिसम्बर 1803, महाराजा मानसिंह।
    • शर्तें:- 
      • परस्पर मित्रता।
      • खिराज नहीं।
      • फ्रांसीसी अधिकारियों को नियुक्त न करने की शर्त।
    • पुष्टि:- 15 जनवरी 1804।
    • विवाद: – मानसिंह ने नई संधि का प्रस्ताव किया, अंग्रेजों ने अस्वीकार किया।
    • परिणाम:- 1804 में संधि रद्द।

राजस्थान की रियासतों द्वारा ब्रिटिश सरकार के साथ अधीनस्थ पार्थक्य संधि (1817–1818)

  • करौली – 
    • अधीनस्थ पार्थक्य की नीति स्वीकार करने वाली राजस्थान की पहली रियासत।
    • तारीख:-  9/15 नवम्बर 1817।
    • शासक:-  हरबक्षपालसिंह।
  • कोटा – 
    • तारीख:-  26 दिसम्बर 1817।
    • मुख्य प्रशासक: – झाला जालिमसिंह।
    • गवर्नर जनरल का विशेष प्रतिनिधि:-  चार्ल्स मेटकॉफ।
  • उदयपुर – 
    • तारीख:-  23 जनवरी 1818।
    • शासक:-  महाराणा भीमसिंह।
  • बीकानेर – 
    • तारीख:-  21 मार्च 1818।
    • शासक:-  महाराजा सूरत सिंह।
  • मुख्य बिंदु – 
    • ये सभी संधियाँ 1817–1818 के काल में की गईं।
    • इन संधियों के माध्यम से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजस्थान की अधिकांश रियासतों को अपनी अधीनस्थ प्रणाली में ले लिया।
  • ब्रिटिश सरकार के साथ सहायक संधि की मुख्य विशेषताएँ – 
    • स्थानीय सेना का विघटन और ब्रिटिश सेना की नियुक्ति
    • सहायक संधि करने वाले भारतीय शासक को अपनी सशस्त्र सेना को भंग करना पड़ता था।
    • राज्य में ब्रिटिश सेना की टुकड़ी रखी जाती थी।
  • व्यय भार का प्रावधान –  
    • ब्रिटिश सेना के रखरखाव का सारा खर्च शासक को उठाना पड़ता था।
    • भुगतान में विफलता की स्थिति में राज्य का कुछ क्षेत्र अंग्रेजों को सौंप दिया जाता था।
  •  रक्षा का वादा – अंग्रेजों ने वचन दिया कि वे विदेशी आक्रमणों और आंतरिक विद्रोहों से राज्य की रक्षा करेंगे।
  • आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप – 
    • सिद्धांततः– अंग्रेज हस्तक्षेप न करने का वादा करते थे,
    • लेकिन वास्तविकता में अक्सर हस्तक्षेप करते थे।
    • राज्य के आंतरिक मामलों की निगरानी के लिए एक ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त किया जाता था।
  • विदेशी और आंतरिक संधियों पर रोक –  बिना अंग्रेजों की अनुमति के राज्य किसी विदेशी शक्ति या अन्य भारतीय रियासत से राजनीतिक संपर्क या संधि नहीं कर सकता था।

राजस्थान की रियासतों की अंग्रेजों से संधियाँ:

रियासतशासक / प्रतिनिधिविशेष विवरण
करौली: 9 नवम्बर 1817महाराजा हरबक्षपाल सिंहअधीनस्थ पार्थक्य की नीति के अंतर्गत अंग्रेजों से संधि करने वाली राजस्थान की प्रथम रियासत
टोंक: 17 नवम्बर 1817अमीर खाँ पिण्डारीसंधि के तहत टोंक व रामपुरा को स्वतंत्र रियासत बनाया गया, अमीर खाँ को नवाब स्वीकार किया गया। लूटमार पर रोक।
कोटा: 26 दिसम्बर 1817महाराव उम्मेदसिंह-Iदीवान झाला जालिमसिंह की सक्रियता से संधि। प्रतिनिधि – शिवदान सिंह, सेठ जीवनराम, लाला हुक्मचंद।
जोधपुर: 6 जनवरी 1818महाराजा मानसिंहप्रतिनिधि – आसोपा बिशनराम, व्यास अभयराम। अंग्रेजी पक्ष से चार्ल्स मेटकॉफ।
मेवाड़ (उदयपुर): 23 जनवरी 1818महाराणा भीमसिंहप्रतिनिधि – ठाकुर अजीतसिंह। उदयपुर को आय का 25% खिराज देना पड़ा, बाद में 3/8 निर्धारित।
बूंदी: 10 फरवरी 1818महाराव विष्णुसिंहवार्षिक 80,000 रुपये खिराज देना तय।
बीकानेर: 21 मार्च 1818महाराजा सूरतसिंहप्रतिनिधि – ओझा काशीनाथ, चार्ल्स मेटकॉफ। पुष्टि – लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने 21 मार्च 1818, पातारसा घाट (घाघरा नदी) पर।
किशनगढ़: 07 अप्रैल 1818महाराजा कल्याणसिंहकिशनगढ़ को खिराज से मुक्त रखा गया, क्योंकि यह मराठों को चौथ नहीं देता था।
जयपुर: 2 अप्रैल 1818महाराजा जगतसिंह-IIप्रतिनिधि – चार्ल्स मेटकॉफ व ठाकुर रावल बैरिसाल नाथावत। अनुमोदन – 15 अप्रैल 1818।
प्रतापगढ़: 5 अक्टूबर 1818महारावल सामंतसिंह
डूंगरपुर: 11 दिसम्बर 1818महारावल जसवंतसिंह-II
जैसलमेर: 12 दिसम्बर 1818महारावल मूलराज-IIअंग्रेजों को खिराज/शुल्क देने का कोई प्रावधान नहीं।
बाँसवाड़ा: 25 दिसम्बर 1818महारावल उम्मेदसिंह
सिरोही: 11 सितम्बर 1823महाराजा शिवसिंहजोधपुर राज्य के दावे के कारण सबसे अंतिम संधि

सती प्रथा – 

  • कानून निर्माण: 4 दिसंबर 1829 – लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा बंगाल सती रेग्युलेशन पारित।
  • उद्देश्य: सती प्रथा को अमानवीय मानते हुए पूरे ब्रिटिश भारत में अवैध घोषित करना।
  • प्रेरणा: राजा राममोहन राय के सुधारवादी प्रयास।
  • स्वतंत्रता के बाद: 1987 – राजस्थान उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि सती प्रथा विधि सम्मत नहीं है।

कन्या वध निषेध – 

  • प्रथम प्रयास: राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में महाराणा ने ब्रिटिश एजेंट पर दबाव डालकर कानून बनवाया।
  • अन्य राज्य:
    • कोटा → कन्या वध निषेध कानून।
    • जोधपुर (1839 ई.) → Code of Rules बनाए।
    • उदयपुर (1844 ई.) → कन्या वध को अनुचित घोषित किया।

बाल विवाह निषेध

  • राजस्थान स्तर पर:-
    • अलवर रियासत → 10 दिसम्बर 1903 को प्रथम बाल विवाह निषेध कानून।
    •  राष्ट्रीय स्तर पर: –
      • शारदा एक्ट 1929 (लागू – 1 अप्रैल 1930)
        • लड़के की उम्र – 18 वर्ष
        • लड़की की उम्र – 14 वर्ष
        • 1978 संशोधन: लड़के – 21 वर्ष, लड़की – 18 वर्ष।
  • राज्य स्तरीय पहल: राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश → विवाह पंजीकरण अनिवार्य।
  • राष्ट्रीय कार्य योजना 2005: लक्ष्य 2010 तक बाल विवाह समाप्त करना।
  • बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006: – माता-पिता, रिश्तेदार, बाराती, पुरोहित सभी दंडनीय।

जयपुर ब्रिटिश संरक्षण समिति का प्रयास (1844 ई.) –

  • 1844 ई. में जयपुर ब्रिटिश संरक्षण समिति ने सती प्रथा उन्मूलन हेतु विधेयक पारित किया।
  • यह राजस्थान में सती प्रथा रोकने का पहला वैधानिक प्रयास था।
  • विधेयक को न तो विशेष समर्थन मिला, न ही विरोध।
  • ब्रिटिश भारत में सती प्रथा निषेध (1829 ई.) –
    • गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने 4 दिसंबर 1829 को बंगाल सती रेग्युलेशन पारित किया।
    • इस कानून से पूरे ब्रिटिश भारत में सती प्रथा पर रोक लगाई गई।
    • विधेयक में सती प्रथा को मानवता और सामाजिक भावनाओं के विरुद्ध बताया गया।

देश हितैषिणी सभा –

  • स्थापना: 2 जुलाई 1877
  • स्थान: उदयपुर (मेवाड़ राज्य, राजपूताना)
  • यह राजस्थान राज्य का पहला संगठित सुधारात्मक प्रयास था।
  • इस सभा से प्रेरित होकर अन्य देशी रियासतों ने भी सामाजिक सुधारों की पहल की।
  • बाल विवाह के खर्चों पर नियंत्रण करना।
  • बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने के नियमों में संशोधन करना।

वाल्टर कृत हितकारणी सभा –

  • स्थापना: जनवरी 1889 ई.
  • स्थान: अजमेर
  • स्थापित करने वाले: अजमेर के कार्यवाहक A. G. G. (ए. जी. जी.)
  • नाम: राजपूत हितकारिणी सभा (वाल्टर कृत)
  • सदस्यों की संख्या: पुराने सदस्य – 20, नए सदस्य – 14
  • मुख्य उद्देश्य और सुधार – 
    • बहुविवाह प्रथा को समाप्त करने का सुझाव।
    • टीका और उपहार प्रथा (विवाह पूर्व नकद राशि, कपड़े, आभूषण आदि देने की प्रथा) को फिजूलखर्ची मानकर समाप्त करने की सिफारिश।
    • बाल विवाह रोकने के लिए विवाह की न्यूनतम आयु निर्धारित करने का सुझाव:
      • लड़का – 18 वर्ष
      • लड़की – 14 वर्ष

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